मंगलवार, 30 जून 2026

सत्यकथाएं, मनोहर कहानियां तो बहुत पीछे रह गईं ....

आज से ५०-६० साल पहले कुछ मासिक पत्रिकाएं थीं जैसे कि सत्यकथा, मनोहर कहानियां, सच्ची दुनिया….१९७० में हम लोग स्कूल में थे और किताबों-पत्रिकाओं की दुकानों पर ये भी डिस्पले की होती थीं…


इन को पढ़ना ज़्यादा अच्छा नहीं माना जाता था …लेकिन दसवीं या उस के बाद की कक्षाओं में पहुंचते पहुंचते इन पत्रिकाओं की एक-आध कहानी पढ़ ही लेते थे और सारी की सारी पत्रिका के पन्ने तो उलटा-पलटा लेते ही थे …


इस तरह की पत्रिकाओं को पढ़ने का हमारे यहां किसी को भी कोई शौक न था …तो फिर यह कैसे हमारे हाथों तक पहुंचती थी….


दरअसल मेरे बड़े मामा को इस तरह की जासूसी और जुर्म की पत्रिकाओं पढ़ने का बड़ा चस्का था….जब भी वह हमारे यहां आते - यही कोई साल में एक दो बार ..दो तीन दिन के लिए …तो मैं अकसर उन को लेटे-लेटे इसी तरह की किताबें पढ़ता ही देखता …

अभी लिखते लिखते ख्याल आ रहा है कि मेरी मां उन को कईं बार टोका भी करती थीं …क्या राम (उन का नाम), तुम यह सब क्या पढ़ते रहते हो, ऐसा क्या है इन पत्रिकाओं में …


खैर, मामा की आदत जैसी थी वैसी ही बरकरार रही …लेकिन हां, वे इंगलिश की कारवां और रीडर-डाइजेस्ट और इंडिया टूडे जैसी पत्रिकाएं भी खूब पढ़ते थे …

मुझे कभी यह सत्यकथा, मनोहर कहानियां….सच्ची दुनिया…ये सब पढ़ कर अच्छा नहीं लगा…प्रेम-प्रसंग में हत्या, जुर्म या लूट-पाट यही कुछ होता था …और यह भी कहा जाता था कि ये सब सच्ची घटनाओं पर आधारित हुआ करती थीं…ज़रूर होंगी, क्यों कि उन के अंदर जुर्म की विचलित करने वाली तस्वीरें भी छपी होती थीं…


लेकिन आज कल जिस तरह की खबरें रोज़ाना देखने-पढ़ने को मिल रही हैं, उस से यही लगता है कि इस दौर में तो वे पत्रिकाएं भी बहुत पीछे रह गई हैं…हां, अभी सत्यकथा तो मिलती है, लेकिन बहुत कम …अब जब रोज़ाना क्राइम का कंटैंट बाज़ार में धड़ल्ले से आ रहा है, ऐसे में कहां तक वे पत्रिकाएं भी अपने को इतना अपडेट कर पाएं….आज कल तो क्राइम-तक का रोज़ाना एक आधे घंटे का बुलेटिन आने लगा है …और एक नहीं, कईं यू-ट्यूब चैनल हैं ऐसे जो सुबह से शाम तक जुर्म के सभी ऐंगल दिखा दिखा कर सिर दुखा कर दम लेते हैं…। 


सिया, तू काहे की सिया…


सिया काण्ड ने तो देश की नींद उड़ा दी है …कितने दिन हो गए सिया के शातिर दिमाग का ही ख्याल बना रहता है हर वक्त। एक २० साल की लड़की इतनी क्रिमिनल-माईंडेड भी हो सकती है। इस केस से जुड़ी एक एक बात हिला देने वाली है। पूरी एक ओटीटी की सीरीज़ जैसी….उस से भी डरावनी। 


जाने वाला गया …अब मोमबती पकड़ के कैंडिल मार्च करें या कुछ और …वह नहीं आने वाला… तीन परिवारों की ज़िंदगी बिना किसी कसूर के बरबाद हो गई …ऊपर से मीडिया वाले उन को परेशान कर रहे हैं, सो अलग। 


मैं तो वैसे भी ओटीटी पर सीरीज़ बहुत कम.. न के बराबर ही देखता हूं। सिर दुखने लगता है ..वही घिसी पिटी गालियां, एडल्ट कंटैंट और मार-धाड़, चीर-फाड़ …कौन देखे यह सब….वैसे भी जब रियल लाईफ में सिया-चेतन जैसे किरदार मौजूद हैं, आप को सब कुछ लाइव बताने के लिए …तो ओटीटी के किस्से-कहानियों में रखा ही क्या है…


लोकल ट्रेन में कत्ल ….

कौन सा ओटीटी प्लेटफार्म हमें ऐसा कुछ लाईव दिखा सकता है …जो बंबई की लोकल ट्रेन के फर्स्ट क्लास कोच में भरे लोगों ने देखा कि एक आदमी ने एक २२ साल के युवक को चाकू से मार डाला…तमाशबीन देखते रह गए …व्हीडियो बनाते रहे ….पकड़ा गया, लेकिन उस से क्या, जाने वाला गया …जो वॉयरल हुई व्हीडियो ने फौरन दुनिया के कोने कोने तक पहुंचा दिया, क्या यह काम सत्यकथाएं कर सकती हैं….


खरबूजा खाने से मौत …

एक परिवार के चार मैंबर कुछ दिन पहले तरबूज़ खा के मर गए…उस में चूहेमार दवा की मिलावट पाई गई …अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है कि वह कैसे उस तरबूज़ तक पहुंची …


सात साल के लड़के की ओक्सीटोसिन इंजेक्शन लगने से मौत …

किसी रंजिश के चलते एक आदमी ने पड़ोसी के सात साल के बच्चे में जानवरों को लगने वाला ओक्सीटोसिन इंजेक्शन घोंप दिया ….वह मर गया …यह कल की खबर थी …मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था …लेकिन फिर जब मैंने गूगल पर जा कर थोड़ी रिसर्च की तो कुछ कुछ समझ में आया कि उस की मौत क्यों हुई होगी….। 

ये ओक्सीटोसिन के टीके पशुओं का दूध निकालने से पहले देते हैं …यह सब तो हम लोग पचास पचपन बरस पहले भी अपनी आंखों से देखते रहे हैं …किस तरह से गाय या भैंस को दूध वाले का बेटा कुक्कू झट से एक पहले से भरा हुआ टीका ठोंक देता था…जी हां, बिल्कुल सही लिखा है, ठोक देता था, क्योंकि टीका लगाते तो मेडीकल स्टाफ हैं, दूसरे तो ठोकते ही हैं…अंजाम कुछ भी हो….कोई परवाह नहीं। 


मुहर्रम के जूलूस में जहर वाले कैप्सूल फैंकने की साजिश …

दो दिन पहले जुलूस में एक आदमी ने पब्लिक में दर्द-निवारक कैप्सूल बांटने चाहे ताकि लोगों का शारीरिक दर्द कम हो …और उन की इम्यूनिटी बढ जाए। ५० किलो ज़िंक-सल्फाईड मंगवाता है आनलाईन और ३० हज़ार खाली कैप्सूल …फिर उन को भरने काम करता रहा, एक सस्ती सी लॉज में किराए पर एक कमरा ले कर रह रहा था। पेपर में लिखा था कि उस का टॉरगेट था ३० हज़ार लोगों को निपटा देना…लेकिन खबर ही पागल पन जैसी लगी थी …चूहेमार दवाई ठीक है, ज़हर है, लेकिन चूहों की तरह ३० हज़ार लोग वहीं के वहीं थोड़े न ढेर हो जाएंगे…कुछ लक्षण होंगे ….कुछ खाएंगे, कुछ नहीं खाएंगे…अभी उसने थोड़े ही केप्सूल बांटे थे कि पुलिस के हत्थे चढ़ गया….

आज के पेपर में यही आया है कि उस का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है….खिसका हुआ है हर तरह से…ऐसा काम इसी तरह का ही इंसान कर सकता है ….। 


देशी घी की मिलावट ….

अभी अभी हमारे एक सीनियर डाक्टर ने एक व्हीडियो शेयर की है जिस में बताया गया है कि देशी घी के नाम पर इतनी मिलावट, इतनी धोखेबाजी हो रही है, पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल हो रहा है ….टैलो नाम आप को याद होगा, यह कोई नईं बात नहीं है….जहां तक मुझे ख्याल है ये सब धंधे हम कम से कम ३०-४० साल से तो देखते ही आ रहे हैं…..पशुओं की चर्बी को देशी घी में मिलावट के लिए इस्तेमाल करना या पशुओं की चर्बी से तैयार किया घी और तेल होटलों, रेस्टरां में इस्तेमाल होना ….अब ये खबरें पुरानी हो गई हैं …सब जानते हैं …लेेकिन हम जान कर अनजान बनने का मज़ा ले रहे हैं ..यही सोच कर कि होता होगी मिलावट कहीं और, हमारे आस पास तो नहीं है ….चलिए, खुशफ़हमी का आनंद लीजिए….

लेकिन एक बात जो आज के संदर्भ में बहुत ज़रुरी है …वह लिख कर इस पोस्ट को बंद करता हूं …कुछ महीने पहले मैं अपने किसी मित्र के पास बैठा हुआ था …अचानक फोन आया …जैसे डिलीवरी वालों का आता है …पता चला कि राजस्थान से उन का शुद्ध देशी घी आ रहा है ….बताने लगे कि ऑन-लाईन एक व्हीडियो देखी थी कि ये लोग शुद्ध घी बेचते हैं ….और इसीलिए उन्होंने भी एक किलो आर्डर कर दिया ….दो हज़ार रुपए में एक किलो था….

वह बंदा एक किलो देसी घी की बोतल दे गया ….फिर वह दोस्त उस को हर तरफ़ से देखने लगा …पूछने लगा कि क्या यह आप को सही लग रहा है …

मैं हंसने लगा …

वह कहने लगा कि इस बार तो मंगवा लिया है ..आगे से ऑनलाईन पेमेंट करने की जल्दी नहीं करूंगा…

पंगा यह है कि आज कल यू-ट्यूब पर अनेकों व्हीडियोज़ की भरमार है …जो लोग देशी घी बनाते दिखते हैं …हर कोई कह रहा है उस का शुद्ध नहीं …शुद्धतम् है….लोग कंफ्यूज़ हैं….बडे़ बड़े ब्रांडों के देशी घी का हाल आए दिन मीडिया में हम देख रहे हैं….किसे कैद हुई, किसे फांसी। सब कुछ चल रहा है ….मैंने तो जहां भी इस तरह के देशी घी के किलो-दो किलो के जार देखे हैं, सब यही कहते हैं कि यह हमारे जानने वाले ने भेजा है, यह नज़दीकी रिश्तेदार ने भेजा है ….


मेरी एक ख्वाहिश है …कभी इन सब स्टार्ट-अप्स को एक टास्क दिया जाए …१५००-१६०० का जितने का यह एक किलो देशी घी बेचते हैं ….इन को इतने पैसे का भैंस का शुद्ध दूध दिया जाए…और अपने सामने कहा जाए कि करो इस से एक किलो देशी घी तैयार ….अपने आप दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा….


आज के रियल वर्ल्ड में सत्यकथाएं, मनोहर कहानियां तो क्या क्राईम नावल, मर्डर मिस्ट्री वाली फिल्में, क्राईम-शो ....सब पीछे हैं, जितने खुराफाती हम हो चुके है ....जितने मक्कार, शातिर, चालबाज़, फांदेबाज़, फ्रॉड.....हम कुछ भी कर सकते हैं ...पैसे, सैक्स, ईश्क, लोभ, लालच के चक्कर में ......बच के रहिए...।

पहले कईं बार अखबार में पढ़ लेते थे जब कोई बड़ा क्राईम होता था तो फलां फलां अभियुक्त पकड़ा गया ....और उसने कबूला कि उस को यह जुर्म करने की प्रेरणा या आईडिया सत्यकथा या मनोहर कहानीयों में प्रकाशित इस कहानी से आया ....अब तो भरमार है, सोशल मीडिया है, ओटीटी है, नेट है, सब कुछ है ...कुछ भी सर्च करने की बस थोड़ी तकलीफ है.....


सोमवार, 29 जून 2026

नाई, हेयर ड्रेसर, हेयर सैलून और नौआ...

कल इतवार का लगभग आधा दिन मेरा एक हेयर-ड्रेसर की दुकान पर बरबाद हो गया…मुझे तीन-चार हफ्तों में एक बार बाल ट्रिम करवाने ही पड़ते हैं…वरना मेरा सिर दर्द होने लगता है …इसलिए मुझे बालों की लंबाई का ख्याल करना ही पड़ता है ….

बाल कटवाने के मेरे कुछ कायदे-कानून हैं…एक तो यह है कि मैं जिस शहर में रहने लगता हूं…चाहे वहां दस साल रहूं या पांच साल…हेयर-ड्रेसर कभी नहीं बदलता और उस दुकान में जो कारीगर होता है उसे भी नहीं बदलता…अगर कभी जाऊं और वह न दिखे, तो लौट आता हूं ..वरना, हर बार एक एक बात समझानी नये कारीगर को बहुत मुश्किल काम होता है …। अभी भी जहां पर मैं बाल कटवाने जाता हूं…(हमारे बचपन के दिनों में कहते थे कि हजामत करवा लो अब, बाल इतने बढ़ गए हैं)...वह दुकान मेेरे घर से लगभग आधा घंटे की दूरी पर है …४-५ किलोमीटर की दूरी पर है। 


ये जो मैंने इतनी तरह के नाई ऊपर लिख दिए हैं, ज़रा इन के बारे में बात करें…


नाई…यह आज से ५०-६० बरस पहले हुआ करते थे …हैं तो अब भी हैं, लेकिन अब हम लोग इन के खोखों से बाहर हो गये हैं…बचपन में नाई के पास जाने का मतलब, बालों पर मशीन चलने से होने वाला दर्द, उस्तरे के एक दो कट, और ऊपर से फिटकड़ी की रगड़ाई से जलन ….लेकिन बाहर आते ही जैसे ही पिता जी एक छोटे से लिफाफे में (यही कोई ५०-१०० ग्राम होती होगी)...बर्फी दिला देते, मैं सब कुछ भूल कर उन की साईकिल के अगले डंडे पर बैठ कर खुशी से खिला हुआ घर लौट आता…। नाई की दुकान की एक खासियत थी …एक तो उसने उस्तरा तेज़ करने के लिए एक चमड़े की बेल्ट टंगी होती थी, एक पुरानी सी मशीन जो बाल नोंचते नोंचते बीच बीच में अटक जाती थी और दीवारों पर अखबारों से काट कर आटे की लई से चिपकी हेमा मालिनी, धर्मेंद्र, राजेेश खन्ना, मुमताज की अलग अलग मुद्राओं में फोटो …और लकड़े की बैंच पर पड़ी एक दो मायापुरी ….और हां, इन दुकानों पर लोग कमीज़ उतार कर हाथ ऊपर कर के बगलें साफ़ करवाने से भी गुरेज नहीं करते थे …देख कर ही बड़ा अजीब सा लगता था…


हेयर-ड्रैसर …कॉलेज तक पहुंचे तो हेयर-ड्रेसर …यह थोड़ी साफ सुथरी दुकानें थीं …कांच वांच के दरवाज़े लगे हुए ..शायद कूलर वूलर का भी कुछ जुगाड़ होता था …और अंदर टीवी पर कुछ न कुछ चल रहा होता …अभी तक अधिकतर इन पर ही जा कर बाल कटवाए हैं…पैसे कम लगते हैं, इसलिए नहीं …बस, इसलिए क्योंकि मेरा तजुर्बा ऐसा रहा है कि इन में काम करने वाले कारीगर अपने काम में बहुत माहिर होते हैं…सारा वर्क-लोड का गणित है …।

आज से तीस साल पहले जब यह बगलें वगलें कटवाने का काम भी हेयर-ड्रैसर के पास ही होते देखा तो क्या करें, बस, एक आईडिया आया कि तब से हमेशा हेयर-ड्रेसर के पास अपनी ही किट ले कर जाता हूं ..कुछ ज़्यादा नहीं, एक महंगी से डेढ़-दो हज़ार की कैंची है, दो कंघे हैं और एक ट्रिमर है …पहले ट्रिमर नहीं था तो अपना उस्तरा अलग से ले कर जाना पड़ता था…। और हां, हेयर-ड्रैसर की दुकानों में भी ए.सी लग गये थे …लेकिन चलाते उसे सोच-समझ कर …बेतहाशा कभी नहीं….


हेयर-सैलून …या यूनिसेक्स हेयर स्टूडियो ….ये बहुत हाई-फाई हेयर-केयर सेंटर….पैसे तो बहुत ज़्यादा लगते ही हैं, उस की भी कोई बात नहीं …लेकिन इन का माहौल ऐसा होता है कि कस्टमर किसी कारीगर को कुछ बता नहीं सकता…और जाते ही अकसर वे बाल धोने लगते हैं…बस, मैं एक बार बेटे के साथ गया था इस तरह की एक जगह में …और दोबारा वहां न जाने की ठान ली…। कहने का मतलब यह है कि ये ठिकाने अपने सिलेबस में नहीं हैं। 


नौआ….अच्छा, आप सोच रहे होंगे की नाई, हेयर ड्रेसर, हेयर सैलून तो चलो देखा है, यह नौआ क्या हुआ। इस के बारे में मेरी जितनी जानकारी है, उसे लिख देता हूं। स्कूल में पढ़ते थे तो कॉलोनी में एक बंदा था, जो रेल महकमे में काम करता था और अपनी आमदनी को थोड़ा बढ़ाने के लिए साईकिल के कैरियर पर एक छोटी सी लोहे की ट्रंकी रख कर बाल काटने जाता था …मैंने कईं बार देखा उस को ..मुझे नहीं पता उन की कोई दुकान थी, या किसी के बुलाने पर जाता था …। लेेकिन मुझे इतना अच्छे से याद है कि जो उन का बड़ा बेटा था…उस को जब कॉलोनी के लड़के नौआ-नौआ के नाम से पुकारते तो वह आग-बबूला हो जाता….पहले तो गालियों की बौछार, उस से मामला अंडर-कंट्रोल हुआ तो ठीक, वरना वह तमाचे जड़ने लगता था ….पता नहीं उसे क्यों इतना बुरा लगता था …मुझे यह समझ न तब ही आया ..और न ही आज आया…नाई को नौआ कहते ही हैं…उसमें कौन सी गलत बात है …हां, वह चिढ़ता था, तो लोग उसे बार बार नौआ नौआ कहा करते थे…। 


एक ऐसे ही होम-विज़िट करने वाले नाई से हमारा भी वास्ता पड़ा ….


यह आज से बीस-बाईस साल पहले की बात है…हम लोग हरियाणा के यमुनानगर में पहुंचे ही थे कि वहां पर एक मरीज़ आया मेरे पास….कहने लगा कि बाल काटने का काम भी करता हूं …मैं आप के यहां आऊंगा..मैंने हां कर दी। 


वह अगले दिन अपनी स्टील की ट्रंकी लेकर पहुंच गया…जिसमें उस की मशीन थी …और दूसरे औज़ार भी …तब तक मैं अपनी किट से बाल कटवाने लगा था…मैंने उसे साफ बता दिया कि मेरे बालों में और वह हाथ से चलने वाली मशीन नहीं लगानी….(जो हम लोग बचपन में देखा करते थे)...सर्दी के दिन थे…छत पर हम बैठ गए ..हम सब ..मैं और बेटे …लेकिन उसने ऐसे बाल काटे जैसे घास काटते हैं….बेटों ने तो तौबा कर ली उसी दिन फिर कभी उस की पकड़ में न आने की …मैंने एक मौका और दिया…सर्दी के दिनों में छत के ऊपर चारपाई मैं बैठा और वह भी वहीं पर कहीं …इतनी फुर्ती और अपने काम की इतनी तारीफ़ कि मैं फलां फलां अफसर की कटिंग करता हूं और फलां फलां बड़ा अफसर तो दिल्ली जा कर भी मुझे ही बुलवाता है …। खैर, मैंने भी दो बार उस से कटवाने के बाद तौबा कर ली…। दरअसल, यह नाई नहीं नौआ था …। 




फुटपाथ पर भी नाई ….बंबई में जो काम लोग हज़ारों में करवाते हैं, उसे दस-बीस में भी करवाने के सभी जुगाड़ हैं…जब मेैं फुटपाथ पर लोगों को दाढ़ी बनवाते या बाल कटवाते हुए देखता हूं …तो उन कारीगरों की मन ही मन तारीफ़ किए बिना रह पाता। मेरी नज़र में ये अपने काम में सब से ज़्यादा माहिर होते हैं …क्योंकि जो कुछ हो रहा है, लाइव हो रहा है, फुटपाथ पर बैठ कर दाढ़ी बनवाना और दाढ़ी बनाना, बाल काटना अपने आप में एक फ़न है ….मैं अकसर इन को देख कर बहुत हैरान होता हूं….हैरान से भी ज़्यादा, इन के टेलेंट से बहुत ज़्यादा प्रभावित होता हूं …। 


कल बाल कटवाने वाली बात तो कहीं पीछे छूट गई …..


कस बाल कटवाने वाली बात तो कहीं गुम ही हो गई…उस के बारे में लिख कर बंद करूं इस पोस्ट को …

हां, तो मैं सुबह दस बजे के करीब अपने हेयर-ड्रेसर के पास पहुंच गया..लेकिन तीनों कुर्सियों पर लोग बैठे हुए थे …

अकसर मुझे १०-१५ मिनट से ज़्यादा का इंतज़ार नहीं करना पड़ता …लेकिन कल तो काम लंबे ही चल रहे थे ….


एक 30-35 का जवान लड़का किसी माटुंगा वर्कशाप में काम करता है (वह कारीगर को बता रहा था)...पहले उसने शेव करवाई, फिर बहुत फेशियल…और फिर स्टीमिंग …..और फिर पता नहीं फेशियल मसाज ….एक डेढ़ घंटे की पूरी स्कीम थी ….। उस के चेहरे की मालिश के लिए एक वॉयब्रेटिंग मशीन का इस्तेमाल किया गया…वैसे तो वह जिम में वर्क-आउट करने वाला लगता था …पता नहीं अलग से उसे अपने चेहरे का इतना वर्क-आउट करवाने की क्या ज़रुरत आन पड़ी। 


दूसरी कुर्सी पर….एक बुर्जु्ग थे …यही कोई ६०-६५ की उम्र थी….पहले उन्होंने अपनी मूछों पर काला कलर लगवाया….बड़ी बारीकी से काम किया गया उन का ….फिर उन को छोड़ दिया गया….कुछ वक्त बाद उन की मूछों पर शैंपू किया गया….फिर उन की शेव हुई और फिर चेहरे की मसाज हुई।


वक्त ज्यादा लग रहा था, मैंने अपने बैग से एक मैगज़ीन निकाली …और पढ़ने लगा ..मोबाईल पर गाने सुनने लगा….दुकान मालिक कहने लगा कि आवाज़ थोड़ी बढ़ा दें, आप जो गाने सुनते हैं, हमें भी बहुत पसंद हैं…

हां, तीसरी कुर्सी पर जो अधेड़ उम्र (५०-५५ बरस के) सज्जन बैठे थे उन की शेविंग होनी थी …अच्छे से शेविंग हुई ….और फिर कारीगर ने पूछा …और बताओ?

कोई जवाब नहीं आया …तो कारीगर ने कहा …हां, बताओ फेशियल या मसाज भी ..

हां, हा, करो दोनों करो …जवाब मिला…

बस, फिर उस बंदे का काम ऐसे शुरु हुआ कि खत्म होने को ही नहीं आ रहा था …

पहले उस के चेहरे की फेशियल की गई …वही पैक लगाया गया, फिर स्टीमिंग …फिर कारीगर ने हाथ में एक मशीन पहन ली और उस से उन के चेहरे की रगड़ाई की …

और उस के बाद उस के सिर की चंपी की गई ..उसी मशीन से ..

फिर उस बंदे की पीठ पर मसाज की गई …एक गोल से दिखने वाले मसाजर के साथ ..जो भी बहुत ज़्यादा वॉयब्रेट कर रहा था ….
इतना होने के बाद …उस ने खड़े होकर अपने बाजू ऊपर उठा दिए …कि करो, बगलें भी साफ़ करो ….

सच में …यह बंदा तो पूरा चमक चुका था…पूरा कायाकल्प ….


अब मेरी बारी थी …१०-१२ मिनट में मेरे बाल काटे गए ….जैसे वह हर बार पूछता है कि और कुछ। मैंने कहा ..नहीं, यार, कुछ नहीं और। दरअसल कुछ साल पहले मैंने भी देखा देखी एक बार सिर की मसाज किसी हेयर-ड्रैसर की दुकान से करवाई थी …एक मशीन वह सिर पर फिराता रहा ..दस-पंद्रह मिनट….बाद में मेरी ऐसी आफ़त आई कि मेरा तो सिर ही घूमने लगा ..पूरा दिन चक्कर आते रहे ….बस, उस दिन से तौबा कर ली..। 


ये तो नाई, नौआ से जुड़ी अपनी यादों बातों का एक ट्रेलर ही है, कभी लिखने लगें तो दस-बीस कागज़ काले कर दें….चलिए, अभी के लिए इतना ही ….। 


और हां, अभी मैं बाहर आ ही रहा था कि एक बुजुर्ग आए ….करवाने तो दाढ़ी ही आए थे …लेकिन पता नहीं कैसे एक नये कारीगर ने पूछ लिया…कि बाल भी कटवाएंगे। उन्होंने कहा ..जब हैं ही नहीं, तो काटोगे क्या। मेरे वाला कारीगर हंसने लगा …मैंने पूछा तो कहने लगा कि अभी पिछले हफते ही तो कटवा के गए हैं, इस उम्र में इतने बाल भी नहीं है उनके और इतनी जल्दी बढ़ते भी नहीं है, इसलिए कह रहे हैं कि जब हैं ही नहीं, को काटोगे क्या।😂 



रविवार, 21 जून 2026

कर्नाटक टिफिन रूम भी बंद हुआ ...

कुछ महीने पहले मेरे बेटे ने दो चार बार कहा होगा कि घर के पास ही एक अच्छा साउथ इंडियन फूड सेंटर खुला है..बढ़िया है, अगर कभी इच्छा हो तो चले जाओ करो…लेकिन जैसे आज कल के बच्चे, वैसे ही मां-बाप….जैसे बच्चे हमारी बात को आई-गई कर देते हैं, वैसे ही मां-बाप भी …मैंने भी कुछ खास ध्यान नहीं दिया …यही सोच कर कि आज कल की खाने-पीने की अलग पसंद हैं, हम जैसे पुराने लोगों की अलग…


मैंं न कभी उधर गया और न ही इस के बारे में पूछने की ज़रूरत ही समझी …क्योंकि मेरी यहां वहां ऐसे ही कुछ भी ट्राई करने में कोई दिलचस्पी नहीं रही कभी भी। 


खैर, कुछ ऐसा हुआ एक दिन कि हम सभी से जा रहे थे और वहां पर खाने के लिए चले गए…पहली बार मैंने उस जगह को देखा था ..नाम था …कर्नाटक टिफिन रुम…वहां पर साउथ इंडियन फूड मिल रहा था ..मैंने डोसा खाया…






मैंने डोसा खाया और इतना पसंद आया कि मैंने उस जैसा डोसा घर के बाहर अपनी अभी तक की ज़िंदगी में कभी नहीं खाया था …मैंने जब यह बात बेटे को बताई तो उसने कहा कि मैं तो आप को कह ही रहा था …(घर के बाहर वाली बात इस लिए लिखी कि घर का डोसा तो हर घर में दुनिया का सब से बढ़िया होता ही है…इस में कोई दो राय नहीं)...जैसे मां का बनाया घर का खाना दुनिया का सब से लज़ीज खाना होता है …मांएं जैसे एक बैंच-मार्क सैट कर के चली जाती हैं और फिर ज़िंदगी भर हर खाने-पीने की चीज़ की मां के हाथ से बनी दाल-सब्जी से तुलना करते रहते हैं….और यह पक्की बात है ..अच्छा, लिखते लिखते याद आया कि जैसे हम लोग अपनी मां का खाना याद करते हैं, हमारी मांएं अपनी ज़िंदगी में अपनी माओं (नानी) के खाने की तारीफ़ें करती नहीं थकतीं…जैसे मेरी मां अकसर कहती थी कि नानी के हाथ के करेले, राजमाह, बैंगन का भर्ता…..सब कुछ बेहतरीन था नानी का ….।और हमें सुन कर हैरानी होती थी कि अरे यह क्या, मां के आगे भी कोई है…खाने बनाने में।


बाज़ार के मसाले डोसे से मुझे जो शिकायत है ….


मसाले दोसे बाहर जब खाते हैं तो लगभग सभी जगह जितनी जगहों पर मैं गया हूं ..सांभर एक दम पतला, और दोसा भी बिल्कुल पतला। 


अब पंगा यह है कि जो लोग डाईटिंग पर हैं या उस रेस्टतां में डेटिंग के चक्कर में गए हैं, उन को तो कुछ भी चलेगा….लेकिन यहां तो डाईटिंग-डेटिंग की कोई बात नहीं है, हमें तो भूख लगी है, हम तो भई पेट भरने के लिए जा रहे हैं…लेकिन कुछ मज़ा अकसर आता नहीं …हम वे आलू ही न थोड़ा खाने जा रहे हैं…


मुझे ऐसा लगता है कि रेस्टरां दोसे के मेटीरियल में और सांभर की दाल में बचत करना चाहते हैं….चाहते क्या हैं, करते ही हैं…। एक बात और यही बात मैंने एक बार किसी के सामने कही तो उसने अपना ज्ञान बघार दिया कि असल में सांभर का सही तरीका यही होता है ……..ठीक है, अगर यही पानी जैसा सांभर ही सही तरीका है, तो रखो यार इसे अपने आप ….हमें अपनेे छोले-भटूरे ही मुबारक हैं…। 


वैसे भी साउथ इंडियन फूड से मेरी पहचान बहुत बाद में हुई ….


इडली से पहली मुलाकात….


पांचवी छठी कक्षा में पढ़ते थे ..पैदल डीएवी स्कूल जाते थे ..रास्ते में अमृतसर का मशहूर दुर्ग्याणा मंदिर पड़ता था, उस के बाहर कुछ लोग स्टील के डिब्बों में कुछ सफेद सफेद रंग के गोले से पानी जैसी दाल के साथ बेचते दिखते थे….इसी फुटपाथ पर कुछ मांगने वाले भी बैठे होते थे ….और इस बालपन में मेरे अंदर यह बात बैठ गई कि यह गरीबों का खाना है, कुछ लोग मुफ़्त में बांटने आते हैं….यह बिल्कुल ईमानदारी से लिख रहा हूं…कोई भी इस बात को अन्यथा न ले, जैसा महसूस करता था उन दिनों वही लिखा है…


बात ऐसे ही कईं साल तक देखते रहे इडली सेवा ….बाद में बहुत वर्षों के बाद जब कालेज जाने लगे तो यह भी देखा कि अमृतसर मंदिर में जो श्रद्रालु लोग दूसरे प्रांतों से आते थे …वे अकसर उस सफेद रंग के गोले को खाते थे …..बडे़ चाव से ….उस सफेद रंग के गोले को इडली कहते हैं, यह तो ३० साल की उम्र में पता चला होगा …या इस से भी बाद में। हां, उस सफेद गोले का दाम बहुत कम था …जहां तक मेरी याद मेरा साथ दे रही है, यही कोई पंद्रह या पच्चीस पैसे में एक सफेद रंग का गोला (इडली) मिल जाता था ….। 


उस गोले को खाने का तो क्या, उस का स्वाद चखने का तो प्रश्न ही न था, क्योंकि ऐसा लगता था कि यह हमारे लिए नहीं है…..। 


डोसे से पहली मुलाकात….


२५ साल की उम्र होने पर रोहतक पीजीआई से थोड़ी दूर एक रेस्टरां था जहां पर चाईनीज़ फूड मिलता था …१९८० के दशक के आखिरी सालों की बातें हैं ..उस का नाम था ..मामा मियां….दुकान का नाम याद नहीं आ रहा ….और मुझे यकीं है ब्लॉग पढ़ने वाले भी याद नहीं कराएंगे …खैर, कोई बात नहीं, माडल टाउन एरिया की उस दुकान मेें मसाला-दोसा भी मिलने लगा था ….लिखते लिखते देखिए मुझे याद आ ही गया…अनुपम स्वीट्स, माडल टाउन, रोहतक …


शायद पहली बार या दूसरी बार दोसा खाया था कि १९९० के आसपास …तब तो कुछ और जगहों पर मिलने लगा था….


बंबई में डोसा …..


बंबई में डोसा माटुंगा में श्रीसुंदर का ही अधिकतर खाया, फिर मुंबई सेंट्रल में गीता भवन में एक दो बार (बाद में कभी नहीं गए), फिर मुंबई सेंट्रल में कल्पना और उडिपी ….इन में भी अच्छा मिल जाता था …लेकिन माटुंगा वाला (जिस का उद्घाटन जार्ज फर्नाडिज़ ने किया था ..). । 


अभी कुछ बरसों से माटुंगा के रामाश्रय, और मैसूर दोसा और षणमुखानंद हाल के सामने मद्रास डोसा….ये सब भी बढ़िया हैं…


हमने दोसे को सामान्य दाल रोटी की तरह ही खाया जब भी खाया….छुरी-कांटे से कभी बात बनी नहीं, एक बार भी नहीं ….


और हां, इन सालों में हैदराबाद, बैंगलोर, त्रिचि, केरला गए तो वहां भी डोसा ही ढूंढते रहते …बैंगलोर और हैदराबाद में अच्छा लगा …शायद बाकी जगह हम ही ठिकाने पर न पहुंच पाए हों। 


यह मैं भी कहां का कहां निकल आया….अपनी पसंद नापसंद लिखने बैठ गया…किसी को इस में क्या रुचि हो सकती है….खैर, मैं तो क.टी.एच के बंद होने की बात कर रहा था ..और दूसरा मुझे आज का अपना एक एक्सपिरिएंस शेयर करना है …

कुछ दिन पहले पता चला कि केटीएच में तोड़-फोड़ चल रही थी, पुलिस भी आई हुई थी और वह बंद हो गया है…यह आज सुबह की तस्वीर है …पहले इस के ऊपर एक छत हुआ करती थी …अब वह गायब है….पता नहीं अब कब खुलेगा., बंद क्यों हो गया…आसपास किसी से पूछो तो कोई सीधे मुंह जवाब नहीं देता …वही बम्बईया स्टाईल में कंधे उचका कर कह देते हैं…क्या मालूम। मालूम नहीं। 


आज जिस इडली-वडा स्टाल को ट्राई किया …..


कुछ महीने पहले मेरा एक मरीज़ किसी इडली-वडा स्टाल की बहुत तारीफ़ कर रहा था ….जब किसी खाने पीने की चीज़ की कोई सिख जेंटलमेन तारीफ़ करता है तो वह मेरे लिए काबिलेगौर होती है क्योंकि अमूमन इन के खाने-पीने के स्वाद बढ़िया ही होेते हैं….वह तो कह रहा था कि मैं किसी दिन ले आऊंगा …आप के सारे स्टाफ के लिए भी …मुझे ठीक नहीं लगा …मैंने ऐसे ही मना कर दिया। वह बंदा इस स्टाल की बड़ी तारीफ़ कर रहा था …कि सुबह कुछ घंटे में ही सारा सामान बेच कर चला जाता है। आप को सुबह जल्दी जाना होगा…

आज कुछ साउथ इंडियन खाने की इच्छा हुई ..तो घर के पास ही एक बेन्ने नाम से दुकान है…कुछ दिन पहले शाम के वक्त गया तो बीस-तीस लोगों की लाइन, वापिस लौट आया… ..आज नौ बजे गया …तो दुकान के बाहर आठ-दस लोग लाइन में खड़े थे ….अब यह लाइन में खडे़ होकर डोसे की दुकान में दाखिला लेना …इतना सब्र नहीं है, न ही इतनी कोई मजबूरी…..


फिर मैंने सोचा कि सरदार जी ने जिस स्टाल के बारे में बताया था, उस का पता करें…मैं उस जगह के आस पास ढूंढ ही रहा था कि एक रिक्शे वाले से पूछा कि एक इडली की मशहूर दुकान है ..कहां है, उसने सामने इशारा किया कि दुकान नहीं है, बस, यहां पर बेचने आता है ….बहुत ज़्यादा मशहूर जगह है। 




ठीक है, मैं भी चला गया ..लेेकिन एक कहावत है न कि सेलिंग लाईक हॉट केक्स (हाथों हाथ किसी चीज़ का बिकना) …यह वहां पर चरितार्थ होती दिखी ….सारे परिवार को ठीक से सांस लेने की फ़ुर्सत न थी ….तीस रुपए की एक इडली, तीस में एक मेदू वडा और तीस में ही एक दाल का वडा….मैंने भी दो इडली ली …और साथ में उसने पतली सी दो तीन तरह की चटनी भी डाल दी ….


मैं पास ही अपने स्कूटर पर बैठ कर खाने लगा …तभी मेरी नज़र पास ही दो बाल्टीयां लेकर बैठे एक इंसान पर पड़ी…जो प्लेटे धो रहा था …एक बाल्टी में बचा खुचा डालो, दूसरी में प्लेट को डुबो दो और तीसरी में डुबो कर बाहर निकाल लो….प्लेट अगले ग्राहक के लिए तैयार …


चलो जी, प्लेटें भी हो गईं साफ, ग्राहकों के अगले बैच के लिए 

वैसे यह बात यहां पर कोई नयीं नहीं दिखी …आप जहां भी कुछ खा रहे हैं, थोड़ा सा उस के आगे देखेंगे तो यही कुछ दिखेगा…हां, लेकिन एक बात की उस स्टाल वाले की तारीफ़ करनी होगी कि हर प्लेट पर एक बटर-पेपर जैसा पेपर बिछा कर ही चीज़ परोसा रहा था …लेेकिन चम्मच तो हर किसी को वैसे ही इ्स्तेमाल करना होगा ….जिस धुलाई प्रक्रिया का मैंने ज़िक्र किया है ….

चम्मचों की एक साथ धुलाई हो गई ...
मैं तो भई इस पेपर के चक्कर में इडली खा गया ...

चलिए, यहां खाने का भी शौक पूरा हुआ…आम तौर पर यहां वापिस नहीं आना चाहूंगा ..लेेकिन कभी एमरजैंसी में कुछ खाना हो तो विचार किया जाएगा, जैसा मूड होगा, देखेंगे। हां, आगे से कभी चम्मच इस्तेमाल नहीं किया करूंगा यहां पर….। 


कर्नाटक टिफिन रूम की बात कर रहा था …उस के बंद होने का मुझे बहुत दुःख है, शायद फिर से खुल जाए…पता नहीं …बहुत बढ़िया जगह थी …कियोस्क था …जहां जा कर आर्डर करो, आनलाईन पेमेंट करो …और अपनी बारी का इंतज़ार करो …और बाद में अपनी प्लेट खुद ही डिस्पोज़ करो जा कर …..बढ़िया सर्विस थी….२०० रुपए में डोसा मिल जाता था …लेेकिन सांभर किसी भी चीज़ के साथ नहीं मिलता था ….दो तरह की चटनी ..एक नारीयल की और दूसरी भी …किस चीज़ की? …शायद वह भी नारियल की ही ..लेकिन थोड़े पीले रंग की …। 


कुछ दिन से सोच रहा हूं कि यह टिफिन रूम बंद क्यों हुआ ….खैर, बुरा हुआ ….क्योंकि मुझे पहली बार घर से बाहर का डोसा पसंद आया था…वह भी चांस गया …फिलहाल तो गया ही। 

Closed - आज कर्नाटक टिफिन रूम इस हालत में दिखा ....


अभी यह पोस्ट लिखने के बाद मुझे अपनी बीस साल पुरानी एक पोस्ट याद आ गई..हरियाणा में रहते थे तब....बेटे की जलेबी में प्लास्टिक निकला था उस दिन ....मैंने इतने बरसों बाद आज पढ़ी है ...और जो वीडियो लगाई थी, उसे भी देखिए....यह मेरी ब्लागिंग की शुरुआत थी ...एक भी शब्द बदला नहीं, डिलीट नहीं किया, जोड़ा नहीं ..अपनी किसी भी पुरानी पोस्ट में ...अगर चाहें तो इसे भी पढ़िए और देखिए ....क्या ये बीमारियां परोसने वाले दोने हैं...18 जनवरी २००८


गुरुवार, 18 जून 2026

अखबार में पढ़ लेंगे कहां आग लगी…

इस वक्त वहां कौन धुआँ देखने जाए..

अखबार में पढ़ लेंगे कहां आग लगी…


यह बहुत ही मशहूर और व्यंग्यात्मक पंक्ति है , जो मशहूर शायर अनवर मसूद की एक ग़ज़ल का हिस्सा है …


ये पंक्ति उन लोगों (मैं भी उन में शामिल हूं) और हमारी आज की मानसिकता पर कटाक्ष करती है, जो किसी हादसे या घटना स्थल पर जाकर मदद करने या हक़ीक़त जानने के बजाय आराम से घरों में बैठना पसंद करते हैं और दूर-दराज की घटनाओं से बस मनोरंजन या जानकारी के लिए जुड़े रहना चाहते हैं। 


मेरे फ्लैट की खिड़की से दिख रहा था यह खौफ़नाक मंज़र ...यही कोई ५०-१०० मीटर की दूरी होगी 

कल रात सोने का वक्त था तो पता चला कि हमारी बिल्डिंग से थोड़ा ही आगे किसी बिल्डिंग में आग लग गई है …खिड़की से बाहर देखा तो यह दिल दहलाने वाला मंज़र था ..रात १०-१०३० बजे का वक्त था…


चिंता यही हुई कि माल का तो कुछ नहीं, जान सब की सलामत रहनी चाहिए…यही दुआ करता रहा…इतनी भयानक लपटों को देख कर ….

मुंबई में फॉयर ब्रिगेड सेवा तो बेहतरीन है ही …जल्दी ही इन के आने की आवाज़ें आने लगीं और पानी की बौछारें भी दिखाई दे रही थीं…


आधे-एक घंटे के बाद आग बुझ गई थी …चलिए, ईश्वर का शुक्र है…लेकिन यह चिंता तो रही कि उस में बसने वाले सभी लोग सकुशल हों …। 


जब आग की लपटें थोड़ी कम हुईं तो देखा कि बड़ी बड़ी टार्चों से, सर्च लाईटों से उस फ्लैट के अंदर देखा जा रहा था …



फिर कुछ एक डेढ़ घंटे के बाद आग बुझ गई …यहां तक की धुआं भी नहीं दिख रहा था …


सात मंज़िला बिल्‍डिंग की सब से ऊपरी मंज़िल में आग लगी थी, यह आज सुबह पेपर से पता लगा …


आग की घटनाएं ज़्यादा ही होने लगी हैं ….देश के हर कोने में …बड़ी चिंता की बात है …ऐसे लगता है जैसे हम सभी बारूद के ढेर पर ही बैठे हुए हैं …और लाटरी सिस्टम से सब कुछ चल रहा है …और क्या कहें। क्या आप को भी ऐसा नहीं लगता?


इस आग की वह फोटो जो अखबार में छपी 

आज की अखबार में यह आग लगने वाली खबर तीसरे पेज पर थी …एक बंदे के गुम होने की बात भी लिखी थी …


आज रात नौ बजे के करीब मैं उस बिल्डिंग को देखने गया ….सन्नाटा पसरा हुआ था …सारी बिल्डिंग की बिजली गुल थी ..शायद बिल्डिंग के लोग फ़िलहाल कहीं दूसरी जगह रहने चले गए थे …क्या करें….दिलों में दहशत बैठ जाती है …


बिल्डिंग के सामने एक फोटोग्राफर फोटो खींच रहा था …शायद किसी पत्रकार के साथ था…पहले तो वॉचमैन से बात कर रहा था…


जब वे दोनों बाहर आए तो मैंने पूछा ..कि किसी को चोट तो नहीं आई…

उसने इशारे से कहा कि एक आदमी की ज़िंदगी चली गई …बहुत दुःख हुआ …उसने कहा कि अभी कंफर्म नहीं है, लेकिन सातवीं मंज़िल पर रहने वाले फलां-फलां दंपति थे …क्या आप उन को जानते हैं…

मैंने कहा ..नहीं…

उसने बताया कि वह पुरुष बेडरुम में था जिस के ए.सी को आग लग गई और वह चल बसा। उस की पत्नी लिविंग रूम में थी, बच गईं…

बहुत बुरा हुआ….अफ़सोसनाक। 


हमारे घर में भी पच्चीस वर्ष पहले पंजाब में आग लग गई थी ..हम लोग घर पर नहीं थे, पूरा घर स्वाहा हो गया था …सब कुछ …बहुत बड़ा शुक्र यही था कि घर के किसी सदस्य का बाल बांका नहीं हुआ..क्योंकि कोई भी घर पर नहीं था …लेकिन उस में सामान सारा जल कर राख हो गया….सब कुछ ख़ाक….दूसरों के लिए कहना आसान होता है लेकिन जिन के ऊपर बीतती है, आटे दाल का भाव उन्हीं को असल में पता चलता है …कईं बरसों तक हम फिर से सारा सामान बनाने में जुटे रहे ….। घर की इंश्योरंस भी न थी…। 


आग तो बहुत बड़ी बात हो गई …घर में छोटी मोटी मुरम्मत करवाने ही में पसीने छूट जाते हैं…कुछ दिन पहले हमारे फ्लैट के ड्राईंग रुम की छत से प्लास्टर रात के वक्त नीचे गिर गया ….शुक्र है उस वक्त वहां पर कोई था नहीं …लेकिन जितनी उस को ठीक करवाने में बहुत दिन लग गए …समझिए एक महीना लग गया….पहले कैमीकल, फिर प्लास्टर, फिर दोबारा प्लास्टर, फिर पुट्टी, फिर फॉईनल पुट्टी, अभी पेंटिंग होना बाकी है ….


यह उन दिनों की बात है जब मुंबई में एक अभियान के अंतर्गत अनाधिकृत्त बस्ती को हटाया जा रहा था …यह सरकार के काम पर कोई टिप्पणी नहीं है, वह तो जो मुनासिब समझेगी और जो इमारतें गैर-कानूनी या सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर के बनाई होंगी, उन को तो कानूनी प्रक्रिया के बाद सरकार जब चाहे ज़मीदोज़ कर दे …लेकिन उन्हीं दिनों जब मेरे घर के ड्राईंग रुम की छत का प्लास्टर नीचे गिरा तो रह रह कर मुझे उन घरों में रहने वालों का ख्याल आता रहा …कहां होंगे, किस हाल में होंगे, कहां सोते होंगे, कहां होता होगा खाना-पीना…चूल्हा-चौका ….। 


बशीर बद्र की बात अकसर याद आ जाती है …जब लोग नफ़रत में, धर्म के नाम पर एक दूसरे धर्म, सम्प्रदाय की बस्तियां जला देते हैं….


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में….


आदमी को चाहिए वक्त से डर के रहे ...कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिज़ाज...वक्त का बदले मिज़ाज ...

सोमवार, 15 जून 2026

सुबह टहलने के लिए मौसम नहीं, मन चाहिए...

जब स्कूल में पढ़ते थे तो सवेरे की सैर से इतना नाता था कि हिंदी में कईं बार निबंध लिखने को दिया जाता था ..सुबह की सैर के लाभ…। हमारे घर के बिल्कुल पास रेलवे का एक अस्पताल था ..यही कोई १९७० के आसपास की बातें हैं ये ….सुबह सुबह आते जाते इक्का-दुक्का लोग फांटे वाले पायजामे में हवाई चप्पल पहने टहलते दिख जाते …उन को देख कर इतनी उदासी क्यों छा जाती थी…बड़ा डिप्रेसिंग मंज़र होता था …पता ही नहीं चलता था कि कौन मरीज़ है और कौन सेहतमंद…क्योंकि उन दिनों रेलवे अस्पताल में भी फांटां वाले (सफेद-नीले स्ट्राइप्स) पायजामे वाली वर्दी मरीज़ों को मिलती थी …और कालोनी में टांवे टांवे लोग जो टहल रहे होते उन को देख कर रेलवे वार्डों में दाखिल मरीज़ों का ध्यान आ जाता ….


हमें नहीं याद कि बचपन में या जवानी में कभी सुबह टहलने का कभी हमारा रुटीन रहा हो ..हां, गर्मी की छुट्टियां शुरु होती थीं तो शुरुआत २-३ दिन सुबह सुबह ज़रूर टहलते थे ..बहुत मज़ा आता था…ठंड़ी ठंडी हवा, कोयल की कू-कू-कू-कू…चिरैया, तोते …सब अपनी मस्त में मस्त…


कट टू …साल 2000-2001….


बस, ऐसे ही चल रहा था ….३०-४० साल की उम्र के दौरान नया नया सुबह टहलने का शौक जागा तो कभी कभी चले जाते थे …लेकिन नियमित कभी नहीं …। 


फिर ३५-४० साल की उम्र में पंजाब में रहते हुए एक इंगलिश की किताब हाथ में पड़ गई …व़ॉकिंग के ऊपर थी …बहुत अच्छी थी …उस में यही लिखा था कि आदमी के लिए पैदल चलना एक प्राकृतिक वरदान है….वह बना ही चलने के लिेए है…


बहुत सी बातें थीं उसमें ऐसी ही…अच्छी लगीं, कुछ दिन सुबह सैर के लिए निकलना शुरु हो गया…फिर कुछ ही दिनों बाद बंद भी हो गया…फिर बीच बीच में कभी मन हुआ तो टहल लिया…किसी दिन साईकिल लेकर निकल गए….यह सब चलता रहा …फिर फिश्चूला परेशान करने आ गया….दो तीन साल वह बहाना चल गया कि न तो इस की वजह से चला जाता है और न ही साईकिल की सीट पर बैठ पाता हूं …जी हां, बिल्कुल तीन साल इसी चक्कर में घर बैठे निकल गए …। 


२००७ में मैंन यह ब्लॉग लिखना शुरु किया…अलग अलग शहरों में रहे …पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश …हर जगह के अपने निराले अनुभव …सुबह की सैर के भी अनुभव …मैं ये सब अपने ब्ल़ॉग में लिखता रहा ….


आज ख्याल आ रहा था कि ऐसे दर्जनों लेख इस ब्लॉग में पड़े होंगे जिस में सुबह की सैर का भ्रमण है …प्रेरणादायी लेख हैं…९० साल के बुज़ुर्गों को टहलते देखा, वॉकर लेकर बुज़ुर्ग महिलाओं को सुबह सवेरे टहलते देखा…ऐसे बुज़ुर्गों को भी टहलते देखा जो किसी सहायक के साथ आए थे, कुछ तो व्हील-चेयर पर आए थे ….सब मंज़र मैंने इस ब्लॉग में सहेज रखे हैं….


सुबह सैर के न निकलने के अनगिनत बहाने हैं…जो मैंने इस्तेमाल किए …नींद पूरी नहीं हुई, आज थोड़ी जल्दी है, कल से करेंगे, आज मौसम उमस वाला है, सुबह सुबह ही इतनी गर्मी हो गई है, घर बैठे ही इतना पसीना आ रहा है, आज कल सूरज इतनी जल्दी उदय हो जाता है (देखिए, सूरज देवता तक से गिला शिकवा …भई, उस का तो सदियों का पक्का टाईम-टेबल है), फिर गर्मी हो जाती है, सड़कों पर सुबह सुबह ही ट्रैफिक हो जाता है …वातावरण प्रदूषण, बरसात में रास्तों में कीचड़…..कितने बहाने गिनाऊं …लिस्ट तो कभी खत्म न होगी…


लेकिन तीन चार साल पहले एक बार टहलने निकला तो कॉलोनी का कुत्ता पीछे पड़ गया….डर गया भई, कोई भी डरेगा ही …कॉलोनी की सुनसान सड़कें और कुत्ता ऊपर उछलने के लिए तैयार …उस के बाद सुबह सुबह पैदल कॉलोनी से बाहर जाने की हिम्मत न हुई …….कईं बार पास ही के एक पार्क में टू-व्हीलर पर निकला भी …लेकिन स्कूटर पर भी जब एक दो बार कुत्ते पीछे पड़ गए …तो बस, सुबह सवेरे यह टहलना-वहलना लगभग बंद ही है … बस, अपने दैनिक कार्यों में जितना चलना-फिरना हो जाता है , वही है ..उस के लिए भी शुक्रगुज़ार हूं …। 


हां, तो मुझे यह पोस्ट लिखने का खयाल आया कैसे ..कुछ दिनों से आ रहा था …मैं जितने भी शहरों में रहा हूं उन सभी में सुबह टहलने के जितने भी प्रेरणादायी मंज़र देखे हैं ..वे सब लिखे हैं…कुछ अलग सा दिखता है तो लिखने की इच्छा होती है …


वैसे तो मुंबई या दिल्ली की हाउसिंग सोसायटी के अंदर ही लोगों को टहलते देखा है …शुरू शुरु में हैरानी भी होती थी कि यह क्या हुआ टहलना ….फिर धीरे धीरे बात पल्ले पड़ गई कि इन को शाबाशी इस बात कि ये लोग घर से बाहर तो निकले हैं…इन का चलने का जज़्बा तो कायम है …चलेंगे तो पहुंच भी जाएंगे, एक बात है …वैसे पहुंचना कहां है, इस सफ़र की ही अहमियत है …। 


हां, तो कुछ लोगों से बातचीत से पता चलता था …खासकर के बुजुर्ग औरतों से कि वे अपनी बिल्डिंग की छत पर ही टहल लेती हैं…शारीरिक हालत की वजह से ..बाहर निकल नहीं पातीं और टैरेस पर ही टहल लेती हैं…कईं बार कुछ ऐसे बुज़ुर्गों को देखा भी टहलते हुए…। 


मैं जिस टैरेस की बात कर रहा हूं , वह इस तस्वीर में बाईं तरफ़ दिखने वाला टैरेस है ...यह भी लगभग आधा ही टहलने के लिए उपलब्ध है, क्योंकि आधी तरफ़ तो तारों का झमेला और दूसरी तरह का अडंगा बिखरा पड़ा है, लेकिन बात वही है जिस ने खुशियां ढूंढने की ठान ली है, वे खुशियां ढूंढ ही लेते हैं , और शिकायतें, गिले, शिकवे करने वाले पड़े रहते हैं उन्हीं चक्करों में ...(यह तस्वीर आज सूर्यास्त के समय की है)

लेकिन कुछ दिनों से एक बिल्डिंग के ऊपर टैरेस पर एक स्वस्थ, चुस्त-दुरुस्त दिखने वाले बंदे का टहलना भी कम प्रेरणादायी नहीं है ….टैरेस से समंदर दिखता है, सुबह सुबह की ताज़ा हवा, पंक्षियों का चहकना …इन सब के बीच छोटे से टैरेस के ऊपर तेज़ तेज़ टहलना ….वाह, बहुत बढ़िया …कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन किसी के लिए भी इंस्पिरेशन हो सकती है ….उस बंदे ने कान में बड़े बड़े स्पीकर लगाए होते हैं, और स्पोर्ट्शू भी पहने होते हैं और वह तेज़ तेज़ चल रहा होता है और पूरे ३०-४० मिनट तक टहलता है ….जैसे अपने आस पास की बिल्डिंग में रहने वालों को एक ज़रूरी पाठ भी पढ़ा रहा है ……सुबह की सैर के लिए मौसम नहीं, मन चाहिए।

अगर पोस्ट पढ़ते पढ़ते आप यहां तक पहुंच ही गए हैं तो मेरी सलाह है कि इस गीत को भी सुन लीजिए..(यह रहा इस का लिंक) शायद इसी से प्रेरणा मिल जाए….

मुझे याद है मैं स्कूल में था और यह फिल्म आई थी- शोर ..१९७२ में ..कक्षा तीन या चार में रहा हूंगा.. और मनोज कुमार की देखा-देखी हमारी कॉलोनी में भी इस तरह के आयोजन होने लगे थे कि कोई युवक हमारी कॉलोनी की ग्राउंड में सात दिन लगातार साईकिल चलायेगा…हमारा क्या था, हमारा दिन बढ़िया कट जाता था, हर दिन स्कूल से लौटने पर उसे देखने चले जाते थे ….और साथ में स्पीकर पर गाने बज रहे होते थे …बढ़िया टाइम-पाइस …..हमारे ज़माने में मुफ्त के इस तरह के टाइम-पास बहुत होते थे …और नहीं तो अड़ोस-पड़ोस में कोई शादी-ब्याह, कीर्तन, जागरण से पहले स्पीकर पर गीत बजने लगते थे …बस, हो जाता था अपना उस दिन तीन चार घंटे के लिए मन बहलाने का जुगाड़….किताबें-कापीयां परे रख देते थे …कौन रटता फिरता अपने स्कूल के पाठों को इतने शोर-गुल में …देख लेंगे …पढ़ाई ही करनी है न, कर लेंगे बाद में …अभी तो कटी पतंग, शोले, दाग के गाने सुनें इत्मीनान से ….


गीत तो यह भी बेहतरीन है ..भोर गए पंछी धुन यह सुनाएं ...जागो रे गई रुत फिर नहीं आए...



रविवार, 31 मई 2026

पैसे के ज़ोर पर मंदिरों में व्ही-आई.पी दर्शन गलत एवं भेदभावपूर्ण ....


यह मेरी स्टेटमेंट नहीं है, मैं इतनी हिम्मत नहीं रखता कि अपने रिस्क पर इस तरह की बात लिख दूं अपने ब्लॉग में ….और उस से फ़र्क भी क्या पड़ता?....गालियां ज़रूर यहां वहां से पड़ जातीं….लेकिन जब मद्रास उच्च न्यायालय ने ही यह बात परसों कह दी तो 50 बरसों तक मेरे दिल के अंदर दबी बातें भी उछल-कूद करने लगीं…इसीलिए मैं भी महीने के आखिरी रविवार के दिन अपने मन की बात लिखने बैठ गया….

निदा फ़ाज़ली बहुत से बढ़िया दोहे, गज़लें, शे’र …हमें थमा कर गए हैं….ऐसा ही एक आज याद आ रहा है …

सीधा सादा डाकिया जादू करे महान्…

एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान….।


इस से सुंदर और बड़ी बात चंद अल्फ़ाज़ में और कोई कैसे ही लिख लेगा….ठीक इसी तरह के खयाल मैं अखबार के बारे में रखता हूं …यह भी एक पूरा पैकेज लिए रहती है …सारी अखबार बलात्कार, दलित शोषण, छीना-झपटी, मार-धाड़, नकली दवाईयां, नकली दारू, नकली मिठाईयां, धोखा-धड़ी, जाल-साज़ी, छुरेमारी, कत्ल, खुदकुशी, ससुराल-बहु के लफड़े…पेपर लीक होने की दिल को हिला देने वाली खबरों से सनी होती हैं जिन्हें पढ़ कर सुबह सुबह ही दम घुटने लगता है लेकिन बीच बीच में कोई किसी पन्ने पर मई जून के महीने में किसी ताज़ा हवा के झोंके की तरह ऐसी ख़बरें भी दिखती हैं जिस से मानवता पर, व्यवस्था पर और सब से ऊपर अपनी अदालतों पर विश्वास पक्का होता है ….जजों की सोच, उन की निडरता और उन के बेखौफ़ फ़ैसलों की झलत इस में मिलती है….इस वक्त वह जज याद आ रहा है जब सिरसे वाले बाबे को उम्र कैद की सज़ा किसी सीबीआई कोर्ट के एक जज ने सुनवाई ….टीवी पर लाइव कवरेज चल रहा था ….सारा पंजाब हरियाणा कोर्ट के बाहर पंचकूला में पहुंचा हुआ था …2017 की बात है …लेकिन बंदे ने वही फ़ैसला किया जो उसे करना था …ऐसी बहुत सी मिसालें मिल जाएंगी ..लेकिन कुछ दिन, कुछ फैसले हमारे दिलो-दिमाग में सदा के लिए फ्रीज़ हो जाते हैं….दुनिया ऐसे लोगो के भरोसे ही टिकी हुई है …

कुछ पुरानी बातें हम सब के ज़ेहन में दफ़न ज़रूर हो जाती हैं लेकिन सारी उम्र वे तूफ़ान की तरह बीच बीच में उठती रहती हैं ….जैसे कि मेरी यह याद …


आज से लगभग 45-50 बरस पुराने दिन …यही कोई 1979-80 के दिन थे …अमृतसर में रहते थे, दो हज़ार रुपए के करीब पैसा था हमारे पास जो उन दिनों अच्छी खासी रकम थी… (पहले यह मज़ेदार बात थी कि घर में लगभग हर किसी को दूसरे की जेब के बारे में पता होता था …अब तो अपनी ही जेब में क्या है, कईं बार पता ही नहीं होता..)  ..मैं, मेरा बड़ा भाई और मां बस में किसी धार्मिक स्थान के लिए चले ..चार पांच घंटे के बाद वहां पहुंच गए ….


लेकिन यह क्या, इतनी भीड़…मई-जून का महीना, इतनी गर्मी, इतनी उमस, याद आ रहा है भाई ने पता किया कि लाईनों में खड़े रहे तो एक-डेढ़ दिन लग जाएगा…दर्शन करने में ….अभी लाईन में खड़े कुछ वक्त ही बीता था तो किसी ने उसे कुछ कहा …वह उस के साथ चला गया….हमें फ़िक्र हुई ..यह गया कहां?...वापिस लौट आया …दस-पंद्रह मिनट में …जो आदमी उसे लाइन में से पिक-अप कर के ले गया था ….वह कौन था, क्या कहूं ..वह दलाल किस्म का था, जिस की अंदर सैटिंग थी …सैटिंग क्या, दरअसल वह उस जगह में कार्यरत था….लेकिन मैं तो दलाल ही लिखूंगा ….कलम इस वक्त मेरे हाथ में है। जो महसूस किया उसे ही न लिखा तो फिर लिख ही क्यों रहा हूं यह डॉयरी !! 


मेरी उम्र उन दिनों 16-17 साल की थी…भाई ने उस दलाल से मिलने के बाद हमें आ कर बताया कि वह कह रहा है अभी फ़ौरन दर्शन करवा देगा …तीन सौ रुपए एक आदमी के लगेंगे …इतने ही लेगा ….कह रहा था वह तो सेवा कर रहा है, पैसे तो उसे आगे देने हैं…अभी लिखते हुए बरसों बाद यह बात याद आ गई कि इतना पैसा उन दिनों दर्शनों पर लगा देना ….बहुत बडी़ बात थी …मां ने भाई को कहा कि ऐसा कर ..तू ही दर्शन कर ले ..हम कतार में खड़े रहते हैं, अगर जल्दी नंबर आ गया तो ठीक, वरना ऐसे ही लौट जाएंगे…यहां तक पहुंच तो चुके ही हैं…शायद मैंने भी कहा कि आप दोनों दर्शन कर के आ जाओ…मैं यहीं रहता हूं …कहने का मतलब यही कि किसी न किसी के तीन सौ रुपए बच जाएं…


लेकिन भाई कहां किसी की सुनने वाला था ..नहीं, नहीं, सभी दर्शन करेंगे …तो जी नौ सौ रुपए उस दलाल को थमा दिए गए और वह किन्हीं तंग गलियों, चौबारों, घरों में से निकाल कर हमें अगले चंद मिनटों में ही झटपट दर्शन करवा के बाहर तक छोड़ भी गया …लेकिन यह क्या, दस बीस मिनट ही में हम फारिग भी हो गए …न कोई मेहनत लगी, न पसीना बहा, न ही खडे़ रहने की थकावट ही हुई …ऐसा मुझे तो लग रहा था जैसे कुछ छूट गया ..क्या हो सकता था …इंतज़ार का रोमांच ….इंतज़ार के दौरान लोगों में उमड़ता जोश, जयकारों के उदघोष….कहीं न कहीं बाल मन में यह बात बैठ गई कि हम तो चीटिंग से पास भले ही हो गए हैं, मेहनत तो इन की सफल होगी ….अर्ज़ी तो इन की ही कबूल की जाएगी….


खैर, चलिए, खाने पीने की बात करें ..जो बात अमृतसरियों को सब से ज़रूरी लगती है …हम लोग बढ़िया से होटल में तंदूरी रोटियां, राजमाह और पनीर का लंच करने और लस्सी पीने बैठ गए….आनंद आया। 


ऐसे लग रहा था जैसे दर्शन करने का बोझ सा था, वह सिर से उतर गया है …और इमानदारी से यह भी लिख दूं कि उस दिन जो एक व्ही-आई-पी जैसा महसूस किया …वैसा ज़िंदगी में फिर न कभी महसूस किया ..और न ही करने की इच्छा ही है …हां, हो सकता है वह बालमन की नासमझी होगी …ज़रूर होगी….क्योंकि जब हम लोग दर्शन कर के वापिस उन्हीं लाइनों को देख रहे थे तो मुझे तो कुछ अलग सा लग रहा था …क्या लिखूं….कुछ कुछ होता है ….वैसे ही कुछ…यानी के हम तो अभी गए और झट से दर्शन कर के बाहर भी आ गए…और यह लोग अभी भी पसीने से तर-बतर उमस में झुलस रहे हैं………छोटी उम्र की नासमझी वाली बातें…

और बाकी लोगों का रिएक्शन….मां को तो 900 रुपए यूं ही बरबाद होने का मलाल था ..भाई को बिलकुल नहीं था, वह कह रहा था, क्या हुआ, आराम से दर्शन भी तो कर आए…लेकिन वह दलाल के लिए जो बातें बोल रहा था ..वह सुन कर हम तीनों बार बार हंस रहे थे…लिखने वाली नहीं हैं वे पंजाबी बातें ….कुछ बातें सिर्फ़ मज़ा लेने के लिए होती हैं…लिखने विखने से बवाल हो जाता है …


यह तो मैं इतने लंबा लिखने लग गया ..चलिए, वापिस अमृतसर के बस-अड्डे पर पहुंचते हैं …हम लोगों ने खूब मज़े से वापिसी की यात्रा की, खाया पीया…(पीया मतलब लस्सी, कोल्ड-ड्रिंक्स…शिंकजी आदि) …थोड़ी बहुत खरीदारी की, परशाद के पैकेट खरीदे……..और हालत हम लोगों की यह थी कि बस अड्डे से घर के लिए हमें दो साईकिल रिक्शे लेने थे ….दस रुपए मेरी मां के पर्स में बचे थे और दस रुपए मेेरे भाई की की जेब में … हम रिक्शे पर बैठते वक्त भी बहुत हंसे …कि शुक्र है कि रिक्शा का किराया तो बचा ….घर पहुंच गए तो यह बात जितनी बात भी याद आती …हम लोग हंसते हंसते लोटपाट हो जाते ….

लोटपोट हो जाना बात ठीक है …लेकिन मेरे बालमन पर इस घटना ने एक अमिट छाप छोड़ दी …दिल में बहुत से सवाल पैदा हो गए कि क्या ऐसे दर्शन करना ठीक है, उन लोगों का क्या जो घंटों तक लाइन में खड़े रहे ….हम उन से आगे कैसे निकल गए …कभी भी वैसे वाली फील फिर न आई जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि दर्शन कर के बाहर लौटते वक्त उन इंतज़ार कर रहे भगतों को देख कर आई थी ….हां, यह ज़रूर है कि इतने साल बीतने के बाद भी जब भी वह बात याद आती है तो खुद पर शर्मिंदगी ज़रूर महसूस होती है ….


खैर, यह तो मैंने अपना अनुभव बांट दिया …हां, शायद इस अनुभव ने अंदर ही अंदर मुझे बहुत बड़ी सीख दे डाली ….मुझे याद नहीं मैंंने फिर कभी इस तरह से व्ही-आई-पी दर्शन या किसी तरह से अतिरिक्त पैसे का भुगतान कर के कहीं पर दर्शन किए हों….और यह अभी तक कायम है …अभी भी मैं ऐसे किसी मौके का फायदा न उठाना चाहूंगा …व्ही-आई-पी दर्शन बिना पैसे के भी मिल रहे हों तो भी मेरा दिल इस के लिए राज़ी न होगा….


पिछले पचास बरसों से लोगों के किस्से सुनते रहा हूं …किस तरह से किस बंदे ने किस जगह पर विशेष दर्शन, व्ही आई पी दर्शन का जुगाड़ कर लिया …साथ में पूरा सरकारी गाड़ीयों को काफिला गया …वहां पर पहले ही से सूचना दे दी गई ….इस तरह की जब कुछ लोगों को शेखी बघारते देखा या किसी बडे़ उद्योगपति की ऐसी जगहों पर स्पैशल दर्शन करते हुए तस्वीरें देखीं तो कुछ भी ऐसा न लगा जिस से प्रभावित हुआ जा सके…सिर्फ़ इन सब की अज्ञानता पर ही तरस आया …यही सोच कर कि अर्ज़ी तो इन की ऐसे कैसे धौंस जमा कर मंज़ूर होगी …नामुमकिन ….ऐसा मुझे लगता है…क्या पता ऊपर वाले का निज़ाम कैसे चल रहा है? …


बहुत सी जगहें हैं जहां पर यह सुविधा उन लोगों के लिए उपलब्ध है जो इन की चाहत रखते हैं और उस के लिए पैसे या रसूख का इस्तेमाल करने के सक्षम हैं……भई, उन सब को ये सब दर्शन, स्पैशल दर्शन, व्ही-आई-पी दर्शन मुबारक…….हम इस तरह से बैक-डोर बिना दर्शन के ही सही हैं।


हमें तो मद्रास हाईकोर्ट के फैसले की बहुत खुशी है …इतने बरसों बाद किसी कोर्ट-कचहरी में यह मुद्दा तो उठा और कोर्ट ने अच्छे से खबर भी ली ….आगे पढि़ए माननीय उच्च न्यायालय में क्या कहा …


“Paid VIP darshan at Hindu Temples is wrong and discriminatory, Madras HC said on Friday while rejecting state’s submission that withdrawing paid VIP darshan would cause loss of revenue. No such practice is followed in churches and mosques, HC further said. 


Hearing a PIL, the vacation bench said….Let ministers and MLAs not think that they could walk into a temple any time and that God would be waiting for them. Why do we need VIP darshan at all? Everyone is equal before God.” 


इसे भी पढ़ लीजिए….भगवान के सामने सब बराबर हैंं….


इसी खबर में यह छोटी सी खबर भी दुबकी पड़ी थी ...टाइम्स आफ इंडिया दिनांक 30 मई 2026 



हम पढ़ लेते हैं …संतों की वाणी पढ़ते हैं, पीर पैगंबरों की बातें सुनते हैं…भावना के भूखे भगवन….किस तरह से भगवान राम को जब शबरी ने दिल से पुकारा तो उस के जूठे बेर खाने के लिए उस की कुटिया पर पहुंच गए ….गुरु नानक देव जी महाराज ने भी भाई लालो और मलिक भागो की साखी के ज़रिए यही संदेश दिया…भाई लालो एक ईमानदार गरीब बढ़ई था और मलिक भागो एक भ्रष्ट बेईमान रईस इंसान ….वे भाई लालो के यहां ठहरना स्वीकार करते हैं ...




लिखते लिखते तो कागज़ काले करते जाएंगे …बस, बात पल्ले पढ़नी चाहिए …मेरे तो पल्ले पचास साल पहले ही पड़ गई थी ..खुशकिस्मती से …ऊपर लिखे उस एक वाक्ये के ज़रिए….न कभी फिर अभी तक इस तरह के दर्शन की इच्छा ही हुई और न ही शायद होगी ….बस, एक ही बात स्मरण रहे ….भावना के भूखे भगवन….। बाकी, हर किसी की अपनी आस्था है, विश्वास, भरोसा, अकीदा है ….सब की आस बनी रहे …विश्वास पक्का बना रहे लेकिन ओछी हरकतों से, दिखावे से कुछ होने वाला नहीं ….। 


इस बात को यहीं पर विराम देते हैं….


काली घटा छाई .....मुंबई 31 मई 2026 

आज सुबह छः बजे उठा तो मौसम खुशनुमा था ….चंद मिनटों में बरसात शुरु हो गई ….कुछ मिनट तक बूंदाबांदी हुई …व्हीडियो बना ली ….प्री-मानसून की बौछार थी या कुछ और …नहीं पता, यह बताना मौसम वैज्ञानिकों का काम है, कल अखबार में पढ़ लेंगे….लेकिन इस ने बचपन-जवानी की बरसात की पहली बौछार वाले दिन याद दिला दिए….कपड़े उतार कर पहली बारिश में भीगनी, सूखी मिट्टी पर पड़ी बरसात से निकलती सौंधी सौंधी खुशबू और पेड़-पौधों का पहली बारिश में झूमना ….सब यादें हैं…….अब बहुमंज़िला इमारतों तक कैसे पहुंचे पहली बारिश के बाद मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू ……वैसे भी हम लोगों ने मिट्टी का कहीं नामोनिशां ही कहीं छोड़ा हो तभी तो ऐसी तमन्ना भी करें …..हर तरफ़ कंकरीट के जंगल खड़े हैं, बिछे पड़े हैं……



पहली बौछार में डिजीटली ही भीगने का आनंद लीजिए....मई 31, 2026 मुंबई


दुआ करते हैं कि इस बार की मानसून बढ़िया हो ….दुआ में आप भी इस गीत के ज़रिए शामिल हो जाइए ….