Friday, July 25, 2014

भसीड़ा, कमलगट्टा और कमल का फूल एक साथ.....

आज शाम को लखनऊ के आलमबाग एरिया में ऐसे ही आवारागर्दी कर रहा था तो सड़क किनारे एक भाई कुछ साग सब्जियां बेच रहा था।

जमीन पर सजी उस की दुकान की तरफ़ मेरा ध्यान खिंचने का कारण था कोलडोडे....जी हां, पंजाबी में कमल के फल को कोलडोडे ही कहते हैं। इधर यूपी में इधर क्या कहते हैं, मुझे पता नहीं था। मेरे पूछने पर उस ने बताया कि इसे कमलगट्टा कहते हैं। यह बाज़ार में बहुत कम बिकता दिखाई देता है, शायद मैं भी वर्षों बाद इस के दर्शन कर रहा था।

कमलगट्टा -इस के बीजों का छिलका उतार कर खाया जाता है
मेरी उस कमलगट्टे में रूचि देखते हुए एक बुज़ुर्ग महानुभाव की भी रूचि उस कमलगट्टे में पैदा हो गई। वह भी पूछने लगे कि यह क्या है, मैंने बताया ..फिर पूछने लगे कि इस की सब्जी बनती है क्या, इसे कैसे खाते हैं। मैंने उस कमलगट्टे का एक बीज निकाला, उस का छिलका उतार कर उन्हें खाने के लिए पेश किया तो वे लगे दूर दूर हटने......मैंने कहा, नहीं, यह तो आपको खाना ही होगा, झिझकते हुए उन्होंने खा लिया.. और उन्हें उस का स्वाद अच्छा लगा। और उन्होंने भी दस रूपये के तीन कमलगट्टे तुरंत खरीद लिए। जाते समय शुक्रिया अदा करने लगे कि मेरी वजह से उन्होंने आज ज़िंदगी में पहली बार इसे चखा।

हम केवल स्कूल-कालेज में ही तो नहीं सीखते, हर जगह सीखते रहते हैं, शर्त केवल इतनी है कि सीखने की अभिलाषा होनी चाहिए। हम भी राह चलते फुटपाथों से ही बहुत कुछ सीखते रहते हैं......जाने अनजाने यह प्रक्रिया सदैव चलती रहती है।

मुझे यह जो कमलगट्टा है खाने में बहुत अच्छा लगता है। इस के बीज का छिलका उतार कर खाया जाता है। लेकिन अभी गूगल सर्च किया तो पता चला कि यह तंत्र-वंत्र के लिए भी प्रयोग किया जाता है। बहरहाल, वह अपना विषय कभी भी नहीं रहा।
कमलगट्टा, भसीड़ा और कमल का फूल 
कमलगट्टे के साथ ही कमल-ककड़ी पड़ी हुई थी..... मेरी श्रीमति इसे कमल-ककड़ी कहती हैं, शायह हरियाणा में जहां पर हम पहले रहते थे, वहां यह इसी नाम से पहचानी जाती है। पंजाब में इसे 'भें' कहा जाता है।   दुकानदार वाले भैया ने बताया कि इसे यूपी में भसीड़ा कहते हैं। गूगल पर अभी देखा तो पता चला कि इस का साग वाग भी बनता है. लेकिन अकसर हम लोग तो इस की और आलू की सब्जी बना कर खाते हैं।

दुकानदार ने भी यह  बता दिया था कि कमल की जड़ जो पानी मे होती है जिसे भसीड़ा कहते हैं इस का साग बनता है। और जो भाग फूल के रूप में पानी के ऊपर होता है वही बाद में कमलगट्टे का रूप ले लेता है।

अब उत्सुकता यह थी कि कमलगट्टा हो गया, भसीड़ा भी हो गया लेकिन यह कमल के फूल यहां इस दुकान में क्या कर रहे हैं, मैंने पूछा कि क्या इस की भी सब्जी बनती है, इतने में एक और ग्राहक बीच में बोल पड़ा कि आज कल पूजा चल रही है, इसे पूजा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। और उसी ने बताया कि ये जो आप कमलगट्टे की बात कर रहे थे, मखाने भी इसी से तैयार होते हैं।

कितना अद्भुत देश है, उम्र पचास के पार हो गई, लेकिन अभी तक सब्जियों की पहचान कर रहे हैं, उन महानुभाव की बात करें जिन्होंने सत्तर की उम्र के आस पास होने के बावजूद कमलगट्टे का स्वाद नहीं चखा।

यह तो हो गई मेरी पीढ़ी की बात, मेरी से थोड़ी पिछली की भी बात, लेकिन आज की युवा पीढ़ी का क्या, उन्हें कैसे पता चलेगा कि कितनी कितनी अद्भुत चीज़ें हैं जिन का हमें अभी पता ही नहीं है, ये छोटी छोटी दुकान चलाने वाले दो पैसे कमाने के लिए कितनी मेहनत कर के इन्हें हमारे तक पहुंचाते हैं। शायद यह जानने पर हम इन लोगों की मेहनत की कुछ कद्र कर सकें।

मेरे पूछने पर क्या किसी भी तलाब से इसे उखाड़ लिया जाता है तो वह भैया बताने लगा कि नांव में नदी तालाब के अंदर जाना पड़ता है इस के लिए।

आते आते मुझे अपने स्कूल के हिंदी के मास्टर साब की वे पंक्तियां याद आ गईं.....जब भी वे विज्ञान के लाभ हानियां पर निबंध लिखवाते तो ये ज़रूर लिखवाते कि अपने आप में कुछ भी भला या बुरा नहीं होता....

नज़र का भेद ही सब भला बुरा दिखता है,
कोई कमल का फूल देखता है कीचड़ में,
किसी को चांद में भी दाग नज़र आता है। 

बॉडी-शॉडी बनाना भी एक खतरनाक जुनून हो सकता है..

कितनी बार बातें चलती रहती हैं कि किस तरह से जिम जाने वाले लड़के तरह तरह के पावडर लेकर अपने डोले शोले बना कर अपनी बॉडी शॉडी से लोगों को इंप्रेस करने लगते हैं। जानते लगभग सब हैं कि इस तरह के प्रोडक्टस का क्या नुकसान है, लेकिन फिर भी जिस से पूछो उस का यही जवाब होता है कि बस एक या दो डिब्बे ही खाए थे, वे भी जिम से ही खरीद कर। लेकिन एक दो डिब्बे खा लेना भी किसी खतरे से कम नहीं है।

यह जो आजकल हम लोग छः पैक (सिक्स पैक) और बिल्कुल मकैनिकल सी बॉडी देखने लगे हैं, ऐसा पहले क्यों नहीं होता था...बचपन से ही हम देखते आ रहे हैं कि पहलवान कुश्तियां लड़ते थे, दंगलों में हिस्सा लेते थे, वज़न भी उठाते थे....लेकिन फिर भी उन के शरीर इस तरह के नज़र नहीं आते थे जितना आज के किसी युवा की बॉडी एक-दो महीने ही जिम जा कर दिखने लगती है।

यह सब उन हारमोन्ज़ और स्टीरॉयड आदि का प्रभाव है जो कि इतनी जल्दी मांसपेशियां इतनी फूल सी जाती हैं...
पहले भी इस विषय पर कईं बार लिख चुका हूं लेकिन आज फिर अचानक ध्यान आ गया कि किस तरह से अमेरिकी युवा इस तरह के हारमोन्ज़ एवं स्टीरायड के चक्कर में पड़ कर अपनी सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं।

और इस रिपोर्ट में इसी बात की परेशानी ब्यां की गई है कि इस तरह के प्रोडक्ट्स की बिक्री पर कोई रोक ही नहीं है,  लोग ये सब चीज़ें ऑनलाईन भी खरीदने लगे हैं।

 Dangerous use of Growth Hormone Surges Among U.S Teens

अगर अमेरिका जैसे देश में इतनी बेबसी है कि इन सब चीज़ों की बिक्री पर अंकुश रखने के लिए तो आप यह तो कल्पना भलीभांति कर ही सकते हैं कि यहां भारत जैसे देश में कैसी विकट समस्या होगी। यहां तो वैसे ही कुछ भी बिकने लगता है।

दरअसल ये दवाईयां हैं जो कि एक विशेषज्ञ डाक्टर ही लिखते हैं ..किन्हें लिखते हैं ..डाक्टर साहब ये दवाईयां.......ये दवाईयां दी जाती हैं एड्स के रोगियों को जिन की मांसपेशियां कमज़ोर पड़नी शुरू हो जाती हैं,  दिमागी के कुछ ट्यूमर ऐसे हैं..पिचूटरी ट्यूमर जिन में इन दवाईयों को देना पड़ता है और हां, कुछ बच्चे जो बचपन से ही कम विकास का शिकार होते हैं उन्हें भी ये दवाईयां एक विशेषज्ञ पूरी छानबीन कर के देता है.........ये वो बच्चे हरगिज़ नहीं होते जिन की ग्रोथ जंक-फूड खाने से प्रभावित होती है ...ऐसे बच्चों को भी ये दवाईयां नहीं दी जातीं, यह एक बहुत गहरा वैज्ञानिक मुद्दा है जिसे विशेषज्ञ डाक्टर ही जानते हैं. और यही बात जानने के लिए वे बीस वर्ष की डाक्टरी पढ़ाई करते हैं....... एमबीबीएस फिर एम डी ..फिर कुछ आगे डी एम ..ऐंडोक्राईनॉलॉजी में......फिर अपने अनुभव के आधार पर ये निर्णय लेते हैं अपनी निगरानी में किसे ये दवाईयां देनी हैं, किसे नहीं।

यह कैसे हो सकता है कि आपके जिम का मालिक जो कुछ हफ़्ते में एक दो फैशनेबुल कोर्स कर के आ जाए और लगे बांटने यह ज्ञान......... नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, अपने जिम की शानोशौकत पर, दिखावे पर और जिम मालिक की स्लैंग या ट्रेंडी इंगलिश पर मत जाइए........बस, कसरत करिए और अपने आप को तंदरूस्त रखिए........क्योंकि आज रात ही रात में लखपति नहीं, करोड़पति बनने की एक दौड़ सी लगी हुई है।

कुछ डाक्टर भी स्पोर्ट्स मैडीसिन के विशेषज्ञ होते हैं, हो सके तो मैडीकल कालेज या अन्य सरकारी संस्थानों से इस तरह के प्रोडक्ट्स के बारे में चर्चा की जा सकती है। 

एच पी वी (HPV) टीकाकरण के बारे में बात स्पष्ट होनी चाहिए

आज भी एक न्यूज़-रिपोर्ट में दिखा कि अमेरिका में किस तरह से तरूणावस्था में एचपीवी वैक्सीन कम लोगों को लगाये जाने पर चिंता प्रकट हो रही है। इस न्यूज़-रिपोर्ट का लिंक यहां दिए दे रहा हूं..

Safe and effective vaccine that prevents cancer continues to be underutilized

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि केवल ५७ प्रतिशत युवतियां जो तरूणावस्था में हैं और ३५ प्रतिशत तरूण युवक ही ऐसे हैं जिन्होंने एक या अधिक खुराकें इस वैक्सीन की ली हैं।

मुझे भी बड़ी हैरानी हुई ये आंकड़े देख के.....पहली बात तो वहां के आंकड़ों में कुछ संदेह नहीं है..... लेकिन इतने युवकों युवतियां को यह इंजैक्शन लगना शुरू हो चुका है, यह एक सुखद सूचना थी।

अभी भी हमारे देश में इस इंजैक्शन के बारे में स्थिति कोई साफ़ है नहीं। इतने वर्ष हो गये इस पर चर्चा ही हो रही है। मुझे याद है मैंने ३-४ वर्ष पहले एक महिला रोग विशेषज्ञ से पूछा था कि  इस वैक्सीन के बारे में क्या रिस्पांस है...ह्यूमन पैपीलोमा वॉयरस संक्रमण के संदर्भ में--- तो उस ने झट से कह तो दिया था......यह समस्या बाहर देशों की ही है।

लेकिन मैं उस के जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ। कईं बार मीडिया में इतने वर्षों से दिखता रहता है कि युवतियों पर इस वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल चल रहे हैं। फिर कुछ आने लगा कि क्लीनिक ट्रायल इस तरह से नहीं किये जाने चाहिए। जो भी है, अभी तक स्थिति कुछ भी स्पष्ट है नहीं।

अभी कुछ ही सप्ताह पहले एक मंत्रालय ने कुछ महिला रोग विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित की ताकि वे इस तरह के इंजैक्शन के बारे में मैडीकल लिटरेचर का गहन अध्ययन कर के इस तरह के टीकाकरण के बारे में अपनी राय कायम कर सकें। पता नहीं क्या हुआ उस कमेटी का।

मुझे ऐसा लगता है कि इस तरह की अलग अलग कमेटियां बनाने से कहीं ज़्यादा बेहतर होगा कि इंडियल काउंसिल ऑफ मैडीकल रिसर्च संस्था जैसा शीर्ष संस्थान देश के चुन हुए संस्थानों से एवं देश के जाने माने विशेषज्ञों की एक समिति का गठन करे ताकि वे अपनी ठोस सिफारिशें तैयार कर सकें जिन्हें बिना किसी संदेह के लागू किया जा सके।

बहुत बार कईं टीकों के बारे में आता रहता है कि कुछ टीके ऐसे हैं जो लोग अफोर्ड कर सकते हैं वे अपने खर्च पर लगवा लें, लेकिन इस तरह की टीके के बारे में मेरा विचार यही है कि अगर विशेषज्ञों का समूह यह तय करे कि इस तरह का टीकाकरण देश के युवकों-युवतियों का भी होना चाहिए तो फिर इसे कैसे भी राष्ट्रीय टीकाकरण पालिसी में ही शामिल कर लिया जाए ताकि सारे युवा वर्ग को इस का लाभ मिल सके।

सब से पहले तो यही ज़रूरी है कि इस टीके के बारे में स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट होनी चाहिए.....पता नहीं इतना समय क्यों लग रहा है। और इस में इंडियन काउंसिल ऑफ मैडीकल रिसर्च, एम्स, पीजीआई जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों की विशेष भूमिका रहेगी। 

गल्तियां करने से नहीं, दोहराने से परहेज़ करें...

एक बार एक इंगलिश की कहावत कहीं पढ़ी थी कि गल्तियां करने से नहीं डरें, जितनी मरजी करते जाएं, होता है जब हम काम करते हैं तो गल्तियां तो होती ही हैं, लेकिन बस ध्यान यही होना चाहिए की एक ही गलती फिर से रिपीट न होने पाए। बस एक कोशिश रहनी चाहिए, ऐसी है।

हम लोग भी आए दिन गल्तियां करते ही हैं, जैसे कि सफ़र के दौरान खाना खा के बीमार होने की गलती, लेकिन फिर भी कुछ गल्तियां करने से शायद हम अपने आप को रोक नहीं पाते। हमें पता है कि बाज़ार का खाना मेरे सेहत के लिए ठीक नहीं है, लेकिन फिर भी मजबूरी वश (मरता क्या न करता वाली बात) कभी कभी खाना पड़ता है, न चाहते हुए भी, और फिर बीमार होने के लिए तैयार रहना ही पड़ता है।

हर गलती से हम लोग कुछ न कुछ सीखते जाते हैं। कुछ दिन पहले हमने बंबई से लखनऊ रेलगाड़ी से वापिस लौटना था, वैसे तो बढ़िया गाड़ीयां हैं इस रूट पर... पुष्पक एक्सप्रैस जैसी.. जो २३-२४ घंटे लेती हैं। वहां से चलने का और यहां लखनऊ में पहुंचने का टाइम भी सुविधाजनक है।

जब मैं रिज़र्वेशन करवाने गया.. तो देखा कि बाकी गाड़ीयों में तो वेटिंग लिस्ट थी, और एक होलीडे स्पेशल गाड़ी थी जिसमें समय ज़्यादा लगता है, लंबे रूट से, मथुरा से होती हुई, भारत दर्शन करवाती हुई लखनऊ पहुंचती है और ३२-३३ घंटे लगते हैं...यानि कि सामान्य गाड़ी से १० घंटे ज्यादा.......चूंकि रिज़र्वेशन मिल रही थी, ले तो ली....लेकिन उस गाड़ी से इतना लंबा सफ़र करना बहुत कठिन लगा।

इस सफ़र से यही सीखा कि आगे से सफ़र न करना मंजूर है, लेकिन इस तरह के इतने बड़े लंबे रूट से यात्रा करना बड़ा टेढ़ा काम लगा। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है .....मैं तो शायद इस से एक सबक ले चुका हूं......लेकिन अनुभव तो तभी सफल होगा जब इस तरह की गल्ती को कभी दोहराया न जाए।

एक गलती और.....कल मुझे दिल्ली जाना था। चार बजे बाद दोपहर किसी के साथ मीटिंग थी। सोचा सुबह एक गाड़ी पकड़ कर चलूंगा और दोपहर २ बजे के करीब वहां पहुंच जाऊंगा। लेकिन पुष्पक एक्सप्रैस सुबह ५.२५ पकड़ने के लिए घर से सुबह पौने पांच बजे चला ...और गाड़ी दिल्ली पहुंचते पहुंचते २ घंटे लेट हो गई और मैं चार बजे नई दिल्ली स्टेशन से पहले शिवाजी ब्रिज पर ही उतर गया और वहां से आटो पकड़ कर अपनी मीटिंग वाली जगह पर पहुंच गया।

तो दूसरी गलती जो मैंने व्यक्तिगत तौर पर की कि दिल्ली जाने के लिए सुबह की गाड़ी पकड़ी.......इस तरह की गाड़ी की यात्रा सुबह के समय इतनी बोरिंग होती है, इस का अंदाज़ा कोई भी लगा सकता है। इसलिए कल ही यह निर्णय लिया कि सामान्तयः सुबह की गाड़ी में इतना लंबा सफ़र नहीं करूंगा चाहे उस के लिए कितना भी नुकसान हो जाए।
देखता हूं इन दोनों गलतियों को दोहराने में कितना समय बच पाता हूं।

वैसे एक गलती जो मैंने पिछले कितने ही वर्षों से नहीं दोहराई ...वह यह है कि मैं सफ़र के दौरान चाय नहीं पीता, वह चाय मेरे हलक से नीचे ही नहीं उतरती। शायद पिछले कुछ सालों में एक दो घूंट भर लिये हों, वह भी सिरदर्द से बचने के लिए ...वरना इस तरह की चाय से तो मेरी तो तौबा। 

17 साल के लड़के के 232 दांत

आज अभी बीबीसी की साइट पर इस खबर पर नज़र पड़ी कि बंबई में डाक्टरों ने एक १७ साल के लड़के के मुंह से २३२ दांत निकाले।

मैंने भी इस तरह की खबर पहली बार ही देखी है। यह लड़का किसी गांव में रहता था, एक महीने पहले उसे जबड़े में बहुत ज़्यादा दर्द हुआ। उस के पिता उसे इस डर से बंबई लेकर आ गये कि कहीं कैंसर ही न हो।

इस खबर के बारे में आप अधिक जानकारी इस लिंक पर क्लिक कर के बीबीसी की साइट पर देख सकते हैं। अभी भी लड़के के मुंह में २८ दांत बचे हैं।

India Doctors remove 232 teeth from boy's mouth

यहां यह बताना ज़रूरी होगा कि यह सब एक ट्यूमर की वजह से हुआ.....लेकिन यह ट्यूमर बिनाईन होता है, अब बिनाईन को कैसे बताऊं.....बस आप यही जान लें कि इस तरह की ट्यूमर खतरनाक नहीं होता, यह शरीर के दूसरे अंगों में फैलता नहीं है, और इस से सामान्यतः जान भी नहीं जाती। लेकिन लड़के की तो २३२ दांत उखड़वाने के बाद जान में जान आई होगी।

ईश्वर सब को सेहतमंद रखे।