शनिवार, 28 मार्च 2026

अंगीठी, भट्ठी, चूल्हा, कांगड़ी.....गुज़रे दौर की मीठी यादें, बातें ...

26.3.26 - रात 10 बजे 

मैं आज सुबह सोच ही रहा था कि मुझे आज अंगीठी से जुड़ी यादें इस वेब-लॉग पर लिखनी हैं...मैं रिक्शा में था, इतने में मुझे एक चाय की दुकान दिख गई ...अंगीठी पर चाय बन रही थी....यह फोटो आज सुबह की ही है ...यह सबूत ही काफ़ी है कि गैस सिलेंडर की किल्लत तो है ही ...बहुत अरसे बाद किसी अंगीठी पर चाय खौलती देखी....इच्छा हुई कि यही उतर जाऊं और अपने मनपसंद चाय पी लूं, फिर आगे चलूं....



अंगीठी पर लिख रहा हूं....मेरी पीढ़ी के लगभग सभी लोगों की यादें इस के साथ जुड़ी हैं....मुझे अच्छा लगता है कि जब लोग मुझे मैसेज करते है्ं कि हमारी यादें भी तु्म्हारे जैसी ही हैं....क्या लिखा आज एक पाठक ने ...."मेरा मानना है. हम अपनी परछाईयों से ही भागते रहे जब कि आप की दौलत उन्हीं फ्लैशबैक में निहित है.." ...ठीक है, हर किसी को लिखना चाहिए...बात के साथ बात जुड़ती है, बात से बात निकलती है तो ही बात आगे बढ़ती है ....खैर, मैं तो हर किसी को प्रेरित करता हूं कि अपनी डॉयरी लिखने से शुरुआत कीजिए...

हां, तो अंगीठी की बात शुरु हुई थी .....

एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस टॉपिक पर मैं जो अनुभव लिख रहा हूं ...वे सभी पंजाब के अमृतसर शहर की एक मध्यमवर्गीय कॉलोनी से जुड़े हुए हैं...न मैं कभी किसी गांव में रहा और न ही मेरा अमृतसर के किसी बड़े पॉश इलाके में कभी आना जाना हुआ...इसलिए ये सारी यादें एक मध्यमवर्गीय इलाके से जुड़ी हुई हैं....

1960 के दशक का मेरा जन्म है --अमृतसर में ही मेरा अवतार हुआ ...वहां की रेलवे कॉलोनी में ही आंखें खोली, और अगले लगभग 25-26 बरस उसी का ही पानी पिया...हां, तो जहां तक बचपन की याद है कि हर घर के बाहर सुबह और शाम के वक्त एक अंगीठी तैयार कर के रखी जाती थी ... किस लिए ? -- अंगीठी भखन लई ....यानि अंगीठी को भखने के लिए रख दिया जाता था ....मेरे पास अब अंगीठी के भखने के लिए कोई हिंदी लफ़्ज नहीं है, हां, समझा सकता हूं कि अंगीठी को जब आग लगा के घर के बाहर दरवाजे के पास रखा जाता था तो शुरुआत में लगभग 10-15 मिनट उस में से धुआं निकलता रहता था ....फिर अचानक धुआं खत्म हो जाता और उसमें से आग की लपटें निकलने लगती....

मुझे याद है जब अंगीठी अच्छे से भख जाती ...उसमें से आग की ऊंची ऊंची लपटें निकलने लगती तो मां की खुशी देखने लायक होती ....सच में उसे ऐसे लगता जैसे की कोई लाटरी लग गई हो ....क्या गजब का वक्त था, छोटी छोटी बातों में भी कितनी बड़ी बड़ी खुशियां छुपी रहती थीं.....वैसे अंगीठी का अच्छे से लट-लट कर के जलना छोटी बात नहीं थी, घर की गृहिणी को ही पता होता अगर अंगीठी की आग कभी मद्द्म रह जाती तो उस पर खाना तैयार करना और दुनिया भर के आग पर किए जाने वाले काम कितने दुश्वार हो जाते .....

27.3.26 प्रातः 4.30 बजे 

अच्छा, एक बात और ….अंगीठी जब जला के घर के बाहर रख दी जाती थी, उस में से धुआँ छटने के बाद आग की लपटें निकलने के इंतज़ार में तो बीच बीच में उसे एक दो बार बाहर जा के देखने भी होता था…यह इसलिए कि कईं बार कुछ छोटी मोटी माइनर एडजस्टमैंट करनी पड़ती थी ….लोहे की किसी पतली सीख (डंडी) से कोयलों को थोड़ा हिलाना ढुलाना पड़ता था ..और कईं बार उसे किसी मोटे कार्डबोर्ड से ( जो कि हमेशा ही अपनी किसी नोटबुक  या पुरानी किताब की जिल्द होती थी, और उसे भी ढूंढना पड़ता था.. …अफसोस, उस वक्त स्विग्गी या ज़ोमेटो न था, न ही फ्लिपकार्ट, इसलिए अब रोज़ाना इक्ट्ठे होने वाले कार्डबोर्ड के डिब्बे नहीं होते थे ….) थोड़ी हवा खिलानी पड़ती थी ….और देखते ही देखते
आग धधक पड़ती थी …और फ़ौरन अंगीठी को अंदर ले आ कर उस पर बढ़िया, मस्त चाय के लिए पानी चढ़ाया जाता था …सब कुछ इलायची, सौंफ, अदरक-वदरक कूट पर उस में डाल के ….

अच्छा, एक बात और याद आ गई….जब मां घर के गेट के बाहर अपनी अंगीठी उठा कर अंदर लेकर आने के लिए जाती तो आस पास कपूर, सोढ़ी, रामलाल और विद्या की मां और टीटू के घर के आगे पड़ी अंगीठीयों की तरफ़ भी नज़र डाल लेती ….किस की अंगीठी कहां तक पहुंची….हां, कईं बार अगर किसी ने अंगीठी जलाते वक्त उपले या लकड़ीयां थोड़ी गीली इस्तेमाल की होतीं तो फिर अडो़स-पड़ोस वाले बहुत ज़्यादा धुएं से परेशान हो जाते ….लेकिन कोई किसी को कहता कुछ नहीं था, बेहद सब्र था सभी में ….चुपचाप उस धुएं की वजह से हुई अपनी गीली आंखों को हाथों से पोंछ देते थे….बस!

कईं बार अंगीठी को बाहर रखे रखे लंबा अरसा हो जाता …न उसमें से धुआं निकलता, न ही आग की लपटें…सीधा सीधा मतलब होता कि प्रोजेक्ट फेल हो गया है ….जुगाड़ लगाए जाते, कईं बार चल भी जाते…जैसे उस के ऊपर मिट्टी के तेल का छिड़काव किया जाता ताकि उसके प्रजवलन में चु्स्ती आ सके….कईं बार यह काम कर जाता, वरना फिर से दोबारा अंगीठी जलाने की मशक करनी पड़ती….

अधिकतर अंगीठी तैयार करने का काम मां के सुपुर्द ही होता….उसे कोई छुट्टी नहीं, सर दुःख रहा होता तो सिर पर दुपट्टा कस के या दांत दुःख रहा होता तो दांतों पर नसवार लगा कर भी अंगीठी तैयार तो करनी ही होती …कईं बार मैंने पिता जी को भी यह काम करते देखा और मैने भी दो चार बार यह काम किया है ….याद नहीं, ऐसी कौन सी एमरजैंसी आ गई होगी …शायद मां 1-2 दिन के लिए बाहर गई होगी ….

मैंने कल जो फोटो खींची सिगड़ी पर चाय बनती देख कर ….यह उन दिनों एक आम बात थी…हर तरफ़ अंगीठी पर ही चाय बनती थी ….चाय के ठेलों पर, चाय की दुकान पर, हलवाई के यहां, किसी ढाबे पर ….सारा काम बड़ी बड़ी अंगीठीयों पर ही होता था….जिसे हम लोग भट्ठी कहते हैं ….बड़े से मिट्टी के तंदूर टाइप बने होते थे …फिक्स किए होते थे ….जिन में कोयलों से अंगारे निकलते रहते थे …और उन्हीं पर दाल मक्खनी, जलेबियां, समोसे, पूरी-छोले, भटूरे-छोले बना करते थे ….

बचपन की यादों की अलमारी की एक बहुत पुरानी, दीमक की मार से खस्ताहाल हो चुकी एक शेल्फ पर एक कोने में अभी एक ईमानदार सा हलवाई भी रखा पड़ा है ….जो कईं कईं घंटों तक भट्ठी पर खौलते दूध को हिलाता करता और शाम को एक दो ट्रे बर्फी तैयार करता था …देखते ही देखते वो खाली हो जाती थी ….वैसे बर्फी न तो कभी खाई और न ही खाने का कोई स्कोप ही है ….जब भी उधर से गुज़रते पिता जी मुझे छोटे लिफाफे में वह ज़रूर दिलाया करते ….यही कोई एक रूपए के आसपास मिल जाती थी …या इससे भी कम …वाह, क्या महक होती थी …सीधी ज़ुबान पर रखते ही घुल जाती थी …उस हलवाई के पास एक नाई की दुकान थी….जो एक बड़ी सख्त सी मशीन से कटिंग किया करता था, कटिंग क्या, नोचता हो जैसे बालों को ….और फिर उस्तरे को बेल्ट पर घिस कर मेरे सर पर रगड़ दिया करता था…कईं कट लग जाते थे …और जले पर नमक छिड़कने के लिए उन पर फिटकड़ी घिसा देता…बस, मेरा रोना चालू….पिता जी बाहर आते ही मुझे जैेसे ही उस बर्फी की दुकान पर ले कर जाते, मेरा दर्द-वर्द कहां भाग जाता, पता नहीं….50-60 बाद भी जब मुझे इस हलवाई का ख्याल आता है तो मुझे हंंसी आती है …..क्या कमा लेता होगा …इतनी मेहनत मशक्कत के बाद …फिर भी इतना सब्र….इतनी मोहब्बत, खुलूस रखता था सब के लिए….अच्छा, लेते सब इतनी ही थे ….50 ग्राम, 100 ग्राम….एक पाव (250ग्राम) तो किसी मेहमान के घर आने पर ही चाय के वक्त लाई जाती थी…समोसों के साथ….या तो समोसे-जलेबी, वरना …समोसे, बर्फी ….यही मेन्यू था, यही स्कोप और यही दायरा था उस वक्त की मेहमान-नवाज़ी का ….

दिनांक ...28 मार्च 2026

अंगीठी में कोयले कौन से इस्तेमाल होते थे ...

अंगीठी में सामान्यतः हार्ड-कोक ही इस्तेमाल होता था...यह ज़्यादातर कोयले के डिपो से ही लाना होता था...वज़न के हिसाब से बिकता था...बीस-तीस किलो या पूरी एक बोरी लाई जाती थी ..साईकिल रिक्शा पर रख कर ....अगर 10-20 किलो ही होते तो साईकिल के पीछे कैरियर पर ढो लिए जाते।

अंगीठी जलाना भी एक कला है....बहुत इत्मीनान, बहुत फोकस चाहिए....जैसे मैंने ऊपर लिखा कि कुछ बार मैंने भी अंगीठी जलाई..कईं बार जल गई, कईं बार फुस हो कर मुझे मुंह चिढ़ाने लगती।ऐसे ही नहीं कहते ..करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान.....गृहिणियों के पास यह महारत बहुत थी। 

(अंगीठी जलाने का आर्ट एंड क्राफ्ट- डॉयग्रैमैटिक )....काश! इस तरह के डायग्राम बनाने में स्कूल-कालेज में इतनी मेहनत की होती....न ही मास्टरों के हाथों पिटना पड़ता और मैं भी कहां से कहां पहुंच चुका होता ....😎

अंगीठी को जलाने के लिेए तैयार करने से पहले सब से नीचे सूखे दो चार गोबर के उपलों के दो चार टुकडे़ रखे जाते जिन पर थोड़ा सा मिटटी का तेल छिड़क दिया जाता ...फिर उन के ऊपर बिल्कुल पतली सी लकड़ीयों के दा चार पांच टुकड़े रखे जाते और फिर उन के ऊपर कोयले सजा दिए जाते ...बहुत ज़्यादा ठंड के दिनों में या बरसात के दिनों में अंगीठी जलाना मुश्किल काम होता..लाटरी लगने जैसा ...लगी तो लगी, नहीं तो ठनठन गोपाल.....खैर, इसी चक्कर में बाहर ओस या बरसात होने की वजह से कईं बार अंगीठी जलाने के लिए उसे घर के बाहर या घर के आंगन में रखने की बजाए, बरामदे में ही रखना पड़ता...

कईं बार यह भी होता कि मिट्टी का तेल (केरोसीन) ही नहीं है....तो फिर गोबर के उपलों के नीचे कुछ बेकार कागज़ भी रख दिए जाते जो जल्दी से आग पकड़ लेते....और फिर यह ऊपर तक अंगीठी से आग की लपटें रुपी न्यूक्लियर रिएक्शन चल निकलता...

रेलवे के फॉयरमैन और उन के थैले में  रखा सूत....

आज की पीढ़ी तो रेलवे के फॉयरमैन के नाम से ही वाकिफ़ न होगी...लेकिन डीज़ल, इलेक्ट्रिक इंजन आने से पहले जब स्टीम इंजन ही चलते थे ...मैं 1960-1970 के दशक की बात कर रहा हूं...बाद में तो फिर डीजल ईंजन भी आ गए....स्टीम इंजन की कार्यप्रणाली को समझने के लिए आप को कोई पुरानी फिल्म जैसे शोले (वो ट्रेन डकैती वाला सीन) या विधाता (जिसमें शम्मी कपूर और दिलीप कुमार पर ट्रेन के इंजन में एक गीत फिल्म गया है ...)....हां, तो फॉयरमैन का काम होता था, स्टीम इंजन के अंदर कोयले झोंकते रहना ...सभी फॉयरमैन एक ही से दिखते थे ..क्योंकि सारा दिन काम आग के सामने ही होता था....

जैसा कि मैं ऊपर लिख ही चुका हूं ...मेरी तो भई आंखे ही खुली रेलवे कॉलोनी में ....इसलिए बचपन ही से रेलवे के हर तरह के मुलाजिम को देखते देखते मैं रेलवे के बारे में बहुत कुछ समझ गया....फॉयरमैन, ड्राईवर, खलासी, वर्कशाप के मकेनिक, गार्ड, टीटी, टिकट बाबू, बुकिंग क्लर्क, गैगमैन  (एक्टिव गैंगमेन और पैसिव गैंगमैन - जो रसोईये, माली, चपरासी, बाबू के काम में लगे रहना अपना सौभाग्य समझते थे)........मैं क्या, कोई भी इन सब रेल मुलाजिमों को देखते ही पहचान लेता ...बिना वर्दी के भी ....अकसर भाप ईजन के दौर में यह माना जाता था कि फॉयरमैन और ड्राईवर बहुत गुस्से वाले होते हैं....खैर, हर काम की अपनी चुनौतियां हैं....क्या कहें इस बारे में ज़्यादा!

हां, तो बात अटक गई थी फॉयरमैन के ऊपर ....दरअसल भाप ईंजन के पूरे रख-रखाव की जिम्मेदारी इस फॉयरमैन की होती थी ...गाड़ी चलती थी तो कोयले से लेकिन उस के पुर्ज़ों को तो डीज़ल या मोबिल-ऑयल से रवां रखना पड़ता था....मुझे नहीं पता कि यह डीज़ल आयल से होता या मोबिल-ऑयल से ...लेकिन जो भी था, इस को जिस कपड़े से (सूत) से साफ किया जाता, उसे गैंगमैन फैंंकता नहीं था, वह उसे अपने घर ले आता ...चूंकि वह डीज़ल या ऑयल से कुछ भीगा हुआ होता, इसलिए वह आग बहुत जल्दी पकड़ लेता और अंगीठी जलाने के लिए वह बहुत काम की चीज़ साबित होता ...मुझे याद है फ़ायरमैन इस को अपने आस पास के घरों में भी बांट देता....बांटने से भी पहले, शायद लोग उस के घर पर ही इस की डिमांड रखने चले जाते ....

मैंने लिखा न कि मैंने भी कईं बार अंगीठी जलाई है ...मेरे से सब्र शुरु ही से कुछ कम था....उतावला पन ज़्यादा (हिसाब के पेपर में सब कुछ आते हुए भी जब दो चार मूर्खता से भरी गल्तीयां कर आता तो मेरे पिता जी मुझे कह दिया करते ...तू, यार, फुर्ती के चक्कर में गल्ती करता है ...., इस के आगे उन्होंने कभी न डांटा न डपटा, न धमकाया....)...हां, कम सब्र के रहते मैं उस जल रही अंगीठी में ऊपर से तेल फैंक देता ....जिस से चंद लम्हों के लिए तो लपटें दिख जातीं लेकिन लकड़ीयों और उपलों को और उस के बाद कोयलों तक आग पहुंचने में 10-15 मिनट का वक्त तो लगना ही होता था....

सर्दी के दिनों में अंगीठी की डिमांड ---

अमृतसर की कड़ाके की सर्दी (3-4डिग्री तक) के दौरान अंगीठी की डिमांड अचानक बहुत बढ़ जाती ...हर कोई अंगीठी के पास ही बैठना चाहता ...आग तापने के लिए....और साथ में मूंगफली, रेवड़ी खाना और गर्मागर्म खौलती हुई चाय की सुस्कियों का लुत्फ़ उठाते हुए वहां से कोई उठना ही न चाहता....वही परम सुख था...इसी चक्कर में काम लेट हो जाते, सोना लेट हो जाता ...लेकिन जब अंगीठी के पास इस तरह जश्न चल रहा हो ....डालडे में तैर रहे नमक-अजवायन के या फिर आलू के परांठे या देसी घी से चुपड़ी मिस्सी रोटी एक के बाद एक बन रही हो तो भला वहां से उठने को दिल किस का चाहेगा....और अकसर अंगीठी के पास बैठने के लिए किसी बोरी का टुकड़ा (टाट) या फिर लकड़ी की चौकी इस्तेमाल होती ....लेकिन पैर तो भी हमारे ठंड़े पड़े होते ...क्योंकि उस दौर में घर में जुराबें पहनने का चलन नहीं था, हां, जब ठंड की वजह से उंगलियां सुन्न पड़ जाती या नीली होने लगतीं तो मां कीस डांट डपट से ऊन की जुराबें चढ़ानी ही पड़ती.....और फौरन आराम भी आ जाता ....

रेलवे से भी कोयला मिलता था .....

हां, तो रेलवे से भी कोयला मिलता था ...स्टीम ईजन कोयले से चलता था ..हार्ड-कोक से ...जगह जगह जैसे नया कोयला ईंजन में झोंका जाता था, पुराना थोड़ा इस्तेमाल किया कोयला नीचे गिर जाता था ...जिसे गिराना फॉयरमैन का काम होता था ..इतनी गाडि़यां तब भी चलती थीं....जहां तक मेरी धुंधली याद है इस बारे में फिर यह  इस्तेमाल किया हुआ कोयला रेल के कर्मचारी खरीद सकते थे ...यही कोई तीन चार रूपए की पर्ची कटवानी होती थी ...फिर वहां से रिक्शा में रखवा कर यह कोयला घर आता था ..हमारे यहां भी एक दो बार आया था, मुझे याद है ....यह अंगीठी में जलाने के लिए बहुत बढ़िया होता था ...और इस की बड़ी डिमांड रहती थी ....और भी कुछ कुछ बातें हैं..धुंधली यादें हैं... फॉयरमैन के द्वारा कोयला नीचे गिराने के बारे में .......लेकिन सब कुछ क्या लिखने बैठें...हमारे लिए इतना ही काफी है कि स्टीम ईजन, उस में काम करने वाला ड्राईवर और फ़ॉयरमैन हमारी बचपनों की यादों का बेशकीमती हुिस्सा हैं.....हम पैदल स्कूल आते जाते वक्त जब भी रेल की लाइनों के पास, किसी माल-गोदाम, किसी लोको-शैड़ के पास ईंजन देखते ही रुक जाते ...10-15 मिनट उस ईंजन को और उस से निकलने वाली भाप को निहारते रहते ....वेहले कम.....वक्त बरबाद करने वाले शौक....

लकड़ी वाला कोयला....
एक कोयला जो लकड़ी से बनता है ...वह भी बिकता था ...लेकिन उसे उन दिनों सिर्फ़ कपड़े प्रैस करने वाली इस्तरी में इस्तेमाल के लिए ही खरीदा जाता था...महंगा होता था... कॉलोनी में जो प्रैस वाले यूपी से आए भाई लोग 
यह काम करते थे, उन के पास बहुत भारी भरकम प्रैस होती थी जिन में यही कोयला इस्तेमाल होता था...जिस की वजह से कईं बार टैरीकॉट, टैरीलीन या दुपट्टे आदि में कभी कभी एक दो  सुऱाख भी हो जाते थे (कईं बार सिगरेट से भी पिता जी की कमीज़ पर छेद हो जाते थे) ...फिर लोगों की उस प्रेस वाले के साथ थोड़ी कहा-सुनी हो जाती थी ....मुझे तो यह काम बढ़िया लगता था ...मैं तो कईं बार उस के पास जा कर खड़ा हो जाता था ...पान चबाते चबाते जिस स्वैग से वह भारी भरकम प्रैस को  उठाता, फिर बार बार उसमें राख को नीचे गिराता ..सब कुछ यादों में कैद है ....

बाद में कुछ बरसों बाद जब गैस वैस आ गई तो भी, बिजली की प्रैस इस्तेमाल होने लगी तो भी यह कोयला तो लोग घर में आग तापने के लिए लाते थे ... और हां, यह कैसे भूल गया कि उन दिनों भुट्टा (छल्ली) भूनने के लिए भी यही कोयला इस्तेमाल करते थे ...इस काम में भी यू-पी बिहार से आए लोगों का वर्चस्व था ...एक दम बढ़िया भुट्टे खाए जो उन दिनों फिर कभी न नसीब हुए....न वो भुट्टे ही रहे (अब तो जी.एम क्रॉप वाले हैं शायद ...कोई स्वाद नहीं, कोई बात नहीं ...फीके फाके ......कौन खाए, इन को ....इसलिए कभी मैं तो नहीं खाता यह सब ...) ....
हां, हमारे घर में भी एक छोटी सी लोहे की प्रैस होती थी जिसे मेरी बहन ही इस्तेमाल करती थीं अपने कपड़ों के लिए....उसमें भी यही लकड़ी वाले कोयले (हां, लिखते लिखते याद आया....इन को कच्चे कोयले कहते थे ) डाले जाते थे ...मुझे यह सब होते देखना बहुत भाता था....कल की बातें लगती हैं....। बहन 10 साल बड़ी हैं, कभी आलस नहीं करती थीं ये सब काम करने में ...।

भट्ठी ....

भट्ठी के बारे में तो मैंने ऊपर भी लिखा है कि वह भी उन दिनों हार्ड-कोक से ही चलती थी ..हलवाई हो, ढाबे हों....लेकिन हां जो भुजवा की भट्ठी होती थी, वह लकड़ीयों के साथ जलती थीं....

लिखते लिखते अब मैं हो गया हूं बोर ....

कईं बार कुछ लिखने लगो तो वह बहुत खिंच जाता है जैसे गीली लकड़ी से आग जलाने के चक्कर में कईं बार हम उलझ जाते हैं....धुआं ही धुआं हर तरफ़ लेकिन आग का नामो-निशान नहीं ....इस पोस्ट को शुरु किए तीन दिन हो गए...मुझे मेरे स्वभाव का पता है मैं अगर इस वक्त जिस भी हालत में यह है , अगर इसे बंद नहीं करूंगा तो फिर यह कभी पूरी ही न करूंगा या ऐसे ही पड़ी रहेगी, पोस्ट नहीं करुंगा ...क्योंकि दो चार दिन बाद लगने लगेगा कि इस में पोस्ट करने जेैसा है ही नहीं......बस, ऐसा ही करता हूं मैं.....वैेसे भी अपने लिखा तो मैं पढ़ता नहीं....क्योंकि अपनी ही लिखी कुछ बातों को लिखते थोड़ा अन्कम्फर्टेबल सा लगता है (लगना बिल्कुल नहीं चाहिए, अगर लिखने वालों को यह लगेगा तो कैसे चलेगा) ...दरअसल बात पूरी सच्चाई पर टिकी होती है ....99 प्रतिशत ....लेकिन कुछ बातें यही कोई एक प्रतिशत भी झूठी नहीं होती, लेकिन उन 1-2 फीसदी को मैं लिखते वक्त दबा जाता हूं ...उन को भी लिखूंगा ज़रूर  लेकिन नौकरी से जब रिटायर हो जाऊंगा ...प्रभु कृपा रखें ...सेहतमंद रखें...। 

इस पोस्ट का दूसरा पार्ट भी लिखना होगा ..जिस में उपले, चूल्हे, कांगड़ी की बातें साझा करनी है....और उस के बाद किसी पोस्ट में तंदूर के किस्से भी तो ब्यां करने हैं .....यह सब गैस की किल्लत की वजह से हो पाया....ये यादें कुरेद कुरेद कर हरी करनी पड़ रही हैं ...अच्छा है इसी बहाने सहेजी जा रही हैं....। 

लिखते लिखते यह मेरे संस्मरण कम और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतो का एक निबंध सा ही लगने लगा है ...खैर, जो भी है, सब कुछ सच है ....सच के सिवा कुछ नहीं....कुछ दिखावा नहीं, प्रपंच नहीं ...हां, आटे में नमक बराबर ...1-2 प्रतिशत तथ्य दबा ज़रुर लिए हैं....इतना खोट भी ज़रूरी है ...24 कैरेट सोने के तो गहने ही नहीं बन पाते ...😃