रविवार, 11 सितंबर 2016

डेंगू के बारे में ज़रूरी बातें ...


कुछ समय पहले हमारी CMS मैडम ने किंज जार्ज मैडीकल यूनिवर्सिटी के सौजन्य से डेंगू के बारे में एक महत्वपूर्ण जानकारी भेजी है व्हाट्सएप पर ...मुझे यह जानकारी बहुत उपयोगी लगी तो मैंने सोचा कि इस का हिंदी अनुवाद कर के अपने ब्लॉग पर शेयर करता हूं...फिर लगा,  उसमें समय लग जायेगा...इस पोस्ट को तो जस का तस ही शेयर करते हैं, और यह कंटैंट हिंदी में भी पाठकों तक पहुंचे उस का भी कुछ उपाय करते हैं...

आप इसे पढ़ लीजिए, जितनी बात समझ में आए ठीक है, परेशान मत होइए...लेकिन इस में जो अहम् बातें हैं वे तो आप समझ भी जाएंगे ..कुछ कुछ बातें चिकित्सकों के लिए हैं...

सच में प्लेटलेट्स की कमी तो एक ऐसी बात हो गई है कि लोग सुबह-शाम टहलते हुए इस तरह की बाते ंकरने लगे हैं..मेरे प्लेटलेट्स इतने हैं तो उस के इतने...अब इस तरह की भ्रांतियां होती हैं तो  CMS मैडम वाली इस पोस्ट जैसी विश्वसनीय जानकारी तो बहुत कम जगहों से मिलती है ..लेकिन इन मौकों का फायदा उठाने वालों और लोगों के खौफ़ को भुनाने वालों का तांता लग जाता है ...

अभी मैं मैडम की यह पोस्ट देख रहा था तो मुझे याद आया कि मैंने डीडी न्यूज़ के टोटल हैल्थ प्रोग्राम में भी कुछ एम्स और दिल्ली के आरएमएल अस्पताल के वरिष्ठ प्रोफैसरों को भी इस पर चर्चा करते सुना था ..कुछ दिन पहले ...बहुत बढ़िया कार्यक्रम था...प्लेटलेट्स की कमी जैसी भ्रांतियां का और अफतातफरी के बारे में चर्चा कर रहे थे...

मैं अकसर इस प्रोग्राम की प्रशंसा किया करता हूं ...और एक बढ़िया बात यह कि ये लोग उस प्रोग्राम को यू-ट्यूब चैनल पर भी अपलोड कर देते हैं...मैंने ढूंढने की कोशिश की .. उस दिन वाला एपीसोड तो नहीं मिला .. लेकिन आज का एपिसोड डेंगू चिकनगुनिया पर ही मिल गया ...यह प्रोग्राम रविवार के दिन सुबह डीडी न्यूज़ पर प्रसारित किया जाता है ..

अच्छा, यह जो आप इंगलिश में नीचे देख रहे हैं, यह तो सीएमएस मैडम ने शेयर किया है ...और इसी बात को सप्लीमेंट करने के लिए मैं यू-ट्यूब का आज का टोटल हेल्थ एपीसोड भी एम्बेड किये दे रहा हूं...अगर कुछ बातें इंगलिश वाली आपके सिर के ऊपर से निकल भी गईं तो गम नहीं, आप नीचे एम्बेडेड वीडियो को देख कर बिल्कुल सटीक जानकारी देश के नामचीन अनुभवी चिकित्सकों के वार्तालाप से कर सकते हैं ...मुझे यह पोस्ट करने की इतनी जल्दी है कि मैंने भी इस वीडियो को अभी तक नहीं देखा, लेकिन अभी देखूंगा...आप भी ज़रूर देखिएगा...



एक बात और याद आ गई ...आज सुबह हमारे सत्संग भवन में साप्ताहिक सत्संग कि लिस्ट के साथ साथ यह नोटिस भी लगा हुआ था...जहां तक मेरा ज्ञान है इस तरह की कोई दवाईयां नहीं हैं ...इसलिए इस तरह की बातों में न आएं...एक बात है, मेरी भी न मानिए, आप अपने मैडीकल स्पेशलिस्ट या फैमली डाक्टर से चर्चा ज़रूर करिए...इस तरह के किसी भी क्लेम की प्रामाणिकता का पता लगाने के लिए....कुछ दिन पहले हम लोगों के सत्संग ग्रुप में भी किसी ने लिख भेजा था कि डेंगू से बचने के लिए फलां फलां दवाई ले लीजिए...वहां तो मैंने तुरंत लिख दिया था कि इस तरह की सूचना आगे मत शेयर करिए... प्रशिक्षित अनुभवी चिकित्सक से परामर्श करना ही होगा...वरना वही बात ..नीम हकीम खतराए जान!

Platelet deficiency is not the cause of death in people suffering from Dengue

According to International guidelines, unless a patient’s platelet count is below 10,000, and there is spontaneous, active bleeding, no platelet transfusion is required. The outbreak of dengue in the City and Hospital beds are full and families are seen running around in search of platelets for transfusion. However what most people do not realize is that the first line of treatment for dengue is not platelet transfusion. It, in fact, does more harm than good if used in a patient whose counts are over 10,000.

The primary cause of death in patients suffering from dengue is capillary leakage, which causes blood deficiency in the intravascular compartment, leading to multi-organ failure. At the first instance of plasma leakage from the intravascular compartment to the extravascular compartment, fluid replacement amounting to 20 ml per kg body weight per hour must be administered. This must be continued till the difference between the upper and lower blood pressure is over 40 mmHg, or the patient passes adequate urine. This is all that is required to treat the patient. Giving unnecessary platelet transfusion can make the patient more unwell.

“While treating dengue patients, physicians should remember the ‘Formula of 20' i.e. rise in pulse by more than 20; fall of BP by more than 20; difference between lower and upper BP of less than 20 and presence of more than 20 hemorrhagic spots on the arm after a tourniquet test suggest a high-risk situation and the person needs immediate medical attention.”

Dengue fever is a painful mosquito-borne disease. It is caused by any one of four types of dengue virus, which is transmitted by the bite of an infected female Aedes aegypti mosquito. Common symptoms of dengue include high fever, runny nose, a mild skin rash, cough, and pain behind the eyes and in the joints. However, some people may develop a red and white patchy skin rash followed by loss of appetite, nausea, vomiting, etc. Patients suffering from dengue should seek medical advice, rest and drink plenty of fluids. Paracetamol can be taken to bring down fever and reduce joint pains. However, aspirin or ibuprofen should not be taken since they can increase the risk of bleeding.

The risk of complications is in less than 1% of dengue cases and, if warning signals are known to the public, all deaths from dengue can be avoided.

DENGUE NS1-Best test is NS1
Cannot be false +ve
Is + from day 1 to 7 ideally.
If on day 1 is -ve, repeat it next day.
Always ask for ELISA based NS1 tests as card tests are misleading.

Value of IgG & IgM dengue-
In a pt with reduced platelets and looking "sick" on day 3 or 4 of illness, a very high titre of IgG with borderline rise in IgM signifies secondary dengue. These pts are more prone to complications.
In primary dengue IgG becomes + at end of 7 days, while IgM is + after day 4.

Immature Platelet fraction/IPF
A very useful test in Dengue for pts with thrombocytopenia.
If IPF in such a pt is > 10%, despite a pl count of 20, 000 he is out of danger & platelets will rise in 24 hrs
If its 6%, repeat the same next day. Now if IPF has increased to 8% his platelets will certainly increase within 48 hrs.
If its less then 5%, then his bone marrow will not respond for 3-4 days & may be a likely candidate for pl transfusion.
Better to do an IPF even with borderline low platelet count.

A low Mean Platelet volume or MPV means platelets are functionally inefficient and such patients need more attention.**

डूबो या मरो, लेकिन घर खरीदने वालों का पैसा लौटाओ

दो तीन दिन पहले मैं कुछ घंटों के लिए दिल्ली में था...कईं दिन से अखबार नहीं देखी थी, अखबार खरीदी और मैट्रो में बैठ कर जैसे ही पढ़ने के लिए पहले पन्ने पर नज़र टिकी तो मेरा तो दिन बन गया...

सुप्रीम कोर्ट के इतने बढ़िया बढ़िया फैसला आ रहे हैं ..आम आदमी के हितों की रक्षा के लिए...

नोएडा के एक बिल्डर को फटकार लगाई सुप्रीम कोर्ट ने कि तुम्हारी हालत कैसी भी है, हमें कुछ लेना देना नहीं उस से ...बस, तुम डूबो या मरो, लेकिन मकान खरीदने वालों का पैसा वापिस करो..

लोग कहते हैं कि ज्यूडिशियरी ज़्यादा हस्तक्षेप करने लगी है .. लेकिन मेरा मानना यह है कि अगर देश की सर्वोच्च स्तर पर देश की न्यायपालिका इतनी सचेत न हो तो रसूखदार लोग छोटे छोटे बंदों को तो पैरों तले रोंदना शुरू कर दें..

कितना मुश्किल होता है कोई घर खरीदना..हम दोनों जॉब में हैं...एक मेट्रो में एक ठीक ठाक फ्लैट लेना चाहते हैं..(घर नहीं, फ्लैट) ..लेकिन कीमत करोड़ों में है...इतना काला होना चाहिए, इतना सफेद होना चाहिए..हमें नहीं आता यह सब कुछ करना...ऐसे में मैं बहुत बार सोचता हूं कि अगर हमारे स्तर पर यह हाल है तो जो लोग अपने लिए एक छोटे-मोटे आशियाने का जुगाड़ कर लेते हैं ..उन की सच में बड़ी हिम्मत है ....अगर किसी शातिर बिल्डर रूपी अजगर से वे बच पाएं तो ....

सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों की भरपूर प्रशंसा की जानी चाहिए...


अधिकांश लोग तो एक आशियाने की उम्मीद में मर-खप जाते हैं.. इसी छोटी सी हसरत को अपने मन में लिए हुए!


सुप्रीम कोर्ट जैसी शीर्ष संस्थाओं के हस्तक्षेप करने के बावजूद भी बहुत सी अड़चने हैं जमीनी स्तर पर ..लालफीताशाही की मार .. जाति पाति के भयंकर समीकरण...(इस के बारे में बात करना पाप है!) ...अब क्या क्या कहें, कहते हुए अच्छा भी नहीं लगता लेकिन अब चुप्पी भी डस लेगी ऐसा लगने लगा है ...

मुझे अभी ध्यान आ रहा है एक विभाग का ..सुप्रीम कोर्ट ने साफ साफ कहा कि तबादलों के लिए पालिसी बनाओ, दिशा-निर्देश जारी करो ...और उस का पालन करिए...तबादला पालिसी भी बन गई ... लेकिन उस का अनुपालन तो बाबू लोगों ने करना है ...अब कौन कोर्ट कचहरी में बार बार जा कर उस के दरवाजे खटखटाए कि यह नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा...कोर्ट कचहरी में बार बार जाना भी कौन सा आसान है, पैसा लगता है, समय की बरबादी होती है ..और फिर वही तारीख पर तारीख ...और अगर फैसला किसी के हक में आ भी जाए तो अपील ..उस के बाद फिर अपील..

बहुत सी जगह तो बस ऐसे ही आंखों में धूल झोंकी जा रही है .. फ्लैट खरीदते हुए, पेशगी देते हुए लोग डरते हैं..निर्माणाधीन फ्लैट के बारे में तो हम लोग सोच भी नहीं सकते ..हां, रेडी-टू-मूव-इन के बारे में सोचा जा सकता है ...

अभी सामने उस दिन वाली अखबार आ गई तो मन की बातें लिखनी की इच्छा हो गई, और कुछ नहीं...यहां लखनऊ में सब कुशल मंगल है ..आशा है आप भी मजे में होंगे .. बस, यहां अखबारें ही नहीं आ रही...आठ दिन होने को हैं...पता नहीं इतना कौन सा बड़ा लफड़ा है, अगर हाकर्स कहते हैं कि उन की कमीशन बढ़ा दो, बढ़ा देनी चाहिए....क्यों बात को इतना तूल दिया जा रहा है, समझ नहीं आ रहा।

धीर साहब का धीर ..

"अच्छा, डाक्टर साहब, सातवां पे कमीशन लागू हो गया है, आप की तनख्वाह कितने पर फिक्स हुई है?"...कल दिल्ली से धीर साहब का फोन आया तो उन्होंने यह जानकारी जुटानी चाहिए...कोई भी कुछ पूछे तो उस का जवाब तो ठीक देना बनता ही है न, और फिर धीर साहब जैसा इंसान तो हमारे मन की तह से भी कुछ पूछे तो भी अच्छे से उन की उत्सुकता शांत होनी चाहिए, यह प्रश्न तो कुछ भी नहीं था..

धीरे साहब ने आगे पूछा कि अच्छा, यह भी बताओ कि आप को एरियर में  कितने मिले हैं...वह भी सैंकड़े की रकम तक तो मुझे याद थी और मैंने ठीक ठीक बता दिया...और जितनी बार मुझे वह रकम रिपीट करनी पड़ी, उस से साफ़ ज़ाहिर था कि वे उसे अपनी डॉयरी में नोट कर रहे थे..

फिर कहने लगे कि डाक्टर साहब, इस का मतलब है कि उस डाक्टर (एक बड़े से घैंट बंदे का नाम लिया उन्होंने) की तो फिक्सेशन कम हुई है .....मैंने इस बात पर भी तुरंत प्रकाश डाल दिया कि उस की फिक्सेशन कम क्यों लगती होगी!

फिर मैंने उनसे अपनी मां की भी बात करवाई .... इन दोनों ने एक दूसरे का हाल चाल लिया ..और मां को मैंने कहते सुना कि धीर साहब, आप ठीक हैं ना, चलते फिरते हैं ना ?...और फिर मां ने उन्हें बताया कि धीर साहब, मैं भी अब लाठी से ही चल पाती हूं...

बहरहाल, फिर मेरे से बात हुई ... एक अधिकारी के बारे में बताते हुए खुश हो रहे थे कि अच्छा है वह पांच साल की एक्सटेंशन मिलने से पहले ही रवाना हो गया, वरना लोगों को बड़ी परेशानी होती!

अब एक ९५ जी हां, पिच्यानवें साल के बुज़ुर्ग का पे-कमीशन की फिक्सेशन, एरियर, कुछ लोगों को एक्सटेंशन न मिल पाने पर राहत महूसस करना ..कितने अद्भुत होंगे ये बुज़ुर्ग, इसीलिए आज सुबह सवेरे आप से इन का तारुफ़ करवाने का मन हुआ...कुछ न कुछ तो हमें सिखाने के लिए हरेक के पास होता है ...

धीर साहब अभी 95 साल के आसपास होंगे ..कम नहीं, इन से मेरी मुलाकात १० साल पुरानी है ...जब मेरी जगाधरी में नई नई पोस्टिंग हुई थी...यह रिटायर कर्मचारी हैं, ज़ाहिर है इलाज के लिए आते थे तो मिलते ज़रूर थे, दांतों की मुरम्मत भी इन की चलती रही ....२००६ से इन की मुझे चिट्ठीयां आनी शुरू हो गईं ...हमेशा पोस्टकार्ड भिजवाते थे ..मुझे अच्छे से याद है कि उन्हीं दिनों मेघदूत पोस्टकार्ड चले थे, २५ पैसे वाले, यह अकसर मेघदूत पोस्टकार्ड भी भिजवाते थे .. जितनी मुझे याद आ रहा है कि कईं बार मैं भी उस का जवाब लिख भेजता था...और फिर जब मोबाइल की तूती बोलने लगी तो मैं फोन पर ही इन की चिट्ठी की पावती इन्हें भिजवा दिया करता ...फिर धीरे धीरे इन के ख़त आने लगभग बंद से हो गये...

लेकिन ये नियमित अस्पताल में आया करते थे ....किसी भी काम से आते तो मिल कर ज़रूर जाते... उन दिनों ये  ८५ साल की उम्र तो पार कर ही चुके थे ...सेहत ठीक ठाक ही थी, लेकिन इन की श्रीमति जी कैंसर से ग्रस्त थीं, वे भी महिला मोर्चा से जुड़ी हुई थीं, अकसर वे बताया करती थीं, सहज स्वभाव की महिला थीं वह भी ..

ये दोनों मियां-बीवी यमुनानगर में एक भव्य घर में रहते थे...मस्त थे ...खुश थे...धीर साहब तो बहुत से सामाजिक कामों से भी जुड़े रहे....लोगों के आंखों के फ्री-आप्रेशन करवाना, ज़रूरतमंदों में कपड़े बांटना, विधवाओं में राशन बांटना,  सिविल अस्पताल के मरीज़ों में खाना बांटना, वहां मरीज़ों में दूध पहुंचा कर आना....इन के पास करने को बहुत कुछ था...हर समय व्यस्त ... और सारा काम अपने साईकिल पर ....बहुत से समाजसेवी लोगों के साथ ये जुड़े हुए थे और सारा काम निष्काम भाव से करते थे...यह कोई कहता नहीं है, लेकिन ताड़ने वाले ताड़ जाते हैं...

धीर साहब कुछ बार घर भी आए और अपने यहां आने के लिए भी बहुत कहा करतेे थे... एक दिन गर्मी की दोपहरी में मैं बर्फी-समोसे लेने गया बाज़ार में तो इन का घर पास में ही था, वहां रुक गया... मुझे इन की दिनचर्या देख कर बहुत खुशी हुई...हालांकि उन दिनों इन की श्रीमति जी की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी लेकिन फिर इन की मेहमाननवाज़ी मन को छू गई...

हां, समोसे-बर्फी से याद आया कि ये शहर का एक चलता फिरता एन्साईक्लोपीडिया थे, कहां से समोसे, कहां से राशन और कहां से क्या मिलना है, ये हमेशा बताते रहते .. हर जगह इन का सम्मान होता था, एक बार हम लोग इन के साथ राशन लेने इन की रिक्मैंडिड दुकान पर चले गये ...लेकिन वहां की भीड़ ...अगली बार से तौबा कर ली हमने।

अपनी सेहत को ठीक रखने का हर जुगाड़ इन के पास था... सुबह उठ कर कौन कौन से पत्ते उबाल कर पीने, फिर दलिया फिर जूस, फिर हल्का खाना और सुबह व्यायाम करना , योगाभ्यास करना .. लोगों को चिट्ठीयां लिखनी, फोन करने...और परहित के किसी भी काम में मस्त रहना इन की दिनचर्या में शुमार था...


धीर साहब, अब आप के ऊपर तो मैं लिखता ही जाऊंगा... कागज़़ कम पड़ेंगे...आप का उत्साह और आप के चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली मुस्कुराहट....क्या कहने.....हां, किसी विधवा की पेंशन का कोई लफड़ा हो तो ये बैंक में उसे जा कर निपटवा देते, किसी को इलाज पर किए गये पैसे न मिल रहे हों तो ये बाबू लोगों की खिंचाई कर देते ...लेकिन प्यार से ... और अपने पैसे नहीं मिले तो इन्होंने केस भी किया ...सुनाया करते थे ... लेकिन फिर यह थक से गये और इस के बारे में बात नहीं करते थे .
पांच छः साल पहले बीवी के रुख्सत होने के बाद कुछ समय के लिए तो ये अकेले अपने घर में रहते रहे लेकिन फिर इन के बेटों और बेटी जो दिल्ली गुड़गांव में रहते हैं,  इन्हें इन की उम्र की वजह से उन्होंने अकेले रहने नहीं दिया...मकान बेच दिया गया ..शायद उन दिनों एक करोड़ के आसपास बिका था...इन्होंने दिल्ली के द्वारका में अपनी बेटी के पास ही एक फ्लैट लिया हुआ है, मस्त रहते हैं ...हमारे घर के हर सदस्य के जन्मदिन, शादी की सालगिरह....ऐसे हर दिन इन का सुबह फोन आता है ... और बहुत अच्छा लगता है ..

इन्हें यह सब याद कैसे रहता है इतना कुछ?....मैंने बताया न कि एक दिन मैं इन के यहां गया तो मैंने देखा कि इन्होंने बहुत सी डॉयरीयां लगाई हुई हैं....डायरी के हर पन्ने के ऊपर उस दिन का लेखा-जोखा लिखा कि फलां फलां दिन मेैंने क्या क्या किया, कहां कहां गया, किस का फोन आया और क्या बात हुई! और रंग बिरंगी स्याही से यह सब लिखा हुआ था....मेरी उस दिन की विज़िट भी उन्होंने दर्ज कर दी थी अपनी डॉयरी में ...सीधी सी बात है यार कि वे इस सब में व्यस्त रहते थे ...मस्त रहते थे .. कोई व्यसन नहीं, बिल्कुल.....दिल खोल कर हंसना और हंसाना ...

हां, एक बात और ...एक डॉयरी में सभी परिचितोंं के परिवार वालों के जन्मदिन, शादी की सालगिरह का ब्योरा लिखा रहता था ...मैं उस दिन देख कर दंग रह गया..हमारे विभाग में कौन कब रिटायर होने वाला है, कौन हो गया और नया कौन उस कुर्सी पर टिकेगा ...उतना रिकार्ड हमारे प्रधान कार्यालय में शायद न हो, इन के पास और इन की यादाश्त में सब दर्ज मिलेगा...इन के किसी पुराने परिचित को घैंट से कुर्सी मिल जाए तो बधाई देने वालों में इन का नंबर सब से पहला होता....किसी तरह की झिझकता की तो ऐसी की तैसी ...हरेक से सीधा वार्तालाप...

शायद यही सादगी ...यह सहजता ...आज समाज से कहीं लुप्त होती जा रही है, हम लोग हर बात को स्वार्थ के तराजू में तोलने लगे हैं ...रही बात हर बात को डॉयरी में लिखने की ... अपने अपने मन की मौज है, अगर इन्हें इस में आनंद मिलता है, तो हमारा क्या ले रहे हैं....मैं भी यही करता हूं सारा दिन, अपने अनुभव अपने ब्लॉग पर दर्ज करता रहता हूं, धीर साहब भी तो एक ब्लॉगिंग ही कर रहे हैं ...ऑफ-लाईन ही सही ...


हां, एक बात और ...इन का एक पोस्टकार्ड है मेरे पास अभी भी, ये जब द्वारका चले गये तो इन्होंने वहां से अपना पता लिखा था, मेरी स्टडी-टेबल के शीशे के नीचे ही पड़ा हुआ है .. इसे देखते ही इन की याद आ जाती है ... हां, पिछले सालों में ये अपने पोस्टकार्ड में सत्संग की तारीख और स्थान भी बताया करते थे ...एक बार हम वहां हो कर भी आये थे...

अच्छे इंसान धीर साहब, हंस कर मिलना, हंसना हंसाना, मिलना-जुलना, दुःख-सुख बांटना, किसी के काम आना....संत लोग वही नहीं होते जिन्हें उपाधियां मिलती हैं, हमारे आस पास रहने वाले ये लोग भी निःसंदेह संत ही हैं..... जियो, धीर साहब, जुग जुग जियो.... १२० साल से भी ऊपर जियो, ईश्वर आप को ऐसे ही चलता-फिरता...टनाटन रखे .. मेरी शुभकामनाएं....मैंने कल आप को कहा था कि मैं आप को चिट्ठी लिखूंगा...कल ही इस लेख की एक कापी निकाल कर आप को भिजवाता हूं और जल्दी ही आप को दिल्ली में मिलूंगा भी ज़रूर... आप जैसे महान लोग हर लिहाज़ से प्रेरणा-स्रोत हैं...

लेकिन मेरी लापरवाही की इंतहा देखिए कि मुझे इन के जन्मदिन की तारीख नहीं पता लेकिन कल यह जब फोन कर रहे थे मुझे यह कह रहे थे कि अगर कभी मेरा फोन नहीं भी मिले तो मेरी बिटिया का नंबर भी लिख कर रख लो ...और मैंने उसे भी लिख लिया..