रविवार, 11 जनवरी 2009

महिलाओं के लिये किसी वरदान से कम नहीं --- पैप स्मियर टैस्ट !!

शायद ही आपने सुना हो कि महिलाओं को नियमित तौर पर यह पैप स्मियर टैस्ट -Pap Smear Test- करवाना अत्यंत आवश्यक है --- लेकिन मैंने आज तक कम ही देखा है कि महिलाएँ स्वयं किसी महिला-रोग विशेषज्ञ के पास इस टैस्ट के लिये गई हों--- और हमारे देश में तो महिलाओं के लिये यह टैस्ट करवाना और भी ज़रूरी है --- क्योंकि यहां पर गर्भाशय के कैंसर के बहुत केस पाये जाते हैं।

पैप स्मियर टैस्ट में होता क्या है ?- गर्भाशय के मुख ( cervix – the entrance to the uterus, located at the innere end of vagina) –से कुछ कोशिकायें ( cells) ले कर उन का निरीक्षण किया जाता है कि कहीं ये गर्भाशय के कैंसर से ग्रस्त तो नहीं हैं।

गर्भाशय का कैंसर जिस वॉयरस के कारण होता है उसे ह्यूमन पैपीलोमा वायरस ( human papillomavirus or HPV) कहा जाता है।

पैप स्मियर टैस्ट में इन कोशिकाओं को सूक्ष्मदर्शी उपकरण से देख कर यह पता लगाया जाता है कि कहीं ये कोशिकायें कैंसर से ग्रसित तो नहीं हैं, कहीं ये कैंसर की पूर्व-अवस्था में तो नहीं हैं !! आज कल तो पैप-स्मियर टैस्ट के अलावा HPV test के द्वारा यह भी ढूंढ निकालते हैं कि एचपीवी ( ह्यूमन पैपीलोमा वॉयरस) संक्रमण है या नहीं !!

वैसे तो जो महिलायें एचपीव्ही ( HPV) से बाधित है उन में से बहुत कम महिलाओं में गर्भाशय का कैंसर उत्पन्न होता है लेकिन एक बात तो निश्चित है कि ह्यूमन पैपीलोमा वॉयरस के संक्रमण की वजह से यह जोखिम बढ़ जाता है।

सभी महिलाओं को यह टैस्ट करवाना ज़रूरी है जिन की आयु 21 वर्ष या उस से ज़्यादा है --- इस से कम उम्र की उन महिलाओं को भी यह टैस्ट करवाना ज़रूरी है जो कि सैक्सुयली एक्टिव हैं।

और यह पैप स्मियर टैस्ट महिलाओं को एक से लेकर तीन साल के भीतर ( जैसी भी आप की स्त्री-रोग विशेषज्ञ सलाह दे) रिपीट करवाना चाहिये --- अगर कोशिकाओं में किसी तरह के बदलाव पाये जाते हैं तो यह टैस्ट इस से पहले भी रिपीट करवाना पड़ सकता है।


महिलाओं का यह टैस्ट तभी किया जाता है जब वे मासिक-धर्म के पीरियड में न हों, इस टैस्ट को करवाने के 24 घंटे पहले संभोग नहीं किया जाना चाहिये। और टैस्ट से पहले योनि में किसी तरह की क्रीम( vaginal creams) का इस्तेमाल वर्जित है।

इस टैस्ट में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती --- इसे समझने के लिये एक बात सुनिये – अगर मुझे मुंह के कैंसर की जांच के लिये इस तरह का ही स्मियर टैस्ट( ओरल स्मियर) करना होता है तो मैं एक स्पैचुला ( आप यह समझ लें कि एक तरह का ऐसा औज़ार जिस से जुबान को थोड़ा नीचे दबा कर गले का निरीक्षण किया जाता है – tongue depressor की तरह से दिखने वाला एक औज़ार ) --- इस्तेमाल करता हूं --- मुंह के अंदर गाल पर इसे थोड़ा घिसने के बाद जो कोशिकाएं प्राप्त होती हैं उन्हें सूक्ष्मदर्शी उपकरण ( microscope) की सहायता से चैक किया जाता है) --- बिल्कुल उसी तरह से जो स्त्री-रोग विशेषज्ञ यह टैस्ट कर रही हैं वह एक गोलाकार स्पैचुला ( rounded spatula) को आहिस्ता से गर्भाशय की बाहरी सतह पर आहिस्ता से घिसने के बाद एकत्रित हुई कोशिकाओं को लैब में माइक्रोस्कोप के द्वारा चैक किये जाने के लिये भेज देती हैं।

माइक्रोस्कोप के द्वारा चैक-अप द्वारा यह देखा जाता है कि कहीं इन कोशिकाओं में कोई असामान्य ( abnormal) कोशिका तो नहीं है , और अगर है तो फिर स्त्री-रोग विशेषज्ञ समुचित उपचार की सलाह दे देती हैं।

एक अंग्रेज़ी कहावत है ---- a stitch in time saves nine !!---अगर समय रहते किसी फटे कपड़े को एक टांका लगा दिया जाये तो भविष्य में लगने वाले नौ टांकों से बचा जा सकता है --- और यहां भी पैप-स्मियर टैस्ट के लिये भी यह बात बिलकुल उसी तरह से लागू होती है ।

वैसे तो अच्छे प्राइवेट हास्पीटल में महिलाओं के हैल्थ-चैक अप प्लान में यह टैस्ट सम्मिलित होता ही है ------लेकिन मुझे अच्छा तब लगेगा अगर आप महिलाओं में से किसी ने अभी तक इस टैस्ट के बारे में सुना नहीं है, करवाया नहीं है तो बिना किसी तरह की स्त्री-रोग संबंधी ( without any gynaecological problem) शिकायत के भी अपनी स्त्री-रोग विशेषज्ञ से नियमित तौर पर मिलें और इस टैस्ट को करवाने के बारे में चर्चा करें। यह बहुत ही ----बहुत ही ----बहुत ही ----- बहुत ही ----- ज़रूरी है ......ज़रूरी है ।

PS……..पुरूष पाठको, आप ने यह पोस्ट पढ़ी--- बहुत बहुत धन्यवाद। लेकिन अगर आप इसे अपनी श्रीमति जी को भी पढ़वायेंगे तो आभार होगा---- और अगर इस का एक प्रिंट-आउट लेकर उन्हें थमा देंगे तो मुझे बहुत खुशी होगी --- और उन्हें यह भी संदेश दें कि इस के बारे में अपनी सखी-सहेलियों से भी चर्चा करें।

यकायक ध्यान उस विज्ञापन की तरफ़ जा रहा है ---- जो सचमुच बीवी से करते प्यार, हॉकिंग्ज़ से कैसे करें इंकार ---- तो सुविधा के लिये हॉकिंग्ज़ की जगह पैप-स्मियर लगा दें, तो कैसा रहेगा !!

शनिवार, 10 जनवरी 2009

सावधान -- वज़न कम करने वाले प्रोडक्ट्स खतरनाक !!

रिश्तेदारी में एक महिला थीं – आज से लगभग पच्चीस-तीस साल पहले की बात है – 35-40 साल की उम्र थी -- स्वास्थ्य की प्रतिमूर्ति दिखती थीं – लेकिन उन्हें किसी भी हालत में अपना वज़न कम करना था--- इसलिये वे कुछ पावडर टाइप की दवाईयां ले रही थीं --- मैं सत्तर-अस्सी के दशक की बात कर रहा हूं ---- एक-दो वर्षों के बाद ही पता चला कि उन्हें लिवर कैंसर हो गया है--- डाक्टरों ने ढूंढ निकाला कारण को –वही मोटापा कम करने वाले पावडरों का सेवन – कमज़ोर होते होते वह कुछ ही समय में चल बसीं।

कुछ दिन पहले जब अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने लोगों के नाम यह चेतावनी जारी की है कि अमेरिका में वज़न कम करने के ऐसे लगभग 12 उत्पाद हैं जिन से बच कर रहने की विशेष ज़रूरत है क्योंकि इनमें कुछ घटक ( ingredients) ऐसे भी होते हैं जिन के बारे में इन्हें बनाने वाली कंपनियां बताती ही नहीं हैं और जो स्वास्थ्य के लिये बेहद खतरनाक हो सकते हैं।

अमेरिका में ऐसे प्रोडक्ट्स कुछ रिटेल स्टोरों पर एवं इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध हैं जिन के बारे में यह बताया जाता है कि इन में प्राकृतिक अथवा हर्बल पदार्थ ही मौजूद हैं । लेकिन इन की पैकिंग के लेबलों पर जिन इनग्रिडिऐंट्स के बारे में कुछ भी बताया नहीं होता उन में मिर्गी के इलाज के लिये इस्तेमाल होने वाली दवाई से लेकर एक कैंसर पैदा कर सकने की क्षमता रखने वाला पदार्थ ( suspected carcinogen) भी हो सकता है, ऐसा अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने कहा है।

अकसर मैं देखता हूं कि कैमिस्ट की दुकानों पर , हिंदी की अखबारों में अथवा स्कूटर के कवरों पर इस तरह के मोटापा कम करने वाले उत्पादों के विज्ञापन अकसर दिख जाते हैं—और मैं व्यक्तिगत रूप से तो अपने मरीज़ों को इन के बारे में आगाह करता ही रहता हूं लेकिन ऐसा सोचता हूं कि इन से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में लोगों को व्यापक स्तर पर सचेत करने की बहुत ही ज़्यादा ज़रूरत है। ध्यान यह भी आ रहा है कि अगर आज की तारीख में अमेरिका जैसे देश में इस तरह की उत्पादों के बारे में चेतावनियां जारी की जा रही हैं तो फिर हमारे देश में ऐसे ही उत्पादों-पावडरों एवं कैप्सूलों- के नाम पर क्या क्या बिक रहा होगा और ध्यान उस महिला की तरफ़ भी जा रहा है कि अगर आज ही हालात ऐसे हैं तो उस ने पच्चीस-तीस साल पहले जो खाया होगा वह भी किसी ज़हर से कम थोड़े ही होगा --- अब अगर मुझे कोई भी कहे कि नहीं, नहीं, यहां तो भई सब कुछ ठीक ठाक है तो वह कोई भी हो, उसे मैं केवल इतना ही कहूंगा --- Better you SHUT UP !!

समस्या यह भी है कि इस तरह के वज़न कम करने वाले उत्पादों में जो भी नुकसान देने वाली पावर-फुल ड्रग्स होती हैं जो कि आम लोगों के जीवन के लिये खतरा हैं --- उन के बारे में जानने का लोगों के पास तो बिल्कुल भी कोई साधन है ही नहीं। और इसीलिये अमेरिका में वहां की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने यह चेतावनी जारी की है।

एफ डी ए ने खोज करने पर पाया है कि इन मोटापा कम करने वाले जिन घटकों के बारे में लोगों को बिल्कुल बताया नहीं जाता ( undeclared ingredients) उन में सिबूट्रामीन( sibutramine- a controlled substance), रिमोनाबैंट( rimonabant- a drug not approved for marketing in the United states), फैनीटॉयन ( Phenytoin – मिर्गी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाई), और फिनोलथ्लीन( Phenolphthalein – एक ऐसा पदार्थ जिसे हम लोग कैमिस्ट्री के एक्सपैरीमैंट्स में इस्तेमाल करते हैं और जो कैंसर रोग पैदा कर सकता है !!) शामिल हैं।

जैसा कि ऊपर भी बताया जा चुका है सिबूट्रामीन ( sibutramine - a controlled substance) जो कि ऐसे अधिकांश उत्पादों में पाई गई – इस से उच्च-रक्तचाप, दौरे ( fits), दिल की धड़कन बढ़ना ( palpitations), हार्ट-अटैक अथवा दिमाग में रक्त-स्राव ( stroke) भी हो सकता है। और अगर कोई व्यक्ति पहले से कोई दवाईयां ले रहा है तो इस सिबूट्रामीन के उन के साथ मिल कर खतरनाक दुष्परिणाम पैदा होने का खतरा और भी बढ़ जाता है। गर्भवती महिलाओं में, ऐसी महिलाओं में जो शिशुओं को स्तन-पान करवाती हैं अथवा 16 साल से कम बच्चों में तो सिबूट्रामीन के सुरक्षात्मक पहलू का आकलन ही नहीं किया गया है।

रिमोनाबैंट एक ऐसी दवा है जिस का गहन परीक्षण तो अमेरिका में हुआ लेकिन इसे एफडीए द्वारा अमेरिका में मार्केटिंग की अनुमति नहीं मिली। यह ड्रग जो यूरोप में बिक रही है जो वहां पर अप्रूवड है... इस को अवसाद एवं आत्महत्या जैसे विचारों के साथ जोड़ा जा रहा है । और यूरोप में पिछले दो सालों में इसे लेने वाले 5 व्यक्तियों की मौत एवं 720 दुष्परिणाम( adverse reactions) के केस हो चुके हैं, यह फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने कहा है।

जाते जाते मुझे ध्यान आ रहा है कि हम लोग अकसर बड़े हल्के-फुलके अंदाज़ मे कह ही देते हैं कि अमेरिका हम से 100 साल आगे है ---लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर अमेरिका में आज की तारीख में इस तरह की दवाईयों की बिक्री हो रही है तो हमारे यहां क्या क्या नहीं बिक रहा होगा --- इस का जवाब मैं आप के ऊपर छोड़ता हूं, लेकिन कृपया इस बात का जितना भी प्रचार-प्रसार हो करियेगा।

और दूसरा एक तर्कसंगत विचार यह भी आ रहा है कि बहुत हो गया कि किसी दवा को एक जगह पर तो मंजूरी है लेकिन दूसरी जगह पर उसी दवा पर प्रतिबंध है --- कहीं ऐसा तो नहीं कि हम लोगों की चमड़ी कुछ ज्यादा ही मोटी है ( जो कि वास्तव में नहीं है !!) या वही बात सही है कि अगर किसी ने भगवान देखना है तो वह यहीं मौजूद है ----- लेकिन ये सब हमारे कमज़ोर मन की दलीले हैं, सच्चाई से मुंह छिपाने के बहाने हैं, हमारे ढोंग हैं---- इस मुल्क में भी एक जान की कीमत भी उतनी ही है जितनी किसी बहुत ही अमीर मुल्क में ---लेकिन अफ़सोस है तो केवल इसी बात का कि यहां तो मौत का कारण तक ढूंढ़ने की कोशिश ही कहां की जाती है ---- जो गया सो गया, उस की लिखी ही इतनी थी , यही कह कर उसे राइट-ऑफ कर दिया जाता है ---- बस, हो गई छुट्टी !!

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

बीस साल बाद दिल्ली में एक रविवार (2)






और जब मैं धौला कुआं से वापिस दिल्ली के अंतर्राजीय बस अड्डे की तरफ़ लौट रहा था तो दिल्ली का मिजाज बदला बदला सा लग रहा था --- कारण ?--- मुझे नहीं पता कि इस मिजाज को बदले कितना अरसा हो गया होगा क्योंकि मेरे ख्याल में मैं किसी रविवार के दिन इस दरियागंज वाली सड़क से 18-20 साल बाद ही गुज़र रहा था।
दरअसल मैं अक्टूबर एवं नवंबर 1988 में दो महीने के लिये बिना सर्विस के यूं ही सबर्बन पास बना कर दिल्ली की सड़कों की खाक छानने रोहतक से लगभग रोज़ निकल जाया करता था --- वास्तव में एक जगह से नियुक्ति-पत्र आने में ही देरी लग रही थी --- लेकिन फिर भी मैं दिल्ली में भी किसी नौकरी की तलाश में चला जाया करता था। इन दिनों मैं अपने खाली समय में नेशनल मैडीकल लाइब्रेरी में भी बहुत जाया करता था।

और हां, जो बात विशेष रहती थी कि रविवार के दिन जब कभी दरियागंज के रास्ते से निकलना होता था तो वहां फुटपाथ पर कहीं कहीं पर किताबों वाले ज़रूर दिख जाते थे --- इसलिये इन से कभी कभी किताब भी खरीद ली जाती थी --- कौन सी किताबें ?- अब यह तो मत पूछो ---अंग्रेज़ी की वही किताबें जिन की इस उम्र में हमारे समय में पढ़ने की चाहत हुआ करती थी। अब जब उन किताबों के बारे में सोचता हूं तो हंसी आती है। लेकिन वह भी दौर था --- इस को कैसे नकारा जा सकता है।

लेकिन इस बार रविवार को मैं इस दरियागंज वाली सड़क का बहुत ही अलग नज़ारा देख रहा था --- यहां पर फुटपाथ पर सैंकड़ों किताबों की दुकानें बिछी पड़ी थीं और किताबों के प्रेमी लोग इन को खरीदने में व्यस्त थे। यह नज़ारा देखते ही बन रहा था। ये सब तस्वीरें उसी दरियागंज एरिया की ही हैं--- अब सोचता हूं कि किसी दिन रविवार के दिन इस जगह ज़रूर जाऊंगा।

इस क्षेत्र में बहुत रौनक थी --- किताबों की दुकान के पास ही अंग्रेज़ों की पहनी हुई जैकेटें, स्वैटर भी मिल रहे थे --- यह सब कुछ भी हम लोग पिछले तीस सालों से देख रहे हैं लेकिन मैं इस बात की खोज करूंगा कि स्वास्थ्य के पहलू से ये वस्त्र कितने सुरक्षित हैं --- मैं इस के बारे में बहुत बार सोचता हूं। लेकिन इस तरह के कपड़े बेचने वालों के अड्डों पर भी बहुत भीड़ थी।

और भीड़ यहां पर इतनी थी कि लगता था जैसे कोई मेला लगा हो --- मुझे ध्यान आ रहा था कि इसी फुटपाथ से शायद बीस साल पहले कईं बेल्ट भी खरीदे थे --- शायद दो-चार टाईयां भी खरीदी थीं ----क्या है न इंटरव्यू के लिये ये सब करना ही पड़ता था । बस, याद आ रहा है कि जैसे ही यह नौकरी लग गई यह दिल्ली जा कर यूं ही लगभग बिना वजह जा कर घूमना बंद सा हो गया --- और फिर दो एक साल बाद जब यह नौकरी छोड़ कर यूपीएससी द्वारा नियुक्त कर लिया गया तो सीधा बंबई पहुंच गया।

उस दिन मुझे दरियांगज एरिया से जुड़ी सारी यादें एक चलचित्र की भांति याद आ रही थीं --- बिल्कुल उसी तरह जिस तरह लगभग रोज़ आज कल जब मैं शाम को हास्पीटल से ड्यूटी करने के बाद बाहर निकलता हूं तो मुझे अपने पिता जी अकसर याद आते हैं ---दरअसल यहां यमुनानगर में शाम को अंधेरा बहुत जल्दी हो जाता है और जब मैं ड्यूटी के बाद छः बजे बाहर आता हूं तो मुझे मेरे ख्यालों में अपने स्वर्गीय पिता जी का चिंतित चेहरा अकसर दिख जाता है ---बात 1974 की हैं –अमृतसर के डीएवी स्कूल में मैं पढ़ा करता था ---छठी कक्षा में ---हिसाब में थोड़ी मुश्किल होती थी इसलिये स्कूल में ट्यूशन रखी हुई थी जो साढ़े पांच बजे तक चलती थी और फिर स्कूल से पैदल आना होता थी ----चूंकि मुझे आते आते थोड़ा अंधेरा हो जाया करता था तो अकसर मेरे पिता जी मुझे अकसर रास्ते में ही देखने आ जाया करते थे ---- आज सोचता हूं कि मेरे में आत्मविश्वास बहुत था, बहुत निडर था लेकिन अपने पिता के लिये तो एक 11 साल का बालक ही था---- उन के चिंतित चेहरे को जो सुकून मुझे देखने के बाद मिलता था वह मैं ब्यां नहीं कर सकता --- शायद उन्हें यही लगता होगा कि उन्हें कुबेर का खजाना मिल गया ।

जो भी था उन दिनों मुझे यह अनुमान नहीं होता था कि अपने बच्चों की इंतज़ार में बिताये गये चंद मिनट क्यों सदियों जैसे लगते हैं --- क्योंकि अब अपने पिताजी वाला काम मैं अपने बच्चों के साथ करता हूं --- और जिंदगी का चक्र चल रहा है ---- The history repeats itself----इतिहास अपने आप को दोहराता है !!

बुधवार, 7 जनवरी 2009

कईं बार ऐसा भी होता है – आगे कुआं पीछे खाई !!

पी.एस.ए टैस्ट – इस का पूरा नाम है प्रोस्टेट स्पैसिफिक ऐंटीजन टैस्ट। दोस्तो, यह तो हम सब जानते ही हैं कि बढ़ती उम्र के साथ कईं बार पुरूषों को पेशाब में थोड़ी दिक्तत सी होने लगती है ---बार बार पेशाब आना, बिल्कुल थोड़ा थोड़ा पेशाब आना, पेशाब करने में दिक्तत होना अर्थात् ज़ोर लगना। इन सब के बारे में आपने अकसर सुना होगा और यह भी सुना होगा कि ये सब प्रोस्टेट के बढ़ने के हो सकते हैं--- भारत के इस हिस्से में तो आम तौर पर यही कहा जाता है कि उस की गदूद बढ़ गई है।

गदूद बढ़ने को कहते हैं --- प्रोस्टेट एनलार्जमैंट । इस के लिये सर्जन से संपर्क करना आवश्यक होता है जो कि अल्ट्रासाउंड करवाने के बाद और चैक-अप करने के बाद यह निर्णय लेते हैं कि इस का आप्रेशन करना अभी बनता है कि नहीं, क्या अभी दवाईयों से चलेगा या नहीं। इस में ऐसे भी कईं मरीज़ देखे जाते हैं जिन्हें थोड़ी बहुत तकलीफ़ तो होती है लेकिन वे इस तरफ़ ध्यान नहीं देते लेकिन एक दिन अचानक पेशाब रूक जाने की वजह से इन्हें एमरजैंसी में पेशाब के लिये नली ( catheter) भी डलवानी पड़ सकती है --- यह नली स्थायी तौर पर ही नहीं लग जाती --- इस से मरीज़ के रूके हुये पेशाब को निकाल दिया जाता है और उस के बाद इस बढ़े हुये प्रोस्ट्रेट के इलाज के बारे में सोचा जाता है।

अब देखते हैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात --- पुरूष की प्रोस्टेट ग्रंथि एक प्रोटीन बनाती है जिसे कहते हैं प्रोटीन स्पैसिफिक ऐंटीजन जिस के स्तर को रक्त की जांच द्वारा मापा जा सकता है। कुछ बीमारियों में जिन में प्रोस्टेट का कैंसर शामिल है प्रोस्ट्रेट इस को ज्यादा मात्रा में बनाने लगता है इसलिये किसी पुरूष के रक्त की जांच कर के डाक्टरों को प्रोस्टेट कैंसर का बिल्कुल प्रारंभिक अवस्था में पता चल सकता है।

डाक्टर लोग अभी तक इस के बारे में एक राय नहीं बना पाये हैं कि क्या 50 वर्ष की उम्र पार कर लेने पर सभी पुरूषों का यह टैस्ट करवाना उचित है । इस का कारण यह है कि इस प्रोस्टेट टैस्ट के द्वारा जिन प्रोस्टेट कैंसर का पता चलता है उन में से बहुत से केस ऐसे भी होते हैं जिन में से यह कैंसर प्रोस्टेट के एक बिल्कुल ही छोटे से क्षेत्र तक ही महदूद रहता है और ये कभी भी आगे फैलता नहीं है जिस की वजह से कोई मैडीकल व्याधियां उत्पन्न ही नहीं होती।

अब ऐसा है न कि इस तरह के बिल्कुल छोटे से कैंसर का भी जब किसी को पता चलता है और वह उस का कोई उपचार नहीं करवाता तो भी उस की तो रातों की नींद उड़ी रहती है। और अगर वह इस तरह के बिल्कुल छोटे कैंसर का ( जिस ने भविष्य में कभी फैलना ही नहीं था) --- उपचार करवा लेता है तो उस को इस के इलाज के संभावित साइड-इफैक्ट्स जैसे कि यौन-सक्षमता का खो जाना और पेशाब की लीकेज की शिकायत हो जाना ( possible side effects such as loss of sexual function, or leakage of urine). वैसे देखा जाए तो बिल्कुल उस कहावत जैसी बात ही यहां भी लग रही है न --- आगे कुआं पीछे खाई --- बंदा जाए तो कहां जाए !!

दूसरी तरफ़ बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर प्रोस्ट्रेट के ऐसे किसी कैंसर को प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़ लिया जाए और समुचित उपचार कर दिया जाए तो समझ लीजिये बंदे को जीवनदान मिल गया। इसीलिये डाक्टर आज कर इस बात को खोज निकालने में पूरे तन-मन से लगे हुये हैं कि आखिर किस तकनीक से उन्हें यह पता लगे कि कौन सा प्रोस्टेट कैंसर फैलेगा और किस केस में यह शेर सारी उम्र सोया रहेगा ------- ताकि सोये हुये शेर को बिना वजह क्यों जगाया जाए !!

इस टैस्ट के लिये कोई विशेष तैयारी की आवश्यकता होती नहीं है लेकिन इस की रिपोर्ट कृत्तिम तौर पर बहुत बढ़ी हुई न आए ( artificially high test level) इस के लिये अमुक व्यक्ति को टैस्ट से पूर्व एक दिन संभोग नहीं करना चाहिये। और अगर आप कोई दवाईयां ले रहे हैं तो इस की जानकारी अपने डाक्टर को दे दें – इस से आप के डाक्टर को आप के टैस्ट का परिणाम समझने में आसानी होगी।

अब यह पोस्ट पढ़ने के बाद किसी के भी मन में यह प्रश्न पैदा होना स्वाभाविक है कि अब तक अगर डाक्टर लोग ही बिल्कुल छोटे प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिये अपनी एक राय नहीं बना पाये हैं तो हम लोग कैसे निर्णय लें कि इलाज करवायें या नहीं ---- सर्जरी करवाये या नहीं ---- इस का जवाब तो दोस्तो यही है कि ये जो ये जो मंजे हुये सर्जन होते हैं इन को मरीज़ की जांच करने के बाद, अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट से , पीएसए टैस्ट से काफ़ी हद तक अनुमान हो ही जाता है कि इस केस की सर्जरी की आवश्यकता है कि नहीं !! और ध्यान रहे कि इन धुरंधर विशेषज्ञों की राय के आगे नतमस्तक होने के इलावा कोई चारा भी तो नहीं है क्योंकि इन्हें अंदर की भी सारी खबर है।

आज कल तो प्रोस्टेट के इलाज के लिये बहुत ही बढ़िया तकनीकों का पसार हो चुका है । दूरबीन से भी बढ़े हुये प्रोस्टेट को निकाल दिया जाता है --- इसलिये कोई इतना घबराने की ज़रूरत नहीं होती। लेकिन बात इस बात का ज़रा ध्यान रहे कि अगर आप की नज़र में आप का कोई मित्र या संबंधी बढ़े हुये प्रोस्टेट के लिये दवाईयां खाये चला जा रहा है तो उसे कहें कि अगली बार किसी सर्जन से जब परामर्श हेतु जाएं तो इस टैस्ट के बारे में थोड़ी चर्चा ज़रूर करें।

क्या मैं भी कभी कभी सुबह सुबह इतने गंभीर विषयों पर लिखना शुरू कर देता हूं ---- तो, ठीक है , दोस्तो, खुश रहिये और परमात्मा आप सब को सेहत की नेमत से नवाज़ता रहे ---- मुझे अभी ध्यान आ रहा है कि मैं भी आप सब हिंदी के प्रकांड विद्वानों में घुस कर हिंदी के शब्दों की धज्जियां उड़ाने में लगा रहता हूं --- और आप सब लोग इतने विशाल हृदय हो कि फिर भी मुझे स्वीकार कर लेते हो--- दरअसल मैं जिन शब्दों को जैसा सुनता हूं वैसा ही लिख देता हूं --- कल ही एक सज्जन की पोस्ट से पता चला ( कथाकार डॉट काम) कि सही शब्द है खतो-किताबत न कि खतो-खिताबत जैसा कि मैं सोचा करता था --- और दोस्तो मुझे यह तो ज़रूर ही बताने की कृपा करें कि सही शब्द सांझा है या साझा ---किसे से विचार सांझे किये जाते हैं या साझे ----मुझे इस में बहुत बार दुविधा होती है !!

अच्छा तो आज का दिन आप सब के लिये बहुत सी खुशियां ले कर आए ---- दो दिन पहले कनॉट-प्लेस की एक दीवार पर लिखी इस बात का ध्यान आ रहा है ------ When you look for the good in others, you discover the best in yourself !!----- जब आप किसी दूसरे की अच्छाईयां ढूंढने में लग जाते हो और आप को खुद की श्रेष्टताएं , विलक्षणता स्वयं ही दिखनी शुरू हो जाती हैं ---कहने वाले ने भी कितना बढ़िया बात कर दी है, दोस्तो !!

सोमवार, 5 जनवरी 2009

इंटरनेट पर स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी के लिये वेबसाइटें

इंटरनेट पर स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी प्राप्त करने के लिये कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण वेबसाइटों ( हाइपरलिंक्स सहित) को कहीं नोट करियेगा।

Centre for Disease Control and Prevention – सैंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल एवं प्रिवेंशन –
www.cdc.gov
अन्य विशेषताओं के साथ साथ इस वेबसाइट पर एक विभिन्न रोगों का एक ए टू ज़ेड ( A to Z Disease Index) है जिस के द्वारा आप किसी भी शारीरिक एवं मानसिक तकलीफ़ के बारे में विस्तृत्त जानकारी हासिल कर सकते हैं।

U.S. Department of Health & Human Services’s National Institutes of Health – यूनाइटेड स्टेटज़ के हैल्थ एवं ह्यूमन सर्विसिज़ विभाग की नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ हैल्थ की यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण वेबसाइट है जिस में स्वास्थ्य के सभी विषयों की समुचित जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
www.nih.gov

Labtestsonline --- लैबोरेट्री टैस्टों के लिये लैबटैस्ट ऑनलाइन – किसी भी लैबोरेट्री टैस्ट के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल करने के लिये अथवा किस बीमारी के लिये कौन से टैस्ट आवश्यक हैं, इस के लिये आप लॉग-ऑन कर सकते हैं ---
www.labtestsonline.org.uk

World Health Organisation – विश्व स्वास्थ्य संगठन – इस वेबसाइट पर भी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी बहुत अच्छे ढंग से मुहैया करवाई जाती है।
www.who.int

US Food and Drug Administration – अमेरिकी फूड एवं ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन – यह भी एक बहुत ही बढ़िया वेबसाइट है जिस में उपभोक्ताओं अर्थात् मरीज़ों के हितों को ध्यान में रख कर काफ़ी पठन सामग्री उपलब्ध है। अगर किसी दवा के कोई गल्त परिणाम सामने आ रहे हैं तो उसे भी इस वेबसाइट पर डाल दिया जाता है। इस साइट की इतनी विशेषताएं हैं कि आप इस की गली की तरफ भी कभी कभी ज़रूर निकल जाया करें – अगर अभी एक नमूना देखना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक करिये ---
www.fda.gov

स्वास्थ्य से संबंधित कुछ अन्य वेबसाइटों के लिंक यहां दिये जा रहे हैं --- अगर कभी समय निकाल पाये तो ज़रूर देख लीजियेगा –
US Department of Health and Human Services – अमेरिकी हैल्थ एवं ह्यूमन सर्विसिज़ विभाग का लिंक यह है
www.hhs.gov

कुछ अन्य साइटों को भी देखिये ---
www.healthfinder.gov
www.informedmedicaldecisions.org
www.womenshealth.gov
www.health.gov

National Library of Medicine – नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मैडीसन भी एक बहुत बढ़िया वेबसाइट है जहां से सेहत से संबंधित बहुत बढ़िया जानकारी हासिल की जा सकती है ।
http://www.nlm.nih.gov

Medline Plus – आप की सेहत से संबंधित बहुत ही विश्वसनीय जानकारी यहां पर उपलब्ध है –
www.nlm.nih.gov/medlineplus

HealthDay – हैल्थ-डे --- स्वस्थ जीवन के कुछ गुर हम लोग यहां पर भी सीख सकते हैं –
www.healthday.com

Masachussets Medical Society – मैसाच्यूसैट्ज़ मैडीकल सोसायिटी का वेबलिंक यह है –
www.massmed.org

International News Agencies – कुछ अंतरर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों की वेबसाइट पर भी स्वास्थ्य संबंधी शीर्षक के अंतर्गत हैल्थ से संबंधित उम्दा जानकारी मिल जाती है
Reuters www.reuters.com

United Press International www.upi.com

Xinhua news agency www.xinhuanet.com/english

Harvard health ( हारवर्ड हैल्थ ) की भी दो साइटें बहुत बढ़िया हैं ---

www.health.harvard.edu

harvardhealth.gather.com

CNN : Health – Medical News for CNN – सी एन एन चैनल पर स्वास्थ्य संबंधित जानकारी इस लिंक पर मिल सकती है –
www.cnn.com/Health

मेरे विचार है कि आप इन वेबसाइटों की एक सूची बना कर रख लें। वैसे तो कुछ डॉट-काम वेबसाइटों पर भी बहुत उपयोगी जानकारी उपलब्ध हो जाती है लेकिन मैं सरकारी साइटों, यूनिवर्सिटी साइटों एवं ऐजुकेशनल संस्थानों की वेबसाइटों पर ही ज़्यादा निर्भर करता हूं ।

कभी कभी इन में से किसी भी वेबसाइट पर थोड़ा टहल लेना चाहिये --- एकदम ताज़ी जानकारी उपलब्ध हो जाती है।
परिवार के प्रत्येक वर्ग के लिये इन वेबसाइटों पर जानकारी उपलब्ध रहती है जैसे कि युवा वर्ग, किशोर बालाओं के लिये, गृहिणीयों के लिये , पुरूषों के लिये अलग सैक्शन रहते हैं। इन साइटों के उन सैक्शनों पर ही जाना ज़्यादा ठीक रहता है जहां पर लिखा रहता है For the Public ---- इस सैक्शन की भाषा बहुत सरल एवं सहज होती है क्योंकि इन्हें एक नॉन-मैडीकल पाठक को ध्यान में रख कर ही लिखा जाता है।

आप की सेहत की कामना के साथ ,
डा प्रवीण चोपड़ा

PS --- यह पोस्ट मैंने लगभग 20-25 दिन पहली ठेल तो दी थी --- हाथ से लिख कर – इंक-ब्लागिंग के ज़रिये – लेकिन मुझे लग रहा था कि ऐसी पोस्ट में हाइपर-लिंक्ज़ के बिना बात बन नहीं पाती है , सो आज टाइम निकाल कर यह काम पूरा कर दिया है । और दूसरी बात यह है कि इंक-ब्लॉगिंग में लिखे को गूगल-सर्च उठा नहीं पाती !!

रविवार, 4 जनवरी 2009

लगभग बीस साल बाद दिल्ली में एक रविवार .....भाग 1..

मुझे आज दिल्ली में एक राइटर्ज़-मीट( लेखन मिलन) के सिलसिले में जाना था --- प्रोग्राम तो था सुबह दस बजे से एक बजे तक – मैं यहां यमुनानगर से सुबह लगभग साढ़े चार बजे बस से चला और दिल्ली के अंतर्राजीय बसअड्डे पर लगभग साढ़े आठ बजे पहुंच गया था। वैसे तो मुझे कहीं भी आने-जाने का इतना आलस्य आता है किक्या बताऊं --- लेकिन जब किसी बहाने लेखकों से मिलने की बात होती है तो मेरे रास्ते में न तो दूरी और न हीसमय की कोई बाधा आती है। आप हिंदी चिट्ठाकारों का भी कोई समारोह हिंदोस्तान के किसी भी कोने में रख के देख लीजिये --- वहां पर भी पहुंच ही जाऊंगा। लेखकों के साथ कुछ समय बिताने के चक्कर में तो अन्य जगहों के इलावा असम के जोरहाट में भी 10 दिन लगा के आ चुका हूं।

हां, तो जैसे ही दिल्ली के बस अड्डे पर उतरा बस-अड्डे की दीवार पर इस दीवारी सूचना नेस्वागत किया --- ये एक-दो नहीं एक दीवार पर तो बीस बार ही लिखा हुआ था । इस सूचना को देख कर इतना ही सोचा कि या तो यह भी लगे हाथ कानून ही बन जाये कि किसी ने भी पेशाब करना ही नहीं है – वरना इन बीसियों नोटिसों की व्याकरण ही थोड़ी दुरूस्त कर दीजाये --- केवल वाक्य के शुरू में यहां लगाने भर की तो बात है , वरना यह तो बीड़ी-सिगरेट की मनाही याद दिलाने वाले किसी विज्ञापन की तरह ही लग रहा है !!



वैसे तो इन नोटिसों में छिपी बैठी
एक ग्रैफिटी यह भी तो थी !!























वहां से मुझे धौला कुआं जाना था – लगभग 45 मिनट का सफ़र था। रास्ते में जाते हुये पता चला कि 1 जनवरी 2009 को दिल्ली में नो-होंकिंग डे ( अर्थात् उस दिन हार्न बजेंगे ही नहीं !!)- मुझे नहीं पता कि वह दिन वास्तव में दिल्ली वालों ने कैसे मनाया होगा लेकिन इतना सोच ही रहा था कि कुछ ही दूरी पर एक अन्य बड़े से पोस्टर पर निगाह पड़ गयी ---जिस में एक हार्न के साथ एक कुत्ते की तस्वीर थी और ये पोस्टर उस कुत्ते की तरफ़ से ही लगे हुये थे जिस में वो बहुत गुस्सा से फरमा रहे थे ---
मैं बिना वजह भौंकता नहीं हूंआप भी बिना वजह हार्न बजायें।

प्रिय टॉमी, हम लोग तुम्हारे जितने समझदार होते तो बात ही क्या थी , यह नौबत ही न आती कि तुम से भी प्रवचन सुनने पड़ते !!

आगे थोड़ी दूरी पर देखा कि मैट्रो का काम चल रहा था – उस के इर्द-गिर्द लगे लोहे की शीटों पर एक बहुत ही बढ़िया संदेश हम सब के लिखा हुआ था --- हैल्मेट इज़ मोर इंपोर्टैंट दैन यूअर हेयर-स्टाईल ---
आप के हेयर-स्टाईल से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है आप का हेल्मेट पहनना!!

जहां पर दरियागंज लगभग खत्म होता है वहां पर एक बहुत बड़ा बोर्ड यह भी दिख गया --- अंग्रेज़ी में लिखा हुआ - दान देने के लिये उपर्युक्त कंबल खरीदने के लिये इस मोबाइल पर संपर्क करें – इन की कीमत 75 रूपये से शुरू होती है। बात सोचने वाली यही है कि क्या दान वाले कंबलों में प्यार की इतनी ज़्यादा हरारत होती है कि एक 75 रूपये वाला कंबल भी फुटपाथ पर पड़े हुये किसी बदकिस्मत को इस नामुराद ठिठुरन से बचा सकता है ---- एक बात और भी है न कि अब किसी का जीना-मरना तो दानकर्त्ता के हाथ में थोड़े ही है ---- सुबह वह फुटपाथी फटीचर उठे या उठे ---लेकिन ठंड की वजह से अकड़ चुके इस बंदे के पड़ोस में ही फुटपाथ पर पड़ी अखबार के स्थानीय पन्ने पर धन्ना सेठ की रंगीन फोटो के नीचे कितना साफ़ साफ़ लिखा भी तो होगा कि कल शाम धन्ना सेठ ने गरीबों में 100 कंबल बांटे ------ गिनती पूरी होनी थी , सो हो गई !! और इसी चक्कर में धन्ना सेठ ने अपना तो लोक-परलोक सुरक्षित कर लिया ---कोई घाटे का सौदा थोड़े ही है ?

दिल्ली की महत्वपूर्ण जगहों की दीवारों पर अकसर गुमशुदा लोगों की तस्वीर देख कर बहुत रहम आता है --- अरेभई, किसे पड़ी है इस चक्कर में अपने दो मिनट खराब करे ---- जो गुमशुदा हो गयें उन का तो पता है कि वेगुमशुदा हो गये हैं लेकिन ये जो लाखों लोग अपने आप से ही गुम हो चुके हैं, महानगर की भागम-भाग में इन का खुद जीवन भी तो कहीं गुम हो चुका है लेकिन इन का गुमशुदा नोटिस क्या कभी कोई छापेगा -----क्योंकि मेरे साथ साथ सब के सब डरते हैं ----सच्चाई डरावनी होती है।

वहां लेखकों के मिलन के दौरान प्रोफैसर जावेद हुसैन से ये पंक्तियां भी सुनीं ---
----
रोज़ किया करते हो कोशिश जीने की ,
मरने की भी कुछ तैयारी किया करो।

अच्छा तो दिल्ली में बिताये गये इस रविवार की बकाया रिपोर्ट एवं उस लेखक-मिलन के बारे में अगली दो पोस्टों में लिखूंगा --- अभी नींद आ रही है ---आज सफर बहुत किया है ---अच्छा तो दोस्तो, शब्बा खैर !! शुभरात्रि !!

बुधवार, 31 दिसंबर 2008

पाबला जी के नाम पत्र –

पाबला जी, सति श्री अकाल -
सब से पहले तो आप का धन्यवाद इस बात के लिये करना चाहूंगा कि आप ने मेरा एक लेख पढ़ने के बाद उस पर एक बहुत अच्छी पोस्ट लिखी – उसे पढ़ कर बहुत अच्छा लगा – मैं यह केवल औपचारिक तौर पर ही नहीं कह रहा हूं बल्कि आप के साथ विस्तार से अपने विचार बांटने की कोशिश करता हूं।

जब कोई हमारे लेखन के बारे में बताता है तो मैं समझता हूं वह हिंदी भाषा के साथ साथ हमारी भी बहुत सेवा कर रहा है --- मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ --- एक बात है ना कि पाबला जी अगर कोई ठीक तरह से समझायेगा तो ही सुधरने की गुंजाईश रहती है। इसलिये भी मैं आप का बहुत धन्यवादी हूं।

आप ने लिखा कि मेरे ब्लॉग पर अंग्रेज़ी शब्दों की भरमार होती है – आप ने बिल्कुल सही कहा – और उसी दिन से मैंने यह ठान ली है कि जितना हो सकेगा इस तरफ़ दिया करूंगा। और अगर कभी कोई किसी भारी भरकम अंग्रेज़ी के शब्द का इस्तेमाल करना भी पड़ा तो शिष्टाचार वश उस के साथ ही एक प्रकोष्ठ में उस का हिंदी में शब्दार्थ लिख दिया करूंगा।

मैं आज ही सुबह देख रहा था कि अपने ज्ञानदत्त पांडे जी के चिट्ठे पर उन की आज की पोस्ट में उन्होंने एक अंग्रेज़ी शब्द को देवनागरी में लिखा तो लेकिन उस के साथ ही ब्रैकट डाल कर उस का हिंदी में शब्दार्थ भी लिख दिया –यह देख कर अच्छा लगा और कोशिश करूंगा कि नॉन-मैडीकल शब्दों के लिये मैं भी कुछ इस तरह की व्यवस्था कर दिया करूं ।

आपने बिल्कुल सही कहा कि जैसे चोपड़ा का सिर किसी शुद्ध हिंदी की साइट पर जाकर भारी होता है ,ठीक उसी तरह से किसी हिंदी प्रेमी का मेरी ब्लाग पर आने के बाद अंग्रेज़ी के इतने शब्द देख कर थोड़ा बहुत नाराज़ होना स्वाभाविक ही तो है। इस बात ने मुझे अपने अंदर झांकने का मौका दिया कि यार सिर दर्द की शिकायत केवल मेरी ही नहीं है, ऐसा दूसरे लोगों के साथ भी हो सकता है जो मेरी ब्लाग पर आते होंगे और कईं बार कुछ इंगलिश के शब्दों के चक्कर में नाराज़ भी हो जाते होंगे।

और एक बहुत ही खास बात जिस के साथ आप ने मुझे रू-ब-रू करवाया वह यह कि किसी हिंदी भाषी को क्या पड़ी है कि वह गूगल सर्च करते समय डायबिटिज़ ही लिखे --- आपने बिल्कुल सही कहा कि वह सीधे सीधे मधुमेह लिख कर ही क्यों न मधुमेह से संबंधित जानकारी प्राप्त कर लेगा ---- पाबला जी, आप के साथ पूरी तरह से सहमत हूं और विशेषकर जब मैंने इन दोनों तरीकों से गूगल-सर्च के नतीजे देखे तो मेरी तो आंखें ही खुल गईं।

आप ने बिल्कुल दुरूस्त कहा कि हम लोग वैसे भी तो कईं बातें सीखते ही हैं फिर हिंदी को भी सुधारने के लिये हमेशा प्रयासरत रहना चाहिये --- ऐसा ही होगा --- और ऐसा करने के लिये हम लोगों को किसी जगह जाने की ज़रूरत भी तो नहीं है --- हिंदी के चिट्ठों पर ही सब कुछ मिल जाता है – आज सुबह वकील साहब ( दिनेशराय द्विवेदी जी) की पोस्ट देखी जिस में उन्होंने विराम, अल्पविराम आदि के बारे में इतनी सहजता से समझा दिया कि क्या कहें !!

दरअसल मेरी बस एक ही समस्या है कि जब मैं किसी चिट्ठे पर हिंदी के बहुत बहुत कठिन शब्द देखता हूं तो मेरी ध्यान फिर वहां लगता नहीं ---- अब आप सोच रहे होंगे कि इस का क्या है यार, एक हिंदी की अच्छी सी डिक्शनरी खरीद लो ना --- दरअसल पाबला जी, शब्द कोषों का तो पूरा संग्रह है लेकिन बस तुरंत उस का शब्दार्थ देखने का आलस्य ही कर जाता हूं।

लेकिन अभी लिखते लिखते ही ध्यान आ रहा है कि अब एक ही चंद शब्दों को उस समय किसी कागज़ पर लिख लिया करूंगा और बाद में किसी समय उस का मतलब ढूंढ लिया करूंगा --- यहां मुझे ध्यान आ रहा है शास्त्री जी का ( sarathi.info) – मुझे लगता है कि वह हिंदी भाषी नहीं है लेकिन उन का भाषा ज्ञान देख कर मैं अकसर दंग रह जाता हूं। सीखने की सौभाग्यवश कोई भी सीमा होती नहीं है इसलिये मैं भी कोशिश करूंगा कि अपनी हिंदी में थोड़ा बहुत सुधार लाता चला जाऊं।

सोच रहा हूं कि एक ऐसा ब्लाग शुरू करूं जिस पर दिन में जितने कठिन शब्द देखे उन 8-10 शब्दों का शब्दार्थ उस में लिखा करूं --- इस समय यही विचार बन रहा है कि इस से एक तो आप सब हिंदी के विद्वानों को यह पता चलता रहेगा कि हिंदी के एक औसत पाठक का स्तर क्या है – उसे क्या मुश्किल लग रहा है , वह कितना समझ पा रहा है --- सोचता हूं यह काम तो शीघ्र शुरू करूंगा – स्वयं मेरे को भी इस से लाभ होगा और शेष हिंदी का औसर ज्ञान रखने वाले ( मेरे जैसे) बंधुओं के लिये भी यह ब्लॉग उपयोगी होगा --- इस के बारे में आप का क्या ख्याल है, लिखियेगा।

बस, अभी तो कहने को इतना ही है, पाबला जी, पत्र यहीं बंद कर रहा हूं --- आप को पत्र लिख कर बहुत अच्छा लगा --- और आप सब को भी नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनायें। और जाते जाते यह बताना चाहूंगा कि आप की पोस्ट देख कर बहुत ही अच्छा लगा --- आप ने कहा था कि मैं इसे अन्यथा न लूं ---वैसे तो सर उन में ऐसा कुछ था ही नहीं कि जिसे मेरे जैसा तुच्छ व्यक्ति अन्यथा ले सके और दूसरा यह कि मेरी खाल बहुत मोटी है । इसलिये आप से सविनय अनुरोध है कि भविष्य में भी अपना भाई समझ कर उचित मार्ग-दर्शन करते रहियेगा। शुभकामनाओं सहित,

प्रवीण
यमुनानगर

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

चलो यार थोड़ा ठंड का इंतजाम करें ....





जब देश के इस भाग में यह जुमला दो दोस्तों के बीच बोला जाए तो समझ लिया जाये कि शाम को लवली पैग की तैयारी हो रही है, चिकन फ्राई की बात हो रही है, टिक्के, फिश-फ्राई की तैयारी हो रही है , चिकन-सूप का प्रोग्राम बन रहा है वरना खरोड़ों के जूस ( बकरे की टांग) की चाह हो रही है।

लेकिन हम इस ठंड का इंतजाम करते हैं चलिये सीधी सादी मूंगफली से --- अभी अभी बाज़ार से लौटा तो घर के पास ही एक रेहड़ी पर एक दुकानदार मूंगफली भून रहा था –मैं भी वह खरीदने के लिये खड़ा हो गया और ये तस्वीरें सभी वही ही हैं।

हम लोग पंजाब में बचपन से देखते रहे हैं कि मूंगफली की रेहड़ी पर एक बहुत बड़ा ढेर लगा रहता है – उस के बीचों बीच एक छोटे से मिट्टी के बर्तन में उपले या छोटी छोटी लकड़ीयां जलाई जाती थीं। और हर ग्राहक को मूंगफली उस बर्तन को उठा कर गर्मागर्म देता था --- और अगर कोई दुकानदार थोड़ा आलस्य करता था और ढेर में से किसी दूसरी जगह से मूंगफली देने की कोशिश भी करता था तो उसे ग्राहक से हल्की सी झिड़की भी पड़ जाती थी कि गर्म दो भई गर्म।

फिर कुछ समय तक हम लोग मूंगफली के पैकेट खरीद कर ही काम चला लिया करते थे --- लेकिन उस में कभी इतना मज़ा आता नहीं है --- पता नहीं क्यों --- कितनी तो खराब मूंगफली ही उस में भरी होती है !!


पिछले लगभग तीन साल से मैं यमुनानगर – हरियाणा में हूं और यहां पर मूंगफली खाने का मज़ा ही अपना है । जैसा कि आप इस फोटो में देख रहे हैं इस शहर में जगह जगह रेहड़ीयों पर मूंगफली बिकती है --- बस, आप यह समझ लीजिये कि पहला जो भट्ठीयां नीचे ज़मीन पर हुआ करती थीं अब ये भट्ठीयां रेहड़ी के ऊपर इन दुकानदारों ने बना ली हैं।


आप को ये तस्वीरें देख कर ही कितना अच्छा लग रहा होगा --- ठंडी छू-मंतर हो रही है कि नहीं ? – इन दुकानदारों ने लकड़ीयों आदि का इस्तेमाल कर के भट्ठी जलाई होती है – जिस पर ये थोड़ी थोड़ी मूंगफली लेकर सेंकते रहते हैं और उसी समय ग्राहकों को देते रहते हैं – इन रेहड़ीयों के इर्द-गिर्द खड़ा होना ही कितना रोमांचक लगता है ---किसी कैंप-फॉयर से कतई कम नहीं --- और आप को यह बताना भी ज़रूरी है कि इस मूंगफली को नमक में भूना जा रहा है --- इस मूंगफली का टेस्ट बहुत बढ़िया होता है।

अभी मूंगफली की बात खत्म नहीं हुई तो ध्यान आ गया है रोहतक की शकरकंदी का ---जिसे दुकानदार रेत की धीमी आंच में सेंक कर इतना बढ़िया कर देते हैं कि क्या बतायें --- वैसे एक बात है इन मौसमी बहारों का मज़ा जो रेहड़ी के पास ही खड़े हो कर खाने में आता है ना उस का अपना अलग ही रोमांच है।

वैसे भी व्यक्तिगत तौर पर मेरा बहुत ही दृढ़ विश्वास में गुमनाम हो कर जीने का मज़ा ही अलग है --- जहां कोई किसी को ना पहचाने --- सब अपनी मस्त में मस्त --- तो लाइफ का मज़ा ही आ जाये --- जहां पर जीवन की छोटी छोटी खुशियों उसे इस बात के लिये न बलिदान करनी पड़ें कि यार, मैं यहां खड़ा हो जाऊंगा तो लोग क्या कहेंगे--- मैं यहां खड़ा होकर कुछ खा लूंगा तो लोग क्या कहेंगे ---- कहेंगे सो कहेंगे --- यह उन की समस्या प्राचीन काल से है --- उन्होंने तो कुछ तो कहना ही है !!
चल बुल्लिया चल उत्थे चलिये,
जित्थे सारे अन्ने,
ना कोई साडी जात पछाने,
ना कोई सानूं मन्ने।

मूंगफली की बात हो रही है और कहां हम लोग मूंगफली खाते खाते गपशप करते करते उस महान पंजाबी सूफी संत बाबा बुल्ले शाह की तरफ़ निकल गये।

हां, तो मैं उस रेहड़ी वाले की बात कर रहा था --- मैंने उस की रेहड़ी के पास खड़े खड़े ऐसे ही कह दिया --- पहलां तां हुंदियां सन भट्ठीयां, हुन एह कम हुंदै रेहड़ीयों पर –( पहले तो यह काम भट्ठीयों के द्वारा होता था लेकिन अब यही काम रेहड़ीयों पर होता है ) --- मेरे पास ही खड़े एक सरदार जी ने कहा --- हुन तां न ही भट्ठीयां ही रहीयां ते ना ही भट्ठीयां वालीयां ही रहीयां --- ( अब न तो भट्ठियां ही रहीं और न ही भट्ठी वालीयां ही रहीं !!) --- मुझे भी उस समय बचपन के दिन याद आ रहे थे जब हम लोग मक्का लेकर एक भट्ठी पर जाया करते थे और उस के पास एक बोरी के टाट पर बैठ जाया करते थे --- वह हमें पांच मिनट में फारिग कर दिया करती थी --- कहां वह नायाब मक्का और कहां ये पैकेट वाले अंग्रेज़ी कार्न-फ्लेक्स !!-- आज भी मुझे जब कोई पूछता है ना कि कार्न-फ्लेक्स खाने हैं तो मेरी आधी भूख तो इस इंगलिश के नाम से ही उड़ जाती है।

यह मैं जिस मूंगफली की रेहड़ी की बात कर रहा हूं --- इन के द्वारा बहुत ही बढ़िया किस्म की मूंगफली इस्तेमाल की जाती है – बिल्कुल साफ --- और इतनी बढ़िया महक।

लगभग छःसात साल पहले मैं जब एक नवलेखक शिविर में गया तो मुझे कुछ आइडिया नहीं था कि लेखन कैसे शुरू करना होता है --- और वहां से आने के बाद कईं साल तक मुझे लगता रहा कि यार ये लेखों के विषय तो बड़े ही सीमित से हैं --- जब मैं इन सब पर लेख लिख लूंगा तो फिर क्या करूंगा --- लेकिन पिछले दो-तीन साल से यह आभास होने लगा है कि केवल हमारा आलस्य ही हमारे आड़े आता है --- हम कलम उठाने में ही केवल सुस्ती कर जाते हैं---वरना लेखों का क्या है ---- लेखों के बीसियों विषय हमें रोज़ाना अपने इर्द-गिर्द दिखते हैं – बस इस के लिये केवल शर्त इतनी सी है कि बस केवल आंखें और कान खुले रखें और हमेशा ज़मीन से जुड़े रहें ।

अच्छा दोस्तो अब मूंगफली काफी खा ली है , थोड़ा थोड़ा खाना खा लिया जाये ----उस के बाद मूंगफली को गुड़ के साथ लेकर फिर बैठते हैं । बिल्कुल सच बताईयेगा कि इस पोस्ट के द्वारा इस सर्दी में भी आप को गर्मी का अहसास हुआ कि नहीं ---- क्या कहा…… नहीं ? ….फिर तो आप को इस मूंगफली के लिये यहां यमुनानगर ही आना होगा।

आज जब मैंने उस 19-20 साल के नवयुवक को देखा ....

तो मुझे पहले तो यही लगा कि वह मेरे पास किसी दांतों की तकलीफ़ के आया है लेकिन जैसे ही मुझे पता लगा कि वह हैपेटाइटिस-बी के लिये कुछ टैस्टों के लिये साइन करवाने के आया है तो मुझे बहुत बुरा लगा। दोस्तो, बुरा इसलिये लगा क्योंकि इस नवयुवक का व्यक्तित्व किसी अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी से किसी भी तरह से कम नहीं था ---मुझे लगता है कि उस का कद छः फुट तो होगा ही और सामान्य स्वास्थ्य भी बहुत बढ़िया था।

मेरे पास वह युवक इसलिये आया था क्योंकि कुछ एडवांस टैस्ट जो हमारे हास्पीटल में नहीं होते, उन टैस्टों को हमारा हास्पीटल बाहर प्राइवेट लैब से करवाने की व्यवस्था करता है और उस के लिये उस की स्लिप पर चिकित्सा अधीक्षक( जो काम मैं आजकल देख रहा हूं) – की स्वीकृति के लिये वह मेरे पास आया था।

अभी मैं उस की टैस्टों वाली स्लिप पढ़ पाता जिसे फिज़िशियन ने लिखा हुआ था, इतने में ही उस का पिता कहने लगा कि इसे देखो, क्या आप को लगता है कि इसे पीलिया है ? – मैं थोड़ा चुप था – उस की बात समझने की कोशिश कर रहा था। उस लड़के ने आगे बताया कि बस कुछ समय पहले वह पंजाब गया हुआ था और वहां पर उस ने रक्त-दान किया था। और कल ही वहां से फोन आया है कि मेरे रक्त में हैपेटाइटिस-बी के विषाणु ( वायरस) पाये गये हैं।

उस लड़के एवं उस के पिता की बातचीत से यही लग रहा था कि वे समझ रहे हैं कि लड़के ने रक्त दान किया है और इसी की वजह से वह इस हैपेटाइटिस-बी की चपेट में आ गया है। ऐसा मैंने पहले भी कुछ हैपेटाइटिस-बी के मरीज़ों के मुंह से सुना था और एक-दो एच.आई.व्ही संक्रमित व्यक्तियों से भी ऐसा ही कुछ सुन रखा था।

मुझे उस लड़के के साथ पूरी सहानुभूति थी --- बहुत बुरा लगता है जब हम लोग किसी इतने कम उम्र के इतने हृष्ट-पुष्ट इंसान को मिलते हैं जिसे अभी अभी पता चला हो कि उसे हैपेटाइटिस-बी की इंफैक्शन है। इसलिये मैंने उसे एवं उस के पिता को 10 मिनट लगा कर बहुत अच्छी तरह से इस के बारे में बता दिया।

दरअसल होता यूं है कि जब भी कोई रक्त दान शिविर लगता है तो रक्त-दाताओं का पता एवं फोन नंबर इत्यादि नोट किया जाता है – रक्त को इक्ट्ठा करने के बाद उस की यह जांच की जाती है कि उस में एचआईव्ही, हैपेटाइटिस बी, हैपेटाइटिस सी एवं मलेरिया जैसे रोगों के कीटाणु तो नहीं है ---अगर किसी रक्त दाता के रक्त में इस तरह का कोई संक्रमण पाया जाता है तो उस रक्त को नष्ट कर दिया जाता है और उस रक्त दाता को सूचित कर दिया जाता है । इस नौजवान वाले केस में भी यही हुआ था।

जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि लड़का बहुत ही स्वस्थ था --- उस का पिता पहले ही से मेरे को जानता था । उस के जो टैस्ट अभी करवाने के लिये फ़िज़िशियन ने लिखा था उस के बारे में मैंने उन्हें समझाया कि ये टैस्ट केवल इसलिये हैं कि लड़के के रक्त की पूरी तरह से जांच की जा सके --- हैपेटाइटिस बी की दोबारा जांच होगी, हैपेटाइटिस सी की भी होगी --- क्योंकि इन दोनों संक्रमणों के फैलने का रूट एक जैसा ही है। ये दोनों ही या तो संक्रमित सिरिंजों एवं सूईंयों के द्वारा, या संक्रमित रक्त के द्वारा अथवा संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध स्थापित करने से ही फैलते हैं।

मुझे उस नवयुवक से ये सब बातें करने के बाद यह नहीं लगा कि वह ऐसे किसी कारण के बारे में कोई ठीक से हिस्ट्री दे पाया है --- न तो उसे कभी रक्त ही चढ़ा था, न ही उसे कभी इंजैक्शन वगैरा लगने का ध्यान था और यौन-संबंधों के बारे में मैंने उस की उम्र को देखते हुये कुछ ज़्यादा प्रोब करना ठीक नहीं समझा ।

मैंने उसे समझाया कि ऐसा नहीं कि यह जो तकलीफ़ हो गई है यह लाइलाज है --- अभी तुम्हारे सारे टैस्ट हो रहे हैं—उस के बाद यह निर्णय होगा कि तुम्हारा क्या इलाज चलेगा—कोई चिंता की बात नहीं है।

सोचता हूं कि हमारे लिये भी किसी मरीज़ को बिल्कुल एक तकिया कलाम की ही तरह यह कह देना कितना आसान होता है कि यार, चिंता न करो – सब ठीक होगा। शायद कईं बार मरीज़ की मनोस्थिति को भांपते हुये ये शब्द कहने भी बहुत ज़रूरी होते हैं।

यह पाठकों की सूचना के लिये बताना चाहता हूं कि हमारे देश की लगभग दो फीसदी जनसंख्या इस हैपेटाइटिस-बी के वायरस की कैरियर है – इसे हम लोग कहते हैं एसिंपटोमैटिक कैरियर्ज़ – अर्थात् ऐसे लोग जिन के रक्त में हैपेटाइटिस बी की वायरस तो है लेकिन उन्हें इस से संबंधित बीमारी अभी नहीं है ---- और अभी ही क्यों, कईं बार तो कुछ लोग बिना किसी तकलीफ़ के सारी उम्र केवल कैरियर ( संवाहक) ही रहते हैं --- उन्हें तो इस से कोई तकलीफ़ होती नहीं लेकिन बेहद दुःखद बात यह है कि वे इस वायरस को किसी भी दूसरे व्यक्ति को देने में पूरे सक्षम होते हैं – चाहे तो अपने रक्त के द्वारा, अपनी लार के द्वारा अथवा यौन-संबंधों के द्वारा।

उस युवक के बारे में बहुत बुरा इसलिये भी लगा कि अभी उस की इतनी छोटी उम्र है ---अभी पूरी उम्र पड़ी है उस के आगे --- अगर वह एसिंपटोमैटिक कैरियर भी है ( asymptomatic carrier of Hepatitis B virus) – अगर टैस्टों से इस बात का पता चला – तो भी उपरोक्त कारणों की वजह से एक बहुत बड़ी परेशानी तो हो गई ---सारी उम्र खौफ़ के साये में जीना पड़ेगा --- I really felt very very bad for this youngman – He was the picture of perfect health !!

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इन नौजवान में हैपेटाइटिस-बी का वॉयरस आया कहां से --- अब इस के बारे में क्या कहा जाये ---जब तक किसी से उचित हिस्ट्री प्राप्त नहीं होती, कुछ कहा नहीं जा सकता – इतना तो तय है कि आती तो वॉयरस रक्त के अथवा किसी अन्य बॉडी फ्लूयड़ ( body fluilds ) के माध्यम से ही ।

हैपेटाइटिस बी से बचाव के टीके का ध्यान आ रहा है --- अकसर लोग इसे कितना लाइटली लेते हैं --- लेकिन देखिये जिस किसी को भी यह इंफैक्शन हो जाती है उस की तो सारी ज़िंदगी ही बदल जाती है।

उस नवयुवक की लंबी स्वस्थ ज़िंदगी के लिये मेरी ढ़ेरों शुभकामनायें एवं आशीष !!

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

ब्लॉगिंग की डगर की मेरी रूकावटें ...

एक साल से ज़्यादा हो गया है इस ब्लॉगिंग के चक्कर में पड़े हुये ---लेकिन बहुत बार बहुत कुछ लिखना चाहते हुये भी आलस्य कर जाता हूं- इस के कारण आज आप के समक्ष बैठ कर ढूंढने का प्रयास कर रहा हूं ---

1. एक कारण इस आलस्य का यह है कि मुझे मोबाइल फोन से कंप्यूटर में या लैपटाप में तस्वीरें ट्रांस्फर करने का ज्ञान नहीं है। और पिछले एक साल से ही सोच रहा हूं कि यह काम सीखना है --- लेकिन बस सोचता ही रहता हूं। मेरे पास इतनी इतनी बढ़िया तस्वीरों का संग्रह है कि क्या बतलाऊं ---- मुझे पता है कि यह सीखना 10-15 मिनट का काम है । लेकिन पता नहीं कभी इच्छा ही नहीं होती --- लेकिन इस चक्कर में मेरे लेखन पर बहुत ही ज़्यादा असर पड़ रहा है, इसलिये अब सोचता हूं कि इस काम को गंभीरता से लेकर इन तस्वीरों को लैपटाप पर ट्रांसफर करना भी सीख ही लूंगा।

इस आलस्य का एक कारण यह भी है कि हमारे घर में इतनी ज़्यादा तारें हैं कि मैं उन्हें देख देख कर कंफ्यूज़ ही रहता हूं। बस, मेरा तो नेट लग जाये तो मैं इत्मीनान कर लेता हूं। इतनी ज़्यादा तारें होने की वजह से जिस वक्त जिस केबल की ज़रूरत होती है वही नहीं मिलती, बस सब कुछ मिल जाता है। इस अव्यवस्था में मेरे बेटों की भी काफ़ी भूमिका है ---- कभी इन उपकरणों को व्यवस्थित करने की उन्होंने भी कोशिश नहीं की।

2. दूसरा कारण भी वैसे तो इस से मिलता जुलता ही है कि एक अच्छे खासे डिजीटल कैमरे से तस्वीरें लैप-टाप में ट्रांस्फर करना अभी मैंने सीखा नहीं है और छोटी छोटी बात के लिये मुझे किसी के ऊपर निर्भर रहना कुछ ठीक नहीं लगता। इसलिये बस उस में बंद तस्वीरें उस में ही बंद रहती हैं जब तक कि कोई उन को लैपटाप में या कंप्यूटर में ट्रांस्फर न कर दे।

लेकिन अब सोचता हूं कि अगर चिट्ठाकारी करनी है तो इन सब बातों का कार्यसाधक ज्ञान तो होना बहुत ही ज़रूरी है और विशेषकर अगर आप किसी विज्ञान से संबंधित विषय पर लिख रहे हैं तो इन उपकरणों की ज़रूरत तो और भी बढ़ जाती है।

3. तीसरा कारण है कि मैं बड़ा परफैक्शनिस्ट किस्म का इंसान हूं ---जब तक मैं किसी बात के बारे में स्वयं पूरी तरह से आश्वस्त न हो लूं, मैं उसे पब्लिक डोमेन पर डालना उचित नहीं समझता हूं। वैसे चिकित्सा जैसे विषय में अगर कोई लिख रहा है तो यह विश्वसनीयता बेहद आवश्यक है ---वरना लिखने के नाम तो बहुत कुछ लिखा जा ही रहा है। तो, इस लिये सब तथ्य जुटाने के चक्कर में कईं बार थोड़ी ऊब सी होने लगती है।

लेकिन पता नहीं यही कारण है कि मैंने अपनी कुछ पोस्टों में अपने व्यक्तिगत जीवन, प्रोफैशनल जीवन से उठाकर इतनी गहरी बातें इन चिट्ठों पर डाल दी हैं कि मैं अपने आप को बिल्कुल खाली समझने लगा हूं --- एकदम हल्का। इतना हल्का कि जिन जिन विषयों पर मैं लिख चुका हूं उन के बारे में मेरे द्वारा कुछ भी और कहना बचा नहीं है ।
और इतना भी जानता हूं कि जब कभी इस चिट्ठा पर कोई किताब छापने की खुराफ़ात सवार होगी (मुझे पता है कि देर-सवेर यह होगी ही !!) तो बिना किसी संपादन के ही इसे छपवा दूंगा और सारी टिप्पणीयां भी साथ ही लगी रहने दूंगा ---यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि चिट्ठाकारी पर छपने वाली किताब की महक इसी तरह ही कायम रह सकती है।

4. ब्लागिंग को सुंदर बनाना नहीं आता ---सुंदर से मेरा भाव है कि कुछ एचटीएमएल नुस्खों के द्वारा किस तरह से ब्लाग को सुंदर बनाया जा सकता है इसे सीखने की मेरी इच्छा तो बहुत है लेकिन पता नहीं कुछ बात बन ही नहीं रही । अब मैं समझता हूं कि पोस्ट में हाइलाइटिंग होनी बहुत ज़रूरी है लेकिन पता नहीं बार बार भूल जाता हूं । अब सोचता हूं कि ये सब बातें जब सीखूंगा तो किसी नोटबुक में नोट कर लिया करूंगा।

5. बहुत बार अतीत में चला जाता हूं --- सब से पहले मैंने 9-10 साल सर्विस बंबई में की ---बहुत अच्छा था ---बंबई सैंट्रल में ही हम लोग रहते थे ---शाम को कभी चौपाटी, कभी मैरीन ड्राइव, कभी नरीमन प्वाईंट और कुछ नहीं तो बंबई सैंट्रल स्टेशन का पांच नंबर प्लेटफार्म ही इतना लंबा था कि अपनी बिल्डिंग से नीचे उतर कर वहां पर ही पंद्रह बीस मिनट टहल लिया करते थे। बंबई में मैंने बहुत कुछ सीखा --- इस नगरी में भी ऐसी बात है कि जब आदमी वहां पर रह रहा होता है तो लगता है कि कैसे भी हो, बस यहां से भाग लिया जाये लेकिन जब यह नगरी छूट जाती है तो इस की बहुत ही ज़्यादा याद आती है --- और अब जहां पर हूं वहां पर किसी जगह घूमने जाने का आलस्य ही लगा रहता है ---- अजीब सी सड़के, ट्रैफिक की कोई इतनी व्यवस्था नहीं, सड़कों पर स्ट्रीट लाइटें कभी जल पड़ी कभी बंद रहीं ----- बस, यूं कह लीजिये कि जैसे तैसे कट रही है। इसलिये ये सब बातें जब सोचने लग जाता हूं तो कुछ भी लिखने की इच्छा नहीं होती।
लेकिन यह कोई मेरी ब्लागिंग के लिये इतनी बड़ी रूकावट नहीं है ---- यह बहानेबाजी ज़्यादा है ।

वैसे इतना लंबी चौड़ी पोस्ट लिखने के बाद लग रहा है कि यार, ये रूकावटें भी क्या कोई रूकावटें हैं ---- अपने आप से कह रहा हूं कि बहाने बनाने छोड़ और ब्लागिंग को गंभीरता से लेना शुरू कर ---- और ध्यान आ रहा है कि मुझे तो इस प्रभु का बार बार शुक्रिया अदा करना चाहिये कि मैं एक ऐसे प्रोफैशन में हूं जिस में जनता-जनार्दन की सेवा कर सकता हूं, कंप्यूटर है, इंटरनैट है, अच्छी भली सोच है और अंगुलियां दुरूस्त हैं लिखने के लिये तो इस के इलावा तो जो भी रूकावटें गिना डाली हैं वे तो वास्तव में कोई रूकावट न हुईं।

देखिये, जब हम लोग कलम उठा लेते हैं तो हमें बहुत सी बातें अपने आप ही समझ आने लगती हैं ---जैसे मुझे आज यह आभास हो गया है कि मैं अपनी ब्लागिंग की डगर पर आने वाली जिन रूकावटों की बात कर रहा हूं वे तो बहुत ही तुच्छ हैं । तो इसलिये यह निश्चय किया है कि अगले तीन-चार दिनों में ही ऊपर लिखी सभी रूकावटों को दूर करने की पूरी पूरी कोशिश करूंगा ---ताकि पहली जनवरी 2009 से जो पोस्टें लिखूं उन को अपने ढंग से लिखूं ----- न तो फोटो डालने के लिये कोई आलस्य हो और न ही हाइलाइटिंग के नाम से ही घबराना पड़े
---------------इसे आप मेरा नव-वर्ष का अग्रिम संकल्प जान लीजिये या कुछ और, लेकिन नये वर्ष में मैं अपने चिट्ठे को नय रूप, नया स्वरूप देने का वायदा अपने आप से कर रहा हूं।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

और जैसे ही मैंने उन्हें डायरी लिखने की सलाह दी ......

डायरी मैं भी लिखता हूं—मैंने एक चिट्ठा ही बना रखा है –डाक्टर की डायरी से --- लेकिन मुझे पता है कि मैं उसे लिखने में इमानदारी नहीं कर रहा हूं। मैं यह इसलिये नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैंने उस में कुछ गलत लिखा है, तोड़-मरोड़ के लिखा है, बात यह नहीं है---तो फिर बात है क्या ? – बात वास्तव में यह है कि मैं बहुत सी ऐसी बातें लिखने के लिये हिम्मत नहीं जुटा पाता हूं जो मुझे वास्तव में मुझे सब से ज़्यादा कचोटती रहती हैं। और डायरी लिखते वक्त किसी बात को गल्त तरीके से पेश करना या कुछ बातों को बड़ी शातिरता से छुपा लेना --- देखा जाये तो जुर्म तो एक सा ही हुआ ---हुआ कि नहीं ?

इसी डायरी से बात याद आ रही है मुझे मेरे एक बुज़ुर्ग मरीज़ की- लगभग 70 वर्ष के होंगे। पहले वह नियमित तौर पर अपनी पत्नी के साथ मेरे पास आते थे और उनकी बातचीत में बहुत गर्म-जोशी देखने को मिलती थी। मुझे वह बहुत ज़िंदादिल इंसान दिखते थे।

एक महीना पहले जब वह मेरे पास आये तो मुझे बुझे बुझे से लगे --- परेशान से ---क्या है ना कि इस उम्र के किसी इंसान के चेहरे को पढ़ना और भी आसान हो जाता है ---सारी किताब ही हमारे सामने खुली पड़ी होती है। मैंने उन्हें दवाई देने के बाद पूछ ही लिया कि क्या बात है आज आप पहले जैसे चुस्त-दुरूस्त नहीं दिख रहे । कहने लगे कि बस ऐसे ही कुछ परेशानियों ने घेर रखा है ।

जब मैं उन के मैडीकल के केस-पेपर्ज़ देख रहा था तो उस में से कागज़ का टुकड़ा भी पड़ा था जिस में उन्होंने सैनेटरी के सामान का पूरा हिसाब किताब रखा हुआ था ---मिस्त्री को दिये गये पैसे के बारे में भी लिखा हुआ था। मुझे उन से बात कर के ऐसा लगा कि वह शरीर से ज़्यादा दुःखी नहीं हैं, मन से कहीं ज़्यादा दुःखी हैं।

मैंने उन से पूछा कि क्या आप डायरी लिखते हैं- जवाब मिला नहीं। मैंने उन्हें कहा कि आज अभी आप हास्पीटल से निकल कर पहला काम यह करेंगे कि एक डायरी खरीदेंगे, ज़रूरी नहीं कि यह कोई बहुत महंगी किस्म की हो। अगर आप चाहें तो एक स्कूल वाली नोट बुक खरीद लें और घर जा कर आज से ही डायरी लिखना शुरू कर दें।
वह महानुभाव मेरी बात बड़ी तन्मयता से श्रवण कर रहा था ---मैं लोहा गर्म देखते हुये आगे कहना शुरू किया --- आप उस में वह सब कुछ लिख डालिये जिसे किसे से कहते हुये या तो आप डरते हैं, झिझकते हैं और या जिसे कोई सुनना ही नहीं चाहता। वह मेरी बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे।

मैंने उन के केस-पेपरों में सैनिटरी वर्क्स का कागज़ देखा था – बता रहे थे कि वे घर में कुछ सैनिटरी का नया काम करवा रहे हैं। तो मैंने उदाहरण इसी बात की ली—मैंने पूछा कि क्या उस का काम सब ठीक चल रहा है--- तो उन्होंने दिल खोलना शुरू किया कि मैं इन मिस्त्रीयों से भी बड़ा परेशान हूं – एक दिन काम कर जाते हैं, चार दिन कोई और काम पकड़ लेते हैं। मैंने उन्हें आगे कहा कि क्या आप जानते हैं कि इस तरह की बातों का इलाज क्या है ----मैंने उन्हें कहा कि आप डायरी लिखा कीजिये।

मैंने उन्हें कहा कि आज डायरी की शुरूआत इस सैनिटरी वाले काम से ही करें ---- सैनिटरी का काम घर की सफाई करना है और यह डायरी मन की सफ़ाई करनी शुरू कर देगी। तो फिर आज आप यूं लिखिये कि किस सैनिटरी मिस्त्री से आप परेशान हैं --- वह क्यों आप के लिये सिरदर्द बना हुआ है --- उस से आप को क्या गिले-शिकवे हैं ---- सब कुछ उस में इमानदारी से लिख डालिये --- लेकिन शर्त केवल यही है कि जब आप उसे लिखें तो शत-प्रतिशत इमानदारी बरतें—उस में कुछ भी लिखना चाहें, बिना किसी रोक-टोक के लिखिये ---वह आप की डायरी है, कोई परवाह नहीं। आप किसी को बुरा भला कहना चाह रहे हैं तो लिख डालिये न, आप को भला इस कायनात में कौन ऐसा करने से रोक रहा है। किसी को गालियां देने की इच्छा हो रही है, तो यह शुभ कर्म भी कर डालो। वह बुज़ुर्ग मेरी बातें बड़ी लगन से सुन रहे थे।

वैसे तो मैं जिस सत्संग में जाता हूं वहां पर किसी को बुरा भला कहने के लिये बिल्कुल मना किया जाता है – गाली गलौज की बात तो बहुत दूर की बात हो गई। लेकिन जब कोई आदमी बदलेगा तब बदलेगा --- तब तक तो अपनी नोटबुक और कलम ज़िंदाबाद। मैं उन को कह रहा था कि लिखते हुये किसी बात की परवाह न किया करें—जो बात भी, जो इंसान आप को परेशान किये हुये हैं उन के बारे में दिल खोल कर लिखा करें। अगर आपकी आप के पड़ोसी के साथ टुक-टुक रहती है तो यार आप को कम से कम इसे कागज़ पर उतार लेने से कौन रोक रहा है, लिखिये बिंदास हो कर लिखिये। मेरी इस बात पर उन की तो बांछें ही खिल गईं और उन्होंने जो ठहाका लगाया वह मैं कभी नहीं भूलूंगा ----विश्वास कीजिये, मज़ा आ गया, मुझे लगा कि मेहनत सफल गई। और मैं उस ठहाके को हमेशा याद रखूंगा।

मैंने उन्हें आगे बताया कि इस बात की परवाह मत करिये कि इसे कोई पढ़ लेगा—वैसे हो सके तो आप घर में सब को बता कर रखिये कि मेरी डायरी जब तक मैं जीवित हूं तब तक कोई भी न पढ़े। फिर भी अगर गलती से कोई पढ़ भी ले, तो यह तो उस की समस्या है। और मैंने उन्हें आगे सुझाव दिया कि पहले पन्ने पर यह नोटिस भी लिख दें कि अव्वल तो इसे कोई पढ़े नहीं, वरना अगर गलती से, जिज्ञासा वश पढ़ भी ले तो इस में लिखी किसी बात के बारे में मेरे से चर्चा न करे।

मैं उन बुज़ुर्ग के चेहरे के बदलते भाव देख रहा था --- मैंने फिर उन्हें कहा कि यह काम आज से ही शुरू हो जाना चाहिये। उस दिन जाते जाते कहने लगे कि डाक्टर साहब, आप से बातें करने के बाद मुझे तो अभी से ही बहुत अच्छा लगने लगा है, मैं आज ही यह रोज़ाना लिखने का काम करना शुरू करता हूं। जाते जाते मैंने उन्हें इतना ही कहा कि देखिये, शरीर के लिये तो आप ने दो एक दवाईयां खा लीं और आप फिट हो गये, लेकिन अफसोस इस मन के लिये कमबख्त कोई टेबलेट ऐसी बनी नहीं है जो इसे लाइन पर ला सके ---उस काम के लिये नये नये तरीकों की खोज करनी होगी और डायरी लिखना और पूरी इमानदारी से अपनी बात को अपने आप को कहना उसी दिशा में किया गया एक ऐसा ही सार्थक प्रयास है।

पता नहीं हम कितनी बातें अपने मन के अंदर ही दबा कर बैठे रहते हैं, किसी से करने में झिझकते हैं, डरते हैं ( विभिन्न कारणों की वजह से) – और सब प्रकार की बीमारियों को अपने शरीर में घर बनाने के लिये निमंत्रण देते रहते हैं। पंजाबी में हम लोग अकसर कहते हैं ---- दिल खोल लै यारां नाल, नहीं तां डाक्टर खोलणगे औज़ारां नाल ( दिल खोल ले यारों से, वरना डाक्टर खोलेंगे औज़ारों से )--- अब अगर यार की जगह कोई डायरी ले रही है तो क्या फर्क पड़ता है।

यह तो बुज़ुर्ग हैं ना आज की तारीख में बहुत अकेले हैं ---- इस के कारण लिखने की मुझे यहां ज़रूरत महसूस नहीं हो रही --- सब कुछ आप जानते हैं। और यही अकेलापन इन की अधिकांश तकलीफ़ों की जड़ है। ये शारीरिक बीमारियों को कुछ नहीं समझते, उन को तो ये बड़े खेल-पूर्ण भाव से सहन कर लेते हैं, उन से टक्कर भी ले लेते हैं , और बहुत बार जीत भी जाते हैं ---- लेकिन इन्हें इस जीत हार की इतनी परवाह नहीं होती, दरअसल ये लोग हारते हैं तो अपनों से ही हारते हैं ---- अपने बेटों-बहुओं के हाथों जब से हारते हैं, जब अपने पौतों के हाथों हारते हैं ---तो इन से यह सहा नहीं जाता, ये टूट जाते हैं और तरह तरह की मन की तकलीफ़ों के शिकार हो जाते हैं ----विशेषज्ञ कुछ भी कहें, लेकिन अभी तक कोई टेबलेट मेरे विचार में तो बनी नहीं जो किसी के मन को भी स्थायी तौर पर दुरूस्त कर डाले। इसलिये भी यह डायरी लिखनी बहुत आवश्यक है ---गांव में कुछ लोग यह सब कुछ लिखने पढ़ने की जगह गांव की चौपाल पर बैठ कर, बुज़ुर्ग महिलायें घर के बाहर खटिया डाल कर अपने मन को हल्का करने का काम बखूबी कर लिया करती थीं ----अब अगर कोई इसे निंदा-चुगली की संज्ञा दे तो दे, अगर बस चंद मिनटों के लिये मुंह की मैल उतार लेने के बाद, अपने तपते हुये मन की तपिश (गर्म हवा, हवाड़) निकालने के बाद उन्हें अच्छा लग रहा है, तो अपना क्या जाता है !!

और मैं जिस बुज़ुर्ग की बात कर रहा था उन्हें मैंने इतना भी कह दिया कि जब आप कुछ महीनों बाद,अपने वर्षों बाद अपनी ही लिखी डायरी पढ़ेगे तो मज़ा आ जायेगा।

लेकिन मैं यह सब कुछ इतनी विश्वसनीयता से कैसे लिख रहा हूं --- क्योंकि मैं यह सब कुछ लिखता रहता हूं ---- जब कभी सिर भारी होता है तो यह काम सिर को हल्का करने के लिये करना ही पड़ता है। नेट पर लिखना ठीक है, लेकिन इस काम के लिये तो आपकी अपनी कापी और पेन से बढ़ कर कोई हथियार है ही नहीं---- नहीं, नहीं, ऑनलाइन डायरी हम लोगों के लिये नहीं है, ऐसा मैं सोचता हूं। कुछ लोग लिखते हैं –लेकिन अनॉनीमस ढंग से लिखते हैं ---जो लोग अपने नाम से, अपनी सही पहचान के साथ लिखते हैं वे बधाई के पात्र हैं। वैसे भी हिंदी में क्या कोई ऑन-लाइन डायरी लिख रहा है--- वैसे तो यह ब्लाग भी ऑन-लाइन डायरी ही है, लेकिन मैं पर्सनल ऑन-लाइन डायरी की बात कर रहा हूं !!

ऑन-लाइन डायरी में अगर अपनी पहचान बता कर के कोई डायरी लिख रहा है तो मेरे विचार में वह पूरी इमानदारी चाहते हुये भी बरत नहीं पाता है। अपने उजले पक्ष के बारे में लिख लिख कर आदमी खुद ही परेशान हो जाता है, चलिये अगर अपने अंधकारमय पक्ष के बारे में किसी से नहीं भी बात करनी तो कम से कम अपने आप से लिख कर बात करने से हम क्यों अपने आप को रोके रखते हैं ? बात है कि नहीं सोचने लायक --- अगर हां, तो उठाइये कलम से और अभी एक नोट बुक पर अपना गुब्बार निकालना शुरू कर दीजिये। और जैसा मैंने अपने उस बुज़ुर्ग मरीज़ को यह भी कहा था कि आप यह लिखना तो शुरू करें, देखिये आप की ज़िंदगी में हरियाली और खुशहाली आ जायेगी------- दोस्तो, अगर आप के आप पास भी कोई बुझी सी आत्मा आप को दिख रही है तो उस तक भी मेरा यह संदेश अवश्य पहुंचा दीजियेगा, कृपा होगी – समझूंगा पोस्ट लिखने का परिश्रम सार्थक होगा।

बड़े दिन की बहुत बहुत मुबारकें --- कल रात ही मैं रोहतक से लौटा हूं और आज यहां यमुनानगर में घना कोहरा छाया हुया है।