Wednesday, July 30, 2014

आग बुझाने वालों में नाम शामिल हो तो बात बने....

एक बार सत्संग में एक प्रेरणात्मक प्रसंग सुना...खेत मे एक जगह सूखे भूसे जैसा कुछ पड़ा हुआ था, एक शैतान पंक्षी को शरारत सूझी, कहीं से आग की चिंगारी उठा ले आकर उस पर फैंक दी, देखते ही देखते आग जंगल की आग की तरह चारों तरफ़ फैलने लगी। एक चिड़िया दूर किसी पेड़ पर बैठी यह मंज़र देख रही थी.....वह तुरंत उड़ कर दूर एक तालाब तक गई, वहां से चोंच में भर कर पानी लाई... और धधकती आग पर उस पानी को छिड़क कर वापिस तालाब से पानी लेने चली गई..यह सिलसिला चल रहा था, तपिश के कारण उस का बुरा हाल हो रहा था, लेकिन उस की सेवा निरंतर चल रही थी।

इतने में दूर से आग का मंज़र देख रहे एक आदमी से रहा नहीं गया, उस ने उस से पूछ ही लिया.. अरी चिड़िया, तुम जो इतना परेशान हो रही है, इतनी बड़ी आग है, चोंच भर पानी के छिड़काव से आखिर क्या हो जाएगा। चिड़िया ने तुरंत जवाब दिया.....देखो, समझदार इंसान, मुझे नहीं पता कुछ होगा कि नहीं, लेकिन इतना तो मानते हो कि जब इस आग का इतिहास लिखा जाएगा, तो मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं, बल्कि आग बुझाने वालों में दर्ज होगा। क्या इतना कम है?

मुझे इस प्रेरक प्रसंग ने बहुत बार प्रेरणा दी।
 श्री निहाल सिंह जी
आज एक इंसान से आप को मिलाना है, यह तस्वीर आप जो देख रहे हैं, यह ७८ वर्षीय रिटायर्ड रेलकर्मी श्री निहाल सिंह जी की है। इन्हें रेलवे से सेवानिवृत्त हुए बीस वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अभी भी मैं इनमें बच्चों जैसा उत्साह देखता हूं। खूब साईकिल चलाते हैं, योगाभ्यास करते हैं और सदैव खुश रहते हैं।

मैं इन को पिछले लगभग एक वर्ष से देख रहा हूं...यह लोगों को योगाभ्यास करने के लिए प्रेरित करते हैं......उन्हें योग की किताबें-प्रतिकाएं पढ़ने को दे जाते हैं, और कुछ भी अपने अनुभव बांटते रहते हैं।
मैं जब भी इन्हें देखता हूं तो यही सोचता हूं कि समाज सेवा केवल कोई बड़े बड़े संगठनों द्वारा ही नहीं की जा रही, बल्कि ऐसे लोग भी अपनी धुन में पता नहीं कितने लोगों का अपनी क्षमता के अनुसार भला करते रहते हैं।

जितनी बार भी मिलता हूं इन से और बात करता हूं तो इन का एक अलग पहलू ही जानने को मिलता है....कईं बार ये जोधपुर के सेवा संस्थान के लिए दान देने के लिए प्रेरित करते दिखते हैं.. कभी अनाथ बच्चों की किसी संस्था के समर्थन में आप से दो बातें करते हैं।

अस्पताल में जहां कहीं भी दिखते हैं किसी न किसी की सहायता या किसी का मार्गदर्शन ही करते इन्हें देखा है।
 आज भी जब यह अस्पताल में आए तो इन के पास एक अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन की कुछ कापियां थीं, मुझे भी पांच छः देकर कहने लगे कि आप भी इसे आगे बांट देना। विज्ञापन यही है कि एक समाचार पत्र ने पर्यावरण संरक्षा हेतु पुराने अखबार अपने नेटवर्क द्वारा इक्ट्ठा करने का एक अभियान चला रखा है, यही लिखा था उस पर और पेड़ों के महत्व की बातें बड़े अच्छे ढंग से लिखी थीं।

आप सुन रहे हैं ना इन का कुछ भी अच्छा काम रोज़ाना करने का ज़ज्बा..........हां, एक और बात......आप पता चला कि ये सुबह सुबह जब सैर के लिए निकलते हैं तो सड़कों पर चल रही स्ट्रीट लाइटों के स्विचों को बंद करते चलते हैं। जब उन्होंने यह कहा कि पता है कि एक घंटे में ये मरकरी के लैंप कितनी बिजली खा जाते हैं तो मुझे उन के दर्द में बिल्कुल ऐसा अपनापन था जैसा अपने घऱ में बिजली की फिजूलखर्ची पर होता है।

रेलवे में हूं ......ऐसी बहुत सी शख्सियतों से मिलता रहता हूं.....जो कुछ न कुछ प्रेरणादायी किए जा रहे हैं। पहले जहां था वहां एक ८५ से भी ऊपर के शख्स थे जो रिटायर्ड लोगों की चिट्ठीयों की मदद, उन की विधवाओं की पैंशन के फार्म या किसी परेशान करने वाले बाबू या किसी की भी खबर लेनी होती थी तो पहुंच जाते थे। सब कुछ निःस्वार्थ भाव की सेवा।

एक रिटायर्ड कर्मचारी को मैं देखता था कि बैंक में , एक को डाकखाने में जा कर लोगों के फार्म भरने, लोगंों को गाइड करना, उन की जितनी भी हो सके मदद कर देना......यह सब मैं लगभग १५ वर्षों से देख रहा हूं। अच्छा लगता है कि रिटायर होने पर किस कद्र सेवा का जज्बा इन में ज़िंदा है,  हम सब के लिए प्रेरणा का एक स्रोत है।

एक बार और...जाते जाते पता नहीं क्या बात हुई........कि कहने लगे श्री निहाल सिंह जी कि डाक्टर साहब, अब ये कुर्ते-पायजामे पांच-छः इक्ट्ठे हो गये हैं मेरे पास, इतने क्या करने हैं, कुर्ते फटते तो हैं नहीं, घर में रखे रखे क्या करना है इन्हें, अब इन्हें भी बांटना शुरू कर दूंगा।

वाह जी वाह, क्या बात कही........वे तो चले गये लेकिन मुझे यह ध्यान आया कि यह शख्स की तो पांच कुर्तों से ही ऐसी तृप्ति हो गई कि वे अब इन्हें ज़रूरतमंद बंदों को बांटने वाले हैं लेकिन जो मेरे घर में सैंकड़ों कमीज़े-पतलूनें पड़ी हैं, जिन  का एक एक साल भर नंबर नहीं आता, मैंने उन्हें बांटने के लिए क्या किया ?....... कुछ भी तो नहीं, एक कड़वा सच। बस विचार आया और यह गया, वो गया, इस के आगे कुछ भी तो नहीं।

अब मैं ऊपर लिखे प्रेरक प्रसंग से निहाल सिंह जी जैसे लोगों के कामों को रिलेट कर सकता हूं......हमारे पास अनेकों अनेकों काम करने वाले हैं, लेकिन यही लगता है ना बहुत बार कि एक हमारे करने से क्या बदल जायेगा, नहीं ऐसा नहीं है, सब बदलेगा.....लेकिन वही चिड़िया जैसी भावना होनी चाहिए.......

शुद्ध पानी भी मिलता है एटीएम से

मेरी नईं नईं नौकरी लगी थी १९९१ में दिल्ली के ईएसआई अस्पताल में.....जहां किराये पर घर लिया उस के पास ही मदर डेयरी का बूथ था। शाम को जाओ, उस बूथ पर बैठे क्लर्क को पैसा दो, वह कुछ टोकन देगा, उन्हें मशीन में डालो और अपना बर्तन टोटी के नीचे रखो ...बस, दूध बाहर आ जायेगा। बड़ी हैरानगी सी हुई थी उस दिन जब पहली बार इस तरह के दूध लेकर आया था....क्योंकि जहां से हम दूध लेना देखते रहे थे, वहां पर लंबा समय इंतजार करो, इधर उधर की बक बक भी सुनो, मक्खियों-मच्छरों को सहो... फिर कहीं जा कर दूध मिलता था।

अब लगता है कि शायद उस समय के लोगों में पेशेंस कुछ ज़्यादा ही थी.......याद है बचपन में पहले साईकिल चला कर दूर डेयरी पर दूध का डोल टांग कर जाना, फिर वहां लाइन में उन की बिखरी चारपाईयों पर बैठो...फिर मशक्कत, फिर दूध......आधे-एक घंटे की तो स्कीम हो ही जाया करती थी। चलिए, वह भी समय अच्छा था, आज भी अच्छे दिन लगभग आ ही गये हैं, आहट नहीं भी सुनी तो कोई बात नहीं.

एटीएम से दूध का मिलना.....इस की खबर मुझे हिंदोस्तानी मीडिया से नहीं, बल्कि दो दिन पहले बीबीसी की न्यूज़ साइट पर मिली। पहले तो एक साधारण सी बात दिखी ...लेकिन जब इस खबर को ढंग से देखा और सुना तो लगा कि यह तो बड़े काम की चीज है।

पानी से एटीएम से दिल्ली में मिलता है शुद्ध पानी (इस लिंक पर क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा, वहां पर लगी वीडियो भी ज़रूर देखिएगा)

दिल्ली के कईं इलाकों में पानी की एटीएम मशीनें लगी हुई हैं ...जहां पर लोग कुछ पैसा खर्च करके अपने पीने का पानी ले लेते हैं। बहुत अच्छी शुरूआत है। सारी खबर मैंने पढ़ सुन ली, लेकिन मुझे उत्सुकता थी कि आखिर कितने पैसे खर्च करने पड़ते होंगे लोगों को इस को पीने के लिए।

सर्वजल वालों की साइट पर भी रेट की कोई बात नहीं दिखी तो फिर वही किया जो हम लोग हार कर करते हैं, गूगल बाबा की शरण में चला गया। उस के सर्च रिज़ल्टस में एक पेज खुल गया जिस में हिमाचल प्रदेश में भी एक ऐसी ही पानी की एटीएम योजना शुरू की जा रही है, आज ही की खबर थी...रेट लिखा था ..पचास पैसे में एक लिटर शुद्ध पानी। बात नहीं भी हजम हो रही तो कैसे भी कर लें, लिखा तो है इस पेज पर सब कुछ साफ साफ।

अब मैं सोच रहा था कि अगर पचास पैसे में वहां हिमाचल में मिलेगा एक लिटर ऐसा शुद्ध जल तो दिल्ली में तो शायद सस्ता ही मिलना चाहिए... क्योंकि यह तो भू-जल ही है, हिमाचल के झरनों से भरा हुआ तो है नहीं, जिसे शुद्ध कर के दिल्ली की जनता तक पहुंचाया जा रहा है। बहरहाल, मुझे दिल्ली के रेट का कुछ पता नहीं है, अगर किसी पाठक को पता हो तो कमैंट में ज़रूर लिखिएगा।

पानी के बारे में यह कह देना कि कुछ लोगों को कैसा भी पानी पीने की आदत हो जाती है, बिल्कुल बेवकूफ़ों वाली बात है. जैसा पानी मेरे को चाहिए वैसा ही मेरे चपरासी को भी चाहिए, जैसे हमारे बच्चों को वैसा भी हमारे नौकर के बच्चों को भी चाहिए, कोई भी सुपर-ह्यूमन नहीं है कि किसी को तो दूषित पानी मार कर देता है किसी को नहीं करता। वो ठीक है कि कुछ समय तक वह मार दिखती न होगी, और एक ही साथ कईं बार धमाका हो जाता है।

बंबई में पिछले दिनों गया था, वहां पर पीने के पानी की २० लिटर की जो बोतल आती है वह लगभग ८०-८५ रूपये की होती है.....अब चार-पांच घर में लोग हैं तो पीने के ज़रूरतों के लिए तो सही है, और शायद उच्च-मध्यवर्गीय लोगों के लिए यह कोई विशेष बात भी न होगी कि एक-डेढ़ हज़ार पीने वाले पानी पर ही खर्च कर दिया जाए।

लेकिन यह बताने की बात नहीं है कि एक औसत भारतीय घर का बजट इतनी महंगी २० लिटर की बोतल में पटड़ी से नीचे उतर जायेगा। इसलिए जब इस तरह के सर्वजल के सस्ते, शुद्ध जल की बात सुनी तो मन खुश हुआ कि चलो, इस तरह का जल सब को मुहैया हो पाएगा।

मुझे इस तरह की स्कीम का कुछ ज़्यादा तो पता नहीं, लेकिन दुआ यही है कि दिल्ली क्या, देश के ज़्यादा से ज़्यादा इलाकों में इस तरह की स्कीमें पहुंचे......और इन के दाम लोगों की पहुंच में हों, ताकि सभी लोग पानी से होने वाली बीमारियों से बच पाएं.....गंगा मैया को साफ़ होने में समय लग सकता है, भाईयो, लेकिन इंसान के शरीर को तो हर समय साफ़-स्वच्छ जल चाहिए। काश, यह हर बाशिंदे को नसीब हो।

जो भी कंपनी ऐसे काम  करती है , ज़ाहिर सी बात है, कुछ मुनाफ़े के लिए ही करती होगी, किसी भी तरह का मुनाफ़ा--- और कुछ नहीं तो सामाजिक सरोकार (या शोहरत ?) के लिए ही सही..... लेिकन फिर भी अच्छा है....बिल्कुल सुलभ-शौचालय जैसे अभियान की हल्की सी खुशबू आ रही है......क्या आप को आई?

अब बारी आती है ..पोस्ट के अंत में एक फिल्मी गीत फिट करने की......शायद जितने भी लेख मैंने पेय जल पर लिखे हैं... उन में से कुछ के अंत में यही सुपर-हिट गीत आप को टिका मिलेगा......क्या करें, बचपन के ८-१० वर्ष की अवस्था के दौरान हमारे ऐतिहासिक रेडियो पर यही बार बार बजता था, यही याद रह गया, आप भी सुनिएगा...........

डा आनंद की बच्चों की देखभाल संबंधी गाइड

  डा आनंद, महान चिकित्सक
डा आर के आनंद विश्व विख्यात बच्चों के डाक्टर हैं, बंबई में रहते हैं, वहां मैडीकल कालेज में वरिष्ठ प्रोफैसर रह चुके हैं और आज से कुछ वर्ष पहले तक बंबई के ओपेरा हाउस के पास (चरनी रोड़ रेलवे स्टेशन) इन का क्लिनिक था। शायद आज भी होगा। इन के जैसा बच्चों का रोगों का माहिर मैंने आज तक नहीं देखा, जो आज से १७-१८ साल पहले भी बच्चों की ओपीडी स्लिप पर यह अकसर लिखा करते थे......किसी दवा की ज़रूरत नहीं है।

आप सोच रहे होंगे, आज सुबह सुबह डा आनंद का कैसे ध्यान आ गया। तो होता यूं है कि आज कल हम देखते हैं कि मां-बाप बच्चों की बिल्कुल छोटी छोटी तकलीफ़ों के लिए बड़े से बड़े ऐंटीबॉयोटिक शुरू कर देते हैं, छोटी मोटी तकलीफ़ों के लिए बड़े से बड़े व्यस्त विशेषज्ञ के पास पहुंच जाते हैं.......ऐसा नहीं है कि डाक्टर के पास जाने में कोई बुराई है, ठीक है, लेकिन अगर बिल्कुल बेसिक सी बातें पता हों तो बहुत बार ऐसे मां-बाप बिना वजह के पैनिक से बच सकते हैं।

हमारे छोटे बेटे का जन्म बंबई में ही हुआ था..१९९७ में और हम उसे सामान्य चैक अप के लिए उन के यहां ही लेकर जाते थे। हर बच्चे और उस के मां बाप को वे पूरा समय देते थे, कोई जल्दी नहीं, हर बात को अच्छे से समझाना, माताओं को स्तनपान के लिए प्रेरित करते रहना, किसी के भी मन में कैसे कोई डाउट रह जाए, सब से दिल से बात करना यह इस महान डाक्टर की फितरत है, वरना डाक्टर तो सब अच्छे ही होते हैं, सेवा कर रहे होते हैं, लेकिन कईं बार मैंने नोटिस किया है कि कुछ महान डाक्टरों में थोड़ा अहम् सा आ जाता है, जो इन में मैंने लेशमात्र भी न पाया। एकदम विनम्र शख्शियत.... यह भी और इन की पत्नी भी जो इन के क्लिनिक में इन के साथ रहती हैं।

हां, तो मैं बताना चाहता था कि छोटे बच्चों वाले घर में एक किताब तो ज़रूर ही होनी चाहिए और वह ही डा आनंद के द्वारा लिखी गई...... गाइड टू चाइल्ड केयर। मुझे याद है शायद १९९७ के दिन रहे होंगे, बंबई के हाजीअली एरिया में एक किताबों की मशहूर दुकान है, क्रॉसवर्ड, वहां पर इन की इस किताब का लोकार्पण हुआ था.......लोकार्पण ही बोलते हैं ना, जब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नईं किताब को बड़े बड़े लोग चमकीले कागज से बाहर निकाल कर फोटू खिंचवाते हैं। इन के निमंत्रण पर मैंने और मेरी श्रीमति जी ने भी वह कार्यक्रम अटैंड किया था। उन के दस्तखत की हुई किताब के पन्नों को अभी भी हम लोग यदा-कदा उटलते-पटलते रहते हैं।

किताब क्या है, मैं नहीं सोचता कि इतनी ईमानदारी और दिल से लिखी किताब मैंने किसी डाक्टर के द्वारा लिखी कभी पढ़ी है। एकदम परफैक्ट.......बच्चों के बारे में सब बातें उन्होंने बिल्कुल आम भाषा में उन्होंने ब्यां कर दी हैं। बच्चों की तरूणावस्था तक के मुद्दे उस में हैं। बच्चों की सभी छोटी मोटी तकलीफ़ों का उस में बहुत सुंदर वर्णन है। मैं ऐसा समझता हूं कि इसे बच्चों वाले हर घर में होना चाहिए।

एक उदाहरण है कि छोटे बच्चों का नाक बंद, सांस लेने में दिक्कत आ रही है, ऐसे में कैसे उस के नाक में घर तैयार की गई सेलाइन नेज़ल ड्राप्स डाल कर आप तुरंत उस की हेल्प कर सकते हैं।

आज पहली बार इस किताब की उस तरह की प्रशंसा करने की इच्छा हो रही है जिस तरह की तारीफ़ स्टेट रोड़वेज़ की बस में दस रूपये में पांच किताबें बेचने वाला लड़का हमें किताबें लेने पर विवश सा कर देता है, हम वे खरीद तो लेते हैं ..फिर सोचते हैं कि इन्हें देंगे किसे किसे। लेिकन यह डा आनंद की किताब तो एक बेशकीमती उपहार भी है मेरे विचार में किसी भी छोटे शिशु और उसके मां बाप के लिए।

टीकों के बारे में कितने प्रश्न रहते हैं,  मां बाप के मन में, टीका लगवाने के बारे कईं बार बच्चों को छोटी मोटी तकलीफ़े एक दो दिन रहती है, सब के बारे में आश्वस्त किया गया है इस किताब के बारे में। आज कल नये नये महंगे टीके भी आ गये हैं, इन सब के बारे में यह किताब आप को अच्छे से समझा देती है।

मुझे अभी अभी याद आ रहा था, आज से लगभग १५-१६ वर्ष पहले की बात थी, हमारा छोटा बेटा स्तनपान करता था उन दिनों, मेरे श्रीमति जी को चिकन-पॉक्स हो गया। डा आनंद को फोन किया ...मिला नहीं, तुरंत इन की किताब उठाई इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए कि क्या इस अवस्था में मां स्तनपान करवा सकती है। तुरंत जवाब भी मिल गया..कि बिना किसी परेशानी के मां चिकन-पॉक्स होते हुए भी शिशु को स्तनपान करवा सकती है, ऐसा करना शिशु के हित ही में है क्योंकि इस से उस में भी चिकन-पॉक्स के लिए रोग प्रतिरोधक शक्ति (इम्यूनिटि) का विकास होता है।

अब ऐसे मैं डा अानंद की और उन की किताब की कितनी भी प्रशंसा किए जाऊं, आप को तभी पता चलेगा जब आप उन की किताब को देखेंगे।

इस लिंक पर जा कर आप उस किताब के बारे में और भी जानकारी पा सकते हैं..... गाइड टू चाइल्ड केयर 
मुझे भी अभी अभी पता चला है कि अब यह किताब हिंदी में भी उपलब्ध हो चुकी है, बहुत ही अच्छा लगा यह देख कर।

मेरे विचार में बहुत हो गया आज के दिन के लिए। और कितनी तारीफ़ करूं, आप स्वयं उन के बारे में जानिए और उन के बेशकीमती अनुभव से लाभ उठाईए।
Guide to Child Care --Dr Anand