रविवार, 21 जून 2026

कर्नाटक टिफिन रूम भी बंद हुआ ...

कुछ महीने पहले मेरे बेटे ने दो चार बार कहा होगा कि घर के पास ही एक अच्छा साउथ इंडियन फूड सेंटर खुला है..बढ़िया है, अगर कभी इच्छा हो तो चले जाओ करो…लेकिन जैसे आज कल के बच्चे, वैसे ही मां-बाप….जैसे बच्चे हमारी बात को आई-गई कर देते हैं, वैसे ही मां-बाप भी …मैंने भी कुछ खास ध्यान नहीं दिया …यही सोच कर कि आज कल की खाने-पीने की अलग पसंद हैं, हम जैसे पुराने लोगों की अलग…


मैंं न कभी उधर गया और न ही इस के बारे में पूछने की ज़रूरत ही समझी …क्योंकि मेरी यहां वहां ऐसे ही कुछ भी ट्राई करने में कोई दिलचस्पी नहीं रही कभी भी। 


खैर, कुछ ऐसा हुआ एक दिन कि हम सभी से जा रहे थे और वहां पर खाने के लिए चले गए…पहली बार मैंने उस जगह को देखा था ..नाम था …कर्नाटक टिफिन रुम…वहां पर साउथ इंडियन फूड मिल रहा था ..मैंने डोसा खाया…






मैंने डोसा खाया और इतना पसंद आया कि मैंने उस जैसा डोसा घर के बाहर अपनी अभी तक की ज़िंदगी में कभी नहीं खाया था …मैंने जब यह बात बेटे को बताई तो उसने कहा कि मैं तो आप को कह ही रहा था …(घर के बाहर वाली बात इस लिए लिखी कि घर का डोसा तो हर घर में दुनिया का सब से बढ़िया होता ही है…इस में कोई दो राय नहीं)...जैसे मां का बनाया घर का खाना दुनिया का सब से लज़ीज खाना होता है …मांएं जैसे एक बैंच-मार्क सैट कर के चली जाती हैं और फिर ज़िंदगी भर हर खाने-पीने की चीज़ की मां के हाथ से बनी दाल-सब्जी से तुलना करते रहते हैं….और यह पक्की बात है ..अच्छा, लिखते लिखते याद आया कि जैसे हम लोग अपनी मां का खाना याद करते हैं, हमारी मांएं अपनी ज़िंदगी में अपनी माओं (नानी) के खाने की तारीफ़ें करती नहीं थकतीं…जैसे मेरी मां अकसर कहती थी कि नानी के हाथ के करेले, राजमाह, बैंगन का भर्ता…..सब कुछ बेहतरीन था नानी का ….।और हमें सुन कर हैरानी होती थी कि अरे यह क्या, मां के आगे भी कोई है…खाने बनाने में।


बाज़ार के मसाले डोसे से मुझे जो शिकायत है ….


मसाले दोसे बाहर जब खाते हैं तो लगभग सभी जगह जितनी जगहों पर मैं गया हूं ..सांभर एक दम पतला, और दोसा भी बिल्कुल पतला। 


अब पंगा यह है कि जो लोग डाईटिंग पर हैं या उस रेस्टतां में डेटिंग के चक्कर में गए हैं, उन को तो कुछ भी चलेगा….लेकिन यहां तो डाईटिंग-डेटिंग की कोई बात नहीं है, हमें तो भूख लगी है, हम तो भई पेट भरने के लिए जा रहे हैं…लेकिन कुछ मज़ा अकसर आता नहीं …हम वे आलू ही न थोड़ा खाने जा रहे हैं…


मुझे ऐसा लगता है कि रेस्टरां दोसे के मेटीरियल में और सांभर की दाल में बचत करना चाहते हैं….चाहते क्या हैं, करते ही हैं…। एक बात और यही बात मैंने एक बार किसी के सामने कही तो उसने अपना ज्ञान बघार दिया कि असल में सांभर का सही तरीका यही होता है ……..ठीक है, अगर यही पानी जैसा सांभर ही सही तरीका है, तो रखो यार इसे अपने आप ….हमें अपनेे छोले-भटूरे ही मुबारक हैं…। 


वैसे भी साउथ इंडियन फूड से मेरी पहचान बहुत बाद में हुई ….


इडली से पहली मुलाकात….


पांचवी छठी कक्षा में पढ़ते थे ..पैदल डीएवी स्कूल जाते थे ..रास्ते में अमृतसर का मशहूर दुर्ग्याणा मंदिर पड़ता था, उस के बाहर कुछ लोग स्टील के डिब्बों में कुछ सफेद सफेद रंग के गोले से पानी जैसी दाल के साथ बेचते दिखते थे….इसी फुटपाथ पर कुछ मांगने वाले भी बैठे होते थे ….और इस बालपन में मेरे अंदर यह बात बैठ गई कि यह गरीबों का खाना है, कुछ लोग मुफ़्त में बांटने आते हैं….यह बिल्कुल ईमानदारी से लिख रहा हूं…कोई भी इस बात को अन्यथा न ले, जैसा महसूस करता था उन दिनों वही लिखा है…


बात ऐसे ही कईं साल तक देखते रहे इडली सेवा ….बाद में बहुत वर्षों के बाद जब कालेज जाने लगे तो यह भी देखा कि अमृतसर मंदिर में जो श्रद्रालु लोग दूसरे प्रांतों से आते थे …वे अकसर उस सफेद रंग के गोले को खाते थे …..बडे़ चाव से ….उस सफेद रंग के गोले को इडली कहते हैं, यह तो ३० साल की उम्र में पता चला होगा …या इस से भी बाद में। हां, उस सफेद गोले का दाम बहुत कम था …जहां तक मेरी याद मेरा साथ दे रही है, यही कोई पंद्रह या पच्चीस पैसे में एक सफेद रंग का गोला (इडली) मिल जाता था ….। 


उस गोले को खाने का तो क्या, उस का स्वाद चखने का तो प्रश्न ही न था, क्योंकि ऐसा लगता था कि यह हमारे लिए नहीं है…..। 


डोसे से पहली मुलाकात….


२५ साल की उम्र होने पर रोहतक पीजीआई से थोड़ी दूर एक रेस्टरां था जहां पर चाईनीज़ फूड मिलता था …१९८० के दशक के आखिरी सालों की बातें हैं ..उस का नाम था ..मामा मियां….दुकान का नाम याद नहीं आ रहा ….और मुझे यकीं है ब्लॉग पढ़ने वाले भी याद नहीं कराएंगे …खैर, कोई बात नहीं, माडल टाउन एरिया की उस दुकान मेें मसाला-दोसा भी मिलने लगा था ….लिखते लिखते देखिए मुझे याद आ ही गया…अनुपम स्वीट्स, माडल टाउन, रोहतक …


शायद पहली बार या दूसरी बार दोसा खाया था कि १९९० के आसपास …तब तो कुछ और जगहों पर मिलने लगा था….


बंबई में डोसा …..


बंबई में डोसा माटुंगा में श्रीसुंदर का ही अधिकतर खाया, फिर मुंबई सेंट्रल में गीता भवन में एक दो बार (बाद में कभी नहीं गए), फिर मुंबई सेंट्रल में कल्पना और उडिपी ….इन में भी अच्छा मिल जाता था …लेकिन माटुंगा वाला (जिस का उद्घाटन जार्ज फर्नाडिज़ ने किया था ..). । 


अभी कुछ बरसों से माटुंगा के रामाश्रय, और मैसूर दोसा और षणमुखानंद हाल के सामने मद्रास डोसा….ये सब भी बढ़िया हैं…


हमने दोसे को सामान्य दाल रोटी की तरह ही खाया जब भी खाया….छुरी-कांटे से कभी बात बनी नहीं, एक बार भी नहीं ….


और हां, इन सालों में हैदराबाद, बैंगलोर, त्रिचि, केरला गए तो वहां भी डोसा ही ढूंढते रहते …बैंगलोर और हैदराबाद में अच्छा लगा …शायद बाकी जगह हम ही ठिकाने पर न पहुंच पाए हों। 


यह मैं भी कहां का कहां निकल आया….अपनी पसंद नापसंद लिखने बैठ गया…किसी को इस में क्या रुचि हो सकती है….खैर, मैं तो क.टी.एच के बंद होने की बात कर रहा था ..और दूसरा मुझे आज का अपना एक एक्सपिरिएंस शेयर करना है …

कुछ दिन पहले पता चला कि केटीएच में तोड़-फोड़ चल रही थी, पुलिस भी आई हुई थी और वह बंद हो गया है…यह आज सुबह की तस्वीर है …पहले इस के ऊपर एक छत हुआ करती थी …अब वह गायब है….पता नहीं अब कब खुलेगा., बंद क्यों हो गया…आसपास किसी से पूछो तो कोई सीधे मुंह जवाब नहीं देता …वही बम्बईया स्टाईल में कंधे उचका कर कह देते हैं…क्या मालूम। मालूम नहीं। 


आज जिस इडली-वडा स्टाल को ट्राई किया …..


कुछ महीने पहले मेरा एक मरीज़ किसी इडली-वडा स्टाल की बहुत तारीफ़ कर रहा था ….जब किसी खाने पीने की चीज़ की कोई सिख जेंटलमेन तारीफ़ करता है तो वह मेरे लिए काबिलेगौर होती है क्योंकि अमूमन इन के खाने-पीने के स्वाद बढ़िया ही होेते हैं….वह तो कह रहा था कि मैं किसी दिन ले आऊंगा …आप के सारे स्टाफ के लिए भी …मुझे ठीक नहीं लगा …मैंने ऐसे ही मना कर दिया। वह बंदा इस स्टाल की बड़ी तारीफ़ कर रहा था …कि सुबह कुछ घंटे में ही सारा सामान बेच कर चला जाता है। आप को सुबह जल्दी जाना होगा…

आज कुछ साउथ इंडियन खाने की इच्छा हुई ..तो घर के पास ही एक बेन्ने नाम से दुकान है…कुछ दिन पहले शाम के वक्त गया तो बीस-तीस लोगों की लाइन, वापिस लौट आया… ..आज नौ बजे गया …तो दुकान के बाहर आठ-दस लोग लाइन में खड़े थे ….अब यह लाइन में खडे़ होकर डोसे की दुकान में दाखिला लेना …इतना सब्र नहीं है, न ही इतनी कोई मजबूरी…..


फिर मैंने सोचा कि सरदार जी ने जिस स्टाल के बारे में बताया था, उस का पता करें…मैं उस जगह के आस पास ढूंढ ही रहा था कि एक रिक्शे वाले से पूछा कि एक इडली की मशहूर दुकान है ..कहां है, उसने सामने इशारा किया कि दुकान नहीं है, बस, यहां पर बेचने आता है ….बहुत ज़्यादा मशहूर जगह है। 




ठीक है, मैं भी चला गया ..लेेकिन एक कहावत है न कि सेलिंग लाईक हॉट केक्स (हाथों हाथ किसी चीज़ का बिकना) …यह वहां पर चरितार्थ होती दिखी ….सारे परिवार को ठीक से सांस लेने की फ़ुर्सत न थी ….तीस रुपए की एक इडली, तीस में एक मेदू वडा और तीस में ही एक दाल का वडा….मैंने भी दो इडली ली …और साथ में उसने पतली सी दो तीन तरह की चटनी भी डाल दी ….


मैं पास ही अपने स्कूटर पर बैठ कर खाने लगा …तभी मेरी नज़र पास ही दो बाल्टीयां लेकर बैठे एक इंसान पर पड़ी…जो प्लेटे धो रहा था …एक बाल्टी में बचा खुचा डालो, दूसरी में प्लेट को डुबो दो और तीसरी में डुबो कर बाहर निकाल लो….प्लेट अगले ग्राहक के लिए तैयार …


चलो जी, प्लेटें भी हो गईं साफ, ग्राहकों के अगले बैच के लिए 

वैसे यह बात यहां पर कोई नयीं नहीं दिखी …आप जहां भी कुछ खा रहे हैं, थोड़ा सा उस के आगे देखेंगे तो यही कुछ दिखेगा…हां, लेकिन एक बात की उस स्टाल वाले की तारीफ़ करनी होगी कि हर प्लेट पर एक बटर-पेपर जैसा पेपर बिछा कर ही चीज़ परोसा रहा था …लेेकिन चम्मच तो हर किसी को वैसे ही इ्स्तेमाल करना होगा ….जिस धुलाई प्रक्रिया का मैंने ज़िक्र किया है ….

चम्मचों की एक साथ धुलाई हो गई ...
मैं तो भई इस पेपर के चक्कर में इडली खा गया ...

चलिए, यहां खाने का भी शौक पूरा हुआ…आम तौर पर यहां वापिस नहीं आना चाहूंगा ..लेेकिन कभी एमरजैंसी में कुछ खाना हो तो विचार किया जाएगा, जैसा मूड होगा, देखेंगे। हां, आगे से कभी चम्मच इस्तेमाल नहीं किया करूंगा यहां पर….। 


कर्नाटक टिफिन रूम की बात कर रहा था …उस के बंद होने का मुझे बहुत दुःख है, शायद फिर से खुल जाए…पता नहीं …बहुत बढ़िया जगह थी …कियोस्क था …जहां जा कर आर्डर करो, आनलाईन पेमेंट करो …और अपनी बारी का इंतज़ार करो …और बाद में अपनी प्लेट खुद ही डिस्पोज़ करो जा कर …..बढ़िया सर्विस थी….२०० रुपए में डोसा मिल जाता था …लेेकिन सांभर किसी भी चीज़ के साथ नहीं मिलता था ….दो तरह की चटनी ..एक नारीयल की और दूसरी भी …किस चीज़ की? …शायद वह भी नारियल की ही ..लेकिन थोड़े पीले रंग की …। 


कुछ दिन से सोच रहा हूं कि यह टिफिन रूम बंद क्यों हुआ ….खैर, बुरा हुआ ….क्योंकि मुझे पहली बार घर से बाहर का डोसा पसंद आया था…वह भी चांस गया …फिलहाल तो गया ही। 

Closed - आज कर्नाटक टिफिन रूम इस हालत में दिखा ....


अभी यह पोस्ट लिखने के बाद मुझे अपनी बीस साल पुरानी एक पोस्ट याद आ गई..हरियाणा में रहते थे तब....बेटे की जलेबी में प्लास्टिक निकला था उस दिन ....मैंने इतने बरसों बाद आज पढ़ी है ...और जो वीडियो लगाई थी, उसे भी देखिए....यह मेरी ब्लागिंग की शुरुआत थी ...एक भी शब्द बदला नहीं, डिलीट नहीं किया, जोड़ा नहीं ..अपनी किसी भी पुरानी पोस्ट में ...अगर चाहें तो इसे भी पढ़िए और देखिए ....क्या ये बीमारियां परोसने वाले दोने हैं...18 जनवरी २००८