Monday, December 24, 2007

जब रेडियो के मासूम से संसार में टू-इन वन ने धावा बोल दिया......

सीधी सादी रेडियो की दुनिया में भी टू-इन वन का धावा....
ज़िंदगी बहुत खुशनुमा उर्दू सर्विस के सहारे तैर रही थी, तब हम भी स्कूली छात्र थे। कभी कभी विविध भारती सुनने का जश्न भी हो ही जाता था-- विशेषकर रात के सन्नाटों के दौरान। आज बहुत समय बाद ध्यान आ रहा है कि स्कूल में भी क्रिकेट टैस्टों के दौरान अपने बहुत से साथी एक छोटा सा ट्रांसज़िस्टर ले कर आने का जोखिम उठा लिया करते थे- जोखिम इसलिए कि मास्टर जी की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर होती थी कि उस दिन उन का मूड कैसा था। लेकिन अपने दोस्त भी खिलाड़ी थे- वो भी इस जोखिम को कम कुछ इस प्रकार कर लेते थे कि आधी छुट्टी के समय ही उस करिश्माई मशीन को निकालते थे या फिर दो पीरियड़ों के बीच का जो अंतराल होता था जब तक मास्टर साहिब की क्लास में एंट्री नहीं हो जाती थी। मेरे एक दोस्त का चेहरा आज मेरी आंखों के सामने घूम रहा है जो इतनी शिद्दत के साथ उस को कान के पास रख कर घुमाता रहता था कि किसी तरह उस के साथ साथ उस को घेरे खड़े गैंग के और छात्रों को सब कुछ स्पष्ट सा सुन जाए कि मदन लाल कैसा खेल रहा है, या फिर बिशन सिंह बेदी ने दूसरी टीम को कैसे धो डाला। आज कल बच्चे स्कूल में या ट्यूशनों में महंगे महंगे मोबाइल फोन ले जा कर भी वह रोमांच हासिल नहीं कर पाते होंगे, जो हम लोग एक छोटे से ट्रांजिस्टर से कर लिया करते थे।
यह सब उन दिनों की बातें हैं जब शोले फिल्म का बोलबाला सारे हिंदोस्तान में छाया हुया था --मोहल्ले में मुंडन हो ,चाहे शगुन की रस्म हो, सिप्पी साहब की इस अनूठी देन के सुपरहिट गाने और रोटी कपड़ा मकान के गीत बडे बडे लाउड स्पीकरों से बजना इन समारोहों का हिस्सा ही बन चुका था --- और हमें यही इंतजार रहता था कि अब मोहल्ले में अगली शादी किस के कहां कब होनी है। कईं बार यह भी सोचता हूं कि दोस्तो क्या मेरी जिंदगी ही हिंदी फिल्मों से इतनी गुथी हुई है कि जब भी अपने अतीत की कोई भी बात याद करता हूं तो उस से भी पहले उस दौर की फिल्मों का ध्यान आ ही जाता है। ओह, मैं फिस से अपनी बात से थोड़ा डेविएट हो गया---प्लीज़ क्षमा करें।
दोस्तो, उन दिनों यानि 1976 के आस पास दिल्ली अपनी बुआ के यहां जाने का अवसर मिला- वहां पर एक अजूबा देख लिया। मेरी बुआ की लड़की अकसर एकांत में बैठ कर एक मशीन पर शोले के डायलाग और गीत बार बार सुना करती थी---मुझे अच्छी तरह याद है कि उस मशीन को सुन कर मज़ा आ जाता था, तब यह भी पता लगा कि इस को टेप-रिकार्डर कहते हैं। इतना भी अच्छी तरह से याद है कि वह हमें अपने पास एक शर्त पर बैठने देती थीं कि हम बिल्कुल शोर न करेंगे--- बीच बीच में हमारी वो रीटा दीदी अपने मुंह पर उंगली ऱख कर चुप रहने का इशारा करती ही रहती थीं। यह भी हमारी समय में आ गया था कि इस मशीन में एक टेप डालनी पड़ती है। बस, साथियो, उस टेप-रिकार्डर से अपना नाता दो-चार दिन का ही था जो वापिस अपने घर अमृतसर आने के बाद टूट गया। और वापिस वही उर्दू सर्विस का फरमाइशी प्रोग्राम और हम...।
कुछ समय बाद जब कालेज की हवा लगनी शुरू हुई तो बम्बई ( जी हां, तब वह अच्छा खासा बम्बई ही हुया करता था) में अपने बड़े भाई के पास जाने का मौका मिला----- उधर तो फिल्मी गीत सुबह ही से शुरू हो जाते थे- और उन दिनों विदेशों टेपरिकार्डरों का बड़ा क्रेज़ था। उन के यहां भी सोनी का एक छोटा सा टू-इन-वन था, जिस का नाम तब पहली बार सुना था। सारा दिन उस टू-इन-वन के साथ चिपके रहना अच्छा लगता था। उन्होंने ने मुझे बहुत कहा कि तू इसे ले जा, मैं दूसरा ले लूंगा। लेकिन मैं बस न-न ही करता रहा। बस, वही छोटी छोटी खुशियां, और छोटी छोटी ज़रूरतें। दोस्तो, ठीक तो नहीं लगता ,लेकिन उस दौर के बच्चों में लगता है एक बात बड़ी जबरदस्त थी कि उन्हें इस बात का पूरा ज्ञान होता था कि कौन सी चीज़ उन के पेरेन्टस की रीच में है, कौन सी नहीं है। इसलिए वे किसी भी चीज़ के लिए मचलना शुरू नहीं कर देते थे। इस बात को देखने का दूसरा ढंग यह भी है कि आज कल बच्चों में अपने आस पास से इतना पियर-प्रेशर है कि अपने पापा के साथ जब किसी फिल्म की सीडी खरीदने जाते हैं तो कोई दो-अढ़ाई हज़ार का एमपी4 पसंद आने पर उसे खरीदने का मन बनाने में दो-मिनट भी नहीं लगाते-----एक बात यह भी तो है न कि उन्हें पता है कि मां-बाप ये सब लग्ज़रीज़ अफोर्ड कर सकते हैं।
1980 के गर्मी के मौसम में मेरे बड़े भैया अमृतसर आए हुए थे- उन को मेरा टेप-रिकार्डर सुनने का शौक पता था,सो उन्होंने ने मुझे एक दिन 1500 रूपये देकर कहा कि जो तेरे मन को अच्छा लगे वो टू-इन वन खरीद लाना। कालेज से छुट्टी होने के बाद, दोस्तों, मैं अमृतसर के हाल बाजार में पहुंच गया सर्वे करने अपनी साइकिल पर---बस उस दिन मेरे लिए भी वही बात थी---आज मैं ऊपर, आसमां नीचे,.................सो, दुर्ग्याना मंदिर के बाहर एक बिजली की दुकान से वैस्टन का एक टु-इन वन मैंने भी खरीद लिया और बेहद खुशी से झूमता हुया उस टूइनवन के डिब्बे को जैसे तैसे साइकिल के कैरियर पर रख घर पहुंचा। दोस्तों, जितनी खुशी मुझे उस दिन हुई शायद उतनी तो मुझे अपनी पहली कार खरीदने पर भी न हुी होगी। क्या करूं--- आप से क्या छिपाना, सब कुछ साफ साफ कहूंगा तो ही ठीक है, नही तो मेरा ही सिर दुखेगा। तब हमारे घर में पड़े बुश के रेडियो ने बैक सीट ले ली थी -- वह भी अब थोड़ा बुजुर्ग हो चला था। खैर, मेरे मनोरंजन की दुनिया का एक नया अध्याय उस टू-इन वन ने शुरू कर दिया। जब भी पढ़ता तो वह मेरा साथी मेरे पास होता । आस-पड़ोस के लड़कों में भी इस की वजह से अच्छी धाक हो गई । लेकिन मेरी दिली इच्छा यही होती थी, कि देखो जो मर्जी, लेकर प्लीज़ इसे छुएं मत। कुछ महीनों बाद 1980 की अगस्त में टैक्सला का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी भी ले लिया --जी हां, वही बिलकुल आप के जैसे वाला---बड़ी सी लकड़ी की बाडी, शटर वाला और साथ में लम्बी लम्बी चार टांगो वाला।बस दोस्तो, अगले छः सात 1985-86 तक का समय इन्हीं के सहारे पास हो गया।
तब दिल्ली के पास ही रहने का अवसर मिला- तो सब से खुशी की बात वहां यह लगी कि वहां सुबह सुबह ही विविध भारती सुनने को मिलने लगा----जीहां,वह उर्दू सर्विस वाला साथी पीछे अमृतसर में ही छूट गया। शायद कभी कभी वह कैच तो हो जाता था, लेकिन वह भी धीरे धीरे पुराने दोस्तों की तरह छूट सा ही गया क्यों कि विविध भारती की चटपटी बातों और गीतों में ज्यादा मन लगने लगा।
दोस्तो, फिर कुछ दिनों में पता चला कि घर-घर में केबल लग रहे हैं जिस पर सारा दिन फिल्में दिखाया करेंगे। बहुत आश्चर्य हुया, लेकिन हम लोग ----हम लोग,खानदान, रामायण, रजनी- जैसे सीरियलों से ही मन बहलाने लगे। बाजार से किराये पर लाकर वीसीआर के साथ तीन फिल्मों की कैसेट ला कर सारा दिन चला कर देखने वाला रिवाज़ भी शुरू हो चुका था। हां,हां, हम कैसे पीछे रह जाते ---वह प्रयोग भी किया ,लेकिन बस वही झिक-झिक जो इन वीसीआर किराये पर चढ़ाने वालों से हुया करती थी कि बार बार रूकावट का कारण आप का पुराना हो चला टीवी सेट है जो आज कल चलता नहीं है। बस,दोस्तो, थोड़ी इंसल्ट सी लगती थी कि घर का सारा आंगन पड़ोस वाला से भरा हुया हो कि आज इन के घर में वीसीआर आया है और हम उन्हें एंटरटेन न कर पाएं.....और दूसरा उस केबल वाले को उस जमाने में पूरे पचास रूपये का किराया देने की टेंशन। घर आकर वीसीआर न चले, तो बिलकुल वही वाली बात......KLPD.... दोस्तो माफ कीजिएगा, मैं इस का फुल फार्म यहां बता नहीं सकता, लेकिन यह क्या आप तो पहले ही सी ज्ञानवान हैं और हंस रहे हैं। जी हां, आप हंसिए और मैं थोड़ा विश्राम ले लूं क्योंकि एक तो यह KLPD की याद आ गई है और दूसरा वीसीआर वाले से होने वाली झिकझिक से परेशान हूं। लेकिन आप क्यों परेशान हो रहे हैं, आप तो केएलपीडी की परिभाषा का ध्यान कर के हंसिए , खूब हंसिए .....अगर फुल-फार्म नहीं पता तो अपने साथियों से आज ही पूछने की ज़हमत उठाइए।
ok, friends, very good morning ...................आज हमारा बम्बई( नही, मुंबई) जाने का प्रोग्राम बना हुया है, छोटे बेटे की छुट्टियां हैं न , अपनी जन्म-भूमि के दर्शन करने के लिए पिछले कुछ अरसे से मचल रहा है। सो, फिर लगता है एक सप्ताह बाद इस मकड़जाल(वैब) के संसार में मुलाकात होगी। तब तक ...................Merry Christmas to all of you and yours......and Season's best wishes for a very very happy and healthy 2008.!!