गुरुवार, 21 मई 2026

भूले-बिसरे किस्से- 1979 में शुरु हुए पंजाब पीएमटी के .....

पिछले कुछ दिनों से मन बहुत उचाट सा है ...नीट के पेपर की खबरें देख-पढ़ कर ....अनपढ़, कम पढ़े लिखे लोग, कल ही रईस बने लोग इस में लिफ्त हैं, कोई बड़ी बात नहीं ...लेकिन अच्छे खासे प्रोफैसर ही इस के मास्टर-माइंड निकले ....यह बहुत दुःखी करने वाली बात है ...अगर इन लोगों ने दलाली ही करनी थी तो कोई दूसरा धंधा ही चुन लेते, दिल्ली बंबई चले जाते ....ज़्यादा कमाई कर लेते ....लेकिन २३ लाख युवाओं से इतना बड़ा धोखा....युवा भी क्या, अभी बच्चे ही हैं वे सभी...१७ साल की कच्ची उम्र वाले सभी बच्चे ही तो होेते हैं, आंखों में कितने ही रंग-बिरंग सपने बसाए रखते हैं.....देखते हैं, क्या होता है इन दलालों का ....लेकिन लोगों की यादाश्त बहुत कमज़ोर है...भूल भुला जाएंगे कुछ वक्त के बाद....दो तीन दिन पहले अखबार में नीट के बारे में एक भी खबर नहीं है ...पहले तो मैंने सोचा कि शायद पहले पेज पर नहीं है, अंदर के पन्नों पर होगी...लेकिन नहीं, कहीं पर कुछ भी न था...।

अच्छा तो मैंने अपनी पिछली पोस्ट में उस सिस्टम की गंदगी की बात लिखी थी जहां पर एमबीबीएस बीडीएस के दाखिले का सारा दारोमदार प्री-मैडीकल की परीक्षा के नंबरों पर ही होता था....और इस में होशियार बच्चे तो बेशक ऊपर आते ही थे लेकिन इस के साथ शहर के रसूख वाले, ऊंचे रुतबे वाले अधिकारियों के बच्चे, कालेजों के प्रोफैसर, मेडीकल कालेज के प्रोफैसरों के भी अपने मां-बाप की पोजीशन के ज़ोर पर अच्छे नंबर पा लेते थे ...इस के पीछे की सारी कहानी मैंने उस पोस्ट में लिखी है ....इन लोगों में से भी शायद कुछ बच्चे होते होंगे होशियार लेकिन जब थोड़ी बहुत होशियारी के साथ मां-बाप की पोजीशन की वजह से प्रेक्टीकल और इंटर्नल एसेसमैंट में पूरे नंबर लग जाएं तो फिर तो वारे-न्यारे होएंगे ही ....

एमबीबीएस-बीडीएस की सीटें....1979 में ....

उस वक्त पंंजाब में तीन मैडीकल कालेज थे...सरकारी मैडीकल कालेज अमृतसर (150 सीटें), सरकारी मैडीकल कालेज पटियाला (150 सीटें), सरकारी मैडीकल कालेज फरीदकोट (60सीटें)...और दो डेंटल कालेज थे....सरकारी डेंटल कालेज अमृतसर (30 सीटें) और सरकारी डेंटल कालेज पटियाला (20 सीटें)....ये सब पंजाब की अलग अलग यूनिवर्सिटियों से सम्बद्ध थे ...गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला और फरीदकोट मेडीकल कालेज पंजाब यूनिवर्सिटी चंड़ीगढ़ से सम्बद्ध था....

1979 में शुरु हुआ पंजाब पीएमटी....

1979 में मैंने प्री-यूनिवर्सिटी (मेडीकल) की परीक्षा पास की ...उन दिनों पंजाब ने यह फैसला किया कि अब मेडीकल-डैंटल दाखिला प्री-मैडीकल के नंबरों के आधार पर न होकर, एक प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर किया जाएगा….जिसे प्री-मैडीकल टेस्ट (पीएमटी) कहा गया। 

पहली बार जब यह टेस्ट 1979 में हुआ तो इस के कुल अंक 60 थे ….और मैंने सुना था कि उन दिनों इस टेस्ट में छः हज़ार के करीब छात्र-छात्राओं ने अपना भाग अजमाया था …शायद एक हफ्ते के बाद रिजल्ट आया और बिना किसी तरह के शोर-शराबे के इस परीक्षा के आधार पर ऊपर बताए गए कालेजों में दाखिले हो गए ….

कुछ कमियां ज़रूर रह गई होंगी….लेकिन कभी किसी को पता नहीं चला …क्योंकि अगले ही साल से 1980 से इस के फार्मेट में बदलाव हुआ …

1980 के पीएमटी की आपबीती …..

आप बीती इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि यह पीएमटी मैंने दिया था …कोई भड़ास नहीं निकाल रहा हूं …बरसों से कुछ सवाल जो दिल में दबे पड़े हैं, उन का लिख देना चाहता हूं….वैसे भी भड़ास क्या निकालनी, मुझे जो मिला…वह उन दिनों भी हज़ारों को न मिल सका…। 

अच्छा, इस से पहले कि इस पेपर के कच्चा-चिट्ठा खोलना शुरु करूं…यह बता दूं कि पंजाब सरकार ने उन दिनों यह फैसला किया था कि हर बरस यह टेस्ट करवाने की जिम्मेदारी पंजाब की किसी एक यूनिवर्सिटी को बारी बारी से दी जाएगी…मुझे यह इस वक्त याद नहीं आ रहा कि 1979 में यह किस यूनिवर्सिटी ने कंडक्ट किया था …(गूगल करने से भी पता नहीं चला…)..खैर, मैंने पता कर के अब करना भी क्या है…मुझे 1980 वाले पीएमटी की बात रखनी है और उस के बारे में मुझे सब अच्छे से याद है। 

1980 में यह पीएमटी टेस्ट करवाने की जिम्मेदारी गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर को दी गई …

1980 में हमारा प्री-मैडीकल एग्ज़ाम हुआ ..(आज कल का प्लस-2) …यह परीक्षा अप्रैल में हुई …मई में रिजल्ट आ गया…69 प्रतिशत नंबर आए …बिना किसी ट्यूशन के,  प्रैक्टीकल में किसी माई-बाप के सहारे के ….। 

इतने में अखबार में पीएमटी का भी इश्तिहार आ गया …इसे वे छात्र दे पाएंगे जिन के प्री-मैडीकल में कम से कम 50 प्रतिशत अंक थे …आरक्षित वर्ग के लिए छात्र-छात्राओं के यह प्रतिशत 45 प्रतिशत था। चलिए, जी फार्म भर दिए….

अभी एक महीने का समय था पीेएमटी होने में ….डीएवी स्कूल ने एक महीने के लिए साठ प्रतिशत से ज़्यादा अंक पाने वालों शायद 60-70 छात्रों के लिए एक महीने के लिेए पीएमटी स्पैशल नाम की क्लासेस शुरु कर दीं …सारे सिलेबस की रिवीज़न के लिए…। भयंकर गर्मी वाले दिन थे …सुबह से दोपहर तक रोज़ कालेज जाते, दोपहर में थक-टूट कर आते और घर में आकर देर शाम तक सोए रहते। 

20 जून का दिन भी आना ही था……आ गया…

बकरे का मां कब तक खैर मनाती….20 जून 1980 का दिन आ गया ….पीएमटी परीक्षा का दिन….अच्छा उस दिन होने वाले पेपर का पैटर्न तो बता दूं पहले आप को …..

कुल अंक ..100 

फिज़िक्स -30, कैमिस्ट्री-30, बॉयोलॉजी-30, अंग्रेजी- 10 अंक…कुल हो गए ….100 अंक…

हां तो फ़िज़िक्स-कैमिस्ट्री का पेपर उस दिन सुबह के वक्त हुआ था …10 से एक वाली शिफ्ट में ….देखिए,जब चीज़ें लिखी नहीं जातीं तो सब कूछ भूल जाता है …अब मुझे यही याद नही्ंं आ रहा कि क्या हमें दस बजे ही दोनों पेपर-फ़िज़िक्स और कैमिस्ट्री के एक साथ दे दिए गए थे या डेढ़ घंटे बाद दूसरा पर्चा दिया गया था …जहां तक मेरी यादाश्त मेरा साथ दे रही है ..दोनों प्रश्न पेपर उत्तर पुस्तिकाओं के साथ हमें थमा दिए गए थे …हमारा सेंटर भी गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी कैंप्स ही बना था …सारे डरे सहमे चेहरे वहां दिखे…मेरे पिता जी मुझे लेकर गए थे …मुझे परीक्षा केंद्र के अंदर जाते कैसा लग रहा था?

कुछ खास नहीं …बस ऐसे लग रहा था जैसे कोई बकरा कसाईवाड़े की तरफ़ कदम बढ़ा रहा हो ….बिल्कुल जीने-मरने जैसी बात लग रही थी …

एक बजे के बाद दो घंटे की ब्रेक थी….इतनी धूप में बाहर कहां भटके कोई।उन दिनों आज से लगभग पचास साल पहले यूनिवर्सिटी नई नई बनी थी …और वहां पर पेड़-पौधे भी इतने नहीं थे …और जो थे भी, इतने बड़े नहीं थे कि छायादार हो चुके हों…(यह भी याद आ रहा है कि गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर की स्थापना 1969 में गुरु साहब की 500 वीं सालगिरह के उपलक्ष्य में की गई थी …)....। 

लंच ब्रेक के बाद ..बॉयोलाजी और अंग्रेज़ी का पेपर था …दोनों पेपर एक साथ दे दिए गए थे ….और समय सीमा थी दो घंटे …तीन से पांच बजे तक। 

चलिए, पांच बजते ही हम तो फ़ारिग हो गए ….

फिर अगले दिन से खबरें आने लगीं कि इस बार रिज़ल्ट एक हफ्ते के बाद निकल जाएगा….लेकिन वह हफ्ता भी ऐसा लग रहा था जैसे कि एक बरस हो ….उत्तर पुस्तिकाएं कहीं बाहर नहीं गईं ….सारे पंजाब से उत्तर-पुस्तिकाएं अमृतसर में ही जमा हो गईं और उन को जांचने वाले प्रोफैसर साहब उन की चैकिंग वहां आकर चलते थे …जहां तक याद आ रहा है, मेरे घर से यूनिवर्सिटी दो तीन किलोमीटर ही दूर थी …एक दिन साईकिल उठा कर ऐसे ही उधर का रुख किया ….रोड-इंस्पैक्टरी करने का भी उन दिनों अपना मज़ा होता है …जेबें खाली लेकिन दिल दुनिया भर के सुनहरे ख्वाबों से लदा हुआ ….

25 जून 1980 का दिन याद आ गया ….

अभी हम लोग अपने रिजल्ट का इंतज़ार कर ही रहे थे कि 25 जून का दिन आ गया ….शाम के वक्त पता चला कि संजय गांधी की एक हवाई-हादसे में मौत हो गई है …बहुत बुरा लगा था ….बहुत ज़्यादा बुरा…। 

आखिर 30 जून, 1980 भी आ गई ….

जी हां, रिजल्ट का दिन भी आ गया ….30 जून ..देर शाम के वक्त चौक पुतलीघर इलाके की एक दुकान में रिजल्ट का गजट आ गया था…छात्रों का हुजूम लगा हुआ था …एक छात्र से पांच रुपए लेे रहा था …और एक पर्ची पर छात्र का रोल नंबर लिख कर उस के आगे उस के प्राप्त किए अंक लिख रहा था और मेरिट लिस्ट में नंबर क्या था….यह सब लिख रहा था ….

मुझे भी जब मेरी चिट मिली …तो अंक थे …44 और मेरिट लिस्ट में नंबर 266…फौरन लगा कि एमबीबीएस की सीटें तो 360 हैं और मेरा नंबर 266 है, इस का मतलब हो गया अपना काम….

वहां पर रुका रहा ..दूसरे लोग भी रिजल्ट देखने आए थे …ऐसा नहीं कि वहां रुक कर अच्छा लग रहा था …बस, ऐसे ही खड़ा रहा …फिर से रिजल्ट भी देखा, दोबारा फीस देकर ….कहीं पहली बार गल्त ही न देख लिया हो …खैर, वही सही था …अंक 44 (रैंक 266)...

फिर वहां खड़े खड़े यह भी देखा कि लोग बातें करने लगे हैं कि 360 सीटों में आरक्षित वर्ग के लिए भी सीटें हैं…शायद उन दिनों आरक्षित सीटें -30-35 प्रतिशत ही थीं…बस, थोड़ी सी दिल की धड़कन बढ़ गई कि यार, यह तो मामला थोड़ा पेचीदा हो गया…। 

वहां खड़े खडे़ यह भी जाना कि इस बार कुल दस हज़ार एक सौ छात्रों ने पीएमटी दिया था ….पिछली बार 1979 में छः हज़ार ने दिया था…और पिछली बार के हारे पछाड़े सभी इस बार भी शामिल थे, फिर से पूरी तैयारी के साथ….(और यह संख्या आने वाले सालों में बढ़ती ही गई….) 

हां, जो मैंने फ़िज़िक्स, कैमिस्ट्री और बायोलाजी, अंग्रेज़ी के पर्चे के बारे में लिखा ऊपर उस का पैटर्न ऐसा था कि उस विषय के तीस अंकों में छ-चार, तीन, दो अंकों वाले डिस्क्रिपटिव सवाल भी थे और एक एक अंक वाले ओब्जैक्टिव सवाल भी थे …मल्टीपल-च्वॉईस….

पीएमटी के रिजल्ट के गजट को देखते हुए यह भी देखा कि यहां तो नंबरिंग प्वाईंट्स में हुई है …कहने का मतलब यह की टॉपर के कुल अंक थे …62 और उस के बाद 61.75, 61.50, 61.25, 61 और आगे भी ऐसे ही ….और 44 तक पहुंचते पहुंचते रैंक हो गया 266…

उस वक्त या उन दिनों तो यही लगा कि वाह, कितनी कड़क मार्किंग हुई है ….प्वाईंट्स में नंबर दिए गये हैं। इससे ज्यादा समझ भी न थी …बात वही है कि अगर समझ होती भी तो क्या ही किसी का उखाड़ पाता….
बहुत सालों बाद, जब यह मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला उजागर हुआ तो ख्याल आया कि पीएमटी जैसी परीक्षा में डिस्क्रिप्टिव सवाल …और वे भी छः नंबर के, चार नंबर के …इन में से न्यूमैरिकल तो दो तीन ही थे…बाकी में तो पेपर चैक करने वाले को पूरी छूट …अपनी मर्ज़ी से छात्रों की किस्मत का फैसला करने की पूरी छूट। 

पूरी ज़िम्मेदारी से लिख रहा हूं…मुझे नहीं पता कि किसी तरह के घोटाले हुए होंगे या नहीं, लेकिन क्या यही कम है कि पीएमटी में डिस्क्रिप्टिव सवाल पूछे गए …एक तो पेपर चैक करने वाले को पूरी छूट …ऊपर से उन दिनों में रुतबे-हैसियत के मुताबिक किसी पेपर-चैकर तक पहुंचना कोई इतना ही मुश्किल काम होता होगा….दुनिया उन दिनों भी बहुत आगे निकल चुकी थी ….। 

मैं बार बार एक ही बात दोहरा रहा हूं कि पंजाब के बुद्दिजीवी, अ्च्छे रुतबे वाले, अफसर, प्रोफैसर, डाक्टर, इंजीनियर …इन के बच्चे अपनी काबिलियत के बलबूते ज़रुर आए होंगे…….लेकिन ऐसा नहीं कि इन सब के सभी बच्चे ही एक ही बार में उस जयपुर के प्रापर्टी डीलर की तरह टैस्ट क्लियर कर लें….असंभव जान पड़ता है ना…..लेकिन उस पीएमटी के पहले 100 रैंक की लिस्ट देख कर यही लगा ….लेेकिन आज से पचास साल पहले ..कौन कहे, किसे कहे ..कब कहे और कैसे…….आज ही देख लीजिए नीट यूजी और पीजी का हम लोगों ने मज़ाक बना रखा है …उन दिनों तो कोई मुंह भी न खोल सकता था …….

लेकिन गंदगी और सड़न तो थी सिस्टम में …..इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मेरा 266 रैंक आया …आया तो आया….वह बात नहीं ……..लेकिन सिस्टम चल कैसे चल रहा था वह सारा मैंने ऊपर लिख दिया कि पीएमटी जैेसे पर्चे में छ-चार, तीन नंबरों के डिस्क्रिपटिव सवाल और ऊपर से कोढ़ में खुजली वाली कहावत को चरितार्थ करती ….नंबरों में प्वाईंट सिस्टम …। ऐसा कौन सा थर्मामीटर, बैरोमीटर मिल गया  उत्तर पुस्तिका जांचने वाले महान मास्टरों को कि ………………ऐसा क्यों किया गया, आप भी कल्पना कर सकते हैं। 

हां, लिखते लिखते बोरियत होने लगती है तो पोस्ट बंद करने का मन होता है …वही कर रहा हूं …इस बात के साथ उस साल आरक्षित वर्ग से जिस छात्र का दाखिला एमबीबीएस में हुआ …उस के अंक छः (6) थे और जिस की बीडीेएम में दाखिला हुआ था उस का स्कोर तीन (3) था…खैर, चलिए, यह बात तो हुई आरक्षित वर्ग की …….खैर, मैंने अपने 44 अंकों के साथ क्या किया….अगली पोस्ट में बताऊंगा…। 

वैसे उस दिन रिजल्ट देखने के बाद जब साईकिल पर घर लौट रहा था तो मन मरा हुआ सा था….बहुत बोझिल महसूस कर रहा था कि पता नहीं 360 सीटों वाले कोर्स में 266 रैंक (ओपन वर्ग) होने पर भी कोर्स में घुस पाऊंगा भी या नहीं …आरक्षित सीटों की गिनती का सही पता नहीं चल रहा था …लेकिन मन उदास ही था….

हां, रिजल्ट के दो दिन पहले आशा फिल्म देखी थी ….बार बार अगले कुछ दिनों तक वह गीत याद आता रहा जैसे मेरे लिए ही आनंद बक्शी ने इसे लिख कर, लता जी ने गा कर , रीना राय पर फिल्माने के लिए दे दिया हो …शीशा हो या दिल हो ….टूट जाता है ….हां, ऐसे लग रहा था टूट रहा है दिल….इश्क विश्क का तो नाम ही न पता था, हां, रिजल्ट की वजह ही से टूट रहा था ….ऐसे लगता रहा अगले कईं दिनों तक …बाद में क्या हुआ, उसे अगली पोस्ट में पोस्ट करता हूं….जुडे़ रहिए….

हां, एक बात और ...मैं अपने इस ब्लॉग में अपने पुराने पीएमटी कार्ड को ढूंढ रहा था कि एक पोस्ट में मुझे मेरा प्राईमरी क्लास का कार्ड मिल गया ...फोटो के साथ ...हा हा हा हा हा ...लगा रहा हूं यहां पर ....

Primary Merit Scholarship - one of biggest events in my life....1973😎

बुधवार, 20 मई 2026

जब जूतों की लाइफ बढ़ाने के भी जुगाड़ थे .....



पिछले दो-तीन दिन से मैं एक चीज़ का नाम न ढूंढ पाने के लिए बहुत परेशान था…चीज़ का अच्छे से ख़्याल था..लेकिन नाम ही याद न आए तो क्या करता। सोचा, कि कौन मेरी मदद कर सकता है ….बड़ी बहन का ख्याल आया कि उस से पूछूं…फिर जैसे कुलकर्णी ,वाघमारे को नीट के अपने सवालों पर यकीन था, मुझे भी इस बात का यकीन था कि और कोई मेरी इसमें मदद नहीं कर सकता..पंजाब मेें रह रहा एक नामचीन डाक्टर मेरे कॉलेज का साथी ज़रूर मुझे इस मुश्किल से निकाल लेगा….

वही हुआ …जब मैंने हार मान ली ….तो मैंने अपने कॉलेज के उस साथी को फोन लगाया….वह बहुत बिज़ी रहता है….प्रोफैश्नल कामों ही में नहीं, आध्यात्मिक और सामाजिक कामों में भी बहुत सक्रिय है …ऐसे साथी वे लोग होते हैं जिन्हें जब भी फोन करो, कोई राम-दुआ नहीं, जो बात करनी है, बात करो और फोन रख दो, कोई भूमिका बांधने की ज़रूरत नहीं ….


फोन की घंटी गई …चुप हो गई…


इन साथियों से कैसे हार मान लें….कॉल-बॉक का इंतज़ार तो बेगाने करते हैं, जो झिझकते हैं…कुछ आधे घंटे बाद फिर फोन किया तो उसने उठा लिया….


हां, यार, कुछ पूछने के लिए फोन किया है, तुम बिज़ी हो इस वक्त…बस, वही बात करूंगा…मैंने कहा। 


हां, हां, बता, उसने कहा …


यार, दो चार दिनों से एक चीज़ का नाम याद नहीं आ रहा ….यार, जो हमारे ज़माने में लोग शूज़ के नीचे वे लोहे के मोटे मोटे से जुगाड़ फिक्स करवा लेते थे, उन का नाम याद नहीं आ रहा ….


खुरियां, खुरियां, यार …..अगले ही पल उस ने खुल कर हंसते हंसते जवाब दिया…

मुझे इतनी राहत महसूस हुई…


मैंने झिझकते 2 उसे कहा कि यार डोंट माईंड (वैसे यह कहने की कोई ज़रुरत भी न थी)...खामखां कईं बार हम लोग फार्मेलिटी में पड़ जाते हैं…हां, यार, जहां तक मुझे याद है जब तुम कॉलेज में आए तो तुम जो ब्रॉउन सोल के शू़ज़ पहनते थे, उस के नीचे भी ये खुरियां (खुरियां- बहुवचन है…पंजाब का लफ़्ज़ है ..खुरी) लगी होती थीं …


हां, हां, प्रवीण, तुझे बिल्कुल सही याद है….उसने हंसते हंसते कहा और साथ में याद दिलाया कि अपने प्रोफैसर साहब डा बी के भी तो अपने जूतों पर ये खुरियां लगवाते थे …..फिर हम दोनों ने  अगले एक दो मिनट ठेठ पंजाबी में बात की और जाहिलों की तरह हंसते रहे …..उसने यह भी याद किया कि वह अमृतसर के बस-अड्डे के सामने किसी मोची से अपने मेचे (अपने नाप के) शूज़ बनवाता था …और फिर उन शूज़ के नीचे खुरियां फलां फलां जगह से लगवा लेता था….


चलिए, मुझे राहत मिली ..कि कम से कम उस चीज़ का नाम पंजाबी ही में सही याद तो आ गया…..हिंदी या हिंदोस्तानी में उसे क्या कहते हैं वह तो मैं ढूंढ ही लूंगा…


लेकिन हिंदी में क्या कहते हैं, पता कर लूंगा …लेकिन ओव्हर-कांफिडेंस काम न आया….रास्ते में चलते चलते एक मोची भाई की शरण में जाना पड़ा। पचास के करीब होगा वह बंदा..मैंने पूछा कि बहुत साल पहले जूतों के नीचे जो लोहे की खुरियां सी लगाते थे …वे हैं क्या?....सोचा यही था कि अगर होंगी तो दो चार ले लूंगा…। 

अच्छा, आप नाल की बात कर रहे हैं, वे तो 10 बरसों से बंद हो चुकी हैं…उसने बताया….

मुझे झटका सा लगा कि बड़े से बड़े, कड़े नियम कानून आने पर भी गुटखा तो बंद नहीं हुआ, इस को बंद करने वाला तो कोई कानून मेरी नज़र से गुज़रा भी नहीं ….

मैंने कहा कि नाल तो घोड़े के पैरों के नीचे लगती है….


उसने कहा कि जिस चीज़ की आप बात कर रहे हैं उसे भी नाल ही कहते हैं….

जब घोड़े ही नहीं रहे तो नाल कहां से मिलेंगी….पास बैठी उस की 80-85 साल की मां ने भी इस चर्चा में अपना हिस्सा डाल दिया ….वह ज़रूर तांगे याद कर रही होगी जो घोड़े चलाते थे….


खैर, मैं आश्वस्त हो गया….कि हां, उस खुरी को ही नाल कहते हैं …मैंने गूगल से भी जब पूछा तो उसी नाल के आकार के जुगाड़ दिखे …अलबत्ता वे लोहे के नहीं, किसी प्लास्टिक-वास्टिक के थे….


घोड़े की नाल से याद आया….बहुत अंधविश्वास है हमारे यहां कि घोड़े की नाल घर के बाहर दरवाज़े पर फिक्स करना बहुत शुभ होता है …यह बात मैंने पंजाब में नहीं सुनी थी कभी …यही बंबई में ही पहली बार यह सुना और देखा….। और तो और, जैसे इतना ही अंधविश्वास काफी न हो, उस से ऊपर यह वाली बात कि अगर भागते हुए घोड़े के पैर की नाल कहीं मिल जाए और उसे घर के दरवाज़े पर लगा लें तो बहुत ज़्यादा लाभदायक होती है …….सब बेकार की बातें हैं….अगर ये बातें मानना शुरु करें तो यह भी पता करना होगा कि अंबानी, अडानी को घोड़ों की ऐसी कितनी नालें मिलीं…पिछले पचास बरसों में….मुझे तो जिस प्रक्रिया में घोड़े के पांव के नीचे ये नाल फिक्स की जाती है, वह देख कर ही बहुत दुःख होता है ….


अभी लिखते लिखते यह लग रहा है कि घोड़े के पैर के नीचे तो ये नाल इसलिए फिक्स की जाती होगी ताकि उस के पैरों पर आंच न आए…लेकिन 50 बरस पहले जो नाल या पंजाबी में कहें तो खुरी ….हम लोग शूज़ के नीचे एड़ी (हील) पर लगवा लेते थे उस का तो एक ही मक़सद होता था कि एड़ी कम घिसे …..

लेकिन यह क्या …एक बात तो मैं लिखनी भूल गया …जब कल उस कॉलेज के दोस्त से बात हुई तो उसने इतना भी कहा कि यार, उसे लगवाने से बंद की टोर (रुआब, डैश) बढ़ जाती थी ….मैंने भी कहा …हां, हां, हां…..उस की आवाज़ ही ऐसी आती थी चलने में ….

जहां तक टोर, रुआब, डैश की बात है वह यह है कि ऐसे शूज़ पहन कर बंदा अपने आप में खामखां बड़ा स्ट्रॉंग सा फील करने लगता था ….जहां कभी भी जाए ..ठक, ठक, ठक …..पैंचो दूसरे भी परेशान और खुद भी परेशान…ऐसे लगता था कि जैसे कोई सिर पर चोट कर रहा है ….

मुझे इतना कैसे पता है इस ठक ठक …ठक ठक….

क्योंकि मुझे याद है कि देखा-देखी मुझे भी एक बार शूज़ के नीचे ये खुरियां लगवाने का शौक चढ़ा था…मैंने भी किसी मोची भाई से लगवा भी ली थीं दो तीन खुरियां दोनों एडियों पर ….लेकिन एक दो दिन में मैं तो भाई परेशान हो गया और निकलवा के बाहर की थीं….। 


जी हां, फैशन भी होगा ….शूज़ से ठक-ठक की आवाज़ आना, चलते हुए शूज़ से चूं-चूं की आवाज़ निकलना (उतनी नहीं जितनी छोटे बच्चों के शूज़ से निकलती है…किसी स्टेशन-अड़्डे पर वह सुन कर तो मज़ा आ जाता है, रौनक लग जाती है…हंसी आ जाती है…दो दिन पहले ही मुंबई सेंट्रल के स्टेशन पर मैं लोकल ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था कि ऐसा ही एक बच्चा टहल रहा था …पांच सात मिनट बाद गाड़ी आई….गाड़ी में चलते चलते मैंने उस बच्चे के अब्बे को कह ही दिया….इस बच्चे के शूज़ की वजह से इंतज़ार के पल बहुत जल्दी खत्म हो गए….वह मुस्कुरा दिया…..) ….मैं अनजान लोगों से बतियाने की अपनी पुरानी आदत से मजबूर…..))....और ऊपर से उस दौर के खुले खुले बैलबाटम, लंबे लंबे बाल ….और कुत्ते कालर वाली लंबी लंबी कमीज़ें…..इस का रिजल्ट यही देखने में मिलता कि बंदा खुद को चाहे जितना मर्ज़ी हिप्पी या मॉड समझ ले …छोटा मोटा विलेन लगने लगता था ….जिसे हम रुआब, डैशिंग ….या मर्दाना लुक्स (मेस्कुलीन लुक).....। 


मैंने लिखा है कि उस दौर में इस तरह से जुगाड़ इसलिए किए जाते थे कि एड़ी कम से कम घिसे क्योंकि एड़ी घिसने के बाद जूता बेकार हो जाता था ….और हां, एडी़ भी उन दिनों यही चमड़े जैसे किसी मेटिरियल की ही होती थी या कोई नरम सा और कोई मेटिरियल होता था …इस नाल के लगने से उस जूते की उम्र बढ़ जाती थी ….


अब क्या लगवाएं लोग ये खुरियां या नालें…..कईं घरों के बाहर इतने जूते पड़े होते हैं …हर मौके के लिए टहलने वाले, दौड़ने वाले, स्कूल कालेज दफ्तर वाले, पार्टी वाले ….फॉर्मल टाइप ….इस के अलावा दो चार ऐसे जो दिल के बहुत करीब लगे, इसलिए खरीद लिए, ऑन-लाईन सेल में 50 फीसदी छूट पर बिक रहे थे …..लेकिन इस सब चक्कर में इतने जूते दिखते हैं घरों के बाहर जितने पुराने ज़माने में किसी घर में धार्मिक आयोजन…..सत्यनारायण कथा, महिला कीर्तन, लेडीज़ संगीत या सत्संग के वक्त भी नहीं मिलते थे….और इनमें कितने तो खराब होने के लिए, फटने के लिए ही रखे होते हैं जैसे ….पड़े पड़े अपनी तकदीर कोसते होंगे कि उन की किस्मत में दुनिया देखना जैसे लिखा ही न हो ….जैसे अलमारी में बंद किताबें तकती रहती हैं कि कब कोई उन को खोल कर उन के पन्ने उलटे ….पलटे….उन को भी कुछ हवा लगे।


अब तो शूज़ घिसने से पहले ही नए आ जाते हैं …घिसने की नौबत ही कहां आने देते हैं….एक बात याद होगी मेरी उम्र के लोगों को कि घरों में इतने ही जूते-चप्पले होती थीं कि कौन सी चपप्ल मां की है, कौन सी बहन की ….सब कुछ सब को पता रहता था …अब तो आए दिन ऑन-लाईन के डिब्बे आते हैं नए नए शूज़ के …कईं कईं दिन बंद ही रहते हैं….फिर कुछ दिन बाद खुलते हैं…अगर तंग हों या पसंद न आए तो लौटा दिए जाते हैं…पहले घर में शूज़ अगर कोई आता तो सारे घर को ख़बर होती ….अगले एक दिन दिन यही मुद्दा डिस्कस होता कि तंग तो नहीं है, है तो बदल ले…..कईं बार झिझक की वजह से तंग जूते न बदले जाते तो वे अगले एक-दो साल तक नाक में दम कर देते …छाले, चलने में दिक्कत…..और इंसान अपनी दूसरी तकलीफ़े भूल जाता क्योंकि सारा ध्यान उन की तरफ़ ही रहता…..


एक कहावत भी तो चली थी पिछले दिनों कि अगर आप अपनी सारी तकलीफ़े भूल जाना चाहते हैं तो आप एक तंग जूता खरीद लीजिए…..इस पर मैंने एक बात और जोड़ दी थी कि अगर और भी अच्छे से भूलना चाहते हैं ..सभी ग़मों को …तो एक बहुत तंग कच्छा (अंडरवियर) भी लगे हाथों खरीद लीजिए….। 


पहले हम चीज़ों की बहुत कद्र करते थे ….जूते के नीचे नालें लगवाना ही नहीं, आज से पचास साठ बरस पहले हम लोग जूतों के सोल भी बदलवा लेते थे जिस से नए जूते खरीदने से बच जाते थे और यह काम पांच छः रूपए में हो जाता था ..मैं पांचवी छठी क्लास में था, मेरे पिता जी एक बार मेरे सैंडल सोल बदलवाने के लिए ले गए….दो तीन दिन की वेटिंग लिस्ट हुआ करती थी …मैं रोज़ उन के आने की इंतज़ार करता कि आज तो मेरे सैंडल वापिस आ ही जाएंगे…..जब चार पांच दिन बाद वे नये सोल के साथ मुझे मिले तो मैं इतना खुश हुआ …कि ये तो नए हो गए हैं…..। 


एक खुशी और याद आ रही है ..कालेज में था ….नया नया….मेरी बडी़ बहन लेक्चरार लगी थी ….10 साल बड़ी हैं…एक बार मुझे अपने साथ बाज़ार ले गईं ….तो ज़िद्द करने लगी कि एक स्पोर्ट्स् शूज़ ले लो ….तुम्हारे पास नहीं हैं….मेरा भी मन तो था..लेकिन बहन से लेना नहीं चाहता था …पर उस की ज़िद्द के सामने मेरी न चली और उन्होंने मुझे अमृतसर की एक दुकान से 125 रूपए के नार्थ-स्टॉर के शूज़ ग्रे कलर के दिला दिए….वाह, क्या शूज़ थे, इतने आरामदायक ….पहली बार मैंने ऐसे शूज़ पहने थे …चमड़े के ही पहनते थे …बस, उन शूज़ को पहन कर मुझे इतना मज़ा आया कि अगले तीन चार साल तक जब तक वे फट नहीं गए, मैंने उन का साथ नहीं छोड़ा …..यह 1978-1979 की बातें हैं ….लेकिन आज भी जब मैं यह बात उस से करता हूं तो हम दोनों भावुक हो जाते हैं….अब पंद्रह-बीस हज़ार के भी शूज़ खरीदते हैं, कुछ दिन पहनते हैं और फिर रख देते हैं ….लेकिन वे 125 रुपए वाले नार्थ-स्टॉर वाले शूज़ बहुत ही ज़्यााद स्पैशल थे …और अभी तक हैं……..


पता है क्यों थे वे इतने स्पैशल ?.....क्योंकि मुझे उस वक्त उस दौर में उन की बहुत ज़रूरत थी ….।


लिखना तो अभी भी बाकी है ..लेकिन ब्लॉगिंग का यही इशू  है जैसे ही लिखते लिखते थोड़ा सी भी बोरियत महसूस होती है, फ़ौरन बंद करने की चाह होती है …हो गया आज के लिए…..बस, बार बार इन नालों वाले शूज़ का ख्याल आते ही उस दौर के खूंखार विलेन भी याद आते हैं (जो ऐसे शूज़ पहनते थे जिन से ठक-ठक की आवाज़ आती है) और उस दौर के सुपर-डुपर हिप्पी गीत भी …..जो 50 सालों के बाद भी दिल के उतने ही करीब हैं …..


अगर आप के पास भी इन नालों, इन खुरियों की कोई याद है तो लिखिएगा….कमैंट में नहीं लिखना चाहते तो ईमेल करिए मुझे …या मुझे वाट्सएप करिए….मैं एक बात भूल रहा हूं कि खुरियों के बारे में तो मैंने लिख दिया …लेकिन एक चलन और भी था, मोटे मोटे लोहे के कील ए़डी पर लगवा लेने का…..मकसद वही, दोस्तो, जूते कम घिसे ….बस, वही राष्ट्रीय मुद्दा था उन दिनों ……मैंने भी एक बार लगवाए थे लेकिन उन से भी दो दिन बाद ही निजात पा ली थी ….

 

चलिए, आज मेरे उस दौर की वजह से यह पोस्ट लिखी गई…ये पुरानी बातें पुराने लोग न लिखेंगे तो कौन लिखेगा….यह पोस्ट उसी दोस्त को समर्पित है ….अगर उस से यह खुरी लफ्ज़ का पता ही न चलता तो मैं कैसे यह लिख पाता …..हां, एक बार इस पंजाबी लफ़्ज़ याद आ गया तो फिर मेरे शब्दकोष ने भी उस दोस्त और उस मोची भाई की बात पर पक्की मुहर लगा दी…यह शब्दकोष बहुत बढ़िया है …1500 पन्ने हैं इस के …पंजाबी मेरी मां-बोली है और अगर किसी पंजाबी फिल्म, गीत में या किसी किस्से कहानी में मुझे किसी पंजाबी लफ़्ज़ का अर्थ पता नहीं होता तो मुझे बहुत बुरा लगता है ….अपनी मां-बोली ही समझ में न आए तो और क्या ही समझ लेंगे।इसीलिए यह शब्दकोष खरीदा था….




सोमवार, 18 मई 2026

पिछले साठ-सत्तर सालों के दौरान डाक्टरी में दाखिला ....

बिल्कुल सही कह रहा है यह .....आज कल नीट से ज़्यादा बास आ रही है ...

डाक्टर बनने के लिए दाखिला....जैसे ही मैंने साठ के दशक में होश संभाला, मैंने यही महसूस किया कि इस दुनिया में बनने के लिए एक-दो ही चीज़ें है ...डाक्टर या इंजीनियर या प्रोफैसर। जो यह नहीं बन पाता या बन पाती, उस की ज़िदंगी बरबाद हो जाती है ...हम लोग इसी माहौल में पैदा हुए...

बड़ा भाई मुझ से आठ साल बड़ा था...जब तक मैंने होश संभाला वह दसवीं कक्षा में पहुंच चुका था ...बहुत ज़हीन...उस ज़माने में उसने मैट्रिक की बोर्ड परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे ...1971 का साल...बस, फिर उसने दो साल और पढ़ना था और उस का मेडीकल कॉलेज में दाखिला हो जाना है ...यही प्लानिंग थी...उन दो वर्षों में उसे रोज़ रोज़ अच्छे से पढ़ने के लिए कहा जाता....परेशान हो गया होगा...घर से थोड़ा बाहर अपने दोस्तोें के साथ थोड़ा टहलने भी जाता तो घर में सब परेशान हो जाते कि पढ़ने कम लगा है ...खैर, इस के आगे और क्या लिखूं ?....बस इस सब का रिज़ल्ट यह निकला कि १९७३ में गुरुनानक विश्वविद्यालय की प्री-मैडीकल परीक्षा में (जिसे आजकल प्लस-२ कहते हैं) उस के ६२.५ प्रतिशत अंक आए....उन दिनों मेडीकल कालेज में दाखिला इन्हीं नंबरों के आधार पर होता था ...मुझे अच्छे से याद है ६४ प्रतिशत नंबर हासिल करने वाले का दाखिला हो गया और भाई की गाड़ी छूट गई...

गाड़ी क्या छूट गई ...घर में मातम छा गया...बीडीएस का नाम तक न सुना था किसी ने घर मेें कि वह भी कोई कोर्स होता है ...इसलिए उस का तो क्या पता करते। उन दिनों लुधियाना के सीएमसी और डीएमसी में दस हज़ार रुपए या उस से थोड़ा ज़्यादा डोनेशन (जिसे बाद में कैपीटेशन कहा जाने लगा) देकर दाखिला मिल जाता था ...पिता जी ने भी कोशिश की ...दाखिले की नहीं, इतनी रकम का जुगाड़ करने की ...लेकिन नहीं हो सका। 

बीच में एक बात याद आ रही है ....

उन्हीं दिनों एक ५० बरस की उम्र की एक महिला डाक्टर अकसर पारिवारिक समारोहों में दिख जातीं....वह मेरे फूफा जी की बड़ी बहन थीं और आज़ादी के बाद जब लाहौर से बदल कर अमृतसर में सरकारी मेडीकल कालेज शुरु हुआ तो वह पहले या दूसरे बैच की अपने बैच की अकेली एमबीबीएस की छात्रा थीं...अमृतसर के मॉडल टाउन में वह लोग रहते थे और बहुत हंस हंस कर सुनाया करती थीं कि जब वह साईकिल पर मेडीकल कालेज की तरफ़ जा रही होती तो लोग अकसर कह देते .......वह देखो कलयुग जा रहा है। और इस तरह के किस्से सुनाते सुनाते वह खूब हंसती थीं....बड़ी खुशमिज़ाज औरत थीं...अकसर मैंने देखा कि मेरी मां को खाने-पीने के बारे में कुछ बातें समझाया करती थीं ...और बात इतनी साफ़ करती थीं कि एक बार जब मेरे फूफा जी हमारे यहां आए तो जाते वक्त मेरी मां को अलग से कह कर गईं कि उस की चादर और तकिये का कवर अलग से गर्म पानी में ज़रूर धो लेना (फूफा जी को कोई चमड़ी रोग था...) ....

मेरे फूफा जी की बहन की शादी भी एक डाक्टर से हुई थी और उन के ससुर भी अविभाजित पंजाब में एक नामचीन डाक्टर थे ....इस डाक्टर दंपति के शायद पांच-छः बच्चे थे ....सभी डाक्टर ...जो सीधे सीधे अपनी मेरिट के आधार पर बन गए, सो बन गए ...लेकिन जो नहीं बन सके ...उन को डोनेशन के जादू से देश के विभिन्न हिस्सों से एमबीबीएस करवा ली गई....

उन दिनों (साठ-सत्तर के दशक) में इस तरह से डोनेशन देकर मेडीकल दाखिला लेना कोई बड़ी बात नहीं थी...पैसा फैंकों तमाशा देखो वाली बात ....उस के बाद उन सब बच्चों ने अलग अलग स्पैशलिटी में पीजी भी कर ली....पैंचो कान पक गए थे यार यह सुन सुन कि उस घर में ४९ डाक्टर हैं....जब भी रिश्तेदार एक जगह इक्ट्ठे होते (पहले यह इक्ट्ठा होने के मौके भी कुछ ज़्यादा ही होते थे ....अब तो लोग ......चलो, छोड़ो)....तो वही गिनती ....यह डाक्टर दंपति, उन के चार लड़के डाक्टर, उन की बहुएं डाक्टर ....और आगे उन के बच्चे भी डाक्टरी कर रहे थे या कर चुके थे ....पूरी प्लॉनिंग के साथ ...उन के घर में सारी स्पैशलिटी थीं .....कितने कहा मैंने ४९ डाक्टर .....फिर १९८० के दशक के बाद की कोई गिनती मेेरे पास नहीं है, लेकिन उन के अस्पतालों की लिस्ट बहुत बड़ी है ....(अस्पतालों के नाम और शहर मैं नहीं लिखना चाहता...) 

चलिए, भाई के बारे में आगे बताता हूं....उसने बीएससी में दाखिला ले लिया ....प्री-मैडीकल के अपने नंबरों के स्कोर को सुधारने का भी एक विकल्प तो होता था ..लेकिन हम लोग इतने चुस्त-दुरुस्त नहीं थे ..खैर, बीेएससी करते करते यह बात सामने आ गई कि अगर बीएससी में फर्स्ट डिवीज़न आ जाए तो उस का चार प्रतिशत का वेटेज मिलेगा ...यानि ६२.५ में चार प्रतिशत जमा हो कर ६६.५ प्रतिशत हो जाएंगे ....फर्स्ट लेना उस के बाएं हाथ का खेल था ..लेकिन इतना तो मुझे भी याद है कि वह घर में आकर बिल्कुल नहीं पढ़ता था ...और वही हुआ जिस का डर था ...कुछ ही अंकों से वह फर्स्ट डिवीज़न न ले पाया........एक बार फिर घर में मातम का माहौल पसर गया ....पैंचो घर में दूसरे लोगों के लिए भी कितना स्ट्रैस होता होगा .....मैं उन दिनों यही पांचवी-छठी में पढ़ता था ...पास ही के डीएवी स्कूल में। 

प्री-मैडीकल के अंकों के आधार पर ही सभी दाखिले .....

यह वह दौर था जब प्री-मैडीकल के अंकों के आधार पर ही मैडीकल और इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिले हो जाते थे ....मैं पूरी जिम्मेदारी से यह लिख रहा हूं कि उस वक्त भी ज़हीन से ज़हीन छात्र थे ...जिन का दाखिला मेरिट के आधार पर होता होगा ...ज़रूर होता होगा ...होता होगा क्या? ....होता ही था....लेकिन वह सिस्टम भी निम्नलिखित कारणों से सड़ा हुआ था ....फिर से लिख रहा हूं कि होशियार छात्रों का मेरिट के आधार पर दाखिला होता होगा लेकिन उस बीमार सिस्टम की वजह से जो छात्र मेडीकल या इंजीनियरिंग में दाखिला नहीं भी लेने के योग्य थे, वे भी किसी तरह से घुस जाते थे ....उन के दाखिले के पीछे नीचे लिखे गोरख-धंधे शामिल थे .....

ट्यूशन पढ़ो और आगे बढ़ो.....यह सत्तर का दौर ऐसा था कि जब छात्रों में प्री-मैडीकल की पढ़ाई के दौरान अपने कालेज के फ़िज़िक्स, कैमिस्ट्री वाले प्रोफैसर से ट्यूशन लेने का चलन ज़ोरों पर था ....फिर ये प्रोफैसर इन छात्रों की इंटर्नल एसैसमैंट बढ़िया भिजवाते और प्रैक्टीकल में भी बहुत अच्छे नंबर लगवा देते....

आप देखिए...प्री-मैडीकल की परीक्षा के आधार पर आप का दाखिला आगे होना था ...साठ नंबर की थ्यूरी, ३० नंबर का प्रैक्टीकल और १० नंबर की इंटर्नल एसैसमैंट --- जो भी प्रैक्टीकल एग्ज़ाम के लिए बाहर से प्रोफैसर आता...वह कहने को ही वहां पर होता क्योंकि इन तीस नंबरों में इंटर्नल प्रोफैसर की ही चलती ....(और यह रेसिप्रोकल अरेंजमैंट होता ...जब यह एक्सटर्नल बन कर बाहर जाता, तब यह भी वहां पर किसी सैटिंग को चेंज करने की कोशिश न करता).....इसी चक्कर में ट्यूशन पढ़ने वाले छात्रों के, शहर में किसी भी तरह का रसूख रखने वाले लोगों के बच्चों के, शहर के नामचीन डाक्टरों, प्रोफैसरों आदि के बेटी-बेटों को इन चालीस अंकों में से कितने मिल जाते होंगे......आप कल्पना करिए, मैं आगे चलता हूं....

बाकी रह गए , साठ अंक .....आज अगर दुनिया इतनी शातिर है, तकनीक इतनी उन्नत है, तब भी नीट का यह हाल है तो उस दौर में बाकी साठ अंकों वाले थ्यूरी पेपर की क्वेश्चन पेपर की सेटिंग या पेपर की चेकिंग में सब कुछ ठीक से चलता होगा, इस के बारे में तो हम ने सोचा ही नहीं। चलिए, अगर सब ठीक भी होता हो तो भी जिसे चालीस में से ३८ मिल गए ....उस का तो स्टार्टिंग प्वाईंट ही आगे हो गया....बढ़िया .......

इस तरह की धांधलीयां इस सड़े-गले सिस्टम में थीं ....रसूख वाले, रुतबे वाले अकसर प्री-मैडीकल की परीक्षा में अच्छे नंबर पा लेते थे .....(फिर से लिख रहा हूं कि अपने बलबूते पर अपनी काबिलियत पर अच्छे नंबर पा लेने वाले भी थे ...ज़रुर थे ..बेशक थे ..) लेकिन यह वाली धांधली भी पक्के तौर पर थी .....। 

चलिए, बात थोड़ी बोरिंग सी हो गई है .....एक दो डाक्टरों के बारे में और लिखें.....

एक तो डाक्टर साहब से मेरे मां के चाचा जी ..जिन्होंने साठ के दशक में श्रीनगर से एमबीबीएस की डिग्री ली ...फिर उन दिनों कोई स्टेट अपने छात्र बाहर भी पीजी के लिए भेज देती थी, उन को पीजीआई चंड़ीगढ़ में न्यूरोसर्जरी में सीट मिल गई ...कोर्स करने के बाद वह बहुत बड़े न्यूरोसर्जन बन गए, फोरन कैनेडा चले गए....जब भी उन को देखा बहुत संजीदा ही देखा...कम बोलते थे ...और मेडीकल की पढा़ई से डर पैदा करते थे ...एक बार मेरे भाई को भी उन्होंने कहा था जब वह प्री-मैडीकल में पढ़ रहा था ..कि मेडीकल में दाखिला इतना आसान नहीं होता.......बात कितनी भी छोटी क्यों न हो, लेकिन जिस लहज़े में कही जाए, उस का मतलब वैसा ही निकाला जाता है.....। वही बात किसी को मायूस कर देती है और वही बात एक आम सी बात समझ कर आई-गई हो जाती है.....सब अंदाज़-ए-ब्यां का खेल है। 

डाक्टर नं...३ ...चलिए अपने रिश्तेदार डाक्टर नं ३ से मिलवाते हैं....१९६० का दशक...पढ़ने में औसत....लेकिन उन के पापा जी के दिल की हसरत कि काके को डाक्टर ही बनाना है । ले दी एडमिशन ...ओस्मानिया यूनिवर्सिटी हैदराबाद में ...कईं सालों की रगड़ाई के बाद ...शायद सात-आठ साल बाद 

डाक्टर की डिग्री मिल गई और इस के साथ ही दिल्ली में किसी एम्बैसी के साथ जुड़ गए। जिस देश की वह एम्बैसी थी, वहां पर जिसे भी अगर जाना होता तो उन के मेडीकल की औपचारिकता वह ही करते ....सप्ताह में एक दो दिन तो पूर व्यस्त रहते ....सोमवार और शायद एक दिन और था ...इन दिनों उन के पास हर दिन २० लोग मेडीकल फिटनेस लेने आते ....जो हमने सुना उन दिनों १९७० के दशक में हर व्यक्ति का मेडीकल करने के लिए उन को पांच सौ रुपए मिलते थे ....। इस के आगे अगर कुछ लिखूंगा तो लक्ष्मण रेखा लांघने जैसा होगा....याद सब कुछ है ....ईश्वर की कृपा से ..लेकिन लिखना उतना ही मुनासिब है जितना विषय की ज़रूरत है ....)

यह जो मैंने ऊपर सिस्टम के बारे में लिखा है कि सब कुछ प्री-मैडीकल के अंकों के आधार पर ही चलता था ...और पंजाब की बात करूं तो यह व्यवस्था १९७९ तक चलती रही.......दूसरे प्रांतों का मुझे कुछ पता नहीं ...लेकिन पंजाब में १९७९ के बाद क्या हुआ......इंतज़ार कीजिए अगली पोस्ट में पढ़ने के लिए ....जिस में आप यह भी पढ़ेंगे कि डेंटल कॉलेज में मेरी एंट्री कैसे हुई .....😄..

फिलहाल यह एक बढ़िया सा गीत सुनिए....बेचारा दिल क्या करे...सावन जले, भादों जले.....


रविवार, 17 मई 2026

यह उन दिनों की बात है ......जब बर्फी के लिए मन बहुत मचलता था....


दो चार दिन पहले मेैं यू-ट्यूब पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के किसी गांव में किसी हलवाई द्वारा बर्फी बनाने की व्हीडियो देख रहा था ....एक बहुत बड़ी लोहे की कड़ाही में दूध के उबालने से सुबह शुरु हुई कईं घंटे चलने के बाद यह तपस्या शाम होते होते खत्म हुई...वह बता रहा था कि खालिस बर्फी इसी तरह से बनती है ...और अगर चालू किस्म की बर्फी बनानी है, वह तो दिन में तीन बार भी बन रही है।

मुझे उस हलवाई की बात पर पूरा यकीन है ...क्योंकि हम भी बचपन में आज से 50-55 साल पहले इस तरह के बर्फी तैयार होने के मंज़र के चश्मदीद गवाह रहे हैं...1970 के कुछ वर्ष इधर और कुछ उधर ....उन दिनों मुझे ऐसा ही एक हलवाई याद आता है ...अमृतसर के हरीपुरे में उस की दुकान थी ....उस के साथ ही एक नाई की दुकान थी ...जहां पर मैं अकसर शाम के वक्त अपने पिता जी के साथ अपनी हजामत करवाने जाता था ....उस्तरा और मशीन उस की ऐसी थी जैसे की बाल काट न रहा हो, नोंच रहा हो .....कईं जगह से चमड़ी कट जाती थी और उस के ऊपर उन के ऊपर उसने फिटकड़ी भी ज़रुर लगानी होती थी ...कटे पर नमक छिड़कने वाली बात बिल्कुल ....मैं ज़ोर ज़ोर से रोने लगता....पचास पैसे में हजामत हो जाती थी ...यह भी मुझे याद है ...

मुझे शांत करने के लिए उसी वक्त मेरे पिता जी मुझे उस हलवाई की दुकान पर ले जाते ...उस वक्त उस की बनाई हुई ताज़ी ताज़ी बर्फी ट्रे में पड़ी होती। मुझे भी एक लिफाफे में बर्फी दिलवा दी जाती ....छोटे छोटे हाथों में 50-100 ग्राम बर्फी का लिफाफा भी बहुत बड़ा जान पड़ता है ....बस, उस बर्फी के एक टुकड़े को मुंह में डालते ही मैं रोना-धोना भूल जाता ....और यह बर्फी 75 पैसे की या 1 रुपए की हुआ करती थी....

हां, तो मैं अमृतसर के उस हलवाई की बात कर रहा हूं ....वह कईं घंटों तक कोयले की भट्ठी पर एक बहुत बड़़ी कड़ाही में दूध डाल कर उस को उबालते वक्त एक लंबा सा कड़छा लगातार चलाता रहता....यह ज़रूरी थी, वरना दूध जल सकता है। आज सोचता हूं कि उस वक्त लोगों में सब्र कितना होता था ...वह एक बुज़ुर्ग था जिसने सफेद सूती धोती, कमीज़ पहनी होती और सिर पर एक ढीली-ढाली सुूती सफेद रंग की पगड़ी रखी होती थी....लेकिन जब भी वह दिखा, मुस्कुराता ही दिखा ....हर तरफ़ के नज़ारे देखता हुआ....

हां, मैं जब यह 55-60 साल पुरानी बातें लिख रहा हूं तो पूरे विश्वास से यह भी लिख रहा हूं कि उन दिनों सभी हलवाई की दुकानों पर ही बर्फी इस तरह से बनती थी ...कोई शार्ट-कट नहीं था, मिलावट का नामोनिशां न था...लोगों में सब्र था ...

वाली जिस बर्फी की मैं बात लिख रहा हूं वह ऐसी थी कि जैसे मुंह में रखते ही घुल जाती थी और उस का ज़ायका ...उस से निकलने वाली खुशबू...और बड़ी इलायची की महक ..वाह, क्या खूब....वैसे बचपन वाली बर्फी कभी फिर नहीं मिली ....न ही कभी मिल सकती है और न ही कभी मिलेगी....वे दिन ही लद गए...और उन के साथ वे लोग भी ...

शादी ब्याह में हलवाई बर्फी तैयार करते थे ....

मुझे याद है मेरे ताऊ जी की बेटी की शादी थी हरियाणा में ...जब हम लोग वहां पहुंचे तो हलवाई तरह तरह की मिठाईयां बना रहे थे ..यह भी 1970 के आस पास की बात है ....क्या बना रहे थे हलवाई...मठ्ठीयां, शक्कर पारे, गुड़पारे, बूंदी, बूंदी के लड़्डू और बर्फी ....और हमने देखा कि तीन चार चारपाईयों पर साफ सुथरा कोई कपड़ा डाल कर ये ताज़ी ताज़ी तैयार हुई मिठाईयां पड़ी हैं....हमें सिर्फ लड्डूओं और बर्फी में रूचि थी ...और हम जितने भी बच्चे थे खेलते खेलते उन चारपाईयों से जितनी बर्फी और लड़्डू लपेट सकते थे, लपेटते रहे ....न किसी ने कभी रोका, न टोका...। और वह बर्फी भी बहुत लज़ीज....रंग बिरंगी ...चाकलेट का हमने तो नाम नहीं सुना था ..लेकिन कोई कोई बर्फी का टुकड़ा भूरे रंग का भी होता था .....इस बर्फी-लड्डू के चक्कर में भी उन दिनों शादी ब्याह में जाने का इंतज़ार रहता था ...

जहां तक मुझे याद है कुछ ही बरसों बाद शादीयों में यह बर्फी तैयार होना बंद हो गई ...शायद उस के बाद जिन शादियों में मेरा जाना हुआ, वहीं पर बंद हुआ होगा ...लेकिन फिर भी शादी के घरों में हलवाई आ कर बाकी सब चीज़ें जैसे मठ्ठीयां, बूंदी, लड्डू और शक्कर पारे तो तैयार करते ही थे ...बस,बर्फी नहीं तो न सही, क्या करते ...हम बूंदी, लड्डू पर ही मौज कर लिया करते 😄 ....

बर्फी के दाम ....

मैं जिस पाकिस्तानी व्हीडियो की बात कर रहा था ...जिस में बर्फी तैयार हो रही थी ....मैंने वह पूरी देखी तो समझ में आया कि बीस किलो बढ़िया दूध से चार किलो खोया तैयार होता है ..और उसमें दो किलो चीनी पड़ती है ...इस का मतलब यह कि बीस किलो दूध से छः किलो बर्फी तैयार हो जाती है .....

पहले भी मैंने लिखा है कि आज से 50-60 साल पहले तक बर्फी इसी तरह से तैयार होती थी ....जैसे कि इस व्हीडियो में दिखाया गया है ....किसी मेहमान के आने पर भी समोसे-जलेबी,बर्फी ले कर आते ही थे ...कितनी? ...यही कोई एक पाव किलो ...लेकिन मज़ा आ जाता था उन दिनों एक दो टुकड़ी बर्फी खाने के बाद भी ....

बर्फी मैं अभी भी कभी कभी खा लेता हू्ं....मुझे विश्वास होते हुए भी अब वह पहले जैसी शुद्ध बर्फी नहीं है, फिर भी खा लेता हूं....ढीठ हूं ...अब मैंने बर्फी के ऊपर यह सब आज क्यों लिख दिया ....क्योंकि असल बात तो अभी लिखनी है ....

पता नहीं आप क्या सोचते होंगे आज कल जो बर्फी मिल रही है ...ब्रांडेड हो या किसी खानदानी हलवाई की दुकान से मिल रही हो ....दूध से और पुरानी प्रक्रिया से होकर तो बनने से रही .........

इसलिए मैंने वह व्हीडियो देख कर गूगल से पूछा कि एक किलो बर्फी तैयार करने के लिए कितना दूध लगता है? ...बिल्कुल सही बताया उसने कि चार-पांच किलो दूध से एक किलो खोया तैयार होता है....

लेकिन मज़े की बात यह कि उस सर्च के नतीजों में नीचे यह भी लिखा हुआ था ......



शार्ट-कट्स ....

हम आज कल जो भी बर्फी खा रहे हैं वह इन शार्ट-कट्स से तैयार हो रही है ....क्योंकि दूध को उबालने के चक्कर में कईं घंटे लग जाते हैं...आज की आधुनिक रैसिपी यही है कि ७५० ग्राम खोया लेकर उस में शक्कर मिलाओ, कुछ खुशबू मिलाओ और एक किलो बर्फी तैयार.....(खोये की मिलावट और नकलीपन की कितनी खबरों से अखबारें भरी रहती हैं...., बस इस का ज़रा ख्याल कर लें...)...

मिल्क पावडर से तैयार होने वाली बर्फी ....यह तो इंस्टैंट बर्फी की रेसिपी है ....ढाई कप फुल क्रीम मिल्क पावडर में एक कप लिक्विड मिल्क डालने से १०-१५ मिनट में एक किलो बर्फी तैयार हो जाती है.....मैं ऐसा समझता हूं कि आज कल जितनी भी बर्फी ज़्यादातर बाज़ार में बिक रही है ...ब्रांडेड हो या किसी पुराने हलवाई की दुकान पर ....सब इतनी ही आसानी से बन रही है .....अगर मेरा अंदाज़ा गलत है तो नीचे कमैंट में लिखिए...........और हां, अगर मिल्क पावडर से ही तैयार हुई बर्फी हम खा रहे हैं तो क्या हम उस की शुद्धता के बारे में आश्वस्त हैं? ....मैं तो कभी नहीं होता .....यह पावडर भी तो दूध ही से बनता है ......कहां से आता है इतना दूध ...कहां से कहां पर तैयार होता है इतना मिल्क पावडर की यह अन-ब्रांडेड भी खुले आम बिक रहा है ......

अपनी अपनी राय है ....मैं तो दूध और दूध से तैयार हुई चीज़ों की शुद्धता को संदेह की निगाह से ही देखता हूं और देखता रहूंगा.....इसलिए जितना कम हो, मिल्क और उस से तैयार चीज़ों को बहुत कम ही खाता हूं  ....सिर्फ़ नाम-मात्र के लिए ही कभी खा लेता हूं , लेकिन वह भी खाना नहीं चाहता..........लेकिन इस अहसास के साथ कि यह सब कितना शुद्ध , कितना अशुद्ध है, कितना मिलावटी कितना नकली है .....और हां, किसी को यह सलाह नहीं देता कि तुम लोग भी न खाओ....खुद ही पता करो और अपने खाने-पीने के फैसले भी खुद करो....

बर्फी वर्फी की तो बातें हो गई जितने मन में थी, अब वक्त है बर्फी फिल्म के इस बढ़िया से गीत को सुनने का ....इत्ती सी खुशी ....इत्ती सी हंसी....

रविवार, 10 मई 2026

दांतों से काले-पीले धब्बे दूर करने के ख़तरनाक जुगाड़...


कल लोकल ट्रेन में मेरे साथ बैठा एक शख्स इंस्ट्राग्राम पर एक व्हीडियो देख रहा था ...हैरान सा भी हो रहा था ...मेरा भी ध्यान उस तरफ़ गया तो मेरी भी आंखे खुली की खुली रह गईं...पत्थर-टाईलें लगाने वाला एक मिस्त्री अपने किसी साथी के दांतों की रगड़ाई कर रहा था ...यह देख कर तो मैं डर गया कि यह काम पत्थर-टाईलें काटने वाली मशीन से किया जा रहा था ....

जब मैंने उस व्हीडियो को अपने मोबाईल पर दो चार बार देखा ..तो अहसास हुआ कि मिस्त्री यह दांतों की डाक्टरी खड़े खड़े ही कर रहा था और एक बात कि मशीन उसने अपने बाएं हाथ में पकड़ी हुई थी...दाएं हाथ से उसने मरीज का सिर थामा हुआ था ....


इस व्हीडियो को देख कर कोई भी कांप जाए ....क्योंकि यह कल्पना डाक्टर ही कर सकते हैं कि यह काम कितना जोखिम भरा रहा होगा....मरीज़ ज़रा सी भी सिर हिला दे, या डाक्टर-मिस्त्री का ही थोड़ा सा भी हाथ हिल जाए तो उससे मुंह का क्या क्या कट-फट जाए, इस का हिसाब लगाना भी मुश्किल है ....दांतों की तो उस ने ऐसी की तैसी कर ही दी ...वह बात बाद में करते हैं...लेकिन दांतों पर जिस तरह से यह कारीगरी की जा रही है अगर यह मशीन होंठ को छू जाए तो होंठ और नाक को छू जाए तो नाक....उड़ के कहां चला जाए पता ही न चले, चीथड़े उड़ जाएं, आंख कौन सा दूर थी....

ईश्वर सब को ऐसी बुद्धि दे कि इस तरह के खतरनाक खेल न खेलें.....। 

और भी क्या क्या हैं जुगाड़ .....

बहुत से जुगाड़ हैं जो लोग दांतों पर लगे काले-पीले धब्बे मिटाने के लिए इस्तेमाल करते आ रहे हैं....लेकिन यह जो टाइल कटर से धब्बे उतरवाने वाला जुगाड़ मैंने कल पहली बार देखा...। 

टुथ स्टेन-रिमूवर ....आज से चालीस-पैंतालीस बरस पहले जब हम लोगों ने डैंटल कॉलेज में दाखिला लिया तो हमें दूसरे साल से अपने इंस्ट्रयूमेंट भी खरीदने होते हैं...उस को प्री-क्लिनिकल ट्रेनिंग कहते हैं ...जब हम लोग फैंटम-हैड पर एक साल काम करने की प्रैक्टिस करते हैं....फैंटम-हैड पर जबाड़े भी लगे होते थे और दांत भी ...हम उन दांतों में अलग अलग तरह के प्रोसिजर करते थे ....

हां, जब हम इंस्ट्रयूमैंट खरीदने जाते तो अकसर देखते कि उस सर्जीकल-स्टोर पर कांच की छोटी छोटी बोतलें रखी होतीं जिन पर लिखा होता ...टुथ स्टेन रिमूवर। हमें तब डैंटिस्ट्री की ए-बी-सी न आती थी ...लेकिन वक्त के साथ अगले एक दो सालों में हमें हमारे सीनियर्स से पता चला कि जो नीम-हकीम, झोला-छाप, फुटपाथ पर बैठे या बिना किसी डिग्री विग्री के दांतों का काम करने वाले दांतों के ऊपर से दाग-धब्बे उतारने के लिए इस लिक्विड का उपयोग करते हैं ...और जो अहम् बात पता चली कि इस तरह का काम भयंकर है ...क्योंकि इस में एसिड मिला होता है ...जो दांतों का दाग तो क्या, उस की बाहरी परत इनैमल भी खरोंच डालता है ....

मरीज़ का हाल? - मरीज़ का हाल यह कि वह उस वक्त तो खुश लेकिन इनैमल उतर जाने से उस को ठंडा-गर्म लगने लगता है और कुछ ही दिनों में वे दाग पहले से भी बदतर रूप में फिर से लौट आते हैं...बाकी रही बात मरीज़ को बातों में उलझाने में, वह झोला-छाप से बढ़िया कौन जानता है। वैसे तो कोई वापिस आएगा ही नहीं शिकायत लेकर ...क्या क्या नहीं चल रहा फुटपाथों पर या फर्जी डाक्टरों के अड्डों पर ....। मुझे यकीं है अभी भी ये टुथ-स्नेर रिमूवर ज़रूर मिलते होंगे ....। 

रेती से घिस देना....

इन सभी बरसों में कभी कभी ऐसे मरीज़ भी आए कि जिन्होंने अपने आगे के दांतों से दाग-धब्बे दूर करने के लिए रेती का इस्तेमाल कर लिया....हमें पता तब चलता जब दांतों पर गहरे गड्ढे दिखते और पूछने पर पता चलता कि यह तो दांतों को रेती से घिसने से हुआ है ....इस में भी वही, दांत की बाहरी परत घिस जाती है और वही ठंडा-गर्मी और दाग-धब्बे बद से बदतर हो जाते हैं। 

दाग-धब्बे मिटाने वाले पावडर....

अकसर बाज़ारों में देखते रहे हैं कि चूहे, खटमल मारने वाली दवाई, मच्छर भगाने वाली दवाई बेचने वाले यह दांतों के इलाज की सेवा भी करते हैं, एक पैकेट तीस-चालीस रुपए का बेचते हैं ...साथ में लाउड-स्पीकर पर एनाउंसमैंट कि अब पान-गुटखे के धब्बों को खुद ही साफ करें। एक पैकेट इन्होंने खोल रखा होता है ...अगर कोई ट्राई करना चाहे तो खुशी से करे ....उस का कोई पैसा नहीं....

यहां भी वही लफड़ा है कि इस पावडर में भी वही एसिड होता है जो दांतों पर कहर बरपा देता है जैसा मैंने ऊपर लिखा है ...यह काम तो हम लोगों ने बस-अड्डों पर भी और बसों में भी होते देखा है ...। 

दाग-धब्बे दूर करने वाली मोबाईल ट्राली.....

पता नहीं आपने देखा है कि नहीं, मैंने तो आज से लगभग १०-१५ बरस पहले लखनऊ की एक मार्कीट में कुछ युवक एक ट्राली लेकर चलते देखे ...जो दांतों से दाग धब्बे उतारने का काम कर रहे थे ...उस के बाद तो मैंने बहुत जगह ये कारीगर देखे हैं....आखिरी बार जब इन को देखा था तो ये दाग-धब्बे दूर करने के चालीस रुपए लेते थे...अब पता नहीं....और हां, इन का भी मोडस-ओप्रेन्‍डाई वही ....वही कोई स्टेन-रिमूवर लिक्विड लेकर अपने पास रखे औज़ारों से दांतों पर लगा देते हैं....यहां स्नेर-रिमूवर के लिक्विड में एसिड के रोने के साथ साथ दूषित औज़ारों से होने वाली भयंकर बीमारियों का भी भरपूर जोखिम ...। 

लेेकिन यह दाग होते क्यों हैं दांतों पर .....

दो तरह के दाग होते हैं दांतों पर ....

बाहरी और अंदरूनी ...

बाहरी दाग धब्बे ....

ये होते हैं ब्रुश ठीक से न करने पर ...या कुछ खाने-पीने की चीज़ों की वजह से होते हैं और गुटखा, पानमसाला तंबाकू की वजह से भी ये  बाहरी दाग धब्बे - बाहरी इसलिए कहते हैं क्योंकि ये दांत की सतह की ऊपर होते हैं....और सामान्य तौर पर ये आसानी से छूट भी जाते हैं ...किसी डेंटल क्लीनिक पर जा कर आप को स्केलिंग करवानी होगी ....और वह खाने-पीने की आदत छोड़नी होगी ताकि फिर से न हो यह सब कुछ .....लेकिन आदतें तो कम ही छूटती दिखी हैं मुझे ....वारिस शाह न आदतां जांदीयां ने, चाहे कट्टो पोरियां पोरियां जी ......

देखने में चाहे जितने भी खराब लग रहे हैं, लेकिन ये भी बाहरी दाग ही हैं....जो तंबाकू, पान वान की वजह से हैं.. ७० बरस का यह मरीज़ दो चार दिन पहले आया था ...मैंने कहा कि ये आदतें छोड़ दें, हम यह सब कालिख हटा देंगे, कहने लगा कि पान इस उम्र में कहां छूट पाएगा, क्या फर्क पड़ता है ...!!


अंदरूनी दाग-धब्बे ....

इस का सब से बड़ा कारण है ....फ्लोरोसिस....जिन इलाकों में पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा रहती है उस इलाकेे में रहने वालों की हड्डियों में भी कुछ जटिलताएं आ जाती हैं और दांतों पर भी पीले-भूरे दाग हो जाते हेैं....जैसे ही ये पक्के दांत मुंह में आते हैं उन पर इस तरह के पीले-भूरे दाग नज़र आते हैं...और यह अकसर बहुत से दांतों में देखे जाते हैं....चूंकि ये दांत के अंदर होते हैं, इसलिए ये स्केलिंग से नहीं जाते ....और इन के लिए भी रेती, और स्टेन-रिमूवर जैसे तरह तरह के जुगाड़ इस्तेमाल किए जाते हैं ....लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता ...पड़ सकता भी नहीं...

इसके लिए भी प्रशिक्षित दंत चिकित्सक को दिखाना चाहिए ....वह अपने अनुभव से यह फैसला करता है कि क्या ये ब्लीचिंग से ठीक हो जाएंगे, या इन के ऊपर कोई दांतों के कलर की कोई फिलिंग (जैसे कंपोज़िट) कर दी जाए...दाग को छिपाने के लिए.....(उसे थोड़ा सा घिसने के बाद)....या फिर अगर पोर्सिलेन-लैमीनेट की ज़रूरत हो तो मरीज़ को बता दिया जाता है ...

सरकारी अस्पतालों में ज़्यादा से ज़्यादा कंपोज़िट फिलिंग या कंपोज़िट-लेमीनेट तक ही इलाज हो पाता है ...और वह भी कितने लोगों को मिल पाता है या कितने लोग इतने बड़े अस्पतालों तक पहुंच कर यह काम करवा पाते हैं ....यह भी एक मुद्दा है .....। इसलिए लोग फिर जुगाड़ की तरफ हो लेते हैं....। 

टाइल कटर वाली घिसाई और दंत चिकित्सक द्वारा की जाने वाली घिसाई ....

टाइल कटर वाली घिसाई के तो जोखिम की बात ही क्या करें....लेकिन दंत चिकित्सक भी जो इस तरह के दांत की फिलिंग से पहले थोडी़ बहुत घिसाई करता है, वह हर तरह की सावधानी बरतता है ....सब से पहला लक्ष्य उस का यही होता है कि कुछ भी हो, मरीज़ का कुछ परेशानी नहीं होनी चाहिए, उस की तकलीफ नहीं बढ़नी चाहिए, इसीलिए जब हम लोग एयर-रोटर (हाई-स्पीड टर्बाइन) को  दांतो पर चलाते हैं तो हम पूरी तरह से सचेत रहते हैं....लगातार पानी का जेट चलता रहता है, और मरीज़ को यह पहले हिदायत दी जाती है कि जब यह मशीन चल रही हो तो हिलना-ढुलना नहीं है, अगर मशीन रुकवानी है तो हाथ से इशारा कर देना, हम रुक जाएंगे.....और एक ज़रूरी बात , दंत चिकित्सक को कालेज ही से इतना पक्का कर दिया जाता है कि दांत के ऊपर रखने के बाद ही उस मशीन को चालू करना है और दांत पर ही बंद करने के बाद उसे बाहर निकालना है ....।इतनी सावधानी के बावजूद भी कभी कभी जब कोई ज़्यादा हिल-ढुल करने वाला बंदा सिर हिला देता है और अगर वह ड्रिल थोडा़ सा होंठ को भी छू जाए तो रक्त बहने लगता है ..उस जगह को दबाने भऱ ही से रुक जाता है, दो मिनट में....कोई परेशानी नहीं होती और हां, कईं बार दंत-चिकित्सक के हाथ में वह चुभ जाती है ....। मतलब यही कि बेहद सचेत रह कर काम करना पड़ता है ...इसीलिए जब से वह टाइल-कटर को अपनी बड़ी सी मशीन से दांतों की रगडाई करते देखा तो बहुत बेचैनी महसूस हुई ....इसलिए यह बात लिख दी ...........अब कौन यह सब पढ़ेगा ....इंस्टा वाली उस की पोस्टों तो लाखों-करोडो़ं ने देखी होगी ....लेकिन इस लेख को कौन पढ़ेगा, कौन शेयर करेगा....चलिए, जो मुझे मुनासिब लगा मैंने लिख दिया.......आग बुझाने वालों में नाम तो शामिल हो जाएगा मेरा ......

कोई सवाल हो तो नीचे कमैंट में लिखिए....जवाब ज़रूर दूंगा....

लिखते लिखते मो रफी साहब का पंजाबी गीत याद आ गया....१९५९ की पंजाबी फिल्म थी ...सफेद दांत हंसने से बाज़ नहीं आते ...और लोग बेकार में शक करने लग जाते हैं... जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो जालंधर रेडियो स्टेशन से यह गीत शाम को बहुत बार बजा करता था ...


बुधवार, 1 अप्रैल 2026

ऐसे कैसे मंद पड़ जाती अंगीठी की आंच ....


पिछली पोस्ट अंगीठी पर लिख कर मैंने सोचा कि अब आगे चला जाए...लेकिन जो मुझे वाट्सएप पर मैसेज आए या जो पाठकों-मित्रों ने कमैंट लिखे....उस से मुझे लगा कि अभी अंगीठी की आग को मंद करने का वक्त नहीं आया....एक मित्र ने लिखा कि उन की मां ठिठुरती सर्दी में उन को स्कूल जाने से पहले बाजरे के पुअे बना कर खिलाती थीं....बस, फिर क्या था, हमारी भी बहुत सी यादें ताज़ा हो गईं ...जिन को लिखे बिना अंगीठी पर चर्चा तो अधूरी लगती....। इसीलिए अंगीठी पर यह अगली पोस्ट ....तंदूर, चूल्हे, कांगड़ी को बाद में देखेंगे फिर कभी ...

एक बात है कि ब्लॉग लिखते वक्त कंटैंट में कोई तरतीब नहीं बन पाती...जो जैसे याद आता गया, लिखते रहते हैं...मैं तो बिल्कुल ऐसे ही करता हूं ...शायद यही तो अपनी डायरी की यूएसपी है ..है कि नहीं? चलिए...शुरु करते हैं ....

सुबह स्कूल जाते वक्त नहाने के बाद पैर ठंडी की वजह से एकदम सुन्न पड़े होते तो जुराबें पहनने से पैरों को भी  अंगीठी के ऊपर थोड़ा सेंक लेते ...पैर गर्म होने पर ही जुराबें पहनते....मैंने अपने पिता जी को अकसर ऐसे करते देखा...। 

बाजरे के पुअे से ख्याल आया कि सारे परिवार का एक जबरदस्त मीटिंग प्वाईंट रसोईघर ही होता था जिसमें अग्नि देवता अंगीठी के रूप में बिराजमान होते थी...उस के आस पास सब नीचे बैठे होते ...आगे की तरफ़ हाथ फैलाए, आग तापते ...कभी किसी का हाथ आगे पहुंच जाता, कभी दूसरे का ..तब तक पहले वाला अपने हाथों को आपस में रगड़ लेता...यह सिलसिला एक दम चलता तो बस फिर वहां से उठने का मन ही न करता किसी का ...फिर मां का डॉयलाग....बस, अग्ग दे सामने एक बार बैठ जाओ तो आलस ऐसे जकड़ लेता है कि ....। लेकिन वहां से उठता फिर भी न था...इधर-उधर सारे जहां की बातें, हंसी मज़ाक.....परिवार का असल मीटिंग-प्वाईंट...जहां सब लोग दिल खोल कर बात करते थे ...जो नहीं करता था, उस का पता लग जाता था....। 

रात के खाने के बाद -

यही कोई आठ -साढे आठ बजे तक उन दिनों सब का खाना खत्म हो जाता था ...क्योंकि खाने के बाद सोना ही होता था, न टीवी न टेपरिकार्डर --- रेडियो कभी कभी ८-९ रात में लगाने की कोशिश सफल हो जाती थी ....खैर, अंगीठी के पास बैठे बैठे जब खाने की आइटम खत्म होती तो फिर शुरु होता मूंगफली, रेवड़ी का दौर....कभी कभी मूंगफली वाली गज्जक भी मिल जाती....तिल वाली गज्जक तो हमें तभी खाने को मिलती जब किसी का रोहतक से आना जाना होता....क्योंकि हमें यही पता था कि यह गज्जक केवल रोहतक ही में तैयार होती है ....

और हां, सर्दी के दिनों में अमृतसर वासियों की एक खास मिठाई...भुग्गा.....खोए से बनता था, उस के बीच किशमिश खूब हुआ करती थी....मेरी बड़ी बहन की यह सब से पसंदीदा मिठाई थी ....और मेरे पिता जी यह अकसर अमृतसर के लाहौरी गेट बाज़ार से लाते थे ....


अंगीठी की आग मंद पड़ने पर तो मेरी बहन कभी कभी उस में छोटे छोटे आलू (पंजाब में उसे शरला आलू कहते थे, दूसरी जगहों का मुझे नहीं पता)..दबा देती और कुछ वक्त बाद निकाल कर उसे खाती….उसे यह सब करने में बहुत मज़ा आता था और हमें उसे यह करते देख कर ….उस की देखा-देखी हम भी १-२ आलू खा लेते, मज़ा आता….लेकिन बहन के तो ये फेवरेट थे …कोई चटनी नहीं, कोई नींबू नहीं…हां, थोड़ा नमक जरूर एक हाथ में रख लिया करती थीं….बस, उन के पतले पतले छिलके (जो आसानी से उतर जाते थे)..उतारो और खाते जाओ। कभी कभी अंगीठी पर छोलिए (हरा चना) की शाखाओं को भी भून कर उन का आनंद लिया जाता…इसी छोलिए से मुझे याद आया …बात से कैसे बात याद आ जाती है ….अभी कुछ अरसा पहले मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गया था ….वहां छोलिये की खेती बहुत ज़्यादा होती है…जहां देखो छोलिया बिक रहा था….हाट में, मेले में, बाज़ार में, साईकिल पर, रिक्शा पर छोलिया बिक रहा था…लोग १०-१० रुपए की छोलिए की डंडी लेकर बड़ी चाव से खा रहे थे …वाह! बहुत खूब..खाने की एक सेहतमंद आदत….

मां के हाथों से परोसी हुई एक थाली ...

जब कभी अंगीठी की आग बिल्कुल मंद पड़ने लगती तो मन में थोड़ी उदासी सी छा जाती कि अब यहां से उठना पड़ेगा....वैसे जब आग पूरी ठंड़ी पड़ जाती तो ऐसे लगता जैसे ...Time to wind up!! Pack up, Guys!! Pack up!! जैसे अंगीठी ही ऐलान कर देती ...बहुत हो गया, चलो, अब उठ भी जाओ, निकम्मो....जाओ, अब मुझे भी थोड़ा आराम करने दो ...और तुम लोग भी अपने किसी काम-धंधे में लगो…मुझे तो सुबह फिर से तुम लोगों के लिए तपना होगा….जाओ, अपनी रज़ाईयों में घुस जाओ जा कर…

अमृतसर में दिसंबर से फरवरी के महीने बेहद ठिठुरन से भरे होते थे …अभी भी होते होंगे ..पता नहीं, क्यों कि जब हाल फिलहाल में वहां गया ही नहीं तो किस भरोसे से लिख दूं…!!

रात के खाने के बाद ….लिखने लगा था मैं डिनर के बाद …लेकिन जब ऐसा कोई लफ़्ज़ हम लोगों ने बचपन क्या और जवानी क्या ..हमने इस्तेमाल ही नहीं किया तो कैसे लिख दूं….यह खाना वाना भी हम नहीं कहते थे …पंजाबीयों का एक ही लफ़्ज़ होता है लंच, डिनर के लिए और वह है रोटी खा लओ बई…रोटी तैयार है….मुझे हमेशा ही से यही अच्छा लगता है …दुनिया भर का सारा अपनापन इस में गूंथा पड़ा है …और हां, कभी किसी पंजाबी घर में यह भी कहां सुनने को मिलता था …(अब, पता नहीं, दुनिया बदल गई है बहुत ..खामखां की बनावट और दिखावे का हर तरफ़ बोलबाला है).....नाश्ते के लिए अकसर यही सुना जाता ….आ जाओ, पराेंठे बन गए ने, गर्मागर्म ने…खा लओ…

खैर, रात के खाने के बाद आम तौर पर एक-डेढ़ घंटे ऐसे ही बीत जाते थे …अंगीठी के इर्द-गिर्द…हां, कभी इ दौरान गाजर का हलवा उसी अंगीठी की धीमी पड़ रही आंच पर पकता रहता…और उस में बेसन डाल कर भूने जाने का इंतज़ार भी रहता…बस, उस की मदहोश कर देने वाली बेहद खुशनुमा खुशबू अब भी जस की तस अपने अंदर संभाल कर रखी हुई है …

हमारे सोने के बाद अंगीठी कितना आराम फरमा पाती ?

नहीं, नहीं, अकसर आराम उस के नसीब में लिखा ही न था…अंगीठी के इर्द-गिर्द बैठे बैठे जब थक गए, जम्हाईयां आने लगीं , जहां भर की जितनी ऊट-पटांग बातें होनी थीं, हंसी मज़ाक होना था ..सब कुछ हो गया …तो घर के सभी बाशिंदे बारी बारी से वहां से उठने लगते और जा कर रज़ाई में दुबक जाते …(उस वक्त शरीर इतना गर्म हो चुका होता कि बाहर आंगन में लघुशंका के लिए जाने में भी आलस आता …कौन जाए इतनी ठंडी में, इतने कोहरे में, ओस में …., इसलिए कईं बार उसे जितना हो सकते रोके रखते….)...

अकसर आखिर में मां अकेली रसोईघर में रह जाती …आखिर में एक चुल्लू भर पानी फेंक कर अंगीठी बुझाने का काम भी उसी के सुपुर्द था….और कईं बार अंगीठी के आखिरी वक्त में मां को ख़याल आता कि अभी तो आंच है, सेक अभी बाकी है …इसे इस तरह बुझाना बुरा लग रहा है…तभी सोने से पहले मां एक पीतल की या मिट्टी की हांडी (पंजाबी में उसे कुन्नी कहते हैं..)...में कोई दाल उस पर चढ़ा देती ..और सुबह तक वह एक दम तैयार हो चुकी होती ..और फिर तड़का मार कर वही दाल खाते वक्त हम उंगलियां चाटने लगते….बिल्कुल सच लिख रहा हूं….ऐसा ही होता था। 

भोर होते ही फिर से अंगीठी की शामत ….

अंगीठी के मुकद्दर में कितना आराम लिखा था, यह तो आपने ऊपर देख ही लिया…और सुबह होते ही, मुंह अंधेरे ही उस की सारी राख एक लोहे की सीख (पतली छड़ी टाइप, आगे से थोड़ी टेढ़ी की हुई….क्योंकि सीधी उंगली से घी से नहीं, सीधी छड़ी से राख भी नहीं निकल पाती…)...से निकाल कर फिर से उसे जलाने का प्रोजैक्ट शुरु हो जाता ….कईं बार तो यह सुबह शुरु होने वाले प्रोजेक्ट का आगाज़ मां रात ही में पूरा कर के सोती…बस कुछ तैयार कर के …बस, सुबह एक उसे माचिस की तीली (दियासिलाई) का इशारा ही करना होता ….सभी तहें (लेयर्स) उपले, लकड़ीयां, कोयला…सब कुछ रात में ही तैयार कर दिया जाता ….जस्ट रेडी-टू-गो….।

ठिठुरती, हाड-तोड़ ठंडी में, ओस, कोहरे वाले मौसम में अंगीठी का जलना नामुमकिन सा होता….लेकिन कोई ग़म नहीं …स्टैड-बॉय स्रोत तैयार होता …मिट्टी के तेल से जलने वाला स्टोव ….। 

अंगीठी ठंडी पड़ने पर उस से निकली राख का क्या? 

इस राख को बर्तन मांजने के लिए इस्तेमाल किया जाता …अधिकतर तो बर्तन पीतल या कांसे के ही होते थे, इसलिए इन को मांजने के बाद उन की चमक-दमक देख कर अच्छा लगता था….जब कभी किसी घर में राख न होती तो उसे पड़ोस से भी ले लिया जाता ….गुलज़ार फ़रमाते हैं पड़ोसी के चूल्ह से आग ले ले ….लेकिन चूल्हे की राख तक ले लेने का चलन था, यह भी यहां दर्ज कर देना मुनासिब होगा…राख न होेने पर घर में बर्तन सफाई सेविका जगिन्दरो ..हंगामा कर देती ….और हां, अंगीठी का एक और इस्तेमाल…जगिन्दरो आते ही एक बड़े पतीले में पानी डाल कर अंगीठी पर रख देती और गर्म पानी से ही वह बर्तन घिसती…अपने छोटे से शिशु को अपनी गोद में, अपने शाल से लपेटे हुए….बहुर भली थी जगिन्दरो…बड़ी मेहनत…मेरी मां से उस की बहुत बनती थी …उस के आते ही पहले तो मां उस के लिए चाय रख देती ….सभी बहुत मधुर यादें हैं…मैं और मेरी बड़ी बहन अकसर ये सब बातें कभी कभी याद करते हैं…. 

रोज़ाना कैंप-फॉयर का मज़ा …

लोहड़ी के दिन बाहर आंगन में, मोहल्ले में कैंप फॉयर होती थी ..लोहड़ी मनाई जाती थी…वह ठीक है, एक रस्म अदायगी रह गई है अब तो ….लेकिन यह जो हर दिन अंगीठी के आस पास बैठ कर सारा कुनबा कैंप-फॉयर की मौज लेता था …वह कैंप-फॉयर बाद में कहां दिखती…। और न ही एक साथ बैठ कर इस तरह से कैंप फिर दिखे …क्योंकि कुकिंग-गैस के चूल्हे आने से धीरे धीरे न नीचे बैठने की ज़रूरत रही न ही आदत, इस के चलते आने वाली पीढ़ीयों में घुटनों में ताकत भी जाती रही ….और फिर इस तरह से अंगीठी के आस पास बैठने की रीत लुप्त ही हो गई…..मैंने ऊपर लिखा कि मैं तो शहरों की बात दर्ज कर रहा हूं….शायद दूर-दराज गांवों में अभी भी कुछ तो रीतियां बची हुई होंगी….पता नहीं…. क्योंकि किसी बड़े नेता के किसी दलित की झोंपड़ी में नीचे बैठ कर रोटी खा लेने से इस का सही अंदाज़ा नहीं होता, न ही हो सकता है ….ये तो शायद क्या कहते हैं बढ़िया सियासी रोटियां सेंकने का एक ज़रिया भर रह गया है …। 

अमृतसर ..१९८७, चालीस साल पुरानी लोहडी की एक केंप-फॉयर कॉलेज में ..

आज की पीढ़ी के लिए यह कैंप-फॉयर-वॉयर जैसी बातें बहुत बड़ी होंगी….इन की तस्वीरें ट्रेंडिंग होंगी, इंस्टा पर, एक्स पर ….लेकिन हमारे लिए ये बिलकुल आम बातें हैं क्योंकि हम ने अपने बचपन और जवानी में हम लोगों ने यह सब खूब जिया….इतना भरपूर कि ये बेशकीमनती यादें मेरी कलम से अपने अपने निकलती जा रही हैं….मुझे कोई कोशिश नहीं करनी पड़ रही ….। 

एक कैंप-फॉयर में पड़ गया पंगा …

उन दिनों मैं स्कूल में था …यही कोई छठी-सातवीं क्लास में …मेरे से बड़े भैया और बहन कालेज में थे …. एक रात हम सब ऐसे ही अंगीठी के इर्द-गिर्द जमा थे…अच्छे से याद है मुझे बहुत लज़ीज मीट बना हुआ था …गर्मागर्म रोटियां सिक रही थीं….ऐसे ही उस वक्त मेरे भाई-बहन में थोड़ी बहस जैसी हो गई (जो आज के दौर में एक आम बात है, उन दिनों हमारे घर में न थी….शायद मैंने पहली बार उन को आपस में इस तरह से बात करते देखा था…कोई खास बात न थी…)...इसी दौरान भाई ने बहन को कुछ ऐसा कहा कि मेरे पिता जो को गुस्सा आ गया, उसे बुरा भरा कहा …और वे उसे एक-दो झापड़ लगाने के लिए उस की तरफ़ लपके ….लेकिन इसी वक्त से पहले ही वह थाली छो़ड़, खाना बीच ही में छोड़ कर वहां से उठ गया ….यही कड़वी घटना आज तक मेरे दिलो-दिमाग में कैद है …..उन दौर में इस तरह से खाना बीच में छोड़ कर उठना..हिंदी फिल्मों में तो कभी कभार होता होगा…लेकिन असल ज़िंदगी में बहुत बुरा माना जाता था ….कईं बार अब फिल्मों में देखते हैं …कईं शानदार डाईनिंग टेबल पर खा रहे लोगों में से एक बंदा कुछ कह कर उठ खड़ा होता है और बाकी लोग खाते रहते हैं……..लेकिन उस रसोई वाले दिनों में अगर कोई मेरे भाई की तरह से उठ खड़ा हुआ तो फिर पूरा चूल्हा-चौका ही उस दिन के लिए पैक-अप….न किसी का खाने का मन हुआ और न ही मां के पकाने का …..अब लिखते लिखते मैं वे लम्हे फिर से जी पा रहा हूं…इस पंगे के अगले दिन तो सब सामान्य हो गया ….लेकिन मूड सब का खराब ही रहा ….मुझे नहीं पता मेरी बहन ने क्या महसूस किया होगा ….ज़ाहिर है उसे भी बुरा ही लगा होगा ….खैर, यह लिखना भी मैंने यहां इस लेख में ज़रूरी समझा, सो लिख दिया….अगर इसे दबा भी जाता तो अपने आप से ही झूठा पड़ जाता …

अंगीठी बनती कैसे थी ?

अब आते हैं एक रोचक टॉपिक पर …कि यह अंगीठी बनती कैसे थी …अभी फेसबुक पर एक रील दिखी…मिट्टी के गमले से एक अंगीठी बनाने की तरकीब समझा रहा था कोई ज्ञानी…..उसने हमारा वक्त नहीं देखा ..यही लगा….मैं जिस अंगीठी के बारे में लिख रहा हूं वे सभी लोहे की पुरानी बाल्टीयों को इस्तेमाल कर के (क्या कहते हैं आज के ज़्यादा पढ़े-लिखे पेज थ्री वाले लोग …री-साईकिल या अप-स्केलिंग या री-पर्पज़िंग…..) तैयार हुआ करती थीं। 

बनी-बनाई हुई, रेडीमेड अंगीठीयां बिकती तो थीं बाज़ार में लेकिन अकसर उन को अच्छा नहीं समझा जाता था क्योंकि उन को बनाने में बिल्कुल खस्ताहाल, जंग से टूटी-फूटी बदहाल बालटी से अंगीठी बना दी जाती थी। यह सोचना भी बिल्कुल ठीक ही रहा होगा…हमारे से पिछली पीढ़ी के अपने अनुभव थे। हमारे अनुभव ही तो हैं जो हमारे छोटे-मोटे फ़ैसलों पर अपनी छाप छोड़ते हैं….। 

यह सब मेहनत अब अखरती है ...यह सब काम काश कॉलेज में किए होते ...

हां तो अंगीठी बनाने का प्रोजेक्ट शुरु कैसे होता था…घरों में उन दिनों लोहे की बाल्टीयां ही हुआ करती थीं..कोई मोटा लोहे, कोई पतले लोहे से बनी हुई। घर की किसी पुरानी बाल्टी को किसी ठठेरे (जो लोहे को काटने, फाटने के ही काम किया करता ..लोहे की बाल्टी, ट्रंक, आटे की पेटी….उसे इन्हीं सब कामों से फुर्सत न थी…अभी भी अमृतसर के इस्लामाबाद इलाके के उस छोटे कद के, सांवले रंग-रूप के  सरदार जी की शक्ल अच्छे से याद है …अपने काम का एक दम माहिर ….लोहे को ठोंकने-पीटने का उत्साद)....उस के पास सभी इसी तरह के मुरम्मत के मरीज़ ही आते थे …मैं अपनी मां के साथ जाता था….हां, तो वह उस बालटी को रख लेता और २-३ दिन बाद की तारीख दे देता। 

उस उस्ताद की डिमांड ही इतनी थी…तीन चार दिन बाद जब मां और मैं उस के पास जाते तो पता चलता कि उसे तो इन दिनों फुर्सत ही न मिली…मेरी मां के कहने पर, हमारी उस पुरानी बाल्टी को ढूंढा जाता और वह उसी वक्त १०-१५ मिनट में तीन-चार रुपए में अंगीठी का ढांचा तैयार कर के हमें थमा देता…

अब चलते हैं अंगीठी बनने के अगले स्टेप की ओर  …

इन परफेक्ट कटे हुए अंगीठी के ढांचे को साक्षात् अंगीठी की शक्ल में बदलना अगला अहम् स्टेप होता ….इस काम की माहिर अलग महिलाएं होती थीं….अकसर वे महिलाएं जो मिट्टी के बडे़-छोटे तंदूर बनाया करती थीं…अपने काम की माहिर मेहनती, खुशमिज़ाज महिलाएं। उन को अंगीठी का वह ढांचा थमा कर दिया जाता …और मां थोड़ी ब्रीफिंग भी कर देती…लेकिन आज सोचता हूं कि वह ज़रूरी न थी, क्योंकि वह बात वैसी ही है कि जैसे किसी मोची को जूता गांठने के बारे में, किसी नाई को बाल काटने के बारे में या मुझे दांत के इलाज के बारे में ब्रीफिंग करे …हम तीनों वैसा ही करेंगे जैसा हम ने करना है, जैसा हमें आता है …हां, वे महिलाएँ अपने काम की एक दम माहिर होती थीँ और चिकनी मिट्टी की मदद से वे एक बढ़िया अंगीठी तैयार कर देतीं…

अंगीठी की मेन्टेनेन्स - उस का नियमित रख-रखाव….

अंगीठी जब घर पर बन कर आ जाती तो फिर उस की छोटी मोटी रिपेयर घर पर ही कर ली जाती….उस के लिए मां ने एक मिट्टी के बर्तन में चिकनी मिट्टी घोल कर रखी होती….वह तैयार ही रखी होती …तंदूर या किसी भी अंगीठी की माइनर रिपेयर के लिए …अंगीठी का कोई ‘ मुन्ना’ अगर हिल जाता या थोड़ा टूट जाता …तो उसे भी ठीक कर दिया जाता, फिर उसे कुछ घंटों के लिए तेज़ धूप में सूखने के लिए रख दिया जाता…फिर से जलाने से पहले …इसी चक्कर में भी शायद हर घर में दो अंगीठीयां तो होती ही थीं…एक बहुत बड़ी और एक छोटी …एक लोहे की बड़ी बाल्टी से और दूसरी छोटी बाल्टी से तैयार करवाई हुई…

अंगीठी की मंद पड़ती आग को तेज़ करना …

जब अंगीठी पर रखे तवे से आलू,गोभी, मूली, पनीर के  परांठों की झमझम बरसात चल रही होती तो उस अंगीठी की मंद पड़ती आग को तेज़ करने का काम भी साथ साथ चलता रहता था। किसी लोहे की सीख (सीख पंजाबी लफ्‍ज़ है…इस का मतलब बिल्कुल पतली सी लोहे की डंडी)..को अंगीठी के निचले सुराख से अंदर डाल कर राख नीचे गिराई जाती और खाली हुई जगह में ऊपर से कोयले डाल दिए जाते ….१-२ मिनट के लिए धुआं उठता ज़रूर….लेकिन डालडे में तैर रहे परांठे और लपेटने के सामने यह बिल्कुल भी परेशानी न थी…उसी वक्त अंगीठी की आग फिर से तेज़ हो जाती, लपटें निकलने लगतीं…

अंगीठी पर हाथ तापना …. 

अंगीठी के इर्द-गिर्द उस को घेर कर बैठे बैठे आग तापते वक्त कईं बार सब लोग अचानक मौन धारण किए हुए अपने ही खयालों में गुमसुम से बैठे हुए होते …नज़रें टकटकी लगाए हुए तेज़-मंद होते अंगारों पर टिकी रहतीं….आज सोचता हूं तो यही लगता है कि यह सब भी किसी ध्यान साधना से कम थोडे़ न रहा होगा…ठीक है, तब हमें ये फेशनेबुल नाम नहीं आते थे …लेकिन ये लम्हे अपने साथ रहने वाले, अपने अंदर झांकते के लिए काफ़ी होते थे…

यह आग तापने वाला काम भी ऐसा था जो सारे कुनबे को एक साथ बांध कर रखता था …और अंगीठी ने इसे बांधे रखा जब तक अंगीठी चलन में थी….यह बंधन इक बार छिटका तो फिर बिखराव ऐसा शुरु हुआ कि परिवार के सभी लोग एक साथ बैठ कर जो दिल खोल लिया करते थे ….एक दूसरे की आपबीती, दिनचर्या सुनते थे, उन में अपनी बात जोड़ देते थे ….बात से बात निकलती थी, आगे बढ़ती थी, आगे की योजना बनती थी…सपने बुने जाते थे….मज़ाक होता था….और अंगीठ वाली रसोईयों के लुप्त होते होते यह सब भी कम होता होता गायब हो गया….

गजब का खुलापन होता था इस कैंप फॉयर में ….

ऐसी ही एक बात याद आ गई ..आठवीं कक्षा में ..पड़ोस के एक लड़के ने मुझे बार बार चिढ़ाना शुरु कर दिया कि तेरा उस से (मोह्लले की एक लड़की से चक्कर है)...मुझे वह कभी भी किसी के सामने कहने लग गया…मुझे बडा़ अजीब सा लगने लगा …ऐसी कोई बात न थी…वह इन सब कामों का खिलाड़ी लगता था …थोडा़ बड़ा था मेरे से …मैं परेशान हो गया…मेरी पढऩे की इच्छा ही जाती रही ….एक दिन ऐसे ही अंगीठी के इर्द-गिर्द मैं और मेरी बड़ी बहन बैठे हुए थे …मैं अचानक रोने लगा कि मेरा अब पढ़ाई में दिल नहीं लगता क्योंकि टीटू मुझे बार बार यह कह कर चिढ़ाता है …

बहन ने आराम से बात सुन ली, मेरा बोझ हल्का हुआ…और अगले दिन जब टीटू जी महाराज बाहर खेल रहे थे, बहन ने उस को आवाज़ देकर अपने पास बुलाया…और समझा दिया …इतना ही कहा उसे मेरे सामने …..इस तरह की फ़िज़ूल बातें मत किया करो, बेकार में परेशान मत किया करो, यह गलत बात है। बस, टीटू सुधर गया , मेरी बहन ने मेरे दिल में किसी हीरो जैसा दर्जा पा लिया और मैं फिर से आठवीं की पढ़ाई में ऐसा रमा कि मेरिट-स्कॉलरशिप पा गया….तो ऐसी होती थी उस वक्त के बहन-भाईयों की बॉंडिंग …हम कुछ भी शेयर कर लेते थे …और किसी भी मसले को  हल भी तुरंत कर दिया जाता था ….मैं अकसर अपनी बहन को यह बात याद दिलाता हूं तो वह बहुत हंसती है…उसे इतनी बातें याद नहीं हैं….कितना याद रखे वह भी, एक नामचीन यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर रह कर रिटायर हो चुकी हैं….। देखने वाली बात यह है कि जब घरों ही में ऐसा स्पोर्ट-सिस्टम होगा तो चिंता, पैनिक, डिप्रेशन या और भी तरह तरह की मानसिक परेशानियों की क्या बिसात कि किसी को घेरा डाल पाएं….सारी काउंस्‌लिंग, सारी थैरेपी….आपस में भाई बहन बात कर के ही समझ लेते थे, सुलटा लेते थे ….सोचने वाली बात यह भी है कि आज तो हर तरफ़ काउंस्लर, थैरेपिस्ट फैले हुए हैं फिर भी आज की पीढ़ी का इतना कम थ्रेश्होल्ड ….कौन नहीं जानता!!

अंगीठी को कमरे के अंदर ले कर जाने की तमन्ना …

हां, कईं बार सोते वक्त अंगीठी को अपने साथ ही अंदर बेड-रूम में लेकर जाने की इच्छा होती…लेकिन यह काम बड़ी एहतियात से किया जाता…अगर थोड़े से वक्त के लिए ले कर जाते भी तो बडे़ ध्यान से …कईं बार रज़ाई को आग लगते लगते बचती। वैसे भी अंगीठी को सर्दियों के दिनों में अंदर रखने से उस दौर में कईं मौतें होने की खबरें आती रहती थीं…परिवार अंगीठी लेकर अंदर गया …दरवाज़े बंद थे, अंगीठी की वजह से कमरे में इतनी कार्बन-मोनोआक्साईड इक्ट्ठी हो गई कि उस कमरे में मौजूद सभी लोगों की सोते सोते जान ही निकल गई।इसलिेए अंगीठी को कमरे के अंदर लेकर जाने में डर ही लगता था ..जितना वक्त भी लेकर जाते तो खिड़की को भी थोड़ा सा खुला ही रखा जाता था…इसी से कुछ जुड़ी कांगड़ी की यादें भी हैं, वे फिर लिखूंगा किसी दूसरी पोस्ट में…। 

छुट्टी पर बाहर हूं थोड़ा इन दिनों  …इसलिए यह लंबा संस्मरण….

मैं आज कल बाहर हूं ..कुछ दिनों की छुट्टी पर हूं…इसलिए इस लेख को लिखते, बीच में छोडते, फिर लिखते ३-४ दिन हो गए हैं….बहुत लंबा हो गया है …परवाह नहीं….क्योंकि मैंने इस दौरान इस दस्तावेज़ में दर्ज सभी यादों को जिया है …पढ़ने वालों के न सही, मेरे लिए ये बेशकीमती हैं….यह सब करते हुए कभी नहीं लगता कि इतनी मेहनत कर रहे हैं…क्योंकि यह सब दिल का मामला है …मुझे अपने लिए तो खुशी है ही, दूसरी बात यह भी है कि इन को पढ़ कर बड़ी बहन भी खुश हो जाएगी…अब घर में अंगीठी के इर्दगिर्द लगने वाले रोज़ाना लगने वाली कैंप-फॉयर के कुल दो ही तो गवाह बचे हैं…वह और मैं…बाकी सब को बहुत जल्दी थी शायद हमें छोड़ कर चले जाने की ….। 

यह जो इस लेख के ऊपर चिपका एक पोस्टर देख रहे हैं….यह मैने ही बनाया है ….अपने लखनऊ प्रवास के दौरान कुछ बरस पहले कुंअर बेचैना साहब को सुना था …उन की बहुत सी बातें दिल में उतर गईं …उन में एक यह भी है जिसे मैंने पोस्टर के नीचे लिखा है….

“बदन से तेरे आती है मुझे ऐ मां वही खुशबू

जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है 

हज़ारों खुशबुएं दुुनियां में हैं पर उससे छोटी है

किसी भूखे को जो सिकती हुई रोटी से आती है ।।”

                                             कुंअर बेचैन 

इन सब अज़ीम अदीबों को बार बार नमन - क्या क्या लिखा छोड़ कर चले जाते हैं, कैसे यह सब इन को सूझता है ….कि इन के अल्फ़ाज़ कहीं लिख कर दोहराते वक्त तो ठीक है, लेेकिन किसी को अगर सुनाने पड़ें तो बिना गला रूंधे सुना ही नहीं पाते ….रोटी से एक बात और याद आ गई …मां को पता था मुझे रोटी कैसे पसंद है …कईं बार मैं उस की फोटी खींच लेता था जब मोबाईल हाथ में होता …ऐसी ही एक तस्वीर मैंने अपने वाट्सएप पर प्रोफाईल फोटो पर लगाई हुई है …यही है वह फोटो….। 

मां के हाथ की बनी रोटी ....

एक बात और याद आ गई जाते जाते …मैंने कुछ साल पहले एक पोस्टर बनाया था…मैं जहां काम करता था, उस रास्ते पर अकसर देखता कि मां आग जला कर चूल्हे पर बच्चों की रोटी का जुगाड़ कर रही है और वे उसे हर तरफ़ घेरे खड़े हैं…खिचड़ी तैयार होने की इंतज़ार में ….। 


अग्नि देवता को शत्-शत् नमन ….

हर दिन अंगीठी के पास से उठते वक्त मां शुकराना कर के उठती …हमें भी कहती कि यह शुकर ज़रूर किया करो ….अंगीठी के समक्ष हाथ जोड़ कर कहती …जिस भंडारेयों निकलया, ओह भंडारा भरपूर….यह मेरी नानी की सीख थी, जो मां भी अकसर दोहराया करती थी….मुझे भी यह बात अभी याद आई….और हां, अग्नि देवता के पूजा-अर्चना भी होती थी…लोहड़ी के दिन पर विशेष तौर पर होलिका दहन तो घर के बाहर या आंगन में होता लेकिन अंगीठी या चूल्हे में भी आहूति देकर उस का कृत्तार्थ व्यक्त किया जाता है …..

क्या ये सब इसी जीवन की बातें हैं….इतना लिख कर सोच में पड़ गया हूं…!! कौन यकीं करेगा….नहीं तो ना सही, मेरा काम था, इन यादों को सहेजना, और मुझे यह काम करते वक्त बहुत मज़ा आया…उस गुज़रे ज़माने में जाने का मौका मिला …वह पुराना दौर जी लिया हो मैंने जैसे …यह सब लिखते लिखते….क्या यही कम है!!

मां और पोता ...फ़ुर्सत के लम्हों में 

इतना लिखने के बाद अगर मैंने इस पोस्ट की मुख्य किरदार की एक फोटो भी यहां न चिपकाई तो अजीब सा लगेगा मुझे, इस से बड़ी एहसानफ़रामोशी क्या होगी ....तो यह रही उन की एक फोटो जिन की वजह से ये सब यादें पहले तो बन पाईँ और फिर लिखने की समझ भी उन से ही आई ...वह भी लिखती थीं....बहुत बढ़िया लिखती थीं...

आज जब मैं सुबह यह लिख रहा था तो विविध भारती एफएम गो्लड पर भी यही गीत बज रहा था ..जैसे वह सब मेरा लिखा पढ़ रहा हो...समझ रहा हो ...मेरी बात के साथ अपनी बात जोड़ता..टिक टिक टिक टिक चलती जाए घड़ी....कल आज और कल की पल पल जुड़ती जाए कड़ी ...😎😁 (यह उस गीत के व्हीडियो का यू-ट्यूब लिंक है)...


मेरे विचार में इस पो्सट को पढ़ने में आसानी होगी अगर इस से पिछली पोस्ट भी देख लेंगे....ऐसा मुझे लगता है ...यह रहा उस का लिंक ....

अंगीठी, भट्ठी, चूल्हा, कांगड़ी.....गुज़रे दौर की मीठी यादें, बातें ...