रविवार, 8 मार्च 2026

आज महिला दिवस पर ब्लॉगिंग का बिल्कुल ख़याल न था ...लेकिन..

इन के लिए महिला दिवस के क्या मायने!! -वही बोझा, उस के तले वैसे ही दबे रहना, वही पिसना...फिर भी इन की जिजीविषा को सलाम 


लेकिन क्या? 

हां, सच में यह ब्लॉग लिखने का कोई इरादा न था ...लेकिन बात ही कुछ ऐसी हो गई कि फिर मैंने ज़िद्द ही कर ली कि अब तो मन की बात वॉट्सएप पर न सही तो क्या, अपने ब्लॉग में दर्ज कर के रहूंगा...

तो हुआ यूं कि आज सुबह जैसे ही मेरा सब से फेवरेट पेपर टाईम्स ऑफ इंडिया बंबई एडिशन हाथ में पकड़ा ....उस के पन्ने उलट पलट रहा था कि महिलाओं से संबंधित कंटैंट इस में भरा हुआ था ....इच्छा हुई कि इस में उन सब पन्नों की फोटो लूं और वाट्सएप पर तस्वीरों की शक्ल में उन को शेयर कर दूं.....चाहे, पढ़ा मैंने उन में से पूरा किसी को भी नहीं, बस हैडिंग ही देखे या तस्वीरों के साथ उन के कैप्शन देखे हैं...



हां, तो जब मैं उन सब तस्वीरों को शेयर करने लगा तो मुझे महसूस हुआ कि जो इस वक्त मन में उद्गार उठ रहे हैं उन को भी लिख कर राहत पा लूं ...जी हां, लिखने वालों के लिए लिखना मानचिक हलचल से निजात पा लेने का एक ज़रिया भी होता है ...मैंने भी उन तस्वीरों के साथ वाट्सएप पर मैसेज लिखते लिखते 12-15 मिनट बिता दिए....लिख रहा था तो सामने पड़ी फीकी चाय की भी परवाह न की ....खैर, मन की पूरी बात लिखने के बाद जैसे ही बटन दबाया.....अचानक सब कुछ गायब। टेक्स्ट मैसेज तो क्या तस्वीरें भी न आगे जा सकीं...

अफ़सोस हुआ ...लेकिन उन बातों को फिर से हु-ब-हू लिखना ...न तो यह हो पाता और न ही इतना सब्र है मेरे में....खैर, मैंने यह सोचा कि ठीक है, जो बातें लिखी हैं उन को अपने ब्लॉग में लिख कर महिला दिवस की बात कर लूंगा....

टाइम्स आफ इंडिया को देखने के बाद जब इंगलिश का मिड-डे देखा तो उस में अधिकतर कंटैंट महिलाओं से ही जुड़ा हुआ था ...बहुत से बोल्ड मुद्दे भी थे ....हैडिंग ही देखे...अब कोई लिख ले या पढ़ ले, एक ही काम हो सकता है ...लेकिन उस के आखिरी पन्ने पर एक इश्तिहार दिख गया ...आप भी देखिए......

इस इश्तिहार में क्या कुछ कमी लगी? अगर हां, तो लिखिए नीचे कमेंट में ...अगर नहीं लगी तो भी सब से नीचे मैंने कुछ लिखा है, पढ़िए ज़रूर ....यह मेरा ख़याल है ...


पूरा पेपर आज महिला दिन के बारे में था ....शायद उन महिलाओं के लिए जो इंगलिश पढ़ना लिखना जानती हैं, बोलती भी हैं और अपने हक-हकूक के बारे में सचेत हैं....मुझे तो अधिकतर यह सब पेज-थ्री कंटेंट ही लगा....कहीं पर आस पास की आम महिलाओं की उपलब्धियों के बारे में मुझे कुछ नहीं लिखा दिखा......वह महिला जिससे जब पूछा जाता है कि आप क्या करती हैं.......और वह लगभग झेंपते हुए कहती हैं........कुछ नहीं, बस हाउस वाईफ....

यही सुन कर सब से ज़्यादा बुरा लगता है कि जो काम ज़िंदगी में सब से ज़रूरी है ...जिस की ड्यूटी तड़के 4-5 शुरू होती है और रात में सब के सो जाने के बाद, चूल्हा-चौका समेटने के बाद चाहे 11 बजे या 12...कोई परवाह नहीं ...वह कह रही है ...कुछ नहीं, बस घर पर ही ...। 

महिला दिवस के सही मायने तभी होंगे जब सारी महिलाओं की तस्वीर बदलेगी....सिर्फ़ अच्छी फर्राटेदार इंगलिश बोलने वाली महिलाओं की ही नहीं....इसलिए जब भी महिलाओं के इस तरह के आयोजन होते हैं, उन में सब की भागीदारी ज़रूरी है....कतार में सब से पीछे खड़ी महिला के भी दिन बदलने चाहिए...जिसे अपने हक का कुछ पता नहीं, हर तरफ़ उस का शोषण है, कुछ दिख जाता है, कुछ दिखता है,  सब कुछ सह जाती हैं...दुनिया भर की कमेटियां हैं, लेकिन फिर भी जो ज़मीनी हालात हैं, यह जग जाहिर है....शोषण सिर्फ़ दैहिक या मानसिक ही नहीं होता, इस के अनेकों रूप हैं, बहाने हैं....जिन आंखों से कोई किसी महिला को तकता है ...बहुत बार वह भी शोषण की श्रेणी ही में आता है ......

सरकार या एनजीओ बहुत कुछ कर रही है लेकिन सब कुछ सरकार ही कर देगी, यह असंभव है....मानसिकता बदलनी होगी...और यह बदलाव तो एक परिवार से एक पुरूष ही से शुरु होगा.... इतना पुरुष प्रधान समाज कि जैसे कन्या का जन्म न हो गया हो, कोई ज़ुर्म हो गया हो....मुझे अच्छे से याद है कि पहले तो किसी घर में स्वस्थ बेटी के जन्म होने पर बधाई देने का रिवाज़ भी न था ....बधाई की तो बात ही क्या करें, अभी परसों मैं देश के एक चोटी के उद्योगपति की (कितना चोटी का है, अगर लिखूंगा तो आप समझ जाएंगे) इस लिए नहीं लिख रहा हूं...वह अपनी जीवनी में लिखता है कि जब उस की बड़ी बहन का जन्म हुआ तो मेरी परदादी ऐसे हो गई कि उसने अपने आप को तीन दिन के लिए कमरे में बंद कर लिया....। (बिल्कुल उसने यही लिखा है) -

चलिए, इतना भी सुस्पेंस ठीक नहीं,  नाम भी लिखने में क्या हर्ज़ है....यह बिरला खानदान की बात है....जब यह बात किताब ही में आ गई है तो मुझे लिखने मेंं क्या दिकक्त है..

सरकार ने कोख में बच्चियों को मारने की भयानक कुरीति को दूर करने के लिए बहुत काम किया है .....बच्चियों की पढ़ाई लिखाई ब्याह शादी के लिए भी सरकार अपना काम कर रही है....अभी हाल ही में महिलाओं को बच्चेदानी के कैंसर से बचाने के लिए युवतियों के तरुणावस्था में एचवीव्ही टीकाकरण की स्कीम आई है ...इस स्कीम का बहुत स्वागत हुआ है .....सफल तो तभी कोई स्कीम मानी जाए अगर अनपढ़, कम पढ़ी-लिखी, श्रमिक.....सभी वर्गों की महिलाएँ इतनी सचेत हो जाएं कि इस तरह की सरकारी स्कीमों का फ़ायदा उठाने के लिए खुद आगे आएं....
और तो और, अभी हाल ही में महिलाओं के सैनेटरी पैड पर खुल कर बात होने लगी है ...कुछ ऐसी जागरुकता बढ़ाने वाली फिल्में भी बनीं....इस तरह की फिल्में बनाने वाले साधुवाद के पात्र हैं....क्या था फिल्म का नाम...पैडमैन....बेहतरीन फिल्म....यह गीत भी आप को याद होगा....देखो देखो तितली बदल रही रंग...होते होते होते होते हो रही पतंग..


महिलाओं से जुड़ी फिल्मों की बात करें तो मुझे अभी पिछले हफ्ते दो एक फिल्में देखी याद आ रही हैं....एक तो थी "जाइए आप कहां जाएंगे"....यह प्रसार भारती के ओटीटी प्लेटफार्म वेव पर मैंने देखी थी ...अकसर मैं विविध भारती पर इस के बारे में सुनता तो था लेकिन पता नहीं था कैसे करना होगा....कुछ दिन पहले बेटे की मदद से टीवी पर शुरु कर लिया ...मुफ्त है....हां तो फिल्म की बात ....इस तरह की फिल्में बनाने वाले ऐसे अहम् मुद्दों की बात करते हैं जिन से परेशान सभी महिलाएं हैं लेकिन बात नहीं करतीं, बस सहती रहती हैं, परेशान रहती हैं इस व्यवस्था के अभाव में .....इस से आगे मैं नहीं लिखूंगा....क्योंकि फिल्म देखने से पहले मुझे भी इस के फिल्म की स्टोरी नहीं मालूम थी....इसलिए मैं पूरे वक्त एलसीडी के सामने डटा रहा .....ऐसे लगा ही नहीं फिल्म देख रहे हैं....या कोई एक्टिंग कर रहा है ...सब कुछ इतना यथार्थ और सजीव कि जैसे आंखों के समने ही घट रहा है ....सभी पात्रों की एक्टिंग सर्वश्रेष्ठ....देखिएगा...कभी इसे ज़रूर .....वेव ओटीटी पर देख पाएं तो ठीक , वरना मुझे अभी इस का यू-ट्यूब लिंक भी मिल गया ...यह है इस का लिंक (क्लिक करिए) ....

महिला दिवस है ...दूसरी फिल्म है ..सदाबहार ....यह भी एक बेहतरीन फिल्म है ....जया भादुड़ी की फिल्म है ....उन का अपने पुराने रेडियो से किस कद्र लगाव है, यह देख कर आप दंग रह जाएंग....अकेली रहती हैं, रेडियो के सहारे....इसे भी ज़रूर देखिए...वेव ओटीटी पर तो है ही...यू-ट्यूब लिंक इस फिल्म का यह है ....सदाबहार...आप को यह फिल्म देखनी ही चाहिए....मैं भी एक बार इस तरह की फिल्म देखने बैठता हूं तो फिर उठ ही नहीं पाता ....जया भादुड़ी के फ़न के तो हम लोग (हमारी पीढ़ी) बचपन से दीवाने हैं....10 बरस की उम्र थी शायद मेरी जब गुड्डी आई ...फिर ज़ंजीर और फिर नमक-हराम ...फिर कोशिश ....क्या क्या याद दिलाएं.....याद क्या दिलाएं, जब भूले ही नहीं तो ...

हां, एक बात बहुत ज़रूरी अभी लिखनी है कि हाउस-वाईफ की तो बात कर ली ...लेकिन कामकाजी महिलाओं के जज़्बे को भी सलाम.....इन में से भी अधिकतर ...अधिकतर क्या, होंगी 99 फ़ीसदी तक जो बाहर काम के साथ साथ घर में भी पिसती हैं ....डबल-पिसाई कहें तो ....ये वो हैं जो काम से घर आते वक्त लोकल ट्रेन के महिला डिब्बे में  सब्जी काटती दिख जाती हैं ताकि घर पहुंचने पर वक्त पर खाना तैयार हो पाए.....

और कितना लिखें....लिखें तो लिखते ही चले जाएं...यह टॉपिक ही ऐसा है ....हालात बदले हैं, बदल रहे हैं..बदलने चाहिए और बदल कर रहेंगे ही .......लेकिन इस के लिए महिलाओं की किसी भी तरह की दया, सहानुभूति, मापदंडों में किसी तरह की रियायत, किसी तरह के ग्रेस-मार्क्स की कतई ज़रूरत नहीं है ........बस,समाज अगर उन्हें अपनी धुन में लगे रह कर काम करने दे तो यह समाज का बड़ा योगदान होगा....वह अपना रस्ता चुनने में, उस पर आगे चलने में, चोटी तक पहुंचने में सक्षम है....हमेशा से थी .....बस, पुरुष-प्रधान समाज में आदमी को अपनी नज़रों को संभालना होगा....अच्छी बात है स्कूल ही से बच्चे-बच्चियों को आज कल गुड-टच, बैड-टच के बारे में समझाया जा रहा है.....लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है....पुरुषों की निगाहें भी ठीक होनी ज़रूरी हैं.....एक दम ठीक, न आढ़ी-न तिरछी..... मैंने कईं बार देखा है कि पॉवर में बैठा पुरुष सब से पहले तो जिस तरह से किसी महिला को देखता है वही उस को असहज कर देती है .......और यह जो बात है, यह जो सही गल्त नज़र परखने की दिव्य शक्ति हर महिला में मौजूद होती है ....अनपढ़ में भी उतनी ही जितनी किसी डाक्ट्रेट तक पढ़ी महिला में ......

बातें छोटी छोटी हैं, कहीं दर्ज भी नहीं होती, लेकिन हैं बहुत ज़रुरूी .....आज के वातावरण में महिलाओं की एम्पावरमैंट का एक पहलू यह भी है कि शादी से पहले वह भावी पति से उस की मैडीकल जांच रिपोर्ट की मांग करे ....और हां, उसे अपनी रिपोर्ट देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.....वरना, बाद में एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ता है ....

बस, अब करें इस पोस्ट को बंद ....इस इल्तिजा के साथ कि जैसे हम लोग अपनी मां-बहन-बेटी से ज़माने से अच्छे व्यवहार की कामना करते हैं .....तो यह काम हमें भी करना होगा...शुरुआत हम से ही होगी....अगर हम दूसरों की मां-बहु, बहू-बेटी से भी आदर से पेश आएंगे........और नज़रों पर लगाम लगाना ज़रूरी है, इधर उधर आंखों को भटकाने से कुछ होता हवाता नहीं है, आदमी की छवि खराब हो जाती है.....अगर इस से भी अपने आप को बचाए रखें तो भी महिला दिवस पर महिलाओं के लिए यह भी उन के सम्मान का एक संकेत ही होगा.....

अब मुझे वे अखबार में दिखने वाली तस्वीरें भी लगानी चाहिए....जिन की वजह से यह पोस्ट मुझे लिखनी पड़ी.....




















हां, तो ्अब  आते हैं ऊपर इश्तिहार वाली फोटो पर ....मैंने कोई त्रुटि पूछी थी....मुझे यह लगा कि यह शो-रूम पुरुषों को आमंत्रित कर रहा है कि अपनी मित्रों, माताओं, बहनों, बेटियों को ले कर आएं ....लेकिन पत्नी का ज़िक्र करना भूल गया शायद.....खैर, बंबई में रहने वालों को यह भी बताना ज़रूरी होगा कि चर्चगेट स्टेशन के बाहर जहां एशिऑटिक स्टोर होता था, अब वह बंद हो चुका है और थोड़े दिन पहले वहां पर कला निकेतन साड़ी शोरूम खुल गया है......हां, जाइए आप भी वहां लेकिन बीवी को मत भूलिए....। 😃