Thursday, February 12, 2015

अपने ब्लॉग का गूगल-प्लस पेज अवश्य बनाएं

दोस्तो, आप को पता ही होगा कि आज कल गूगल हिंदी भाषा के कंटेंट को बहुत बढ़ावा दे रहा है।

इस के लिए नेट पर मौलिक हिंदी कंटेंट की बहुत आवश्यकता है। मैं समझता हूं कि हम सब लोगों को हिंदी भाषा में कुछ न कुछ कंटेंट अवश्य बनाना चाहिए।

हिंदी में लिखने की एक शुरूआती झिझक ही है, एक बार आप लिखने लगेंगे तो बहुत ही सहज अनुभव करेंगे। अब तो इतने टूल्स हैं जिन से आप को हिंदी लिखने में किसी विशेष तकनीक के ही भरोसे रहने की भी ज़रूरत नहीं है।

क्यों न आप हिंदी में एक ब्लॉग ही बना लें.....और गूगल प्लस पर अपने ब्लॉग का एक पेज अवश्य बनाएं.


मैंने भी अपने इस ब्लॉग का गूगल पेज बनाया था कुछ महीने पहले ...यह रहा इस का लिंक ... मीडिया डाक्टर गूगल प्लस...

गूगल पेज बनाने से आप के ब्लॉग की दृश्यता तो निश्चय बढ़ती ही है ....इस के साथ आप अपने पाठकों के साथ सीधे जुड़े रह सकते हैं। एक तरफ जहां इस से यूज़र एक्सपिरिएंस तो बेहतर होता ही है, आप के कंटेंट की पहुंच भी बहुत बढ़ जाती है।

मैंने भी जब से अपने ब्लॉग का गूगल पेज बनाया है और इसे अपने ब्लॉग से लिंक किया है, उस में पाठकों की निरंतर वृद्धि हो रही है... इस से आप बेहतर हिंदी कंटेंट क्रिएट करने के लिए प्रेरित होते हैं। 

एक बात जो मैंने नोटिस की है वह यह है कि मेरे इस ब्लाग पर पहले लगभग सारा ट्रैफिक गूगल सर्च ईंजन से ही आता था ..लेकिन अब इस का गूगल प्लस पेज बनाने से लगभग उतने ही पाठक गूगल-प्लस से भी आते हैं ..जिन में से अधिकतर एंड्रायड के माध्यम से ब्लॉग को देखते हैं।

पाठकों की इतनी बड़ी संख्या का श्रेय गूगल प्लस पेज को जाता है.. 
मैं आज मीडिया डाक्टर के गूगल प्लस पन्ने पर insights चैक कर रहा था.. इस का स्क्रीन-शॉट मैं यहां लगा रहा हूं...आप नोटिस करिए कि किस तरह से ब्लॉग का गूगल पेज बनाने से नियमित पाठकों की निरंतर वृद्दि हो रही है। दूसरे स्क्रीन-शॉट में आप देखिए कि विभिन्न पोस्टों के पाठकों की संख्या दैनिक बीस हज़ार के करीब है......यह सब ब्लॉग के गूगल-प्लस पेज का ही कमाल है। 


दोस्तो, हम में से हरेक के पास शेयर करने को बहुत कुछ है, हम कहने में कईं बार झिझक जाते हैं, और लिखने में तो और भी...लेकिन इस शुरूआती झिझक को दूर रखने का भी एक ही उपाय है कि आप निरंतर लिखते रहिए...बस, अपनी धुन में लगे हुए लिखते जाइए.....आप को लिखना अच्छा लग रहा है ना, महज़ इतना ही काफी है।

अपने इर्द-गिर्द नज़र दौडाइए.... इतनी एक्टिवी है.. गूगल पेज पर फोटो, वीडियो, अपना स्टेट्स शेयर करते रहिए और एक संवाद स्थापित करिए.....अपने पाठकों को एंगेज करिए। एक बात ध्यान रखने योग्य है ...निरंतरता (regular posts) बहुत ज़रूरी है, और यह हमारे भी हित में है।

गूगल सर्च इंजन अगर इतने ज़ोरों से हिंदी के कंटेंट को आगे ला रहा है तो हम सब का भी तो कर्तव्य है कि हम लोग अपने अपने क्षेत्र से जुड़ी नई नई जानकारियां अपने ब्लॉग, गूगल प्लस आदि माध्यमों पर शेयर कर के उत्कृष्ट हिंदी कंटेंट तैयार करने में मदद करें।

और नेट पर लिखने के दांव पेच जानने की तमन्ना हो तो ये लिंक्स भी देखिएगा....चार पांच साल पहले ये भी नेट लेखन के बारे में मेरे दिल से निकले हुए भाव हैं ..

इंटरनेट लेखन के दांव-पेच 
इंटरनेट लेखन के दांव-पेच- २
इंटरनेट लेखन के दांव-पेच-३
इंटरनेट लेखन के दांव-पेच-४
इंटरनेट लेखन के दांव-पेच-५ 

बढ़ती उम्र में सेहतमंद बने रहने का फंडा

Photo Credit...Google images
चलिए दोस्तो आज आप को एक ८० साल के जवान की बातें सुनाता हूं।

आज मेरी ओपीडी में एक अधेड़ उम्र के शख्स आए...५५-६० की उम्र के ही लग रहे थे... साथ में एक २० वर्ष के करीब की एक बेटी थी... उसके इलाज के लिए आये थे।

ऐसे ही बात चली तो पता चला कि वह बच्ची उन की भतीजी है..और वे तो २० साल पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। मुझे यह जानकर बेहद आश्चर्य हुआ.. क्योंकि मुझे उन की उम्र ६० के ऊपर लग ही नहीं रही थी, एकदम दुबला-पतला स्वस्थ शरीर और चेहरे पर चमक-दमक। मूल रूप से इटावा के रहने वाले हैं। इंटरमीडिएट तक शिक्षा है और कार्यालय अधीक्षक (ऑफिस सुपरिन्टेंडेंट) के पद से रिटायर हुए थे।

दो तीन लोग उस समय मेरे पास खड़े थे....उन की भतीजी की जांच करने के बाद मैंने उस शख्स से पूछ ही लिया कि यार, ज़रा आप दो मिनट हम सब के फायदे के लिए इस उम्र में भी ऐसी सेहत का राज़ बतलाइए।

मैं चाहता हूं कि उन्होंने दो तीन मिनट में जो कहा ...आप भी उसे पढ़े, समझें....विशेषकर आज की युवा पीढ़ी जिन की बॉडी-क्लॉक अस्त-व्यस्त है.. न खानेपीने का कोई ठिकाना, न सोने-जागने का, और खाने पीने में भी ज़्यादातर जंक फूड की भरमार है।

उन्होंने बताया...
"सुबह छः बजे उठ जाता हूं..टहलने जाता हूं रोजाना एक घंटा....सुबह केवल मुट्ठी भर चने, दो तीन बादाम, और किशमिश जो रात में भिगो देता हूं ...सुबह उस पानी को पीता हूं और चने-बादाम-किशमिश का खाता हूं, बस। फिर घर के काम काज में बिजी हो जाता हूं... थोड़ा अखवार-वार देख लेता हूं... टीवी देखता हूं लेकिन बहुत कम... केवल आस्था चैनल और खबरें। 
दोपहर में दाल रोटी साग सब्जी खाता हूं .लेकिन दो रोटी से ज़्यादा कभी नहीं। फिर आराम करता हूं। देसी-घी बाबा रामदेव के यहां से ४५० रूपये किलो लाकर रोज़ाना खाने के साथ --दाल-रोटी पर लगा कर लेता हूं। दूध पीते समय उस में छुवारे उबाल कर पीता हूं। 
चावल खाता तो हूं बहुत कम ..सप्ताह में एक बार। मीठे का शौकीन इतना हूं कि बस खाने के बाद थोड़ा गुड़ लेता हूं।  
दोपहर का खाना खाने के बाद आराम करता हूं... फिर शाम को टहलता हूं ..दो चपाती दाल सब्जी खाता हूं रात को ..नींद पूरी लेता हूं......बस यही है डाक्टर साहब अपने सेहतमंद रहने का राज़।"

मुझे उन की इतनी बढ़िया जीवनशैली के बारे में जान कर बहुत खुशी हुई।   मैंने ठहाके लगाते हुए कहा कि यार, आपने तो पूरी दोगुनी पेन्शन लेने का जुगाड़ कर रखा है(सेवानिवृत्त कर्मचारियों को १०० वर्ष की आयु होने पर उन्हें मिलने वाली पेन्शन डबल हो जाती है) ...मेरी बात सुन कर वह भी हंसने लगे ...कहने लगे आप सब का आशीर्वाद मिल गया है, यह भी हो जाएगा।

इन्होंने कभी भी बीड़ी-सिगरेट-दारू किसी तरह का नशा नहीं किया। ये कभी हस्पताल गये ही नहीं है कोई दवाई लेने.....कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। चाय केवल सर्दी के दौरान पीते हैं, गर्मी में बिल्कुल बंद।

एक दम खुशमिजाज हंसता खिलखिलाता ८० वर्षीय बुज़ुर्ग।

दोस्तो, क्या जो बातें वह बुज़ुर्ग मुझे और मेरे मार्फत आप सब को याद दिला गया...क्या वे बातें हम सब पहले ही से नहीं जानते हैं?...आप को भी लगता होगा कि इन में है क्या, लेकिन फिर भी दोस्तो, हम पता नहीं क्यों इन बातों पर चल नहीं पाते।

अगर आप उस अधेड़ रूपी बुज़ुर्ग की बातें ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि उस की हर बात में लंबी सेहतमंद ज़िंदगी का राज़ छिपा है। है कि नहीं?

काश, अगर हम इन बड़े-बुज़ुर्गों के जीवन से कुछ सीख ले सकें तो ज़िंदगी के मायने ही बदल जाएं।

एक बात का मलाल है कि मैंने उन की तस्वीर नहीं ली...आप को उन के चेहरे की तरो-ताज़गी और ज़िंदगी के प्रति उत्साह की एक झलक दिखाने के लिए। फिर कभी उन का चक्कर लगेगा तो उन के दर्शन करवा दूंगा।

वैसे तो मैं नज़र वज़र लगने में विश्वास नहीं रखता......और वैसे भी डाक्टर लोगों की नज़र भी कभी बुरी होती है क्या! यही प्रार्थना है कि ये बुज़ुर्ग शतायु हों।

वैसे मैंने कुछ अरसा पहले आप को एक दूसरे बुज़ुर्ग से भी मिलवाया था जो ७० की उम्र में ७० किलोमीटर की साईक्लिंग करते हैं......७० की उम्र में रोज़ाना ७० किलोमीटर की साईक्लिंग। 

वैसे ८० साल के एक और बुज़ुर्ग की बातें यहां भी हैं... बिना किसी तकलीफ़ के भी रक्तचाप की जांच। वैसे मैंने जब आज वाले ८० साल के बुज़ुर्ग का ब्लड-प्रेशर नापा तो बिल्कुल ठीक आया।

इन सेहतमंद बुज़ुर्गों को देख कर यही लगता है कि जो लोग ईमानदारी और सच्चाई के रास्ते पर चलते हैं, वे ऐसे ही बढ़िया जी लेते हैं। आप का क्या ख्याल है?