Tuesday, December 30, 2008

चलो यार थोड़ा ठंड का इंतजाम करें ....





जब देश के इस भाग में यह जुमला दो दोस्तों के बीच बोला जाए तो समझ लिया जाये कि शाम को लवली पैग की तैयारी हो रही है, चिकन फ्राई की बात हो रही है, टिक्के, फिश-फ्राई की तैयारी हो रही है , चिकन-सूप का प्रोग्राम बन रहा है वरना खरोड़ों के जूस ( बकरे की टांग) की चाह हो रही है।

लेकिन हम इस ठंड का इंतजाम करते हैं चलिये सीधी सादी मूंगफली से --- अभी अभी बाज़ार से लौटा तो घर के पास ही एक रेहड़ी पर एक दुकानदार मूंगफली भून रहा था –मैं भी वह खरीदने के लिये खड़ा हो गया और ये तस्वीरें सभी वही ही हैं।

हम लोग पंजाब में बचपन से देखते रहे हैं कि मूंगफली की रेहड़ी पर एक बहुत बड़ा ढेर लगा रहता है – उस के बीचों बीच एक छोटे से मिट्टी के बर्तन में उपले या छोटी छोटी लकड़ीयां जलाई जाती थीं। और हर ग्राहक को मूंगफली उस बर्तन को उठा कर गर्मागर्म देता था --- और अगर कोई दुकानदार थोड़ा आलस्य करता था और ढेर में से किसी दूसरी जगह से मूंगफली देने की कोशिश भी करता था तो उसे ग्राहक से हल्की सी झिड़की भी पड़ जाती थी कि गर्म दो भई गर्म।

फिर कुछ समय तक हम लोग मूंगफली के पैकेट खरीद कर ही काम चला लिया करते थे --- लेकिन उस में कभी इतना मज़ा आता नहीं है --- पता नहीं क्यों --- कितनी तो खराब मूंगफली ही उस में भरी होती है !!


पिछले लगभग तीन साल से मैं यमुनानगर – हरियाणा में हूं और यहां पर मूंगफली खाने का मज़ा ही अपना है । जैसा कि आप इस फोटो में देख रहे हैं इस शहर में जगह जगह रेहड़ीयों पर मूंगफली बिकती है --- बस, आप यह समझ लीजिये कि पहला जो भट्ठीयां नीचे ज़मीन पर हुआ करती थीं अब ये भट्ठीयां रेहड़ी के ऊपर इन दुकानदारों ने बना ली हैं।


आप को ये तस्वीरें देख कर ही कितना अच्छा लग रहा होगा --- ठंडी छू-मंतर हो रही है कि नहीं ? – इन दुकानदारों ने लकड़ीयों आदि का इस्तेमाल कर के भट्ठी जलाई होती है – जिस पर ये थोड़ी थोड़ी मूंगफली लेकर सेंकते रहते हैं और उसी समय ग्राहकों को देते रहते हैं – इन रेहड़ीयों के इर्द-गिर्द खड़ा होना ही कितना रोमांचक लगता है ---किसी कैंप-फॉयर से कतई कम नहीं --- और आप को यह बताना भी ज़रूरी है कि इस मूंगफली को नमक में भूना जा रहा है --- इस मूंगफली का टेस्ट बहुत बढ़िया होता है।

अभी मूंगफली की बात खत्म नहीं हुई तो ध्यान आ गया है रोहतक की शकरकंदी का ---जिसे दुकानदार रेत की धीमी आंच में सेंक कर इतना बढ़िया कर देते हैं कि क्या बतायें --- वैसे एक बात है इन मौसमी बहारों का मज़ा जो रेहड़ी के पास ही खड़े हो कर खाने में आता है ना उस का अपना अलग ही रोमांच है।

वैसे भी व्यक्तिगत तौर पर मेरा बहुत ही दृढ़ विश्वास में गुमनाम हो कर जीने का मज़ा ही अलग है --- जहां कोई किसी को ना पहचाने --- सब अपनी मस्त में मस्त --- तो लाइफ का मज़ा ही आ जाये --- जहां पर जीवन की छोटी छोटी खुशियों उसे इस बात के लिये न बलिदान करनी पड़ें कि यार, मैं यहां खड़ा हो जाऊंगा तो लोग क्या कहेंगे--- मैं यहां खड़ा होकर कुछ खा लूंगा तो लोग क्या कहेंगे ---- कहेंगे सो कहेंगे --- यह उन की समस्या प्राचीन काल से है --- उन्होंने तो कुछ तो कहना ही है !!
चल बुल्लिया चल उत्थे चलिये,
जित्थे सारे अन्ने,
ना कोई साडी जात पछाने,
ना कोई सानूं मन्ने।

मूंगफली की बात हो रही है और कहां हम लोग मूंगफली खाते खाते गपशप करते करते उस महान पंजाबी सूफी संत बाबा बुल्ले शाह की तरफ़ निकल गये।

हां, तो मैं उस रेहड़ी वाले की बात कर रहा था --- मैंने उस की रेहड़ी के पास खड़े खड़े ऐसे ही कह दिया --- पहलां तां हुंदियां सन भट्ठीयां, हुन एह कम हुंदै रेहड़ीयों पर –( पहले तो यह काम भट्ठीयों के द्वारा होता था लेकिन अब यही काम रेहड़ीयों पर होता है ) --- मेरे पास ही खड़े एक सरदार जी ने कहा --- हुन तां न ही भट्ठीयां ही रहीयां ते ना ही भट्ठीयां वालीयां ही रहीयां --- ( अब न तो भट्ठियां ही रहीं और न ही भट्ठी वालीयां ही रहीं !!) --- मुझे भी उस समय बचपन के दिन याद आ रहे थे जब हम लोग मक्का लेकर एक भट्ठी पर जाया करते थे और उस के पास एक बोरी के टाट पर बैठ जाया करते थे --- वह हमें पांच मिनट में फारिग कर दिया करती थी --- कहां वह नायाब मक्का और कहां ये पैकेट वाले अंग्रेज़ी कार्न-फ्लेक्स !!-- आज भी मुझे जब कोई पूछता है ना कि कार्न-फ्लेक्स खाने हैं तो मेरी आधी भूख तो इस इंगलिश के नाम से ही उड़ जाती है।

यह मैं जिस मूंगफली की रेहड़ी की बात कर रहा हूं --- इन के द्वारा बहुत ही बढ़िया किस्म की मूंगफली इस्तेमाल की जाती है – बिल्कुल साफ --- और इतनी बढ़िया महक।

लगभग छःसात साल पहले मैं जब एक नवलेखक शिविर में गया तो मुझे कुछ आइडिया नहीं था कि लेखन कैसे शुरू करना होता है --- और वहां से आने के बाद कईं साल तक मुझे लगता रहा कि यार ये लेखों के विषय तो बड़े ही सीमित से हैं --- जब मैं इन सब पर लेख लिख लूंगा तो फिर क्या करूंगा --- लेकिन पिछले दो-तीन साल से यह आभास होने लगा है कि केवल हमारा आलस्य ही हमारे आड़े आता है --- हम कलम उठाने में ही केवल सुस्ती कर जाते हैं---वरना लेखों का क्या है ---- लेखों के बीसियों विषय हमें रोज़ाना अपने इर्द-गिर्द दिखते हैं – बस इस के लिये केवल शर्त इतनी सी है कि बस केवल आंखें और कान खुले रखें और हमेशा ज़मीन से जुड़े रहें ।

अच्छा दोस्तो अब मूंगफली काफी खा ली है , थोड़ा थोड़ा खाना खा लिया जाये ----उस के बाद मूंगफली को गुड़ के साथ लेकर फिर बैठते हैं । बिल्कुल सच बताईयेगा कि इस पोस्ट के द्वारा इस सर्दी में भी आप को गर्मी का अहसास हुआ कि नहीं ---- क्या कहा…… नहीं ? ….फिर तो आप को इस मूंगफली के लिये यहां यमुनानगर ही आना होगा।

आज जब मैंने उस 19-20 साल के नवयुवक को देखा ....

तो मुझे पहले तो यही लगा कि वह मेरे पास किसी दांतों की तकलीफ़ के आया है लेकिन जैसे ही मुझे पता लगा कि वह हैपेटाइटिस-बी के लिये कुछ टैस्टों के लिये साइन करवाने के आया है तो मुझे बहुत बुरा लगा। दोस्तो, बुरा इसलिये लगा क्योंकि इस नवयुवक का व्यक्तित्व किसी अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी से किसी भी तरह से कम नहीं था ---मुझे लगता है कि उस का कद छः फुट तो होगा ही और सामान्य स्वास्थ्य भी बहुत बढ़िया था।

मेरे पास वह युवक इसलिये आया था क्योंकि कुछ एडवांस टैस्ट जो हमारे हास्पीटल में नहीं होते, उन टैस्टों को हमारा हास्पीटल बाहर प्राइवेट लैब से करवाने की व्यवस्था करता है और उस के लिये उस की स्लिप पर चिकित्सा अधीक्षक( जो काम मैं आजकल देख रहा हूं) – की स्वीकृति के लिये वह मेरे पास आया था।

अभी मैं उस की टैस्टों वाली स्लिप पढ़ पाता जिसे फिज़िशियन ने लिखा हुआ था, इतने में ही उस का पिता कहने लगा कि इसे देखो, क्या आप को लगता है कि इसे पीलिया है ? – मैं थोड़ा चुप था – उस की बात समझने की कोशिश कर रहा था। उस लड़के ने आगे बताया कि बस कुछ समय पहले वह पंजाब गया हुआ था और वहां पर उस ने रक्त-दान किया था। और कल ही वहां से फोन आया है कि मेरे रक्त में हैपेटाइटिस-बी के विषाणु ( वायरस) पाये गये हैं।

उस लड़के एवं उस के पिता की बातचीत से यही लग रहा था कि वे समझ रहे हैं कि लड़के ने रक्त दान किया है और इसी की वजह से वह इस हैपेटाइटिस-बी की चपेट में आ गया है। ऐसा मैंने पहले भी कुछ हैपेटाइटिस-बी के मरीज़ों के मुंह से सुना था और एक-दो एच.आई.व्ही संक्रमित व्यक्तियों से भी ऐसा ही कुछ सुन रखा था।

मुझे उस लड़के के साथ पूरी सहानुभूति थी --- बहुत बुरा लगता है जब हम लोग किसी इतने कम उम्र के इतने हृष्ट-पुष्ट इंसान को मिलते हैं जिसे अभी अभी पता चला हो कि उसे हैपेटाइटिस-बी की इंफैक्शन है। इसलिये मैंने उसे एवं उस के पिता को 10 मिनट लगा कर बहुत अच्छी तरह से इस के बारे में बता दिया।

दरअसल होता यूं है कि जब भी कोई रक्त दान शिविर लगता है तो रक्त-दाताओं का पता एवं फोन नंबर इत्यादि नोट किया जाता है – रक्त को इक्ट्ठा करने के बाद उस की यह जांच की जाती है कि उस में एचआईव्ही, हैपेटाइटिस बी, हैपेटाइटिस सी एवं मलेरिया जैसे रोगों के कीटाणु तो नहीं है ---अगर किसी रक्त दाता के रक्त में इस तरह का कोई संक्रमण पाया जाता है तो उस रक्त को नष्ट कर दिया जाता है और उस रक्त दाता को सूचित कर दिया जाता है । इस नौजवान वाले केस में भी यही हुआ था।

जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि लड़का बहुत ही स्वस्थ था --- उस का पिता पहले ही से मेरे को जानता था । उस के जो टैस्ट अभी करवाने के लिये फ़िज़िशियन ने लिखा था उस के बारे में मैंने उन्हें समझाया कि ये टैस्ट केवल इसलिये हैं कि लड़के के रक्त की पूरी तरह से जांच की जा सके --- हैपेटाइटिस बी की दोबारा जांच होगी, हैपेटाइटिस सी की भी होगी --- क्योंकि इन दोनों संक्रमणों के फैलने का रूट एक जैसा ही है। ये दोनों ही या तो संक्रमित सिरिंजों एवं सूईंयों के द्वारा, या संक्रमित रक्त के द्वारा अथवा संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध स्थापित करने से ही फैलते हैं।

मुझे उस नवयुवक से ये सब बातें करने के बाद यह नहीं लगा कि वह ऐसे किसी कारण के बारे में कोई ठीक से हिस्ट्री दे पाया है --- न तो उसे कभी रक्त ही चढ़ा था, न ही उसे कभी इंजैक्शन वगैरा लगने का ध्यान था और यौन-संबंधों के बारे में मैंने उस की उम्र को देखते हुये कुछ ज़्यादा प्रोब करना ठीक नहीं समझा ।

मैंने उसे समझाया कि ऐसा नहीं कि यह जो तकलीफ़ हो गई है यह लाइलाज है --- अभी तुम्हारे सारे टैस्ट हो रहे हैं—उस के बाद यह निर्णय होगा कि तुम्हारा क्या इलाज चलेगा—कोई चिंता की बात नहीं है।

सोचता हूं कि हमारे लिये भी किसी मरीज़ को बिल्कुल एक तकिया कलाम की ही तरह यह कह देना कितना आसान होता है कि यार, चिंता न करो – सब ठीक होगा। शायद कईं बार मरीज़ की मनोस्थिति को भांपते हुये ये शब्द कहने भी बहुत ज़रूरी होते हैं।

यह पाठकों की सूचना के लिये बताना चाहता हूं कि हमारे देश की लगभग दो फीसदी जनसंख्या इस हैपेटाइटिस-बी के वायरस की कैरियर है – इसे हम लोग कहते हैं एसिंपटोमैटिक कैरियर्ज़ – अर्थात् ऐसे लोग जिन के रक्त में हैपेटाइटिस बी की वायरस तो है लेकिन उन्हें इस से संबंधित बीमारी अभी नहीं है ---- और अभी ही क्यों, कईं बार तो कुछ लोग बिना किसी तकलीफ़ के सारी उम्र केवल कैरियर ( संवाहक) ही रहते हैं --- उन्हें तो इस से कोई तकलीफ़ होती नहीं लेकिन बेहद दुःखद बात यह है कि वे इस वायरस को किसी भी दूसरे व्यक्ति को देने में पूरे सक्षम होते हैं – चाहे तो अपने रक्त के द्वारा, अपनी लार के द्वारा अथवा यौन-संबंधों के द्वारा।

उस युवक के बारे में बहुत बुरा इसलिये भी लगा कि अभी उस की इतनी छोटी उम्र है ---अभी पूरी उम्र पड़ी है उस के आगे --- अगर वह एसिंपटोमैटिक कैरियर भी है ( asymptomatic carrier of Hepatitis B virus) – अगर टैस्टों से इस बात का पता चला – तो भी उपरोक्त कारणों की वजह से एक बहुत बड़ी परेशानी तो हो गई ---सारी उम्र खौफ़ के साये में जीना पड़ेगा --- I really felt very very bad for this youngman – He was the picture of perfect health !!

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इन नौजवान में हैपेटाइटिस-बी का वॉयरस आया कहां से --- अब इस के बारे में क्या कहा जाये ---जब तक किसी से उचित हिस्ट्री प्राप्त नहीं होती, कुछ कहा नहीं जा सकता – इतना तो तय है कि आती तो वॉयरस रक्त के अथवा किसी अन्य बॉडी फ्लूयड़ ( body fluilds ) के माध्यम से ही ।

हैपेटाइटिस बी से बचाव के टीके का ध्यान आ रहा है --- अकसर लोग इसे कितना लाइटली लेते हैं --- लेकिन देखिये जिस किसी को भी यह इंफैक्शन हो जाती है उस की तो सारी ज़िंदगी ही बदल जाती है।

उस नवयुवक की लंबी स्वस्थ ज़िंदगी के लिये मेरी ढ़ेरों शुभकामनायें एवं आशीष !!