बुधवार, 30 नवंबर 2022

दादी नानी के टोटके याद आने लगे हैं हमें भी ...

कल रात कभी मेरे एक घुटने में दर्द हो जाए, कभी दूसरे में ...जब करवट लेता हूं तो घुटने भी चूं-चूं करने लगे हैं...कभी एक करवट लेकर लेटे रहो तो कूल्हे में दर्द शुरू हो जाता है...फिर पासा बदलना पड़ता है....ये छोटी मोटी दर्दें वर्दें तो बढ़ती उम्र के साथ चलती ही रहती हैं...कभी मां को इस तरह की तकलीफ होती तो हम चिंता करते तो वह झट से कह देती...यह कोई बात नहीं, यह तो चलता ही है, अब ७०-८० बरस से इन को हम वाह रहे हैं (इन से काम ले रहे हैं)....इन की भी एक हद है...बस, काम चल रहा है न...और इतना कहते हुए वह ईश्वर का शुक्रिया अदा करने लगती...

यह तो हुई मां की बात ...नानी दादी की बातें भी कभी कभी याद आ जाती हैं तो बड़ी हैरानी होती है ...नानी को टांगों में अकसर दर्द रहता था ..कभी मूड होता तो हम उन की टांगें दबा देते लेकिन बच्चे कहां काबू में आते थे तब भी ...इसलिए मैंने कईं बार देखा कि नानी ने दो-तीन नाड़े जोड़ के एक बड़ा सा नाड़ा बनाया हुआ था ..एक नहीं दो ...और दोनों टांगों पर नानी उसे अपने आप कस से बांध लेती थीं...और फिर कुछ घंटों के बाद खोल देती थी...हमें भी इतनी समझ कहां थी कि नानी को मना करें कि इस से खून का दौरा बंद हो सकता है ...इतना कसना ठीक नहीं है ...और हम देखा करते कि जब वह उस नाड़े को अपनी टांगों से खोलती तो उन की पिंडलियों पर गहरे निशान पड़े होते ...

खैर, यह तो थी टांगों में दर्द खत्म करने का नानी दादी का जुगाड़....और हां, घर में कुछ आयोडैक्स जैसा (आयोडैक्स नहीं) भी पड़ा रहता था ...जिसे कहीं भी दर्द होने पर थोड़ा लगाया जाता, थोड़ा रगड़ दिया जाता ..खास कर के सिर दर्द और गर्दन वर्दन में दर्द होने पर या मोच-वोच पड़ जाने पर ...। अगर कहीं बात कोई गोली खाने तक पहुंच भी जाती तो सेरीडोन की एक गोली बीस-पच्चीस पैसे की भाग कर जा के ले आते ..

और हां, जब कभी हमें चमूने काटने लगते (लखनऊ में रहा हूं ...कुछ बरस ..वहां इसे चुन्ना काटना कहते हैं) तो पहले तो यह खिंचाई होती कि और खाओ मीठा, और खाओ चीनी के परांठे (जो कि मुझे बहुत पसंद थे बचपन में)...फिर इलाज के तौर पर प्लास्टिक की एक शीशी से सरसों का थोड़ा तेल हमारी हथेली पर रख दिया जाता कि जाओ, लगा लो, अभी ठंड पड़ जाएगी....अरे वाह, सच में तुरंत ठंड पड़ जाती थी ...और एक बात, यह चमूने काटने वाला पंगा है क्या, अगर पता है तो ठीक है, वरना, इस बात पर यहीं मिट्टी डालिए और मेरे साथ आगे बढ़िए...

अब, क्या तकलीफ रह गई..हां, बदपरहेजी हो जाना, पानी ज़्यादा पी कर अगर पेट आफर जाना तो उस का इलाज था ...मिट्ठा सोडा एक या आधा चम्मच पानी के साथ ले लेना...वह भी काम कर ही जाता था ...बाद में पता चला कि इस तरह से उसे इस्तेमाल करना भी ठीक नहीं है, नुकसान हो सकता है ...और पेट के दर्द का एक ही इलाज था, अजवायन और नमक की फक्की मारो पानी के साथ और आराम करो..

एक बार मां को पेट में भयकंर दर्द उठा रात के वक्त ..हम उस दिन नानी के पास थे ..हमें कुछ नही पता था कि डाक्टर भी होते हैं इन कामों के लिए ...नानी ने पानी गर्म किया, यही अजवायन-नमक दिया....मां भी कराहती वराहती कब सो गई ...और हम भी। बहुत बरसों बाद पता चला कि पित्ते में पथरियों की वजह से भी उस तरह का दर्द उठ सकता है ...खैर, बाद में पित्ता ही निकलवाना पड़ा पत्थरीयों से भरा हुआ ...गर्म पानी से याद आया कि यह भी एक घरेलू इलाज जबरदस्त था ...था क्या, मेरे जैसे तो अभी भी करते हैं, सिर विर दर्द होने पर गर्म सिकाई करता ही हूं...हां, पहले कांच की बोतल में करते थे, अब वे डकबैक की बोतलें आ गई हैं...जिन में गर्म पानी डाल कर सिकाई करते हैं ...हमारे ताऊ और ताई जी तो सर्दी के दिनों में एक एक दो दो बोतलें ऐसे ही बिस्तर में बिना दर्द के भी रख लेते थे ..गर्माइश के लिए ...। बोतलें के बाद अब हमारे पास हीटिंग पैड आ गए हैं......शक्ल ही बदली है, फंडे वही दादी-नानी वाले ही हैं...

दादी जी को पकौडे़ बहुत पसंद थे ...और जब भी पकौडे़ बनते, दादी इतने ज़्यादा खा लेतीं कि अगले तीन चार दिन रोटी-पानी की छुट्टी...उन्हें गैस सिर पर चढ़ जाती और वह सिर पर दुपट्टा बांध कर, और मीठा सोढ़ा खा खा कर दो तीन दिन के बाद कहीं कायम हो पातीं...दुपट्टे बांधने से याद आया कि वह प्रथा भी मां-पिता जी, दादी -नानी के ज़माने से चली ही आ रही है...सिर दुखने पर मुझे भी सिर पर कोई कपड़ा आज भी बांधना ही पड़ता है ...बचपन में हम देखा करते थे कि महिलाओं को सिर दर्द वर्द की वजह से भी कहां घर के काम काज से छुट्टी मिलती थी ...मां का सिर दुख रहा होता, उसने सिर पर दुपट्टा बांधा होता और अंगीठी पर हमारे परांठे सेंक रही होती, वहां से फारिग होती तो डंडे (थापी) से कपड़ों को पीट पीट कर साफ करना शुरू हो जाती .....हमारा क्या था, हम तो अपनी मस्ती में मस्त थे ...बस, हमें परांठे मिल रहे थे, कपड़े साफ धुले हुए मिल रहे थे ....शायद हमें वहां तक ही मां से मतलब था...

गला खराब होने पर, जुकाम होने पर ...भट्ठी से चने भुनवाए जाते और उन्हें खाया जाता, अदरक वाली चाय पी जाती बार बार, पतला सीरा (हम तो उसे लसबी कहते हैं...बेसन से बनती है) पिया जाता और दो तीन दिन मुलैठी चूसी जाती ....और हम ठीक भी हो जाते ..और मुलैठी चूसने और गरारे करने की बात पर हम आज भी अमल करते हैं ...और जब ठंडी-जुकाम हो तो चाय में नमक डाल कर पीना भी याद आता है कभी कभी ...

कोई कितना लिखे, इस की भी अपनी सीमा है ...लेेकिन जब तक कोई अपने दिल की बातें लिखे नहीं तो दूसरों को पता कैसे चले कि पहला दौर क्या था .....

अब पोस्ट बंद करने लगा तो याद आ गया आंख का भी इलाज...जिसे इंगलिश में कंजकटिवाईटिस कहते हैं...उसे पंजाबी में कहते हैं कि आंखें आ गई हैं...और उस का इलाज यही होता था कि कहीं से वह एक लहसून की एक तुरी की शक्ल वाला एक आई-एप्लीकैप ले आते थे ...पांच पैसे में मिलता था कैमिस्ट के यहां से ...उसे दो चार बार डाल देते थे ..कहीं जा कर दिखाने का रिवाज था नहीं .....और हां, आंख में जो बाकी कष्ट होते थे, खारिश होना, आंखों का लाल हो जाना.....उस के लिए नानी के पास एक सुरमचू था (जिस से आंखों में सुरमा डालते थे) उसे वह एक लहसून (असली लहसून, वह आई-एप्लीकैप नहीं) की फांक में घोंप कर आंखें में उस सुरमुचे को फिरा देती ...जैसे सुरमा डालते हैं उसी अंदाज़ में ...और बस, दो मिनट के बाद नानी कहने लगती और नानी के बाद मां भी यही कहतीं कि बस, ठंड पड़ गई है ....इतनी खारिश हो रही थी आँखों में ....। 

अब इस पोस्ट को बंद करने का वक्त है ....क्योंकि मैं लिखते लिखते ही ऊब गया हूं ...आप पढ़ते पढ़ते भी कहीं ऊब गये तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी....

नोट ...इस में लिखे किसी भी दादी नानी के टोटके को अपने जोखिम पर इस्तेमाल करें....मैंने तो एक तरह से अपने अनुभव ब्यां किए हैं कि हम लोग ऐसा करते रहे हैं, मैंने यह नहीं कहा कि यह ठीक है, गलत है....सेहत से जुड़े सभी फैसले अपने डाक्टर से परामर्श करने पर ही करें ..........बस, जाते जाते एक मशविरा है कि चीनी के परांठें मत खाया करिए क्योंकि चमूने लड़ने की वह एक खास वजह है ...लीजिए, जाते जाते एक बात और याद आ गई ...जब पेट से बड़े बड़े कीड़े निकलते थे तो हम तो डर जाते ...लेकिन हमें कीड़ों की दवा दिला दी जाती ...पीठ पर घमौरियां होने पर लगाया जाने वाला नायसिल पावडर तो बहुत बाद आया...पहले तो बनियान उतार कर नवारी चारपाई पर लेट कर या किसी कंघी की मदद से खारिश से मुक्ति पा ली जाती थी और अगर बात आगे बढ़ जाती तो फिर कईं बार उन बड़ी बड़ी घमौरियों पर मुल्तानी मिट्टी भी लगाने की नौबत आ जाती ...

और साइडें अगर लग जाती पसीने की वजह से ....तो भी इलाज वही सरसों का तेल लगाओ ....और बाद में उस पर पावड़र छिड़क लो ...इन दोनों चीज़ों को एक साथ इस्तेमाल करने से एक अजीब सी परत बन जाती थी साइडों पर ....हां, खुजली से तो बच जाते थे ..और करते भी तो क्या करते, न तो हमें पता था कि यह फंगल है, और न ही कैंडिड का कुछ अता-पता-ठिकाना था, और न ही अमूमन लोगों को डाक्टर तक पहुंच ही थी ......और अगर हम जैसों की थी भी तो उसे क्या कहें कि जांघ के अंदर खुजली से परेशान हैं, साइडें लग गई हैं....इसलिए हम लोगों ने अपने मन को भी कुछ ऐसे समझा लिया था कि चुपचाप सरसों का तेल लगाओ और प्रभु के गान गाओ.....राम जी भली करेंगे ...😂

अब मैं उषा उथुप को सुनूंगा ...कुछ दिन पहले उन्हें देखा था तो यह रिकार्डिंग की थी ....मुझे इन के गीत सुनना बहुत अच्छा लगता है ...जब मैं १७ बरस का था तो उन दिनों उन का वह गीत खूब बजा करता था ...रम्बा हो ..रम्बा हो .....और हां, मुझे उस दिन इन को लाइव सुनते हुए यह पता चला कि हरे रामा हरे कृष्णा का वह सुपर डुपर गीत ...दम मारो दम ...भी इन्हीं का ही गाया हुआ है ...

पोस्ट बंद करने पर ध्यान आया कि कान में दर्द में भी क्या बेवकूफी किया करते थे ...सरसों के तेल में लहसून डाल कर उसे गर्म किया जाता और उस की एक दो बूंद कानों में डाल दी जातीं....हमारे पास ही ईएनटी का एक बहुत बड़ा विशेषज्ञ है, अगर उसे यह पता चल गया तो बड़ी बात नहीं वह मेरी पिटाई ही कर दे ....😂