Friday, May 10, 2019

दादी, तुम अच्छी नहीं दिखती !

अभी निठल्ले बैठ कर रेडियो सुनते हुए मन में ख़्याल आया कि हम लोग सब कुछ किताबों से और स्कूल से ही नहीं सीखते, बहुत कुछ हमें हमारे पेरेन्ट्स बिना कुछ कहे सिखा के चले जाते हैं...जैसा हम उन का बर्ताव दूसरे लोगों के साथ देखते हैं, हम भी कहीं न कहीं उसी सांचे में ढलने लगते हैं, आप का क्या ख़्याल है...हमने अपने पेरेन्ट्स को हमेशा देखा कि उन का व्यवहार हर एक इंसान से एक जैसा होता था...घर में काम करने वाले लोगों से लेकर, रिक्शा वाले के साथ, सब्जी वाले के साथ ....हम ने बचपन में ही बड़े ही अच्छे से सीख लिया कि जात-पात, धर्म, चमड़ी के रंग या पढ़ाई लिखाई के आधार पर किसी से अपना बर्ताव नहीं बदलना होता... सब बराबर हैं...और यह सीखने का ज़िंदगी में बहुत फ़ायदा हुआ ...ज़िंदगी आसान सी लगने लगी ... किसी को भी बुलाते वक्त 'जी' लगाने से कौन सा जान निकल जाती है...

हमारे बच्चे भी जब हरेक के साथ बेहद इज़्ज़त से पेश आते हैं तो रूह ख़ुश हो जाती है बॉय-गाड....

सच में बात कितनी सही है कि जिस चीज़ पर हम लोगों का अख्तियार ही नहीं है, उस के आधार पर किसी तरह का भेद-भाव या दुर्भावना पाल लेना कितनी बड़ी बेवकूफी है ...है कि नहीं..

बीजी जब कभी अपनी ठोढी पर उग रहे बाल चिमटी से साफ कर रही होती तो हमें कहा करतीं कि एक बार ट्रेन में एक औरत पर उगे हुए चेहरे के बाल देख कर उन्हें बड़ी क्रीच सी महसूस हुई (क्रीच का मतलब होता है कि मन ख़राब होना)...बस, कुछ समय के बाद उन की ठोढी पर भी बाल उगने लगे...मां को बहुत मलाल रहा कि उस के मन में यह भावना आई क्यों....हम जानते हैं कि हारमोन्ज़ की वजह से यह सब किसी भी महिला में हो सकता है ...बस, एक बात शेयर करनी थी बीजी की ...

आज मेरे पास एक दंपति आए ...पुरूष 80 के ऊपर हैं और महिला दो चार साल कम (महिला को फुलबहरी है, चेहरे पर भी) ...मरीज़ महिला थीं...दोनों बड़े ख़ुश-मिज़ाज हैं...हंसते हंसते बात करते हैं...और हम लोग पंजाबी में ही बात करते हैं...मुझे उन का मेडीकल-आइडेंटिटी कार्ड का नंबर देखना था...मैंने जैसे ही उसे खोला ...और उस महिला की तस्वीर देखी ...यही कोई दो-चार साल पहले की तस्वीर होगी ...बड़े सलीके से सफेद बाल बंधे हुए ..मैं भी कहां अपने आप को रोक पाता हूं...जो मन में होता है, उसे बोल कर ही दम लेता हूं....मैंने उन्हें ऐसे ही कह दिया कि आप की फोटो बहुत अच्छी आई है ...आप तो किसी स्कूल की प्रिंसीपल लग रही हैं....मेरी यह बात सुन कर वे दोनों हंसने लगे और पास खड़े दो-तीन मरीज़ और ठहाके लगाने लगे ..

ठहाके जैसे ही बंद हुए ...उस बुज़ुर्ग महिला की एक बात से माहौल थोड़ा गंभीर हो गया...उन्होंने कहा - " डाक्टर साहब, मेरा पोता तो मुझे कहता है कि आप अच्छी नहीं दिखती हो..।" मैंने पूछा...क्यों, ऐसा क्यों कहता है वह। उन्होंने बताया कि बस, इसी की वजह से (अपनी फुलबहरी की तरफ़ इशारा किया)....मैंने तुरंत कहा कि ऐसा कुछ नहीं है, हमें तो आप किसी स्कूल की हैड-मिस्ट्रेस लगती हैं...यह सुन कर माहौल फिर से हल्का-फुल्का हो गया..

हर बात का रुख बदलना भी तो हमारे हाथ में ही होता है ...जिधर चाहे मोड़ कर मूड ख़ुशनुमा कर लेना चाहिए ...

वह औरत तो चली गई लेकिन मुझे अफसोस इस बात का बड़ा रहा कि उस पोते की परवरिश करने में इस दादी ने भी कुछ तो किया ही होगा, कितनी रातें जागी होगी, दुःख सुख में उस का साथ निभाया होगा ...लेकिन बड़ा होेने पर अगर पोते ने दादी को यही तमगा देना था तो ...

फुलबहरी है तो क्या है ....अंदर उस दादी की रूह कितनी सुंदर है ...और वैसे भी वह अब भी प्रिंसीपल से कम नहीं लग रही थीं...यह तो मैं पहले ही लिख चुका हूं...

उस दंपति के जाने के एक घंटे बाद एक युवक अपनी मां को लेकर आया....यह महिला भी मेरी पुरानी मरीज़ हैं...65 साल के करीब होंगी ...आज उस महिला के दोनों हाथों पर पट्टियां बंधी हुई थीं...मैंने पूछा तो बेटे ने बताया कि एसिड गिर गया मां के हाथों पर ...मैंने पूछा - कैसे ..तो उसने बताया कि कार की बैटरी फट गई ... मैंने कहा कि कार की बैटरी के पास मां क्या कर रही थीं...उसने बताया कि वे तीन लोग...वह, उस की बहन और मां मोटरसाईकिल पर जा रहे थे ...एक रेड-लाइट पर रुके थे ...इतने में एक तेज़ आवाज़ करती हुई कार आई .. उसे रोक कर उस के मालिक ने जैसे ही उस का बोनट खोला, उस की बैटरी फट गई और एसिड पास ही खड़ी मोटरसाईकिल पर बैठे इन तीन लोगों पर पड़ गया....बेटे के तो कपड़ों पर एसिड गिरा ...कपड़े जल गये...बहन के चेहरे पर गिरा ..आंखों के आस पास...(लेकिन वह भी अब ठीक है) और मां के दोनों हाथ एसिड की चपेट में आ गये ...

मैंने भी यही कहा कि चलिए, आप लोग बच गये ....आंखें आप सब की बच गईं....वह भी यही कह रहा था ..

उन के बारे में सोच कर यही लग रहा है कि लोग अपनी सुंदरता के लिए कितने कितने जतन करते हैं...लेकिन खेल चंद लम्हों का है .... सुंदर होना, सुंदरता बढ़ाना यह सब रब्बी बातें हैं... बुटीक में हज़ारों रुपये बहा देने से भी कुछ नहीं होता ...बाहरी सुंदरता से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है रूह की सुंदरता ...और यह भी रब्बी मामला है ..

बेहद खूबसूरत चेहरों के पीछे बदसूरत रूहें दिख जाती हैं ...और सामान्य चेहरे के पीछे छुपी खूबसूरत रूह का पता उन की प्यारी मुस्कान और हंसी बता देती है अकसर ...कुछ लोगों का हंसना भी कितना डरावना सा होता है ..जैसे किसी की खिल्ली उडा़ने के लिए वह अपनी बतीसी को जेहमत दे रहे हों ...और कुछ सामान्य चेहरों की हंसी कितनी बेबाक होती है और अपने आस पास खुशियां बिखेर देती है....एक सत्संग में मैंने यह बात सुनी थी कि मौला, दुनिया में हंस वही सकता है ....या तो वह दीवाना हो ...या फिर जिसे तू हंसने की तौफ़ीक बख्शता है....

मुझे यह बात बड़ी अच्छी लगी ...

चलिए, इस पोस्ट की थीम से मेल खाता एक फिल्मी गीत सुनते हैं ...दिल को देखो, चेहरा न देखा...चेहरों ने लाखों को लूटा...मेरा एक पसंदीदा गीत ...