Wednesday, December 16, 2015

साईकिल से चलना एक मिशन जैसा..

अभी मैं लखनऊ की जेल रोड पर जा रहा था तो मैंने एक साईक्लिस्ट को देखा...उसने हेल्मेट पहना हुआ था और उस की साईकिल के पीछे एक बड़ी पावरफुल लाल बत्ती टिमटिमा रही थी...खूब स्पीड से चल रहा था...मुझे लगता है कि वह कोई साईक्लिस्ट होगा...जो विभिन्न इवेंट्स में भाग लेते हैं। मैंने झट से उस की फोटो ली...



आज सुबह भी मित्र अनूप शुक्ल जी ने एक बढ़िया पोस्ट शेयर की ... वे स्वयं भी साईकिल पर खूब चलते हैं और लोगों को भी प्रेरित करते हैं...उन की फेसबुक पोस्ट यहां शेयर किए दे रहा हूं...पढ़िएगा...
इसे अच्छे से पढ़ने के लिए इस फोटो पर क्लिक करिए..
रेलवे के उच्च अधिकारी हैं ..ज्ञान दत्त पांडेय जी... रिटायर होने के बाद अपने गांव में सेटल हो गये हैं...साईकिल खूब चलाते हैं..दो तीन महीनों में ही वजन भी कम हो गया है और चेहरे पर १००० वॉट की मुस्कान भी अकसर नज़र आने लगी है...

मैं भी कभी कभी सुबह साईकिल चलाने निकल जाता हूं...वह सारा दिन अच्छा निकल जाता है...लेिकन बहुत बहुत बार आलस की वजह से ...नहीं निकल पाता।

सच में प्रदूषण का स्तर इतना भयानक है कि भीड़ के समय बाज़ार जाने में डर लगने लगा है.. सिर दुःख जाता है... मुझे तो जल्दी ही असर हो जाता है... मैं देख रहा हूं कि आजकल यहां लखनऊ के भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में निकलना दूभर हो गया है... भयंकर प्रदूषण...प्रदूषण का स्तर जानने के लिए विज्ञान को पढ़ने की ज़रूरत नहीं ...हमें अपने आप ही पता चल जाता है कि हम लोग हवा के नाम पर अंदर क्या खींच रहे हैं!

कोर्ट कचहरीयां हस्तक्षेप कर रही हैं....केजरीवाल सरकार ने भी कुछ प्रोग्राम तो बनाया है ...ऑड-इवन वाला ...बहुत अच्छा है...देखते हैं...

 आज का टाइम्स ऑफ इंडिया ...17 दिसंबर 2015
कल रात मैं टीवी पर देख रहा था कि डीज़ल गाड़ियों के पंजीकरण पर दिल्ली में रोक लगी रहेगी....किसी चेनल पर देख रहा था किसी दिल्ली वाले ग्राहक की व्यथा... उसने अपनी भांजी की शादी में देने के लिए एक डीज़ल वाली गाड़ी बुक करवाई थी...लेकिन अब उसे गाडी की डिलिवरी नहीं मिलेगी..वह अपना दर्द कुछ इस तरह से ब्यां कर रहा था कि या तो अब उसे पेट्रोल वाली गाड़ी को चुनना होगा...वरना दिल्ली से बाहर डीज़ल वाली गाड़ी खरीद लूंगा, वहीं रजिस्टर करवाऊंगा ..लेकिन चलेगी तो फिर भी वह गाड़ी दिल्ली की सड़कों पर ही ना।

आप भी समझ रहे हैं कि समस्या कितनी विषम है।

मुझे कल एक टीवी के प्रोग्राम में सेंटर फॉऱ एन्वायरमेंट साईंस की सुनीता नारायण से पता चला कि एक डीज़ल गाड़ी से होने वाला प्रदूषण सात पेट्रोल वाली गाड़ियों के बराबर होता है....सच में मुझे यह पहले नहीं पता था..मैं भी पता नहीं कैसी साईंस पढ़ा हूं कि मुझे अपने लिए डीजल गाड़ी खरीदते समय इस बात का ज़रा भी पता नहीं था...मुझे तो बस इतना बताया गया था कि यह लंबे सफर के लिए सस्ती पड़ती है....हम कितने महत्वपूर्ण फैसले ऐसे ही हो जाते हैं!

मैं कईं बार सोचता हूं कि साईकिल पर ही ड्यूटी के लिए निकल जाया करूं...सोच रहा हूं कि अगर ऐसा सोचता हूं तो फिर ऐसा कर क्यों नहीं पाता हूं....चलिए आज इस के कारण ढूंढता हूं...
  • आफिस के समय सड़कों पर ट्रैफिक बहुत ज़्यादा हो जाता है... बिना डिवाईडर वाली रोड पर उस समय साईकिल चलाने की हिम्मत नहीं है मेरे में। 
  • आफिस जाते समय टिपटाप हो कर साईकिल पर निकलना थोड़ा हास्यास्पद लगता है मुझे अपने आप में...विशेषकर जब सूट-बूट डाला हो ...तो ऐसे में साईकिल उठाने की हिम्मत ही नहीं होती....लिखते हुए मुझे यही लग रहा है कि यह शायद मेरी झिझक है...जो भी है, लेकिन है तो। मुझे ऐसे लगता है ...मैं ऐसा भी सोचता हूं कि जिन लोगों की अखबारों में फोटो आती है ...बड़े बड़े अधिकारियों की साईकिल पर जाते हुए एक ग्रुप में...मुझे लगता है कि वे बस अखबार में फोटो के लिए ही होती हैं....
  • मैं चाहे जितना भी कहूं कि मुझे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन फिर भी मैं इतना तो कांशियस हूं ही कि मेरा अधीनस्थ स्टाफ मुझे साईकिल पर आते जाते देखेगा तो वह पता नहीं क्या फील करेंगे, लेकिन मैं असहज महसूस करूंगा...
लेकिन फिर भी लगता है कि अगर वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग साईकिल पर चलेंगे तो अधीनस्थ कर्मचारियों को भी साईकिल पर चलने के लिए इस से बढ़िया प्रेरणा नहीं हो सकती।

हम सब झिझक से ही सिमटे-सहमे जा रहे हैं...बहुत से लोगों से मिलता हूं जो कहते हैं कि उन्हें साईकिल उठाना ही गवारा नहीं है....इसे वे अपनी बेइज्जती समझते हैं, जो मैं समझा हूं।

साईकिल चलाने के बारे में यहां लखनऊ में कुछ न कुछ गतिविधियां होती ही रहती हैं...लखनऊ हेरीटेज वॉक... साईक्लिस्टों के लिए अलग से पथ --साईकिल लेन....कुछ न कुछ चलता ही रहता है... और छावनी एरिया में तो मैं कुछ फौजियों को अकसर हेल्मेट डाल कर साईकिल चलाते हुए भी देखता ही हूं।

इस पोस्ट को यही लिख कर बंद करूं कि कुछ अरसा पहले तो हम लोग कहते थे कि साईकिल चलाइए...अपना वजन कम करिए, सेहतमंद रहिए.... ईंधन को बचाए...ऊर्जा संरक्षण कीजिए....प्रदूषण कम करिए......लेकिन दोस्तो अब तो हम इस स्थिति में पहुंच चुके हैं....कि बड़ी बड़ी महान् बातें की हमें करने की ज़रूरत नहीं, हमें अब एक्शन की ज़रूरत है.....जीने के लिए....सांस लेने के हवा तो चाहिए.......कब तक हम लोग विषैली गैसों के मिश्रण में सांस ले कर अपनी सेहत को खराब करते रहेंगे....अब एक्शन चाहिए। साईकिल चलाने को आइए एक मिशन के रूप में अपना लें और पर्यावरण को बचा लें, वरना देर तो पहले ही बहुत हो चुकी है। 

मैं भी देखता हूं कि कब तक मेरी झिझक और मेरी बहानेबाजी मुझे अधिक से अधिक साईकिल पर चलने से रोक पाती है!

 मैं जब भी साईकिल चलाने जैसे विषय पर लिखता हूं तो मुझे मेरे बचपन के ज़माने का यह गीत ही बार बार याद आता है....हमारे बचपन के दिनों में इस तरह से लोग कईं कईं दिन तक निरंतर साईकिल चलाने के करतब भी दिखाया करते थे...हम अकसर उन्हें देखने जाया करते थे...बिल्कुल इसी तरह के मंजरों के सत्तर के दशक में हम गवाह रह चुके हैं...