बुधवार, 29 जुलाई 2026

न जाने किस मजबूरी में करती होंगी महिलाएं अपने अंडाणु दान....

कल मुंबई की बोरिवली-स्लो लोकल के दूसरे दर्जे के डिब्बे में मेरे साथ वाली सीट पर एक युवा महिला बैठी हुई बड़ी जल्दबाजी में, हड़बड़ाहट से कुछ सरकारी पन्ने उलट पलट रही थी ….कम उम्र की महिला लिखने को लिख तो दिया है, लेकिन थी वह यही कोई २०-२२ बरस की युवती ही थी ..हम देखते हैं, समझते हैं कि किस तरह से कुछ ज़िंदगीयां वक्त के थपेड़ों से जल्दी बडी़ हो जाती हैं…वह तो मुझे उस के मंगल-सूत्र से पता चला कि वह शादी-शुदा है…

हां, तो मैं मुंबई लोकल के दूसरे दर्जे के डिब्बे में क्या कर रहा था? 


दरअसल मैंने लोअर परेल से लोकल ली …और एक तो मैं कल शाम इतना थक चुका था और दूसरी बात यह कि फर्स्ट क्लास का डिब्बा थोडा़ दूर था…मेरे पास वहां तक पहुंचने का वक्त न था …और अगर गाड़ी छूट जाती तो फिर अगले २-४ मिनट में अगली गाड़ी आ जाती, और उस वक्त मन इस बात के लिए भी तैयार न था…वैसे तो मेरा सफ़र भी कुछ ज़्यादा नहीं था, १०-१५ मिनट का ही मेरा सफ़र था ..इसलिए जो दूसरे दर्जे का डिब्बा मुझे सामने दिखा मैं उसी में चढ़ गया …


सीट मिल गई …बंबई में यह एक छोटी मोटी लॉटरी लगने जैसी बात है…। 


साथ वाली सीट पर वह युवती आई और बार बार कुछ सरकारी कागज़ देखे जा रही थी …जल्दबाजी में थी …बिल्कुल वैसी ही जैसे हम लोगों ने नोटबंदी के दिनों में बैंकों के बाहर देखी थी …लाचार, बेबस इंसान वाली जल्दबाजी …एक बार तो मुझे लगा कि यह जो कागज़ हैं यह इस को SIR के सर्वे के लिए चाहिए होंगे…बहुत से लोग आज कल फोटोकापी की दुकान पर यही कुछ झेराक्स करवाते दिख जाते हैं और दुनिया के मेले में आते-जाते कुछ लोगों द्वारा एफिडेविट तैयार करवाने की बातें भी कान में पड़ती रहती हैं…


खैर, जब वह इतनी जल्दी जल्दी से उन तीन चार पन्नों को बार बार उलट पलट रही थी तो मेरा भी ध्यान उधर जाना स्वभाविक ही थी …मैंने देखा कि वह एक स्टाम्प पेपर पर एक अश्टाम (एफिडेविट) …(एक तो यहां पर इतने इतने बड़े शातिर लोग पैदा हुए हैं कि कितने बरस हो गए हैं जब भी कभी अश्टाम का नाम भी आता है तो मुझे उस तेलगी डाकू की याद ज़रूर आ जाती है …डाकू ही तो कहेंगे तो इस तरह से देश को लूटेंगे)....


हां, फिर वह युवती उन पन्नों की मोबाइल में फोटो लेने लगी ….शायद मोबाईल का माडल कुछ ऐसा होगा कि उसे एक पन्ने के लिए उस की तीन हिस्सों की फोटो खींचनी पड़ रही थी…यह मेरी समझ में नहीं आया , न ही मैंने समझने की कोशिश की …क्योंकि मैंने उस के मोबाईल की तरफ़ भी नहीं देखा…..हां, जब वह बार बार एक पेज़ को ध्यान से पढ़ रही थी या देख रही थी …तो मैंने भी अनायास उस पेज़ की चंद पंक्तियों को पढ़ लिया….


यह एफिडेविट (अश्टाम) ..शपथ-पत्र था जो कि एक २४ साल की लड़की ने अपने अंडाणु दान देने के लिए बनवाया था …


अंडाणु दान के बारे में मैंने कुछ पढ़ा तो था पहले लेकिन फिर भी मुझे आईवीएफ के बारे में कुछ ज़्यादा मालूम है नहीं …हां, पिछले महीने कुछ मुंबई में अंडाणु दान के बारे में फ्रॉड हुए थे …जैसा कि होता है दो चार दिनों तक खबरें आती हैं, फिर उन को सिया वाला कांड मिल गया …फिर वे उसमें व्यस्त हो गए …


हां, तो मेैं महिलाओं द्वारा जिन अंडाणुओं के दान की बात कर रहा हूं …उन न्यूज़-रिपोर्ट में बताया गया था कि बंबई के कुछ आईवीएफ सेंटरों को इस इलाज में हर तरह की धांधली के चलते बंद किया गया है ….और मुझे याद है उन खबरों में वे सब तरह की गड़बड़ियों की खबरें थीं जो अंडाणु दान के बारे में हो सकती हैं….सभी नियम नज़रअंदाज़, कुछ ही लड़कियों का बार बार अंडाणु दान करना, बिचोलिया औरतें किस तरह से ज़रूरतमंद महिलाओं को अपने जाल में फंसाती हैं, और कुछ आईवीएफ सेंटरों की भी इस में मिली-भगत ….इस से भी अलावा बहुत कुछ था उन खबरों में जो उन दिनों पेपर में छपी थीं ….


हां, तो जो मैंने पढ़ा…उस में लिखा था कि मेरी उम्र २४ साल है …मैं अपनी पूर्ण स्वतंत्र इच्छा से यह अंडाणु दान कर रही हूं ….और यह मैं पहली बार कर रही हूं …मेरा आधार कार्ड नंबर यह है ..और मेरी फोटो भी साथ लगी है …मेरे पति, पिता, मां, भाई, बहन …( जो भी लागू हो) ने सहमति दी है कि वे इस काम में मेरे गार्डियन की भूमिका में रहेंगे ….


मैंने पहले ही लिखा है कि मेरा ज्ञान आईवीएफ के बारे में नगन्य है ..फिर भी कुछ चीज़ें मैंने कल नेट पर देखीं और कुछ अन्य शपथ-पत्र (एफीडेविट) जो नेट पर पड़े मिले, उन को पढ़ा तो पता चला कि अंडाणु दान देने के लिए एक अच्छी खासी प्रक्रिया है ….टेस्ट वेस्ट तो चलिए होते ही होंगे…लेकिन दान देने वाली महिला को कुछ हार्मोन के इंजेक्शन भी लगते हैं और फिर उस के अंडाणु निकालने के लिए उसे जनरल एनेस्थीसिया (आम भाषा में कहें तो बेहोश कर के आप्रेशन करने वाली बात ….निश्चेतन कहते हैं उसे कठिन वाली हिंदी में ..जो न मुझे आती है, न ही मैने कभी सीखने की ज़रूरत ही समझी है …)...मैं तो बोलचाल वाली हिंदी में विश्वास रखता हूं …


मेरे दिमाग में कुछ विचार कल से आ रहे थे कि जो महिलाएं अपने अंडाणु दान देती हैं. ..(दान देना ही कहना पड़ता है, क्योंकि कानून के तहत अंडाणु बेचना प्रतिबंधित है…इसलिए मैं भी बार बार दान -दानी ही लिख रहा हूं ..और जो नेट पर मुझे थोड़ी बहुत जानकारी मिली, मैंने सोचा एक कागज़ पर लिख कर ब्लॉग में शेयर करूं….कर रहा हूं …इस पेज को पूरा पढ़ने के लिए इस इमेज पर क्लिक करिए।…



मुझे आज से पहले नहीं पता था कि यह अंडाणु दान देने वाला काम इतना पेचीदा है …पेचीदा क्या, उस दानी की आफ़त है…कितने मर्ज़ी कानून हैं, लेकिन ज़मीना हकीकत हम सब जानते हैं कि कम पढ़े लिखों का, गरीब लोगों का हर तरह को शोषण इस काम में भी होना तय ही है ….ऐसे लोगों की क्या कहीं पर कोई सुनवाई होती है? आप का क्या ख्याल है? 


मैंने जब से पढ़ा है कि ये अंडाणु दान देने वाला काम कितना जटिल है …तो मेरा ध्यान बार बार उन महिलायों की तरफ़ ही जा रहा है जिन्हें मजबूरन यह काम करना पड़ता होगा….कितना मुश्किल काम है, पहले तरह तरह के हार्मोन इस्तेमाल किए जाएं ताकि अंडाणु बनने की प्रक्रिया तेज़ हो सके …कईं बार उस के साईड-इफेक्ट्स ..और बाद में बेहोश (एनसथीसिया - निश्चेतन) कर के अंडाणु निकालने की प्रक्रिया ….


क्या है ३०-४० हज़ार रुपया …अगर किसी महिला को इतना मिल भी जाता होगा …वैसे तो इतना भी नहीं मिलता होगा, क्योंकि बीच में बिचौलिए कैसे चुप बैठे रहेंगे ….कल जो गाड़ी में मुझे महिला दिखी, वह भी कोई बिचौलन ही लग रही थी …


मुझे कैसे पता चला .?


जब मैं अपना स्टेशन आने से पहले अपनी सीट से उठा तो उसने झट से जिस लड़की को आवाज़ देकर बैठने को कहा …वह नाम ही उस एफिडेविट पर लिखा हुआ था….और मैंने आते आते उस लड़की को देखा जो उम्र में उस से भी कम लग रही थी…मुझे बहुत दुःख हुआ …अफ़सोसनाक …


 कोई भी प्रावधान जो कानूनी तौर पर उपलब्ध है, उस का जितना दुरुपयोग या जितना भी उस को तोड़ा मरोड़ा जा सके ताकि उस गरीब, शोषित महिला के अलावा बाकी सभी अपने अपने हिस्से की चांदी कूट सकें ….इस के नियमों से खिलवाड़ होता ही होगा और होता ही है ..मैंने ऊपर लिखा है न कि इस तरह की कईं रिपोर्टें पिछले दिनों अखबारों में बहुत आई थीं….



विक्की डोनर फिल्म में युवकों द्वारा स्पर्म-डोनेशन को एक तरह से मज़ाहिया अंदाज़ में पेश किया गया लेकिन महिलाओं द्वारा अंडाणु दान बहुत बड़ी बात है ….जब से उसने होश संभाली, वह किसी न किसी के कंट्रोल में ही रही, किसी ने उस की कभी मर्ज़ी कम ही पूछी….१२-१३ साल की उम्र से मासिक धर्म की सभी परेशानियों को स्कूल-कालेज में जूझती ...कईं बार वॉश-रुम का ही न होना, (काश…पैडमैन फि्लम की तरह यह सब सब को, सभी जगह उपलब्ध करना इतना आसान होता…)...बाद में, शादी के बाद, बच्चे पर बच्चे, प्रसव पर प्रसव…गर्भपात, अपने आप और कईं बार करवाने का दबाव या मजबूरी ….और हर महीने पांच छः दिन की परेशानी और हर प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान और उस के बाद हफ्तों, महीनों तरह तरह की दुश्वारियों को झेलना … क्या यह सब कम था कि उस के ऊपर उसे अगर अंडाणु बेचने (दान) देने के लिेए भी मजबूर होना पड़े….

अंडाणु दानी बनने की मजबूरी ….हां, यह मेरा विश्वास है कि यह अंडाणु दान किसी न किसी मजबूरी में ही होता होगा….किसी न किसी …केवल एक मजबूरी …पैसे की कमी, और क्या कमी हो सकती है …मुझे नहीं पता। और वैसे तो कहते हैं प्राईव्हेसी रखी जाती है, अंडाणु देने वाले को प्राप्त करने वाले का नाम नहीं पता होता और प्राप्त करने वाले को दानी की डिटेल्स नहीं पता होतीं…। (आज कहीं पर पढ़ रहा था कि अंडाणु दान देने के लिए महिला का ३५ वर्ष की उम्र से कम होना ज़रूरी है)....


मुझे ऐसा क्यों लगता है कि यह दान-वान कम पढ़ी लिखी, मजबूर, मजलूम, आश्रित महिलाओं द्वारा ही किया जाता होगा….क्या आप किसी पढ़ी-लिखी और आत्म-निर्भर के बारे में सोच सकते हैं कि वे अंडाणु दान करे ….असंभव। 


एक बात और बहुत अजीब लगी कि सामान्य नयन-नक्श वाली महिला के अंडाणु की कीमत कम और पढ़ी लिखी, स्पैशल प्रोफाईल वाली महिला के अंडाणु की कीमत बहुत ज़्यादा..आप उस ऊपर दी गई लिस्ट में पढ़ ही सकते हैं….। जब प्राईव्हेसी है तो किसे पता कौन सा अंडाणु आईवीऐफ सैंटर ने किस शुक्राणु के हवाले कर दिया ….यह तो खुदा ही जाने या जब ९ महीने बाद रिजल्ट निकले तभी तो पता चले शायद, वरना अगले दो-चार पांच साल बाद ही पता चलेगा…लेकिन कोई कर ही क्या लेगा तब, सब थ्यूरी की बातें हैं  …..। 


सोचने वाली बात है कि एक तरफ तो आईवीएफ करवाने वाले पेरेंट्स इतना भरोसा करते हैं …क्या करें, मजबूरी है …(कुछ आईवीएफ सेंटरों के गोरखधंधे अखबारों में आते हैं …लेकिन कईं बार तो वे मंजूरशुदा प्रामाणिक आईवीएफ सेंटर होते ही नहीं…)...और दूसरी तरफ़ लोग अपने निकट संबंधियों की राख के लिए भी भरोसा नहीं करते आजकल ….हमारे एक मित्र का भाई स्वर्ग सिधार गया…उन के भतीजों ने कहा कि हम तो राख आज ही रात लेकर जाएंगे …क्या पता, परसों लेने आएँ तो राख बदल ही दी हो …और हम किसी और की राख गंगाजी में प्रवाह के आ जाएं?...इसलिए वे दाह-संस्कार के बाद कईं घंटों वहां बैठे रहे ..चिता के ठंडा होने की इंतज़ार में …रात में जब चिता ठंडी हुई तो उन के फूल (राख) लेकर ही अपने घर आए…। 


क्या लगता है कि इस तरह के शोषण का कोई समाधान है ? …..


कानून बहुत हैं, लेकिन उन का पालन होने की ज़रुरत है …कड़ाई से पालन हो ….हर चीज़ के कायदे कानून मौजूद हैं लेकिन लोग इतने शातिर हो चुके हैं कि कैसे सब कुछ तोड़-मरो़ड़ कर के अपना मतलब निकाल लेते हैं, पैसा हड़प लेते हैं ..इसलिए मेरे विचार में तो इस का एक ही समाधान है कि महिलाएं पढ़ी लिखी हों, अपने पैरों पर खड़ी हों और जो बात उन के शरीर से , उन की सेहत से जुड़ी है उस के बारे में सवाल करें….एक बार नहीं, बार बार करें ……फिर देखिए, इन बिचौलियों की तो ऐसी की तैसी …। पहले किराए की कोख (surrogate mother) के नाम पर धांधलियां और अब अंडाणु दान के नाम पर गरीब, बेबस, अनपढ़, कम पढ़ी लिखी महिलाओं का हर तरह को शोषण….यह सब कुछ तो भई युवतियों की पढ़ाई लिखाई से और उन के स्वालंबी होने से ही खत्म होगा …



आज १५ दिन बाद ब्लॉग लिख रहा हूं …क्यों भला?


बहुत बार सोचता हूं कि २० साल हो गए ब्लॉग लिखते लिखते ….अब यह बेकार, फ्री-फंड वाली दुकान बंद करने का वक्त आ गया है …बोरियत होने लगती है लिखते लिखते …फिर यह भी ख्याल आता है कि मैं जो भी आज लिख पा रहा हूं …जैसा भी टूटा-फूटा …सिमटा, बिखरा …..यहां तक भी मैं पहुंच पाया कि मैं पिछले बीस साल से - २००७ से …निरंतर हिंदी ब्लॉगिंग में सक्रिय रहा ….ऐसे कैसे छोड़ दें इसे भी लिखना ….जिस काम को अभी तुच्छ स्तर पर ही टटोल पाया हूं …उसे इतनी आसानी से कैसे छोड़ दें….। अंदर की बातें अंदर ही दबी रहें, क्या लिखने वालों को यह शोभा देता है ? 


खैर अपने आप से ये बातें चलती रहती हैं …इतने दिनों पर चलती हैं…फिर अचानक १०-१५ दिन बाद कोई मिल जाता है …तो अचानक उस से मुंह से बर्बर निकल जाता है कि डाक्टर साहब, आप की वह नाई वाली पोस्ट पढ़ी, बहुत मज़ा आया …मैं तो उस के माध्यम से अपने गांव में ही पहुंच गया …..


फिर अगले दिन कोई किसी दूसरी ब्लाग-पोस्ट में लिखी कुछ बातें हंसते हंसते हु-ब-हू सुनाता है …और खिलखिला कर हंसते हुए सुनाता है …तो बस, लिखने की जो थोडी़ बहुत मेहनत होती है सफल हो जाती है …अगर कुछ लोगों के चेहरों पर खुशी आ गई, हमारे लैपटाप पर उंगलियों को थपथपाने में लगी थोड़ी मेहनत में तो कौन सी बड़ी बात है …। और हां, वह सज्जन कह रहे थे कि मुझे इतनी अच्छी लगी उस में लिखी बातें कि मैंने दो बार उसे इत्मीनान से पढ़ा। 


और यह तो हो गई बातें, उन दोस्तों, जान-पहचान वालों द्वारा कही हुई जो कभी मिलने पर कह देते हैं ..इस के अलावा कभी कभी वाट्सएप पर कभी कोई ऐसा कमैंट लिख भेजता है या उस पोस्ट के नीचे ही कुछ ऐसा लिख देता है या कोई बहुत दूर किसी शहर से फोन कर के कुछ कहता है ….बस, फिर से कलम उठाने के लिए इतना ही उकसाना काफ़ी होता है …। है कि नहीं ? 


अभी पोस्ट को बंद करते वक्त मुझे पता नहीं गीत गाता चल फिल्म का यह एक बहुत बढ़िया गीत याद आ गया ...सोचा, यही लगा देता हूं ....मैं वही, दर्पण वही ...न जाने यह क्या हो गया कि सब कुछ लागे नया नया ....



PS... As i have admitted above, my knowledge on this subject is very poor, so if any enlightened reader has to say anything which would enable me to add/amend the contents of this post, please feel free to write in comments, if you wish or even feel free to email me. Feedback is quite important in such posts.