Monday, January 12, 2015

फोर-स्ट्रोक स्कूटर भी इक्कीसवीं सदी की बड़ी उपलब्धि..

जिन स्कूटरों को किक की ज़रूरत नहीं होती...शेल्फ-स्टार्ट वाले स्कूटर ... मेरे विचार में तो ये भी इस सदी की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

शायद आज की युवा पीढ़ी को लगे कि इस में कौन सी बड़ी बात है, लेिकन यह सच में कितनी बड़ी बात है यह मेरी उम्र के लोग ही बता पाएंगे।

सच में जब याद आता है कि किस तरह से १९८० के दशक में मैं अपनी येज्दी मोटरसाईकिल को किक पे किक मार कर स्टार्ट किया करता था। बहुत अच्छी हालत में थी...लेिकन सुबह सुबह खास कर सर्दी के दिनों में तो किक मार मार के नानी याद आ जाया करती थी।

मैकेनिक तो कह दिया करता था कि सुबह सुबह चोक लगा लिया करो, लेकिन चोक भी कुछ न करती थी उन ठंड के दिनों में।

कहावत है ना ..कंगाली में आटा गीला....बिल्कुल उसी तरह एक तो जेब में यही सो पचास रूपये हुआ करते थे और ऊपर से इसी खौफ़ के साये में ही वह सड़क पर दौड़ा करती थी कि क्या पता चलते चलते कब हड़ताल कर दे और इसे मैकेनिक को दिखाने की नौबत आ जाए.....फिर बीस तीस रूपये का फटका......जी हां, होता भी कुछ यूं था....हमारे घर और कालेज के रास्ते में एक पुल आता था.....जब कभी पुल चढ़ते हुए थोडी सी अलग तरह की आवाज़ निकालने लगती तो दिल ऐसे डूबने लगता जैसे किसी मां का बच्चा बीमार पड़ गया हो।

पुल के ऊपर पहुंचते ही...और फिर कालेज पहुंच कर बांछे खिल जातीं.....फिर लगता, चलो अभी तो पहुंच गए ..वापिसी के समय देखेंगे.

मैकेनिक कभी कुछ कहता कि इस का तेल निकल रहा है, इस का प्लग ऐसा है, शार्ट हो गया है, टैंकी में कचरा है...जिसे सुन कर मेरा भी बहुत कुछ शार्ट होने लगता....सब कुछ गिना देता लेकिन दो ही मिनट में चला देता.

फिर १९९० में एलएमएल ली ......बहुत अच्छा लगा इस की सवारी करना......बस, सुबह सुबह सर्दी के मौसम में थोड़ी दिक्कत हुआ करती थी, समय समय पर सर्विस करवा लिया करते थे....कोई खास दिक्कत हुई नहीं कभी इस के साथ।

कुछ ही समय बाद मिसिज़ ने वह स्कूटर खरीदा जिस में शेल्फ-स्टार्ट था.....हां, हां, काईनेटिक...आप किक भी इस्तेमाल कर सकते थे....लेिकन शेल्फ-स्टार्ट का फीचर मन को इतना भा गया कि बस, हर समय उस ही निकालने की इच्छा हो....उस को हम ने बहुत यूज़ किया... अब तक तो मोटरसाईकिल भी शेल्फ-स्टार्ट आ चुकी थीं.....देख कर बहुत ताजुब्ब होता था, कईं बार चलाया भी।

लगभग तभी हमने एक एक्टिवा खरीद ली......सब लोग उस की प्रशंसा किए करते थे......अभी उसे खरीदा नहीं था, एक दिन एक समझदार सा बिजनेस मैन कहीं मिल गया.....कोई बात छिड़ी तो उसने कहा ... अब आप देखें यह एक्टिवा स्कूटर बिक रही है इतनी .....लेकिन इस में है क्या, सारे का सारा प्लास्टिक लगा हुआ है।

उस की बात सुन कर यही लगा कि यह तो बेवकूफी वाली बात है.......यार, तुमने कबाड़ थोड़ा ही न बेचना है......इतनी बड़ी कंपनी है, प्लास्टिक या लोहा लगाने का निर्णय इन के हाथ में थोड़ा होता होगा।

जितनी बड़ी संख्या में यह एक्टिवा नाम की स्कूटर बाज़ार में दौड़ती है मुझे कईं बार लगता है कि इस की कंपनी इस सफलता की हकदार है। कोई परेशानी नहीं होती इसे चलाने में ......युवा से लेकर बुज़ुर्ग भी इसे सहजता से चला रहे होते हैं, महिलाएं भी आसानी से इसे कंट्रोल कर लेती हैं।

बस अगर समय समय पर इस की सर्विस करवा ली जाए.. तो इस को स्टार्ट करने में दिक्कत आती नहीं....बस, सुबह पहली बार इसे स्टार्ट करते समय किक का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। लेिकन मैं इसे जब भी चलाता हूं मैंने शायद इसे स्टार्ट करने के लिए किक का इस्तेमाल ही नहीं किया था।

यह पोस्ट मैंने यह बताने के लिए लिखी कि इस तरह के स्कूटर में मेरे जैसे लोग भूल ही जाते हैं कि किक भी है.......पिछले महीने की बात है, बाज़ार में मैंने कहीं खड़ी की, फिर से स्टार्ट करने लगा तो स्टार्ट ही न हो, ऐसे में मैंने बड़ी कोशिश की, चोक भी लगाई.........हार कर मैं इसे एक मैकेनिक के पास ले गया, उसे तकलीफ़ बताई। उसने कहा ...बाऊ जी, किक से भी नहीं हो रही क्या?......मैं उस की तरफ़ ऐसे देखने लगा जैसे चोरी की स्कूटर हो, उसने एक ही किक लगाई और स्कूटर स्टार्ट............सच में मुझे यह अहसास ही नहीं था कि इस स्कूटर में किक भी होती है, क्योंकि मैंने कभी भी इस किक को इस्तेमाल ही नहीं किया था।

तो फिर दोस्तो हुई कि नहीं, शेल्फ-स्टार्ट स्कूटरों वाली इक्कीसवीं सदी की एक बड़ी उपलब्धि।

नोट.......पोस्ट का कंटैंट ऐसा है कि लग सकता है कि जैसे यह पोस्ट स्पांसर्ड हो, नहीं, बिल्कुल नहीं.....मैं कभी भी प्रायोजित लेखन में विश्वास नहीं रखता, सारे ब्लॉग में एक भी पोस्ट प्रायोजित नहीं है, और शायद न ही कभी होगी। लेकिन कभी कभी किसी चीज़ की कार्यप्रणाली से आप इतने प्रभावित हो जाते हैं कि आप उस की दिल खोल कर तारीफ़ किए बिना रह नहीं सकते।

सोना कितना सोना है..

व्हाट्सएप पर कुछ कुछ तस्वीरें-बातें शेयर होती रहती हैं..जो हम सब को यादों की बारात में शामिल कर देती है। आज भी एक तस्वीर पंजाबी मुटियार की शेयर की गई थी जिसने इतने गहने पहने थे कि पंजाबी में कहते हैं ..सोने से लदे होना.....बस वह सोने से लदी ही हुई थी।

कल ही इसी ग्रुप पर यह चर्चा हो रही थी कि सोने के ज़ेवर खरीदना तो महिलाओं की कमज़ोरी है।

मुझे लगता है कि सोना शायद ३० हज़ार रूपये प्रति तोला के आस पास है, बस इस के अलावा इस पर कुछ भी चर्चा के िदन लद गये।

इतनी वारदातें होने लगी हैं कि अब तो असली क्या और नकली क्या, हर पीली धातु से डर लगने लगा है।

चलिए, जल्दी जल्दी कुछ आसपास की घटनाएं बता दूं....आज से बीस बरस पहले की बात है, एक बंदा बंबई में बस में यात्रा कर रहा था..अचानक उस की अंगुली में कुछ गीला गीला सा लगा.. देखा तो किसी ने उस के हाथ की अंगूठी के उतारने के चक्कर में उस की अंगुली ही काट दी थी.....उस दिन के बाद कभी हाथ में अंगूठी डालने की हिम्मत नहीं हुई। अखबार में आदमी की तस्वीर भी आई थी।

१०-१२ साल पहले की बात..मेरी पत्नी और उस की भाभी दिल्ली में एक सत्संग से बाहर निकल रही थी, मोटरसाईकिल पर दो लड़के आए और मेरी श्रीमति के गले से चीन झपट पर तुरंत आंखों से ओझल हो गये। शुक्र यह था कि यह वारदात करते समय उन्होंने किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया।

मेरे सामने एक बार पुरानी दिल्ली स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी छूटी, तो खिड़की के किनारे बैठी एक औरत के गले से चैन बाहर से किसी ने खींच ली....उस दिन उस सिख जेंटलमेन ने अपनी पत्नी की अच्छी क्लास ली..कहने लगा>>>..."यह तो होना ही था, कहा भी था कि इसे मत पहनो, और पहना ही है तो खिड़की वाली सीट पर मत बैठो। ये चोर उचक्के तो गिरोह में काम करते हैं, वारदात करने के बाद अगले ही पल गायब हो जाते हैं, अब कौन XXXXXX(मोटी सी गाली) इन के चक्कर में पहले तो गाड़ी छोड़े, फिर पुलिस के धक्के खाए, मिलना मिलाना फिर भी कुछ नहीं।"

बंदा बातें समझदारी की कर रहा था।

कुछ वर्ष पहले की ही बात है.....मेरी मदर-इन-ला एक शादी में करनाल गई हुई थीं, उन की बंद अटैची से लगभग २० तोले सोना निकल गया...यह एक मिस्ट्री ही बनी रही कि यह कैसे हो गया?...शादी वाले घर में आप किस से कुछ कहें?
लगभग हर रोज़ इस तरह की वारदातें अखबारों के पन्नों की सुर्खियां बनी होती हैं। कुछ ज़्यादा डेढ़ सयानी महिलाएं यह सोच कर खुश होती हैं कि उन्होंने तो नकली सोना पहन रखा है। सोचने वाली बात है कि शायद इस से पैसे का नुकसान होना अगर बच भी गया, जान तो खतरे में है ही.....पहले तो कोई उचक्का पता ही नहीं किस हथियार के साथ तैयार हो कर आ रहा है, और नहीं तो कान की बालियां खींचने के चक्कर में तो कितनी महिलाओं के कान ही कट जाते हैं।

अब क्या क्या लिखें, पहला ज़माना और था..मेरी मां कहती हैं कि वे शादी से पहले भी सोने की दो चूड़ी, बूंदे और गले की चेन डाल कर रखती थीं। विवाह शादियों में भी हम लोग देखा करते थे .. कईं कईं दिन पहले ही हम लोग शादी वाले घर में जा कर डेरा जमा िलया करते....फिर किसी कमरे में महिलाएँ अपनी अपनी सोने के गहनों की पोटलियां खोल लेतीं, और फंक्शन में डालने के लिए एक दूसरे से गहनों का आदान प्रदान किया करतीं। और एक बात, विवाह शादियों में लोग पड़ोसियों से गहने ले कर चले जाया करते थे.......सच में लगता है कि हम लोगों ने रामराज देखा है।
मुझे ऐसा लगता है कईं बार कि सोना खरीदना ही बेवकूफी है.......विवाह शादी में कुछ लेना देना भी हो तो भी सोना न खरीद कर, कोई एफ.डी आदि दे देनी चाहिए।

एक बात और याद आ गई... विवाह शादी पर जाने से पहले.. एक्स्ट्रा गहने आदि किसी ट्रंक में रख कर अपने पड़ोसी के यहां रख जाया करते थे। यह सोच कर हैरानगी होती है ना कि आज से ३०-३५ वर्ष पहले भी हम लोग आपस में इतना विश्वास कर लिया करते थे!!

अपने इर्द-गिर्द देखता हूं ..अपने सर्कल में तो यही देखता हूं लोग सोने की वजह से परेशान हैं.......क्या करें, क्या न करें, महंगा इतना हो गया है कि इस की नुमाइश कर के अपने से थोड़े कमजोर रिश्तेदारों पर धाक जमा नहीं सकते.....वरना उचक्के जीना हराम कर दें, अगर किसी ने संभाल कर रख हुआ है तो किस काम का!........बस, देग पर बैठे सांप की तरह उस की हिफाजत करते रहिए।

अकलमंद लोग हैं वे जो सोना बेच कर कोई घर आदि खरीद लिया करते हैं या किसी बड़े उद्देश्य से बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में इसे लगाते हैं.. सोना तो अपनी चमक खो चुका है सच में। कारण यह भी है कि अमीर गरीब के बीच की खाई बहुत गहरी हो चुकी है.....आदमी जिस का बच्चा बीमार है, या जिस के घर में दो दिन से चूल्हा नहीं जला, उसे अगर कोई सोने की चेन पहने औरत दिखेगी तो वह तो मन में यही सोचता है कि शराफत, गई तेल लेने.......बाकी हिसाब तो बाद में हो जाएगा, पहले पापी पेट को तो भरें......यही हो रहा है, ज़ाहिर सी बात है कि इस चक्कर में कौन अनैतिक, नैतिक के चक्कर में पड़ता है।

सीधी सी बात है कि कोई भी सेफ नहीं है......आज कल एक और ट्रेंड देखा गया है.....औरतें अपने पति के साथ कहीं जाती हैं तो खूब गहने पहन लेती हैं.......पति तो साथ है यही सोच कर........पति ही तो है, कोई किंग-फुंगली या गामा पहलवान तो नहीं।

सोने का सही इस्तेमाल भी कईं जगह सुना......और लोगों के कईं ढंग भी सुने इसे छिपाने के। जब हम लोग अपने ग्रैंड-पेरेंट्स के बारे में सुनते हैं तो यही बताते हैं कि पाकिस्तान से आते वक्त वे लोग अपने साथ बस सोना ही लेकर आ सके.....थोड़ा भी नहीं, सोने की एक दो ईंटें, तीन-चार किलो सोना, और तब सोना सस्ता भी तो बहुत था......और हिंदोस्तान पहुंचने पर उस सोने को बेच बेच कर जैसे तैसे सिर छुपाने के लिए घऱ बने, सभी बच्चों-भाईयों-बहनों की पढ़ाईयां, शादियां हुईं......घर का खर्चा चलता रहा ...और सोना खत्म होने पर बिल्कुल कंगाली जैसे दिन भी आ गये.......कुछ लोग उद्यमी थे, उन्होंने सोना बेच कर छोटे मोटे धंधे शुरू कर लिए जो चल निकले और फिर कभी उन्हे पलट कर न देखना पड़ा। हमारे बड़े-बुजुर्ग पहली श्रेणी में आते हैं.....जो भारत आने पर छोटा मोटा धंधा करने में झिझकते ही रह गये। हम लोगों ने बचपन में बहुत कुछ देखा और अनुभव किया है, ये सब बातें मैं काल्पनिक नहीं लिख रहा हूं। यह तो हुया सोने का सही इस्तेमाल ..किस तरह से सोने की वजह से भुखमरी से बच गये लोग।

सोने को छिपाने की बात.......मुझे अच्छे से याद है जब मैं छोटा सा था तो हमारे पड़ोस वाली आंटी मेरी मां को एक दिन बता रही थीं कि कैसे उसने अपना सारा सोना तंदूर के नीचे एक गड्डे में दबा कर रखा हुआ था...और ट्रांसफर होने पर तंदूर तोड़ कर उसे निकाल कर ले गये थे। लोगों ने तब भी सारे जुगाड़ कर ही रखे थे।

जाते जाते एक कमैंट हो जाए........दिल की बात बताऊं ..अब किसी महिला से भी कोई वारदात होती है ना ..किसी की चेन किसी ने झपट ली, कितनी की चूड़ीयां उतरवा लीं..किसे के कानों की बालियां खींच ली, कान फट गये........फिर भी ऐसी किसी भी घटना की शिकार महिला से सहानुभूति बिल्कुल न के बराबर होती है, यही लगता है कि जब सब कुछ रोज़ाना अखबारों में छप रहा है तो भी अगर समझ नहीं आ रही तो कोई इनका क्या करे!




मैं तो बहुत बार कहता हूं कि जो हमारे पारंपरिक कांच और स्टोन से बने गहने हैं, क्या वे हम आकर्षक हैं ?.........वैसे भी.....Thank God, Beauty is not skin deep!!        And of course, Beauty lies in the eyes of the beholder! ..... हाथ कंगन को आरसी क्या!!

चूडियों की बात चलती है तो मुझे बचपन में देखी फिल्म सास भी कभी बहू थी का यह गीत अकसर ध्यान में आ ही जाता है......