बुधवार, 1 अप्रैल 2026

ऐसे कैसे मंद पड़ जाती अंगीठी की आंच ....


पिछली पोस्ट अंगीठी पर लिख कर मैंने सोचा कि अब आगे चला जाए...लेकिन जो मुझे वाट्सएप पर मैसेज आए या जो पाठकों-मित्रों ने कमैंट लिखे....उस से मुझे लगा कि अभी अंगीठी की आग को मंद करने का वक्त नहीं आया....एक मित्र ने लिखा कि उन की मां ठिठुरती सर्दी में उन को स्कूल जाने से पहले बाजरे के पुअे बना कर खिलाती थीं....बस, फिर क्या था, हमारी भी बहुत सी यादें ताज़ा हो गईं ...जिन को लिखे बिना अंगीठी पर चर्चा तो अधूरी लगती....। इसीलिए अंगीठी पर यह अगली पोस्ट ....तंदूर, चूल्हे, कांगड़ी को बाद में देखेंगे फिर कभी ...

एक बात है कि ब्लॉग लिखते वक्त कंटैंट में कोई तरतीब नहीं बन पाती...जो जैसे याद आता गया, लिखते रहते हैं...मैं तो बिल्कुल ऐसे ही करता हूं ...शायद यही तो अपनी डायरी की यूएसपी है ..है कि नहीं? चलिए...शुरु करते हैं ....

सुबह स्कूल जाते वक्त नहाने के बाद पैर ठंडी की वजह से एकदम सुन्न पड़े होते तो जुराबें पहनने से पैरों को भी  अंगीठी के ऊपर थोड़ा सेंक लेते ...पैर गर्म होने पर ही जुराबें पहनते....मैंने अपने पिता जी को अकसर ऐसे करते देखा...। 

बाजरे के पुअे से ख्याल आया कि सारे परिवार का एक जबरदस्त मीटिंग प्वाईंट रसोईघर ही होता था जिसमें अग्नि देवता अंगीठी के रूप में बिराजमान होते थी...उस के आस पास सब नीचे बैठे होते ...आगे की तरफ़ हाथ फैलाए, आग तापते ...कभी किसी का हाथ आगे पहुंच जाता, कभी दूसरे का ..तब तक पहले वाला अपने हाथों को आपस में रगड़ लेता...यह सिलसिला एक दम चलता तो बस फिर वहां से उठने का मन ही न करता किसी का ...फिर मां का डॉयलाग....बस, अग्ग दे सामने एक बार बैठ जाओ तो आलस ऐसे जकड़ लेता है कि ....। लेकिन वहां से उठता फिर भी न था...इधर-उधर सारे जहां की बातें, हंसी मज़ाक.....परिवार का असल मीटिंग-प्वाईंट...जहां सब लोग दिल खोल कर बात करते थे ...जो नहीं करता था, उस का पता लग जाता था....। 

रात के खाने के बाद -

यही कोई आठ -साढे आठ बजे तक उन दिनों सब का खाना खत्म हो जाता था ...क्योंकि खाने के बाद सोना ही होता था, न टीवी न टेपरिकार्डर --- रेडियो कभी कभी ८-९ रात में लगाने की कोशिश सफल हो जाती थी ....खैर, अंगीठी के पास बैठे बैठे जब खाने की आइटम खत्म होती तो फिर शुरु होता मूंगफली, रेवड़ी का दौर....कभी कभी मूंगफली वाली गज्जक भी मिल जाती....तिल वाली गज्जक तो हमें तभी खाने को मिलती जब किसी का रोहतक से आना जाना होता....क्योंकि हमें यही पता था कि यह गज्जक केवल रोहतक ही में तैयार होती है ....

और हां, सर्दी के दिनों में अमृतसर वासियों की एक खास मिठाई...भुग्गा.....खोए से बनता था, उस के बीच किशमिश खूब हुआ करती थी....मेरी बड़ी बहन की यह सब से पसंदीदा मिठाई थी ....और मेरे पिता जी यह अकसर अमृतसर के लाहौरी गेट बाज़ार से लाते थे ....


अंगीठी की आग मंद पड़ने पर तो मेरी बहन कभी कभी उस में छोटे छोटे आलू (पंजाब में उसे शरला आलू कहते थे, दूसरी जगहों का मुझे नहीं पता)..दबा देती और कुछ वक्त बाद निकाल कर उसे खाती….उसे यह सब करने में बहुत मज़ा आता था और हमें उसे यह करते देख कर ….उस की देखा-देखी हम भी १-२ आलू खा लेते, मज़ा आता….लेकिन बहन के तो ये फेवरेट थे …कोई चटनी नहीं, कोई नींबू नहीं…हां, थोड़ा नमक जरूर एक हाथ में रख लिया करती थीं….बस, उन के पतले पतले छिलके (जो आसानी से उतर जाते थे)..उतारो और खाते जाओ। कभी कभी अंगीठी पर छोलिए (हरा चना) की शाखाओं को भी भून कर उन का आनंद लिया जाता…इसी छोलिए से मुझे याद आया …बात से कैसे बात याद आ जाती है ….अभी कुछ अरसा पहले मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गया था ….वहां छोलिये की खेती बहुत ज़्यादा होती है…जहां देखो छोलिया बिक रहा था….हाट में, मेले में, बाज़ार में, साईकिल पर, रिक्शा पर छोलिया बिक रहा था…लोग १०-१० रुपए की छोलिए की डंडी लेकर बड़ी चाव से खा रहे थे …वाह! बहुत खूब..खाने की एक सेहतमंद आदत….

मां के हाथों से परोसी हुई एक थाली ...

जब कभी अंगीठी की आग बिल्कुल मंद पड़ने लगती तो मन में थोड़ी उदासी सी छा जाती कि अब यहां से उठना पड़ेगा....वैसे जब आग पूरी ठंड़ी पड़ जाती तो ऐसे लगता जैसे ...Time to wind up!! Pack up, Guys!! Pack up!! जैसे अंगीठी ही ऐलान कर देती ...बहुत हो गया, चलो, अब उठ भी जाओ, निकम्मो....जाओ, अब मुझे भी थोड़ा आराम करने दो ...और तुम लोग भी अपने किसी काम-धंधे में लगो…मुझे तो सुबह फिर से तुम लोगों के लिए तपना होगा….जाओ, अपनी रज़ाईयों में घुस जाओ जा कर…

अमृतसर में दिसंबर से फरवरी के महीने बेहद ठिठुरन से भरे होते थे …अभी भी होते होंगे ..पता नहीं, क्यों कि जब हाल फिलहाल में वहां गया ही नहीं तो किस भरोसे से लिख दूं…!!

रात के खाने के बाद ….लिखने लगा था मैं डिनर के बाद …लेकिन जब ऐसा कोई लफ़्ज़ हम लोगों ने बचपन क्या और जवानी क्या ..हमने इस्तेमाल ही नहीं किया तो कैसे लिख दूं….यह खाना वाना भी हम नहीं कहते थे …पंजाबीयों का एक ही लफ़्ज़ होता है लंच, डिनर के लिए और वह है रोटी खा लओ बई…रोटी तैयार है….मुझे हमेशा ही से यही अच्छा लगता है …दुनिया भर का सारा अपनापन इस में गूंथा पड़ा है …और हां, कभी किसी पंजाबी घर में यह भी कहां सुनने को मिलता था …(अब, पता नहीं, दुनिया बदल गई है बहुत ..खामखां की बनावट और दिखावे का हर तरफ़ बोलबाला है).....नाश्ते के लिए अकसर यही सुना जाता ….आ जाओ, पराेंठे बन गए ने, गर्मागर्म ने…खा लओ…

खैर, रात के खाने के बाद आम तौर पर एक-डेढ़ घंटे ऐसे ही बीत जाते थे …अंगीठी के इर्द-गिर्द…हां, कभी इ दौरान गाजर का हलवा उसी अंगीठी की धीमी पड़ रही आंच पर पकता रहता…और उस में बेसन डाल कर भूने जाने का इंतज़ार भी रहता…बस, उस की मदहोश कर देने वाली बेहद खुशनुमा खुशबू अब भी जस की तस अपने अंदर संभाल कर रखी हुई है …

हमारे सोने के बाद अंगीठी कितना आराम फरमा पाती ?

नहीं, नहीं, अकसर आराम उस के नसीब में लिखा ही न था…अंगीठी के इर्द-गिर्द बैठे बैठे जब थक गए, जम्हाईयां आने लगीं , जहां भर की जितनी ऊट-पटांग बातें होनी थीं, हंसी मज़ाक होना था ..सब कुछ हो गया …तो घर के सभी बाशिंदे बारी बारी से वहां से उठने लगते और जा कर रज़ाई में दुबक जाते …(उस वक्त शरीर इतना गर्म हो चुका होता कि बाहर आंगन में लघुशंका के लिए जाने में भी आलस आता …कौन जाए इतनी ठंडी में, इतने कोहरे में, ओस में …., इसलिए कईं बार उसे जितना हो सकते रोके रखते….)...

अकसर आखिर में मां अकेली रसोईघर में रह जाती …आखिर में एक चुल्लू भर पानी फेंक कर अंगीठी बुझाने का काम भी उसी के सुपुर्द था….और कईं बार अंगीठी के आखिरी वक्त में मां को ख़याल आता कि अभी तो आंच है, सेक अभी बाकी है …इसे इस तरह बुझाना बुरा लग रहा है…तभी सोने से पहले मां एक पीतल की या मिट्टी की हांडी (पंजाबी में उसे कुन्नी कहते हैं..)...में कोई दाल उस पर चढ़ा देती ..और सुबह तक वह एक दम तैयार हो चुकी होती ..और फिर तड़का मार कर वही दाल खाते वक्त हम उंगलियां चाटने लगते….बिल्कुल सच लिख रहा हूं….ऐसा ही होता था। 

भोर होते ही फिर से अंगीठी की शामत ….

अंगीठी के मुकद्दर में कितना आराम लिखा था, यह तो आपने ऊपर देख ही लिया…और सुबह होते ही, मुंह अंधेरे ही उस की सारी राख एक लोहे की सीख (पतली छड़ी टाइप, आगे से थोड़ी टेढ़ी की हुई….क्योंकि सीधी उंगली से घी से नहीं, सीधी छड़ी से राख भी नहीं निकल पाती…)...से निकाल कर फिर से उसे जलाने का प्रोजैक्ट शुरु हो जाता ….कईं बार तो यह सुबह शुरु होने वाले प्रोजेक्ट का आगाज़ मां रात ही में पूरा कर के सोती…बस कुछ तैयार कर के …बस, सुबह एक उसे माचिस की तीली (दियासिलाई) का इशारा ही करना होता ….सभी तहें (लेयर्स) उपले, लकड़ीयां, कोयला…सब कुछ रात में ही तैयार कर दिया जाता ….जस्ट रेडी-टू-गो….।

ठिठुरती, हाड-तोड़ ठंडी में, ओस, कोहरे वाले मौसम में अंगीठी का जलना नामुमकिन सा होता….लेकिन कोई ग़म नहीं …स्टैड-बॉय स्रोत तैयार होता …मिट्टी के तेल से जलने वाला स्टोव ….। 

अंगीठी ठंडी पड़ने पर उस से निकली राख का क्या? 

इस राख को बर्तन मांजने के लिए इस्तेमाल किया जाता …अधिकतर तो बर्तन पीतल या कांसे के ही होते थे, इसलिए इन को मांजने के बाद उन की चमक-दमक देख कर अच्छा लगता था….जब कभी किसी घर में राख न होती तो उसे पड़ोस से भी ले लिया जाता ….गुलज़ार फ़रमाते हैं पड़ोसी के चूल्ह से आग ले ले ….लेकिन चूल्हे की राख तक ले लेने का चलन था, यह भी यहां दर्ज कर देना मुनासिब होगा…राख न होेने पर घर में बर्तन सफाई सेविका जगिन्दरो ..हंगामा कर देती ….और हां, अंगीठी का एक और इस्तेमाल…जगिन्दरो आते ही एक बड़े पतीले में पानी डाल कर अंगीठी पर रख देती और गर्म पानी से ही वह बर्तन घिसती…अपने छोटे से शिशु को अपनी गोद में, अपने शाल से लपेटे हुए….बहुर भली थी जगिन्दरो…बड़ी मेहनत…मेरी मां से उस की बहुत बनती थी …उस के आते ही पहले तो मां उस के लिए चाय रख देती ….सभी बहुत मधुर यादें हैं…मैं और मेरी बड़ी बहन अकसर ये सब बातें कभी कभी याद करते हैं…. 

रोज़ाना कैंप-फॉयर का मज़ा …

लोहड़ी के दिन बाहर आंगन में, मोहल्ले में कैंप फॉयर होती थी ..लोहड़ी मनाई जाती थी…वह ठीक है, एक रस्म अदायगी रह गई है अब तो ….लेकिन यह जो हर दिन अंगीठी के आस पास बैठ कर सारा कुनबा कैंप-फॉयर की मौज लेता था …वह कैंप-फॉयर बाद में कहां दिखती…। और न ही एक साथ बैठ कर इस तरह से कैंप फिर दिखे …क्योंकि कुकिंग-गैस के चूल्हे आने से धीरे धीरे न नीचे बैठने की ज़रूरत रही न ही आदत, इस के चलते आने वाली पीढ़ीयों में घुटनों में ताकत भी जाती रही ….और फिर इस तरह से अंगीठी के आस पास बैठने की रीत लुप्त ही हो गई…..मैंने ऊपर लिखा कि मैं तो शहरों की बात दर्ज कर रहा हूं….शायद दूर-दराज गांवों में अभी भी कुछ तो रीतियां बची हुई होंगी….पता नहीं…. क्योंकि किसी बड़े नेता के किसी दलित की झोंपड़ी में नीचे बैठ कर रोटी खा लेने से इस का सही अंदाज़ा नहीं होता, न ही हो सकता है ….ये तो शायद क्या कहते हैं बढ़िया सियासी रोटियां सेंकने का एक ज़रिया भर रह गया है …। 

अमृतसर ..१९८७, चालीस साल पुरानी लोहडी की एक केंप-फॉयर कॉलेज में ..

आज की पीढ़ी के लिए यह कैंप-फॉयर-वॉयर जैसी बातें बहुत बड़ी होंगी….इन की तस्वीरें ट्रेंडिंग होंगी, इंस्टा पर, एक्स पर ….लेकिन हमारे लिए ये बिलकुल आम बातें हैं क्योंकि हम ने अपने बचपन और जवानी में हम लोगों ने यह सब खूब जिया….इतना भरपूर कि ये बेशकीमनती यादें मेरी कलम से अपने अपने निकलती जा रही हैं….मुझे कोई कोशिश नहीं करनी पड़ रही ….। 

एक कैंप-फॉयर में पड़ गया पंगा …

उन दिनों मैं स्कूल में था …यही कोई छठी-सातवीं क्लास में …मेरे से बड़े भैया और बहन कालेज में थे …. एक रात हम सब ऐसे ही अंगीठी के इर्द-गिर्द जमा थे…अच्छे से याद है मुझे बहुत लज़ीज मीट बना हुआ था …गर्मागर्म रोटियां सिक रही थीं….ऐसे ही उस वक्त मेरे भाई-बहन में थोड़ी बहस जैसी हो गई (जो आज के दौर में एक आम बात है, उन दिनों हमारे घर में न थी….शायद मैंने पहली बार उन को आपस में इस तरह से बात करते देखा था…कोई खास बात न थी…)...इसी दौरान भाई ने बहन को कुछ ऐसा कहा कि मेरे पिता जो को गुस्सा आ गया, उसे बुरा भरा कहा …और वे उसे एक-दो झापड़ लगाने के लिए उस की तरफ़ लपके ….लेकिन इसी वक्त से पहले ही वह थाली छो़ड़, खाना बीच ही में छोड़ कर वहां से उठ गया ….यही कड़वी घटना आज तक मेरे दिलो-दिमाग में कैद है …..उन दौर में इस तरह से खाना बीच में छोड़ कर उठना..हिंदी फिल्मों में तो कभी कभार होता होगा…लेकिन असल ज़िंदगी में बहुत बुरा माना जाता था ….कईं बार अब फिल्मों में देखते हैं …कईं शानदार डाईनिंग टेबल पर खा रहे लोगों में से एक बंदा कुछ कह कर उठ खड़ा होता है और बाकी लोग खाते रहते हैं……..लेकिन उस रसोई वाले दिनों में अगर कोई मेरे भाई की तरह से उठ खड़ा हुआ तो फिर पूरा चूल्हा-चौका ही उस दिन के लिए पैक-अप….न किसी का खाने का मन हुआ और न ही मां के पकाने का …..अब लिखते लिखते मैं वे लम्हे फिर से जी पा रहा हूं…इस पंगे के अगले दिन तो सब सामान्य हो गया ….लेकिन मूड सब का खराब ही रहा ….मुझे नहीं पता मेरी बहन ने क्या महसूस किया होगा ….ज़ाहिर है उसे भी बुरा ही लगा होगा ….खैर, यह लिखना भी मैंने यहां इस लेख में ज़रूरी समझा, सो लिख दिया….अगर इसे दबा भी जाता तो अपने आप से ही झूठा पड़ जाता …

अंगीठी बनती कैसे थी ?

अब आते हैं एक रोचक टॉपिक पर …कि यह अंगीठी बनती कैसे थी …अभी फेसबुक पर एक रील दिखी…मिट्टी के गमले से एक अंगीठी बनाने की तरकीब समझा रहा था कोई ज्ञानी…..उसने हमारा वक्त नहीं देखा ..यही लगा….मैं जिस अंगीठी के बारे में लिख रहा हूं वे सभी लोहे की पुरानी बाल्टीयों को इस्तेमाल कर के (क्या कहते हैं आज के ज़्यादा पढ़े-लिखे पेज थ्री वाले लोग …री-साईकिल या अप-स्केलिंग या री-पर्पज़िंग…..) तैयार हुआ करती थीं। 

बनी-बनाई हुई, रेडीमेड अंगीठीयां बिकती तो थीं बाज़ार में लेकिन अकसर उन को अच्छा नहीं समझा जाता था क्योंकि उन को बनाने में बिल्कुल खस्ताहाल, जंग से टूटी-फूटी बदहाल बालटी से अंगीठी बना दी जाती थी। यह सोचना भी बिल्कुल ठीक ही रहा होगा…हमारे से पिछली पीढ़ी के अपने अनुभव थे। हमारे अनुभव ही तो हैं जो हमारे छोटे-मोटे फ़ैसलों पर अपनी छाप छोड़ते हैं….। 

यह सब मेहनत अब अखरती है ...यह सब काम काश कॉलेज में किए होते ...

हां तो अंगीठी बनाने का प्रोजेक्ट शुरु कैसे होता था…घरों में उन दिनों लोहे की बाल्टीयां ही हुआ करती थीं..कोई मोटा लोहे, कोई पतले लोहे से बनी हुई। घर की किसी पुरानी बाल्टी को किसी ठठेरे (जो लोहे को काटने, फाटने के ही काम किया करता ..लोहे की बाल्टी, ट्रंक, आटे की पेटी….उसे इन्हीं सब कामों से फुर्सत न थी…अभी भी अमृतसर के इस्लामाबाद इलाके के उस छोटे कद के, सांवले रंग-रूप के  सरदार जी की शक्ल अच्छे से याद है …अपने काम का एक दम माहिर ….लोहे को ठोंकने-पीटने का उत्साद)....उस के पास सभी इसी तरह के मुरम्मत के मरीज़ ही आते थे …मैं अपनी मां के साथ जाता था….हां, तो वह उस बालटी को रख लेता और २-३ दिन बाद की तारीख दे देता। 

उस उस्ताद की डिमांड ही इतनी थी…तीन चार दिन बाद जब मां और मैं उस के पास जाते तो पता चलता कि उसे तो इन दिनों फुर्सत ही न मिली…मेरी मां के कहने पर, हमारी उस पुरानी बाल्टी को ढूंढा जाता और वह उसी वक्त १०-१५ मिनट में तीन-चार रुपए में अंगीठी का ढांचा तैयार कर के हमें थमा देता…

अब चलते हैं अंगीठी बनने के अगले स्टेप की ओर  …

इन परफेक्ट कटे हुए अंगीठी के ढांचे को साक्षात् अंगीठी की शक्ल में बदलना अगला अहम् स्टेप होता ….इस काम की माहिर अलग महिलाएं होती थीं….अकसर वे महिलाएं जो मिट्टी के बडे़-छोटे तंदूर बनाया करती थीं…अपने काम की माहिर मेहनती, खुशमिज़ाज महिलाएं। उन को अंगीठी का वह ढांचा थमा कर दिया जाता …और मां थोड़ी ब्रीफिंग भी कर देती…लेकिन आज सोचता हूं कि वह ज़रूरी न थी, क्योंकि वह बात वैसी ही है कि जैसे किसी मोची को जूता गांठने के बारे में, किसी नाई को बाल काटने के बारे में या मुझे दांत के इलाज के बारे में ब्रीफिंग करे …हम तीनों वैसा ही करेंगे जैसा हम ने करना है, जैसा हमें आता है …हां, वे महिलाएँ अपने काम की एक दम माहिर होती थीँ और चिकनी मिट्टी की मदद से वे एक बढ़िया अंगीठी तैयार कर देतीं…

अंगीठी की मेन्टेनेन्स - उस का नियमित रख-रखाव….

अंगीठी जब घर पर बन कर आ जाती तो फिर उस की छोटी मोटी रिपेयर घर पर ही कर ली जाती….उस के लिए मां ने एक मिट्टी के बर्तन में चिकनी मिट्टी घोल कर रखी होती….वह तैयार ही रखी होती …तंदूर या किसी भी अंगीठी की माइनर रिपेयर के लिए …अंगीठी का कोई ‘ मुन्ना’ अगर हिल जाता या थोड़ा टूट जाता …तो उसे भी ठीक कर दिया जाता, फिर उसे कुछ घंटों के लिए तेज़ धूप में सूखने के लिए रख दिया जाता…फिर से जलाने से पहले …इसी चक्कर में भी शायद हर घर में दो अंगीठीयां तो होती ही थीं…एक बहुत बड़ी और एक छोटी …एक लोहे की बड़ी बाल्टी से और दूसरी छोटी बाल्टी से तैयार करवाई हुई…

अंगीठी की मंद पड़ती आग को तेज़ करना …

जब अंगीठी पर रखे तवे से आलू,गोभी, मूली, पनीर के  परांठों की झमझम बरसात चल रही होती तो उस अंगीठी की मंद पड़ती आग को तेज़ करने का काम भी साथ साथ चलता रहता था। किसी लोहे की सीख (सीख पंजाबी लफ्‍ज़ है…इस का मतलब बिल्कुल पतली सी लोहे की डंडी)..को अंगीठी के निचले सुराख से अंदर डाल कर राख नीचे गिराई जाती और खाली हुई जगह में ऊपर से कोयले डाल दिए जाते ….१-२ मिनट के लिए धुआं उठता ज़रूर….लेकिन डालडे में तैर रहे परांठे और लपेटने के सामने यह बिल्कुल भी परेशानी न थी…उसी वक्त अंगीठी की आग फिर से तेज़ हो जाती, लपटें निकलने लगतीं…

अंगीठी पर हाथ तापना …. 

अंगीठी के इर्द-गिर्द उस को घेर कर बैठे बैठे आग तापते वक्त कईं बार सब लोग अचानक मौन धारण किए हुए अपने ही खयालों में गुमसुम से बैठे हुए होते …नज़रें टकटकी लगाए हुए तेज़-मंद होते अंगारों पर टिकी रहतीं….आज सोचता हूं तो यही लगता है कि यह सब भी किसी ध्यान साधना से कम थोडे़ न रहा होगा…ठीक है, तब हमें ये फेशनेबुल नाम नहीं आते थे …लेकिन ये लम्हे अपने साथ रहने वाले, अपने अंदर झांकते के लिए काफ़ी होते थे…

यह आग तापने वाला काम भी ऐसा था जो सारे कुनबे को एक साथ बांध कर रखता था …और अंगीठी ने इसे बांधे रखा जब तक अंगीठी चलन में थी….यह बंधन इक बार छिटका तो फिर बिखराव ऐसा शुरु हुआ कि परिवार के सभी लोग एक साथ बैठ कर जो दिल खोल लिया करते थे ….एक दूसरे की आपबीती, दिनचर्या सुनते थे, उन में अपनी बात जोड़ देते थे ….बात से बात निकलती थी, आगे बढ़ती थी, आगे की योजना बनती थी…सपने बुने जाते थे….मज़ाक होता था….और अंगीठ वाली रसोईयों के लुप्त होते होते यह सब भी कम होता होता गायब हो गया….

गजब का खुलापन होता था इस कैंप फॉयर में ….

ऐसी ही एक बात याद आ गई ..आठवीं कक्षा में ..पड़ोस के एक लड़के ने मुझे बार बार चिढ़ाना शुरु कर दिया कि तेरा उस से (मोह्लले की एक लड़की से चक्कर है)...मुझे वह कभी भी किसी के सामने कहने लग गया…मुझे बडा़ अजीब सा लगने लगा …ऐसी कोई बात न थी…वह इन सब कामों का खिलाड़ी लगता था …थोडा़ बड़ा था मेरे से …मैं परेशान हो गया…मेरी पढऩे की इच्छा ही जाती रही ….एक दिन ऐसे ही अंगीठी के इर्द-गिर्द मैं और मेरी बड़ी बहन बैठे हुए थे …मैं अचानक रोने लगा कि मेरा अब पढ़ाई में दिल नहीं लगता क्योंकि टीटू मुझे बार बार यह कह कर चिढ़ाता है …

बहन ने आराम से बात सुन ली, मेरा बोझ हल्का हुआ…और अगले दिन जब टीटू जी महाराज बाहर खेल रहे थे, बहन ने उस को आवाज़ देकर अपने पास बुलाया…और समझा दिया …इतना ही कहा उसे मेरे सामने …..इस तरह की फ़िज़ूल बातें मत किया करो, बेकार में परेशान मत किया करो, यह गलत बात है। बस, टीटू सुधर गया , मेरी बहन ने मेरे दिल में किसी हीरो जैसा दर्जा पा लिया और मैं फिर से आठवीं की पढ़ाई में ऐसा रमा कि मेरिट-स्कॉलरशिप पा गया….तो ऐसी होती थी उस वक्त के बहन-भाईयों की बॉंडिंग …हम कुछ भी शेयर कर लेते थे …और किसी भी मसले को  हल भी तुरंत कर दिया जाता था ….मैं अकसर अपनी बहन को यह बात याद दिलाता हूं तो वह बहुत हंसती है…उसे इतनी बातें याद नहीं हैं….कितना याद रखे वह भी, एक नामचीन यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर रह कर रिटायर हो चुकी हैं….। देखने वाली बात यह है कि जब घरों ही में ऐसा स्पोर्ट-सिस्टम होगा तो चिंता, पैनिक, डिप्रेशन या और भी तरह तरह की मानसिक परेशानियों की क्या बिसात कि किसी को घेरा डाल पाएं….सारी काउंस्‌लिंग, सारी थैरेपी….आपस में भाई बहन बात कर के ही समझ लेते थे, सुलटा लेते थे ….सोचने वाली बात यह भी है कि आज तो हर तरफ़ काउंस्लर, थैरेपिस्ट फैले हुए हैं फिर भी आज की पीढ़ी का इतना कम थ्रेश्होल्ड ….कौन नहीं जानता!!

अंगीठी को कमरे के अंदर ले कर जाने की तमन्ना …

हां, कईं बार सोते वक्त अंगीठी को अपने साथ ही अंदर बेड-रूम में लेकर जाने की इच्छा होती…लेकिन यह काम बड़ी एहतियात से किया जाता…अगर थोड़े से वक्त के लिए ले कर जाते भी तो बडे़ ध्यान से …कईं बार रज़ाई को आग लगते लगते बचती। वैसे भी अंगीठी को सर्दियों के दिनों में अंदर रखने से उस दौर में कईं मौतें होने की खबरें आती रहती थीं…परिवार अंगीठी लेकर अंदर गया …दरवाज़े बंद थे, अंगीठी की वजह से कमरे में इतनी कार्बन-मोनोआक्साईड इक्ट्ठी हो गई कि उस कमरे में मौजूद सभी लोगों की सोते सोते जान ही निकल गई।इसलिेए अंगीठी को कमरे के अंदर लेकर जाने में डर ही लगता था ..जितना वक्त भी लेकर जाते तो खिड़की को भी थोड़ा सा खुला ही रखा जाता था…इसी से कुछ जुड़ी कांगड़ी की यादें भी हैं, वे फिर लिखूंगा किसी दूसरी पोस्ट में…। 

छुट्टी पर बाहर हूं थोड़ा इन दिनों  …इसलिए यह लंबा संस्मरण….

मैं आज कल बाहर हूं ..कुछ दिनों की छुट्टी पर हूं…इसलिए इस लेख को लिखते, बीच में छोडते, फिर लिखते ३-४ दिन हो गए हैं….बहुत लंबा हो गया है …परवाह नहीं….क्योंकि मैंने इस दौरान इस दस्तावेज़ में दर्ज सभी यादों को जिया है …पढ़ने वालों के न सही, मेरे लिए ये बेशकीमती हैं….यह सब करते हुए कभी नहीं लगता कि इतनी मेहनत कर रहे हैं…क्योंकि यह सब दिल का मामला है …मुझे अपने लिए तो खुशी है ही, दूसरी बात यह भी है कि इन को पढ़ कर बड़ी बहन भी खुश हो जाएगी…अब घर में अंगीठी के इर्दगिर्द लगने वाले रोज़ाना लगने वाली कैंप-फॉयर के कुल दो ही तो गवाह बचे हैं…वह और मैं…बाकी सब को बहुत जल्दी थी शायद हमें छोड़ कर चले जाने की ….। 

यह जो इस लेख के ऊपर चिपका एक पोस्टर देख रहे हैं….यह मैने ही बनाया है ….अपने लखनऊ प्रवास के दौरान कुछ बरस पहले कुंअर बेचैना साहब को सुना था …उन की बहुत सी बातें दिल में उतर गईं …उन में एक यह भी है जिसे मैंने पोस्टर के नीचे लिखा है….

“बदन से तेरे आती है मुझे ऐ मां वही खुशबू

जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है 

हज़ारों खुशबुएं दुुनियां में हैं पर उससे छोटी है

किसी भूखे को जो सिकती हुई रोटी से आती है ।।”

                                             कुंअर बेचैन 

इन सब अज़ीम अदीबों को बार बार नमन - क्या क्या लिखा छोड़ कर चले जाते हैं, कैसे यह सब इन को सूझता है ….कि इन के अल्फ़ाज़ कहीं लिख कर दोहराते वक्त तो ठीक है, लेेकिन किसी को अगर सुनाने पड़ें तो बिना गला रूंधे सुना ही नहीं पाते ….रोटी से एक बात और याद आ गई …मां को पता था मुझे रोटी कैसे पसंद है …कईं बार मैं उस की फोटी खींच लेता था जब मोबाईल हाथ में होता …ऐसी ही एक तस्वीर मैंने अपने वाट्सएप पर प्रोफाईल फोटो पर लगाई हुई है …यही है वह फोटो….। 

मां के हाथ की बनी रोटी ....

एक बात और याद आ गई जाते जाते …मैंने कुछ साल पहले एक पोस्टर बनाया था…मैं जहां काम करता था, उस रास्ते पर अकसर देखता कि मां आग जला कर चूल्हे पर बच्चों की रोटी का जुगाड़ कर रही है और वे उसे हर तरफ़ घेरे खड़े हैं…खिचड़ी तैयार होने की इंतज़ार में ….। 


अग्नि देवता को शत्-शत् नमन ….

हर दिन अंगीठी के पास से उठते वक्त मां शुकराना कर के उठती …हमें भी कहती कि यह शुकर ज़रूर किया करो ….अंगीठी के समक्ष हाथ जोड़ कर कहती …जिस भंडारेयों निकलया, ओह भंडारा भरपूर….यह मेरी नानी की सीख थी, जो मां भी अकसर दोहराया करती थी….मुझे भी यह बात अभी याद आई….और हां, अग्नि देवता के पूजा-अर्चना भी होती थी…लोहड़ी के दिन पर विशेष तौर पर होलिका दहन तो घर के बाहर या आंगन में होता लेकिन अंगीठी या चूल्हे में भी आहूति देकर उस का कृत्तार्थ व्यक्त किया जाता है …..

क्या ये सब इसी जीवन की बातें हैं….इतना लिख कर सोच में पड़ गया हूं…!! कौन यकीं करेगा….नहीं तो ना सही, मेरा काम था, इन यादों को सहेजना, और मुझे यह काम करते वक्त बहुत मज़ा आया…उस गुज़रे ज़माने में जाने का मौका मिला …वह पुराना दौर जी लिया हो मैंने जैसे …यह सब लिखते लिखते….क्या यही कम है!!

मां और पोता ...फ़ुर्सत के लम्हों में 

इतना लिखने के बाद अगर मैंने इस पोस्ट की मुख्य किरदार की एक फोटो भी यहां न चिपकाई तो अजीब सा लगेगा मुझे, इस से बड़ी एहसानफ़रामोशी क्या होगी ....तो यह रही उन की एक फोटो जिन की वजह से ये सब यादें पहले तो बन पाईँ और फिर लिखने की समझ भी उन से ही आई ...वह भी लिखती थीं....बहुत बढ़िया लिखती थीं...

आज जब मैं सुबह यह लिख रहा था तो विविध भारती एफएम गो्लड पर भी यही गीत बज रहा था ..जैसे वह सब मेरा लिखा पढ़ रहा हो...समझ रहा हो ...मेरी बात के साथ अपनी बात जोड़ता..टिक टिक टिक टिक चलती जाए घड़ी....कल आज और कल की पल पल जुड़ती जाए कड़ी ...😎😁 (यह उस गीत के व्हीडियो का यू-ट्यूब लिंक है)...


मेरे विचार में इस पो्सट को पढ़ने में आसानी होगी अगर इस से पिछली पोस्ट भी देख लेंगे....ऐसा मुझे लगता है ...यह रहा उस का लिंक ....

अंगीठी, भट्ठी, चूल्हा, कांगड़ी.....गुज़रे दौर की मीठी यादें, बातें ...