Thursday, March 20, 2008

मेरी लेखन यात्रा.....


कल मैंने अपनी पोस्ट में उल्लेख किया था कि किस तरह से लेखक बनने की जब मेरे ऊपर धुन सवार हुई और किस तरह से मैंने इस के लिये दो दूरस्थ पाठ्यक्रमों में पूरे पैसे भेजे, किताबें भी आ गईं लेकिन कुछ कारणों के कारण( जिन का जिक्र कल मैंने किया था..) उन्हें कभी देखने की भी इच्छा नहीं हुई। मेरी श्रीमति जी अकसर मेरे से कभी कभार पूछ भी लेतीं कि हां, उस कोर्स का क्या बना जिस में तीस हज़ार रूपये भेजे थे......लेकिन मैं भी कहां कम था....बिलकुल एक स्कूली बच्चे की तरह हर बार टाल जाता....हां, हां, करना है, क्या करूं सारी दिक्कत टाइम की हो रही है। खैर, इतने सारी रकम एक टुच्चे से कोर्स के लिये भेज देने के लिये मैं अपने हाथ ज़ोर से अपने माथे पर मारने में मशगूल ही था कि एक हल्की सी आशा की किरण दिखी....यह वर्ष 2002 की बात है।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय के बारे में तो आप में से काफी लोग जानते ही होंगे...यह संस्था तरह तरह के कार्यक्रम हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिये चलाती रहती है। उन में से एक यह भी है कि यह नवलेखकों के लिये भी नवलेखक शिविर लगा कर उन्हें उत्साहित करती है। ऐसा ही एक विज्ञापन एक बार मेरी नज़र में पड़ गया....इस में उन्होंने अहिंदी भाषी नवलेखकों से उन की एक रचना मांगी थी.......मैंने भी अपने आप को कहा कि यार, तू इतने वर्षों से कुछ न कुछ लिख रहा है, अनगिनत सरकारी निबंध लेखन प्रतियोगिताओं में बार-बार पुरस्कृत होता रहता है ...इसलिये इस नवलेखक शिविर वाली ओखली में भी सिर घुसा ही दे। अपने आप को समझाने की कोशिश की कि देख, उन्होंने नव-लेखक ही मांगा है ....तू भी लिख कुछ भी ऐसे ही .....उस को भेज दे इस निदेशालय को और करवा ले अपने नाम को नव-लेखकों की सूची में दाखिल।
मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं कईं दिन सोचता रहा कि यार, अब मैं क्या लिखूं.....ठीक है, मैं चिकित्सा विषयों के ऊपर लिखता रहता हूं लेकिन अब इन को क्या लिख कर भेजूं। तभी मुझे एक ऐसी शख्सियत का ध्यान आया जिस से मैं बचपन से ही बहुत प्रभावित रहा हूं............यानि अपना डाकिया। बचपन से ही डाकिये के बारे में मेरे मन में बहुत विचार आते थे.....एक दिन मैंने इन सब विचारों को एक लेख में पिरो कर तैयार कर दिया एक लेख ......डाकिया डाक लाया। मुझे अपने आप को यह लेख बहुत पसंद आया ( किस लिखने वाले को यह खुशफ़हमी नहीं होती..!)…और मैंने इसे केंद्रीय हिंदी निदेशालय को भेज दिया।
मुझे याद है कि इस लेख को लिखने के लिये मुझे अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ी थी...पहले शायद एक-दो बार रफ लिखा। उस की एक प्रति मैंने अब भी संभाल कर रखी हुई है...........जब भी उसे पढ़ता हूं तो अच्छा लगता है....चलो, ठीक है कल होली के उपलक्ष्य में अपने इस पहले लेख....डाकिया डाक लाया......को अपनी पोस्ट के माध्यम से प्रस्तुत करूंगा। मुझे याद है कि यह लिखने के बाद मैं अपने आप में बहुत हल्कापन महसूस कर रहा था।
और हां, मैं यहां पर यह भी बताना चाहूंगा कि वर्ष 2001 में मैंने इंगलिश टाइपिंग भी सीखी...क्योंकि अपनी चिट्ठीयां किसी से टाइप करवा के मेरी कभी तसल्ली नहीं होती थी। या तो टाइप करने वाले को बार-बार कोमा, साइऩ ऑफ एक्सक्लैमेशन....इत्यादि के लिये खुद याद दिलायो ...नहीं तो उस के द्वारा टंकित कागज़ को देख देख कर कुढ़ते रहो। और 2002 के शुरू शुरू में कंप्यूटर पर हिंदी किस तरह से टाइप करनी है...यह भी सीख लिया, लेकिन इंस्क्रिप्ट शैली में और तब से एक सॉफ्टवेयर...आईएसएम2000....की मदद से हिंदी में टाइप करना शुरू कर दिया।
अच्छा तो मैंने उस डाकिया डाक लाया वाले लेख के बारे में आप को बता दिया है कि मैंने उसे केंद्रीय हिंदी निदेशालय को भेज दिया। और लगभग एक-डेढ़ महीने के पश्चात् मुझे चिट्ठी आई कि मेरी रचना का चयन कर लिया गया है और मुझे उन्होंने नव-लेखक शिविर में सम्मिलित होने का आमंत्रण भी दिया । यह शिविर जोरहाट( आसाम) में होना तय हुया था और यह आठ-दस दिन चलने वाला था। मुझे इस चयन की इतनी खुशी थी कि मैं वहां पहुंच गया।
उस नवलेखक शिविर में इस निदेशालय द्वारा हिंदी लेखन की विभिन्न विधाओं के मंजे हुये खिलाड़ीयों को नवलेखकों के साथ अपने अनुभव साझे करने के लिये बुलाया गया था....सो, वह अनुभव बहुत सार्थक सिद्ध हुया । यह कार्यशाला सुबह से शाम नौ दिन तक चली.........मैंने चिकित्सा क्षेत्र के बाहर आकर पहली बार यह अनुभव किया कि यह लेखन-वेखन वाली बात भी कितनी रोमांचाक है। वे हमें वहां से एक टापू ...मजौली...पर स्टडी-टूर पर भी एक दिन के लिये ले गये थे।
खैर , वहां पर जब भी कुछ लिखने को कहा जाता है, मैं भी उस में पूरी तरह से सम्मिलित होता.....लेकिन जब कभी कविता लिखने की बारी आती, मेरी सारी पोल खुल जाती। मुझ से कभी कविता की एक लाइन भी नहीं लिखी गई। मुझे यह दुनिया का सब से मुश्किल काम लगता है...और मैं उन सब कवियों को बहुत हैरानी से सुनता रहता, देखता रहता….और देख कर हैरान होता रहता कि यार, किसी का मन इतनी लंबी उड़ान भी भर सकता है ! खैर, जब वहां पर मैंने एक कहानी लिखी तो इस की बहुत प्रशंसा हुई ...और मुझे कहा गया कि आप सरिता के स्तर की कहानी तो लिख ही सकते हो।
और हां, उन दस दिनों में यह भी तो सीखा कि लेखन है क्या.....किस तरह से इस झिझक को दूर किया जाये। सब से अहम् बात जो मैंने वहां से सीखी कि लेखन का मतलब है बस लिखते जायो...........कुछ भी लिखो.....किसी भी विधा में ...जिस में भी आप अपने आप को सहज सा अनुभव करते हो..........लिखो..........और जब लिख रहो हो तो बिल्कुल एक अबोध बालक की तरह बेपरवाह हो कर लिखो.......जैसे वह पतंग के पेचे लगाते हुये सारी दुनिया भूला होता है, बस उस तन्मयता से लिखो...............और लिखते समय किसी बात की फिक्र न करो.............बस, अपनी कलम को कागज़ पर खुला छोड़ दो..............बाकी सब कुछ अपने आप हो जायेगा। ये विचार-वार तो अपने आप आयेंगे..............लेकिन आप तो बस पहला कदम उठायो और कलम लेकर बैठ जायो ..........एकांत में। और हां, उस शिविर में यह भी जाना कि किस तरह से हमारे आस-पास सैंकडों लेख बिखरे हुये हमारी कलम की इंतजार में हैं। बस, यही समझा कि अपने विचारों को बेलगाम छोड़ कर कागज पर लिख देना ही लेखन है। वहां पर एक विद्वान आये थे...तिवारी जी....उन्होंने बताया कि देखो, यह साहित्य रचना कोई दुर्गम काम तो है नहीं.....आप लोग अपने आस पास जो भी देखते हो, बस शुरूआत इसी बात से करो कि उन सब बातों को कागज़ पर उतारते जायो। उन्होंने यह भी कहा कि आप लोग कम से कम एक पन्ना रोज़ाना लिखा करें.........साल में लिखे उन 365 पन्नों में से चालीस-पचास पन्ने तो ऐसे होंगे ही जो प्रकाशित किये जा सकते हों। उन्होंने बतलाया कि उन के नाना जी सन् 1901( जी हां, सौ साल पहले...)....में एक कापी पर रोज़ाना सारे दिन का बस हिसाब-किताब ही लिख लेते थे कि घी इतने रूपये में इतने सेर आया, गुड़ इस रेट में मिला.........उन्होंने बताया कि अब वह वाली कॉपी भी किसी साहित्यिक कृत्ति से क्या कम है !!
उस लेखक-शिविर में हमें यह भी बताया गया कि हमें हिंदी भाषा में अपना ज्ञान बढ़ाने के लिये कौन कौन से शब्द-कोष पढ़ने चाहिये.........कॉमिल बुरके का महान नाम भी इसी शिविर में ही पहली बार सुना, वहीं से अरविंद कुमार एवं कुसुम कुमार द्वारा रचित हिंदी समांतर कोष के बारे में सुना और वापिस आ कर तीन-चार शब्द-कोष और समांतर कोष खरीदे।
लेखन के तालाब में छलांग लगाने की इच्छा और भी दृढ़ हो गई। और लेखक शिविर से वापिस लौटते ही खूब लिखना शुरू किया....समाचार-पत्रों के लिये खूब लिखा....सामाजिक विषयों पर लिखा, व्यंग्य-बाण छोड़े और हां, चिकित्सा से संबंधित मुद्दों पर तो लिखा ही। बस, ऐसे ही हौंसला बढ़ता चला गया।
शायद एक-दो साल बाद एक अन्य नवलेखक शिविर में बुला लिया गया...यह शिविर डीएवी कॉलेज अमृतसर में होना तय हुया था......चूंकि यह मेरा पुराना कॉलेज भी था, इसलिये वहां भी मैंने इस शिविर में पूरा भाग लिया। यह शिविर भी केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा ही आयोजित किया गया था। वहां जा कर भी बहुत अच्छा लगा....बहुत कुछ सीखा...चोटी के हिंदी लेखक एवं अनुवादक आये हुये थे....वहां पर मैंने एक लेख लिया....एंटीबॉयोटिक दवाईया...कहीं आप की सेहत न बिगाड़ दें !!........इस लेख की बहुत सराहना हुई ....जब इतने इतने महान लेखकों ने इसे सराहा तो मुझे लगा कि मेरे लेखन में कुछ तो बात होगी .......अब इतने सारे लोग तो गल्त नहीं ना कह रहे होंगे। खास कर मेरी सहज, साधारण, आसानी से समझ में आ जाने वाली शैली की बहुत प्रशंसा हुई। सो, एक बार फिर हौंसला बुलंद हो गया। ( और हां, वह वाला लेख भी एक-दो दिन बाद पोस्ट में डालूंगा)....।
इन्हीं वर्षों में ही एनसीईआरटी के लिये उन के निमंत्रण पर हिंदी में एक किताब की मैन्यूस्क्रिप्ट लिख कर उन्हें सौंप दी......। बस, यह लेखन-यात्रा तो चल ही रही थी....लेकिन अब संपादकों को बार बार अपने लेख फैक्स करना और फिर फोन पर पूछना कि फैक्स ठीक ठाक पहुंच गया है ना .....यह सब पिछले कुछ अरसे से अखर रहा था....और वैसे भी कुछ संपादक कहने लगे थे कि आप फलां-फलां फांट में अपने लेख ई-मेल ही कर दिया करें.............लेकिन मुझे लगता था कि अब मैं कैसे यह लिख पायूंगा...क्योंकि मुझे तो केवल इंस्क्रिप्ट के द्वारा ही लिखना आता है।
लेकिन मेरा बेटा जो अकसर कंप्यूटर पर बैठा कुछ न कुछ पंगे लेता रहता है ....मेरी इसी हिंदी में ई-मेल न कर सकने की समस्या का तोड़ निकालने में लगा हुया था कि उसे इस हिंदी बलोगिंग के बारे में पता चला............उस ने पता नहीं कैसे रविरतलामी जी का हिंदी बलाग किसी सर्च इंजन से ढूंढ निकाला और मेरे को इस के बारे में बतलाया। दो-दिन बाद बताने लगा कि बापू, अब तुम हिंदी में भी ई-मेल भेज सकते हो ....और मुझे यह जान कर बहुत खुशी हुई कि कैफे-हिंदी नाम से कुछ नेट पर है.........ट्राई किया तो मेरी बांछे खिल गईं.......और अगले ही दिन ब्लागर पर अपनी बलाग बना कर पोस्टें डालनी शुरू कर दीं......यह सब चार-पांच महीने की ही बातें हैं..........लेकिन यह मुझे अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम प्रतीत हो रहा है।
बस, सफर अभी ज़ारी है...........मंज़िल बहुत दूर है........लेकिन बस इन्हीं पंक्तियों को अपने मन ही मन दोहराता रहता हूं और दूसरे लोगों को भी कुछ भी लिखने के लिये उकसाता रहता हूं............
इन परिंदों को भी मिलीगी मंज़िल एक दिन
ये हवा में खुले इन के पंख बोलते हैं।
अच्छा, तो साथियो, इस बेहद लंबी पोस्ट पढ़ने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.................भगवान आप की कलम भी सलामत रखे !!!