शुक्रवार, 29 मई 2026

उम्र नब्बे साल …. बैटिंग अभी जारी है ….




परसों के अंग्रेज़ी के अखबार में एक फीचर देखा …रस्किन बॉंड पर था ..90 साल के हैं …वह अच्छे से जीने के गुर बता रहे थे उसमें…हर दिन पेपर में कुछ तो खास होता है …उस को काट कर रख लेते हैं, या सोचते हैं कि कतरन सहेजेंगे लेकिन बहुत बार भूल-भुला जाते हैं …कईं बार कुछ लेख ऐसे भी होते हैं जिन्हें फ्रेम करवा के रखने की चाहत होती है …


रस्किन बॉंड का फीचर भी ऐसा ही था …अगले दिन तक वह मेरे पास पड़े एक विंटेज-फ्रेम के अंदर पहुंच ही गया …


अगर इसे पढ़ना चाहें तो इस फोटो पर क्लिक करिए, वरना आन-लाईन सर्च कर के पढ़िए...


मुझे बॉंड का लिखा बहुत पसंद है …पिछले कुछ बरसों में मैंने इन को खूब पढ़ा है…लिखने का स्टाईल बहुत बढ़िया है …बिल्कुल सीधी सादी भाषा…और अपने आस पास से प्रेरित लेख, कहानियां….यह जो परसों फीचर था, इसमें भी अधिकांश बातें मैंने इनकी किसी न किसी किताब में पढ़ी हुई हैं, कहीं इन के किसी इंटरव्यू में सुनी हुई हैं …लेकिन फिर भी यह फीचर स्पैशल तो था …इसीलिए फ्रेम में जा पहुंचा ….चाहे ए.आई से बनी एक फोटो भी इसमें थी, लेकिन वह भी इतनी दिलकश और कुदरत के बीचोंबीच ….जैसी ज़िंदगी वे मसूरी के पास जी रहे हैं ..बिल्कुल वैसी ही तस्वीर ….। 


परसों बहुत बार रस्किन बॉंड का ख्याल आया…


कल की अखबार में एक और 90 साल की उम्र वाली की दास्तान पढ़ी….देश का नामचीन डाक्टर, एक बहुत प्रतिष्ठित मेडीकल कालेज में प्रोफैसर एंड हैड रह चुका …बहुत नाम वाला डाक्टर …फोटो भी छपी थी जिस में वह लकड़ी की कुर्सी पर बैठे हैं और उन के नौकर-चाकर उस कुर्सी को उठा कर उन को ऊपर तीसरी मंज़िल पर उन के फ्लैट तक ले जा रहे हैं…चलने-उठने में दिक्कत है …और ऊपर से कोर्ट-कचहरी चल रही है मालिक मकान के साथ …पगड़ी-वगड़ी वाली व्यवस्था के ज़माने से फ्लैट में रह रहे हैं….अपने सेवक को कुछ दिन पहले गोद ले लिया है और अपनी जायदाद उस के नाम लिख दी है…और लिखा था कि कोर्ट-कचहरी में जो केस चल रहे हैं उन सब की जड़ वही सेवक है …उकसाता रहता है, पट्टियां पढ़ाता रहता होगा….


चाहे कपड़े उन्होंने एकदम चकाचक पहने हुए थे …लेकिन उस से क्या होता है …इस उम्र की अपनी परेशानियां क्या कुछ कम होती हैं ..ऊपर से यह सब झेलना…..। मालिक मकान ने खराब लिफ्ट को रिपेयर ही नहीं करवाया…कोर्ट ने अब आदेश दिया है कि लिफ्ट नई लगवा लो….। 


बुरा लगा इतने बडे़ नामचीन की ऐसी हालत देख कर ….


पिछले दो दिनों से यही 90 साल की उम्र तक पहुंचने वालों की याद आती रही …कुछ नामचीन हस्तियां जब 90 साल की थीं तो उन के किसी न किसी प्रोग्राम में जाने का मौका मिला था….उन प्रोग्रामों के दौरान यही लगता था कि ये सब देश-समाज के बेशकीमती नगीने हैंं, काश…ये ऐसे ही चलते रहें लंबे अरसे तक …


आज से 13-14 बरस की बात है …शायद 2013 की …महान् गीतकार गोपाल दास नीरज जी का 90 वां जन्मदिन था..लखनऊ के विशाल सभागार में था …उस में शिरकत करने का मौका मिला….एक बिजनेस हाउस था जिस के द्वारा यह आयोजित किया गया था …उन्हें 90 हज़ार रुपए नगद दिए गए …उपहार स्वरुप ..और यह घोषणा की गई कि हर साल उन की सालगिरह मनाई जाएगी और वे जितने बरस के होंगे उतने हज़ार उन को तोहफ़े में दिए जाएंगे …


वे व्हील-चेयर पर थे …लेकिन बोलचाल में एक्टिव थे …उस दिन का यह व्हीडियो देखिए…अफसोस, अगले दो तीन बरसों में ही चल बसे…



लखनऊ में मुशायरे अकसर होते हैंं…जब भी बज़ुर्ग शायरों को देखते-सुनते उन की सलामती की दुआ करते …बाल काले रंग लेने से कुछ होता वोता नहीं …उम्र तो झलक ही जाती है …लेकिन इन सब में मुनव्वर राणा और राहत इंदौरी तो बेवक्त ही चले गए …आपने खबर पढ़ी होगी ..कल जनाब बशीर बद्र भी चले गए …कुछ अरसा पहले इन की कुछ व्हीडियो देखी थीं, बीमार चल रहे थे …बहुत बढि़या लिखते थे …लखनऊ में रहने के दौरान शायरों को देखने-सुनने- पढ़ने और इन की लिखी किताबें खरीदने के मौके मिले …एक नोटबुक रखने का आइडिया आया …2015 में लिखा यह पेज़ अभी खोल के देखा …बशीर बद्र साहब की शायरी इसमें दर्ज हैं …दूसरे कुछ शायर जिन के शेयर इस में लिखे हुए हैं ….निदा फ़ाज़ली, मुन्नवर राणा, राहत इंदौरी, वसीम बरेलवी, अकबर इलाहाबादी, फ़ैज़, गोपाल दास नीरज, जावेद अख्तर, साहिर लुधियानवी….मुझे इन सब की कही बातें ही समझ में आती हैं…बातें बहुत बड़ी होती हैं लेेकिन कहते इतने आसान अल्फ़ाज़ में हैं कि सीधी दिल में उतर जाती हैं ….


2015 में मैंने नोटबुक में लिखी थी ..उम्मीद की, फिर से उठ कर खड़े होने की ...बशीर बद्र की कही बात...

खु़दा बशीर बद्र साहब को जन्नत में जगह दे …नेक इंसान, हरदिल अज़ीज़….आम आदमी की बात उसी की सादी ज़ुबान में कहने वाले अज़ीम शायर ...



बस, पिछले दो तीन दिनों से 90 साल की उम्र वाले ही दिलो-दिमाग पर छाए रहे ….सबब भी कुछ ऐसा बना कि कल कुछ ढूंढ रहा था तो दो किताबें भी ऐसे ही लोगों की हाथ में पड़ गईं….एक तो थी खुशवंत सिंह की …लेसन्ज़ आफ़ मॉय लाईफ …Lessons of my life! आप को पता ही है कि खुशवंत सिंह भी कलम के बहुत धनी थे….जो लोग जानते हैं वे उन को इलस्ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया के दिनों से जानते हैं …और कईं बरसों तक हर हफ्ते हिंदी और इंगलिश की अखबारों में उन का लेख छपता था …उन की भी किताबें पढ़ने का मौका मिला …यह किताब भी उन्होंने 90 साल पूरे होने के बाद लिखी थी ..बढ़िया है ..हर लेखक अपने अनुभव साझा करता है ..कोई सबक सीखना चाहे तो सीख ले, वरना वे तो अपना काम कर के चले गए……।



दूसरी किताब जो हाथ पड़ गई …वह संत पुरुष दलाई लामा की थी ..खुशी के ऊपर …आधी पढ़ी थी ..बहुत बढि़या लिखते हैं…ये भी 90 साल की उम्र का माईल-स्टोन कहीं पीछे छोड़ चुके हैं…ईश्वर से प्रार्थना है कि ये सेंचुरी मार के और भी आगे चलते रहें ….मानवता को प्यार और खुशियां बांटने का सबक सिखाते रहें …


ज़िंदगी हर इंसान की अलग होती है, अलग हालात….जब लेखक लिखते हैं तो अपने अनुभव लिखते हैं …जो उन्होंने भोगा, उसे वे लिख देते हैं …इसलिए जो भी ऐसे लोग लिख कर गए हैं मौका मिले तो उन को पढ़ते रहना चाहिए ..क्या पता कोई ज्ञान का मोती हमें भी मिल जाए और हमारी ज़िंदगी ही बदल दे ….


ये तो उन कुछ बड़े नामचीन लोगों की बातें हैं …लेकिन आम लोग भी जो 90 का लक्ष्य पार कर जाते हैं, मैं उन से बड़ा मुतासिर होता हूं जैसे मेरे इर्द-गिर्द तीन जो सहायक हैं वे खामखां मेरे से मुतासिर हैं …ये सब बीस-तीस-और चालीस वाली उम्र वाले हैं…कभी कोई बात चलती है तो कईं बार कह चुके हैं कि पता नहीं हम लोग आप की उम्र तक भी पहुंच पाएंगे या नहीं, जैसी आबोहवा है, जैसा हम लोग खा-पी रहे हैं ..हम तो अभी से ही….।


फिर कहते हैं कि इस उम्र में भी आप के इतने घने बाल हैं और आप उस उम्र में भी …….मैं उन की इस बात से डर जाता हूं …पहली बात तो ये कि कहीं इन की नज़र ही न लग जाए…फिर मैं कहता हूं कि मेरे घुटनों की हालत तो तुम लोग देखते ही हो …फिर कहते हैं कि घुटनों का क्या है, सर, वे तो आज कल जवान लोगों के भी घिस जा रहे हैं…..


मैंने ऊपर लिखा कि मैं 90 साल और उस के पार पहुंच चुके लोगों से बहुत प्रभावित हूं. और जब भी इस उम्र के मरीज़ मेरे पास आते हैं तो अकसर उन के साथ पांच-सात मिनट बिताने का वक्त निकाल लेता हूं और मौका मिलने पर एक फोटो भी उन के साथ खिंचवा ही लेता हूं …हर बार मेरा उन से एक सवाल तो होता ही है कि इस सेहत का राज़ हमें भी बताएं….जब वे यह राज़ बताते हैं तो मेरे तीनों सहयोगी अच्छी तरह से कान खोल कर सुन रहे होते हैं और दो चार दिन पहले जो 91 बरस का शख्स एक दम फिट चलता फिरता आया ….तो बाद में कहने लगे ..सर, हम तीनों की उम्र भी अगर जोड़ दें तो इन की उम्र 91 तक पहुंचते हैं …हैरान थे …बहुत हैरान थे…मुझे ही देख कर हैरान रहते हैं तो मेरे से 25-30 साल बड़े बंदे को देख कर तो इन की आंखें फटी की फटी रह जाती हैं… हा हा हा हा हा हा …चलिए, सभी 90 की उम्र वाले और उस के पार वाले कम से कम सेंचुरी तो ज़रूर ही लगाएँ ….


पहले 80 साल की उम्र तक पहुंचना बहुत बार थी …1975 में दादी और 1981 में नाना जी चल बसे….मुझे याद है कि मां-पिता जी तो गमगीन थे ही, मां-बाप होते हैं.. ..लेकिन हम बच्चे थे, हमारे सामने ऐसा दिखावा करते थे कि अब उम्र हो गई थी, कितना वकत और ….दादी की तो गुसलखाने में गिरने से कूल्हे की हड़़्ड़ी टूट गई थी..बस, कुछ महीने वह बिस्तर पर ही पड़ी कराहती रही …जब तक की बेड-सोर ने उन को हम से छीन ही न लिया…दादी, नाना और नानी ये सभी 80-82 की उम्र तक पहुंच चुके थे …नानी को जब ब्लैडर-कैंसर हुआ ..जितना संभव था, इलाज हुआ …फिर भी चल बसीं….बाद में यही सुना कि इस उम्र में तो बस बहाना ही बनता है ….. 


खैर, आज कल 80 की उम्र पार करना कोई बडी़ बात नहीं रही ….अकसर लोग चलते-फिरते मिल जाते हैं….अब जो आंकड़ा प्रभावित करता है वह 90 साल वाला है ….इसलिए 90 साल या ऊपर के लोगों से मुझे बात करना, उन की ज़िदगी से कुछ सीख लेना ….अकसर मेरी प्रॉयर्टिटी लिस्ट में शामिल होता है…


पिछले 15-20 बरसों से जिन भी उम्रदराज़ लोगों से मिलना हुआ…उन की बात मैंने दर्जनो ब्लॉगों में सहेज रखी हैं, यही सोच कर कि अगर ये लोग किताब नहीं लिख पाए, या इन का किसी ने इंटरव्यू नहीं भी मिला तो कोई बात नहीं, इन की सीख भी तो सहेजने लायक है ..हर इंसान की होती है….मैं अकसर कहता हूं कि हर इंसान अपने आप में एक अच्छा-खासा नावल है जिसे छपने का मौका नहीं मिला ……


दस साल पहले ..91 स्कोर कर चुके शर्मा जी के साथ लेखक 

वह अलग बात है कि अपना लिखा बाद में मैं कभी खुद भी नहीं पढ़ता ..लेकिन अभी कोई एक तो ऐसा ढूंढ ही लूंगा…अपने ब्लाग पर जा कर सर्च किया ..बुज़ुर्ग की सीख तो बहुत से लेख दिख गए (मेरे ब्लॉग के डेस्कटाप वर्शन में जाकर आप भी यह एक्सरसाईज़ कर सकते है…)फिलहाल उसे ज़रूर पढ़िए…91 वर्षीय शख्स की सीख ….(इन की सीख आप लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं)...


अभी मुझे 10-15 साल पुराने ब्लाग दिखे तो कुछ 80-90 साल के बुजुर्गों की बातें भी उसमें दिखीं…फोटो भी दिखीं कि चींटी की चाल से ही सही, लेकिन फिर भी बाग में टहलने ज़रुर आते है और पूरा चक्कर लगाते हैं …कुछ तो वॉकर लेकर आते हैं …इन सब की ज़िंदादिली को सलाम…..


90 की उम्र का आंकडा़ ही कुछ ऐसा है ….अब बच्चों की यह तमन्ना होती है कि कैसे भी उन के मां-बाप 90 की उम्र तक तो पहुंचे ….मुकद्दर वाले पहुंचते भी है और एक बार यह बैरियर पास होने पर वही हसरत सेंचुरी मारने वाली जन्म ले लेती  है …स्वभाविक सी बात है ….बच्चों के लिए मां-बाप का यही रुतबा होता है ….हां, कईं बार विभिन्न वजहों से बुजुर्ग खुद ही थक जाते हैं …वहां तक पहुंचते पहुंचते …वह अलग बात है …वह अपने आप में एक बहुत बड़ा मुद्दा है ….। 

टांवे टांवे ही सेंचुरी मार पाते हैं ….कईं महीने पहले मैने अखबार में किसी 100 साल के बंदे के बारे में शोक-संदेश देखा तो उस की कतरन रख ली….यह भी एक कलेक्टर-आईटम लगी मुझे ……क्या जाने कितने बरसों बाद अखबार मेें ऐसा संदेश दिखता हो …


जाते जाते एक बात …हमें अपने मां-बाप की बढ़ती उम्र का आभास ही नहीं होता अकसर …जब तक कोई हमें जताता नहीं …हमें लगता है खा पी रहे हैं, खुश हैं, मस्त है, चलते फिरते हैं …अभी तो ये लंबे अरसे तक हमारे आस पास ही हैं लेकिन जब मेरी मां को 87-88 साल की उम्र में पेन्क्रियाटिक कैंसर ने धर दबोचा, तो सभी जांचो् के बाद एक तरह से जवाब ही मिल गया….मैंने जब कीमो के लिेए डाक्टर से पूछा तो उसने उन की पतली हालत को देख कर मेरी ही तरफ़ सवाल उछाल दिय….क्या ये सब झेल पाएंगी यह इस हालत में ? ..मैं बुझा हुआ बाहर आ गया ..लेकिन एक बड़े हास्पीटल के बडे़ डाक्टर के शब्द मुझे बहुत चुभे….अभी तक चुभते हैं …असहाय दर्द से निजात पाने के लिए उन की छाती पर मारफीन के पैच लगते थे …वह लगते ही वह बेसुध ही पड़ी रहती कईं कईं घंटों तक …एक बार मैे जब उन के पास गया कुछ पैच लेने तो मुझ से पूछने लगा कि कैसी हैं मां, मैंने कहा कि बस सोई रहती हैं हर वक्त …उसने आगे कहा …देखना, भई. माता कहीं सोई की सोई न रह जाए, ध्यान रखना। 


मुझ उस की बात बहुत बुरी लगी ….बात सच्ची थी, लेकिन कहने का अंदाज़ बहुत बेहूदा था …कितनी दिन टिकतीं, तीन-चार महीनों में ही यह गई, वो गई ..90 तक न पहुंच सकी…….लेकिन जाते जाते वह भी एक ऐसी सीख दे गई जिसने मेरे आंसू सुखा दिए….


इस नश्वर शरीर को छोड़ने से एक दो दिन पहले मुझे परेशान देख कर ईशारे से अपनी तरफ़ बुलाया ….और धीरे धीरे बोल कर मुझे सीख दी….


“ प्रवीण, दिल बड़ा रखना होता है, मां-बाप हमेशा साथ नहीं रहते”.......


अभी इस पोस्ट को बंद करते वक्त मुझे गोपाल दास नीरज का कलमबद्ध किया हुआ यह गीत याद आ रहा है ...मां नहीं, बाप नहीं .....कुछ भी नहीं रहता है ....