Wednesday, January 20, 2016

परीक्षक भी फर्जी होते हैं..

मुझे अच्छे से याद है कि बचपन में हमें लगता था कि सब से बड़े फ्रॉड वही लोग होते हैं जो लोगों की कमेटियां लेकर कहीं गायब हो जाते हैं ..कमेटियां यानि चिट-फंड चलाने वाले लोग .. फिर थोड़े बड़े हुए तो पता चला कि नटवर लाल ने भी बहुत से कारनामे किए हैं। फिल्मों में तो चोरी, डकैती, धोखाधड़ी देखते ही रहते थे.

अब तो लगने लगा है जैसे कि धुरंधर नटवरलाल हमारे आस पास ही फैले हुए हैं...हर तरह की जालसाजी, फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी नये नये रूप में सुबह आंख खुलते ही अखबार में देखने को मिल जाती है।

मुन्ना भाई एमबीबीएस ने एक रास्ता दिखा दिया हो जैसे देश को कि अगर नकल करने का हुनर है तो बड़ी से बड़ी परीक्षा को क्लियर करना भी बाएं हाथ का खेल है...मध्यप्रदेश के व्यापम् घोटाले ने देश को हिला कर रखा हुआ है...आए दिन उस से संबंधित या उस की बात करने वाले की मौत की खबर देख-सुन लेते हैं...अभी भी निरंतर परीक्षाओं में परीक्षार्थी की जगह किसी दूसरे के द्वारा परीक्षा में बैठे जाने की खबरें आती ही रहती हैं..दो दिन पहले पढ़ा कि रेल के आर पी एफ की एक आई जी की पत्नी के पर्स से ट्रेन के फर्स्ट क्लास ए.सी कोच से एक लाख से ज़्यादा रकम निकल गई...

अब तो बस वह कहावत ही सच होनी रह गई है जिस में कहते हैं कि किसी की आंखों से काजल चुराना...फिर यह भी लगता है कि ये तो लेखक के मन की उड़ान है, अगर काजल में भी चुराने जैसा कुछ होता तो यह भी ज़रूर चुरा ही लिया जाता। वैसे हाल ही की फिल्मों की बात करें तो अनुपम खेर की सुपर २६ ने अच्छे से समझा दिया कि फर्जी सी बी आई या फर्जी इंकम टैक्स की टीम कैसे छापा मारती है!

अच्छा, भूमिका तो ठीक ठाक हो गई िदखे है...अब असली बात कर ली जाए। कल मैंने अखबार उठाया तो देखा कि कोई फर्जी परीक्षक जा कर कहीं पर स्कूली छात्रों का कैमिस्ट्री का प्रेक्टीकल ले आया....मैंने इसे इतनी गंभीरता से लिया नहीं ...सोचा पहले दूसरी खबरें देख ली जाए।

इस फर्जी परीक्षक के बारे में फिर से पढ़ा .... पढ़ते पढ़ते यही लगा कि ऐसे ही कोई मजाक-वाक कर दिया होगा किसी ने .. मसखरा होगा कोई ...वरना कोई ठीक ठाक आदमी क्यों इस तरह के चक्कर में पड़ेगा ...बस, अच्छी मेहमान नवाज़ी के चक्कर में ... आप को भी याद होगा कि जो परीक्षक हमारी भी परीक्षाएं लेने आया करते थे हमारे स्कूल कालेज वाले उन की भी सेवा-सुश्रुषा जमाई राजा की तरह किया करते थे... हमें झल्लाहट हुआ करती थी कि हमें सॉल्ट का पता नहीं चल रहा और इस बंदे का ध्यान बस बर्फी की प्लेट खाली करने पर ही है।

इस मेहमान-नवाजी के लिए बस एक बार स्कूल में हम से हमारे पी टी मास्टर ने सब से पैसे ऐंठे थे .. यही पांच दस बीस ही होंगे .. सच में अभी याद नहीं है...साफ साफ मॉनीटर ने कहा था कि फिजिकल एजेकेशन के प्रैक्टीकल में पूरे अंक मिल जाएंगे, इन पैसों से एक्सटर्नल परीक्षक की सेवा होनी है... पढ़ाई के मैदान में शायद वह पहली और आखिरी सौदीबाजी थी।

अच्छा तो मैं कल की अखबार की बात कर रहा था फर्जी परीक्षक की ... सारा दिन मेरे दिमाग में बात घूमती रही .. यह भी पता चला कि वह तो पहले भी चार पांच स्कूलों में प्रैक्टीकल की परीक्षाएं ले चुका है ...और इस के साथ ही एक दूसरे फर्जी परीक्षक के बारे में भी पढ़ा...मन में बात घूमती रही ... यह भी और एक और भी ...एक तो मैंने आप से शेयर कर दी, दूसरी मैंने केवल अपने सहयोगी (असिस्टेंट) से शेयर की ...उस ने भी खूब ठहाके लगाये...वह बात यहां शेयर नहीं कर सकता... अपने कुलीग्ज़ से भी मैं अकसर जो बातें शेयर नहीं करता, वह मैं अपने असिस्टैंट से कर लिया करता हूं...पूरे भरोसे के साथ।

दोपहर होते होते जब एक दूसरी अखबार हाथ में लगी तो जाकर पता चला कि ये फर्जी परीक्षक बन कर जाना भी केवल कचौड़ी-जलेबी या मक्खन मलाई के लिए ही नहीं होता... यह तो पूरा मामला ही मलाईदार है...जिस स्कूल में ये फर्जी परीक्षक जाते हैं वहां से हर छात्र के लिए १०० रूपये के हिसाब से वसूली करते हैं ताकि उन्हें अच्छे अंक दिला सकें.....अगर किसी स्कूल में २०० छात्र हैं तो हो गई २०००० की वसूली.....अगर प्रैक्टीकल परीक्षाओं के सीजन में आठ-दस स्कूल कवर कर लिए तो हो गया कुछ महीनों के गुजारे का जुगाड़।

थोड़ा यह भी लगता है कि १०-२० हज़ार के लिए इतना बड़ा जोखिम कैसे उठा लेते हैं ये युवक... फिर यह भी लगा कि क्या इस फर्जीवाड़े का सारा दोष बस इन के सिर पर ही मढ़ देने से काम चल जाएगा... नहीं ना, व्यवस्था में कहीं न कहीं तो ढीलापन होगा ही वरना डाकखाने में देखते हैं कि लोगों को अपने ही पैसे पर मासिक ब्याज के १३३० रूपये लेने में पसीने छूट जाते हैं कईं बार कि हस्ताक्षर नहीं मिल रहे, आई.डी लाओ, फोटो कापी लाओ, कोई साक्ष्य लाओ.....ऐसे में यू पी बोर्ड की शिक्षा प्रणाली कब से इतनी ढीली हो गई कि कोई भी जब चाहे जा कर किसी स्कूल में फर्जी परीक्षक बन कर टोपी पहना कर आ जाए।

उम्मीद है कि इन प्रकरणों की पूरी जांच होगी ताकि सच सामने आ जाए...बहुत बार सच सामने आ नहीं पाता.....हां, लीपापोती अच्छी हो जाती है बस।


ये तो हो गई बातें फर्जी परीक्षकों की ... लेकिन आदर्श अध्यापकों की बात भी आज करनी होगी... कुछ दिन पहले कैफ़ी आज़मी साहब की ९७ वीं जन्म जयंती के अवसर पर आल इंडिया कैफ़ी आज़मी एकेडमी द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत करने का मौका मिला...शबाना आज़मी भी थीं...अच्छा लगा शबाना को सुनना .. जिसे फिल्मों में देखते देखते ही हम लोग बड़े हुए.. बेहतरीन अदाकारा... शबाना आज़मी ने बताया कि उन की फिल्म चाक एंड डस्टर रिलीज़ होने वाली है.. जो टीचर्ज़ के बारे में है....अखिलेश यादव ने भी जब अपनी बात रखी तो यह भी कहा कि अभी अभी इस फिल्म की यूपी में टैक्स मुआफ़ी की फाइल पर हस्ताक्षर करने के बाद इस कार्यक्रम में आया हूं......हां, एक बात तो बहुत बढ़िया मैं शेयर करना भूल ही गया कि उस प्रोग्राम में अखिलेश यादव और चीफ सैक्रेटरी जैसी शख्शियतों का पुष्प-गुच्छों से नहीं, गमलों में रोपे हुए तुलसी के पौधों से स्वागत किया गया... अच्छा लगा ....बहुत ही अच्छा....काश, हम लोग कम से कम इस एक बात को ही अपना लें।

जी हां, पहले ही दिन चॉक एंड डस्टर फिल्म देखने का अवसर मिला.....मुझे बहुत पसंद आई....मैंने भी अपने स्कूल के टीचर्ज़ को इसी बहाने फिर से याद कर लिया...बेहतरीन फिल्म......आप भी देखिए ज़रूर और बच्चों को भी ज़रूर दिखाइएगा....इस तरह की सार्थक फिल्में वैसे भी आज कल कम ही दिखती हैं...

चलिए, चॉक एंड ड्स्टर फिल्म का एक छोटा सा ट्रेलर ही देख लेते हैं..


शबाना आज़मी का बातें हुई और जावेद अख्तर का नाम नहीं आए, हो नहीं सकता....उन की कही एक बात को यहां शेयर कर रहा हूं... मन को छू गई...