Monday, January 7, 2008

हेयर-ड्रेसर के पास जाने से पहले.....

दोस्तो, मैं अकसर सोचता हूं कि हम बड़ी बड़ी बातों की तरफ तो बहुत ध्यान देते हैं लेकिन कईं बार बहुत महत्वपूर्ण बातें जो देखने में बिल्कुल छोटी मालूम पड़ती हैं, उन को जाने-अनजाने में इग्नोर कर देते हैं। ऐसी ही एक बात मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं कि हम हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाने को कभी सीरियस्ली लेते नहीं है, पता नहीं झिझकते हैं या फिर भी....पता नहीं क्या।

दोस्तो, किट से मेरा भाव है कि हमें चाहिए अपनी एक सिज़र, एक-दो कंघीयां व एक रेज़र हर बार हेयर-ड्रेसर के पास अपना ही लेकर जाना चाहिए। दोस्तो, मैं कोई अनड्यू पैनिक क्रियेट करने की बिल्कुल कोशिश नहीं कर रहा हूं, मुझे तो यह पिछले 15 सालों से लग रहा है कि यह आज के समय की मांग है। दोस्तो, आप ज़रा सोचें कि हम सब लोग अपने घर में भी एक दूसरी की कंघी इस्तेमाल नहीं करते----घर में आया कोई मेहमान आप की कंघी इस्तेमाल कर ले,तो इमानदारी से जवाब दीजिए कोफ्त सी होने लगती है न। तो फिर, हेयर-ड्रेसर के यहां हज़ारों सिरों के ऊपर चल चुकी उस कंघी से हम परहेज़ करने की कोशिश क्यों नहीं करते। प्लीज़ सोचिए !! अब करते हैं, रेज़र की बात----मान लिया कि ब्लेड तो वह बदल लेता है, लेकिन दोस्तो अगर किसी कंटमर को कट लगा है , तो इस बात की भी संभावना रहती है कि थोड़ा-बहुत रेज़र( उस्तरे) पर भी लगा रह गया हो। बातें तो ,दोस्तो, छोटी छोटी हैं लेकिन जिस तरह से एड्स और हेपेटाइटिस बी जैसी बीमारियों ने आजकल अपना मुंह फाड़ रखा है तो एक ही बात ध्यान आती है----पूरी तरह से सावधानी रखना ही ठीक है। अब जब लोग शेव करवा रहे हैं या कटिंग करवा रहे हैं तो जरूरी नहीं हर कट हमें दिखे, कुछ कट ऐसे भी होते हैं जो हमें दिखते नहीं हैं..अर्थात् माइक्रोकट्स। जहां तक हो सके शेव तो स्वयं ही करने की आदत होनी चाहिए। कंघी, उस्तरे की बात कर रहे थे, तो पता नहीं किस को कौन सी स्किन इंफैक्शन है, क्या है , क्या नहीं है----ऐसे में एक यह सब चीज़े शेयर करना मुसीबत मोल लेने के बराबर नहीं तो और क्या है। तो, सीधी सी बात है कि अपनी किट लेकर ही हेयर-ड्रेसर के पास जाया जाए। आप को शायद एक-दो बाहर थोड़ा odd सा लगे, लेकिन फिर सब सामान्य सा लगने लगता है। दोस्तो, मैं पिछले लगभग 15 सालों से हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाता हूं, और बहुत से अपने मरीज़ों को भी ऐसा करने के लिए कहता रहता हूं। क्या आप भी मेरी बात मानेंगे ?
जो मैंने बात कही है कि शेव वगैरह तो स्वयं घर पर ही करने की आदत डाल लेनी चाहिए---दोस्तो, चिंता नहीं करें, इस से आप के हेयर-ड्रेसरों के धंधे पर कुछ असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि वे तो पहले से ही आज की युवा पीढ़ी के नए-नए शौक पूरा करने में मशगूल हैं-----हेयर ब्लीचिंग, हेयर पर्मिंग, हेयर सटरेटनिंग......पता नहीं क्या क्या आज के यह नौजवान करवाते रहते हैं, लेकिन सब से ज्यादा दुःख तो उस समय होता है जब कोई 18-20 साल का नौजवान अपना फेशियल करवा रहा होता है।
दोस्तो, समय सचमुच बहुत ही ज्यादा बदल गया है ...अपने बचपन के दिन याद करता हूं तो एक लड़की की बड़ी सी कुर्सी पर एक लकड़ी के फट्टे पर एक नाई की दुकान पर अपने आप को बैठे पाता हूं जिस की सारी दीवारें मायापुरी की पत्रिका में से धर्म भाजी की फोटों की कतरनों से भरी रहती थीं और उस नाई को एक चमड़े की बेल्ट पर अपना उस्तरा तेज़ करते देख कर मन कांप जाता था कि आज खैर नहीं......लेकिन उस बर्फी के लालच में जो पिता जी हर बार हजामत के बाद साथ वाली हलवाई की दुकान से खरीद कर खिलवाते थे,यह सब कुछ सहन करना ही पड़ता था, और खास कर के वह अजीबोगरीब मशीन जो इस तरह से चलती थी मानो घास काटने की मशीन हो। बीच बीच में उस मशीन के बीच जब बाल अटक जाते थे, तो बडा़ दर्द भी होता था, और एक-दो अच्छे बड़े कट्स कटिंग के दौरान हमेशा न लगें हों, ऐसा तो मुझे याद नहीं.
वैसे दोस्तो, अब लगता है कि वही टाइम अच्छा था, न किसी बीमारी का डर, न कोई किट साथ लेकर जाने का झंझट......लेकिन दोस्तो, अफसोस, अब न तो वह नाई रहा, न ही उस का साज़ो-सामान और न ही पिता जी। लेकिन आज आप से बतियाने के बहाने देखिए मैंने अपने बचपन को फिर से थोड़ा जी लिया....................आप भी कहीं कुछ ऐसी ही यादों में तो नहीं खो गए---चलिए,खो भी गए हैं तो अच्छा ही है, वैसे भी मैं अकसर हमेशा कहता रहता हूं ............
Enjoy the little things in life, someday you will look back and realise that those were indeed the big things !!!!!...........................................What do you say ??

Ok, friends, Good night!!

इन ट्रांस्फैटस से बच कर रहने में ही है समझदारी !!

समोसे, जलेबीया, अमरतियां, गर्मागर्म पकोड़े( भजिया), वड़ा-पाव वाले वड़े, आलू की टिक्कीयां,पूरी छोले, चने-भटूरे,नूडल्स........दोस्तों, लिस्ट बहुत लंबी है, कहीं पढ़ कर हमारे मुंह में इतना पानी भी न आ जाए कि अंतरजाल में बाढ़ ही आ जाए....वैसे भी लगता है कि इतनी मेहनत क्यों करें.....सीधी बात करते हैं कि हमारे यहां ये जो भी फ्राइड वस्तुएं बिकती हैं न, ये ट्रांसफैट्स से लैस होती हैं। वैसे मेरी तरह से आप को भी क्या नहीं लगता कि भई ये सब तो हम बरसों से अच्छी तरह खाते आ रहे हैं, इस के बारे में पता नहीं अब मीडिया को इतना ज्यादा लिखने की क्या सूझी है। जी हां, जब बीस-तीस साल की आयु में लोग दिल के रोगों के शिकार हो रहे हैं, मोटापा बेलगाम बढ़े जा रहा है, जिस की वजह से छोटी उम्र में ही लोग डायबिटिज़ जैसी बीमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं, तो मीडिया कैसे हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहे !!---- दोस्तो, इन ट्रांसफैट्स की वजह से हमारे शरीर में लो-डैंसिटि लाइपोप्रोटीन अथवा बुरे कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ जाता है, जिस के कारण यह हमारी रक्त की नाड़ियों में जमने लगता है और दिल की बीमारियों को खुला निमंत्रण दे देता है।
Transfats could raise levels of low -density lipoproteins or Bad cholesterol in the body and lead to clogged arteries or heart disease.

दोस्तो, कैनेडा का पश्चिमी शहर कैलगैरी कैनेडा का पहला शहर बन गया है जिस ने होटलों, रेस्तराओं में इस्तेमाल किए जाने वाले घी में ट्रांसफैट्स की मात्रा से संबंधित कड़े नियम बना दिए हैं और खाने में उपयोग होने वाले तेल में ट्रांसफैटस की मात्रा दो फीसदी से कम होने के नियम बना दिए हैं। उन्होंने तो साफ कह दिया है कि या तो अपने यहां इस्तेमाल होने वाले तेल बदल लो, नहीं तो फलां-फलां ताऱीख के बाद इन आदेशों की अवज्ञा करने वाले होटलों पर ताला लटका दिया जाएगा।
हमारे यहां तो बस नालेज अध-कचरी होने की वजह से लोगों को घुमा कर रखना कोई मुश्किल काम नहीं है----Thanks to the over-zealous advertising of these products.....और एक और फैशन सा चल पड़ा है, कुछ दिन पहले मैं चिप्स वगैरह के पैकेट पर यह भी बड़ा-बड़ा लिखा पढ़ रहा था.....contains NO Transfats!!.....यह सब ग्राहक को खुश करने के तरीके नहीं हैं तो और क्या हैं, इससे क्या ये पैकेट्स नुकसानदायक से स्वास्थ्यवर्धक बन जाएंगे....बिल्कुल नहीं। ये तो जंक फूड हैं और जंक ही रहेंगे----चाहे ट्रांसफैट्स जीरो हों या कुछ हो।


दोस्तो, अब हमारे यहां कि शिचुएशन देखिए--- कभी आप इन पकोड़े बनाने वालों, जलेबीयां बनाने वालों की कढ़ाही में सुबह से उबल रहे तेल की तरफ देखिए-----दोस्तो, ऐसा तेल हमारी सेहत को पूरी तरह बर्बाद करने में पूरा योगदान देता है......ट्रांसफैट्स की मात्रा के बारे में तो आप पूछो ही नहीं, उस के ऊपर तो यह रोना भी है कि उस तेल की क्वालिटी क्या है, उस में पता नहीं कौन कौन सी मिलावटें हुई हुईं हैं.........दोस्तो, हमारे यहां कि समस्याएं निःसंदेह बेहद जटिल हैं, क्या हम ऐसे किसी कानून की उम्मीद कर सकते हैं जो इन हलवाईयों, रेहड़ी वालों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तेल की क्वालिटी को नियंत्रित कर सके----------मुझे तो कोई उम्मीद लगती नहीं ,, बस दोस्तो उम्मीद है तो आप ही से --क्योंकि अगर हम so-called intellactuals किसी बात से कन्विंस हो जाते हैं और पहले हम स्वयं इन नुकसानदायक खाध्य पदार्थों से परहेज़ करने लगेंगे तो हम आस पास के लोगों को भी कंविंस कर पाएंगे। दोस्तो, समय वह आ गया कि हमें बाज़ार के तेलों से बनी इन वस्तुओं से दूरी बना कर के रखनी चाहिए...............हां, तीज-त्योहारों पर इस कसम को कभी कभी तोड़ने के बारे में आप क्या सोच रहे हैं ??-----Oh,sorry, यह भी मैं क्या लिख गया ----इन तीज-त्योहारों की जगह आप दीवाली-दशहरा सी पढ़े क्योंकि अगर हम तीज-त्योहारों की बात करेंगे तो भी मैं और आप आए दिन समोसे, टिक्के के डोने हाथ में लिए रखेंगे क्यों कि हमारा देश तो वैसे ही तीज-त्योहारों का देश है-----यहां तो हर रोज कोई न कोई पर्व होता है...........हर दिन दीवाली है ।

हेयर-ड्रेसर के पास जाने से पहले.....


दोस्तो, मैं अकसर सोचता हूं कि हम बड़ी बड़ी बातों की तरफ तो बहुत ध्यान देते हैं लेकिन कईं बार बहुत महत्वपूर्ण बातें जो देखने में बिल्कुल छोटी मालूम पड़ती हैं, उन को जाने-अनजाने में इग्नोर कर देते हैं। ऐसी ही एक बात मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं कि हम हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाने को कभी सीरियस्ली लेते नहीं है, पता नहीं झिझकते हैं या फिर भी....पता नहीं क्या।

दोस्तो, किट से मेरा भाव है कि हमें चाहिए अपनी एक सिज़र, एक-दो कंघीयां व एक रेज़र हर बार हेयर-ड्रेसर के पास अपना ही लेकर जाना चाहिए। दोस्तो, मैं कोई अनड्यू पैनिक क्रियेट करने की बिल्कुल कोशिश नहीं कर रहा हूं, मुझे तो यह पिछले 15 सालों से लग रहा है कि यह आज के समय की मांग है। दोस्तो, आप ज़रा सोचें कि हम सब लोग अपने घर में भी एक दूसरी की कंघी इस्तेमाल नहीं करते----घर में आया कोई मेहमान आप की कंघी इस्तेमाल कर ले,तो इमानदारी से जवाब दीजिए कोफ्त सी होने लगती है न। तो फिर, हेयर-ड्रेसर के यहां हज़ारों सिरों के ऊपर चल चुकी उस कंघी से हम परहेज़ करने की कोशिश क्यों नहीं करते। प्लीज़ सोचिए !! अब करते हैं, रेज़र की बात----मान लिया कि ब्लेड तो वह बदल लेता है, लेकिन दोस्तो अगर किसी कंटमर को कट लगा है , तो इस बात की भी संभावना रहती है कि थोड़ा-बहुत रेज़र( उस्तरे) पर भी लगा रह गया हो। बातें तो ,दोस्तो, छोटी छोटी हैं लेकिन जिस तरह से एड्स और हेपेटाइटिस बी जैसी बीमारियों ने आजकल अपना मुंह फाड़ रखा है तो एक ही बात ध्यान आती है----पूरी तरह से सावधानी रखना ही ठीक है। अब जब लोग शेव करवा रहे हैं या कटिंग करवा रहे हैं तो जरूरी नहीं हर कट हमें दिखे, कुछ कट ऐसे भी होते हैं जो हमें दिखते नहीं हैं..अर्थात् माइक्रोकट्स। जहां तक हो सके शेव तो स्वयं ही करने की आदत होनी चाहिए। कंघी, उस्तरे की बात कर रहे थे, तो पता नहीं किस को कौन सी स्किन इंफैक्शन है, क्या है , क्या नहीं है----ऐसे में एक यह सब चीज़े शेयर करना मुसीबत मोल लेने के बराबर नहीं तो और क्या है। तो, सीधी सी बात है कि अपनी किट लेकर ही हेयर-ड्रेसर के पास जाया जाए। आप को शायद एक-दो बाहर थोड़ा odd सा लगे, लेकिन फिर सब सामान्य सा लगने लगता है। दोस्तो, मैं पिछले लगभग 15 सालों से हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाता हूं, और बहुत से अपने मरीज़ों को भी ऐसा करने के लिए कहता रहता हूं। क्या आप भी मेरी बात मानेंगे ?
जो मैंने बात कही है कि शेव वगैरह तो स्वयं घर पर ही करने की आदत डाल लेनी चाहिए---दोस्तो, चिंता नहीं करें, इस से आप के हेयर-ड्रेसरों के धंधे पर कुछ असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि वे तो पहले से ही आज की युवा पीढ़ी के नए-नए शौक पूरा करने में मशगूल हैं-----हेयर ब्लीचिंग, हेयर पर्मिंग, हेयर सटरेटनिंग......पता नहीं क्या क्या आज के यह नौजवान करवाते रहते हैं, लेकिन सब से ज्यादा दुःख तो उस समय होता है जब कोई 18-20 साल का नौजवान अपना फेशियल करवा रहा होता है।
दोस्तो, समय सचमुच बहुत ही ज्यादा बदल गया है ...अपने बचपन के दिन याद करता हूं तो एक लड़की की बड़ी सी कुर्सी पर एक लकड़ी के फट्टे पर एक नाई की दुकान पर अपने आप को बैठे पाता हूं जिस की सारी दीवारें मायापुरी की पत्रिका में से धर्म भाजी की फोटों की कतरनों से भरी रहती थीं और उस नाई को एक चमड़े की बेल्ट पर अपना उस्तरा तेज़ करते देख कर मन कांप जाता था कि आज खैर नहीं......लेकिन उस बर्फी के लालच में जो पिता जी हर बार हजामत के बाद साथ वाली हलवाई की दुकान से खरीद कर खिलवाते थे,यह सब कुछ सहन करना ही पड़ता था, और खास कर के वह अजीबोगरीब मशीन जो इस तरह से चलती थी मानो घास काटने की मशीन हो। बीच बीच में उस मशीन के बीच जब बाल अटक जाते थे, तो बडा़ दर्द भी होता था, और एक-दो अच्छे बड़े कट्स कटिंग के दौरान हमेशा न लगें हों, ऐसा तो मुझे याद नहीं.
वैसे दोस्तो, अब लगता है कि वही टाइम अच्छा था, न किसी बीमारी का डर, न कोई किट साथ लेकर जाने का झंझट......लेकिन दोस्तो, अफसोस, अब न तो वह नाई रहा, न ही उस का साज़ो-सामान और न ही पिता जी। लेकिन आज आप से बतियाने के बहाने देखिए मैंने अपने बचपन को फिर से थोड़ा जी लिया....................आप भी कहीं कुछ ऐसी ही यादों में तो नहीं खो गए---चलिए,खो भी गए हैं तो अच्छा ही है, वैसे भी मैं अकसर हमेशा कहता रहता हूं ............
Enjoy the little things in life, someday you will look back and realise that those were indeed the big things !!!!!...........................................What do you say ??

Ok, friends, Good night!!

2 comments:

दादी का दवाखाना said...
सही है
शास्त्री जे सी फिलिप् said...
जानकारी से भरपूर इस लेख के लिये आभार. इसी तरह जन जन का मार्गदर्शन करते रहें.

हर पेराग्राफ के बीच एक खाली पंक्ति जरूर डालें. लेख अधिक पठनीय हो जायगा.

इन ट्रांस्फैटस से बच कर रहने में ही है समझदारी !!


समोसे, जलेबीया, अमरतियां, गर्मागर्म पकोड़े( भजिया), वड़ा-पाव वाले वड़े, आलू की टिक्कीयां,पूरी छोले, चने-भटूरे,नूडल्स........दोस्तों, लिस्ट बहुत लंबी है, कहीं पढ़ कर हमारे मुंह में इतना पानी भी न आ जाए कि अंतरजाल में बाढ़ ही आ जाए....वैसे भी लगता है कि इतनी मेहनत क्यों करें.....सीधी बात करते हैं कि हमारे यहां ये जो भी फ्राइड वस्तुएं बिकती हैं न, ये ट्रांसफैट्स से लैस होती हैं। वैसे मेरी तरह से आप को भी क्या नहीं लगता कि भई ये सब तो हम बरसों से अच्छी तरह खाते आ रहे हैं, इस के बारे में पता नहीं अब मीडिया को इतना ज्यादा लिखने की क्या सूझी है। जी हां, जब बीस-तीस साल की आयु में लोग दिल के रोगों के शिकार हो रहे हैं, मोटापा बेलगाम बढ़े जा रहा है, जिस की वजह से छोटी उम्र में ही लोग डायबिटिज़ जैसी बीमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं, तो मीडिया कैसे हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहे !!---- दोस्तो, इन ट्रांसफैट्स की वजह से हमारे शरीर में लो-डैंसिटि लाइपोप्रोटीन अथवा बुरे कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ जाता है, जिस के कारण यह हमारी रक्त की नाड़ियों में जमने लगता है और दिल की बीमारियों को खुला निमंत्रण दे देता है।
Transfats could raise levels of low -density lipoproteins or Bad cholesterol in the body and lead to clogged arteries or heart disease.

दोस्तो, कैनेडा का पश्चिमी शहर कैलगैरी कैनेडा का पहला शहर बन गया है जिस ने होटलों, रेस्तराओं में इस्तेमाल किए जाने वाले घी में ट्रांसफैट्स की मात्रा से संबंधित कड़े नियम बना दिए हैं और खाने में उपयोग होने वाले तेल में ट्रांसफैटस की मात्रा दो फीसदी से कम होने के नियम बना दिए हैं। उन्होंने तो साफ कह दिया है कि या तो अपने यहां इस्तेमाल होने वाले तेल बदल लो, नहीं तो फलां-फलां ताऱीख के बाद इन आदेशों की अवज्ञा करने वाले होटलों पर ताला लटका दिया जाएगा।
हमारे यहां तो बस नालेज अध-कचरी होने की वजह से लोगों को घुमा कर रखना कोई मुश्किल काम नहीं है----Thanks to the over-zealous advertising of these products.....और एक और फैशन सा चल पड़ा है, कुछ दिन पहले मैं चिप्स वगैरह के पैकेट पर यह भी बड़ा-बड़ा लिखा पढ़ रहा था.....contains NO Transfats!!.....यह सब ग्राहक को खुश करने के तरीके नहीं हैं तो और क्या हैं, इससे क्या ये पैकेट्स नुकसानदायक से स्वास्थ्यवर्धक बन जाएंगे....बिल्कुल नहीं। ये तो जंक फूड हैं और जंक ही रहेंगे----चाहे ट्रांसफैट्स जीरो हों या कुछ हो।


दोस्तो, अब हमारे यहां कि शिचुएशन देखिए--- कभी आप इन पकोड़े बनाने वालों, जलेबीयां बनाने वालों की कढ़ाही में सुबह से उबल रहे तेल की तरफ देखिए-----दोस्तो, ऐसा तेल हमारी सेहत को पूरी तरह बर्बाद करने में पूरा योगदान देता है......ट्रांसफैट्स की मात्रा के बारे में तो आप पूछो ही नहीं, उस के ऊपर तो यह रोना भी है कि उस तेल की क्वालिटी क्या है, उस में पता नहीं कौन कौन सी मिलावटें हुई हुईं हैं.........दोस्तो, हमारे यहां कि समस्याएं निःसंदेह बेहद जटिल हैं, क्या हम ऐसे किसी कानून की उम्मीद कर सकते हैं जो इन हलवाईयों, रेहड़ी वालों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तेल की क्वालिटी को नियंत्रित कर सके----------मुझे तो कोई उम्मीद लगती नहीं ,, बस दोस्तो उम्मीद है तो आप ही से --क्योंकि अगर हम so-called intellactuals किसी बात से कन्विंस हो जाते हैं और पहले हम स्वयं इन नुकसानदायक खाध्य पदार्थों से परहेज़ करने लगेंगे तो हम आस पास के लोगों को भी कंविंस कर पाएंगे। दोस्तो, समय वह आ गया कि हमें बाज़ार के तेलों से बनी इन वस्तुओं से दूरी बना कर के रखनी चाहिए...............हां, तीज-त्योहारों पर इस कसम को कभी कभी तोड़ने के बारे में आप क्या सोच रहे हैं ??-----Oh,sorry, यह भी मैं क्या लिख गया ----इन तीज-त्योहारों की जगह आप दीवाली-दशहरा सी पढ़े क्योंकि अगर हम तीज-त्योहारों की बात करेंगे तो भी मैं और आप आए दिन समोसे, टिक्के के डोने हाथ में लिए रखेंगे क्यों कि हमारा देश तो वैसे ही तीज-त्योहारों का देश है-----यहां तो हर रोज कोई न कोई पर्व होता है...........हर दिन दीवाली है ।

2 comments:

शास्त्री जे सी फिलिप् said...
इस तरह के फेट से बचने के लिये क्या करना होगा यह भी बता दें !
PD said...
मुझे फिरसे अपना होस्टल याद आ गया.. मेरे मेस का खाना बहुत स्वादिष्ट तो नहीं पर उसे खाकर आज तक किसी को जौंडिस हुआ हो ऐसा मैंने नहीं सुना है..
वहां एक दिन पापड़ बहुत ही खराब जले हुये तेल में तला हुआ था.. मैंने उसे तेल बदल कर पापड़ तलने को कहा.. उसने देखा की कहीं ये लड़का हंगामा ना कर दे सो उसने मुझे अलग से अच्छा वाला पापड़ लाकर दिया.. मैंने कहा की बस मुझे नहीं पूरा पापड़ चेंज करो.. थोड़ी देर बाद मैंने देखा की वही अभी तक रखा हुआ है.. बस मैंने पापड़ की थाली से एक के बाद एक पापड़ फ़ेंकना चालू कर दिया..
तब मेरे होस्टल इंचार्ज आये और गुस्से से पूछा की ऐसा क्यों किया? मेरा सीधा सा जवाब था की अगर आप अपने बेटे को ये पापड़ खिला सकते हैं तो मैं अपनी गलती मान लूंगा और फाईन भी भड़ दूंगा.. नहीं तो आप जहां भी मेरा कंप्लेन करेंगे वहां तक मैं लड़ने को तैयार हूं.. यहां तक की कोर्ट में भी..
उनको शायद मुझसे पहले किसी ने ये जवाब नहीं दिया था, सो पहले अकचकाये फिर पापड़ बदलने का आदेश देकर चुपचाप चले गये.. :)