Monday, September 5, 2016

'टीचर जी, मेरे बच्चे को यह सब जरूर सिखाना'


आज कल मैं इस ब्लॉग पर चिट्ठी-पत्री की ही बातें कर रहा हूं...

कुछ चिट्ठीयां ऐसी भी होती थीं जिन्हें हम लोग सहेज कर रख लिया करते थे ..बार बार पढ़ने के लिए...


इस बात का ध्यान मुझे कल आया जब मुझे ध्यान आया कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ने एक चिट्ठी अपने बेटे के स्कूल प्रिंसीपल को लिखी थी। लिंकन ने इसमें वे तमाम बातें लिखी थीं, जो वह जिंदगी में बेटे को सिखाना और समझाना चाहते थे...

चलिए, आज अध्यापक दिवस के अवसर पर उस चिट्ठी को ही फिर से पढ़ लेते हैं...ऊबने का तो प्रश्न ही नहीं....

सम्माननीय महोदय,  
मैं जानता हूं  कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी। पर मैं चाहता हूं कि आप उसे यह बताएं कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा दिल होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूं कि आप उसे सिखाएं कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है।  
ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूं। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया १ रुपया, सड़क पर मिलने वाले ५ रुपये के नोट से ज़्यादा कीमती होता है।  
आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाए। साथ ही यह भी कि खुलकर हंसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएंगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्छी बात नहीं है. यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।  
आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहना ही, पर साथ में उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मंडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहना। मैं समझता हूं कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।  
मैं मानता हूं कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।  
आप उसे बताना मल भूलना कि उदासी को किस तरह से खुशी में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताना कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल महसूस न करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।  
ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएं, उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी।  
आपका
अब्राहम लिंकन 
चिट्ठीयां हमारे पेरेन्ट्स ने भी लिखीं हमारे टीचर्ज़ को और हम ने भी लिखीं अपने बच्चों के अध्यापकों को ...कुछ याद आ रहा है। पहले आज सुबह की सैर की कुछ तस्वीरें ....

अद्भुत प्रकृति का वरदान 
प्रकृति के रहस्य की बंद पोटली ..
अगले पेड़ में यह अद्भुत पिटारा खुला मिला ..
डीएवी स्कूल अमृतसर के दिनों की बात है ..छठी कक्षा में था ...गणित विशेषकर बीजगणित समझ नहीं आ रहा था...कुछ दिन बीत गए...एक दिन घर आ कर मैं रोने लगा ...अपने पिता जी को कारण बताया...उन्होंने उर्दू में एक चिट्ठी लिखी और मुझे उसे मास्टर जी को देने को कहा...उस दिन से ही मास्टर साहब ने मुझे ट्यूशन के लिए रोकना शुरू कर दिया...कुछ ही दिनों में मुझे सब कुछ समझ में आने लगा...कुछ महीने के लिए वह ट्यूशन चलती रही ...लेकिन एक बात मैंने जो आज से ४० साल पहले सीखी कि मेरे पिता जी हर महीने मेरी ट्यूशन की फीस एक सफेद लिफ़ाफे में मुझे देते थे मास्टर साहब को देने के लिए....मुझे यह बहुत अच्छा लगता था ...वरना खुले में उन्हें २५ रूपये महीना थमाना ऐसे लगता जैसे वह दुकानदार हैं और मैं ग्राहक ...छोटी छोटी बातें हमें छू जाती हैं कईं बार ...और मैंने भी इस प्रैक्टिस को अपने बच्चों की ट्यूशन में भी बरकरार रखा ...हर बार मासिक फीस आदर सहित एक सफेद लिफ़ाफे में रख कर ही भिजवाई....

लेकिन कुछ कुछ मस्ती भी की बच्चों के साथ...मेरी जिन बेवकूफियों पर वे आज भी ठहाका लगाते हैं कि देखो, बापू ने इंगलिश वाले क्लास टीचर को क्या लिख दिया था ...

तो हुआ यूं कि बड़ा बेटा सातवीं आठवीं कक्षा में था, फिरोज़ुपर पंजाब की बात है ...इंगलिश पढ़ाने वाले टीचर संधू साहब उस के क्लास टीचर भी थे....मुझे उसदिन क्या मजाक सूझा....बेटे ने होमवर्क नहीं किया था...और संधू साहब चांटे वांटे लगा दिया करते थे ...स्कूल जाने से पहले मुझे कहता है कि कुछ लिख दो पापा, बचा लो...मैंने कहा ..लाओ, यार, डायरी लाओ....लेकिन हिंदी में लिखूंगा...हंसने लगा ...कहने लगा ...चाहे, कैसे भी लिखो, लिख दो बस।

मैंने उस में लिख दिया.....
"महोदय, तबीयत ठीक न होने की वजह से बच्चा गृह-कार्य करने में असमर्थ रहा। कृपा क्षमा कीजिए।"

 उस दिन स्कूल से आया तो बहुत खुश...बच गया था पिटने से ...सारा घटनाक्रम सुना रहा था कि पापा, होमवर्क चैक करते समय मैंने आप का लिखा नोट संधू साहब के आगे कर दिया....जिसे पढ़ कर संधू साहब भी हंस पड़े और मुझे कहने लगा ...चल, सीट पर जा !

 पुरानी बातें हो गईं, नईं बात यह है कि जब कभी मैं शिक्षा मंत्री बन जाऊंगा चॉक एंड डस्टर जैसी फिल्में शिक्षक दिवस पर सभी स्कूलों में इस दिन दिखाए जाने का आदेश दिया करूंगा....बेहतरीन फिल्में...शिक्षकों की व्यक्तिगत पीड़ा और उन की दैनिक चुनौतियों को ब्यां करती इस तरह की फिल्में इन महान् अध्यापकों के प्रति हमारी सुप्त या उनींदी संवेदनाओं को झकझोड़ने का काम करती हैं निःसंदेह ....छोड़िए, शिक्षकों पर और प्रवचनबाजी सुनने और झाड़ने को अब यहीं छोडि़ेए...अगर अभी तक इस फिल्म को नही ं देखा तो आज कम से कम यही शुभ काम कर लीजिए..