Thursday, May 7, 2015

अच्छा तो सूअर भी झुंड में ही चलते हैं!

कल एक डिनर में गये थे...निमंत्रण पर Compulsory लिखा हुआ था..वहां पर खाने में थोड़ी ओव्हर-ईटिंग सी हो गई..आठ बजे से भजिया-पकौड़ी आने लगी तो खाने के समय कुछ विशेष इच्छा नहीं थी। लेकिन फिर भी स्वीट डिश में बेक्ड बूंदी, चाकलेट पुडिंग और कुल्फी देख कर रहा नहीं गया..ज़रूरत से ज़्यादा खा ली। 

आज सुबह पांच बजे के करीब उठा तो तबीयत भारी भारी सी लग रही थी..यही लगा कि अगर आज सुबह साईकिल टूर पर नहीं निकले तो सारा दिन तबीयत ऐसे ही सुस्त ही रहने वाली है। 

कॉलोनी से बाहर निकलने पर विचार बनाया कि आज एयरपोर्ट तक हो कर आया जाए...इसी चक्कर में एक-सवा घंटा भी पास हो जाएगा। 

तो हवाई अड्डे का ही रूख कर लिया। 

यह तस्वीर जो आप देख रहे हैं यह सुबह लगभग छः बजे की है...सुबह सुबह किस तरह से सफाई कर्मचारी अपने काम धंधे पर निकल पड़ते हैं। आगे चल कर मैंने दो महिलाओं को भी देखा जो बड़ी सहजता ते इस तरह की रिक्शा चला रही थीं। जो भी व्यवसाय किसी को सम्मानपूर्वक गुजर-बसर करने का अवसर देता है वह श्रेष्ठ व्यवसाय है।
बीस पच्चीस मिनट लखनऊ कानपुर रोड पर चलने के बाद एयरपोर्ट आ गया। अमौसी एयरपोर्ट जाने के लिए यहां से सड़क अंदर की तरफ़ मुड़ जाती है। आगे की पांच तस्वीरें एयरपोर्ट एप्रोच रोड की हैं।





लखनऊ का एयरपोर्ट (डोमेस्टिक टर्मिनल)
एयरपोर्ट से बाहर आने के लिए दूसरी एप्रोच रोड पर यह नोटिस किया कि लार्सेंन एंड टूबरो का कोई काम चल रहा है...और इतने बढ़िया बढ़िया स्लोगन भी दिख गये...बेहद सटीक ...थोड़ा आगे चल कर पता चला कि यह तो लखऩऊ मेट्रो का प्रोजेक्ट ऑफिस है..

वृक्ष धरा के भूषण, दूर करें प्रदूषण 

आज तक यहां लखनऊ में मेट्रो का काम ज़ोरों शोरों से चल रहा है। अखिलेश यादव सरकार ने इसे अगले विधान सभा चुनाव से पहले एयरपोर्ट से चारबाग रेलवे स्टेशन तक तो शुरू करने की ठान रखी है।

बीच बीचे में कुछ लफड़ा हो जाता है ...कुछ खास नहीं--बस ऐसे ही छोटा मोटा...क्रेडिट कौन ले और कौन किसे कितना लेने दे, यह भी तो एक बड़ा मुद्दा होता है। तो हुआ यूं कि मेट्रो के किसी समारोह में प्रदेश सरकार ने किसी केन्द्रीय मंत्री को नहीं बुलाया...दिक्कत हो गई...५० फीसदी पैसा तो केन्द्र का लग ही रहा है, केन्द्र ने कोई अनुमति देने से इंकार कर दिया.... मेट्रो के काम में अवरोध होने वाला था....लेकिन मेट्रो प्रशासन ने बीच बचाव करा के सुलह करवा दी ..अगले फंक्शन में प्रदेश सरकार के साथ साथ केन्द्र सरकार के नुमांइदे भी होंगे। शुक्र है जल्दी सी मामला सुलट गया।

यह जो तस्वीर आप नीचे देख रहे हैं, यहां से मेट्रो का काम शुरू है...यह एयरपोर्ट के बिल्कुल बाहर ही है ...

मैंने पहले शायद कभी नोटिस नहीं किया होगा......लेकिन आज सुबह मुझे यह भी पता चल गया कि झुंड में भेड़-बकरियां- गधे ही नहीं चलते, झुंड में चलने की तहज़ीब इन सूअरों को भी हासिल है। इन के पीछे भी इन का मालिक डंडा लेकर और इन्हें गालियां बकता हुआ जा रहा था।
जो नीचे आप तस्वीरें देख रहे हैं ये शहीद पथ फ्लाई-ओवर के नीचे वाली सड़क की हैं। एक बार हम एयरपोर्ट से वापिस आ रहे थे तो गल्ती से गाड़ी में इस फ्लाई-ओव्हर पर चढ़ गए और बहुत दूर निकल गये...पूरा एक डेढ़ घंटा लग गया था घर वापिस लौटते लौटते।
अकसर ट्रेनों में सफर करते वक्त हम ने झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों को मंजन, तंबाकू, और दातुन से दांत घिसते देखा है...कईं बार लोग ब्रुश करते भी दिख जाते हैं...जो भी हो इस बच्चे को ब्रुश करते देख कर अच्छा लगा...दूसरे हाथ में टंग-क्लीनर देख कर तो और भी खुशी हुई....चाहे वह ठीक ढंग से कर तो नहीं था, लेकिन कोई बात नहीं....
मजबूरी का नाम........आप जानते ही हैं। ये श्रमिक लोग बहुत सी चीज़ों को रीसाईक्लिंग करने का जुगाड़ जानते हैं...हम लोग तो बस नारे लगाते हैं...लेकिन ये लोग इसे व्यवहार में लाते हैं। आप देख रहें किस तरह से सीमेंट की पुरानी टूटी-पुरानी चद्दरों से इन्होंने अपने कच्चे झोंपड़ों की दीवारें खड़ी करने का जुगाड़ कर रखा है। इस के लिए ताली ही बजा दीजिए।


यह कोई पोखर है या कुछ और .......पता नहीं.


बड़े बड़े पेड़ों के नीचे मंदिर आदि तो बनते ही आए हैं ..लेकिन अगर इस काम को पेड़ के तने से थोड़ा हट के किया जाना तो पेड़ की सेहत के लिए बहुत अच्छा लगा। जब भी मैं इस रोड से गुज़रता हूं तो यही लगता है जैसे इस पेड़ का किसे ने गला ही दबा दिया हो..एक तरफ़ मंदिर और दूसरी तरफ़ बिना किसी गैप के एक बड़ा सा सीमेंटेड प्लेटफार्म भी बना दिया है बनाने वालों ने...!


We are in the habit of taking so many things for granted and also grumbling over slight discomforts...इन छोटे छोटे बच्चों को मैंने जब घर के सभी डिब्बों और कोल्ड-ड्रिंक्स की खाली बोतलों में पानी भरते देखा तो मुझे यह एहसास हुआ कि पानी की सही कीमत ये बच्चे जानते होंगे!

 गर्मियों का तोहफा-- तरबूज के ढ़ेर आज कल जगह जगह दिखते हैं. 
पढ़ेंगे तो बढ़ेंगे वाली बात समझ गया है यह बच्चा 
स्कूल चलें हम भी ...
 बस, घर आते आते तबीयत ठीक ही लग रही थी...फ्रिज में रखा तरबूज खाया, अच्छा लगा।
 पसंद का एक गीत बजा कर निकलता हूं.....