घासलेट भी मैंने ज़्यादा लिख दिया है ...कहीं गोबर के उपले इस्तेमाल करने वाले दिन ही न लौट आएं...क्योंकि अगर उस महान् वैज्ञानिक आइंन्सटाईन की बात याद करें तो कुछ भी हो सकता है ...वह कह कर गए हैं कि मुझे यह तो पता नहीं कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा लेकिन इतना तय है कि भविष्य में अगर चौथी वर्ल्ड वॉर की नौबत आई तो यह डंडों और पत्थरों से लड़ी जाएगी...
हालात जिस तरह से बिगड़ रहे हैं ...कुछ यू-ट्यूब चैनलों पर न्यूक्लियर-वॉर के दौरान होने वाले कहर और उस से थोड़ा-बहुत बचने के उपाय बताने शुरु कर दिेए हैं। कल दो तीन ऐसी व्हीडियो देखी मैंने। सब से अच्छी व्हीडियो तो किसी मैडीकल कॉलेज के प्रिंसीपल रह चुके एक डाक्टर साहब की थी ...
खैर, यह तो अभी कयास ही हैं ..लेकिन कुछ भी मुमकिन है आने वाले वक्त में ....पड़ोस में कहीं आग लगे तो देर-सवेर उस की आंच में हमारा घर भी आता ही है....अभी भी जिस तरह से कुकिंग गैस आदि कि किल्लत होने लगी है ...आप सब जानते ही हैं....उस रेस्ट्रां में यह बनना बंद हो गया, वहां यह अब नहीं बनेगा...गैस किसे मिलेगी, किसे नहीं मिलेगी....किसे पहल दी जाएगी किसे नहीं। कालाबाज़ारी नहीं होगी, आप को यकीं है? - नहीं, मुझे बिल्कुल यकीं नहीं है क्योंकि मैंने 50-55 साल पहले मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) वाले दिन देखे हैं, अनुभव किेेए हैं....उसे ब्लैक में मिलता देखा है, फिर सत्तर-अस्सी के दशक में कुकिंग गैस के सिलेंडर भी ब्लैक में मिलते देखे हैं...बहुत कुछ देखा है, इसलिए इसे यहां इस ब्लॉग में लिखने बैठ गया...
कुछ महीने पहले मैंने किसी एक एंटीक शाप में पीतल का एक चमचमाता स्टोव देखा ....पीतल का, चमचमाता हुआ...1500 रुपए में मिल रहा था ....मेरे पूछने पर उस दुकानदार ने बताया कि यह सब फिल्म शूटिंग पर ले कर जाते हैं....अच्छा, मैं यह लिखने बैठा हूं तो मुझे सुबह सुबह याद आ गया कि मैंने भी तो केरोसिन या घासलेट, स्टोव के बारे में कुछ बरस पहले लिखा था ....झट से ब्लॉगर खोला और मिल गया .....यह रहा मेरी उस पोस्ट का लिंक ....यह मैंने दो-तीन बरस पहले लिखी थी ....मुंबई के भायखला स्टेशन के पास रानी बाग है ...बिल्कुल उस के पास ही मैंने एक दिन किसी बंदे को स्टोव उठा कर जाते देखा था.....मैंने कोशिश की थी कि उसमें सब कुछ लिख दूं ...लिखा भी था अपनी तरफ़ से ...अगर हो सके तो उसे ज़रूर देखिए.....आज स्टोव याद आ गया....(पोस्ट का लिंक)...
मैंने आज सरसरी देखी है वह पोस्ट ....लेकिन पूरा पढ़ा नहीं...जो कि मैं अकसर करता भी नहीं ...लेकिन मैं अपनी किसी भी पुरानी पोस्ट को कभी भी एडिट नहीं करता ...न कुछ उस में जोड़ता हूं, न काटता हूं ...उस घड़ी में जो कलम से निकला, सो निकल गया....लेकिन मैं उसे पढ़ता इसलिए नहीं क्योंकि मैं बाद में कुछ बरसों बाद पढ़ता हूं तो खामखां लगने लगता है कि ऐसा मैंने क्यों लिख दिया, कैसे यह लिख दिया.....असहजता तो न कहूं, ऐसे ही कुछ अलग सा लगता है, इसी से बचने के लिए अपनी पुरानी पोस्टों को पढ़ता नहीं हूं, उसी हलवाई की तरह जो अपनी दुकान में तैयार की हुई मिठाईयां नहीं खाता.....मतलब आप समझ ही गए हैं....
मेरे ख्याल है कि मैंने अपनी उस पुरानी पोस्ट में यह कहीं नहीं लिखा था कि पीतल के स्टोव के दिनों में एक स्टोव और भी आ गया था ..प्रभात का स्टोव ....इस को जलाने में ज़्यादा मशक्कत न लगती थी ...शांति से चुपचाप चालू हो जाता था और जब तक जलता था बिल्कुल भी आवाज़ भी नहीं करता था .....
केरोसिन पर कल मैंने एक पोस्ट देखी, पहले भी देखी थी,,,, 1940-50 के दशक में मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) का विज्ञापन मोहम्मद रफी की आवाज़ में रेडियो पर बजता था ...चूंकि गोबर के उपले वाला ईंधन घासलेट से सस्ता पड़ता था, इसलिए इस का विज्ञापन खूब ज़ोरों-शोरों से चलता था ...यह बात तो मैंंने विविध भारती रेडियो पर भी कुछ बरस पहले सुनी थी .....सोचने वाली बात है कि हम भी कहां से कहां आ गए हैं और अभी विश्व फिर से अपने फितूर की वजह से, सिरफिरेपन की वजह से कहीं वापिस हमें पुराने दिनों की तरफ़ ही न ले जाए.........अगर आईंन्स्टीन की मानें कि चौथा विश्व युद्ध लाठियों और पत्थरों से लड़ा जाएगा........तो फिर उस के बाद खाना भी (अगर कुछ बचा तो) लकड़ी के टुकड़ों (अगर तब तक जंग ने या हमारे लालच ने पेड़ भी बचे रहने दिए) पर चलने वाले चूल्हों पर ही पकाना होगा ....
लिखा ही होगा मैंने अपनी दो तीन बरस पुरानी उस पोस्ट में कि घासलेट लेकर आना भी पहाड़ पर चढ़ने जैसा मुश्किल काम था ......लेकिन फिल्मी गाने तब भी आम आदमी को उस की तकलीफ़ को ज़्यादा तकलीफ़ नहीं लगने देते थे ....किशोर के ऐसे गीत रेडियो बजते थे और आम आदमी सोचता था कि वह भी इस में शामिल है, वही है राजेश खन्ना,.(1970 का दशक).....
वैसे आप को पता ही होगा कि शायद एमरजैंसी के दिनों में किशोर कुमार के गीतों को आल इंडिया रेडियो पर बजाने पर प्रतिबंध लग गया था .......पाठक बस यह कल्पना ही करें कि हिंदोस्तानियों ने भी कैसे कैसे दिन देखे हैं....लेकिन फिर भी पुरानी पीढ़ियों में ठहराव था, सब्र था, संतोख था.....अब अगर किसी ने राशन की दुकान से केरोसिन लेना है तो उसे सब्र तो रखना ही पड़ता था ....
अच्छा लगा, सुबह सुबह केरोसिन की बातें अपने पाठकों से साझा करने को मौका मिल गया .....फिर से याद दिला दूं ... मेरी यह पुरानी पोस्ट भी देखिए....पूरी बात उस में लिखी है...आज अचानक स्टोव याद आ गया...,अभी कोयले और लकड़ी-चूल्हों वाले दिनों का बोझा भी किसी दिन अपने दिल से उतारना है ....बहुत सी बातें साझा करनी हैं...देखते हैं फिर कभी!
काश इत्ती सी छोटी बात ही किसी के पल्ले पड़ जाए....
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
टैंक आगे बढ़़ें कि पीछे हटें...
कोख धरती की बांझ होती है ...
फ़तह का जश्न हो के हार का सोग,,,
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है...
- साहिर लुधियानवी