बुधवार, 20 मई 2026

जब जूतों की लाइफ बढ़ाने के भी जुगाड़ थे .....



पिछले दो-तीन दिन से मैं एक चीज़ का नाम न ढूंढ पाने के लिए बहुत परेशान था…चीज़ का अच्छे से ख़्याल था..लेकिन नाम ही याद न आए तो क्या करता। सोचा, कि कौन मेरी मदद कर सकता है ….बड़ी बहन का ख्याल आया कि उस से पूछूं…फिर जैसे कुलकर्णी ,वाघमारे को नीट के अपने सवालों पर यकीन था, मुझे भी इस बात का यकीन था कि और कोई मेरी इसमें मदद नहीं कर सकता..पंजाब मेें रह रहा एक नामचीन डाक्टर मेरे कॉलेज का साथी ज़रूर मुझे इस मुश्किल से निकाल लेगा….

वही हुआ …जब मैंने हार मान ली ….तो मैंने अपने कॉलेज के उस साथी को फोन लगाया….वह बहुत बिज़ी रहता है….प्रोफैश्नल कामों ही में नहीं, आध्यात्मिक और सामाजिक कामों में भी बहुत सक्रिय है …ऐसे साथी वे लोग होते हैं जिन्हें जब भी फोन करो, कोई राम-दुआ नहीं, जो बात करनी है, बात करो और फोन रख दो, कोई भूमिका बांधने की ज़रूरत नहीं ….


फोन की घंटी गई …चुप हो गई…


इन साथियों से कैसे हार मान लें….कॉल-बॉक का इंतज़ार तो बेगाने करते हैं, जो झिझकते हैं…कुछ आधे घंटे बाद फिर फोन किया तो उसने उठा लिया….


हां, यार, कुछ पूछने के लिए फोन किया है, तुम बिज़ी हो इस वक्त…बस, वही बात करूंगा…मैंने कहा। 


हां, हां, बता, उसने कहा …


यार, दो चार दिनों से एक चीज़ का नाम याद नहीं आ रहा ….यार, जो हमारे ज़माने में लोग शूज़ के नीचे वे लोहे के मोटे मोटे से जुगाड़ फिक्स करवा लेते थे, उन का नाम याद नहीं आ रहा ….


खुरियां, खुरियां, यार …..अगले ही पल उस ने खुल कर हंसते हंसते जवाब दिया…

मुझे इतनी राहत महसूस हुई…


मैंने झिझकते 2 उसे कहा कि यार डोंट माईंड (वैसे यह कहने की कोई ज़रुरत भी न थी)...खामखां कईं बार हम लोग फार्मेलिटी में पड़ जाते हैं…हां, यार, जहां तक मुझे याद है जब तुम कॉलेज में आए तो तुम जो ब्रॉउन सोल के शू़ज़ पहनते थे, उस के नीचे भी ये खुरियां (खुरियां- बहुवचन है…पंजाब का लफ़्ज़ है ..खुरी) लगी होती थीं …


हां, हां, प्रवीण, तुझे बिल्कुल सही याद है….उसने हंसते हंसते कहा और साथ में याद दिलाया कि अपने प्रोफैसर साहब डा बी के भी तो अपने जूतों पर ये खुरियां लगवाते थे …..फिर हम दोनों ने  अगले एक दो मिनट ठेठ पंजाबी में बात की और जाहिलों की तरह हंसते रहे …..उसने यह भी याद किया कि वह अमृतसर के बस-अड्डे के सामने किसी मोची से अपने मेचे (अपने नाप के) शूज़ बनवाता था …और फिर उन शूज़ के नीचे खुरियां फलां फलां जगह से लगवा लेता था….


चलिए, मुझे राहत मिली ..कि कम से कम उस चीज़ का नाम पंजाबी ही में सही याद तो आ गया…..हिंदी या हिंदोस्तानी में उसे क्या कहते हैं वह तो मैं ढूंढ ही लूंगा…


लेकिन हिंदी में क्या कहते हैं, पता कर लूंगा …लेकिन ओव्हर-कांफिडेंस काम न आया….रास्ते में चलते चलते एक मोची भाई की शरण में जाना पड़ा। पचास के करीब होगा वह बंदा..मैंने पूछा कि बहुत साल पहले जूतों के नीचे जो लोहे की खुरियां सी लगाते थे …वे हैं क्या?....सोचा यही था कि अगर होंगी तो दो चार ले लूंगा…। 

अच्छा, आप नाल की बात कर रहे हैं, वे तो 10 बरसों से बंद हो चुकी हैं…उसने बताया….

मुझे झटका सा लगा कि बड़े से बड़े, कड़े नियम कानून आने पर भी गुटखा तो बंद नहीं हुआ, इस को बंद करने वाला तो कोई कानून मेरी नज़र से गुज़रा भी नहीं ….

मैंने कहा कि नाल तो घोड़े के पैरों के नीचे लगती है….


उसने कहा कि जिस चीज़ की आप बात कर रहे हैं उसे भी नाल ही कहते हैं….

जब घोड़े ही नहीं रहे तो नाल कहां से मिलेंगी….पास बैठी उस की 80-85 साल की मां ने भी इस चर्चा में अपना हिस्सा डाल दिया ….वह ज़रूर तांगे याद कर रही होगी जो घोड़े चलाते थे….


खैर, मैं आश्वस्त हो गया….कि हां, उस खुरी को ही नाल कहते हैं …मैंने गूगल से भी जब पूछा तो उसी नाल के आकार के जुगाड़ दिखे …अलबत्ता वे लोहे के नहीं, किसी प्लास्टिक-वास्टिक के थे….


घोड़े की नाल से याद आया….बहुत अंधविश्वास है हमारे यहां कि घोड़े की नाल घर के बाहर दरवाज़े पर फिक्स करना बहुत शुभ होता है …यह बात मैंने पंजाब में नहीं सुनी थी कभी …यही बंबई में ही पहली बार यह सुना और देखा….। और तो और, जैसे इतना ही अंधविश्वास काफी न हो, उस से ऊपर यह वाली बात कि अगर भागते हुए घोड़े के पैर की नाल कहीं मिल जाए और उसे घर के दरवाज़े पर लगा लें तो बहुत ज़्यादा लाभदायक होती है …….सब बेकार की बातें हैं….अगर ये बातें मानना शुरु करें तो यह भी पता करना होगा कि अंबानी, अडानी को घोड़ों की ऐसी कितनी नालें मिलीं…पिछले पचास बरसों में….मुझे तो जिस प्रक्रिया में घोड़े के पांव के नीचे ये नाल फिक्स की जाती है, वह देख कर ही बहुत दुःख होता है ….


अभी लिखते लिखते यह लग रहा है कि घोड़े के पैर के नीचे तो ये नाल इसलिए फिक्स की जाती होगी ताकि उस के पैरों पर आंच न आए…लेकिन 50 बरस पहले जो नाल या पंजाबी में कहें तो खुरी ….हम लोग शूज़ के नीचे एड़ी (हील) पर लगवा लेते थे उस का तो एक ही मक़सद होता था कि एड़ी कम घिसे …..

लेकिन यह क्या …एक बात तो मैं लिखनी भूल गया …जब कल उस कॉलेज के दोस्त से बात हुई तो उसने इतना भी कहा कि यार, उसे लगवाने से बंद की टोर (रुआब, डैश) बढ़ जाती थी ….मैंने भी कहा …हां, हां, हां…..उस की आवाज़ ही ऐसी आती थी चलने में ….

जहां तक टोर, रुआब, डैश की बात है वह यह है कि ऐसे शूज़ पहन कर बंदा अपने आप में खामखां बड़ा स्ट्रॉंग सा फील करने लगता था ….जहां कभी भी जाए ..ठक, ठक, ठक …..पैंचो दूसरे भी परेशान और खुद भी परेशान…ऐसे लगता था कि जैसे कोई सिर पर चोट कर रहा है ….

मुझे इतना कैसे पता है इस ठक ठक …ठक ठक….

क्योंकि मुझे याद है कि देखा-देखी मुझे भी एक बार शूज़ के नीचे ये खुरियां लगवाने का शौक चढ़ा था…मैंने भी किसी मोची भाई से लगवा भी ली थीं दो तीन खुरियां दोनों एडियों पर ….लेकिन एक दो दिन में मैं तो भाई परेशान हो गया और निकलवा के बाहर की थीं….। 


जी हां, फैशन भी होगा ….शूज़ से ठक-ठक की आवाज़ आना, चलते हुए शूज़ से चूं-चूं की आवाज़ निकलना (उतनी नहीं जितनी छोटे बच्चों के शूज़ से निकलती है…किसी स्टेशन-अड़्डे पर वह सुन कर तो मज़ा आ जाता है, रौनक लग जाती है…हंसी आ जाती है…दो दिन पहले ही मुंबई सेंट्रल के स्टेशन पर मैं लोकल ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था कि ऐसा ही एक बच्चा टहल रहा था …पांच सात मिनट बाद गाड़ी आई….गाड़ी में चलते चलते मैंने उस बच्चे के अब्बे को कह ही दिया….इस बच्चे के शूज़ की वजह से इंतज़ार के पल बहुत जल्दी खत्म हो गए….वह मुस्कुरा दिया…..) ….मैं अनजान लोगों से बतियाने की अपनी पुरानी आदत से मजबूर…..))....और ऊपर से उस दौर के खुले खुले बैलबाटम, लंबे लंबे बाल ….और कुत्ते कालर वाली लंबी लंबी कमीज़ें…..इस का रिजल्ट यही देखने में मिलता कि बंदा खुद को चाहे जितना मर्ज़ी हिप्पी या मॉड समझ ले …छोटा मोटा विलेन लगने लगता था ….जिसे हम रुआब, डैशिंग ….या मर्दाना लुक्स (मेस्कुलीन लुक).....। 


मैंने लिखा है कि उस दौर में इस तरह से जुगाड़ इसलिए किए जाते थे कि एड़ी कम से कम घिसे क्योंकि एड़ी घिसने के बाद जूता बेकार हो जाता था ….और हां, एडी़ भी उन दिनों यही चमड़े जैसे किसी मेटिरियल की ही होती थी या कोई नरम सा और कोई मेटिरियल होता था …इस नाल के लगने से उस जूते की उम्र बढ़ जाती थी ….


अब क्या लगवाएं लोग ये खुरियां या नालें…..कईं घरों के बाहर इतने जूते पड़े होते हैं …हर मौके के लिए टहलने वाले, दौड़ने वाले, स्कूल कालेज दफ्तर वाले, पार्टी वाले ….फॉर्मल टाइप ….इस के अलावा दो चार ऐसे जो दिल के बहुत करीब लगे, इसलिए खरीद लिए, ऑन-लाईन सेल में 50 फीसदी छूट पर बिक रहे थे …..लेकिन इस सब चक्कर में इतने जूते दिखते हैं घरों के बाहर जितने पुराने ज़माने में किसी घर में धार्मिक आयोजन…..सत्यनारायण कथा, महिला कीर्तन, लेडीज़ संगीत या सत्संग के वक्त भी नहीं मिलते थे….और इनमें कितने तो खराब होने के लिए, फटने के लिए ही रखे होते हैं जैसे ….पड़े पड़े अपनी तकदीर कोसते होंगे कि उन की किस्मत में दुनिया देखना जैसे लिखा ही न हो ….जैसे अलमारी में बंद किताबें तकती रहती हैं कि कब कोई उन को खोल कर उन के पन्ने उलटे ….पलटे….उन को भी कुछ हवा लगे।


अब तो शूज़ घिसने से पहले ही नए आ जाते हैं …घिसने की नौबत ही कहां आने देते हैं….एक बात याद होगी मेरी उम्र के लोगों को कि घरों में इतने ही जूते-चप्पले होती थीं कि कौन सी चपप्ल मां की है, कौन सी बहन की ….सब कुछ सब को पता रहता था …अब तो आए दिन ऑन-लाईन के डिब्बे आते हैं नए नए शूज़ के …कईं कईं दिन बंद ही रहते हैं….फिर कुछ दिन बाद खुलते हैं…अगर तंग हों या पसंद न आए तो लौटा दिए जाते हैं…पहले घर में शूज़ अगर कोई आता तो सारे घर को ख़बर होती ….अगले एक दिन दिन यही मुद्दा डिस्कस होता कि तंग तो नहीं है, है तो बदल ले…..कईं बार झिझक की वजह से तंग जूते न बदले जाते तो वे अगले एक-दो साल तक नाक में दम कर देते …छाले, चलने में दिक्कत…..और इंसान अपनी दूसरी तकलीफ़े भूल जाता क्योंकि सारा ध्यान उन की तरफ़ ही रहता…..


एक कहावत भी तो चली थी पिछले दिनों कि अगर आप अपनी सारी तकलीफ़े भूल जाना चाहते हैं तो आप एक तंग जूता खरीद लीजिए…..इस पर मैंने एक बात और जोड़ दी थी कि अगर और भी अच्छे से भूलना चाहते हैं ..सभी ग़मों को …तो एक बहुत तंग कच्छा (अंडरवियर) भी लगे हाथों खरीद लीजिए….। 


पहले हम चीज़ों की बहुत कद्र करते थे ….जूते के नीचे नालें लगवाना ही नहीं, आज से पचास साठ बरस पहले हम लोग जूतों के सोल भी बदलवा लेते थे जिस से नए जूते खरीदने से बच जाते थे और यह काम पांच छः रूपए में हो जाता था ..मैं पांचवी छठी क्लास में था, मेरे पिता जी एक बार मेरे सैंडल सोल बदलवाने के लिए ले गए….दो तीन दिन की वेटिंग लिस्ट हुआ करती थी …मैं रोज़ उन के आने की इंतज़ार करता कि आज तो मेरे सैंडल वापिस आ ही जाएंगे…..जब चार पांच दिन बाद वे नये सोल के साथ मुझे मिले तो मैं इतना खुश हुआ …कि ये तो नए हो गए हैं…..। 


एक खुशी और याद आ रही है ..कालेज में था ….नया नया….मेरी बडी़ बहन लेक्चरार लगी थी ….10 साल बड़ी हैं…एक बार मुझे अपने साथ बाज़ार ले गईं ….तो ज़िद्द करने लगी कि एक स्पोर्ट्स् शूज़ ले लो ….तुम्हारे पास नहीं हैं….मेरा भी मन तो था..लेकिन बहन से लेना नहीं चाहता था …पर उस की ज़िद्द के सामने मेरी न चली और उन्होंने मुझे अमृतसर की एक दुकान से 125 रूपए के नार्थ-स्टॉर के शूज़ ग्रे कलर के दिला दिए….वाह, क्या शूज़ थे, इतने आरामदायक ….पहली बार मैंने ऐसे शूज़ पहने थे …चमड़े के ही पहनते थे …बस, उन शूज़ को पहन कर मुझे इतना मज़ा आया कि अगले तीन चार साल तक जब तक वे फट नहीं गए, मैंने उन का साथ नहीं छोड़ा …..यह 1978-1979 की बातें हैं ….लेकिन आज भी जब मैं यह बात उस से करता हूं तो हम दोनों भावुक हो जाते हैं….अब पंद्रह-बीस हज़ार के भी शूज़ खरीदते हैं, कुछ दिन पहनते हैं और फिर रख देते हैं ….लेकिन वे 125 रुपए वाले नार्थ-स्टॉर वाले शूज़ बहुत ही ज़्यााद स्पैशल थे …और अभी तक हैं……..


पता है क्यों थे वे इतने स्पैशल ?.....क्योंकि मुझे उस वक्त उस दौर में उन की बहुत ज़रूरत थी ….।


लिखना तो अभी भी बाकी है ..लेकिन ब्लॉगिंग का यही इशू  है जैसे ही लिखते लिखते थोड़ा सी भी बोरियत महसूस होती है, फ़ौरन बंद करने की चाह होती है …हो गया आज के लिए…..बस, बार बार इन नालों वाले शूज़ का ख्याल आते ही उस दौर के खूंखार विलेन भी याद आते हैं (जो ऐसे शूज़ पहनते थे जिन से ठक-ठक की आवाज़ आती है) और उस दौर के सुपर-डुपर हिप्पी गीत भी …..जो 50 सालों के बाद भी दिल के उतने ही करीब हैं …..


अगर आप के पास भी इन नालों, इन खुरियों की कोई याद है तो लिखिएगा….कमैंट में नहीं लिखना चाहते तो ईमेल करिए मुझे …या मुझे वाट्सएप करिए….मैं एक बात भूल रहा हूं कि खुरियों के बारे में तो मैंने लिख दिया …लेकिन एक चलन और भी था, मोटे मोटे लोहे के कील ए़डी पर लगवा लेने का…..मकसद वही, दोस्तो, जूते कम घिसे ….बस, वही राष्ट्रीय मुद्दा था उन दिनों ……मैंने भी एक बार लगवाए थे लेकिन उन से भी दो दिन बाद ही निजात पा ली थी ….

 

चलिए, आज मेरे उस दौर की वजह से यह पोस्ट लिखी गई…ये पुरानी बातें पुराने लोग न लिखेंगे तो कौन लिखेगा….यह पोस्ट उसी दोस्त को समर्पित है ….अगर उस से यह खुरी लफ्ज़ का पता ही न चलता तो मैं कैसे यह लिख पाता …..हां, एक बार इस पंजाबी लफ़्ज़ याद आ गया तो फिर मेरे शब्दकोष ने भी उस दोस्त और उस मोची भाई की बात पर पक्की मुहर लगा दी…यह शब्दकोष बहुत बढ़िया है …1500 पन्ने हैं इस के …पंजाबी मेरी मां-बोली है और अगर किसी पंजाबी फिल्म, गीत में या किसी किस्से कहानी में मुझे किसी पंजाबी लफ़्ज़ का अर्थ पता नहीं होता तो मुझे बहुत बुरा लगता है ….अपनी मां-बोली ही समझ में न आए तो और क्या ही समझ लेंगे।इसीलिए यह शब्दकोष खरीदा था….