बुधवार, 5 अगस्त 2026

अगर भोर सुहानी है तो गीत भी उसी मूड वाले हों ..



दो दिन पहले पनवेल के एक बाग में ....सुबह सुहानी कुछ ऐसी दिखी...

आज सुबह हमेशा की तरह मैं उठने में थोड़ा लेट हो गया …विविध भारती के राष्ट्रीय चेनल पर अपने रेडियो पर उन के बढ़िया प्रोग्राम सुन रहा था …जैसे गीत वे बजाते हैं, ये केवल विविध भारती के बस की ही बात है …कईं कईं गीत तो ऐसे होते हैं जिन्हें हम बीस-तीस साल बाद सुनते हैं तो झट से याद आ जाता है वह गीत ….


आज भी सुबह जो गीत बज रहा था …मुझे अच्छा लगता है …लेकिन बहुत लंबे अरसे के बाद रेडियो पर सुना था …उस के बोल बहुत बढ़िया हैं…


बीती हुई रात की सुनाती है कहानी….

यह सुबह सुहानी हो …


कलियों का बचपन…

फूलों की जवानी…

यह सुबह सुहानी हो …


गाने के बोल तो हैं ही,… यशुदास ने गाया है और …और संगीत भी बहुत बढ़िया है …मन को छूने वाला …किल्लर कंबीनेशन ही देखिए….आनंद बक्शी की कलम, रवींद्र जैन का संगीत, यशुदास ने गाया..फिल्म अय्याश (१९८२) का यह गीत …अगर ऐसे गीत दिल को न छुएंगे तो फिर दिल में ही गड़बड़ी है, समझ लीजिए….

इस गीत को आप इस लिंक पर क्लिक कर के सुन सकते हैं ....यह सुबह सुहानी हो ....

रेडियो पर बंद हुआ तो मैंने यह गीत यू-ट्यूब पर मोबाईल पर लगा लिया….अच्छा लगता है जब सुबह सुबह आप को कोई सुकून देने वाला गीत इस तरह से रेडियो पर सुनने को मिलता है ….

अच्छा, अगर मैं बहुत सुबह उठ जाऊं तो सब से पहले मैं कोशिश करता हूं कि आलइंडिया रेडियो की एप पर दिल्ली एफएम गोल्ड लगा लूं…क्योंकि उन का एक प्रोग्राम आता है ..शायद पांच बजे के आस पास इसी नाम से …भोर सुहानी ….उस में कईं बार इसी तरह के गीत सुनने को मिलते हैं …जिनको हम बिसार चुके होते हैं…

अच्छा, मैंने आज विविध भारती पर सुबह सुबह गीत सुन रहा था …यह प्रोग्राम भी कुछ शायद त्रिवेणी नाम से जाना जाता है …एक तो गीत यह बजा जो मैंने ऊपर लिखा, और दो गीत और भी सुंदर बजाए गए उसमें ….

भोर भए पंछी धुन यह सुनाएं …जागो रे गई रुत फिर नहीं आए….(बहुत खूबसूरत गीत..)

और एक बावर्ची फिल्म का वह सुपर डुपर गीत ….

भोर आई…गया अंधियारा …

सारे जग में हुआ उजियारा …

नाचे झूमे यह मन मतवारा ….मतवारा।

….

धरती भी झूमें, बगिया भी झूमे ..

नन्ही किरण मुस्काए…

लागे नीला सागर बड़ा प्यारा, बड़ा न्यारा …

भोर आई …गया अंधियारा ….

तो इस तरह से अपने दिन की शुरुआत हुई आज …इतनी सुंदर शुरूआत ….फिल्म टाईम्स ऑफ इंडिया आया , दस मिनट को उस को देखने लगा …

तभी मेरे एक कज़िन ने वाट्सएप पर एक गीत मुझे भेजा ….

गीत के साथ उसने लिखा कि बहुत बढ़िया गीत …मन प्रफुल्लित हो जाएगा…और यह गीत बहुत बार फार्वाडेड हो चुका था ….आठ मिनट का वीडियो था …मैंने सोचा कि चलो मन को और प्रफुल्लित करने का अगर सुनहरा मौका मिला है तो, इस का भी फायदा उठा लिया जाए….

मैंने उसे बजाना शुरु किया ….

उस गीत के बोल सुनिए…..

यह दुनिया भीड़ का मेला ..

पर अंदर से इंसान अकेला…

हंसता चेहरा..रोती रुह..

किस से कहे मन का झमेला….

चेहरों पर मुस्कान सजी है ..

भीतर से हर दिल टूटा पड़ा है ..


रात अंधेरी जब घिर आती …

मन मंदिर में गूंजे सन्नाटा…

सांस सांस लगे इक झमेला…

कबीर कहे सुन रे बंदे …

झूठा जग का हर इक मेला …

इस गीत को सुनते वक्त मुझे यह देख कर यह बात बहुत अजीब लगी कि इस गीत को रिकार्ड इतने सुदंर मनमोहक दृश्यों की मदद से किया गया है (शायद कृत्रिम बुद्धि से..) …झील के किनारे, पुरातन बट-वृक्ष के नीचे, किसी धार्मिक स्थल में बैठ कर …इतने इतने सुदंर संगीत के यंत्र लेकिन चेहरे सभी रोते हुए ..उदास से… दुनिया के झमेले को सजीव कर रहे हों जैसे…।

(मैंने इस गीत का लिंक यू-ट्यूब पर ढूंढा है और यहां लगा रहा हूं ….हां, यह भी मैने सर्च किया कि यह कबीर जी को इस में क्यों इंवाल्व किया जा रहा है …तो मुझे पता चला कि इस गीत से कबीर जी का कुछ लेना-देना नहीं है, उन का नाम यूं ही लिखा जा रहा  है…)... यह रहा इस गीत का लिंक ....झमेला झमेला झमेला ...

लेकिन प्रफुल्लित तो क्या होना …मेरी तो जितनी बैटरी चार्ज थी, यह सब झमेला, झमेला सुन कर तो मैं तो भई उदास हो गया …सोचने लगा कि क्या सच ज़िंदगी ही इतना बडा़ झमेला है ….?

जी हां, है तो एक झमेला ही …कोई इंसान अंबानी-अडाणी, ट्रम्प …कोई ऐसा नहीं जिसे बीसियों परेशानियां, दुश्वारियां न हों, तो फिर हम आप तो किस खेत की मूली हैं…तो क्या इस का मतलब है कि हम लोग दिन की शुरुआत ही इस तरह के उदास करने वाले गीतों से करें ….

नहीं, मैंने यह कभी नहीं किया…इस से दिन की शुरुआत ही ऐसी की तैसी हो जाती है ….नाश्ता करते वक्त भी पांचो वही झमेला, लफड़ा ….सब कुछ वही चेते आने लगता है ….यह भी सच है कि घर से निकलते ही दुनिया के झमेलों को पार करते, उन का मुकाबला करते, उन को लांघते-फांदते, उन को नज़रअंदाज़ करते आप दिन भर कुछ कर पाते हैं…..लेकिन अगर सुबह सुबह घर से निकलने से पहले शुरूआत भी इस तरह के उदासी भरे गीतों से हो तो फिर इस का क्या नतीजा होगा, इस की आप कल्पना कर सकते हैं….

मैं पहले सुबह के वक्त भी कुछ सत्संगों में जाया करता था …वहां पर भी वही बातें, स्वर्ग-नरक, ८४ लाख योनियां भुगतनी पड़ेगीं, मोक्ष नहीं मिलेगा, अगर ऐसा नहीं करोगेे ..अगर वैसे नहीं करोगे….यह करो, वह करो….सत्संगों के इंचार्ज खुद रेंज-रोवर में, सिक्योरिटी गार्डों के झुंड के साथ निकलते हैं….यह सब देख कर बहुत सालों बाद अपने आप ही समझ से परदा हटा कि ये तो खुद ९९ के गेड़ में उलझे पड़े हैं. ….ये कौन होते हैं मुक्ति दिलाने वाले…और मुक्ति की ऐसी की तैसी…किसे मिली, किसे नहीं, किस ने आ कर बताया….ये सब पब्लिक को पीछे लगाने वाले लोग हैं ….हर बार इन सत्संगों में यह सुन सुन कर कान पक गये वही स्वर्ग-नरक, मोक्ष, चौरासी का चक्कर. …..बस, मैं फिर पीछे हट गया…वैसे भी बहुत से बाबा लोगों ने जो कुछ किया और जो कुछ बाद में उन के साथ हुआ…वह सारी दुनिया के सामने है ….मुझे नहीं पता कि कितने बाबे जेन्यून हैं या नहीं है, लेकिन मेरा मन नहीं मानता ……।

खैर, यह तो ब्लॉग का विषय है भी नहीं ….

हां, मैं अपने दिन की शुरुआत कैसे करता हूं ..ऊपर लिख ही दिया है ..रेडियो सुनते हुए, अखबार पढ़ते हुए ….ज़रूरी नहीं कि भजन ही सुनता हूं..जो रेडियो पर बज रहा हो, मुझे बढ़िया ही लगता है …वैसे भी कुछ फिल्मी गीत ऐसे बन चुके हैं जो भजनों से कम न

नहीं है, कुछ तो पूरे भजन ही हैं….ज़िंदगी के पूरे फ़लसफ़े के उसमें दर्शन होते हैं…

अनेकों अनेक ऐसे फिल्म गीत हैं जिन्हें मैं उच्चकोटि के आध्यात्मिक गीत ही मानता हूं जो किसी गिरते हुए को उठने के लिए बाध्य करने वाले हैं, कुछ मायूस चेहरों पर मुस्कान ले कर आते हैं….लिखने के लिए मुझे अल्फ़ाज़ कम पड़ रहे हैं, लेकिन बहुत कुछ है इन फिल्मी गीतों में …इन का अपना जादू ही अनूठा है …

ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना …यहां कल क्या हो किसने जाना ….

जीवन चलने का नाम….चलते रहो सुबहो शाम …..

आ बता दें तुझे कैसे जिया जाता है ….

तक़दीर से क़लम से कोई बच न पाएगा….पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आएगा..(पेशानी-माथा)
 

सोचते जाएं तो इस लिस्ट को जितना भी चाहें लंबा कर दें ….

शिक्षा ….तो इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है कि सुबह सवेरे या दिन में भी कभी किसी को भी उदासी भरे गीत न भेजें….वह पता नहीं अपनी धुन में मस्त कौन से सुनहरी ख़्वाब बुन रहा है, हम उसे वह गीत भेज दें कि ज़िंदगी एक झमेला..एक एक सांस झमेला ..

ठीक है,यार , झमेला तो झमेला सही …..लेकिन इस झमेले को और कंप्लीकेट न करिए…….

वैसे भी मैं एक झमेले वाले गाने के बोल इस में जोड़ ही दूं…..

दुनिया में अगर आए हैं तो जीना ही पड़ेगा ..

यह जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा….

सोचिए, अगर इस तरह के गीत से दिन की शुरुआत होगी तो वह दिन ही कैसा होगा…!!
 
PS...उदासी भरे गीतों या ऐसी शेरोशायरी से मुझे इतनी तकलीफ़ है कि मैं इन्हें अगर कहीं पढ़ भी लूं तो कोशिश यही रहती है कि ये फिर से मेरी नज़रों में न पड़ें। बाकी, पसंद अपनी अपनी है ...फिर भी किसी दूसरे के साथ शेयर करते वक्त हमें थोड़ा सचेत रहने की ज़रूरत है ...