Saturday, August 9, 2014

केवल गुटखा-पानमसाला ही तो नहीं है विलेन...

हिंदी की एक अखबार के पहले पन्ने पर एक विज्ञापन देखा --एक पानसाले का..
उस मे लिखे शब्दों पर ध्यान दीजिए..
अच्छा खाईये निश्चिंत रहिये
वो स्वाद जिसमें छुपी हैं अनमोल खुशियां
भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय पान मसाला
साफ---सुरक्षित-- स्वादिष्ट
0%Tobacco   0%Nicotine

ठीक है, ठाक है .. एक कोने में छुपा कर यह भी लिखा है .... पानमसाला चबाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

अब आप बताएं कि इस तरह का विज्ञापन हो और आप के शहर में हर तरफ़- आप के दोस्त, परिवारजन, अध्यापक, डाक्टर हर तरफ पान मसाला गुटखा चबाने में लगे हों तो फिर कैसे एक स्कूल-कालेज जाने वाला लोंडा इस से बच सकता है।

कितनी खतरनाक बात लिखी है कि पानमसाले में तंबाकू नहीं, निकोटीन नहीं... बहुत से पानमसालों पर यह लिखने लगे हैं.. लेकिन फिर भी क्यों इसे खा कर युवक अपनी ज़िंदगी बरबाद कर लेते हैं। उस का कारण है सुपारी ---और नाना प्रकार के अन्य कैमीकल जो इस में मौजूद रहते हैं और जिन्हें खाने से रोटी खाने के लिए मुंह तक न खुलने की नौबत आ जाती है...इस अवस्था को ओरल-सबम्यूकसफाईब्रोसिस कहते हैं और यह मुंह के कैंसर की पूर्व अवस्था भी है।
अब आप ही बताईए की गुटखा तो विलेन है ही जिस में तंबाकू-वाकू मिला रहता है लेकिन यह पान मसाला भी कितना निर्दोष है?

सब से पहले तो मैं बहुत से मरीज़ों से पूछता हूं कि क्या आप गुटखा-पान मसाला खाते हैं तो जवाब मिलता है कि नहीं, नहीं वह तो हम बिल्कुल नहीं लेते, कभी लिया ही नहीं, या बहुत पहले छोड़ दिया। लेकिन थोड़ी बात और आगे चलने पर कह देते हैं कि बस थोड़ी बहुत बीड़ी से चला लेता हूं। ऐसे किस्से मेरे को बहुत बार सुनने को मिलने लगे हैं.....बहुत बार......और कितने युवक यह कह देते हैं कि और किसी चीज़ का नशा नहीं, बीड़ी सिगरेट नहीं,  बस कभी कभी यह सुपारी वारी ले लेते हैं.......फिर उन की भी क्लास लेने पड़ती है कि ये सब के सब आग के खेल हैं।

आज मेरे पास एक महिला आई..सारे दांत बुरी तरह से घिसे हुए.....ये जो देसी मंजन बिकते हैं न बाज़ार में ये बेइंतहा किस्म के खुरदरे होते हैं....और इन को दांतों पर लगाने से दांत घिस जाते हैं। उसने कहा कि उसने इन्हें कभी इस्तेमाल नहीं किया.... मैं भी हैरान था कि ऐसे कैसे इस के दांत इतने ज़्यादा घिस गये। कहने लगी नीम की दातुन पहले करती थी गांव में. मैंने कहा कि उस से दांत इस तरह खराब नहीं होते। बहरहाल, अभी मैं सोच ही रहा था कि उसने कहा कि एक बात आप से छुपाना नहीं चाहती.......कहने लगी कि मैं गुल मंजन इस्तेमाल करती हूं. बस, फिर मैंने उसे समझा दिया कि क्यों गुल मंजन को छोड़ना ज़रूरी है......और बाकी तो उस का इलाज कर ही दूंगा, घिसे हुए दांत बिल्कुल नये जैसे हो जाते हैं आज कल हमारे पास बहुत से साधन मौजूद हैं।

उस के बाद अगला मरीज़ था, एक दो दांतों में दर्द था, मेरा प्रश्न वही कि गुटखा-पानमसाला लेते हैं, तो कहने लगा कि कभी नहीं यह सब किया. लेकिन कुछ अरसे से दांत में जब दर्द होता है तो तंबाकू-चूना तेज़ सा मिक्स कर के दांत के सामने गाल में दबा लेता हूं. .आराम मिल जाता है।

यहां यह बताना चाहूंगा कि तंबाकू की लत लगने का एक कारण यह भी है कि लोग दांत के दर्द के लिए मुंह में तंबाकू या नसवार (पिसा हुआ तंबाकू) रगड़नी शुरू कर देते हैं......मेरी नानी को भी तो यही हुआ था, दांत में दर्द होता रहता था, पहले डाक्टर वाक्टर ढंग के कहां दिखते थे, नीम हकीम ही दांत उखाड़ देते थे (अभी भी बहुत जगहों पर यही चल रहा है).. सो, मेरी नानी को नसवार मसलने की लत लग गई..... और फिर वह आदत नहीं छूटी......इस तरह की आदत का शिकार लोगों को मसाने में भयंकर रोग होने का रिस्क तो रहता ही है, बस इसी रोग ने हमारी चुस्त-दुरूस्त नानी हम से छीन ली। अफसोस, मुझे उन दिनों पता ही नहीं था कि यह नसवार इतनी खराब चीज है, वह बहुत झिझकते हुए हमें हमारे स्कूल-कालेज के दिनों में बाज़ार से नसवार की डिब्बी लाने को कहती और हम भाग कर हरिये पंसारी से खरीद लाते।

बच के रहो बई इन सब तंबाकू के रूपों से और हां, पानमसाले से भी....... कुछ दिन पहले मेरे पास एक मरीज आया ५० के करीब का रहा होगा, यही पानमसाले से होने वाला रोग था, मुंह नहीं खुल रहा था, घाव तो मुंह के पिछले हिस्से में थे ही, मुंह के अंदर की चमड़ी बिल्कुल सख्त चमड़े जैसी हो चुकी थी.....और साथ ही एक घाव मुझे ठीक नहीं लग रहा था जिस की टेस्टिंग होनी चाहिए और पूरा इलाज होना चाहिए......मैंने उसे समझाया तो बहुत था लेकिन वह वापिस लौट कर ही नहीं आया। यह युवक की बात केवल इसलिए की है कि पानमसाला छोड़ने के वर्षों बाद तक इस ज़हर का दंश झेलना पड़ सकता है, तो क्यों न आज ही, अभी ही से मुंह में रखे पानमसाले को दस गालियां निकाल कर हमेशा के लिए थूक दें।

तंबाकू-गुटखे की बातें लिख लिख कर थक गया हूं. लेकिन फिर भी बातों को दोहराना पड़ता है। हां, एक काम करिएगा, अगर मेरे इन विषयों से संबंधित लेख देखना चाहें तो इस ब्लॉग के दाईं तरफ़ जो सर्च का ऑप्शन है, उस में तंबाकू, गुटखा या पानमसाला लिख कर सर्च करिएगा। ये सब ज़हर आप हमेशा के लिए थूकने के लिए विवश न हो जाएं तो लिखिएगा।

सदियों से होता आ रहा कीटाणुओं का जंग में इस्तेमाल

जब कभी कैमीकल वारफेयर के बारे में या फिर बॉयोलाजीकल वॉरफेयर के बारे में मैं कभी भी पढ़ता था तो यही सोचता था कि यह तो एक आधुनिक जुनून है। लेकिन आज ही पता चला कि लड़ाईयों में कीटाणुओं को इस्तेमाल पिछली कईं सदियों से चला आ रहा है।

बीबीसी इस रिपोर्ट पर जब मैंने इस विषय पर लिखा पढ़ा तो मुझे बड़ा शॉक सा लगा कि किस तरह से चेचक का वैसे तो उन्मूलन बीसवीं सदी में ही हो गया था और अगर आज चेचक कहीं फैल गया तो दुनिया किस तरह से फनां हो जायेगी। यह बात भी इस रिपोर्ट में लिखी है कि अमेरिका और सोवियत संघ ने किसी गोपनीय लैब में स्माल-पॉक्स के कीटाणु सहेज कर रख छोड़े हैं। सोच कर ही डर लगता है ना।

एक और देश के बारे में लिखा है कि उसने ३५०० वर्ष पूर्व एक दुश्मन देश के बार्डर पर छः भेड़े छोड़ दीं.....और जब उस देशवासियों ने उन्हें अंदर कर लिया तो उन भेड़ों के शरीर पर विद्यमान टिक्स (ticks) ने ऐसी एक बीमारी फैला दी जिस से देश की आधी जनसंख्या खत्म हो गई होगी।

How long mankind has been waging warfare?

मुझे यह सब पढ़ कर यही लग रहा है कि सुबह सवेरे उठ कर फेसबुक पर निरंतर धुआंधार स्टेट्स छोड़ने की बजाए सारे संसार की सद्बुद्धि की प्रार्थना निरंतर करते रहना चाहिए, पता नहीं किस के पास क्या धरा-पड़ा है और कब किस की बुद्धि थोड़ी सी भी सटक जाए।

एटमबम-वम के बारे में तो हम सुनते ही हैं, हीरोशीमा-नागासाकी अभी तक सत्तर वर्ष बाद भी उस एक धमाके का दंश सह रहे हैं, लेकिन क्या ये कीटाणु और कैमीकल्स भी किसी एटमबम से कम हैं।

चलिए सब के कल्याण की कामना करते हैं........

दांत उखड़वाने के लिए हर सप्ताह ५०० बच्चे भर्ती

मुझे अभी तक किसी भी बच्चे का दांत उखड़वाने के लिए उसे अस्पताल में दाखिल करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। जब हम लोग डैंटिस्ट्री पढ़ रहे थे तब भी कभी नहीं सुना-देखा कि इस तरह से बच्चों के दांत उखड़वाने के लिए कभी हमारे प्रोफैसरों ने भी बच्चों के दांत उखाड़ने के लिए उन्हें पहली भर्ती किया हो।

हां, कभी कभी कुछ वर्षों बाद कोई ऐसा बच्चा आ जाता था जो बहुत ही डरा हुआ, भयभीत सा या फिर किसी ऐसी मानसिक अथवा शारीरिक बीमारी से ग्रस्त होता था कि उस के दांत बिना उस को भर्ती किए और बिना अलग तरह का अनेस्थिसिया दिए (जिस के पश्चात उसे कुछ समय के लिए नींद आ जाती है)... नहीं हो पाता था। यह भी मैंने अपनी प्रोफैसर को एक बार करते देखा था।

वैसे तो जो भी चिकित्सक यह इलाज करते होंगे वे सब कुछ जांच कर ही करते होंगे, लेकिन वर्ष में २०-२५ हज़ार बच्चे अगर अस्पतालों में दांत उखड़वाने के लिए दाखिल किए जा रहे हैं तो यह एक चिंताजनक आंकड़ा है।
इस मुद्दे पर अपने विचार लिखना चाहता हूं।

इंग्लैंड जैसे देशों में बच्चों के दांत यहां की अपेक्षा बहुत ज़्यादा खराब होते हैं.......इस के पीछे उन का खानपान बहुत ज़्यादा जिम्मेदार है। वे बच्चें कोला ड्रिंक्स, चाकलेट्स, बर्गर और दूसरे तरह के जंक फूड के किस कद्र दीवाने हैं, हम जानते हैं। दीवानापन इधर भी बढ़ रहा है लेकिन यहां बच्चे के मां बाप दाल-रोटी की जुगाड़बाजी में ही इतने उलझे हुए हैं कि अधिकतर पेरेन्ट्स बच्चों को यह सब कचरे जैसा खाना उपलब्ध नहीं करवा पाते, और यह बच्चों का सौभाग्य नहीं तो और क्या है कि अधिकांश को दाल-रोटी-सब्जी से ही संतुष्ट होना पड़ता है।

मैं नहीं गया कभी इंगलैंड..लेकिन जो मीडिया से जाना वहां के बारे में कि वहां पर डाक्टरों और मरीज़ों के बीच कुछ ज़्यादा बढ़िया संवाद है नहीं, किसी के पास समय ही नहीं है इस तरह के संवाद में पड़ने का.......लेकिन यहां अभी भी डाक्टर और पेरेन्ट्स के बीच अच्छी बातचीत हो ही जाती है...... पता नहीं आप मेरे से कितना सहमत हों, लेकिन अभी यहां हालात उतने स्तर तक गिरे नहीं है, मुझे तो ऐसे लगता है।

इसी संवाद के अभाव में...शायद डाक्टर मरीज़ के संबंध में विश्वास का हनन भी हुआ है, ऊपर से इतने सारे कोर्ट-केस, मुआवजा ..और सब तरह की पेशियां, झंझट..ऐसे में लगता है कि बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर के उन के दांत निकालना ही इंगलैंड के दंत चिकित्सकों को एक सुरक्षित रास्ता जान पड़ता होगा।

वहां पर इंश्योरैंस का भी कुछ चक्कर है, अस्पतालों को भुगतान इंश्योरैंस द्वारा होता है, इसलिए अस्पताल में इस तरह की भर्तीयां करनी ज़रूरी भी होती होंगी।

यहां के बच्चे बात समझ लेते हैं, अकसर मां-बाप उन के साथ ही होते हैं, वहां पर मां-बाप बाहर रोक दिये जाते हैं.....बच्चे मां-बाप की उपस्थिति में बिंदास अनुभव करते हैं, है कि नहीं ?...और इलाज के लिए बच्चे हम जैसों की बातों में भी आसानी से आ जाते हैं कि दांत उखड़वाने के बाद पापा, दो आइसक्रीम दिलाएंगे, कुछ को उन के पापा दस रूपये का नोट थमा देते हैं.........यानि कि कुछ भी जुगाड़बाजी से आसानी से बिना किसी विशेष परेशानी के बच्चे अाराम से दांत उखडवा ही लेते हैं।

हां, कभी कभार दो एक साल में एक बच्चा आ जाता है जो बहुत डरता है, रोता है और डैंटल चेयर पर बैठने ही से मना करता है, अकसर वह भी दूसरी या तीसरी बार प्यार-मनुहार से काम करवा ही लेता है। कोई विशेष दिक्कत नहीं आती, कोई विशेष दवाईयां या विशेष टीके नहीं लगवाने पड़ते। थैंक गॉड--तुसीं ग्रेट हो।

मैं उस इंगलैंड वाली रिपोर्ट में पढ़ रहा था कि कईं बच्चों के सारे के सारे दांत ही उखड़वाने पड़त हैं। इस से पता चलता है कि वहां बच्चों के दांतों की स्थिति कितनी खराब है।

ऐसा मैंने कोई बच्चा नहीं देखा अभी तक यहां जिस के सारे दांत निकलवाने की ज़रूरत पड़ी हो........ वैसे भी हम जैसे लोगों ने अपने प्रोफैसरों की बात तीस साल पहले ही गांठ बांध ली थी कि बिना किसी विशेष कारण के बच्चों के दांतों को उखाडना नहीं चाहिए क्योंकि उन के गिरने का एक नियत समय है, जब वे गिरेंगे और उन की जगह पर पक्के दांत उन का स्थान लेंगे। अब अगर किसी दांत के गिरने वाले टाइम-टेबल से बहुत पहले उसे निकाल दिया जाए या निकालना पड़े तो फिर उस के नीचे विकसित हो रहे पक्के दांत के मुंह में निकलने में गड़बड़ी होने की आशंका बनी रहती है... ऊबड़-खाबड़ दांत होने का एक बहुत बड़ा कारण।

हमें यह सिखाया गया कि अगर बच्चे के दांत में कोई दांत पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है और उस की केवल जड़ या जड़ें ही बाकी रह गई हैं लेकिन बच्चे को इन जड़ों की वजह से कोई परेशानी नहीं है, तो भी इन जड़ों को बिना निकाले ही रहने दिया जाना चाहिए जब तक वे अपने नियत टाइम-टेबल अनुसार या तो स्वयं ही हिल कर न निकल जाएं या फिर जब तक उन में कोई दिक्कत न हो। ये बातें बच्चों के दांतों के बारे में लिख रहा हूं।

लेकिन यह निर्णय कि कौन से बच्चे में कौन से दांत बिना किसी चिंता-परेशानी के पड़े रहें और किन्हें निकालना ज़रूरी है, यह निर्णय दंत चिकित्सक का होता है, आप स्वयं यह निर्णय नहीं कर पाएंगे. मेरे निर्णय को यह बात अकसर प्रभावित करती है कि अगर तो किसी टूटे फूटे दूध के दांत में बार बार पस पड़ने लगी है, ऐब्सेस बन रहा है जिस के लिए बच्चे के बार बार कुछ कुछ समय के बाद ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां खिलानी पड़ रही हैं तो ऐसे टूटे फूटे दूध के दांतों को बाहर का रास्ता दिखाना ही ठीक रहता है।

मैं यह बात एक सामान्य दंत चिकित्सक की हैसियत से रख रहा हूं ..जो दंत रोग विशेषज्ञ बच्चों के स्पैशलिस्ट हैं, उन के अनुभव क्या हैं, जब वे लिखेंगे तो पता चलेगा। बाकी बातें तो सब की सब वही हैं जो मैंने लिखी हैं, लेकिन चूंकि उन के पास जटिल से जटिल केस भी आते होंगे जब वे किसी डैंटल कालेज में काम कर रहे हों, ऐसे में वे किस तरह के दांत उखाड़ते हैं.......क्या उन्हें बच्चे को रिलैक्स करने के लिए, उस का भय भगाने के लिए कोई टीका भी इस्तेमाल करना पड़ता है, यह तो वे ही बता सकते हैं। लेिकन मुझे कभी इस की ज़रूरत महसूस नहीं हुई या मैंने इस्तेमाल नहीं किया...इस का आप जो भी मतलब निकाल लें।

कईं बार किसी पोस्ट में इतनी विश्वसनीयता घुस आती है कि उस के नीचे डिजिटल सिग्नेटर करने की इच्छा होती है।
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