Wednesday, December 30, 2015

त्योहारों पर बेमतलब का शोर शराबा...

मुझे याद है बचपन में मुझे लगता था कि त्योहारों के नाम पर जो शोर शराबा होता है वह ३१ दिसंबर की रात को बंबई में ही होता है...लेकिन फिर धीरे धीरे जैसे जैसे समय बदलता गया...यह शोर शराबा..यह शोशेबाजी, दिखावा, फिज़ूल की नौटंकियां, रस्मी तौर पर शुभकामनाएं देने का सिलसिला, तोहफ़ों का आदान प्रदान....रोड-रेज....यह सब कुछ इतना देख सुन लिया कि त्योहारों के नाम से डर लगने लगा.....अब यह आलम है कि त्योहार के दिन बिल्कुल शांति से अपने घर में टिके रहने में और कोई पुरानी हिंदी मूवी देखने में ही आनंद मिलता है.... किसी को रिवायत के तौर पर शुभ संदेश भेजने की इच्छा भी बिल्कुल नहीं होती...चुपचाप सब के मंगल की कामना करना अच्छा लगता है।

इसलिए हम लोगों के लिए हर दिन उत्सव के समान है और हर उत्सव हमारे लिए एक बिल्कुल सामान्य दिन है। हम उत्सव के दिनों पर तोहफ़ों के आदान प्रदान में रती भर भी विश्वास नहीं रखते.. ये सब खोखले खेल हैं..मतलबी समीकरण हैं अधिकतर..कुछ नहीं है। हम कभी भी इन त्योहार के दिनों में शहर से बाहर हों या जाना पड़े तो भी हमें कुछ मलाल नहीं होता, लगभग त्योहारों का हमारे लिए कुछ भी महत्व नहीं है....शोर शराबा, हुल्लड़बाज़ी, शोहदापंथी, स्टंटबाजी से नफ़रत है...मुझे ही नहीं, घर में सभी को, चुप्पी अच्छी लगती है, अपनी भी और दूसरे की भी...हर एक को अपना स्पेस मिले तो बहुत अच्छा है।

यह तो हो गई अपनी बात .... अब शशि शेखर जी की बात कर लें....ये हिन्दुस्तान के संपादक हैं...और रविवार के पेपर में ये एक लेख लिखते हैं जिसका मेरे से ज़्यादा मेरी मां को इंतज़ार रहता है....हर बार एक बढ़िया सा मुद्दा उठाते हैं...इस बार २७ दिसंबर को इन के लेख का शीर्षक था... इस धुंध को चीरना होगा.. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा... आप भी इस लिंक पर क्लिक कर के इसे अवश्य पढ़िए...

मैं फिर से आग्रह कर रहा हूं कि इस लेख को अवश्य पढ़िए...इस में इन्होंने वर्णऩ किया है कि किस तरह से दीवाली के दिन इन के लिए सांस लेना दूभर हो गया... उसी लेख में यह लिखते हैं...परंपराएं उल्लास जगाएं, तो अच्छा। परंपराएं मर्यादा की रक्षा करें, तो बहुत अच्छा। परंपराएं हमें इंसानियत की सीख दें, तो सबसे अच्छा। मगर परंपरा के नाम पर समूचे समाज की सेहत से खिलवाड़! मामला समझ से परे है।

वे आगे लिखते हैं... वही परंपराएं जिंदा रहती हैं, जो कल्याणकारी होती हैं। समय आ गया है कि हम त्योहारों और रोजमर्रा के रहन-सहन को नए नजरिये से देखें। हमारे इतिहास में ही हमारी सफलताओं और असफलताओं के सूत्र छिपे हुए हैं। यह हमें तय करना है कि हम इन दोनों में से किसका वरण करते हैं?

इस रविवार को इस लेख को पढ़ कर जैसे ही अखबार को एक किनारे रखा तो ज़ाहिर सी बात है कुछ तो करना ही था...रिमोट उठाया तो ध्यान आया कि आज इस समय तो डी डी न्यूज़ पर टोटल हैल्थ प्रोग्राम आ रहा होगा...वह चैनल लगाया तो लगाते ही पता चला कि उन लोगों ने भी इस सप्ताह कुछ इस तरह का ही विषय चुना हुआ है।
विषय था... नये वर्ष के जश्न के दौरान सेहत का कैसे रखें ध्यान।

सब से पहले तो मैंने इन लोगों को इतना बढ़िया विषय चुनने के लिए बधाई दी ... दरअसल मैं इस पोस्ट को रविवार को ही लिखना चाहता था लेकिन मैं इस के साथ उस दिन के प्रोग्राम की वीडियो भी एम्बेड करना चाहता था, यह काम शायद डी डी न्यूज़ ने कल किया...इसलिए इस पोस्ट को आज लिख रहा हूं।



मुझे नहीं पता कि आप इस प्रोग्राम को देखेंगे कि नहीं लेकिन मेरा आग्रह है कि इसे आप भी देखें और आगे भी भेजिए....अभी तो नव वर्ष के जश्न को समय है, शायद हम इस प्रोग्राम की एक बात को भी अपना पाएं।

मैं बहुत बार ऐसा सोचता हूं कि इस तरह के बेहतरीन प्रोग्राम किसी भी बड़े से बड़े संत के प्रवचनों से क्या कम होते हैं, तीन चार प्रोफैसर बैठे हुए हैं... वे अपने जीवन भर के अनुभव कितने खुलेपन से बांट रहे हैं .....ये केवल अपने विषय का ज्ञान ही नहीं बांट रहे, आप देखिए, आप देखिएगा कि ये बच्चों में सामने वाले को सम्मान देने वाले संस्कारों की भी बात कर रहे हैं....

फिर से कहना चाह रहा हूं कि इस प्रोग्राम का एक एक वाक्य ध्यान देने योग्य, याद रखने योग्य और अनुकरणीय है....यह हमारी और हमारे आस पास के लोगों की ज़िंदगी बदल सकता है..

चलिए, थोड़ी रस्म अदायगी तो मैं भी कर लूं......  आने वाले साल को सलाम...यह आप सब के लिए बहुत शुभ हो!!

यहां पर भी कुछ हुल्लड़बाजी चल रही है, अगर इसे भी देखना चाहें तो...

Tuesday, December 29, 2015

तंबाकू की हर आदत के लिए मुंह में कैंसर की जगह लगभग फिक्स है...

कहने का मतलब यही है कि पान खाने वालों को गाल या होठों के अंदरूनी हिस्सों में, बीड़ी-सिगरेट पीने वालों को तालू के पिछले हिस्से और गले में, पान-मसाला, ज़र्दा, गुटखा चबाने वालों में गाल एवं होठों के अंदर वाले हिस्सों में....अकसर यह पैटर्न देखने को मिलता है। आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में तेज समुद्री हवाओं से अपनी जलती बीड़ी को बचाने के चक्कर में बीड़ी को उल्टा कर के मुंह में दबा लेती हैं ...जलता हुया किनारा अंदर लेकर...इस की वजह से इन महिलाओं में तालू का कैंसर होने की संख्या ज़्यादा है।

मेरा यह सब लिखने का मतलब यही है कि बहुत बार मुंह के अंदर झांकने से किसी व्यक्ति की तंबाकू की आदतों के बारे में पता चल जाता है ..केवल लाल-भूरे दांत ही नहीं, मुंह के अंदर की चमड़ी बहुत कुछ बता देती है ..इसलिए बार बार लोगों को अपने मुंह के अंदरूनी हिस्सों का स्वतः निरीक्षण करने को कहा जाता है...विशेषकर अगर आप किसी भी तरह से तंबाकू या पान आदि का शौक रखते हैं।


अवेयरनैस है नहीं, अकसर बीड़ी पीने वालों के तालू इस तरह के हो जाते हैं ....आप नोटिस करेंगे सफेद सा हो चुका है इस बीड़ी पीने वाले बंदे का तालू ...यह अकसर बीड़ी पीने वालों में मिल ही जाता है...इसे कहते भी हैं...स्मोकर्स पैलेट (Smoker's Palate)..


कल जब यह इंसान मेरे पास आया तो मैंने इस से पूछा कि क्या इसे पता है कि बीड़ी के क्या नुकसान हैं....इसे कुछ नहीं पता था, मुझे हैरानगी हुई ....फिर मैंने इसे समझाया और इस के तालू की तस्वीर दिखाई कि वहां पर क्या हो रहा है...शायद समझ आ गई होगी,लेकिन बीड़ी छोड़ देगा, ऐसा मुझे बिल्कुल नहीं लगा..


मैंने इस बंदे को चार दिन पहले वाले एक मरीज़ की भी तस्वीर दिखाई ...पचास-पचपन की उम्र रही होगी ...वह भी केवल बीड़ी ही पीता है लेकिन उस के तालू में कुछ इस तरह के घाव हैं....उसे भी ये घाव डेढ़-दो साल से हैं, लेकिन वह कहता है कि उसने इन के बारे में कभी सोचा ही नहीं, कोई खास तकलीफ़ थी नहीं, बस खाना थोड़ा बहुत लगता था, और कुछ नहीं....लेिकन मैंने उसे समझाया कि इस तरह से बने रहने वाले घावों की जांच ज़रूरी है ...टुकड़ा लेकर जांच होगी तभी कुछ कहा जा सकता है...(बायोप्सी) ...

तालू से मुझे एक मरीज़ का ध्यान आ रहा है...वह भी बीड़ी पीता था, पान भी खाता था, उस के तालू के बिल्कुल पिछले हिस्से में एक बिल्कुल छोटा सा घाव था...लगभग आधे सैंटीमिटर से भी कम ...यहां वहां कहीं से भी दवाई ले जाया करता....कह देता कि सुखाने के लिए कुछ कैप्सूल दे दो, लगाने के लिए कुछ दे दो....यह सिलसिला उस का दूसरे चिकित्सकों के पास तो कुछ महीनों तक चलता रहा....मैंने तो एक दो बार ही दवाई देकर उसे जांच करवाने के लिए कह दिया....

उसे लगा मैं उसे टरका रहा हूं....वह थोड़ी बदतमीजी करने लगा ..लेकिन एक बार मैंने उसे दवा नहीं दी ..पहले कहा कि इस की जांच करेंगे.... जांच करने पर कैंसर निकला ...उसे कैंसर विशेषज्ञ के पास भेजा गया ...उसने उसे कहा कि जिस ने भी तुम्हें इस अवस्था में भेजा है, उस की वजह से तेरी जान बच गई समझो। बहुत खुश था, अगली बार आया..तालू का घाव इतना छोटा था कि विशेषज्ञों ने सिकाई (Radiotherapy) से ही उसे खत्म करने का निर्णय लिया...और वह कुछ ही महीनों में ठीक भी हो गया...उस के बाद उस की नियमित जांच भी होती रही ... एक डेढ़ साल बाद जब वह फिर आया तो फिर से एक बिल्कुल छोटा सा घाव दिखा....मुझे अंदेशा हुआ...जांच करवाने पर फिर से कैंसर पाया गया....उस के बाद फिर वह मुझे दिखा नहीं.

अकसर लोग पान खाते हैं, गुटखा-पान मसाला चबाते हैं, खैनी ज़र्दा भी चलता है, तंबाकू-चूना भी मुंह में दबाए रखते हैं, बीड़ी-सिगरेट भी हो ही जाता है... और ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये सब आदतें कुछ लोगों में एक साथ पाई जाती हैं... अभी उस दिन की बात है एक ४०-४५ वर्ष का बंदा आया था कि जुबान में तकलीफ है, खाया पिया जा नहीं रहा....वह पहले बीड़ी बहुत पिया करता था, तंबाकू-चूना भी मुंह में दबाए रखता था...पान-मसाले के लिए मना कर रहा था, लेकिन फिर उसे ओरल-सबम्यूकसफाईब्रोसिस (oral sub mucous fibrosis) ...... उस का मुंह बहुत ही कम खुल रहा था ..यह तकलीफ़ उसे लगभग एक डेढ़ साल से है ... खाना खाने में भी बहुत दिक्कत ही है ...आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकते इस की तकलीफ़ की....यह दिक्कत तो थी ही लेकिन साल पहले उसे जुबान की साइड पर घाव हुआ जो ठीक ही नहीं हो रहा था ... तो पता चला कि यह भी कैंसर से ग्रस्त है... इलाज करवाया गया, इस के लिए जुबान का कुछ हिस्सा तो काटना ही पड़ा, सिकाई भी हुई  (रेडियोथैरेपी)....अब उस की परेशानी इतनी ज़्यादा है कि पहले ही से वह ठीक से कुछ नहीं खा पा रहा था मुंह के पूरा न खुलने की वजह से, साथ में अब यह समस्या हो गई कि ठीक से बोल भी नहीं पा रहा..मुंह टेढ़ा सा हो गया है.... बहुत ही परेशानी में दिखा यह बंदा....लेकिन चिकित्सकों को तो उस की जान की सलामती के लिए कैंसर की सर्जरी के लिए जो भी ज़रूरी है...कांटना-छांटना तो पड़ता ही है....

अब क्या क्या लिखें दोस्तो, ये सब शौक जान लेवा हैं....कौन बच निकलेगा, कितने दिनों तक बच निकलेगा, शरीर कौन सा अंग इन की वजह से ग्रस्त हो कर बर्बादी का कारण बनेगा, यह बताना थोड़ा मुश्किल है, बस आसान यही है कि इन सब चीज़ों से दूर रह कर आप बचाव कर सकते हैं, बाकी सब बकवास है.......कि कैंसर होने पर मैंने बीड़ी छोड़ दी, मैंने गुटखा छोड़ दिया......इस से क्या हासिल! ......बड़े ढीठ प्राणी हैं यार कुछ लोग, इतना कुछ सुनने-देखने के बाद भी गुटखा-पान मसाला, तंबाकू हमेशा के लिए थूकने का नाम नहीं लेते........नहीं तो ना नहीं, अपना काम है ढिंढोरा पीटना ........सो, हम किये जा रहे हैं!

जाते जाते एक खबर भी दे दूं?....लखनऊ में मेट्रो दौड़ने लगेगी अगली दिसंबर से लेकिन मैट्रो तेज़ गति से अपना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में दिन रात एक कर रही है....पूरे अनुशासन से...... अब लखनऊ के आलगबाग बाज़ार का एरिया कुछ इस तरह से दिखने लगा है...अच्छा लगता है!



इस दातुन वाली से एक बात फिर से याद दिला दिया कि लोगों का दिल अगर जीतना है तो मीठा मीठा बोलो, वह तो ठीक है, लेिकन टाटा अस्पताल के निदेशक डा राव को एक बार कहते सुना था कि अगर लोग रात में मुंह में तंबाकू, पान दबा कर सोना बंद कर दें और सोने से पहले अच्छे से दांत साफ़ के सोया करें तो देश में मुंह के कैंसर के रोगियों की संख्या आधी रह जायेगी। बिल्कुल सही बात है!

Monday, December 28, 2015

ईमानदारी वाली खुशबू !

आप भी सोच कर हंस रहे होंगे कि अब यह ईमानदारी वाली खुशबू का डियो कहां से ले आया हो आज मियां...मुझे भी नहीं पता दरअसल...लेकिन यह खुशबू कईं बार हमें अपने आप मिल ही जाती है...तब ध्यान आता है, अरे, यह तो ईमानदारी वाली खुशबू थी।

ईमानदारी का मतलब बस केवल अपने आप से ईमानदारी है...क्योंकि कोई ऐसा तराजू बना ही नहीं और न ही बन पाएगा जो किसी की ईमानदारी को तोल पाए...यह नामुमकिन है...बस, हमें खुद को ही सब कुछ पता होता है ...और यह खुशबू फैल ही जाती है।

आप कहीं भी जाइए, आप तक यह खुशबू पहुंच ही जायेगी...किसी अस्पताल में जाइए...वहां भी मिलेगी, बैंक में भी, डाकखाने में, स्कूल में, थियेटर में, सिनेमा में ....कहने का मतलब कहीं भी ...इस की न तो कोई परिभाषा है, न ही कोई रैसिपि है...बस, या तो यह है या नहीं है..that's all!

उस दिन मैंने एक पोस्टमास्टर को कहा (लेकिन फिर भी वह टस से मस नहीं हुआ...और उसने ना ही काम किया) कि इस डाकखाने में आते हुए अब डर लगने लगा है ...पता नहीं क्या कह के दौड़ा दिया जाए ..कि आज नहीं होगा यह काम..प्रिंटर ठीक नहीं है, अभी कोई दूसरा काम चल रहा है, या सर्वर स्लो है...और अकसर यह सब कहा भी इतने रूखे ढंग से जाता है कि मेरे जैसे इंसान का को फिर से उधर रुख करने को मन ही नहीं करता....बैंकों में भी बहुत बार ऐसा ही होने लगा है ..प्रिंटर नहीं है ठीक, आज प्रिंट करने वाला नहीं है, नेटवर्क में प्राबल्म है...यही आम सी बातें हैं..

इस की तुलना में खुशगवार फिज़ाओं की बात करें...ऐसे कर्मचारी जो मुस्कुराते हुए आने वाले का स्वागत करें, आने वाले को लगे कि यार,  मैं यहां पर Welcome हूं....मैंने यहां आकर कोई गलती नहीं की....होते हैं, हर दफ्तर में, हर सरकारी दफ्तर में, हर अस्पताल में.....हर जगह ऐसे भी लोग मिलते हैं।

अपने अतीत में देखता हूं तो याद करता हूं ऐसे बहुत से चिकित्सकों को भी जिन के पास जा कर ही मरीज़ को लगता है कि अब तो बच ही जाएंगे, उन की body language, उन की कार्यदक्षता, बातचीत का ढंग, व्यवहार, आत्मीयता.....सब के नंबर हैं.....लेिकन छुपे हुए हैं....कहीं न कहीं बिना किसी की नॉलेज के मूल्यांकन हो रहा है...सीधी सीधी सी बात यह है कि खुशगवार फिज़ा का मतलब बस इतना है कि डाक्टर के पास पहुंचते ही मरीज़ को राहत की अनुभूति हो, दवाई तो बाद में असर करेगी....वह अलग बात है, लेकिन पहली बात है ईमानदारी वाली खुशबू.....ईमानदारी से यहां मेरा मतलब यही है कि जो हम सच में अनुभव कर रहे होते हैं उस बात को सामने वाले तक ईमानदारी से पहुंचा देना....लेिकन, पूरी एहतियात के साथ.......because...we are dealing with very fragile minds and frayed souls!

यह इतनी फिलासफी मैंने पता नहीं क्यों झाड़ दी, लेकिन इस के पीछे भी एक कारण तो है....आज शाम को मैंने लैपटाप पर जैसे ही यू-ट्यूब लगाया तो सामने ही मेरी नज़र राज्यसभा के गुफ्तगू प्रोग्राम के विभिन्न एपीसोड्स पर पड़ी...कुछ अरसा पहले मैं सुबह उठ कर इन में से एक दो एपीसोड्स देखा करता था ....ऐसे प्रोग्रामों का महत्व मेरे लिए किसी प्रवचन से भी कहीं ज़्यादा बढ़ कर है, यह मेरी व्यक्तिगत राय हो सकती है। 

 मैं डी डी न्यूज़ पर हर हफ्ते आने वाले टोटल हैल्थ प्रोग्राम की तारीफ़ तो अपने ब्लॉग पर बहुत बार करता ही रहता हूं...वैसे तो मैंने राज्यसभी चैनल के गुफ्तगू प्रोग्राम के बारे में भी बहुत बार लिखा है...लेिकन जब भी मैं इस पर कोई भी ऐपीसोड देखता हूं तो बस उसी समय उस के बारे में लिखना शुरू कर देता हूं....


सुरेखा सीकरी जी का इंटरव्यू

आज भी यही हुआ...आज सुरेखा सीकरी जी की इंटरव्यू देखने का मौका मिला....मैं तो इन के फन का हमेशा से कायल रहा ही हूं.....आप देखिएगा इस इंटरव्यू में कि कितनी ईमानदारी से इसे रिकार्ड किया गया है....इस प्रोग्राम में सभी एपीसोड ऐसे ही हैं, एक से एक बढ़ कर ....ईमानदारी की खुशबू से लबरेज...

अकसर सुरेखा सीकरी जी को आप विभिन्न सोप-अोपेराज़ में देखते ही रहते होंगे....इन्होंने टीवी और फिल्मों में बहुत काम किया है.....मुझे अभी प्रेम चंद की कहानी ईदगाह का ध्यान आ रहा है जिस में इन्होंने एक छोटे बच्चे की दादी का किरदार किया है....बहुत बढ़िया किरदार था इन का वह भी ... काबिले-तारीफ़...यह ईदगाह कहानी का टीवी रूपांतर भी दूरदर्शन ने ही बनाया था....


ईदगाह कहानी ऐसी जिसे बार बार देखने का मन चाहता है...

मैं ऐसा मानता हूं कि जितने भी बेहतरीन इस तरह के प्रोग्राम है ...जमीन से, लोगों से जुड़े हुए, जो जोड़ने की बात करते हैं, वे सभी इस तरह के सरकारी चैनल ही बना सकते हैं... क्योंकि ये लोग इस तरह के प्रोग्राम एक सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत कर रहे हैं, इन का कोई कमर्शियल इंट्रेस्ट नहीं है....लेकिन मुझे कईं बार यह भी लगता है कि ये उतने लोगों तक पहुंच नहीं पाते, जितने लोगों तक इन्हें पहुंचना चाहिए...

यह जो राज्यसभी टीवी पर गुफ्तगू प्रोग्राम प्रसारित होता है यह हर रविवार की रात में १०.३० बजे आता है...मैंने भी शायद ही इसे कभी लाइव देखा हो, लेकिन राज्यसभी के यू-ट्यूब चैनल पर इस के विभिन्न एपीसोड अपलोड हुए हैं ...मैं इन्हें वहीं देख लेता हूं अकसर.

आज मैं सुरेखा सीकरी जी के इंटरव्यू को देखते हुए यह सोच रहा था....कि इस तरह के प्रोग्रामों को को स्कूलों कालेजों में भी दिखाया जाना चाहिए... ताकि बच्चों को इस तरह की शख्शियतों की बात चीत से, उन से साथ हो रही गुफ्तगू से भी प्रेरणा मिल सके.....बच्चे यह भी सीख पाएँ कि ईमानदारी से अपनी बात को कैसे रखा जाता है! मैं ऐसा सोचता हूं।

जो लोग इस तरह के प्रोग्राम में बुलाए जाते हैं ..किसी भी फील्ड से हों, इन लोगों ने अपना पूरा जीवन अपने पेशे के नाम कर दिया होता है...ज़रूरत है इन के अनुभव से कुछ ग्रहण कर लेने की..

अब कितनी तारीफ़ करूं, मेरे पास तो शब्द ही खत्म हो गए.... लेिकन एक दो बातें अभी शेयर करनी हैं... पहली बात तो यही कि ज़रूरी नहीं कि हमें देश के चंद आठ-दस-बीस नेताओं की ही बातें करनी हैं या उन के ही इंटरव्यू देखने-दिखाने हैं हर समय...बिल्कुल वैसे ही जैसे डाक-टिकटें केवल आठ दस नेताओं की फोटो वाली ही नहीं चाहिए, इस महान देश के हर शहर में, हर गांव में, हर नुक्कड़ पर महान् लोग गुदड़ी के लाल की तरह छिपे हुए हैं......बस, उन से मिलने की देर है, उन से बात करने की बात है...बदलाव ही प्रकृति का नियम है.....डाकटिकटों के बारे में तो मैंने पिछले महीनों इतना कुछ पढ़ा कि वहां पर भी किस तरह  की राजनीति होती है ...आप भी सब जानते ही हैं.... इसलिए कुछ दिन पहले मैं एक पोस्ट ऑफिस में गया तो मैंने भी कुछ डाकटिकटें खरीद लीं. मुझे ज़रूरत भी नहीं थी ...लेिकन उस पर लिखा मैसेज इतना बढ़िया लगा कि मैंने ये खरीद लीं...यही होना चाहिए, इतने सामाजिक एवं जनोपयोगी संदेश हैं, जिन के प्रचार प्रसार के लिए इन डाक टिकटों का इस्तेमाल होना चाहिए......फिज़ा खुशगवार हो तो रही है, आगे देखते हैं कैसे रहता है!

ईमानदारी वाली खुशबू की बात को विराम भी सिने तारिका साधना जी को याद कर के ही देते हैं....दो दिन पहले जब उन के स्वर्गवास का पता चला तो बेटा कहने लगा कि बापू की फेवरेट एक्सट्रेस.....सच में हमारे स्कूल के दौर में साधना जी ने बहुत एंटरटेन किया....एक नेक रूह थीं वह ...ईश्वर उन की आत्मा को शांित प्रदान करे..



Sunday, December 27, 2015

साहिब नज़र रखना...मौला नज़र रखना

मुझे खुद पता नहीं मैं पूरा पूरा आस्तिक हूं या थोड़ा नास्तिक हूं...न ही इस के बारे में कभी सोचने की हिम्मत हुई कि मैं पाखंडी हूं, ढोंगी हूं या नहीं हूं....प्रश्न तो मन में बहुत से घूमते फिरते ही हैं लेकिन कभी इन का जवाब ढूंढने की तमन्ना ही नहीं हुई...शायद हिम्मत न हुई या समय ही नहीं मिला...बहाने बनाने के बहुत से अंदाज़ सीख गये हैं ना हम!

जो भी है, उसे छोड़ते हैं, बस एक तो है कि जब भी मैं सुबह सवेरे अपने शहर का टूर लगा कर वापिस लौट रहा होता हूं तो मुझे यह अरदास, प्रार्थना, भजन, भक्ति गीत ...इसे आप कुछ भी कह कर पुकार लें, यह मुझे बहुत याद आता है और मैं इसी अरदास में शामिल हो जाता हूं....और इसे लिखने वाले की दाद दिए बिना रह नहीं पाता....

आप भी सुनिए...भूतनाथ फिल्म का गीत है वैसे तो यह ..लेकिन इस से बेहतर, बढ़िया मैंने कोई भजन या अरदास कहने का ढंग नहीं देखा...आप भी सुनिए....इत्मीनान से ज़रा ...और इस अरदास में अपने आप को शामिल हुआ पाएंगे...



मैं सोच रहा हूं कि कुछ फिल्मी गीत भी ऐसे होते हैं कि ये हमारी सोई पड़ी मानवीय संवेदनाओं को हिलाने-ढुलाने, जगाने और झकझोड़ने का अच्छा काम कर देते हैं...और ये हर उम्र के दौर में बदलते रहते हैं ..मुझे ऐसा लगता है....चलिए, आज आप से शेयर करते हैं इस तरह के वे कुछ गीत जो इस समय मेरे ज़हन में आ रहे हैं और जो मुझे बीते बहुत से वर्षों से बहुत अच्छे लगते हैं और जिन्हें मैं बेहतरीन भजन या भक्ति गीत या अरदास का दर्जा देता हूं...और अपनी लाइफ के विभिन्न पड़ावों में किसी न किसी तरह से इन से बहुत ज़्यादा मुतासिर भी रहा हूं।


 ओथे अमलां दे होने ने नबेड़े ..किसे न तेरी ज़ात पुछनी


इतनी शक्ति हमें देना दाता...मन का विश्वास कमज़ोर हो न


हमको मन की शक्ति देना...मन विजय करें


सरबंस दानिया वे, देना कौन दऊगा तेरा..


अल्लाह करम करना, मौला तू रहम करना..


दाता धन तेरी सिखी, धन सिखी दा नज़ारा...

और बहुत पहले तो इस तरह के गीत ही हमें काफी ज्ञान दे दिया करते थे ...अपने स्कूल के दिनों में तो इस तरह के मुकद्दस गीत ही हमें सीखने लायक कुछ कुछ तो ज़रूर सिखा दिया करते थे...कुछ कुछ सोचने पर मजबूर भी कर दिया कर दिया करते थे ज़रूर...दूरदर्शन के दौर में लगभग हर दूसरे चित्रहार में अकसर यह गीत देख कर अच्छा लगता था।


आदमी मुसाफिर है...आता है, जाता है

मुझे बहुत बार लगता है मैंने लाइन गलत चुन ली....इन गीतों-वीतों से ही जुड़ा कोई काम धंधा कर लेता तो बेहतर होता...सब के लिए .सच कह रहा हूं...(मन की बात) खैर, अब तो बहुत देर हो गई ....प्रधानमंत्री मोदी के मन की बातें भी सुननी हैं अभी मुझे ...प्रसारण शुरू हो गया है, आप भी सुनिए.


Monday, December 21, 2015

साफ़ हवा पाने की चाह - फेस मॉस्क, एयर-प्यूरीफॉयर और गुड़ का सच

पिछले कुछ अरसे से जब मैं बाहर निकलता था और कुछ लोगों को अपने चेहरों को फेस-मॉस्क से ढके देखता था तो मेरे मन में भी प्रश्न तो उठता ही था कि इस का कितना फायदा होता होगा! सड़कों पर घने कोहरे जैसी स्मॉग देख कर मुझे भी कईं बार इच्छा हुई कि अब तो वह समय आ गया है कि मुझे भी इस फेस-मॉस्क को लगा कर ही बाहर निकलना चाहिए। बस दुविधा बनी ही रही।

लेकिन कल शाम को कीर्ति आज़ाद की सी.डी देख कर जब चैनल सर्फिंग कर रहा था तो शाम के छः बजे से चंद मिनट ऊपर हुए थे तो अचानक दूरदर्शन के न्यूज़ चैनल पर टोटल हेल्थ प्रोग्राम पर रिमोट थम गया..यहां पर वायु प्रदूषण पर एक कार्यक्रम चल रहा था...मैं हमेशा से इस प्रोग्राम का बड़ा प्रशंसक रहा हुआ।

दूरदर्शन पर और आल इंडिया रेडियो विशेषकर विविध भारती आदि पर जो सेहत संबंधी प्रोग्राम प्रसारित होते हैं...ये बेहतरीन कार्यक्रम होते हैं...इन में भाग लेने वाले लोग बहुत वरिष्ठ और मेडीकल कालेजों के प्रोफैसर जैसे पदों पर तैनात होते हैं..जो यह बात कह देते हैं अपनी स्पेशलिटि के बारे में उस में फिर कुछ किंतु-परंतु की गुंजाइश नहीं होती... they don't have any conflict of interest!


फेस-मॉस्क का सच 

संयोग से कल मुझे भी मेरे फेस-मॉस्क वाले प्रश्न का जवाब मिल गया...एक वरिष्ठ डाक्टर ने बताया कि वायु प्रदूषण से बचाने के लिए इन फेस-मास्कों का प्रभाव शून्य है...ऐसा उन्होंने ज़ोर देकर कहा क्योंकि ये फेस-मॉस्क particulate matter को रोकने में असमर्थ होते हैं। 

साथ में उन्होंने यह भी बताया कि केवल N-95 जैसे फेस-मॉस्क हैं जो वायु प्रदूषण से बचाव कर सकते हैं...लेकिन साथ में यह भी कहा कि ये बहुत महंगे मिलते हैं और इन्हें लगाए रखा प्रैक्टीकल नहीं होता क्योंकि इन्हें लगाने वाले को हर समय दम घुटने का अहसास सा होने लगता है.

इस तरह के फेस-मॉस्क के बारे में आपने भी पिछले महीनों में स्वाईन-फ्लू संक्रमण के दिनों में सुना होगा...विशेषकर इस रोग से संक्रमित व्यक्ति का इलाज करते वक्त या वैसे भी अपने बचाव के लिए चिकित्सा कर्मियों को इन विशेष फेस-मॉस्क को चढ़ाए रखने की हिदायत दी जाती रही है। 

फिर भी चिकित्सक बता रहे थे कि साधारण फेसमास्क की इफेक्ट बस आप इतना जान लीजिए कि अगर किसी व्यक्ति को सांस की तकलीफ़ है जैसे दमा या श्वसन-तंत्र मे रूकावट आदि और वह किसी भारी ट्रैफिक या प्रदूषण वाली जगह में जा रहा है तो इस तरह का फेस-मॉस्क उस की कुछ तो रक्षा करेगा ही। ...यह तो कॉमन-सैंस की बात हुई!

एयर-प्यूरीफॉयर का सच 

एयर-प्यूरीफॉयर के बारे में भी विशेषज्ञों ने बड़ी बेबाकी से अपना एक्सपर्ट ओपिनियन दिया कि अभी तक कोई ऐसी वैज्ञानिक स्टडी नहीं आई है जिस ने यह निष्कर्ष निकाला हो कि इन एयर-प्यूरीफॉयर से सेहत पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। 

मैं भी कल तक एयर-प्यूरीफायर के बारे में कुछ विशेष नहीं जानता था..बस नाम से ही परिचित था...एक्सपर्ट्स ने बताया कि अगर कोई यह समझे कि २५-५० हज़ार रूपये खर्च करने भर से, एक फेशनेबुल डिब्बा सा अपने बड़े से हाल में रख देने से ही वायु प्रदूषण से निजात मिल जायेगी ...तो यह भ्रम ही है कि अपने गाड़ी या घर में एयर-प्यूरीफॉयर लगा देने से ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। 

बताया गया कि एयर-प्यूरीफॉयर की भी अपनी कैपेसिटी होती है कि इतने मिनट में इतने लिटर हवा ही वे छान सकते हैं...और इस में नाइट्रस-आक्साईड और कार्बन-मोमोआक्साईड जैसी गैसों के छनने के लिए और particulate matter छनने के लिए अलग प्रणाली उपलब्ध रहती है..

विशेषज्ञों की यही राय थी कि सारा दिन तो उस एयर-प्यूरीफॉयर के सामने टिके रहना नहीं है...बाहर हवा तो वही है ...जिसे सारा दिन छकना है.

एयर-कंडीशनर का सच

एक विशेषज्ञ ने इतना ही कहा बस कि एयर-कंडीशनर से वायु-प्रदूषण से थोड़ा बचाव तो है लेकिन यह भी उपाय कारगर नहीं है, प्रैक्टीकल बिल्कुल नहीं है...इसी बात से यह चर्चा छिड़ी कि अगर किसी ने इस उपाय से अपने कमरे में थोड़ा प्रदूषण कम कर भी लिया तो क्या?....उसने इस एयर-कंडीशनिंग की वजह से जो प्रदूषण फैलाया उस का क्या!... इसी बात से बात चली कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए हमें केवल अपने बारे में ही नहीं बल्कि अब तो सारे संसार के बारे में ही सोचने की ज़रूरत है ...हमें अपने कार्बन प्रिंट कम करने की तरफ़ ध्यान देना होगा... गाड़ी का कम से कम उपयोग करें, जहां पैदल जा सकते हैं वहां दुपहिया वाहन न लेकर जाएं, साईकिल का इस्तेमाल शुरू करें...अपनी गाड़ियों के प्रदूषण की जांच भी करवाएं और उसे ठीक ठीक भी रखें, घर से समय से पहले निकलें ताकि चौराहों पर इत्मीनान से गाड़ी बंद कर के हरी बत्ती का इंतज़ार कर सकें। 


क्या गुड़ खाने से सब कुछ ठीक हो जाता है..

एक प्रश्न उस प्रोग्राम में यह भी उभर कर आया कि क्या गुड़ खाने से वायु प्रदूषण से होने वाली तकलीफ़ों से निजात मिल सकती है। ऐसा बहुत से लोग सोचते हैं।

उस प्रोग्राम में समझाया गया कि वायु प्रदूषण की विशेष दिक्कत यह है कि इस से थोड़ा बहुत गला खराब होना, खांसी होना जैसे लक्षण तो होते ही हैं लेिकन सब से ज़्यादा चिंता की बात यह है कि particulate matter के बिल्कुल सूक्ष्म कण हमारे फेफड़ों के अंदर जा कर जम जाते हैं...वहां जमने के बाद हमारे रक्त के माध्यम से शरीर के दूसरे अंगों में भी जा पहुंचते हैं और विभिन्न प्रकार की बीमारियां पैदा करते हैं। फेफड़ों में ही इन के जमा होने से फेफड़े के कैंसर जैसे रोगों का डर तो बना ही रहता है। 

गुड़ खाने से बस प्रदूषण के कुछ कण आप के गले के रास्ते से श्वसण प्रणाली में जाने की बजाए आप के पेट में चले जाते हैं, बस इतनी सी है गुड़ की भूमिका ...

घरेलू प्रदूषण ..

चूल्हे की बनी दाल-रोटी का अनुपम ज़ायका होता है लेकिन यह किसी सेहत की कीमत चुका कर हम तक पहुंचता रहता है सदियों से और अभी भी यह हो रहा है....बेहतर हो कि अब हम लोग इस तरह के शौक पालने बंद कर दें...घर के अंदर धूम्रपान करने से..चूल्हे आदि जलाने कर ...जगह जगह पर लकड़ियां, उपले, प्लास्टिक आदि जलाने से वायु प्रदूषण बहुत ज़्यााद बढ़ जाता है...गर्भवती महिलाओं के होने वाले बच्चों के लिए घातक, महिलाओं के स्वयं के लिए घातक, छोटे बच्चों की सेहत के लिए बहुत ही बुरा.....ये सब बातें हम लोग क्या जानते नहीं हैं, जानते हैं लेकिन ढीठ हैं, गांवों की बात करते हैं कि वहां पर लकड़ियों को और खेतों में पराली (फसल का शेष हिस्सा जो काटने के बाद खेत में बच जाता है) को जलाने से प्रदूषण होता है...लेकिन शहरी लोग भी अपनी धुन में यह काम करने में किसी से पीछे नहीं हैं...जगह जगह प्लास्टिक तक जलाया जाता है...

याद आया कुछ दिन पहले मैं लखनऊ के एक बहुत पॉश कॉलोनी की तरफ़ से गुज़र रहा था...इतनी पॉश की सारी कॉलोनी में एक तिनका भी पड़ा हुआ सड़कों पर नज़र नहीं आता ...लेकिन उस की बांउड्री के बाहर का मंज़र आप स्वयं देख लीजिए.... इस हवा से उस पॉश कालोनी में रहने वाले कैसे बच पाएंगे?

इन सब बातों का निष्कर्ष यही निकलता है कि हम आइसोलशन में नहीं जी सकते कि हम अपने हिस्से की हवा तो कैसे भी शुद्ध कर लें और इस के आगे कुछ नहीं ......नहीं, अब हम उस दौर में पहुंच चुके हैं कि हमें बस सारे पर्यावरण की बेहतरी के बारे में सोचना होगा... वरना वही बात हो जाएगी जैसा पश्चिमी देशों ने किया ...कार्बन प्रिंट इतना बढ़ा दिया आधुनिकता के नाम पर कि अब साफ़ हवा में सांस लेना भी दूभर हो चुका है!

धुंध में सैर ---कितनी लाभदायक? 

एक प्रश्न के जवाब में एक्सपर्ट्स ने बताया कि सर्दी के दिनों में वायु प्रदूषण बढ़ जाता है और अकसर धुंध में वायु प्रदूषण के कण बहुत ज़्यादा मात्रा में होते हैं...इसलिए जो लोग सुबह सुबह इस तरह के वातावरण में टहलते हैं उन की सेहत के लिए भी यह ठीक नहीं है...टहलते समय या कोई भी शारीरिक क्रिया करते समय हमारे फेफड़ों की  vital capacity काफी बढ़ जाती है ...इस का मतलब यह है कि हम अपने फेफड़ों में बहुत अधिक मात्रा में वायु खींच पाते हैं...ऐसे में अगर इस तरह की प्रदूषित हवा इतनी ज्यादा मात्रा में अंदर जाएगी तो ज़ािहर सी बात है कि उस के दुष्परिणाम ही होंगे ......इसलिए यह हिदायत दी जाती है कि दिन खुलने पर ही, कोहरा छंटने पर और थोड़ी धूप आने पर ही टहलने के लिए निकला जाए.......अब यह कितना प्रेक्टीकल है, यह आपने देखना है, ऐसा एक्सपर्ट्स भी कह रहे थे। 

लिखते लिखते मुझे भी १८ साल पुराने वे दिन याद आ गये जब मैं नियमित सुबह सूर्योदय के समय प्राणायाम् किया करता था और मेरा बेटा घर में कहीं भी होता था तो रेंगता हुआ आ कर मेरी गोद में बैठ जाया करता था......और मेरा प्राणायाम् बस इसी तरह ही हो जाया करता था!!!

जाते जाते बस इतना ही कहना चाहूंगा कि हमें बस अपना अपना हिस्सा निभाना होगा ... कि हम कैसे अपने कार्बन प्रिंट को कम कर सकते हैं, बाकी बहुत से काम सरकारें कर रही हैं, और ये निरंतर एक सतत प्रयास है ताकि हम अपने कल को आज से बेहतर बना सकें और अगली पीढ़ी के लिए कम से कम वायु तो सुरक्षित थमा सकें.....आप क्या सोच रहे हैं। 

हां, सोच रहा हूं कि डी डी न्यूज़ के एक ऐसे ही प्रोग्राम का लिंक यहां लगा दूं...just a sample..ताकि आप स्वयं देख पाएं कि इन के प्रोग्राम कितने बढ़िया होते हैं... देखिएगा......many such health related programs telecast earlier are available on its youtube channel.......just check this out! 


मैंने अभी इस चैनल को खोला तो देखा कि कल का टेलीकॉस्ट प्रोग्राम भी इस पर पड़ा हुआ है....तो फिर मेरी मेहनत का क्या हुआ?...कोई बात नहीं, मैंने कुछ लेसन रिवाइज़ ही कर लिए इसी बहाने ...चलता है... अब आप क्या सुनेंगे.... मैं तो प्रदूषण की इतनी ढेरों बातें करने के बाद इसे सुन रहा हूं....





एक बात तो शेयर करनी है अभी ..दो  दिन पहले मैं जब मैं एक बुक फेयर में इन्हें इस तरह के आराम फरमाते देखा तो मुझे बड़ा इत्मीनान यह हुआ कि किताबों के नाम से केवल मैं ही नहीं हूं जिसे नींद आ जाती है....८०प्रतिशत कुर्सियां वैसे तो खाली थीं, मुझे और मेरे बेटे को बुक फेयर की बढ़िया बात ही उस दिन यह लगी कि इसी बहाने इसे इस के हिस्से की जगह मयस्सर हो गई और उसने भी चैन से दो झपकियां ले लीं...साहित्य की यही खूबी है, सब को सुकून देता है!





Friday, December 18, 2015

गुटखा-पान मसाला चबाने वालों के लिए खुशखबरी



खुशखबरी?...गुटखा पान-मसाला चबाने वालों के लिए?...यह कैसे संभव है!...यही सोच रहे हैं ना आप इस शीर्षक को पढ़ कर...लेकिन, नहीं, एक खुशखबरी इन के हिस्से की भी आज ले कर आया हूं...बहुत दिनों से सोच रहा था शेयर करूंगा...लेकिन बस टलता रहा।

यह जो आप मुंह के अंदर की तस्वीर देख रहे हैं यह लगभग १८-२० साल के नवयुवक की है ..इंटर में पढ़ता है..कालेज जाता है...यह लगभग दो-अढ़ाई साल पहले आया था मेरे पास...तकलीफ़ यही कि मुंह नहीं खुलता, मुझे अच्छे से याद है कि यह अपने मुंह में एक-दो अंगुली भी मुश्किल से डाल पा रहा था...इस के मुंह के अंदर बहुत से घाव थे..पायरिया तो था ही ...और सब से दुःखद बात कि यह मेरे पास जब भी आता था पायरिया के इलाज के लिए इस के मुंह में गुटखा पान-मसाला दबा होता था और मैं भी आदत से मजबूर इस के पायरिया के इलाज से पहले इसे गुटखे-पान मसाले से दूर रहने की नसीहत पिला दिया करता था...यह आराम से सुन लेता था ...मैं हर बार यही किया करता था...फिर इस के मसूड़े ठीक हो गये और मैंने इसे कहा कि अब तुम नियमित मुंह के चेक अप के लिए आया करो...गुटखा-पान मसाला छोड़ने को कहा और मुंह कम खुलने एवं मुंह के अंदर घाव पर कुछ दवाईयां लगाने को कहा ...

फिर यह नवयुवक मुझे दिखा नहीं ...अभी कुछ दिन पहले दांत की किसी तकलीफ़ के लिए वापिस आया तो मुझे इसे देख कर बहुत खुशी हुई....इसने पान मसाला दो साल पहले ही छोड़ दिया था, गुटखा पान मसाले से होने वाले मुंह के घाव पूर्णतयः ठीक हो चुके थे और सब से खुश करने वाली बात यह लगी जब इस ने मुझे बताया कि अब इस की तीन अंगुलियां मुंह में चली जाती हैं....

ऐसे नवयुवक --इतनी दृढ़ इच्छा शक्ति वाले मिलते हैं तो अच्छा लगता है, मुझे लगा कि शायद यह पिछले डेढ़ दो साल से दवाईयां खा रहा होगा या मुंह के अंदर लगाता भी रहा होगा, लेकिन नहीं, इसने कोई दवाई न खाई और न ही कोई मुंह के अंदर लगाई......बस, पान मसाला और गुटखे को बॉय-बॉय कहने से ही इस का कल्याण हो गया...मुझे बहुत खुशी हुई....आप सब के सामने एक प्रूफ पेश करने को मिल गया कि किस तरह से कोई भी बंदा धूम्रपान, गुटखा, पान मसाले को छोड़ने से स्वास्थ्य लाभ हासिल करने के साथ साथ भयंकर बीमारियों से अपने आप को बचा लेता है।

आप सोच रहे होंगे कि इस के मसूड़े फिर से ठीक नहीं लग रहे...हां, वह तो है ..लेकिन उस का संबंध इस के द्वारा ब्रुशिंग करने की कमी से है, वह भी ठीक हो जायेगा....कुछ दिनों में वह भी दुरूस्त हो जायेगा...वह कोई इश्यू नहीं है, सब से बड़े इश्यू को वह अपने आप मिटा चुका है।

अब आप मेरी इस पोस्ट को और इस नवयुवक की आपबीती देख-पढ़ कर यह मत समझ लीजिएगा कि इस तरह की तकलीफ़ के लिए किसी को भी इलाज की ज़रूरत नहीं है....नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। इलाज तो करवाना ही होता है...लेिकन इस तरह का केस जब मेरी नज़र में आया तो मैंने उस के अनुभव भी दर्ज कर देना ज़रूरी समझा।

एक दूसरा युवक ...उम्र यही लगभग २०-२१ साल....हर समय मुंह में गुटखा-पान मसाला दबाये रहना..और मेरे पास भी यह सब चबाते हुए ही आना....(यह कुछ जगहों की संस्कृति में शामिल हो गया दिखे है अब ) .और मुंह मे बहुत से घाव ....इस की भी तीन चार बात अच्छे से क्लास ली कि गुटखे या अपनी ज़िंदगी में से एक हो अभी से चुन लो....जल्दी समझ गया...यह कोई एक डेढ़ महीने पहले की बात होगी....यह समय रहते ही समझ गया ...और बच गया...अभी दो चार दिन पहले चेक -अप करवाने आया था ..मुंह के सभी ज़ख़्म बिना किसी दवा के स्वतः ठीक हो चुके थे ...केवल एक घाव दिख रहा है जिसे आप यहां इस तस्वीर में देख रहे हैं.....यह भी चंद दिनों-हफ्तों में अपने आप ही गायब हो जायेगा।

हां, तो जिस बात को मैं रेखांकित करना चाह रहा हूं कि गुटखे-पान मसाले का त्याग करना सर्वोपरि है ....और अगर कुछ दवाईयां खाने या लगाने के लिए दी गई हैं, इन का इस्तेमाल करना ही चाहिए....लेकिन फिर भी आदत का छोड़ना सब से ...सब से ज़्यादा ज़रूरी है ...पहले वाले युवक की दास्तां आप ने अभी मेरे से सुनी।

मेरे पास बहुत से ऐसे मरीज़ भी आते हैं जो शायद मेरी इन्हीं बातों से परेशान (!) हो कर ये सब आदतें छोड़ देने पर मजबूर हो जाते हैं...लेकिन कईं बार कुछ लोग यह कह देते हैं कि बस, कभी कभी थोड़ा इस्तेमाल कर लेता हूं या बस, पहले तो ५० पैकेट हो जाते थे, लेकिन अब तो एक दो ही .....उन्हें मैं यही कहता हूं साफ़ साफ़ कि ज़हर तो ज़हर ही है, पूरी तरह से छोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं....मैं उन्हें समझाता हूं कि उच्च रक्त चाप के लिए चिकित्सक रोज़ाना एक टेबलेट से ही आप को ठीक कर देते हैं तो रोज़ाना एक गुटखा-पान मसाला या कभी कभी भी चबाया जाने वाला गुटखा-पान मसाला आप को बीमार..बहुत बीमार करने के लिए काफी है...

ये जो दोनों युवकों की बात मैंने शेयर की इन्हें मैंने यह भी समझाया था कि महंगे टॉनिक-वॉनिक लेने की वजाए...अपने खाने पीने पर ध्यान दें...सादा पौष्टिक खाना खाएं, नियमित सलाद लें और मौसमी फल तो लें लेकिन जंक-फूड से दूर रहें....

इन युवकों ने ..विशेषकर पहले वाले युवक ने तो लगता है मेरी बातों पर पूरा अमल किया ....एक बात और भी है कि इस १८-२० साल की अवस्था में हमारे शरीर में इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) और अपने आप को हील (heal) करने...reparative capacity...  की अपार क्षमता होती है... और इन युवकों की इस बात ने भी हेल्प की...

इस का मतलब नहीं कि अगर आप उम्रदराज़ हैं और आप सोचें कि अब कुछ नहीं होगा, इतने सालों से इस तरह की चीज़ों का सेवन कर रहे हैं, अब तक तो होना था, हो ही गया होगा.........नहीं, ऐसी बात नहीं है.... आप शुरूआत तो कीजिए......ये दोनों उदाहरण हमेशा आप को प्रकृति की हीलिंग पॉवर की याद दिलाते रहेंगे ......लेकिन बस आप को हमेशा के लिए गुटखे-पान मसाले--पान को थूक देना होगा....और अगर आज ही किसी दंत चिकित्सक से एक बार अपने मुंह का चेक-अप करवा लें तो सोने पे सुहागा......अगर तो वह कहेगा कि अभी आप के मुंह में इस तरह का कोई प्रभाव नहीं दिख रहा तो आप को ये सब आदतें छोड़ने के लिए दृढ़ प्रेरणा मिलेगी !

इस तरह की आदतों से लिप्त कोई भी व्यक्ति अपने मुंह के अंदरूनी हिस्सों का अपने आप भी निरीक्षण निरीक्षण करे और दंत चिकित्सक से भी नियमित मिलता रहे .... एचआईव्ही की भी ऐच्छिक टेस्टिंग के पीछे भी तो यही फंडा है ...हम लोग कहते हैं कि जिस व्यक्ति का भी हाई-रिस्क बिहेवियर है उसे गुप्त रोगों की जांच एवं एचआईव्ही की ऐच्छिक रक्त जांच करवा लेनी चाहिए...God forbid, अगर कुछ पाया जाता है तो तुरंत उस से निपटने की तैयारी हो जायेगी और अगर सब कुछ ठीक आता है कि वे सब आदतें छोड़ने की एक मजबूर प्रेरणा तो मिल ही जायेगी.

बस, जाते जाते बात वही है..कि शुरूआत तो खुद हमें ही करनी है ....बार बार कितनी बार वही बात दोहरानी पड़ती है जो मैंने अपने बेटे के स्कूल के प्रिंसीपल के कक्ष के बाहर पढ़ी थी १५ साल पहले........There is never a wrong time to do the right thing!



गुटखे-पान मसाले का इस्तेमाल व्यापक तौर पर हो रहा है ...इस तरह के मरीज़ जिन का मैंने ऊपर वर्णन किया... कभी आकर हमारा हमारे में विश्वास पुख्ता कर देते हैं शायद ... और वैसे भी मैं तो हमेशा उस चिड़िया वाली कहानी को हमेशा अपने ज़हन में रखता ही हूं...जो एक जंगल की आग को दूर किसी तालाब से अपनी चोंच में पानी भर भर ला और उस आग पर छिड़काव कर बुझाने की कोशिश करती है और कोई उस की इस कोशिश की खिल्ली उड़ाता है कि इस से क्या होगा........उस चिड़िया का जवाब ही मेरी भी प्रेरणा है .....वह उस मज़ाक करने वाले को कहती है .....मेरी इस चोंच के पानी से आग बुझेगी कि नहीं, मुझे यह सोचने की फुर्सत नहीं है, मैं तो बस इतना जानती हूं कि जब इस आग का इतिहास लिखा जायेगा तो मेरा नाम आग बुझाने वालों में लिखा जायेगा...




Thursday, December 17, 2015

आज सपने में भी सॉरी ने बचा लिया..

आज सुबह एक सपने ने मुझे ५.३० बजे जगा दिया..सुनना चाहेंगे?

मैं किसी बैंक की कतार में खड़ा हूं...है तो बैंक, लेकिन कतार बाहर ओपन में लगी हुई है...पता नहीं कैसा बैंक था यह...
कतार बहुत लंबी है। मेरे आगे एक बुज़ुर्ग खड़े हैं (जो आव-भाव से कोई रिटायर फौजी दिखते हैं, ऐसा मैंने सोचा सपने में) ....बैंक की खिड़की से ज़्यादा दूर नहीं हूं मैं..लेकिन कतार थोड़ी टेढ़ी होने के अंदेशे से मैं उस फौजी की पीठ पर हल्का सा हाथ रख कर उसे कतार सीधी करने की बात कहने ही वाला था कि वह आग बबूला हो गया। 

वह बुज़ुर्ग मुझे क्या कतार में खड़े सभी लोगों को बुरा भला कहने लगता है...बहुत बुरा भला...और यह सिलसिला लगभग दो मिनट तक चलता है...जब ऐसी बातें दो मिनट के सुननी पड़ती है तो उस समय पता चलता है कि समय की रफ्तार कितनी स्लो है!

लेकिन वह बुज़ुर्ग बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था...तभी मेरे मुंह से हल्का सा निकल गया...सॉरी....
वाह भई, यह क्या?...इस छोटे से फिरंगी शब्द ने जैसे जादू कर दिया हो...उस बुज़ुर्ग ने तुरंत कहा ...हां, मैं यही सुनना चाहता था!

तभी किसी ने कह दिया कि यह इस बिल्डिंग वाली बैंक की ब्रांच आज बंद रहेगी (ऐसे सपने में ही होता है...हा हा हा ) लेकिन सामने दूसरी बिल्डिंग वाला बैंक खुला है..

तभी मैं देखता हूं कि सारी कतार बिल्कुल जंगलियों की तरह उस बिल्डिंग वाले बैंक की तरफ़ बेतहाशा भागने लगती है... मैं अभी सोच ही रहा था कि अब कौन किस से खफ़ा होगा, कौन किस से सॉरी मांगेगा.....

तुरंत मेरा सपना टूटा ....मैं उठ गया.....

और मैं टाटास्काई के मिनिप्लेक्स पर शिखर हिंदी मूवी देखने बैठ गया....मुझे यह मूवी बहुत अच्छी लगी है...यू-ट्यूब पर भी है.. अगर देखना चाहें तो ...

हां, वह सॉरी वाली बात से ध्यान आ रहा है कि हम लोग किसी से सॉरी कहलवाने के लिए इतने उतावले क्यों रहते हैं....और यही शब्द अपने मुंह से निकालने में हमें आफ़त महसूस होती है....बात सोचने लायक है कि नहीं!

एक और विचार यह भी आ रहा है कि किस तरह से उम्र के साथ हमारे सपने भी बदल जाते हैं....सच में.....स्कूल कालेज के दौर के सपने भी कैसे होते थे कि उठने की इच्छा ही नहीं होती थी!.....आप का क्या ख्याल है? 

शिखर फिल्म का यह टाइटल गीत है... बिल्कुल भजन जैसा....बिल्कुल भक्ति गीत जैसा... हां, मुझे सपने पर एक काम की बात याद आ गई....मैंने २५ साल पहले किसी पोस्टर पर लिखा पढ़ा था......Never laugh at anybody's dreams!......और मैं कभी किसी के ख्‍वाब पर हंसा नहीं......और हमेशा अपनी इस आदत को कायम रखूंगा...Life is full of new possibilities and hopes! 

Wednesday, December 16, 2015

साईकिल से चलना एक मिशन जैसा..

अभी मैं लखनऊ की जेल रोड पर जा रहा था तो मैंने एक साईक्लिस्ट को देखा...उसने हेल्मेट पहना हुआ था और उस की साईकिल के पीछे एक बड़ी पावरफुल लाल बत्ती टिमटिमा रही थी...खूब स्पीड से चल रहा था...मुझे लगता है कि वह कोई साईक्लिस्ट होगा...जो विभिन्न इवेंट्स में भाग लेते हैं। मैंने झट से उस की फोटो ली...



आज सुबह भी मित्र अनूप शुक्ल जी ने एक बढ़िया पोस्ट शेयर की ... वे स्वयं भी साईकिल पर खूब चलते हैं और लोगों को भी प्रेरित करते हैं...उन की फेसबुक पोस्ट यहां शेयर किए दे रहा हूं...पढ़िएगा...
इसे अच्छे से पढ़ने के लिए इस फोटो पर क्लिक करिए..
रेलवे के उच्च अधिकारी हैं ..ज्ञान दत्त पांडेय जी... रिटायर होने के बाद अपने गांव में सेटल हो गये हैं...साईकिल खूब चलाते हैं..दो तीन महीनों में ही वजन भी कम हो गया है और चेहरे पर १००० वॉट की मुस्कान भी अकसर नज़र आने लगी है...

मैं भी कभी कभी सुबह साईकिल चलाने निकल जाता हूं...वह सारा दिन अच्छा निकल जाता है...लेिकन बहुत बहुत बार आलस की वजह से ...नहीं निकल पाता।

सच में प्रदूषण का स्तर इतना भयानक है कि भीड़ के समय बाज़ार जाने में डर लगने लगा है.. सिर दुःख जाता है... मुझे तो जल्दी ही असर हो जाता है... मैं देख रहा हूं कि आजकल यहां लखनऊ के भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में निकलना दूभर हो गया है... भयंकर प्रदूषण...प्रदूषण का स्तर जानने के लिए विज्ञान को पढ़ने की ज़रूरत नहीं ...हमें अपने आप ही पता चल जाता है कि हम लोग हवा के नाम पर अंदर क्या खींच रहे हैं!

कोर्ट कचहरीयां हस्तक्षेप कर रही हैं....केजरीवाल सरकार ने भी कुछ प्रोग्राम तो बनाया है ...ऑड-इवन वाला ...बहुत अच्छा है...देखते हैं...

 आज का टाइम्स ऑफ इंडिया ...17 दिसंबर 2015
कल रात मैं टीवी पर देख रहा था कि डीज़ल गाड़ियों के पंजीकरण पर दिल्ली में रोक लगी रहेगी....किसी चेनल पर देख रहा था किसी दिल्ली वाले ग्राहक की व्यथा... उसने अपनी भांजी की शादी में देने के लिए एक डीज़ल वाली गाड़ी बुक करवाई थी...लेकिन अब उसे गाडी की डिलिवरी नहीं मिलेगी..वह अपना दर्द कुछ इस तरह से ब्यां कर रहा था कि या तो अब उसे पेट्रोल वाली गाड़ी को चुनना होगा...वरना दिल्ली से बाहर डीज़ल वाली गाड़ी खरीद लूंगा, वहीं रजिस्टर करवाऊंगा ..लेकिन चलेगी तो फिर भी वह गाड़ी दिल्ली की सड़कों पर ही ना।

आप भी समझ रहे हैं कि समस्या कितनी विषम है।

मुझे कल एक टीवी के प्रोग्राम में सेंटर फॉऱ एन्वायरमेंट साईंस की सुनीता नारायण से पता चला कि एक डीज़ल गाड़ी से होने वाला प्रदूषण सात पेट्रोल वाली गाड़ियों के बराबर होता है....सच में मुझे यह पहले नहीं पता था..मैं भी पता नहीं कैसी साईंस पढ़ा हूं कि मुझे अपने लिए डीजल गाड़ी खरीदते समय इस बात का ज़रा भी पता नहीं था...मुझे तो बस इतना बताया गया था कि यह लंबे सफर के लिए सस्ती पड़ती है....हम कितने महत्वपूर्ण फैसले ऐसे ही हो जाते हैं!

मैं कईं बार सोचता हूं कि साईकिल पर ही ड्यूटी के लिए निकल जाया करूं...सोच रहा हूं कि अगर ऐसा सोचता हूं तो फिर ऐसा कर क्यों नहीं पाता हूं....चलिए आज इस के कारण ढूंढता हूं...
  • आफिस के समय सड़कों पर ट्रैफिक बहुत ज़्यादा हो जाता है... बिना डिवाईडर वाली रोड पर उस समय साईकिल चलाने की हिम्मत नहीं है मेरे में। 
  • आफिस जाते समय टिपटाप हो कर साईकिल पर निकलना थोड़ा हास्यास्पद लगता है मुझे अपने आप में...विशेषकर जब सूट-बूट डाला हो ...तो ऐसे में साईकिल उठाने की हिम्मत ही नहीं होती....लिखते हुए मुझे यही लग रहा है कि यह शायद मेरी झिझक है...जो भी है, लेकिन है तो। मुझे ऐसे लगता है ...मैं ऐसा भी सोचता हूं कि जिन लोगों की अखबारों में फोटो आती है ...बड़े बड़े अधिकारियों की साईकिल पर जाते हुए एक ग्रुप में...मुझे लगता है कि वे बस अखबार में फोटो के लिए ही होती हैं....
  • मैं चाहे जितना भी कहूं कि मुझे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन फिर भी मैं इतना तो कांशियस हूं ही कि मेरा अधीनस्थ स्टाफ मुझे साईकिल पर आते जाते देखेगा तो वह पता नहीं क्या फील करेंगे, लेकिन मैं असहज महसूस करूंगा...
लेकिन फिर भी लगता है कि अगर वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग साईकिल पर चलेंगे तो अधीनस्थ कर्मचारियों को भी साईकिल पर चलने के लिए इस से बढ़िया प्रेरणा नहीं हो सकती।

हम सब झिझक से ही सिमटे-सहमे जा रहे हैं...बहुत से लोगों से मिलता हूं जो कहते हैं कि उन्हें साईकिल उठाना ही गवारा नहीं है....इसे वे अपनी बेइज्जती समझते हैं, जो मैं समझा हूं।

साईकिल चलाने के बारे में यहां लखनऊ में कुछ न कुछ गतिविधियां होती ही रहती हैं...लखनऊ हेरीटेज वॉक... साईक्लिस्टों के लिए अलग से पथ --साईकिल लेन....कुछ न कुछ चलता ही रहता है... और छावनी एरिया में तो मैं कुछ फौजियों को अकसर हेल्मेट डाल कर साईकिल चलाते हुए भी देखता ही हूं।

इस पोस्ट को यही लिख कर बंद करूं कि कुछ अरसा पहले तो हम लोग कहते थे कि साईकिल चलाइए...अपना वजन कम करिए, सेहतमंद रहिए.... ईंधन को बचाए...ऊर्जा संरक्षण कीजिए....प्रदूषण कम करिए......लेकिन दोस्तो अब तो हम इस स्थिति में पहुंच चुके हैं....कि बड़ी बड़ी महान् बातें की हमें करने की ज़रूरत नहीं, हमें अब एक्शन की ज़रूरत है.....जीने के लिए....सांस लेने के हवा तो चाहिए.......कब तक हम लोग विषैली गैसों के मिश्रण में सांस ले कर अपनी सेहत को खराब करते रहेंगे....अब एक्शन चाहिए। साईकिल चलाने को आइए एक मिशन के रूप में अपना लें और पर्यावरण को बचा लें, वरना देर तो पहले ही बहुत हो चुकी है। 

मैं भी देखता हूं कि कब तक मेरी झिझक और मेरी बहानेबाजी मुझे अधिक से अधिक साईकिल पर चलने से रोक पाती है!

 मैं जब भी साईकिल चलाने जैसे विषय पर लिखता हूं तो मुझे मेरे बचपन के ज़माने का यह गीत ही बार बार याद आता है....हमारे बचपन के दिनों में इस तरह से लोग कईं कईं दिन तक निरंतर साईकिल चलाने के करतब भी दिखाया करते थे...हम अकसर उन्हें देखने जाया करते थे...बिल्कुल इसी तरह के मंजरों के सत्तर के दशक में हम गवाह रह चुके हैं...

Saturday, November 21, 2015

परिंदों को खुले में उड़ान भरने का अधिकार है क्या?

इस प्रश्न के बारे में कुछ बताने से पहले मैं एक गीत लगा देता हूं...बहुत ही खूबसूरत गीत..परिंदों की आज़ादी का जश्न मनाने वाला गीत.....पंछी, नदियां, पवन के झोंके..कोई सरहद न इन्हें रोके..याद आया कुछ?



वैसे भी हम सब की ज़िंदगी में परिंदे कभी न कभी तो रहे ही हैं...स्कूल के दिन याद हैं जब हम लोग पक्षियों के चहचहाने के बारे में कविताएं गुनगुनाते थे... गर्मी के दिनों में सुबह सुबह उठते तो पक्षियों की बहुत सी आवाज़ें सुनने को मिलतीं...आंगन में अकसर बहुत से पक्षी रोज़ाना आते...कभी कभी बिल्कुल नये से पक्षी दिखते..जिन्हें पहले नहीं देखा होता था...कितना मज़ा आता था ना तब। 

एक तो वैसे ही पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों पर आफत आई हुई है ...ऊपर से यह जो बचे खुचे पक्षियों के ऊपर पक्षी-प्रेम नाम के बहाने तरह तरह के अत्याचार हो रहे हैं...ये देख-सुन-पढ़ कर बहुत बुरा लगता है। 

हम तरह तरह के विभिन्न पशु-पक्षियों पर अत्याचार किए जा रहे हैं.. मैंने पिछले दिनों ये तस्वीरें खींची थी ...मुझे बहुत बुरा लगा था..लगा क्या, रोज़ाना लगता है, जिस तरह से हम पक्षियों को ट्रीट करते हैं।

आज मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया में जब एक खबर देखी तो पहली बार तो मुझे कुछ ज़्यादा समझ में नहीं आया...फिर से अच्छे से पढ़ा तो पता चला कि मामला है क्या!

खबर यही है कि अब सुप्रीम कोर्ट यह फैसला करेगी कि क्या परिंदों को परवाज़ का अधिकार है या फिर उन्हें पिंजरों में कैद कर के रखा जा सकता है!
( Please click on this pic to read clearly)..ToI. 21Nov' 2015
मैंने पहली बार यह जाना कि परिंदों पर किस तरह से अत्याचार हो रहे हैं... इन के पंख काट दिये जाते हैं, पंख काटने के बाद उन पर सेलो-टेप लगा दी जाती है..और फिर उन की टांगों पर अंगुठियां डाल दी जाती हैं...कुछ अरसा पहले बहुत से ऐसे पंक्षी जब्त किए गये थे...गुजरात हाई कोर्ट ने निर्णय दिया है कि पक्षियों को पिंजरों में बंद करना उन के स्वतंत्र रहने के अधिकार का हनन है। 

लेिकन कुछ "पेट लवर्ज़ (Pet lovers)" संगठनों ने सुप्रीम में यह केस कर दिया है कि गुजरात हाई कोर्ट का यह फैसला गैर-कानूनी है...इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट का एक बेंच यह फैसला करेगा कि क्या गुजरात कोर्ट का फैसला सही है या नहीं कि परिंदों को आसमां में आज़ाद हो कर उड़ान भरने का अधिकार है!

मुझे सुप्रीम कोर्ट के विवेक पर पूरा भरोसा है और यही कामना है कि फैसला पक्षियों की बिंदास उड़ान के हक में हो.....हम लोग इन परिंदों से,  इन के ऊपर बने शेयरों से ही इतनी इंस्पीरेशन लेते रहते हैं... 

सपने वही सच होते हैं जिन में जान होती है...
पंखों से कुछ नहीं होता, हौंसलों की उड़ान होती है!

और जहां तक पंक्षियों के साथ निःस्वार्थ प्रेम की बात है ...वह हम लोग अकसर अपने आस पास देखते ही रहते हैं ..जब लोगों को चौराहों पर इन नन्ही जानों को दाना डालते देखते हैं... कभी कभी व्हाट्सएप पर देखते हैं कि कैसे लोग घायल परिंदों की मरहम-पट्टी करते हैं......और मैं अपने सामने वाले घर के बाहर यह नज़ारा देखता हूं......इस से सुंदर भला इन नन्हें परिंदों की मेजबानी करने का और क्या तरीका हो सकता है!......यह तस्वीर मैंने आज बाद दोपहर खींची...

वैसे मेरी बीवी भी इन नन्हे परिंदों पर बहुत फिदा हैं....बालकनी में इन के आने का बहाना तैयार कर के रखती हैं रोज़ और फिर जब कोई भी मेहमान चंद लम्हों के लिए आता है तो मुझे बताते हुए खुश हो जाती हैं.....मैं अपना कैमरा पकड़ कर तस्वीर खींचने लगता हूं किचन के अंदर से ही तो ये मेहमान फुर्र से उड़ जाते हैं......कभी कभी मेरे कैमरे में कैद हो जाते हैं......जैसा कल यह वाला परिंदा हो गया था...

काश ! इन परिंदों की आसमां में बिंदास, ऊंची उड़ाने हमेशा कायम रहें....

कुछ बातें कानून नहीं बदल सकता,  उस के लिए हमारे मन बदलने होंगे...बस यही उम्मीद बची है कि हमारी सोच बदल जाए..बस, हम लोग ढोंग करना छोड़ दें .......पक्षी प्रेमी होने के नाम पर इन को पिंजरों में ठेल दिया, यह क्या बात हुई.....हम इन्हें आज़ाद कर दें ताकि ये फिर अपनी इच्छा से हमारे पास रोज़ चंद लम्हों के लिए बार बार आएं...हम से बात करने ...हमारा हाल चाल लेने, अपना हाल चाल देने.....मुझे व्हाट्सएप पर पिछले दिनों चलने वाला एक कार्टून याद आ गया.....सूरज उदय हो चुका है..और एक बंदा अपने बिस्तर पर लेटा हुआ है अपने कमरे में...उस की चद्दर पर दस बीस परिंदे उस का हाल चाल पूछने आये हैं..और कह रहे हैं....... दोस्त, क्या हाल है?..सब ठीक तो है ना, आज हम ने तुम्हें पार्क में टहलते नहीं देखा तो चिंता हुई, इसलिए हाल चाल पूछने आ गए!........सच मे ऐसे ही होते हैं ये नन्हे जीव, कभी इन से बतिया कर के देखिए तो! 

अभी पोस्ट का पब्लिश बटन दबाने लगा तो बचपन में सैंकड़ों-हज़ारों बार जलंधर रेडियो स्टेशन से सुना हुआ मन जीते जग जीत पंजाबी फिल्म का यह गीत ध्यान में आ गया... जदों जदों बनेरे बोले कां........इस में मुटियार अपने मन के उद्गार प्रगट कर रही है कि जब जब भी आंगन में कौवा आ कर बोलता है तो मुझे तेरे आने की आस बंध जाती है... सुंदर गीत है, पंजाबी नहीं भी समझ में आती तो भी सुनिएगा....

Thursday, November 19, 2015

डाक्टर, आप की बात टेप ही कर लेता हूं!

इस से पहले की मैं आप को एक वाकया सुनाऊं, मैं आप को उस परिवेश से रू-ब-रू करवाना चाहूंगा जिस में हम पले-बढ़े और जिस में डाक्टर और मरीज कैसे हुआ करते थे!

स्कूल कालेज के दिनों तक हमारा वास्ता इस तरह के सरकारी डाक्टरों से पड़ा जो अपने मरीज़ों की तरफ़ देखे बिना कुछ न कुछ लिख दिया करते थे...बात करना और चेक करना तो दूर, वे पूरी तकलीफ़ सुने बिना अस्पताल में मौजूद दो चार तरह की दवाईयों में से दो का नुस्खा लिख कर थमा देते थे, वे हमें वहीं से मिल जाती थीं...हम घर आकर एक दो खुराक खा लेते थे... बाकी दवाईयां फैंक दिया करते थे, डाक्टरी की बेरूखी की वजह से दवाई खाने की इच्छा ही कहां हुआ करती थी! 

एक दो दिन में तकलीफ़ ठीक हो गई तो ठीक, वरना हमारे पिता जी किसी कैमिस्ट से दो चार खुराकें लाते और वे हमें लग भी जाया करती थी, नहीं तो माता जी के साथ अमृतसर के एक नामचीन डाक्टर कपूर के पास जाना होता था...वह भी बातें कम करते थे लेकिन काम में एक्सपर्ट थे... मुझे अच्छे से याद है मरीज़ सभी डरे-सहमे-सिमटे उन की क्लिनिक की बेंचों पर बैठे रहते थे. बातें ज़्यादा नहीं करते थे, अपना काम जानते थे, लेकिन बंदा चिड़चिड़ा सा था थोड़ा, एक से दूसरी बात पूछने पर भड़क जाता था, आज से चालीस साल पहले वाला ज़माना सीधे साधे लोगों का था, कहने का मतलब यही कि सब तरह के डाक्टर बस जैसे तैसे चल जाया करते थे। 

और जहां तक डाक्टर के पास जाकर ज़्यादा बात करने की बात है, तौबा भई तौबा ...यह हम ने कभी बचपन में देखा ही नहीं, हमारे मां-बाप से ही एक से दूसरी बात डाक्टरों के साथ नहीं होती थी तो हम ने ही क्या करनी थी! बस, दब्बू गूंगे से बन कर बैठे रहते थे।

आज के दौर में जिस तरह से छोटे बच्चे भी आत्मविश्वास से बात करते हैं ...अधिकतर ...उस समय लगता है कि हां, ज़माना बदल चुका है बहुत.... लेकिन कईं बार जब हद पार हो जाती है तो थोड़ा अजीब सा लगता है, मैंने यह नहीं कहा गलत लगता है, यही कहा कि कुछ अलग सा लगता है जैसा कि मैं आप को एक असल वाकया सुनाने लगा हूं।

उस दिन वह अधिकारी मेरे पास आया था... सेकेंड ओपिनियन के लिए...उस की पत्नी का कहीं से इलाज चल रहा था, उसे सेकेंड ओपिनियन चाहिए था। बता रहा था कि घर दूर है, इसलिए बीवी को साथ नहीं ला सकता था। 

जब मुझे उस से बात करते पांच मिनट हो गये तो...उसने कहा कि डाक्टर, अच्छा होगा अगर मैं आप की बात टेप कर लूं..(उसने यही शब्द टेप ही बोला था).....मुझे अजीब नहीं, बहुत ही अजीब लगा था, शायद अटपटा भी ...क्योंकि इस तरह की बातें सुनने की शायद आदत नहीं है ...यह मेरे साथ पहली बात हुआ।

मैंने तुरंत उसे हल्के अंदाज़ में कहा ...नहीं, नहीं, उस की कोई ज़रूरत नहीं है, आप की पत्नी जब आएंगी तो मैं ये सब बातें दोबारा फिर से बता दूंगा.... लेकिन उसने मेरी बात सुनी-अनसुनी कर दी ... और तब तक वह स्मार्ट अधिकारी अपने से भी स्मार्ट फोन पर उंगली चलाने लगा और रिकार्ड का बटन दबा कर फोनवा जेब में रख कर मेरे सामने बैठ गया.......मैंने अगले १५-२० मिनट उस से बात की....लेिकन मुझे बीच बीच में थोड़ा सा अजीब ज़रूर लगता रहा।

अब आप सोच रहेंगे कि मैंने उसे इजाजत ही क्यों दी कि वह मेरा इतना लंबा वार्तालाप रिकार्ड कर ले, उस का जवाब एक तो यह है कि मैं तो इजाजत तभी देता अगर वह मांगता, लेिकन यह तो एक तरह की जबरजस्ती ही समझें......और दूसरी बात जो मेरे ज़हन में उस समय कौंध रही थी वह यही थी कि इसने तो पूछ कर बात रिकार्ड की है, अगर मेरे चेंबर के बाहर ही से यह मोबाइल फोन ऑन कर के अंदर आ जाता तो मैं क्या कर लेता, मुझे क्या पता चल पाता!

और एक ध्यान यह भी आया कि वैसे भी दिन में पता नहीं कितने लोग क्या क्या रिकार्ड कर ले जाते होंगे, हर हाथ में एक स्मार्ट फोन होता है, रिश्तेदार इलाज करवा रहे होते हैं और साथ आने वाला हमारे सामने वाली कुर्सी पर बैठ कर स्मार्ट फोन के साथ लगा रहता है...यही सब सोच कर लगा कि इस अधिकारी को सख्ती से मना ना ही करना मुनासिब है।

वैसे भी आज कल रिकार्डिंग डिवाइस कुछ ज़्यादा ही दिखने लगे हैं....स्टिंग आप्रेशन स्टाईल के ...दो दिन पहले मैं लेपटाप के लिए एक केबल खरीदने गया  था, वहां पर सब तरह के खुफिया कैमरे जो हम लोग टीवी के विज्ञापनों में ही देखते हैं, वे सब बिक रहे थे...खुफिया कैमरे से लैस पेन भी...लेिकन मैंने उन्हें देखने का भी कष्ट नहीं किया......जब ये सब घटिया हरकतें करनी ही नहीं कभी तो इन के चक्कर में पड़ना ही क्यों!

मैंने कभी भी किसी की फोन की बातचीत भी रिकार्ड नहीं की है......मैंने अपने किसी भी फोन में यह फीचर ढूंढने तक की ज़हमत नहीं उठाई...क्योंकि किसी के साथ इस से बड़ा विश्वासघात क्या होगा कि आप बिना उस की जानकारी के उस की बातचीत रिकार्ड कर लें, फिर उसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करें.....मैं जिस परिवेश में पला-बढ़ा हूं और जो हमें घर-बाहर से सिखलाई मिली है ,उस के मुताबिक इसे पीठ में छुरा (back stabbing)घोंपना कहते हैं... इसे बहुत गलत समझा जाता है....जब किसी ऐसे आदमी के बारे में पता चल जाता है तो उस की साख ज़ीरो हो जाती है....कोई उस से सलाम-दुआ तक नहीं करना चाहता। आदमी की करेडिबिलिटी बहुत बड़ी पूंजी है, मैं ऐसा समझता हूं....इसलिए किसी के साथ भी विश्वासघात बहुत महंगा पड़ता है। 

कईं साल पहले की बात है ...आठ दस साल पहले की...हमें एक बंदे का पता चला जो सब की बातें रिकार्ड कर लिया करता था ..फिर उसे अपने स्वार्थ के लिए यूज़ भी किया करता था....मुझे याद है कि जिस दिन मुझे यह पता चला... उस दिन से ही मैं उस के साथ फोन पर बात करने से ही कतराने लगा... यहां तक कि वह जब कहीं मिल भी जाता तो यही लगता कि जेब में रखे अपने फोन से ये सारी बातें रिकार्ड कर रहा होगा......और ज़ाहिर सी बात है कि कुछ समय बाद उस के साथ वार्तालाप का स्टाईल कुछ इस तरह का हो गया कि जैसे वह हर बात रिकार्ड कर रहा है... यह कहूं कि उस के बाद उस के साथ बात करने में मज़ा ही नहीं आया...लेिकन अब समय इस तरह से बदला है कि अब यह टेंशन बिल्कुल भी नहीं रही, अब तो ये सब बातें इतनी आम हो गई हैं कि यह इश्यू ही नहीं रहा.....करो, यार, करो रिकार्ड ...और कर लो जहां चाहते हो इसे इस्तेमाल ...लेिकन फिर भी उस दिन जब उस अधिकारी ने मुझे कह कर मेरी बात रिकार्ड की तो मुझे अटपटा सा लगा.......सोचने की बात है कि आखिर मुझे ऐसा लगा क्यों ? कभी फुर्सत में अपने आप से फिर पूछूंगा। मेरे पास भी छिपाने के िलए कुछ भी तो नहीं था!

उस अधिकारी के पास अपनी पत्नी के एक्स-रे की सी.डी थी...जिसे उसने अपने लैपटाप में लगा लिया ...और फिर मेरे से वार्तालाप शुरू किया....सेकेंड ओपिनियन तो क्या, बीच बीच में मुझे उस के प्रश्नों से लग रहा था जैसे वह मेरा वाईवा (viva voce) ले रहा हो.. a sort of structured interview...और मेरे चेंबर से बाहर निकलने से पहले उसने मेरे को दूसरे विशेषज्ञ की प्रिसक्रिप्शन भी दिखाई और पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि जो इलाज चल रहा है वह बिल्कुल दुरूस्त है। 

डाक्टर मरीज के संबंध भी बड़े नाज़ुक और अजीब होते हैं, there are many layers to it...जहां तक हो सके इसे जटिल न बनाया जाए, ऐसा मैं सोचता हूं....सोचता ही नहीं हूं...इसे व्यवहार में भी लाता हूं.....मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता कि मैं किसी विशेषज्ञ को यह पाऊं कि मैं उस की बात को रिकार्ड करना चाहता हूं। 


यह वाकया मेरे साथ उस दिन पहली बार हुआ... लेिकन इस ने मुझे एक सबक सिखा दिया....मैं खुलेपन की बात तो बहुत करता हूं लेिकन मैं इतना भी नहीं खुल पाया हूं कि इस तरह के कोई पहले बता के सारा वार्तालाप रिकार्ड कर के ले जाए.... (बिना बताए चाहे वीडियो बना ले जाए.......हा हा हा हा हा हा हा ....है ना विडंबना...लेिकन जो है, सो है , मैं महानता का ढोंग भी करने से नफ़रत करता हूं!) .... यही सोचा है कि अगली बात जब कोई इस तरह से किसी वार्तालाप को रिकार्ड करने की बात करेगा तो उसे साफ़ साफ़ मना ही कर दूंगा.....मुझे यही ठीक लगता है....विशेषकर जब मरीज साथ आया नहीं है , उस का रिकार्ड दिखा नहीं रहे हो ...बस एक्स-रे दिखा कर ही मुकम्मल रिकार्डिंग कर लेना चाहते हो।

कोई बात नहीं, रिकार्डिंग तो हो गई , लेकिन ना चाहते हुए भी मैंने अपने मन में उस बंदे के बारे में एक ओपिनियन कायम कर लिया(इस काम में तो हम सब एक्सपर्ट हैं ही!!) ...अब जो है सो है! ...I can't help it!

अच्छा, अब चित्रहार की बारी है.....कोई गीत समझ में ही नहीं आ रहा.....चलिए, बचपन के िदनों का एक सुपरहिट गीत ही लगा देते हैं...अभी याद आ रहा है... बड़े दिनों बाद ध्यान में आया है.. अच्छा लगता है!

Wednesday, November 18, 2015

बॉयोलॉजिक घड़ी का भी ध्यान रखना ज़रूरी

लखनऊ में एक जेल रोड है...मेरा उधर से निकलना अकसर होता है...आगे चल कर यह वीआईपी रोड़ के साथ मिल जाती है...इस जेल रोड़ पर सुबह ६-७ बजे के बाद से ही सारा दिन यातायात की आवाजाही खूब रहती है...मैं शाम के समय विशेषकर जब इस रोड़ पर किसी को टहलते देखता हूं तो मुझे रूक कर उसे कुछ कहने की इच्छा होती है..लेिकन विभिन्न कारणों की वजह से ऐसा कर नहीं पाता हूं..बस, कुछ महीने पहले एक नवयुवक जो जॉगिंग कर रहा था इस रोड़ पर उसे मैंने रूक कर ज़रूर कहा था कि इस तरह के ट्रैफिक में इस तरह की ऐरोबिक कसरत का फायदा कम और नुकसान ज़्यादा हो सकता है..शाम के समय प्रदूषण भी खूब बढ़ जाता है। बात उस की समझ में आ गई थी, मुझे ऐसा लगा था।

इसी रोड़ पर सुबह ६-७ बजे जब लोग टहलते हैं तो कोई चिंता की बात नहीं है, उस समय वातावरण ठीक ही होता है। लेकिन शाम के समय केवल जॉगिंग करना ही नहीं, आधा-एक घंटा टहलना भी ऐसी रोड़ पर सेहत के लिए अच्छा नहीं हो सकता।

लिखते लिखते ध्यान आ गया...आज कल के जिम कल्चर के दिनों में...मैंने जो नोटिस किया है ...लोग कुछ इस तरह से सोचने लग गये हैं कि जिस समय टाइम मिले या जो स्लॉट जिम का खाली हो, उसी समय जा कर वर्क-आउट कर आएंगे...विभिन्न कारणों की वजह से महिलाओं में तो मैंने विशेष देखा है कि सुबह नाश्ते के बाद जिम या लंच से पहले जिम या दोपहर में जिम हो कर आ जाती हैं। मुझे लगता है कि यह भी बॉयोलॉजिक क्लाक की कहीं न कहीं अनदेखी है...ईश्वर ने हमारे शरीर में एक बेहद सुंदर, नैसर्गिक घड़ी फिट कर रखी है कि हर काम करने का एक टाइम लगभग फिक्स कर दिया गया है--खाने का समय, काम करने का, टहलने का, सोने का, पढ़ने का ...कुछ भी। अगर हम उस के अनुसार चलते हैं तो फायदे में रहते हैं, वरना अपने मेटाबॉलिज़्म को गड़बड़ा देते हैं।

यह जो मैंने वक्त बेवक्त जिम जाने की बात करी है, इस से यह तो ज़रूर होगा कि चर्बी पिघल जाए...ज़रूर वजन कम हो जाता होगा... (अब जब भी मैं यह शब्द "होगा"  इस्तेमाल करता हूं तो मुझे फिल्म आंखो-देखी याद आ जाती है...



बड़ी मजेदार फिल्म है, देखिएगा...मैंने तो तीन चार बार देख ली, मुझे बहुत पसंद आई) ...लेिकन जब हम लोग सुबह टहलने निकलते हैं, योगाभ्यास, प्राणायाम् करते है, कुछ भी व्यायाम आदि करते हैं....प्रकृति के सान्निध्य की वजह से ..सेहतमंद रहने की हमारी कोशिशों में चार चांद तो लग ही जाते हैं...उन से होने वाले लाभ कईं गुणा बढ़ जाते हैं....प्रदूषण ना के बराबर होता है, एक बात....दूसरी बातें, जैसे प्रातःकाल की अनुपम छटा, उदय होता सूरज, पक्षियों का चहचहाना....सब कुछ कितना आनंद देने वाला होता है...यह नैसर्गिक अनुकम्पा हमें दिन की शुरूआत अच्छे से करने में बेहद मदद करती हैं...

इसे अच्छे से पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करिए....और इस बात को गांठ बांध लीजिए
ये सब बातें आज आप से करने की इच्छा सुबह से हो रही थी...आज की टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर पढ़ी कि चिकित्सा विशेषज्ञों ने लोगों को सचेत किया है कि शाम के समय टहलना सेहत के लिए खराब है...यह बात उन्होंने विशेषकर सांस के रोगियों के लिए कही है.....आप इस खबर को नीचे दी गई तस्वीर पर क्लिक कर के अच्छे से पढ़ सकते हैं... देखिएगा... बाकी, बातें तो ऊपर आप से साझा कर ही ली हैं।

लेकिन जाते जाते मन हो रहा है कि कुछ ऐसी बातें तो ज़रूर यहां दर्ज कर ही दूं जिस के द्वारा हम लोग अपनी बॉयोलाजिक घड़ी को खराब करने में और अपनी मैटाबॉलिज्म को पटरी से उतारने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते ..
  • रात को देर से सोना, सुबह देर से उठना, नींद का पूरा न होना...
  • सुबह नाश्ता नहीं करना
  • दोपहर को खाना टाल देना, जंक-फूड से काम चला लेना ..बार बार चाय पीते रहना 
  • रात को बहुत लेट खाना और भारी खाना, और खाते ही बिस्तर पकड़ लेना
बस, इस पोस्ट के माध्यम से इतना ही संदेश पहुंचाना चाहता था कि टहलना ही काफी नहीं है, उस का समय और जिस वातावरण में टहला जा रहा है, वह भी कहीं ज़्यादा अहम् है...हां, शाम के समय ही अगर आप को समय मिलता है टहलने का तो किसी पार्क आदि में चले जाइए जहां पर हरियाली रहती है और अकसर वहां पर प्रदूषण का इतना प्रभाव नहीं रहता.....और जहां तक रात के समय खाने के बाद टहलने की बात है, उस समय तो बस बिल्कुल धीरे धीरे १०-१५ मिनट टहलकदमी ही की जा सकती है...

टहलने, घूमने, व्यायाम करने की बातें चलती हैं तो फिर जागर्ज़ पार्क फिल्म का ध्यान आ ही जाता है, क्या आपने वह फिल्म देखी है, अगर नहीं तो देखिएगा...यू-ट्यूब पर पड़ी है... 




खुरदरे मंजन कोई जादू तो नहीं कर देते ?


१९८० के दशक में जब हम लोग डेंटिस्ट्री पढ़ रहे थे तो यही सोचते थे कि खुरदरे मंजनों की समस्या इतनी व्यापक नहीं है, लेकिन नहीं...खुरदरे मंजन भयंकर क्षति पहुंचा रहे हैं।

मैंने शीर्षक में लिखा है कि खुरदुरे मंजनों का जादू....बिल्कुल ठीक लग रहा है मुझे यह लिखना...क्योंकि जब हम लोग किसी के ऐसे दांत देख कर उस को खुरदुरे चालू किस्म के मंजन त्यागने के लिए कहते हैं तो कुछ लोग हमारी बात मानने की बजाए उसी मंजन की तारीफ़ें करनी शुरू कर देते हैं...यही कहते हैं कि पहले तो समस्याएं बहुत थीं दांतों और मसूड़ों की ..लेकिन जब से फलां फलां मंजन रगड़ना शुरू किया है, आराम मिल गया....और यह भी कहते हैं कि दांतों के घिस जाने से भी उन्हें पहले तो कोई दिक्कत नहीं थी अब ही यह सूजन-दर्द हो गया है।

चलिए अपनी बात को एक मरीज़ का उदाहरण लेकर समझाने की कोशिश करते हैं...जिस बंदे की आप यह तस्वीर देख रहे हैं ये मेरे पास आज आए थे...दांतों की बरबादी और साथ में सूजन तो आप देख ही रहे हैं। इस बंदे ने बताया कि वह वही पेस्ट-मंजन इस्तेमाल करता है ...जो देश में बहुत प्रचलित है...यह पिछले बीस-तीस वर्ष से उसे ही कर रहे हैं...(मंजन-पेस्ट का नाम लिखना नहीं चाहता, चाहता तो हूं.....लेकिन हिम्मत नहीं है, कहीं कोई कंपनी वाला मुझे मरवा ही न दे!!..कुछ भी हो सकता है....मैं समझता हूं इस बात को .....हा हा हा हा हा ह ाहाहा हा हा ..)

 खुरदरे मंजन किस तरह से दांतों को नष्ट कर देते हैं...आज जो मरीज मेरे पास आया उस के दांत
(ऊपर वाली पोस्ट भी इसी मरीज़ की ही है, फ्लेश के साथ) 
इस तरह के मुंह की तस्वीर हमें दिन में कईं बार देखने को मिलती है....हर रोज़ बार बार ऐसे मरीज़ों को समझाना-बुझाना पड़ता है कि इस तरह के खुरदरे पेस्ट-मंजन में गेरू मिट्टी भी मिली रहती है..कुछ में तंबाकू भी मिला रहता है...इन के मुंह के अंदर ब्रुश से इस्तेमाल करने से या अंगुली से घिसने से दांत घिसने शुरू हो जाते हैं....थोड़ा थोड़ा ठंडा गर्म लगने लगता है...लेिकन फिर भी लोग इसे इस्तेमाल करना नहीं छोड़ते ....लगे रहते हैं...नतीजा यही होता है जो इस मरीज में हुआ ...दांत इतना घिस जाता है कि उस की नस नंगी हो जाती है...और फिर उस की जड़ के नीचे फोड़ा (abscess) बन जाता है... अब ऐसा नहीं है कि इस तरह की तकलीफ कोई जानलेवा तकलीफ़ है, नहीं, ऐसा नहीं है।

इस फोड़े की वजह से मुंह के अंदर और बाहर की सूजन तो दो चार दिन में दवाईयां लेने से ठीक हो जाती है...अस्थायी रूप से ही लेकिन ......स्थायी उपचार के लिए इन दांतों की आरसीटी (रूट-क्नॉल ट्रीटमेंट) करवाना पड़ता है... और फिर उन के ऊपर कैप लगवाने होते हैं....यानि इन का इलाज खूब झँझट वाला काम ...मरीज के लिए इसलिए कि उसे खूब खर्च करना पड़ता है ...बार बार डेंटिस्ट के यहां जा कर चक्कर लगाने का झंझट....सरकारी अस्पतलालों में अकसर इस तरह के कैप आदि की सुविधाएं होती नहीं .... बहुत से मरीज़ बाहर से करवाना नहीं चाहते, करवा नहीं पाते ....कुछ भी समझ लीजिए...

मैं कईं बार जब इस तरह के खुरदरे मंजनों और पेस्टों का त्याग करने की सलाह देता हूं और इस की जगह बढ़िया गुणवत्ता वाली कोई भी पेस्ट आदि का इस्तेमाल करने के लिए कहता हूं कि मुझे कईं बार लगता है कि मरीज सोच रहा है कि मैं किसी ऐसी ही टुथपेस्ट कंपनी के उत्पाद प्रोमोट करना चाह रहा हूं.......नहीं, ऐसी बात बिल्कुल नहीं है, न ही मेरे से यह धंधा हो पाएगा और ईश्वर की कृपा से मुझे न ही इस की ज़रूरत है...इन कंपनियों से कभी कोई तोहफ़ा, हवाई-यात्रा या किसी तरह के चारे की न तो कभी पेशकश हुई और न ही मेरे से यह हो पाता...अब ध्यान आ रहा है कि हम जैसे लिखने वालों को कौन चारा डालेगा!.....अभी ध्यान आया कि कुछ साल पहले इन पेस्टों के ऊपर कुछ लिखा था...अब मुझे ठीक से याद नहीं है कि क्या लिखा था, यहां पर लिंक लगा दूंगा....कईं बार कह चुका हूं कि हलवाई अपनी मिठाई नहीं खाता, मैं भी अपने लेख वापिस पढ़ने से गुरेज करता हूं....मुझे अजीब सा लगता है !

बात ज़्यादा लंबी खिंच रही है...इसलिए यहां विराम लगाता हूं...बस इसी बात के साथ कि कभी भी किसी भी चालू कंपनी के देसी मंजनों वंजनों पेस्टों के चक्कर में पड़ें नहीं.... मुझे इन में उपलब्ध दालचीनी, लौंग, काली मिर्च...और भी पता नहीं कितनी कितनी सुंदर चीज़ें जिन के बारे में आप पैकिंग के ऊपर पढ़ते हैं, बढ़िया चीज़ें हैं, लेिकन यह जो लाल मिट्टी (गेरू मिट्टी) और तंबाकू जैसे हानिकारक तत्व हैं, ये सब गुड़-गोबर कर देते हैं....दांतों को इन का खुरदुरापन बर्बाद कर देता है। इसलिए इन से दूरी बना कर रखिए... मैं भी एक अच्छी कंपनी की पेस्ट खरीद कर ही करता हूं...हमें कोई सेंपल वेंपल भी नहीं आते...न ही मैं इन की तरफ़ ध्यान करता हूं।

गूगल-प्ललस से मुझे पता चलता रहता है कि इस ब्लॉग के पाठक दो लाख से ऊपर हैं.....तो क्या मैं यह अनुरोध कर सकता हूं कि मुझे कोई उपाय सुझाएं कि मैं इस तरह की काम की बातें छोटी छोटी किताबों में लिख कर आठ-दस-पंद्रह रूपये में प्रकाशित करवा के बिकवा सकूं.....नहीं, फ्री में मैं बांटना नहीं चाहता हूं, उस की कोई कद्र नहीं होती, दस-पंद्रह रूपये खर्च कर खरीदी हुई किसी पुस्तक को हम सहेज कर रखते हैं...उसे कभी कभी देखने की तमन्ना भी रहती है।

अपने मुंह मिट्ठू बनना सीखा नहीं है, बिल्कुल बेकार सी बात लगती है, लेिकन सच तो सच है ही ....और यह सच यह है कि यह जो मैंने इस लेख में लिखा है ...इसे इतनी मजबूती से लिखने के पीछे मेरी ३५ साल की तपस्या शामिल है....बात को मानना या ना मानना आप का अधिकार-क्षेत्र है, जिस तरह से इस तरह के विषयों पर लिखना मेरा अधिकार है...या फ़र्ज़ है....फर्ज़ शब्द ज़्यादा अच्छा लग रहा है यहां।

इसीलिए कह रहा हूं कि अगर सस्ते कागज पर सस्ती सस्ती किताबें छपवाने के बारे में कुछ जानते हैं तो मुझे बतलाइएगा ....मैं अपना ईमेल भी यहां दे रहा हूं...          drparveenchopra@gmail.com     क्योंकि मैं कम से कम २०-२५ इस तरह की किताबें छपवाने के ख्याली पुलाव बरसों से बना रहा हूं...मुझे बड़े बड़े प्रकाशकों से किताबें छपवा कर उन्हें चार पांच सौ रूपये में बिकवाने में कोई रूचि नहीं है, पांच सौ हज़ार कापियां बेच कर....कोई बड़ा सा ईनाम लेने का भी कोई इरादा नहीं है ..(फिल्म उसे वापिस करने का भी झंझट....) ...मुझे तो खुशी इसी बात से होगी कि जब एक आम आदमी सड़क से गुजरता हुआ किसी फुटपाथ से पानमसाले-गुटखे की बजाए पांच-दस रूपये में ऐसी पुस्तक खरीदेगा, उस में कही बात को लेकर उस का मन उद्वेलित होगा....वह इन सब बातों को याद रखेगा....चाहे बिल्कुल थोड़ा थोड़ा..., मुझे अपना नाम याद करवाने की भी चाह बिल्कुल नहीं है...

किताबों की दुकानें खंगाल मारी हैं, इन विषयों पर आम आदमी की भाषा में उस के ही स्तर पर उतर कर उतनी सहजता से बात करने वाली किताबें छपती ही नहीं!.........शायद इस मार्कीट ही नहीं है, इसलिए!

अच्छा, बातें हुईं फुटपाथ की, आम आदमी की, पांच दस रूपये में बिकने वाली किताबों की ......तो फिर आज के चित्रहार का गीत भी कोई फुटपाथ छाप ही हो जाए.....बेहतरीन बोल, बेहतरीन संगीत...बेहतरीन अदाकारी ...जितेन्द्र और रीनाराय की ......न जाने हम सड़क के लोगों से ये महलों वाले क्यों जलते हैं!


Jane Ham Sadak Ke Logon Se-Aasha (1980) by MrBilal2009



Friday, November 13, 2015

जिस का काम उसी को साजे...

मुझे यह कहावत अच्छी लगती है...जीवन का सार इस में जैसे भर दिया गया हो।

आज जब मैं बाग में टहलने जाने लगा तो देखा कि वहां पर पतंजलि योग शिक्षा की तरफ़ से जो कक्षा लगाई जाती है, वह बंद होने का समय था. शिक्षक महोदय एक अधेड़ उम्र की महिला को बड़ी आत्मीयता से कह रहे थे कि आप कल भी आईएगा....अच्छा लगा मुझे यह सुन कर...महिला उन्हें आगे से कुछ कह तो रही थीं कि ये (पति) और बिटिया तो लंबी तान कर सोये रहते हैं..। आचार्य जी फिर आगे से कुछ कह तो रहे थे..."यहां पर तो आने से ही ..."...आगे वाली बात मेरे कानों में नहीं पड़ी...मैं आगे बढ़ चुका था।

सुबह टहलते हुए मैं बाबा रामदेव के बारे में ही सोचता रहा...मैं यही सोचता रहा कि बाबा की लोकप्रियता के किस दौर के हम गवाह रह चुके हैं...सुबह सुबह उठ कर लोग पांच बजे बाबा के साथ योग करने लग जाते ...लेकिन मुझे मेरे आलस्य ने ही घेरे रखा ...मैं नहीं कर सका....कुछ कुछ बातें खाने पीने की अच्छे से उनकी मानने लग गया।

बाबा अच्छा इंसान है.....सारे विश्व में योग का डंका बजा दिया....लोगों को सुबह सुबह उठने पर मजबूर कर दिया...आंवला जूस, आंवला कैंडी....बहुत कुछ खिला-पिला दिया....धन्यवाद. मुझे याद आता है शायद १५ साल से पहले के वे दिन जब लोग दोनों हाथों के नाखुन आपस में रगड़ने लगे थे ताकि सिर के बाल काले रह पाएं....

बाबा ने निःसंदेह बढ़िया काम किया है ....ऐसे ही तो कोई किसी प्रांत का ब्रांड अम्बेसेडर नहीं बन जाता...लेकिन मुझे लगता है कि हम लोगों को इस बात से सबक लेना चाहिए कि जिस का जो काम हो उसे वही करना चाहिए, उसे उसी पर केंद्रित रहना चाहिए...हम दूसरे काम में घुसने की कोशिश करते हैं तो शायद यह मुनासिब नहीं होता।

होता यह था कि सुबह सुबह रोज़ाना पांच बजे लोगों को योग की खुराक के साथ बाबा की काले धन से जुड़ी मन लुभावन बातें, किस्से, घोषणाएं सुनने की भी लत लग चुकी थी...मुझे ऐसा लगता है....बढ़िया चल रहे प्राणायाम के बीचों बीच काले धन के अरबों के आंकड़े सुन कर एक आम हिंदोस्तानी का दिल फिर से तेज़ गति से धड़कने लगता था...लेिकन इसे यह सब सुनने में मज़ा आने लगा था..उन्हें योग के साथ मसाला चाय जितना मज़ा ये मसालेदार, चुटीली बातें भी देने लगीं....वे एक फेंटेसी में जीन लगे जैसे कि कालाधन विदेशी बैंकों से निकल कर सीधे उन के बचत खाते में आ जाएगा... हां, वह बड़ा करेंसी नोट बंद किए जाने की बात मुझे बहुत अच्छी लगती थी, लेकिन क्या कुछ हुआ!

व्यक्तिगत तौर पर यह हमेशा से यही लगता था कि इतनी सुंदर योग की कक्षा में अचानक यह भ्रष्टाचार, काले धन आदि की बातें! ...बाबा रामदेव ऐसा करते थे तो कोई औचित्य भी होगा इस में, मेरी समझ में नहीं आया...मैं दुनियादारी सीख ही नहीं पाया ...मेरे एक प्रोफैसर ने भी मुझे एक बार यही कहा था प्रवीण, worldly-wise होना भी जरूरी है!

बस, यही राजनीति की बातें ही बाबा की योग की बढ़िया चल रही कक्षाओं में अजीब सी लगने लगी...फिर वह रामलीला वाला किस्सा हो गया.....और बस, फिर तो जो हुआ सब जानते हैं। बाबा को किन परिस्थितियों में आत्म-रक्षा के लिए कैसे वहां से जाना पड़ा, उसके बारे में चर्चा नहीं करते, लेकिन इस बात ने बाबा की छवि को बहुत हानि पहुंचाई....आप का क्या ख्याल है?... और एक बात, एक बार बाबा की कपिल सिब्बल आदि मंत्रियों के साथ मीटिंग के बाद भी कुछ लफड़ा हुआ था...

सीधी सीधी बात कि राजनीति करना हरेक की बस की बात नहीं है...मैं जब कभी चुनावी दंगल में लोगों को भाषण करते देखता हूं तो अकसर हंस देता हूं और आसपास बैठे बंदों से शेयर करता हूं कि क्या ऐसा हम लोग कर सकते हैं......मेरे तो सिर ही डेढ़ मिनट में ही दुःखने लग जाए, और मैं कह दूं वहीं ...ठीक है, यार, तुम जीते मैं हारा!

ईश्वर ने संसार में हर बंदे को एक विशेष काम के लिए भेजा हुआ है...कोई बातें बढ़िया करता है, कोई प्रवचन, कोई किस्सागोई अच्छी करता है, कोई रंगकर्मी बढ़िया है तो कोई पेन्टर उमदा, कोई गाने लिखता है, कोई गाता अच्छा है, कोई खाना अच्छा बनाता है.....आदि आदि ..लेकिन हम मिक्स-अप नहीं कर सकते....

बस, यही था आज का विचार...आज सुबह टहलते हुए लखनऊ एफएम सुन रहा था ..जमशेद प्रोग्राम पेश कर रहे थे ...बीच बीच में गाने भी बजा रहे थे ...अजीब अजीब से गाने....सिग्नल ..प्यार का सिग्नल ...प्यार का सिग्नल....यह भी कोई गीत हुआ...गीत तो जो बढ़िया बनने थे...लिखे जाने थे और गाये जाने थे वे गाये जा चुके हैं...



 जाते जाते एक बात का ध्यान आ गया...योग और राजनीति का अगर संबंध नहीं है तो आध्यात्म और राजनीति का भी नहीं है, लोग अपनी समझ के साथ कभी कभी इन्हें भी मिलाने की कोशिश कर लेते हैं....भोली भाली जनता समझ नहीं पाती...लेकिन यह बात बिल्कुल गलत है....चुनाव दंगल के दिनों में बहुत बार कुछ प्रत्याशी या उन के परिजन विभिन्न् सत्संगों में जाकर भक्तों का आशीर्वाद लेने पहुंच जाते हैं....और बड़े सूक्ष्म ढंग से भक्तों तक संदेश पहुंचा दिया जाता है.....मुझे यह बिल्कुल अजीब लगता है ..जो भक्त वैसे ही अपने को चरण-धूल समझते हैं, उन के सीधेपन या vulnerability कहूं, इस का भी फायदा लिया जाता है या लेने की कोशिश तो की ही जाती है....बस, यह लिखने की इच्छा हुई सो लिख दिया.....जैसे पेप्सी पीने वाला वह युवक आज कल कह रहा है दिन में बीसियों बार.......पैप्सी थी यार, पी गया.............मैंने भी जो देखा, जो फील किया....ब्यां कर दिया!

हां, वापिस बाबा रामदेव पर लौटते हैं.....मुझे बाबा के बनाए मंजन और पेस्ट पर आपत्ति है....उस के साथ सब ठीक नहीं है ..इस के बारे में जानने के िलए आप को मेरी यह ब्लॉग पोस्ट देखनी होगी.......आज बाबा रामदेव की बात करते हैं..

अच्छा, यार, बाकी फिर कभी ...ड्यूटी पे पहुंचने का समय हो गया है...




Wednesday, November 11, 2015

फूलों की भी अच्छी आफ़त हो जाती है

एक दिन नहीं, दो दिन नहीं...हमेशा ही ...कोई भी मौका हो...खुशी, गमी, कोई धार्मिक, सामाजिक या आध्यात्मिक पर्व..हर जगह खूब फूल इस्तेमाल हुए होते हैं। मुझे यह देख कर अजीब सा लगता है..

फूल की जगह ही पेड़ पर है, रंग बिरंगे फूल पत्ते आने जाने वाले के मन को खुश कर देते हैं...करते हैं ना?...फिर इन्हें तोड़ने से क्या हासिल...

मैं अकसर सत्संग में एक भजन सुनता हूं जिस के शुरूआती बोल कुछ इस तरह से हैं....

क्या भेंट करूं तुम्हें भगवन..
हर चीज़ तुम्हारी है!

किसी का स्वागत समारोह हो, श्रद्धांजलि हो....कुछ भी कभी भी ....बस, ढ़ेरों फूल तो चाहिए ही होते हैं...कुछ लोग खरीद लेते हैं, वरना लोग इधर उधर से तोड़ कर काम चला लेते हैं...कभी इन लोगों ने ध्यान ही नहीं किया कि रंग बिरंगे चमकदार फूल आने जाने वालों को कितना सुकून देते हैं, किस तरह से उन की उदासी को भगा देते हैं..लेिकन इतना सोचने की फुर्सत ही किसे है..


शायद ये मेरे व्यक्तिगत विचार हों लेकिन जिस जगह पर जिस किसी पर्व पर फूलों की बरबादी होते देखता हूं, मुझे बड़ा खराब लगता है, उधर मन टिकता ही नहीं। आज भी दोपहर में देखा कि जगह जगह पर बच्चे इक्ट्ठे हो कर फूल-पत्ते धड़ाधड़ तोड़े जा रहे थे....

फूलों के जीवन-चक्र के बारे में भी सोचते हैं तो बड़ी प्रेरणा मिलती है....इतनी सहनशीलता, इतना परोपकार....हर तरफ़ खुशियां ही बिखेरनी हैं...कांटों से घिरे होते हुए भी...

एक शेयर का ध्यान आ रहा है, कुछ दिन पहले मैंने अपनी नोटबुक में लिखा था...मुझे इसे बार बार पढ़ना बहुत भाता है...

 "गुंचे तेरे अंजाम पे जी हिलता है
बस एक तबस्सुम के लिए खिलता है
गुंचे ने कहा कि इस जहां में बाबा 
ये एक तबस्सुम भी किसे मिलता है?"
--जोश मलीहाबादी 

मुझे हिंदी की कविता समझने में बड़ी दिक्कत है...बिल्कुल समझ ही नहीं आती...१०-१२ साल कोशिश की कि हिंदी या पंजाबी में कविता कह भी पाऊं...लेकिन बिल्कुल ज़ीरो.....अब समझ में आ गया कि यह मेरे से नहीं हो पायेगा...यहां बहुत से कवि सम्मेलनों में भी गया...लेकिन कुछ पल्ले नहीं पड़ा बल्कि सिर दुखा के वापिस लौट आया...लेकिन अपने स्कूल के गुरू जी की पढ़ाई वह कविता अभी भी अच्छे से याद है.... माखनलाल चतुर्वेदी जी की वह सुंदर कविता है ...

चाह नहीं, मैं सुरबाला के 
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध

प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर

हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक!
जिस प्यार से स्कूल के गुरू जी ने इस के शब्दार्थ एवं भावार्थ समझाए थे...वे दिल में उतर कर रह गये...

चलते चलते सोच रहा हूं कि अपने बड़े भाई का पसंदीदा गीत ही लगा दूं....उन्होंने यह अपने कालेज के दिनों में एक फेयरवेल में गाया था...यह बात १९७२-७३ के आस पास की है...