Wednesday, November 18, 2015

बॉयोलॉजिक घड़ी का भी ध्यान रखना ज़रूरी

लखनऊ में एक जेल रोड है...मेरा उधर से निकलना अकसर होता है...आगे चल कर यह वीआईपी रोड़ के साथ मिल जाती है...इस जेल रोड़ पर सुबह ६-७ बजे के बाद से ही सारा दिन यातायात की आवाजाही खूब रहती है...मैं शाम के समय विशेषकर जब इस रोड़ पर किसी को टहलते देखता हूं तो मुझे रूक कर उसे कुछ कहने की इच्छा होती है..लेिकन विभिन्न कारणों की वजह से ऐसा कर नहीं पाता हूं..बस, कुछ महीने पहले एक नवयुवक जो जॉगिंग कर रहा था इस रोड़ पर उसे मैंने रूक कर ज़रूर कहा था कि इस तरह के ट्रैफिक में इस तरह की ऐरोबिक कसरत का फायदा कम और नुकसान ज़्यादा हो सकता है..शाम के समय प्रदूषण भी खूब बढ़ जाता है। बात उस की समझ में आ गई थी, मुझे ऐसा लगा था।

इसी रोड़ पर सुबह ६-७ बजे जब लोग टहलते हैं तो कोई चिंता की बात नहीं है, उस समय वातावरण ठीक ही होता है। लेकिन शाम के समय केवल जॉगिंग करना ही नहीं, आधा-एक घंटा टहलना भी ऐसी रोड़ पर सेहत के लिए अच्छा नहीं हो सकता।

लिखते लिखते ध्यान आ गया...आज कल के जिम कल्चर के दिनों में...मैंने जो नोटिस किया है ...लोग कुछ इस तरह से सोचने लग गये हैं कि जिस समय टाइम मिले या जो स्लॉट जिम का खाली हो, उसी समय जा कर वर्क-आउट कर आएंगे...विभिन्न कारणों की वजह से महिलाओं में तो मैंने विशेष देखा है कि सुबह नाश्ते के बाद जिम या लंच से पहले जिम या दोपहर में जिम हो कर आ जाती हैं। मुझे लगता है कि यह भी बॉयोलॉजिक क्लाक की कहीं न कहीं अनदेखी है...ईश्वर ने हमारे शरीर में एक बेहद सुंदर, नैसर्गिक घड़ी फिट कर रखी है कि हर काम करने का एक टाइम लगभग फिक्स कर दिया गया है--खाने का समय, काम करने का, टहलने का, सोने का, पढ़ने का ...कुछ भी। अगर हम उस के अनुसार चलते हैं तो फायदे में रहते हैं, वरना अपने मेटाबॉलिज़्म को गड़बड़ा देते हैं।

यह जो मैंने वक्त बेवक्त जिम जाने की बात करी है, इस से यह तो ज़रूर होगा कि चर्बी पिघल जाए...ज़रूर वजन कम हो जाता होगा... (अब जब भी मैं यह शब्द "होगा"  इस्तेमाल करता हूं तो मुझे फिल्म आंखो-देखी याद आ जाती है...



बड़ी मजेदार फिल्म है, देखिएगा...मैंने तो तीन चार बार देख ली, मुझे बहुत पसंद आई) ...लेिकन जब हम लोग सुबह टहलने निकलते हैं, योगाभ्यास, प्राणायाम् करते है, कुछ भी व्यायाम आदि करते हैं....प्रकृति के सान्निध्य की वजह से ..सेहतमंद रहने की हमारी कोशिशों में चार चांद तो लग ही जाते हैं...उन से होने वाले लाभ कईं गुणा बढ़ जाते हैं....प्रदूषण ना के बराबर होता है, एक बात....दूसरी बातें, जैसे प्रातःकाल की अनुपम छटा, उदय होता सूरज, पक्षियों का चहचहाना....सब कुछ कितना आनंद देने वाला होता है...यह नैसर्गिक अनुकम्पा हमें दिन की शुरूआत अच्छे से करने में बेहद मदद करती हैं...

इसे अच्छे से पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करिए....और इस बात को गांठ बांध लीजिए
ये सब बातें आज आप से करने की इच्छा सुबह से हो रही थी...आज की टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर पढ़ी कि चिकित्सा विशेषज्ञों ने लोगों को सचेत किया है कि शाम के समय टहलना सेहत के लिए खराब है...यह बात उन्होंने विशेषकर सांस के रोगियों के लिए कही है.....आप इस खबर को नीचे दी गई तस्वीर पर क्लिक कर के अच्छे से पढ़ सकते हैं... देखिएगा... बाकी, बातें तो ऊपर आप से साझा कर ही ली हैं।

लेकिन जाते जाते मन हो रहा है कि कुछ ऐसी बातें तो ज़रूर यहां दर्ज कर ही दूं जिस के द्वारा हम लोग अपनी बॉयोलाजिक घड़ी को खराब करने में और अपनी मैटाबॉलिज्म को पटरी से उतारने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते ..
  • रात को देर से सोना, सुबह देर से उठना, नींद का पूरा न होना...
  • सुबह नाश्ता नहीं करना
  • दोपहर को खाना टाल देना, जंक-फूड से काम चला लेना ..बार बार चाय पीते रहना 
  • रात को बहुत लेट खाना और भारी खाना, और खाते ही बिस्तर पकड़ लेना
बस, इस पोस्ट के माध्यम से इतना ही संदेश पहुंचाना चाहता था कि टहलना ही काफी नहीं है, उस का समय और जिस वातावरण में टहला जा रहा है, वह भी कहीं ज़्यादा अहम् है...हां, शाम के समय ही अगर आप को समय मिलता है टहलने का तो किसी पार्क आदि में चले जाइए जहां पर हरियाली रहती है और अकसर वहां पर प्रदूषण का इतना प्रभाव नहीं रहता.....और जहां तक रात के समय खाने के बाद टहलने की बात है, उस समय तो बस बिल्कुल धीरे धीरे १०-१५ मिनट टहलकदमी ही की जा सकती है...

टहलने, घूमने, व्यायाम करने की बातें चलती हैं तो फिर जागर्ज़ पार्क फिल्म का ध्यान आ ही जाता है, क्या आपने वह फिल्म देखी है, अगर नहीं तो देखिएगा...यू-ट्यूब पर पड़ी है... 




खुरदरे मंजन कोई जादू तो नहीं कर देते ?


१९८० के दशक में जब हम लोग डेंटिस्ट्री पढ़ रहे थे तो यही सोचते थे कि खुरदरे मंजनों की समस्या इतनी व्यापक नहीं है, लेकिन नहीं...खुरदरे मंजन भयंकर क्षति पहुंचा रहे हैं।

मैंने शीर्षक में लिखा है कि खुरदुरे मंजनों का जादू....बिल्कुल ठीक लग रहा है मुझे यह लिखना...क्योंकि जब हम लोग किसी के ऐसे दांत देख कर उस को खुरदुरे चालू किस्म के मंजन त्यागने के लिए कहते हैं तो कुछ लोग हमारी बात मानने की बजाए उसी मंजन की तारीफ़ें करनी शुरू कर देते हैं...यही कहते हैं कि पहले तो समस्याएं बहुत थीं दांतों और मसूड़ों की ..लेकिन जब से फलां फलां मंजन रगड़ना शुरू किया है, आराम मिल गया....और यह भी कहते हैं कि दांतों के घिस जाने से भी उन्हें पहले तो कोई दिक्कत नहीं थी अब ही यह सूजन-दर्द हो गया है।

चलिए अपनी बात को एक मरीज़ का उदाहरण लेकर समझाने की कोशिश करते हैं...जिस बंदे की आप यह तस्वीर देख रहे हैं ये मेरे पास आज आए थे...दांतों की बरबादी और साथ में सूजन तो आप देख ही रहे हैं। इस बंदे ने बताया कि वह वही पेस्ट-मंजन इस्तेमाल करता है ...जो देश में बहुत प्रचलित है...यह पिछले बीस-तीस वर्ष से उसे ही कर रहे हैं...(मंजन-पेस्ट का नाम लिखना नहीं चाहता, चाहता तो हूं.....लेकिन हिम्मत नहीं है, कहीं कोई कंपनी वाला मुझे मरवा ही न दे!!..कुछ भी हो सकता है....मैं समझता हूं इस बात को .....हा हा हा हा हा ह ाहाहा हा हा ..)

 खुरदरे मंजन किस तरह से दांतों को नष्ट कर देते हैं...आज जो मरीज मेरे पास आया उस के दांत
(ऊपर वाली पोस्ट भी इसी मरीज़ की ही है, फ्लेश के साथ) 
इस तरह के मुंह की तस्वीर हमें दिन में कईं बार देखने को मिलती है....हर रोज़ बार बार ऐसे मरीज़ों को समझाना-बुझाना पड़ता है कि इस तरह के खुरदरे पेस्ट-मंजन में गेरू मिट्टी भी मिली रहती है..कुछ में तंबाकू भी मिला रहता है...इन के मुंह के अंदर ब्रुश से इस्तेमाल करने से या अंगुली से घिसने से दांत घिसने शुरू हो जाते हैं....थोड़ा थोड़ा ठंडा गर्म लगने लगता है...लेिकन फिर भी लोग इसे इस्तेमाल करना नहीं छोड़ते ....लगे रहते हैं...नतीजा यही होता है जो इस मरीज में हुआ ...दांत इतना घिस जाता है कि उस की नस नंगी हो जाती है...और फिर उस की जड़ के नीचे फोड़ा (abscess) बन जाता है... अब ऐसा नहीं है कि इस तरह की तकलीफ कोई जानलेवा तकलीफ़ है, नहीं, ऐसा नहीं है।

इस फोड़े की वजह से मुंह के अंदर और बाहर की सूजन तो दो चार दिन में दवाईयां लेने से ठीक हो जाती है...अस्थायी रूप से ही लेकिन ......स्थायी उपचार के लिए इन दांतों की आरसीटी (रूट-क्नॉल ट्रीटमेंट) करवाना पड़ता है... और फिर उन के ऊपर कैप लगवाने होते हैं....यानि इन का इलाज खूब झँझट वाला काम ...मरीज के लिए इसलिए कि उसे खूब खर्च करना पड़ता है ...बार बार डेंटिस्ट के यहां जा कर चक्कर लगाने का झंझट....सरकारी अस्पतलालों में अकसर इस तरह के कैप आदि की सुविधाएं होती नहीं .... बहुत से मरीज़ बाहर से करवाना नहीं चाहते, करवा नहीं पाते ....कुछ भी समझ लीजिए...

मैं कईं बार जब इस तरह के खुरदरे मंजनों और पेस्टों का त्याग करने की सलाह देता हूं और इस की जगह बढ़िया गुणवत्ता वाली कोई भी पेस्ट आदि का इस्तेमाल करने के लिए कहता हूं कि मुझे कईं बार लगता है कि मरीज सोच रहा है कि मैं किसी ऐसी ही टुथपेस्ट कंपनी के उत्पाद प्रोमोट करना चाह रहा हूं.......नहीं, ऐसी बात बिल्कुल नहीं है, न ही मेरे से यह धंधा हो पाएगा और ईश्वर की कृपा से मुझे न ही इस की ज़रूरत है...इन कंपनियों से कभी कोई तोहफ़ा, हवाई-यात्रा या किसी तरह के चारे की न तो कभी पेशकश हुई और न ही मेरे से यह हो पाता...अब ध्यान आ रहा है कि हम जैसे लिखने वालों को कौन चारा डालेगा!.....अभी ध्यान आया कि कुछ साल पहले इन पेस्टों के ऊपर कुछ लिखा था...अब मुझे ठीक से याद नहीं है कि क्या लिखा था, यहां पर लिंक लगा दूंगा....कईं बार कह चुका हूं कि हलवाई अपनी मिठाई नहीं खाता, मैं भी अपने लेख वापिस पढ़ने से गुरेज करता हूं....मुझे अजीब सा लगता है !

बात ज़्यादा लंबी खिंच रही है...इसलिए यहां विराम लगाता हूं...बस इसी बात के साथ कि कभी भी किसी भी चालू कंपनी के देसी मंजनों वंजनों पेस्टों के चक्कर में पड़ें नहीं.... मुझे इन में उपलब्ध दालचीनी, लौंग, काली मिर्च...और भी पता नहीं कितनी कितनी सुंदर चीज़ें जिन के बारे में आप पैकिंग के ऊपर पढ़ते हैं, बढ़िया चीज़ें हैं, लेिकन यह जो लाल मिट्टी (गेरू मिट्टी) और तंबाकू जैसे हानिकारक तत्व हैं, ये सब गुड़-गोबर कर देते हैं....दांतों को इन का खुरदुरापन बर्बाद कर देता है। इसलिए इन से दूरी बना कर रखिए... मैं भी एक अच्छी कंपनी की पेस्ट खरीद कर ही करता हूं...हमें कोई सेंपल वेंपल भी नहीं आते...न ही मैं इन की तरफ़ ध्यान करता हूं।

गूगल-प्ललस से मुझे पता चलता रहता है कि इस ब्लॉग के पाठक दो लाख से ऊपर हैं.....तो क्या मैं यह अनुरोध कर सकता हूं कि मुझे कोई उपाय सुझाएं कि मैं इस तरह की काम की बातें छोटी छोटी किताबों में लिख कर आठ-दस-पंद्रह रूपये में प्रकाशित करवा के बिकवा सकूं.....नहीं, फ्री में मैं बांटना नहीं चाहता हूं, उस की कोई कद्र नहीं होती, दस-पंद्रह रूपये खर्च कर खरीदी हुई किसी पुस्तक को हम सहेज कर रखते हैं...उसे कभी कभी देखने की तमन्ना भी रहती है।

अपने मुंह मिट्ठू बनना सीखा नहीं है, बिल्कुल बेकार सी बात लगती है, लेिकन सच तो सच है ही ....और यह सच यह है कि यह जो मैंने इस लेख में लिखा है ...इसे इतनी मजबूती से लिखने के पीछे मेरी ३५ साल की तपस्या शामिल है....बात को मानना या ना मानना आप का अधिकार-क्षेत्र है, जिस तरह से इस तरह के विषयों पर लिखना मेरा अधिकार है...या फ़र्ज़ है....फर्ज़ शब्द ज़्यादा अच्छा लग रहा है यहां।

इसीलिए कह रहा हूं कि अगर सस्ते कागज पर सस्ती सस्ती किताबें छपवाने के बारे में कुछ जानते हैं तो मुझे बतलाइएगा ....मैं अपना ईमेल भी यहां दे रहा हूं...          drparveenchopra@gmail.com     क्योंकि मैं कम से कम २०-२५ इस तरह की किताबें छपवाने के ख्याली पुलाव बरसों से बना रहा हूं...मुझे बड़े बड़े प्रकाशकों से किताबें छपवा कर उन्हें चार पांच सौ रूपये में बिकवाने में कोई रूचि नहीं है, पांच सौ हज़ार कापियां बेच कर....कोई बड़ा सा ईनाम लेने का भी कोई इरादा नहीं है ..(फिल्म उसे वापिस करने का भी झंझट....) ...मुझे तो खुशी इसी बात से होगी कि जब एक आम आदमी सड़क से गुजरता हुआ किसी फुटपाथ से पानमसाले-गुटखे की बजाए पांच-दस रूपये में ऐसी पुस्तक खरीदेगा, उस में कही बात को लेकर उस का मन उद्वेलित होगा....वह इन सब बातों को याद रखेगा....चाहे बिल्कुल थोड़ा थोड़ा..., मुझे अपना नाम याद करवाने की भी चाह बिल्कुल नहीं है...

किताबों की दुकानें खंगाल मारी हैं, इन विषयों पर आम आदमी की भाषा में उस के ही स्तर पर उतर कर उतनी सहजता से बात करने वाली किताबें छपती ही नहीं!.........शायद इस मार्कीट ही नहीं है, इसलिए!

अच्छा, बातें हुईं फुटपाथ की, आम आदमी की, पांच दस रूपये में बिकने वाली किताबों की ......तो फिर आज के चित्रहार का गीत भी कोई फुटपाथ छाप ही हो जाए.....बेहतरीन बोल, बेहतरीन संगीत...बेहतरीन अदाकारी ...जितेन्द्र और रीनाराय की ......न जाने हम सड़क के लोगों से ये महलों वाले क्यों जलते हैं!


Jane Ham Sadak Ke Logon Se-Aasha (1980) by MrBilal2009