Friday, January 23, 2015

मज़ा तो पहले आता था फिल्म देखने का ..


आज दोपहर मैं लंच के लिए घर आया तो कॉलोनी के नोटिस बोर्ड पर इस फिल्म का पोस्टर लगा देखा...मुझे एक दम से लगा कि आज कल तो पता ही नहीं चलता कि नईं फिल्में कब आईं और कब उतर गईं।

फिल्में देखने का जो मज़ा हम लोगों ने बचपन और युवावस्था में ले लिया... वह सोच कर ही मजा आ जाता है।
पहले फिल्में देखने के लिए कितने कितने दिन पहले मंसूबे बनते थे....फिर कहीं जा कर प्रोग्राम बनता था..अधिकतर यह छुट्टी का दिन ही हुआ करता था।

कौन सी फिल्म देखनी है यह दोस्तो, पड़ोसियों और रिश्तेदारों की फीडबैक पर निर्भर किया करता था अकसर।

मुझे अच्छे से याद है मेरी मौसी जब भी कोई फिल्म देखती थी तो अपने पोस्टकार्ड में उस का छोटा मोटा रिव्यू ज़रूर लिखा करती थी..उन के रिव्यू के आधार पर हमने घरौंदा, गोलमाल और मासूम जैसी फिल्में देखीं......और फिर जब हम लोग मिला करते तो उस पर चर्चा हुआ करती।

याद आ रहा है कि मेरी बड़ी बहन मेरे चाचा के यहां छुट्टियों के दिनों में रहने गई थी..वहां से जो उनका अंतर्देशीय पत्र आया उस में लिखा था कि हम सब लोगों ने अमिताभ बच्चन की ज़मीर फिल्म देखी है, बहुत अच्छी है, आप भी देख लेना।

एक बात और...जब कोई रिश्तेदार किसी के यहां आता था तो उसे फिल्म दिखाने लेकर जाना उस की इटिनरी में शामिल हुआ करता था। इसी चक्कर में मैंने बहुत फिल्में देखीं...मेरी मौसी शादी के बाद जब हमारे यहां आई तो हम उन्हें जुगनू फिल्म दिखाने ले गये थे...आज भी अच्छे से याद है....मैं उन दिनों सात-आठ साल का था...लेकिन यही इतंज़ार रहता था कि कब कोई रिश्तेदार रहने आए और हम लोग फिल्मों के मजे लें।

बड़ी बहन शादी के बाद जब भी आती मैं भी लपक कर रिक्शे में उन के बीच बैठ जाता और इसी सिलसिले में फकीरा, मां, नूरी देख डालीं। बहुत मज़ा आता था दोस्तो। वह रोमांच ही अलग हुआ करता था।

हम देखते थे कि कोई पारिवारिक फिल्म होती थी तो मोहल्ले की पांच सात औरतें एक साथ चल पड़ती थीं...और हम बच्चों के फिर से मजे....नानक नाम जहाज है, दो कलियां आदि फिल्मे इसी क्रम में देखने को मिल गईं।

ये दीवारी पोस्टर मुझे लखनऊ में चार दिन पहले दिखे थे...
यह कैसे मैं भूल सकता हूं कि स्कूल-कालेज आते जाते शहर के मुख्य चौराहों पर फिल्मों के इश्तिहार अच्छे से देखना-पढ़ना...और समझना भी हमारे शगल में शुमार हुआ करता था..अपनी स्कूली पाठ की तरह कितने शो और किस किस समय हैं, यह सब ठीक से पढ़ लिया करते थे...और अकसर सहपाठियों से भी इस के बारे में चर्चा तो हो ही जाती थी...और अगर कोई सहपाठी फिल्म देख कर आता तो आधी छुट्टी के समय सारी स्टोरी वह हम से शेयर किया करता।

एक बात तो पक्की है कि कोई भी फिल्म देख कर उस का नशा कम से कम एक हफ्ता तो रहा ही करता था। बिल्कुल सच कह रहा हूं। और फिर जब कभी रेडियो पर देखी हुई फिल्म का गीत बज जाता तो सारी स्टोरी फ्लैशबैक की तरह मन ही मन घूम जाती।

अब क्या क्या लिखें दोस्तो.....फिल्मों की दुनिया से जुड़ी यादों पर तो किताब लिखी जा सकती है।

वह फिल्म शुरू होने से कम से कम आधा घंटा पहले पहुंच जाने का क्रेज़-- कहीं न्यूज़-रील ही न मिस हो जाए, और इंटरवल के समय भाग कर सब से पहले वाशरूम से फारिग होने की जल्दी ...ताकि बाहर से ब्रेड-पकौड़ा, तली हुई मूंगफली या फिर समोसा और फैंटा- गोल्ड-स्पाट पहले ले लिया जाए.....यार, एक भी सीन मिस नहीं होना चाहिए....और अगली कोई दो मिनट का टाइम बच गया तो हाल के बाहर लगे ट्रेलर देख देख कर ही खुश हो जाना कि अच्छा, यह सीन हो गया, यह अभी आएगा.......सच में बहुत मजे के दिन थे।

जब हम सब कज़िन इक्ट्ठे हुआ करते तो फिल्म ज़रूर देखने जाते ....एक बार तो हमारे पास पैसे सिर्फ इतने ही थे कि हम लोग दो की बजाए एक ही रिक्शा पर लद गये....वह दिन याद आता है तो हम सब बड़े हंसते हैं, उस दिन अगर उस रिक्शा वाले की जान न भी जाती तो उस का रिक्शा तो टूट ही जाता...यह अंबाला छावनी की बात है जिस दिनों अर्पण फिल्म लगी हुई थी। पता नहीं कैसे हम में से कुछ को रहम आ गया और उस टोली के दो तीन सदस्य रिक्शा के साथ हंसी ठिठोली करते पैदल ही हो लिए और साथ में रिक्शा को पीछे से धक्का लगाते रहे....और थियेटर भी झटपट आ गया था।

अब सब कुछ है, क्रेडिट कार्ड है, जेब में भी पैसे रहते हैं, लेिकन पता नहीं इन पीवीआर आदि में फिल्म देखने का मजा नहीं आता... पुराने थियेटर अलग ही माहौल बना दिया करते थे...हर कोई अंदर ही खा पी रहा है... बेचने वाले अंदर ही घूमते रहते थे.......लेकिन अब तो पीवीआर में फिल्म देखना एक आमजन के बस की बात रही भी नहीं, पहले महंगी महंगी टिकटें ...फिर तीन चार सौ रूपये के पापकार्न और कोल्ड-ड्रिंक्स.......ऐसा लगता है कि पैसा फैंक रहे हैं ।

इस के आगे क्या लिखूं...पुराने और नये की याद में हमेशा पुराने दिन ही अच्छे लगते हैं, मैं ऐसा सोचता हूं..कुछ विचार मन में आए थे आज...आप सब से शेयर कर के अच्छा लगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति का भारत दौरा....खुशामदीद...

मुझे अभी अभी याद आया कि १९७७-७८ की बात है... मोरार जी देसाई को प्रधानमंत्री बने अभी चंद ही दिन ही हुए थे...उन्हीं दिनों हमारे सैकेंड टर्म एग्ज़ाम चल रहे थे... मोरारजी देसाई के ऊपर निबंध आ गया। हमारे हिंदी के मास्साब ने हमें यह लिखवाया नहीं था...जिसे हम लोग रट कर एग्जाम में उलट कर चैन की सांस ले लेते। मुझे पांचवी छठी कक्षा से अखबार देखने की लत लग चुकी थी.. इसलिए जो कुछ पिछले दिनों में पढ़ा था, चेप दिया उन कागज़ के पन्नों पर..बहुत खुशी हुई थी उस दिन की अखबार पढ़ने से आज पांच दस नंबर का फायदा हो गया।

आज कल भी परीक्षा के दिन हैं...बोर्ड की परीक्षा की तैयारियों ज़ोरों पर हैं। मेरा बेटा भी बोर्ड की परीक्षा देने वाला है..कुछ दिन से वह अपना काफ़ी समय राष्ट्रपति ओबामा के बारे में हर छोटी बड़ी खबर पढ़ने में बिता देता है।

दो तीन दिन पहले उसने राष्ट्रपति की स्पेशल गाड़ी और मोबाइल फोन के फीचर पढ़ने समझने में इतना समय लगाया जैसे वह किसी फिजिक्स-केमिस्ट्री के अध्याय को तैयार कर रहा था। लेकिन मैंने उसे नहीं कहा कि समय बहुत बदल गया है, अब इस तरह के गैजेट्स के अद्भुत फीचरों पर तो कोई प्रश्न-पत्र फिजिक्स-परीक्षा में आने से रहा।

सभी पेपरों की भी दाद देनी पड़ेगी कि इतनी मिन्यूट डिटेलज़ उन्होंने अखबार में दे डाली। पूरे पूरे पन्ने पर ये सब खबरें।

आज भी हिन्दुस्तान देखी तो इतनी मिन्यूट डिटेल्स......मैंने सोचा चलो यार इस के नोट्स बनाए जाएं। मैं अपने स्कूल-कॉलेज में नोट्स तैयार करने के लिए बहुत मशहूर था....सोचा कि चलो आज इस विषय पर ही नोट्स तैयार कर लिए जाएं... ताकि मुझे भी लंबे अरसे तक आभास तो रहे कि इस विज़िट की तैयारियां किस स्तर तक थी!!

इस विषय पर अगर आप मेरे नोट्स देखना चाहें तो इन तस्वीरों पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं........बेटा भी कह रहा है कि अगले तीन चार दिन तो अखबार में बस ओबामा के भारत के दौरे की ही खबरें होंगी.....इसलिए इस तरह के नोट्स सोच रहा हूं अगले तीन चार दिन भी तैयार करता रहूं... काम आएंगे!!





कल नुक्कड़ पर दिखी फिर एक मशाल...

कल शाम...लखनऊ अम्बेडकर चौराहा..कानपुर रोड़
कल लखनऊ के अंबेडर चौराहे के पास एक मशाल फिर दिखी...अच्छा लगा. मशाल यह थी आम आदमी को सूचना देने वाली... बहुत सी सूचना...इस तरह की मशालें चाहे वे नुक्कड़ नाटक के रूप में हों,  इप्टा के सरोकारों के रूप में या फिर इस तरह के उद्यम से ...इन का स्वागत होना चाहिए।

शायद एक डेढ़ साल पहले की बात है ...मैंने एक दिन लखनऊ के जीपीओ के बाहर एक रिक्शे पर बैठे आदमी को देखा जो कुछ किताबें बीस बीस रूपये में बांट रहा था...साथ में कुछ लिख रहा था....और ऐसे ही लाउड-स्पीकर पर उस किताब के फायदे बता रहा था। यह रिक्शा लखनऊ में मुझे अकसर कुछ दिनों बाद कहीं न कहीं दिख ही जाता है। 

कल जब मैंने उसी तरह की प्रचार-प्रसार देखा तो मैंने जो वीडियो बनाई उसे यहां नीचे शेयर कर रहा हूं....इस में सरकारी की विभिन्न कल्याण योजनाओं, सूचना का अधिकार, प्रताड़ित महिलाओं के लिए सूचना, ड्राईविंग लाईसेंस के लिए जानकारी, राशन कार्ड---क्या क्या लिखूं जितनी सरकारी किस्म की जानकारी एक नागरिक को चाहिए होती है, वह सब उस पतली सी बुकलेट में सरल हिंदी भाषा में उपलब्ध थी। 

बेचते वक्त यह रिक्शा में बैठा शख्स इस पर कोई हेल्पलाइन नंबर भी लिख रहा था...और यह मैंने नोटिस किया...आते जाते राहगीर रूक कर पूरी तन्मयता से सब बातें सुनते हैं...कुछ किताब को खरीद भी लेते हैं। 

मैंने भी पिछले साल खरीदी थी....लेकिन वही ओव्हर-कांफिडेंस का चक्र...मेरे जैसे को लगता है कि हमें तो सब पता ही है, हम तो सब पहले ही से जानते हैं...इसलिए इस तरह की किताब खरीद तो लेते हैं, लेिकन अगले दिन उस का अता पता नहीं होता, बस घर लाकर जिज्ञासा वश किताब के पन्ने एक बार पलट ज़रूर लेते हैं लेकिन फिर कुछ पता नहीं रहता.....मैंने भी जब कल घर आकर इस किताब को ढूंढना चाहा तो कहीं ना मिली..

पढ़े लिखे लोग सोचते हैं कि नेट पर सब कुछ पड़ा है, वहीं से देख लेंगे लेकिन कम पढ़े लिखे और उन लोगों के लिए जिस को इंटरनेट उपलब्ध नहीं है,  इस तरह की सूचना रूपी मशाल उन के जीवन तो प्रकाशमय करती ही है, निःसंदेह...

इसे लिखते लिखते मुझे हिंदी फिल्म वेलडन अब्बा का ध्यान आ गया....किस तरह से सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर के गांव वाले अपने गांव में कुआं खुदवा के ही दम लेते हैं......आम जन तक सूचना पहुंचने का ही सारा चक्कर है...अब वे दिन लद गये कि गुप-चुप कुछ भी किया जाए और उसे चटाई के नीचे सरका दिए जाए......अब सब कुछ हम जान सकते हैं ...बस आम जन को सवाल उठाने भर की ज़रूरत है.......

आग मेरे सीने में ना सही, 
तेरी सीने में ही सही, 
हो जहां भी आग 
लेकिन जलनी चाहिए...