Friday, February 27, 2015

शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है!

सुबह का सुंदर समय है...खुशनुमा माहौल है....मुझे लगता है कि मैं अपनी फिजूल की बक-बक शुरू करूं इस से पहले आप फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई से विद्या बालन के इस बेहद सुंदर डॉयलाग को सुन लें, मुझे पता है आपने इसे कम से कम सैंकड़ों बार सुना हुआ है ...लेिकन फिर भी इसे बार बार सुनना बहुत भाता है...एक नईं स्फूर्ति का संचार सा हो जाता है.....होता है ना?



हां, तो दोस्तो, विद्या बालन ने तो अपनी बात इतने सुंदर अंदाज़ में कर ली, अब हम भी थोड़ा शुरू हो जाते हैं।


दोस्तो, यह जो आप तस्वीर देख रहे हैं ना यह लखनऊ में हमारे अस्पताल के बाहर वाली सड़क की तस्वीर है।

पिछले कुछ दिनों से मैं जब भी अस्पताल से निकलता तो बाहर सड़क पर इतने सुंदर रंग बिरंगे फूल देख कर मन खुश हो जाता....कल मेरे से रहा नहीं गया, मैंने एक फूल उठा ही लिया....फिर लगा कि जितना सुंदर यह मुझे दूर से दिखा करता था, पास से तो यह हज़ारों गुणा ज़्यादा मनोहर है।




मैं कईं बार सोचता हूं कि प्रकृति भी हमें निरंतर सब कुछ सिखा रही है...सारे गुण जो इस में हैं उन से हम कौन सी सीख नहीं ले सकते!!

सहनशीलता

सब से पहले तो सहनशीलता ही देखिए....इतने सुंदर फूल, सब कोई पैर के तले मसल कर आगे निकल रहा है ...फिर भी प्रकृति को किसी से कोई गिला शिकवा नहीं...और हमें पब्लिक ट्रांसपोर्ट में किसी की बाजू भी टच हो जाए तो हम कैसी निगाहों से उसे घूरने लगते हैं!

परोपकार 

सब को खुशियां बांटना, सब के चेहरे पर मुस्कुराहट लाना ही जैसा इन फूलों का धर्म हो, और कुछ नहीं...किसी और से कुछ लेना देना नहीं....हर समय परोपकार की भावना..उदास चेहरों को खुशनुमा बना देने का हुनर......हम में से कितनों का आता है यह, अपने दिल पर हाथ रख कर बोलिए।

निःस्वार्थ भाव 

जो भी परोपकारी काम किया जा रहा है, ऐसी अनुपम छटा बिखेरते हुए..इस से कोई एक्सपेक्टेशन बिल्कुल भी नहीं कि कोई राही आयेगा, मेरी तारीफ़ करेगा ... मुझे इस के बदले कुछ मिलेगा.......बिल्कुल भी तो नहीं ..यही बात लिखते लिखते पुष्प की अभिलाषा गीत का ध्यान आ गया।



इस रास्ते से अधिकतर बहुत से फौजी निकलते हैं इसलिए मुझे इस गीत का तुरंत ध्यान आ गया..

प्रकृति रहस्यमयी है

पता नहीं कितने रहस्य प्रकृति की गोद में कैद हैं......और साईंसदान एक एक रहस्य खोजने में सैंकड़ों बरस गरक कर देते हैं....दोस्तो, इस फूल को देख कर यही लगता है कि दुनिया की सारी दौलत इक्ट्ठा कर के भी इस की एक पंखुडी का सृजन करने की क्या कोई कल्पना भी कर सकता है!....एक पंखुड़ी तो बहुत बड़ी बात हो गई ..

अगर हम प्रकृति से दोस्ती कर लेंगे तो यह अपने रहस्य धीरे धीरे हमारे समक्ष अनफोल्ड करती चली जाती है, आजमा कर देखिएगा।

प्रकृति हमें आशावादी बनाती है

सोचने वाली बात है कि अगर इस तरह का अद्भुत फूल बिना किसी कारण तैयार हो सकता है तो कुछ भी हो सकता है....प्रकृति संभावनाओं से परिपूर्ण है....अपने हर तरफ़ नज़र दौडाएं...संभावनाएं बिखरी पड़ी हैं......लेकिन जैसा कि विद्या बालन ऊपर वीडियो में कह रही हैं कि हमें यह सब देखने की फुर्सत ही कहां है!

और हम किसी मरीज़ को कितनी आसानी से कह सकते हैं कि यह बीमारी तो ठीक न होगी!..यह तो तुम्हारे साथ ही जाएगी।

हम तो बस दौड़े जा रहे हैं, दौड़े जा रहे हैं ...बिना इस पर विचार किए कि शहर की इस दौड़ में दौड़ के आखिर करना क्या है !

प्रकृति के पास रहेंगे...इसे निहारते लगेंगे, इस की गहराई में डूबने लगेंगे  तो किसी को धोखा दे कर कुछ पैसे बना लेने या किसी का किसी तरह का भी शोषण करने का सोच भी कैसे सकते हैं, नहीं हो पाएगा...कैसे भ्रष्टाचार से इक्ट्ठा कर के घर में बोरों में कागज के टुकड़े छिपा पाएंगे.....कितना गौण लगता है यह सब कुछ प्रकृति की विशालता के सामने.....सच में ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है, अगर हमारे पास कुछ समय इस के साथ बिताने की फुर्सत है....

अपने हिस्से का आकाश ढूंढ कर तो देखिए..

लगता है अब बंद कर दूं इस पोस्ट को.....किसी धार्मिक चैनल के प्रवचन की अगर आप को गंध भी आ गई तो मेरी खैर नहीं....अच्छा दोस्तो, आज की यह पोस्ट विद्या बालन की इस सुंदर बात और इस सुंदर पुष्प की अनुपम छटा के नाम रही। मिसिज कह रही हैं कि इस पेड़ को फोरेस्ट फॉयर कहते हैं....मुझे नहीं पता था, न ही मैंने इस का नाम जानने की कोशिश ही की। हमें तो इसी से संतोष कर लेना चाहिए कि हमें प्रकृति नित्य-प्रतिदिन कुछ नया परोसती है.. जो कि हमारी रूह की खुराक हुआ करती है, लेकिन अगर हमारे पास चंद लम्हों की फुर्सत हो तो!