शनिवार, 22 जनवरी 2022

सार्वजनिक जगह पर कब्ज़ा करना भी आर्ट है ...

मज़हब बड़ा संवेदनशील मुद्दा है भई इस देश में ...कोई खुल कर बात नहीं करता....डरे-सहमे से बात करते हैं ....और जब किसी धर्म के नाम पर किसी जगह पर कब्ज़ा होने की बात होती है तो वह भी बड़ा सोच विचार कर होती है ... 

एक साल हो गया होगा ...मेरे मोबाइल में फोटो भी हैं ...मैं कल्याण में टहलते हुए देखा करता था कि रेलवे के ग्रांउड के बाहर किसी एक दीवार से टिका कर किसी ने लोहे का एक फ्रेम सा रख कर, उस के सामने सरसों के तेल का दिया जला रहा था ...और उस के सामने एक बंदा चुपचाप बैठा अजीब अजीब सी हरकतें कर रहा था, हिल ढुल रहा है ...सिर हिला रहा था...बस, जो भी था अपने को कोई पहुंचा हुआ पीर-फकीर दिखाने की कोशिश कर रहा था ...पहुंचा हुआ न भी सही तो कोई नौसीखिया सा ही समझिए...जिसने नया नया इस धंधे में पांव रखा हो...


जी हां, एक धंधा ही है यह भी किसी जगह पर कब्ज़ा करना ...समझने वाले लोग समझ जाते हैं कि कब्ज़ा होने की शुरूआत कैसे होती है ..यही कोई मूर्त, कोई और पत्थर, फूल, तेल ....कमबख्त बिल्कुल तांत्रिक से लगते हैं ऐसा करने वाले ..लेकिन वे सब कुछ बड़ी प्लॉनिंग से कर रहे होते हैं...और अपनी पब्लिक को किसी भी झांसे में आते देर नहीं लगती....आस पास के लोगों में दो चार पांच औरतें जो नरम दिल होती हैं वे उस पाखंड़ी को पहले तो कभी कभी रोटी-खीर पहुंचाने लगती हैं, फिर उस के दिए में तेल...फिर कुछ नकदी ..फिर कुछ उपाय पूछने लगती हैं कि पति की दारू कैसे छुड़वाऊं, बेटे का पढ़ने में दिल लगे, उस के लिए क्या करूं, बाबा...

लिखते लिखते निर्मल बाबा याद आ रहा है ....वह भी बड़े अजीबोगरीब उपाय सुझाया करता था ...पहले जब हम लोगों टीवी देखते थे तो मैं रोटी खाते वक्त उस का प्रोग्राम मनोरंजन के लिए लगा लिया करता था. 

बहरहाल, शामलाट जगहों पर कब्ज़ा करना एक आर्ट एंड साईंस दोनों हैं ....लोगों को ऐसे ही फुद्दू से कामों में उलझाए रखना होता है और यह काम इतना लो-प्रोफाइल रख के आहिस्ता आहिस्ता करना होता है कि उस रास्ते से गुज़रने वाले पढ़े-लिखे तबके को इस की भनक भी न पड़े, वैसे भी यह तबका अपने काम से काम रखता है ...उस के पास तो पहले ही से ख़ुद की सिरदर्दीयां कम हैं कि वह इन सब बातों पर ध्यान दे....और जिस विभाग की जगह होती है, वे भी अकसर तब तक सोए रहते हैं जब तक वहां पर पक्के कमरा टाइप न बन जाए, कोई धार्मिक जगह न बन जाए ...फिर देखे कोई उस बाबे को वहां से उठाने की ...

जहां मैं रहता हूं ...वहां भी पास ही एक बुज़ुर्ग महिला ने एक धार्मिक स्थान की स्थापना कर रखी है ...उस का ठिकाना वही है.....कईं बार गुज़रते देखता हूं वहां पर धार्मिक गीत लगे होते हैं और वह अजीबो-गरीब तरीके से ताली बजा बजा कर सिर हिला रही होती है ...क्या है न इतनी मेहनत तो करनी पड़ती है लोगों को अपनी तरफ़ खीचने के लिए....या दूर रखने के लिए....अगर उस का यह दैवी रूप देख कर कोई चढ़ावा चढ़ा गया तो बढ़िया ....और अगर उस को इस हालत में देख कर कुछ लोग डर तक दूर रहते हैं उस जगह से, बच्चों को उस के पास फटकने से मना करते हैं तो भी उस के लिए तो यह भी ठीक ही है ....और रहे टांवे टांवे मेरे जैसे लोग लगभग नास्तिक से लोग ...जिन्हें न तो इस असर की बेवकूफियां अपनी पास खींच पाती हैं, न ही दूर रख पाती हैं ....उन के पास अपना हथियार है ....वे कागज़ पर लिख कर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं....


दो चार दिन पहले भी मैंने शाम के वक्त देखा कि एक औरत ने फुटपाथ पर किसी हवन-कुंड में आग जला रखी है और वह उस से चार पांच गज़ दूर बैठ कर ज़ोर ज़ोर से तालियां मारे जा रही थी...मुझे भी यह सब सूंघते कहां देर लगती है कि यह इस फुटपाथ को हड़पने की नौटंकी की शुरुआत भर है ....लोगों के मन में डर, खौफ़, कौतूहल, रोमांच पैदा करिए और अपना मतलब साधिए.....

वैसे ही लोग अंधविश्वास का चश्मा लगाए घूमते हैं ....कितनी शर्म की बात है कि आज भी देश के कईं हिस्सों में विधवा, बुजुर्ग औरतों को बेकाबू भीड़ यह कह कर मौत के घाट उतार देती है कि यह औरत बच्चों पर जादू-टोना करती हैं, बच्चे उठा कर ले जाती है....क्या यार, एक विधवा, असहाय, बुज़ुर्ग महिला क्या बिगाड़ लेगी कमबख्तों आप लोगों का ...जीन लेने तो उसे भी चैन की ज़िंदगी ...ऐसी महिलाओं की कुछ मदद करने की बजाए सिर फिरे लोग उन के साथ बड़ी बुरी तरह से पेश आते हैं ...पत्थर मारते हैं, पत्थर मार मार कर ही मार गिराते हैं ...इसीलिए मैं किसी धर्म-वर्म के चक्कर में बिल्कुल नहीं हूं....बस, एक ही धर्म को जानता हूं जिस में हर इंसान के साथ एक इंसान की तरह बर्ताव करना सिखाया जाता है ...बिना किसी भी तरह के भेदभाव के ....

सार्वजनिक जगहों पर कब्ज़ा करने के बारे में और भी बहुत सी बातें मन में उमड़-घुमड़ रही हैं ...लेकिन इस वक्त लिखने की फुर्सत नहीं है, अभी नहा-धो कर काम पर जाना है ...लिखने का क्या है, एक बात लिखने लगो तो अल्फ़ाज़ पीछे ही पड़ जाते हैं कि हमारे बारे में भी लिक्खो, हमारे बारे में भी तो कुछ कहो ...हमें भूल गए....क्यों भई.....चलिए, आज की बात को यहीं विराम देते हैं...