Tuesday, December 23, 2014

ई-बुक्स आप की नींद उड़ा देती है..

आप ने नोटिस किया होगा जब रात के वक्त सोते समय हमें अपने अपने मोबाइल पर कोई मैसेज देखना या पढना पड़ता है, तो हमें कितना भारी लगता है यह सब। कम से कम मुझे तो ऐसा लगता है।

और आप कल्पना कीजिए उन लोगों की जो रात को सोने से पहले अपने गैजेट्स पर ई-बुक्स पढ़ते हैं। माना कि ई-बुक्स का क्रेज़ बढ़ रहा है, इन की नेट पर भरमार है।

Photo credit... Google images
लेकिन हमारी नींद से बढ़ कर तो कुछ नहीं। जी हां, न्यू-यार्क टाइम्स अभी एक रिपोर्ट पर नज़र पड़ी तो पता चला कि किस तरह से रात को सोते समय ई-बुक को पढ़ना हमारी नींद में खलल डालता है.. इस का वैज्ञानिक अध्ययन हुआ है कि जो लोग रात में सोते वक्त ई-बुक्स पढ़ते हैं उन को नींद देर से आती तो है ही, वे लोग उतनी गहरी नींद का आनंद भी नहीं ले पाते और सुबह उठ कर भी वे लोग अपने आप को चुस्त-दुरूस्त महसूस नहीं करते। 

एक बात और है कि हम लोग अधिकतर अब नेट भी मोबाइल पर ही चलाते हैं........ऐसे में मोबाइल पर ई-बुक्स रात के समय सोने से पहले पढ़ना कितना सिर-दुखाऊ काम होता होगा, आप के व्यक्तिगत अनुभव भी होंगे, मैं तो उस समय एक आर्टिकल तक नहीं देख पाता अपने मोबाइल पर........नींद की बात तो दूर, मेरा तो सिर ही भारी हो जाता है।

आप इस लेख को इस लिंक पर क्लिक कर के देख सकते हैं.. E-books may disrupt your sleep.

एक बात और शेयर करूं आप से.......ई-बुक्स की तो बात ही क्या, अपने स्कूल के दिनों से ही ...यह सिलसिला मेरे कालेज के दिनों तक निरंतर चला...मुझ से रात में बिल्कुल भी पढ़ा ही नहीं जाता था.....पांच मिनट में नींद आ जाया करती थी......मेरी मां मुझे अकसर जैसे ही नींद जैसी हालत में बिस्तर पर किताब पकड़े देखती तो कहा करती थीं..."उठ जा, बैठ कर पढ़, लेट कर तो नींद आ जाती है, नहीं तो अब सो जा, सुबह उठ कर पढ़ना।" लेिकन मैं भी ऐसा ढीठ प्राणी कि कभी यह बात नहीं मानी।

रात में पढ़ने की कोशिश केवल परीक्षा के दिनों में करता था.......हाथ में किताब, बिस्तर में दुबक कर....बीस बार सो जाना और बीस बार जाग जाना......पन्ना वही का वही खुला रहना....सुबह होने तक, याद या रिवाइज तो क्या होना था, लेकिन उस समय फिर से एक झपकी लेने की तमन्ना हो जाया करती थी। बस, यार ऐसे ही सिलसिला चलता रहा। आज भी एक टीस सी तो है मन में कि अगर यह आदत सुधर जाती तो कुछ बेहतर कर सकता था, लेकिन इसी का नाम ज़िंदगी है दोस्त.......काश, यह होता, काश वह होता!!......हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले!!

आज भी कौन सा सुधर गया हूं......ई-बुक्स पढ़ने की तो मैं रात में पढ़ने की कल्पना ही नहीं कर सकता, लेकिन जो दूसरी किताबें भी हैं, मैं उन्हें उठाता हूं या कभी अखबार ही उठाता हूं तो बच्चे हंसने लगते हैं......अब पापा सोने लगे हैं.....हर बार यही होता है कि मैं अपनी स्टडी से किसी बेस्ट-सेलर को भी उठा कर लाता हूं कि इसे थोड़ा तो पढूंगा लेकिन यकीन मानिए दो-चार मिनट से ज़्यादा पढ़ ही नहीं पाता...पांच मिनट के भीतर ही उसे छोड़ कर स्वपनलोक में चला जाता हूं।

रात के वक्त सोते समय यह हाल मेरा किताब पढ़ने पर ही नहीं होता, मैं अगर उस रोज़ की अखबार भी उठा लेता हूं तो मेरा यही हाल होता है......और मज़े की एक बात, यही हाल मेरा अकसर दोपहर का खाना खाने के बाद भी होता है, किताब-अखबार हाथ में लेते ही पांच मिनट से पहले नींद घेर लेती है।

ई-बुक्स वाले अध्ययन को तो आपने देख लिया, पढ़ लिया........मैंने वरसों की रिसर्च का यह नतीजा निकाला है कि बिस्तर पर लेट कर --दिन हो या रात--पढ़ाई हो ही नहीं सकती, हो सकता है आप कुछ पढ़ लें, लेकिन उस में से आप कितना स्मरण या ग्रहण कर पाते होंगे, यह आप का दिल ही जानता है.........वैसे अब मैं अपने बेटे को लेट कर पढ़ने से मना करता रहता हूं.......क्या पता वह भी मेरी तरह बरसों चलने वाली कोई लंबी रिसर्च ही कर रहा हो!!

देखिए इस समय सुबह के साढ़े चार बजे हैं और मैं ड्राईंग रूम में कुर्सी पर बैठ कर यह लिख रहा हूं.....इस मौसम में स्टडी में बैठने की इच्छा ही नहीं होती... हां, टांगों के ऊपर रजाई ज़रूर डाली हुई है।

आज के इस सुबह सुबह वाले पाठ से यही शिक्षा मिलती है कि रात के समय सोने से पहले ई-बुक्स से दूर रहेंगे तो चैन की नींद ले पाएंगे, वरना सुबह भी जम्हाईयां लेते रहेंगे। Take care!