Saturday, August 11, 2018

परवाज़ सलामत रहे तेरी, ए दोस्त

आज सुबह ११ बजे के करीब मैं एक मरीज़ का चेक-अप कर रहा था...इतने में मेरे कमरे के बाहर पंक्षियों की तेज़ तेज़ आवाज़ें आईं...इस तरह की आवाज़ें अकसर तभी सुनती हैं जब कोई पंक्षी किसी मुश्किल में फंस जाता है ...

कमरे के परदे हटे रहते हैं वैसे भी ..खिड़कियां बंद रहती हैं ए.सी की वजह से ...और बाहर का नज़ारा अच्छा है, दूर बड़े बड़े पेड़ दिखते हैं...खुला आकाश दिखता था ..इसलिए अपनी तुच्छता का अहसास बना रहता है ...

परिंदा इस काली तार में उलझ कर उल्टा लटक गया था
बहरहाल, मेरे अटैंडेंट सुरेश ने झट से खिड़की खोल कर बाहर देखा तो एक परिंदा इस तार से उल्टा लटका हुआ था .. दरअसल हुआ यूं कि परिंदा इस तार पर आ कर जैसे ही बैठा होगा (यह बिजली की नहीं, टैलीफोन की तार थी)...उस के पैर पतंग वाले मांजे में अटक गये ...वह बेचारा क्या कोशिश करता उस जाल से अपने पैर को निकालने की । बस, कुछ ही पलों बाद वह उसी मांज के साथ उसी तार के साथ बिल्कुल उल्टा लटक गया...और लगा चीखने....

इसी आवाज़ को सुनते ही कुछ और परिंदे आ गये होंगे इसी जगह के ऊपर और वे भी चीखने-चिल्लाने लगे होंगे ...जो आवाज़ हम लोगों ने सुनीं..

इत्तेफ़ाक देखिए कि इस कमरे की खिड़की से चंद कदम की दूरी पर सरकारी ऐंबुलेंस खड़ी रहती है ...उस के ड्राईवर ने परिंदे पर आई मुसीबत को देखा तो झट से पंक्षी को सहारा देने के लिए लपका ...इतने में मेरे अटैंडेंट ने भी खिड़की खोल दी थी...उस ऐंबुलैंस वाले ने उस परिंदे को तब तक आराम से सहारा देने लिए पकड़ लिया था ...शायद वह उस डोर को जोर से खींच के उसे  तार से छुड़वा लेता .. लेकिन मेरे अटैंडेंट ने तब तक कमांडिंग ऑफीसर की कमान संभाल ली थी ...उसने उस ऐम्बुलेंस ड्राईवर को कहा...नहीं, नहीं, ऐसे नहीं खींचना, यह चाईनीज़ मांजा होता है, इस का पैर कट जायेगा....मैं तुम्हें ब्लेड देता हूं...

इतने में वह ड्राईवर कहने लगा कि यह तो काट रहा है ....फिर कमांड की तरफ़ से उसे मशविरा मिला ...देखो, इस को ऐसे गर्दन के पास से मत पकड़ो, इसीलिए यह काट रहा है,  पीछे से पकड़ो। उस ड्राईवर ने वैसा ही किया और पंक्षी ने काटना बंद कर दिया...

इतने में सुरेश ने ब्लेड़ निकाल लिया था ...जिसे इस्तेमाल कर के उस मांजे को काटा गया जिस के साथ वह तार से लटक गया था ...चलिए, कुछ काम हुआ तो ...

अब आगे का किस्सा यह था कि उस परिंदे के पैरों के इर्द-गिर्द मांजा इतनी पेचीदगी से कसा गया था कि उसे छुड़वाना भी एक चैलेंज था ...ऐंबुलैंस वाला प्राणीयों पर दया तो करने वाला था ...लेकिन शायद थोड़ी जल्दी में था....वह उस उलझे हुए मांजे को खींच कर परिंदे के पैर से अलग करने लगा ...फिर खिड़की के इस तरफ़ से उसे हाई-कमान का फ़रमान मिला ....न भाई न, ऐसे खींचना मत, उस का पैर कट जायेगा..।

अब तक परिंदा शांत हो चुका था ... ड्राईवर साहब ने उस परिंदे को बडे़ प्यार से पकड़ रखा था ...मैं और सुरेश उस मांजे को उस से पैरों से अलग करने में लगे हुए थे ...कुछ ज़्यादा ही कसाव था उस मांजे का ...और उस के पैर तो नाज़ुक थे ही ...इतने में अपने कमांडिंग आफीसर ने कहा कि ठहरो, मैं कैंची लाता हूं...। और वह झट से कैंची ले आया ...कैंची से कुछ उसने धागे काटे, कुछ मैंने काटे...(कैंची सर्जीकल कैंची थी, बारीक वाली) ...

लो जी, कट गये धागे सारे ... इतने में मैं एक गिलास में पानी लाया और ग्रिल के अंदर से ही गिलास बाहर किया और परिंदे की चोंच उस में डुबो दी गई कि परवाज़ भरने से पहले दो बूंद पानी पी ले ...हम लोग खुद भी तो ऐसे मौकों पर बदहवास हो जाते हैं ...बस, अब उस से विदा लेने का समय था .... यह तसल्ली तो थी कि उस के पैर सही सलामत हैं ...देखते हैं उड़ान भरता है तो ठीक है, नहीं तो ध्यान रखेंगे इस का ....

ड्राईवर साहब ने उस जैसे ही हवा में छोड़ा देखते ही देखते वह हवा से बातें करने लगा ....और पलक झपकते ही इन पेड़ों के पास पहुंच गया ... और जैसे ही उसने उड़ान भरी उस के साथी जो इधऱ उधर उस का इंतज़ार कर रहे थे वह भी उस की आज़ादी में शरीक हो गये ...

परिंदे की उड़ान के बाद ली यह तस्वीर ..यह उस परिंदे की नहीं है 
उस की परवाज़ देख कर इतनी खुशी हुई कि खुशी से आंखें नम हो गईं..

बाद में ध्यान आया कि कैसे लोग इस तरह की नन्ही जान को अपना निवाला बना लेते हैं....धार्मिक-वार्मिक बात नहीं कर रहा हूं....न ही करता हूं...वे फ़साद की जड़ होती हैं...एक विचार आया मन में कि कैसे इन का गुलेल से, गोली से शिकार किया जाता है या जाल में फंसाया जाता था ...

अब ध्यान आ रहा है कि एक परिंदे की चोट देख कर हम सब इक्ट्ठा हो गये ...अगर हम सब लोग इतने ही दयालु-कृपालु हैं तो फिर समाज में इतनी मार-काट, लूट-पाट, काट-फाड़ कौन कर रहा है....किसी आदमी को काटने-गिराने में हम लोगों को क्या रती भर दया नहीं आती...क्या हो जाता है हम लोगों को जब हम भीड़ का हिस्सा बन कर बस्तियां जला देते हैं, लोगों के गले में जलते टायर डाल देते हैं ... भीड़-तंत्र का हिस्सा बनना हमें बंद करना होगा, वरना यहां कुछ नहीं बचेगा... बस, धधकते तंदूरों पर सियासी लच्छेदार परांठे लगते रहेंगे ....काश, हम सब सुधर जाएं....

बहरहाल, कल रविवार है ...परसों परिंदे के उन दोनों रक्षकों को अच्छी पार्टी करवाऊंगा ... मुझे पता है ऐसे नेक लोगों को इन सब की कुछ परवाह नहीं होती लेकिन मेरा भी कुछ फ़र्ज़ तो बनता है क्योंकि परिंदा फंसा तो हमारे आंगन में ही था ..




चलती है लहरा के पवन कि सांस सभी की चलती रहे ....