सच में, जैसे और बहुत से दिन-त्यौहार बिना किसी आहट के गुज़र जाते हैं, आज बसंत पंचमी भी ऐसे ही निकलने वाली थी...
आज सुबह तैयार होते वक्त जब मेरे रेडियो सैट पर बसंत पंचमी की कुछ बातें चल रही थीं तो मुझे यही लग रहा था कि शायद, बसंत पंचमी आने ही वाली होगी...दो चार दिन में आती होगी....इस के आगे मैंने दिमाग नहीं लगाया...
लेकिन जैसे ही हम लोग लिफ्ट का इंतज़ार कर रहे थे तो श्रीमती जी ने अपने फोन में कुछ ऐसा देखा होगा कि उन्होंने झट से कहा ...अच्छा, तो आज बसंत पंचमी है !!
मैंने भी कहा ...अच्छा......श्रीमती जी ने आगे कहा कि यह तो संयोग ही हो गया कि मैंने आज पीली साड़ी पहनी है।
मैं यह सोच में पड़ गया कि चलिए, किसी ने बसंत पंचमी का शगुन तो किया....मैं तो उस से भी महरुम रह गया कि क्योंकि मैंने तो वही मेरी कोंडो के स्पार्किंग ज्वॉय के सिद्धांत पर चलते हुए अपने एक मनपसंद काली जैकेट पहनी हुई थी ...
खैर, चलिए....आते वक्त रास्ते में भी इस महानगरी मुंबई में रास्तों पर ऐसा कुछ न लगा जिस से बसंत रुत की आहट महसूस हो सके....सब कुछ आस पास ...पेड़-पौधे पहले ही से हरे-भरे दिखे...सब कुछ सामान्य दिनों की तरह चलता दिखा...मैंने श्रीमती जी से पूछा कि उन को बसंत का कैसे पता चला तो उन्होंने बताया कि किसी ग्रुप पर एक मैसेज आया था...
बस, रास्ते में बचपन और जवानी में अमृतसर शहर में बसंत देखे याद आते रहे ....चाहे मुझे पतंग उड़ानी कभी नहीं आई...लेकिन बसंत के दिन लोगों को पतंग बाजी करते देख कर बहुत मज़ा आता था, हम सब खूब मज़ा करते थे. छुट्टी का दिन होता था ....घर में मां पीले रंग के मीठे चावल ज़रूर बनाती और अकसर हम लोग पीले कपड़े पहनते थे....स्कूल वकूल बंद होते थे बसंत पंचमी वाले दिन....और सब से मज़ेदार बात कि जब लोग पतंगबाज़ी करते थे तो छतों पर बहुत बडे़ बड़े लाउड-स्पीकरों पर उस दौर के सुपर डुपर हिंदी फिल्मी गीतों के रिकार्ड बज रहे होते थे ...ऊंची ऊंची आवाज़ में बज रहे गीतों से जश्न सा माहौल हो जाता था ...और जहां तक मुझे याद है बसंत पंचमी वाले दिन आसमान में बदली छाई रहती थी, वैसे भी पंजाब में इन दिनों सर्दी का मौसम रुख्सती की कगार पर ही होता है ....वहां पर यह कहावत है ....आई बसंत, पाला हड़ंत.....यानि कि बसंत आते ही ठँड़ी खत्म ही समझो.....और मां हर बार जब इस कहावत को कहती तो साथ में यह भी बताना न भूलती कि पहले तो बसंत आते ही लोग बाहर आंगन में सोना शुरू कर देते थे ......चाशनी में घुली पुरानी मीठी यादें।
कल मैं यहां दादर की एक बहुत मशहूर दुकान में कुछ मिठाई खरीदने पहुंचा तो उस बड़ी सी दुकान के अंदर 15-20 लोग कतार में खड़े थे...मैं थका हुआ था और मेरा इस तरह से इंतज़ार करने का कोई मूड नहीं था. मैंने वहां से बैरंग लौटने से पहले सोचा कि थोड़ा आगे चल के देखूं तो सही ....लेकिन नहीं, मुझे जो खरीदना था, वहां दो तीन लोग ही थे ये सब लोग बूंदी का प्रसाद खरीदने के लिए खड़े थे ...मुझे अब लगता है कि शायद आज वे पूजा के लिए भी ये प्रसाद ले रहे होंगे ....
लेकिन एक बात है कल मैंने किसी मिठाई की दुकान पर प्रसाद खरीदने के लिए पहली बार इतनी लंबी कतार देखी थी ....वैसे बंबई में रहते हुए आते जाते कुछ ऐसी जगहों पर भी कतार दिख जाती है जो हैरान कर देती है ...जैसे कुछ अरसा पहले एक सार्वजनिक मुतारी के बाहर (किसी स्टेशन पर ही) -मुतारी यहां शौचालय को कहते हैं, और पंजाब में तो सीधा ही पेशाबखाना .... 😂 ..और स्टेशनों पर लिफ्ट के बाहर भी अब लोग कतार लगा लेते हैं....
खैर, आज शाम जब मैंने इंगलिश का अखबार खोला तो इच्छा हुई कि देखें बसंत पंचमी के बारे में क्या लिखा है ... कुछ नहीं मिला ...जितना भी था वेलेंटाइन-दिवस के बारे में ही था, इश्तिहार भी, फोटो भी और बातें भी और यादें भी ...कुछ ऐसा भी लिखा था कि वेलेंटाइन के दिन इस बार 1990 के दशक की फिल्में फिर से थियेटरों में लगेंगी ...दिल वाले दुल्हनिया भी इस लिस्ट में है ....लिखते लिखते मुझे तो लिंक मिल गया.....क्योंकि उस फिल्म में भी तो बसंत श्रतु के दौरान लहलहाते खेतों में एक गीत था जिसे हम लोग हज़ारों नहीं तो सैंकड़ों बार तो सुन ही चुकें हैं यकीनन...
खैर, जब मैं पुराने दौर के बसंत पंचमी के पर्व के बारे में सोचता हूं तो मुझे वे हरे-पीले सरसों के खेत भी बहुत याद आते हैं ...हमें सरसों वाले प्रैक्टीकल भी इसी महीने में बॉटनी की प्रैक्टीकल क्लास में इन्हीं दिनों करवाए जाते थे ....आते जाते खेतों में लहलहाती सरसों को देखना कितना सुखद होता था ...अच्छा, तब कैमरे इतने आम नहीं थे, नहीं तो हम लोग फोटू-वोटू के चक्कर में असली नज़ारों के रोमांच को तो मन में कैद ही न पाते....
अच्छा, एक बात और ...जब मुझे पुराने दिनों की याद इतनी तंग कर रही थी तो मुझ से रहा नहीं गया ...मैंने फोन उठाया और अपने स्कूल के एक दोस्त को (हम लोग जो स्कूल में एक साथ थे ...20-25 लड़कों का एक ग्रुप है ...डीएवी स्कूल, अमृतसर का...जो मास्टरों से एक साथ पिटते भी खूब थे) ...मैसेज किया कि आज वहां पंजाब में तो छुट्टी होगी और जो बसंत पंचमी का जश्न वहां मना रहे हो, उस की कुछ फोटो भेजो और पतंगबाजी का एक वीडियो भी भेजो....
दोस्त का जो जवाब आया ...वह यहां लिख रहा हूं......
प्रवीण, बसंत पंचमी की छुट्टी यहां भी नहीं होती...पतंगबाजी अब पुराने अमृतसर में ही देखने को मिलती है, नए रिहाइशी इलाकों में नहीं। तुम्हें पता है कि मैं तो अब सर्कुलर रोड के पास रहने लगा हूं, यार, वीडियो रिकार्डिंग के लिए यहां कुछ भी नहीं है।
चलिए, मेरा भ्रम तो टूटा कि यहां महानगर में ही बसंत पंचमी की रौनकें नहीं है, बहुत कुछ बदल गया है सभी जगह .....लेकिन एक बात है बदला नहीं है तो अपने फिल्मी किरदारों के प्रति उन के फैन्स की वफादारी ..... अभी मुंबई सेंट्रल स्टेशन के सामने से गुज़रा तो देखा कि वहां पर दिल वाले दुल्हनिया फिल्म पिछले 29 वर्षों से चल रही है और शाहरुख खां और काजोल और यश चोपड़ा के चाहने वाले अभी भी आते हैं उस फिल्म का लुत्फ़ उठाने ....शायद मार्निग शो इन्होंने इस फिल्म के लिए रिज़र्व रखा हुआ है ....
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| यह मराठा मंदिर के बाहर का आज का मंज़र है ...DDLJ का बोर्ड देख रहें हैं आप ...😎 |
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| दोस्तो,मैंने भी यह बसंती रंग की बूंदी छक के बसंत पंचमी की शगुन कर लिया ...😀 |
चलिए, बसंत पंचमी की बातें हुई ...मैंने भी एक दुकान से यह बसंती रंग की बूंदी छक कर बसंत पंचमी का पर्व मना लिया...और हां, इंगलिश के अखबार में संपादकीय पन्ने पर एक आध्यात्मिक लेख दिखा बसंत पंचमी के बारे में ...यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि कैसे हम किसी चीज़ को चाहने की बजाए उसे देने की तरफ़ अपनी प्रवृति को मोडे़ं ....बाकी तो प्रवचन टाइप ही था, जिसे पढ़ कर मेरा सिर भारी हो जाता है .....लेकिन उसमें लिखी आखिरी लाइनें यहां लिखने वाली हैं...
Goddess Saraswati reminds us to invoke our Satya Yug sanskars of Wisdom, divinity, power and unity. The yellow-colored offerings during Basant Panchami remind us that these sanskars create Golden Age, that of purity and prosperity.
एक बात और याद आ गई ...कि बसंत के बाद हम लोग अचानक देखा करते थे कि पेड़ों पर छोटे छोटे कपोल, पत्तियां फूटने लगतीं ....हम उन को कितने दिन निहारते रहते और देखते ही देखते फिर से सारा पेड़ फिर से हरा-भरा हो जाता...मज़ा आता देख कर ....नए नए हरे हरे कोमल पत्ते देख कर जिन की चमक-दमक देखते ही बनती थी ....और इस पोस्ट को बंद करते वक्त मुझे कोई ज्ञान की बातें तो याद नहीं आ रहीं, लेकिन एक गीत याद आ रहा है - Earth1947 का गीत जिसमें आमीर खान बसंत पंचमी के दिन नंदिता दास को पतंंगबाजी का सबक सिखा रहा है ...अच्छी लगी थी फिल्म ....आप भी सुनिए वह गीत ....
बसंत पंचमी की बहुत बहुत मुबारक और शुभकामनाएं.... यह पर्व आप सब की ज़िंदगी में हरियाली-खुशहाली ले कर आए...स्वस्थ रहिए, मस्त रहिए...

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