Tuesday, September 25, 2018

मंटो - एक बेहतरीन फ़िल्म

कुछ अरसा पहले से सुन रहे थे कि मंटो फिल्म आने वाली है ...जिसे जानी मानी हस्ती नंदिता दास बना रही हैं और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी इस में मंटो की भूमिका में नज़र आएंगे। दो दिन पहले इस फिल्म को देखने का मौका मिल गया ...बहुत अच्छी लगी यह फिल्म।


जनाब मंटो साहब के बारे में एक दिलचस्प बात यह कि मैंने शायद इन का नाम २० साल पहले सुना था... लेकिन बहुत समय तक मुझे यही लगता रहा कि यह कोई ब्रिटिश नाम है ...इंगलिश-विंगलिश में लिखते होंगे..

मुझे अच्छे से याद है कि १५-१६ साल पहले की बात है ...मैं उस समय पंजाब में पोस्टेड था ..वहां पर मंटो साहब की कहानियों की एक किताब मेरे हाथ लग गई ... सच बताऊं तो इस किताब से ही पता चला कि वे ब्रिटिश नहीं है, यहीं के ही हैं...


हां, एक बात और ...बहुत साल हो गये अखबारों में यह रिपार्ट देखी थी कि पाकिस्तान से मंटो साहब की साहिबज़ादियां अपने अब्बा का जन्मदिन मनाने के लिए समराला आती हैं...एक बार तो इन बेटियों की इंटरव्यू भी पढ़ी थी अखबार में ...तब से इस महान् शख्स के काम में दिलचस्पी और भी बढ़ गई ...


मंटो फिल्म आने से तो नई पीढ़ी को भी मंटो साहब के बारे में बहुत कुछ जानने का मौका मिलेगा ...मेरी उम्र ५५ की है, मेरा बेटा २५ साल का है ...बंबई में रहता है ...कुछ महीने पहले मैं उस की बुक-शेल्फ़ देख रहा था ..मंटो साहब की कहानियों की किताब देिख गईं...जैसे ही उसे खोला तो पता चला कि उस के किसी फ्रेंड ने उसे वह गिफ्‍ट की थी और गिफ्ट करने वाले ने लिखा था ...विशाल, जब शोर बहुत ज़्यादा बढ़ जाए, तो इस किताब को खोल लेना....


उस दिन मैं फ़िल्म देख कर आया तो एफएम रेडियो पर भी इस के बारे में देर रात के वक्त प्रोग्राम चल रहा था ...बहुत अच्छा रिव्यू था ...अखबारों में भी देखा है कि फिल्म मेकर नंदिता दास की बहुत तारीफ़ हो रही है ...उन के काम के बारे में तो कुछ कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है...1947 Earth फिल्म किसे याद नहीं होगी, और उन के बेहतरीन काम की बेइंतहा तारीफ़ हुई ....मैं उन की सभी फिल्में देखता हूं ...और खास कर के एक फिल्म आई थी ...रामचंद पाकिस्तानी ....क्या गज़ब फिल्म थी ...मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत यह फिल्म किसी को भी झकझोर के रख सकती है।


बहरहाल, मंटो फिल्म की बात कर रहे थे ...नवाज़ुद्दीन साहब का काम, रसिका दुग्गल जी की अदाकारी ...जबरदस्त एक्टिंग की है सब किरदारों ने ...लेकिन, नहीं, फिल्म देखते लगता ही नहीं कि कलाकार एक्टिंग कर रहे हैं, सब कुछ इतना यथार्थ लगता है....जिस के लिए मंटो साहब जाने जाते हैं।

इस फिल्म के संवाद हमें सोचने के लिए मजबूर करते हैं....कुछ संवाद तो मैंने सुने और मुझे ऐसे याद हो गये कि मैंने उन्हें अपनी डॉयरी में नोट कर लिया ... आप से शेयर कर रहा हूं...


इस तरह की फ़िल्म हम तक पहुंचाने के लिए नंदिता दास का बहुत शुक्रिया ...मंटो साहब जैसे लोगों के काम की जगह जगह चर्चा होनी चाहिए ...उन के विचार आज भी उतने ही मौजू हैं जितने उस समय थे ...

बस, अभी इस पोस्ट को बंद करता हूं ...इस गुज़ारिश के साथ कि इस फिल्म को थियेटर में जा कर देखिए... मेरी सिफ़ारिश ही समझ लीजिए...क्योंकि मैं चाहता हूं कि आप भी इस अज़ीम शख्शियत के मुख्तलिफ़ पहलुओं से वाकिफ़ हो पाएं...

और रही मेरी बात, मैं तो इस फिल्म को एक बार फ़िर देख कर आऊंगा ....और हां, मंटो साहब को फिर से पढूंगा...और समझूंगा भी ....इस शख्शियत की याद को सादर नमन !!