Friday, November 13, 2015

जिस का काम उसी को साजे...

मुझे यह कहावत अच्छी लगती है...जीवन का सार इस में जैसे भर दिया गया हो।

आज जब मैं बाग में टहलने जाने लगा तो देखा कि वहां पर पतंजलि योग शिक्षा की तरफ़ से जो कक्षा लगाई जाती है, वह बंद होने का समय था. शिक्षक महोदय एक अधेड़ उम्र की महिला को बड़ी आत्मीयता से कह रहे थे कि आप कल भी आईएगा....अच्छा लगा मुझे यह सुन कर...महिला उन्हें आगे से कुछ कह तो रही थीं कि ये (पति) और बिटिया तो लंबी तान कर सोये रहते हैं..। आचार्य जी फिर आगे से कुछ कह तो रहे थे..."यहां पर तो आने से ही ..."...आगे वाली बात मेरे कानों में नहीं पड़ी...मैं आगे बढ़ चुका था।

सुबह टहलते हुए मैं बाबा रामदेव के बारे में ही सोचता रहा...मैं यही सोचता रहा कि बाबा की लोकप्रियता के किस दौर के हम गवाह रह चुके हैं...सुबह सुबह उठ कर लोग पांच बजे बाबा के साथ योग करने लग जाते ...लेकिन मुझे मेरे आलस्य ने ही घेरे रखा ...मैं नहीं कर सका....कुछ कुछ बातें खाने पीने की अच्छे से उनकी मानने लग गया।

बाबा अच्छा इंसान है.....सारे विश्व में योग का डंका बजा दिया....लोगों को सुबह सुबह उठने पर मजबूर कर दिया...आंवला जूस, आंवला कैंडी....बहुत कुछ खिला-पिला दिया....धन्यवाद. मुझे याद आता है शायद १५ साल से पहले के वे दिन जब लोग दोनों हाथों के नाखुन आपस में रगड़ने लगे थे ताकि सिर के बाल काले रह पाएं....

बाबा ने निःसंदेह बढ़िया काम किया है ....ऐसे ही तो कोई किसी प्रांत का ब्रांड अम्बेसेडर नहीं बन जाता...लेकिन मुझे लगता है कि हम लोगों को इस बात से सबक लेना चाहिए कि जिस का जो काम हो उसे वही करना चाहिए, उसे उसी पर केंद्रित रहना चाहिए...हम दूसरे काम में घुसने की कोशिश करते हैं तो शायद यह मुनासिब नहीं होता।

होता यह था कि सुबह सुबह रोज़ाना पांच बजे लोगों को योग की खुराक के साथ बाबा की काले धन से जुड़ी मन लुभावन बातें, किस्से, घोषणाएं सुनने की भी लत लग चुकी थी...मुझे ऐसा लगता है....बढ़िया चल रहे प्राणायाम के बीचों बीच काले धन के अरबों के आंकड़े सुन कर एक आम हिंदोस्तानी का दिल फिर से तेज़ गति से धड़कने लगता था...लेिकन इसे यह सब सुनने में मज़ा आने लगा था..उन्हें योग के साथ मसाला चाय जितना मज़ा ये मसालेदार, चुटीली बातें भी देने लगीं....वे एक फेंटेसी में जीन लगे जैसे कि कालाधन विदेशी बैंकों से निकल कर सीधे उन के बचत खाते में आ जाएगा... हां, वह बड़ा करेंसी नोट बंद किए जाने की बात मुझे बहुत अच्छी लगती थी, लेकिन क्या कुछ हुआ!

व्यक्तिगत तौर पर यह हमेशा से यही लगता था कि इतनी सुंदर योग की कक्षा में अचानक यह भ्रष्टाचार, काले धन आदि की बातें! ...बाबा रामदेव ऐसा करते थे तो कोई औचित्य भी होगा इस में, मेरी समझ में नहीं आया...मैं दुनियादारी सीख ही नहीं पाया ...मेरे एक प्रोफैसर ने भी मुझे एक बार यही कहा था प्रवीण, worldly-wise होना भी जरूरी है!

बस, यही राजनीति की बातें ही बाबा की योग की बढ़िया चल रही कक्षाओं में अजीब सी लगने लगी...फिर वह रामलीला वाला किस्सा हो गया.....और बस, फिर तो जो हुआ सब जानते हैं। बाबा को किन परिस्थितियों में आत्म-रक्षा के लिए कैसे वहां से जाना पड़ा, उसके बारे में चर्चा नहीं करते, लेकिन इस बात ने बाबा की छवि को बहुत हानि पहुंचाई....आप का क्या ख्याल है?... और एक बात, एक बार बाबा की कपिल सिब्बल आदि मंत्रियों के साथ मीटिंग के बाद भी कुछ लफड़ा हुआ था...

सीधी सीधी बात कि राजनीति करना हरेक की बस की बात नहीं है...मैं जब कभी चुनावी दंगल में लोगों को भाषण करते देखता हूं तो अकसर हंस देता हूं और आसपास बैठे बंदों से शेयर करता हूं कि क्या ऐसा हम लोग कर सकते हैं......मेरे तो सिर ही डेढ़ मिनट में ही दुःखने लग जाए, और मैं कह दूं वहीं ...ठीक है, यार, तुम जीते मैं हारा!

ईश्वर ने संसार में हर बंदे को एक विशेष काम के लिए भेजा हुआ है...कोई बातें बढ़िया करता है, कोई प्रवचन, कोई किस्सागोई अच्छी करता है, कोई रंगकर्मी बढ़िया है तो कोई पेन्टर उमदा, कोई गाने लिखता है, कोई गाता अच्छा है, कोई खाना अच्छा बनाता है.....आदि आदि ..लेकिन हम मिक्स-अप नहीं कर सकते....

बस, यही था आज का विचार...आज सुबह टहलते हुए लखनऊ एफएम सुन रहा था ..जमशेद प्रोग्राम पेश कर रहे थे ...बीच बीच में गाने भी बजा रहे थे ...अजीब अजीब से गाने....सिग्नल ..प्यार का सिग्नल ...प्यार का सिग्नल....यह भी कोई गीत हुआ...गीत तो जो बढ़िया बनने थे...लिखे जाने थे और गाये जाने थे वे गाये जा चुके हैं...



 जाते जाते एक बात का ध्यान आ गया...योग और राजनीति का अगर संबंध नहीं है तो आध्यात्म और राजनीति का भी नहीं है, लोग अपनी समझ के साथ कभी कभी इन्हें भी मिलाने की कोशिश कर लेते हैं....भोली भाली जनता समझ नहीं पाती...लेकिन यह बात बिल्कुल गलत है....चुनाव दंगल के दिनों में बहुत बार कुछ प्रत्याशी या उन के परिजन विभिन्न् सत्संगों में जाकर भक्तों का आशीर्वाद लेने पहुंच जाते हैं....और बड़े सूक्ष्म ढंग से भक्तों तक संदेश पहुंचा दिया जाता है.....मुझे यह बिल्कुल अजीब लगता है ..जो भक्त वैसे ही अपने को चरण-धूल समझते हैं, उन के सीधेपन या vulnerability कहूं, इस का भी फायदा लिया जाता है या लेने की कोशिश तो की ही जाती है....बस, यह लिखने की इच्छा हुई सो लिख दिया.....जैसे पेप्सी पीने वाला वह युवक आज कल कह रहा है दिन में बीसियों बार.......पैप्सी थी यार, पी गया.............मैंने भी जो देखा, जो फील किया....ब्यां कर दिया!

हां, वापिस बाबा रामदेव पर लौटते हैं.....मुझे बाबा के बनाए मंजन और पेस्ट पर आपत्ति है....उस के साथ सब ठीक नहीं है ..इस के बारे में जानने के िलए आप को मेरी यह ब्लॉग पोस्ट देखनी होगी.......आज बाबा रामदेव की बात करते हैं..

अच्छा, यार, बाकी फिर कभी ...ड्यूटी पे पहुंचने का समय हो गया है...