Thursday, November 27, 2014

जुबान साफ़ रखना माउथवाश से भी ज़्यादा फायदेमंद

आज बहुत वर्षों बाद शायद इस विषय पर हिंदी में लिख रहा हूं कि जुबान साफ़ रखना माउथवाश से भी ज़्यादा फायदेमंद है। अभी मैंने इस ब्लॉग को सर्च किया तो पाया कि कईं वर्ष पहले एक लेख लिखा था...सांस की दुर्गंध परेशानी। आप इसे इस िलंक पर जा कर देख सकते हैं।

फिर से इस विषय पर लिखने की ज़रूरत इस लिए महसूस हुई क्योंकि जुबान साफ़ करने के बारे में भ्रांतियों के बारे में पिछले कुछ अरसे में कुछ नया सामने आया जो आपसे शेयर करना ज़रूरी समझा।

टेस्ट बड्स कायम रहते हैं....

एक अच्छी पढ़ी लिखी महिला थी ...कल जब मैंने उस से पूछा कि क्या आप अपनी जुबान साफ़ करती हैं तो उस ने पलट कर मुझ से यह पूछ लिया कि हम ने तो सुना है डाक्टर कि जुबान साफ़ करने से जुबान की ऊपरी सतह पर लगे हुए टेस्ट बड्स (स्वाद की ग्रंथियां) घिस जाती हैं। मुझे बड़ी हैरानी हुई ..लेकिन उसी समय ध्यान आया कि यही प्रश्न कुछ अरसा पहले भी दो एक महिलाओं ने पूछा था।

तो इस का जवाब यह है कि नहीं, जुबान साफ़ करने वाली पत्ती का इस्तेमाल करने से आप के स्वाद में कोई फ़र्क नहीं पड़ता ...न ही यह टेस्ट बड्स को किसी तरह का नुकसान ही पहुंचाता है। बल्कि सच्चाई यह है कि जुबान की रोज़ाना सफ़ाई करने से सांस की बदबू तो दूर भाग ही जाती है ...साथ साथ आप की स्वाद की क्षमता अच्छी बनी रहती है।

टंग-क्लीनर यूज़ करने से उल्टी जैसा लगता है....

बहुत बार यह भी प्रश्न करती हैं ..विशेषकर महिलाएं कि हम तो जुबान नहीं साफ़ करतीं क्योंकि हमें उसी समय उल्टी जैसा होने लगता है। इस का कारण यह है कि कुछ लोग टंग-क्लीनर (जुबान साफ़ करने वाली पत्ती) को बहुत पीछे तक ले जाते हैं....इसलिए टंग-क्लीनर को वहां तक ले कर जाइए जहां तक आप सुविधा से ले जा पाएं.....िफर मतली जैसा नहीं लगेगा। कोशिश कर के देखिएगा... क्योंकि रोज़ाना जुबान की सफ़ाई करने का कोई विक्लप है ही नहीं.....महंगे महंगे माउथवाश भी नहीं।

टुथ-ब्रुश से ही जुबान साफ़ करने का चलन ..

आज कल बहुत बार सुनता हूं कि हम लोग तो टुथ-ब्रुश से ही जुबान भी साफ़ कर लेते हैं. यह ठीक नहीं है.....टुथब्रुश केवल दांतों की सफ़ाई के लिए बना है और कुछ ब्रुशों के हैड की पिछली तरफ़ को वे  अब कुछ खुरदरा सा बना तो देते हैं लेकिन इस से कैसे जुबान की सफ़ाई हो सकती है ?..इस से कैसे आप रोज़ाना जुबान की सतह पर जमने वाली काई को उतार पाएंगे। इसलिए अच्छे से टंग-क्लीनर का उपयोग तो बहुत ज़रूरी है ही।

घर के हर बंदे के लिए अलग टंग-क्लीनर ...

जी हां, घर में हर एक के लिए टंग-क्लीनर अलग हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि एक दूसरे का टंग-क्लीनर न इस्तेमाल न होने पाए। वैसे तो यह बहुत कम मेरे सुनने में आया लेकिन एक-दो बार मैंने यह भी सुना....कुछ सप्ताह पहले की ही बात है . एक कालेज पढ़ने वाली लड़की अपने पापा के साथ आई थी.....टंग-क्लीनर की बात छिड़ने पर जब उसने कहा कि हां, हम उसे धो कर ही यूज़ करते हैं ...तो मुझे लगा कुछ तो गड़बड़ है......पता चला कि घऱ में एक टंग-क्लीनर से सारा परिवार जुबान साफ कर लेता है। फिर उन्हें समझाया ... जो कि उन्हें तुरंत समझ में आ गया।

टंग-क्लीनर से जुबान छिल जाती है.....

कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे ही मुंह में अंगुली डाल कर ही जीभ और गला साफ़ कर लेते हैं.....टंग-क्लीनर के बार बार इस्तेमाल से बहुत बार जुबान छिल जाती है ..इसलिए ठीक नहीं लगता। इस का समाधान यह है कि पहले तो जब आप टंग-क्लीनर का चुनाव करें तो ध्यान दीजिए कि उस पत्ती के किनारे एकदम नरम हों, तीखे न हों.......वैसे तो आज कल बाज़ार में उपलब्ध अच्छे टंग-क्लीनरों में यह दिक्कत होती नहीं है, लेकिन फिर भी देख ही लिया करें। दूसरा, अगर आप बहुत ही ज़ोर से जुबान पर टंग-क्लीनर रगड़ेंगे तो दो एक बूंद खून तो निकलेगा ही......इसलिए इस टंग-क्लीनर को थोड़ा आराम और इत्मीनान से ही इस्तेमाल करिए। न ही जुबान छिलेगी और न ही खून निकलेगा।

  आज तक तो काफ़ी अच्छे अच्छे टंग-क्लीनर मिलने लगे हैं....

जंग लगे टंग-क्लीनर से डर लगता है.....

कईं लोग मुझे यह भी कहते हैं कि जब टंग-क्लीनर को जंग लग जाता है तो उसे मुंह के अंदर इस्तेमाल करने से डर लगता है। अब पता नहीं कितनी खराब क्वालिटी के टंग-क्लीनर की बात कर रहे होते हैं ये लोग ...क्योंकि मैंने तो यह जंग कभी नोटिस नहीं किया। बहरहाल, स्टील के टंग-क्लीनर पर तो जंग नहीं लगता कभी, फिर भी मैं उन के टैटनस हो जाने के डर को भांपते हुए उन्हें तांबे या प्लास्टिक का टंग-क्लीनर इस्तेमाल करने को कहता हूं तो वे सहर्ष मेरी बात मान लेते हैं।

अब जाते जाते ध्यान आया है कि जो ऊपर मैंने शीर्षक लिखा है ...जुबान साफ़ करना माउथवाश से भी ज़्यादा फायदेमंद..यह शीर्षक बढ़िया इसलिए नहीं है कि इन दोनों बातों की तुलना तो की ही नहीं जा सकती .. क्योंकि नित्य-प्रतिदिन अच्छे से जुबान साफ़ करने का विकल्प तो है ही नहीं और न ही कभी होगा शायद.....और न ही महंगे माउथवाश ही इस सदियों पुरानी हिंदोस्तानियों की इस बहुत अच्छी आदत की कभी जगह ले लकते हैं.....प्राचीन भारत में तो जुबान साफ़ रखने के लिए आम के पेड़ के पत्ते की डंडी का ही लोग इस्तेमाल कर लिया करते थे.....बचपन में देखते थे कि दातुन को बीच में से फाड़ कर उसे टंग-क्लीनर के तौर पर यूज़ भी किया करते थे........थे क्या, अब भी दातुन का इस्तेमाल करने वाले यह सब करते ही हैं।

ऐसा नहीं है कि लोग टंग-क्लीनर का इस्तेमाल नहीं करते......बिल्कुल करते हैं बहुत से लोग। मुझे ध्यान है बचपन में उस जमाने में जो प्लास्टिक के टंग-क्लीनर मिला करते थे.....वे झट से थोड़ा सी ही ज़ोर लगाने पर टूट जाया करते थे.....बिल्कुल कमज़ोर से हुआ करते थे......खिलौना टूटने से कम दुःख न होता था उस समय.. ....टाईम टाईम की बात है।

मेरे विचार में जुबान की सफ़ाई के लिए इतना ही काफ़ी है......वैसे एक मुंह की मैल और तरह की भी होती है, any guess?....... यह मैल भी भारतीयों में बहुत संख्या में पाई जाती है.......इस का इलाज है गपशप करना, गॉसिप करना .. इसलिए लोग कहते हैं कि किसी यार-दोस्त से बात कर के मन हल्का हो गया....मज़ाक में कह देते हैं कि मुंह की मैल भी उतारनी तो ज़रूरी है .....है कि नहीं?.......... पता नहीं यार, लेकिन जुबान की मैल नित्यप्रतिदिन उतारते रहेंगे तो तरोताज़ा रहेंगे, सांसें महकती रहेंगी।