Monday, November 17, 2014

गर्भावस्था के दौरान मधुमेह रोग का जोखिम...

आज से १५-२० वर्ष पहले तक मुझे याद है कि यह बहुत कम गर्भवती महिलाओं में देखा जाता था कि वे मधुमेह का शिकार हो गईं.....चाहे यह रोग होता कुछ महीनों के लिए ही है लेकिन इस का नकारात्मक पहलू यह भी है कि इस से होने वाले बच्चे में कईं दिक्कतें आ सकती हैं और वैसे भी यह जच्चा-बच्चा दोनों के लिए जटिलतायें उत्पन्न कर सकता है।

इस तरह के मरीज मेरे संपर्क में तो आते नहीं है इसलिए मैं यही सोचता था कि यह समस्या कोई आम समस्या नहीं है। वैसे भी कभी कोई ऐसी महिला आ जाती थी अपने मुंह के इलाज के लिए।

लेिकन इस बार विश्व मधुमेह दिवस पर जब मैंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाली अखबार में यह खबर देखी कि यहां मैडीकल कालेज में स्त्री रोग विशेषज्ञों ने एक स्टडी की है जिस में यह पाया है कि लगभग २० प्रतिशत महिलायें लखनऊ में गर्भावस्था के दौरान मधुमेह की चपेट में आ जाती है.....गर्भावस्था के दौरान होने वाला मधुमेह रोग लगभग ४ प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में जटिलतायें उत्पन्न कर देता है।


सब से चिंताजनक बात यह पढ़ने को मिली कि जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान मधुमेह रोग पाया जाता है......उन में से आधी महिलाओं को आगे चल कर ४० साल की उम्र पार करने पर मधुमेह रोग होने की बहुत संभावना होती है और जो महिलायें गर्भावस्था के दौरान मधुमेह से ग्रस्त होती हैं, उन से पैदा होने वाले बच्चे भी अकसर ४० साल की उम्र पार करने पर मधुमेह से ग्रस्त हो जाते हैं।

इतनी सारें बातें यहां करने का यही फंडा है कि गर्भवती महिलाओं को समय समय पर अपनी सभी जांचे करवानी ज़रूरी है......वैसे तो अगर वे नियमित अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलती रहती हैं तो यह काम स्वतः ही होता रहता है...और एक बात, गर्भवती महिलाओं को खानपान के बारे में भी सही दिशा-निर्देश दिये जाने ज़रूरी हैं....क्योंकि भारतीय समाज में एक बात तो है कि गर्भवती महिला को अच्छा पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिलने का मतलब यही लिया जाता है कि सब तरह का खाना ..मीठा भी ... कस के खाया जाये .......और वैसे ही इस समय दौरान शारीरिक श्रम तो ज़्यादा वर्जित ही होता है.....इसलिए मोटापा होने की संभावना और फिर इस से होने वाली परेशानियों का खतरा तो बढ़ ही जाता है।

बस, यह ध्यान रखें कि गर्भावस्था में जो मधुमेह रोग होता है......वह काफी जटिलतायें पैदा कर सकता है ... जच्चा बच्चा के लिए जन्म के समय भी और ४० की उम्र पार करने पर भी यह दोनों में मधुमेह रोग उत्पन्न करने की क्षमता तो रखता ही है। ध्यान रखियेगा।

गैस से भरे गुब्बारे का खेल भी खतरनाक

आज कल बहुत दिखता है कि पार्टीयों में गैस से भरे गुब्बारे खूब टंगे रहते हैं.....कुछ ही समय में बच्चे उन्हें फोड़ना शुरू करते हैं...होता है ना यह सब आज कल खूब!!

मुझे तो गैस के गुब्बारे देख कर अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं.....गुब्बारे वाले ने अपनी लकड़ी पर दो तरह के गुब्बारे टंगे होते थे.....एक साधारण और दूसरे गैसी गुब्बारे। गैसी गुब्बारे का रेट साधारण गुब्बारे की तुलना भी उस समय के अनुसार काफ़ी हुआ करता था....कभी कभी जब मैं गैस का गुब्बारा खरीदता था तो उस के साथ लंबा सा धागा बांध कर बैठक में छोड़ दिया करता था।

और सुबह उठ कर जितनी शिद्दत से आज के बच्चे व्हास्ट्स-अप और फेसबुक अपडेट्स चैक करते हैं, उस से भी कहीं ज्यादा शिद्दत से मैं बैठक की तरफ़ लपक पड़ता था यह देखने के लिए अपने गैसी गुब्बारे का क्या हाल चाल है?.. अगर वह अभी भी ऊपर छत पर लगा दिखता तो बहुत मज़ा आ जाया करता था। कितनी छोटी छोटी सी बातों में अपुन की खुशियां छुपी हुआ करती थीं!!



पांच सात दिन पहले यहां लखनऊ के पास गैस वाले गुब्बारों से संबंधित एक बड़ा हादसा हो गया..एक सरकारी समारोह में गैस के गुब्बारे छोड़े गये..साथ में कोई बैनर वैनर बंधा हुआ था.. यह गुब्बारे पास ही के किसी गांव में जाकर जब नीचे गिरने लगे तो बच्चों का झुंड आ धमका....और जैसे ही ये गैसी गुब्बारे फूटे, पास ही पड़े सूखे घास में आग लग गई... और लगभग १२-१५ बच्चों आग से बुरी तरह से झुलस गये। बड़ा अफसोसजनक हादसा था यह।

फिर अगले दिन पता चला कि अब इन गैस के गुब्बारों में लोगों ने हीलियम गैस की जगह हाईड्रोजन और एसिटिलिन जैसी गैसें ज्वलनशील गैसें भरनी शुरू कर दी हैं... सब कुछ सस्ते के चक्कर में .....ये लोग अमोनियम नाइट्रेट और कास्टिक जैसे कैमीकल्स को मिला कर हाइड्रोजन जैसी गैस तैयार करते हैं जो कि शीघ्र ही आग पकड़ सकती है।

पड़े हुए हैं सब लोग अब इस बात के पीछे कि दोषियों को पकड़ो....कुछ को पकड़ा भी गया है.....लेकिन लोगों को भी सचेत किये जाने की भी बहुत ज़रूरत है......और वैसे भी गैस से भरे गुब्बारों पर प्रतिबंध की तैयारी हो ही गई है।

सोचने वाली बात है कि पहले ही से कितनी चीज़ें हैं जो प्रतिबंधित हैं और धड़ल्ले से बिक रही है.....गुटखा, पानमसाला एक उदाहरण है।

१४ नवंबर २०१४ के हिन्दुस्तान लखनऊ संस्करण में छपी खबर 
आप भी सावधान रहिए...बच्चों की पार्टियों आदि में भी ध्यान रखिए.... इन गैसी गुब्बारों-वारों से दूर ही रहने में समझदारी है। 

स्कूली बच्चों की शादी, मोबाईल चोर की हत्या और सैक्स टॉय बाज़ार

ओह माईगाड---शीर्षक कितना सनसनीखेज दिखता है ..स्कूली बच्चों की शादी, मोबाईल चोर की हत्या और सैक्स टॉय बाज़ार....कुछ कुछ उस टीवी चैनल जैसा जो हर एपीसोड से पहले कहता है कि चैन से जीना है तो जाग जाईए। इस शीर्षक की बात तो बाद में करते हैं, उससे पहले एक बात याद आ गई कि डीएवी स्कूल अमृतसर में भी सत्तर के दशक में मेरी एक ड्यूटी लगा करती थी।
मुझे स्कूल के ज़ीरो पीरियड में एक साथी के साथ लाईब्रेरी में जाकर हिंदी और इंगलिश के पेपरों की हैडलाइन्ज़ को खंगालना होता था और फिर उन में से पांच छः मुख्य खबरें छांट कर हिंदी और इंगलिश में अलग अलग नोटिस बोर्डों पर गीले चाक से लिखनी होती थीं..यह सिलसिला दो तीन साल तो चला....मुझे बड़ा गर्व महसूस होता था कि जो मैं चाहूं वही लिख दूं बोर्ड पर ..फिर आधी छुट्टी के समय स्कूल के बच्चे उन्हें पढ़ा करते थे। आज सोचता हूं कि यह तो एक संपादक जैसा ही काम हो गया...फिर मुझे स्कूल की मैगजीन का स्टूडैंट एडिटर भी बना दिया गया......अच्छा लगता था यह सब काम करना।
आज भी जब अखबार देखी तो वही दिन याद आ गये.....तीन चार खबरों ने कुछ हिला सा दिया।
खबर पढ़ने के लिए इस क्लिपिंग पर क्लिक करिये
पहली खबर यह कि आठवीं क्लास का लड़का और सातवीं कक्षा की छात्रा लखनऊ के एक कानवेंट में पढ़ने वाले लखनऊ से भाग कर नैनीताल की तरफ़ निकल पड़े। घर से कुछेक हज़ार रूपये उन्होंने साफ किए और वे शादी के मनसूबे बना कर निकल पड़े। पहुंच गये बरेली.....वहां अगला कोई कार्यक्रम बना रहे थे कि किसी बैंक अधिकारी भद्रपुरूष को कुछ शक सा हुआ उन की उम्र देख कर....उसने पुलिस को सूचित किया......पुलिस के सामने उन्होंने यह सब कबूल किया... और फिर मां बाप उन्हें वापिस ले कर आए।

यह घटना समाज का आईना तो है ही .....यह केवल बदलते समय की दस्तक ही नहीं है, आज के मां बाप की रातों की नींद हराम करने के लिए काफ़ी है। मैं खबर पढ़ते यही सोच रहा था कि भला हो उस भलेमानुस का जिस की नज़र इन बच्चों पर पड़ गई और ये किसी अनहोनी का शिकार होने से बच गये।

अभी तो ये बच्चे १६ के भी नहीं हुए होंगे और अभी से ये तेवर......




दूसरी खबर यह कि कलकता के मैडीकल छात्र जिस होस्टल में रहते थे ... वहां उन्होंने एक मोबाईल चोर को पकड़ लिया... और फिर फिर सब ने क्रूरता से उस की तुरंत हत्या ही कर डाली। बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाली यह घटना। भविष्य में डाक्टर बनने वाले डाक्टरों में इतनी क्रूरता कैसे आ गई कि एक मोबाईल के चक्कर में एक जान ही ले डाली.......डर लगा यह खबर पढ़ कर कि एक जान इतनी सस्ती भी हो सकती है। वह घटना याद आ गई हरियाणा की कुछ महीने पहले की जिसमें एक बच्ची के साथ मुंह काला करने वाले युवक का लोगों ने पकड़ कर लिंग ही काट कर उसे थमा दिया। हम निःसंदेह खतरनाक समय में जी रहे हैं। एक और खबर पर नज़र पड़ गई थी जिसमें कलकत्ता के ही एक घर में जब चोर घुसे और उन्होंने ८० पार कर चुकी बुज़ुर्ग महिला को धक्का मारा तो उसने चंद मिनटों पर मृत होने का ऐसा नाटक किया कि उस की जान बच गई।

तीसरी खबर ...यह खबर मुझे बड़ी अजीब सी लगी ... हो न हो यह भी कोई स्पांसर्ड टाइप की ही खबर थी ....खबर यह बता रही है कि अब महिलाओं ने सैक्स टॉयज़ में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी है और वे इन के ऊपर खूब पैसा खर्च कर रही हैं....यह खबर पढ़ कर तो ऐसा लगा कि जैसे सारे देश की महिलायें ही इस तरह की ऑनलाईन खरीददारी में लगी हुई हैं......कुछ भी अखबार वाले बकवास भी तो लिख देते हैं ना....यह उसी का ही एक उदाहरण है... उन्हें बकवास लिखना भी पड़ता होगा शायद.....पर शिकायत इस तरह की खबर से यह है कि जिन की ज़िंदगी चल रही है ठीक है....वे भी क्यों ठीक ठाक चलें, बेचो उन को भी ये सैक्स टॉयज़... और तरह तरह के सैक्स टॉयज़ के नाम और वे देख के किन किन शहरों में किस किस पते पर मिलते हैं, यह भी बता दिया गया है.........जबरदस्ती का सौदा...बेकार लगा यह देख कर.

प्रातःकाल के भ्रमण की तो कोई मांग नहीं...

यह कौन सा डिज़ाईनर है....
क्या नज़ारा है......वाह..
अभी अभी अपने घर के पास ही एक बाग में टहल कर आ रहा हूं...अच्छा लगता है। आज मैंने एक बुज़ुर्ग को बिल्कुल स्कूल की पी.टी की तरह अपने बाजु वाजू हिलाते-ढुलाते देखा तो मुझे बहुत अच्छा लगा। दो चार दिन पहले की ही बात है कि मैं अपने एक मरीज से उस की दिनचर्या की बात कर रहा था तो उस बुज़ुर्ग ने भी मुझे कहा था कि सुबह टहलता हूं और थोड़ी पी टी कर लेता हूं।

पता नहीं यह क्या है...पर देख कर मज़ा आ गया
उस दिन मुझे भी अपने स्कूल का पी टी पीरियड याद आ गया था... लेिकन सोचने वाली बात है कि क्या वह पी टी केवल अपने पी टी मास्टर की पिटाई से ही बचने के लिए हम किया करते थे....शायद हां, कुछ खास मन नहीं लगता था ना उस दौरान.........लेकिन अब तो उस सब में मन लगाने की बहुत ज़रूरत है।

हां, तो मैंने आज सुबह बुज़ुर्ग को पी टी जैसा करते देखा तो मैंने भी वैसे ही करना शुरू कर दिया....अच्छा लगा।

सुबह बाग में जब जाते हैं तो सब को बहुत खुश पाते हैं....भ्रमण करते करते जब लोगों के ठहाके सुनाई देते हैं तो यही कामना होती है कि ये ठहाके यूं ही गूंजते रहें....कोई हास्य-क्लब में ठहाके लगा रहे होते हैं कुछ लोग इक्ट्ठा हो कर......कुछ यार दोस्त वैसे ही हंसी-ठिठोली करते दिखते हैं।

ऐसे नज़ारे सब को रोज़ाना दिखते रहें..काश!
आज मैं यही सोच रहा था कि जो भी हो ये लोग घर से एक घंटे के लिए बाहर आ गये और बच्चे बन गये.....यही एक बड़ी बात है....हम लोग बच्चे ही तो बनना भूलते जा रहे हैं। सारे दिन में केवल एक घंटे तो अपने आप को देना बनता है कि नहीं।

मैंने एक बात नोटिस की है कि कुछ लोग सैर करते समय गंभीर सी बातें करते सुनाई पड़ते हैं.......मुझे नहीं पता कि यह ठीक है कि नहीं, वैसे हंसी मज़ाक हो और हल्की फुल्की बातें हों तो ठीक है, ज़्यादा गंभीर विषयों को तो शायद बाकी के तेईस घंटों के लिए छोड़ देना चाहिए......यार, पहले आप अच्छे से चार्ज तो हो जाईये।

वैसे भी यह सुबह का समय होता है यह अपने आप के साथ और प्रकृति के साथ समय बिताने का एक बेहतरीन अवसर होता है.....मैं भी कुछ कुछ तस्वीरें खींच लेता हूं......आज मैंने बाग में टहलते हुए जो तस्वीरें खींचीं, यहां ठेल रहा हूं.....कैसी लगीं?

पिछले दिनों मैं एक हृदय रोग विशेषज्ञ को रेडियो पर सुन रहा था ...बता रहे थे कि कुछ लोग सुबह सैर करना इसलिए टालते रहते हैं कि सैर करने वाले बूट नहीं हैं.....वह यही बताना चाह रहे थे कि सुबह की सैर की कोई मांग नही है, शूज़ नहीं हैं तो क्या है, चप्पल तो है, उसे ही पहन कर निकल पड़े.......मैं भी देखता हूं कि बाग में कुछ गृहिणीयां चप्पल डाल कर टहल रही होती हैं....बिल्कुल ठीक है।

एक बात और याद आ रही है कि स्कूल के शुरूआती दिनों में जब प्रातःकाल का भ्रमण विषय पर हमें निबंध लिखना सिखाया जाता है ...उसे जब गर्मी की छुट्टियों में हम उसे रिवाईज़ किया करते थे तो उन दिनों सुबह सुबह पास की ग्राउंड में टहलने भी निकल जाया करते थे......क्या मज़ा आता था.......लेकिन धीरे धीरे हम क्यों यह सब भूलना शुरू कर देते हैं....स्वर्ग सिधार गये अपने मास्टर लोगों की नज़र अभी भी अपने ऊपर है........इसलिए जो भी है, जैसे भी हैं, सुबह का एक घंटा अपने शरीर के लिए रख दें तो कितना अच्छा हो ! Let's stop taking things for granted!!