Tuesday, November 10, 2015

श्रम करने वाले का व्यायाम भी यही...

मैं अकसर आप का तारुफ़ कुछ ऐसे सेहतमंद लोगों से करवाता रहता हूं जिन की जीवनशैली से हम सब को ..विशेषकर मुझे .. बहुत कुछ सीखने को मिलता है.


तो आज आप की मुलाकात करवाते हैं श्री पी पी सिंह जी से ...इन की आयु ६३-६४ वर्ष है...रिटायर हुए चार साल हो चुके हैं। मेरा ध्यान इन के चमकते-दमकते चेहरे की तरफ़ गया तो मैं इन से इन की जीवनशैली के बारे में पूछने से अपने आप को रोक नहीं पाया...खान पान कैसा है, व्यायाम कितना करते हैं?

इन्होंने बताया कि हमेशा से शुद्ध शाकाहारी हूं ..और जहां तक व्यायाम की बात है, श्रम ही इतना कर लेते हैं, डाक्टर साहब, कि व्यायाम की हमें ज़रूरत ही नहीं पड़ती। चाय हम कभी पीते नहीं। 

पी पी सिंह का गांव लखनऊ से ४० किलोमीटर की दूरी पर है...वहां ये अपनी पत्नी के साथ रहते हैं...लखनऊ में छोटा भाई है ..मां भी वहीं रहती हैं जिन की उम्र १०० के पार है...१५ दिन बीत जाने पर हमें देखने के लिए व्याकुल हो जाती हैं, फोन कर देती हैं कि आओ, आ कर मिल जाओ। मैंने पूछा कि वह गांव में नहीं रहतीं?....बताने लगे कि गांव में चिकित्सा सुविधा नहीं, एमबीबीएस डाक्टर है नहीं, यहां मां को कुछ भी चिकित्सीय मदद चाहिए होती है तो तुरंत मिल जाती है। 

इन्होंने अगले दो तीन मिनट में झट से अपनी जीवनशैली के बारे में बता दिया....गांव के जिस घर में रहते हैं वह एक बीघा में है....खूब खुला है...सब्जी-फल-फूल खूब लगा रखे हैं...

डाक्टर साहब, मुझे यही शौक है, मेरे समय इन फूलों के साथ ही बीत जाता है....इन के साथ ही बतियाते हैं...साग-सब्जी इतनी लग जाती है कि कभी बाहर से खरीदनी ही नहीं पड़ी। 

आगे कहने लगे - "दो बेटे दो बेटियां पढ़े लिखे हैं...काम धंधे पर लगे हुए हैं...सुखी हैं...अब इंटरनेट से हमें पानी तो दे नहीं सकते ..इसलिए हम अपने आप में मस्त रहते हैं।"

" सुनने वाले को अजीब लगता होगा लेकिन सच यह है कि गर्मी हो या सर्दी मैं सुबह चार बजे उठ जाता हूं...दो िगलास पानी पीता हूं ..घर की साफ़-सफाई में लग जाता हूं...पेड़-पौधों की सेवा में लग जाता हूं... इस सब से फ़ारिग हो कर दलिया -मीठा या नमकीन लेता हूं....ग्यारह बजे खाना खा लेता हूं...उस के बाद एक घंटे के लिए खाट पर लेट जाता हूं ..बीस मिनट के लिए झपकी लग जाती है, फिर तरोताज़ा हो कर ऐसे ही टीवी पर खबरें देख लेता हूं...रेडियो सुन लेता हूं."

मैंने पूछा--"केबल लगवाया हुआ है और रेडियो भी सुनते हैं?"

पी पी सिंह कहने लगे..."टी वी पर खबरें ही देखता हूं...और रेडियो पर गाने और भजन आदि सुनना बहुत अच्छा लगता है...और संगीत का तो ऐसा जादू है, डाक्टर साहब, कि मरते हुए को भी ज़िंदा कर दे"

गांव में अखबार चौपाल पर आता है ...किसी की दुकान पर अकसर पेपर पड़ा रहता है ...जो कि इन के घर से लगभग ५०० मीटर की दूरी पर है...उधर से आते जाते या तो कोई घर में इन्हें पकड़ा जाता है ...नहीं तो शाम के समय ये स्वयं जा कर अखबार ले आते हैं....

"लेिकन डाक्टर साहब, अखबार का मैं एक एक शब्द पढ़ता हूं...दैनिक जागरण अखबार लेता हूं...चूंकि मैं कबड्डी का खिलाड़ी रहा हूं, इसलिए सब से पहले खेलों वाला पन्ना पढ़ता हूं...और उस के बाद मुख्य पृष्ठ की तरफ़ लौटता हूं...बस, उस के बाद मैं सारा पेपर खंगाल लेता हूं और शाम होने तक कोई कल्याण या अन्य कोई धार्मिक ग्रंथ का पठन-पाठन कर लेता हूं।" 

मुझे इन की यह बात अच्छी लगी पेपर को इतने गंभीरता से पढ़ने की ...शहरों में कितने लोग इस तरह से पेपर को पढ़ पाते हैं, यह बात विचारणीय है। 

इन की पत्नी के जोड़ों में दिक्कत है इसलिये वह इतनी ज़्यादा सक्रिय नहीं हैं...

शाम के समय कहीं किसी से यहां आस पास निकल जाते हैं या कोई हमजोली आ जाता है....इक्ट्ठे बैठ कर बतिया लेते हैं। 

और एक बात उन्होंने बड़े चाव से बताई...आंगन में आम और अमरूद के पेड़ हैं...इसलिए इन पेड़ों पर फल रहने तक गांव के बच्चों के बाबा-चाचा बने रहते हैं...अकसर आते जाते ...बुलाते रहते हैं....बाबा प्रणाम....चाचा प्रणाम (यह कहते हुए वे खिलखिला कर हंस रहे थे)

बीमारी वीमारी हमेशा दूर रही है...होम्योपैथिक दवाईयों पर ज़्यादा भरोसा है....और रात को साढ़े आठ बजे के करीब खाना खा कर रात नौ बजे तक सो जाना बहुत ज़रूरी है...खटिया पर पड़ते ही पांच मिनट में ही गहरी निद्रा आ जाती है। 

कैसी लगी पी पी सिंह की जीवन शैली?

आप सब पाठक सुधिजन हैं.....आप से कुछ भी कहना सूर्य को दीया दिखाने जैसा है! जहां तक मेरी बात है मुझे तो ऐसे सभी लोगों से बहुत प्रेरणा मिलती है। सीधा-साधा उच्च जीवन ...और काफ़ी हद तक मासूमियत कायम अभी भी .. 
आप को पी पी सिंह जी से मिलना कैसा लगा?.....मुझे पता है आप बिल्कुल नहीं बताएंगे......लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है! 

अब आप को सुनाएं क्या!...राजश्री प्रोड्क्शनज़ का ही कुछ लगा देते हैं.....ये प्रेम रतन धन पायो.. रतन धन पायो...प्रेम रतन धन पायो.. रतन धन पायो...अजी प्रेम रतन धन पायो ...सुन कर कर के अभी से कान पक गये हैं....फिल्म तो अभी बाकी है....अब तो वह जब बजता है लगता है मानो कोई सिर पर प्रहार कर रहा हो........और यह जो गीत अभी आप सुनेंगे ....यह के बोल और संगीत तो काफ़ी सुकून देने वाला ही है, आप का क्या ख्याल है?...यह भी राजश्री की ही फिल्म थी...