“तुम टी सी लगे हो क्या? दिखाओ, अपना वो …आईडी.!!”
परसों जैसे ही अंधेरी स्टेशन से चर्चगेट फॉस्ट लोकल ट्रेन चली तो एक लगभग २५-३० साल के नवयुवक के मुंह से जब यह डिमांड निकली तो लोकल ट्रेन के फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे का माहौल थोड़ा गर्मा गया …
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| १८-२० साल पुरानी मेरी फोटो जिस के बारे में आप आगे पढ़ेंगे .... |
होता है …आज कल कुछ पता चलता नहीं..हम लोग पंगे तो ले लेते हैं ..लेकिन सामने वाले का कुछ पता नहीं….याद होगा कुछ सप्ताह पहले फर्स्ट क्लास डिब्बे के दरवाज़े को बंद करने की ताकीद करने वाले एक २५ साल के जवान लड़के को उस शख्स ने चाकू से गोद दिया…चल बसा बेचारा। महिलाएं भी अब एग्रेसिव होने लगी हैं…कुछ दिन पहले खबर पढ़ी कि सीट के चक्कर में एक महिला ने दूसरी महिलाओं पर पेपर-स्प्रे छोड़ दिया….
हां, तो मैं जिस युवक की बात कर रहा था जो एक शख्स से उस की टी.सी की आई.डी पूछने लगा, वह बात यूं हुई कि जब यह युवक गाड़ी के उस डिब्बे में बांद्रा स्टेशन से सवार हुआ तो ट्रेन खचाखच भरी हुई थी …बहुत से लोग खड़े हुए थे ..।
मैं जहां पर खड़ा था …वहां पास की एक थ्री-सीटर सीट पर बैठे तीन लोगों की तरफ़ एक हल्का सा इशारा करते हुए उसने उन को थोड़ा थोड़ा सा सरकने के लिए कहा …
सरकना-वरकना तो मुंबईकरों ने क्या होता है, बल्कि उस युवक को ही कह दिया गया ….यह फर्स्ट क्लास है, इसमें एक सीट पर तीन ही बैठते हैं …। (मुझे यह बात किसी को कहना ही बिल्कुल बेवकूफी लगती है…हां, कुछ सिचुएशन हैं जहां मैं अपनी इस जजमैंट का इस्तेमाल करता हूं …उस के बारे में बाद में लिखता हूं …पहले यह बात पूरी कर लूं..)...
यह जो बात कही गई ..कि यह फर्स्ट क्लास है…यह चाहे कही एक बंदे ने ही थी, लेकिन साथ बैठे-खड़े कुछ लोगों का समर्थन था, ऐसा माहौल था…
उसी वक्त वह युवक थोड़ा गुस्से में आ गया …और उस बंदे की से मुख़ातिब होते हुए यही कहने लगा ….क्या तुम टी.सी लगे हो? दिखाओ…अपना वो..आई.डी…
मामला थोड़ा सा गड़बड़ाने ही वाला था….
खामखां टी.सी बना वह बंदा कह उठा ….पहले तुम दिखाओ, अपनी फर्स्ट क्लास की टिकट…
यह देखो, अगले ही पल उस युवक ने अपनी टिकट उस के सामने रख दी….
बस, फिर क्या था, सन्नाटा छा गया….
फिर से किसी इंसान को कम आंकने की गल्ती …जो हम सब लोग रोज़ करते हैं, और दूसरों को भी करते देखते हैं….
हम किसी के चेहरे-मोहरे, उस के रूप-रंग से, कपड़ों से किसी की भी ब्रॉंडिंग करने में खुद को एक्सपर्ट मानते हैं …यही हमारी सब से बड़ी बेवकूफ़ी है …
हमें कबीर जी जैसे महांपुरुष अपनी वाणी के ज़रिए अच्छे से समझाते रहते हैं …..
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान…
मोल करो तलवार का, पड़ी रहने दो म्यान….
अब अगर इतनी सी बात भी हमारे पल्ले नहीं पड़ी तो फिर हम लोग कैसे समझेंगे….
हां, गाड़ी आगे चल रही है…हम भी आगे बढ़ें …
हां, दादर स्टेशन आने वाला था तो उस से पहले ही एक बंदा उठने वाला था, वह सीनियर सिटिज़न था..उसने मुझे इशारा किया कि मैं उस खाली सीट पर बैठ जाऊं…मैंने इशारा किया कि उस युवक को बैठने को कहते हैं…
खैर, जब वह बंदा उठा तो उस युवक ने मुझे कहा …अंकल, आप बैठिए…
मैंने उस का हाथ पकड़ कर कहा …नहीं, नहीं, यार, तुम बैठो, हम तो पास वाले हैं, तुम ने यार टिकट ली है…
लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़ कर कहा ..नहीं,नहीं, आप …बैठो…
(बिल्कुल लखनवी बात लगी ..पहले आप ..पहले आप…)
खैर, उसने जितनी आत्मीयता और दिल से मुझे दो तीन बार बैठने को कहा, मैं बैठ गया …
जैसे ही दादर स्टेशन आया …दो तीन लोग और उतर गए…और उसे भी बैठने की सीट मिल गई …
और वह मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर अपना गंतव्य स्टेशन आने पर उतर भी गया....
जब कोई फर्स्ट क्लास में चढ़ जाता है …
जब कोई फर्स्ट क्लास में ऐसा इंसान या समूह चढ़ जाता है जिसे फर्स्ट क्लास के ज्ञानी लोग समझते हैं कि वह तो दूसरे दर्जे की सवारी है, गल्ती से फर्स्ट क्लास में गलती से चढ़ गई है …तो झट से उसे चेतावनी के अंदाज़ में कह देते हैं….यह फर्स्ट क्लास है। ….
अब यहां से बात आगे चलती है ….
मुंबई लोकल के पहले दर्जे में जो लोग भूलवश या अनाधिकृत्त तरीके से चढ़ जाते हैं …वे तीन तरह के होते हैं….
जिनकी गलती सच में मासूम गलती होती है …
ऐसे लोगों के बारे में झट से पता चल जाता है …जो मुंबई लोकल में पहली बार चढा़ है …अभी अभी बाराबंकी, गोंढा की गाड़ी से उतर कर लोकल में चढ़ा है, उस को लोग थोड़ा आगाह कर देते हैं …यह बहुत अच्छी बात है …
यह काम मैं भी अकसर करता हूं लेकिन बहुत सावधानी से ….एहतियात से …एक बाप-बेटा कुछ महीने पहले चढ़े…शायद पहली बार लोकल ट्रेन में चढ़े थे …मैंने उन को आहिस्ता से कहा कि यह फर्स्ट क्लास है …। इसमें चढ़ने से जुर्माना लग जाता है….। मेरी बात सुनते ही वह अधेड़ उम्र का बंदा तो बिल्कुल परेशान हो गया…मैंने उसे समझाया …शांत रहो, आराम से अगले स्टेशन पर उतर कर दूसरे डिब्बे में चढ़ जाना …और उसे महिला डिब्बे में न चढ़ने के बारे में भी बता दिया ….। उसे मेरी बात सुन कर सुकून सा मिल गया ..और वह अगले स्टेशन पर उतर गया ।..
मैंने ऊपर लिखा न कि जो इस तरह के फर्स्ट-टाइम ओफेंडर होते हैं ….उन के बारे में पता चल ही जाता है …और अगर हम जैसे लोगों को पता चल जाता है तो टी.सी- टीटीई को भी तो ज़रूर पता चल ही जाता होगा…अब अगर फर्स्ट क्लास डिब्बे से उतरते वक्त उन के हत्थे चढ़ जाएं तो फिर उन का क्या होता होगा …माफ़ी या जुर्माना…..इस के बारे में मैं ज़्यादा नहीं जानता….
कुछ यंगस्टर्स मस्ती के मूड में होते हैं …
बहुत बार ऐसे युवकों के झुंड भी फर्स्ट क्लास में चढ़ जाते हैं जिन के पास दूसरे दर्जे का टिकट होता है …अकसर यह त्योहारों के दिनों में तो बहुत बार होता ही है …और छुट्टी के दिन भी और नॉन-पीक ऑवर में भी यह अकसर दिख जाता है ..। इन से कौन पंगा ले, लेकिन हां, अगर ये ट्रेन में टीटाई या स्टेशन पर टीसी के सामने आ जाते हैं तो फिर वह इन को अकसर छोड़ता नहीं है …लेकिन फिर भी मुंबई लोकल में यह समस्या बहुत ज़्यादा है ….कुछ तो चढ़ते ही इस अंदाज़ में कि देखेंगे, अगर पकड़े जाएंगे तो दे देंगे पैनल्टी….
कुछ लोगों को पूरी छूट होती है …
इस श्रेणी में वे सब जो पर्स, मोबाईल कवर बेचने हैं, और महिलाओं के डिब्बे में उन के मेक-्अप समान बेचती हैं, इमीटेशन चेन-झुमके बेचती हैं, हेयर क्लिप बेचती हैं….वे बिना किसी रोकटोक के नॉन-पीक ऑवर में पहले दर्जे में चढ़ते-उतरते रहते हैं ..इन में सूरदास भिक्षक, गवैये, ट्रासजैंडर भी शामिल हैं….जो सिर पर हाथ फेर कर आर्शीवाद देने की फीस वसूलते हैं …उन को पता रहता है कि कहां पर लोहा ज़्यादा गर्म है …उसी हिसाब से अपनी फीस वसूलते हैं….कल ही वह किसी प्रेमी-युगल को आशीर्वाद देकर कह रहा था …चेंज नहीं है तो ऑन-लाइन कर दो …इस बात पर वे दोनों हंसने लगे ….
संदेह के घेरे में ….
हमें पता है कि कोर्ट-कचहरी भी बेनेफिट का डॉउट देती हैं…हम तो कोर्ट-कचहरी भी नहीं है, न ही टीसी, टीटाई हैं…फिर हमें भी थोडी़ ब्रेक तो लगा के रखनी चाहिए….जैेसे हम लोग उन मनचलों को फर्स्ट क्लास में तफ़रीह के लिए, मस्ती करने चढ़ गये हैं, उस वक्त हम खामोश रहते हैं, उसी तरह हमें बाकी सभी डाउटफुल केसों में भी चुप रहने की आदत डालनी चाहिए….
लेकिन हम अकसर कपड़े, बॉडी लेंग्वेज और रुप-रंग देख कर बहुत बड़ी गलती कर ही देते हैं…जिस का नतीजे में मारपीट की नौबत आ सकती है …।
विडम्बना है कि मुंबई हो या कोई दूसरे बड़े शहर ……बड़े ही क्यों, छोटे शहरों में भी जिस अंदाज़ में लोग फटी से फटी जीन-पतलून पहन कर निकलते हैं, जिस तरह की चीथड़े हो चुकी टी-शर्ट पहनते हैं,….छोटी छोटी निक्करें पहन कर निकलते हैं …और समाज में सम्मान की नज़र से देखे जाते हैं …ऐसे में ठीक ठाक कपड़े पहने इंसान को हम कईं तरह से कम आंक लेते हैं…बेवकूफी न हुई तो क्या हुआ यह…।
| उसे भी सीट मिल गई तो मुझे बहुत अच्छा लगा ... |
मैंने ऊपर जिस २५-३० साल के युवक की बात लिखी है …आप इस तस्वीर में देखिए…वह ठीक ठाक कपड़े पहना हुआ है ….लेेकिन मैं बैठा उस दिन ट्रेन में यह सोचता रहा कि क्यों इस युवक को ऐसे बोलने की हिमाकत की गई कि यह फर्स्ट क्लास है ….फिर मुझे यही लगा कि शायद इस के कपड़े जिस रंग के हैं वह बीएमसी की ड्रैस है …लेकिन यह भी कहीं नहीं लिखा कि बीएमसी वाली ड्रैस पहन कर कोई फर्स्ट क्लास का टिकट लेकर उसमें नहीं चढ़ सकता ….
| और वह मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतर गया .... |
मैंने उस दिन जिन लोगों के साथ इस बात की चर्चा की और उन को यह फोटो दिखाई तो उन को भी यही लगा कि लोगों ने उसे बीएमसी का स्टॉफ, या बीएसटी का ड्राईवर या कंडक्टर या कोई सिक्योरिटी गार्ड समझ लिया होगा …..लेकिन अगर ऐसी बात है तो यह बात बहुत गलत है….यह तो हमारे स्टीरियो टाइप हो गए कि फर्स्ट क्लास में कौन सी वर्दी पहन कर आदमी सफर कर सकता है। बीच बीच में मुझे अफ्रीका में जो महात्मा गांधी के साथ एक ट्रेन में हुआ वह याद आता रहा ….बस, बात इतनी सी है कि हम फैसले सुनाने में इतनी जल्दबाजी न किया करें ….कबीर जी वाली बात ऊपर पढ़ ली है …उस फर्स्ट क्लास के डिब्बे में दूसरे लोगों के कपड़े जैसे दिख रहे थे उस की फोटो मैं यहां लगा रहा हूं….।
ऊपर चिपकाई मेरी फोटो का राज़ ….
अच्छा, आप सोच रहे होंगे कि इतना सब कुछ तो लिख दिया मैंने ..लेकिन यह समझ में नहीं आया कि मैंने ऊपर क्यों अपनी फोटो लगा दी है …उस फोटो को लगाने का भी एक मक़सद है ..मेरी यह फोटो १८-२० साल पुरानी है …२००७-०८ के पास के दिन थे …जब मैं पंजाब-हरियाणा का माल खा-पी कर (नॉन-वेज और दारू छोड़ कर)...फूल कर कुप्पा हो चुका था…१०० किलो से भी ऊपर। आप भी यही सोच रहे हैं न कि पंजाब हरियाणा में सूफी लोगों के लिए है ही क्या ..है, बहुत कुछ है…ढेरों मिठाईयां, समोसे, गुलाब जामुन, जलेबियां, भटूरे-छोले …..यह सब कुछ आठ-दस बरस ठूंस ठूंस कर मैं इतना भारी भरकम हो चुका था …और ऊपर से मेरी कपड़ों की पसंद …मुझे इसी तरह के कोट और इन के साथ नीचे रेमंड की काली या नेवी ब्लू पतलून बहुत पसद थी …या काली पैंट और सफेद शर्ट ….टीसी-टीटाई वाली ड्रेस ….इसी चक्कर में पंजाब-हरियाणा के जिन भी शहरों में रहा, यहां तक जब भी दिल्ली जाना हुआ और प्लेटफार्म पर खड़ा होता तो एक-दो लोग मुझे टीटीई समझ कर सीट के बारे में, गा़ड़ी के बारे में पूछते या सीट की कोई गुंजाईश है तो भी पूछ लेते …..खैर, अब अगर यह कपड़े पहनूं भी तो कोई न पूछेगा …यह सोच कर कि यह तो कोई रिटायर्ड
टीटी ई होगा …
जब मैं यह टीटीई.टीसी लगने वाली बात बच्चों को सुनाता तो वे हंसी से लोटपोट हो जाते और कईं बार कह भी देते कि पापा …कह दिया करो ……हां, हां, जहां मर्जी बैठ जाओ। लेकिन, मुझे पता है कि इतना फ्रेंडली टीटीई-टीसी अगर पब्लिक को मिल जाए जो इतनी आसानी से कहीं भी बैठने के लिए कह दे ….तो उन को भी यह बात पचेगी नहीं….
हां, अभी पोस्ट को बंद करने का समय आ गया है …कुछ बातें रह गई हैं जिन में मैं लिखूंगा उन किस्सों के बारे में जब मुझ से किसी को पहचानने में गलती हुई और जो बोझ आज तक मेरे दिल पर है …शायद जब उन सब के बारे में लिखूंगा तो कुछ हल्कापन महसूस हो जाए….
हां, अगर कबीर जी की वाणी भी मुश्किल लग रही हो तो काका जी की बात ही सुन लीजिए….मक़सद वही है …बात हमारे पल्ले पड़नी चाहिए….वह भी हमें पचास बरस पहले आम आदमी की ज़बान में कितने प्यार से, दिलफरेब अंदाज़ में समझा गए हैं…..दिल को देखो, चेहरा न देखो…चेहरों ने लाखों को लूटा….दिल सच्चा और चेहरा झूटा….(उस गीत का लिंक)...
तो फिर आज के पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है? ....अपनी जजमेंट संभाल के रखिए अपने खीसे में.....लोग बहुत आगे निकल चुके हैं...। 😂😎😀
