Sunday, December 23, 2007

जीवन चलने का नाम-----चलते रहो सुबह शाम !

दशकों पुराना यह एक अपने समय का बेहद पापुलर गीत तो हमें अच्छा-खासा याद है, पर हम उस की स्पिरिट कहीं भूल तो नहीं--- सब से पहले तो मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस हम में मैं भी पूरी तरह शामिल हूं। तो चलिए, उस फिल्म में कईं दिन तक लगातार साइकल चला रहे हीरो की बात को अगर हम ने नज़रअंदाज़ कर भी दिया है तो अब अंग्रेजों की ही सुन लें। वैसे भी कहा गया है न हम हिंदोस्तानियों को वह बात कहीं ज्यादा भाती है जो सात समुंदर पार कर के हमारे पास आती है---चाहे, वे बातें सदियों पहले हमारे ही तपस्वियों ने कह दी हों, लिख दी हों। खैर, कोई बात नहीं, हम सब भुल्लनहार हैं और हमारा दाता बख्शनहार है। तो,एक बार फिर अमेरिकन जर्नल आफ कारडीआलोजी में छपे एक अध्ययन में विशेषज्ञों ने फिर से एक बार आवाज़ लगाई है कि हफ्ते में छः दिन( आप भी मेरी तरह खुश हो गए न कि चलो कल तक तो यह मामला टल गया क्योंकि आज तो वैसे भी छुट्टी का दिन है, और वैसे भी यह छः दिन वाली कुछ बात ही कर रहा है) तक तीस मिनट तक तेज़ चलना ब्लड-प्रेशर को कम करने के लिए काफी है, कमर के साइज को घटा सकता है और मैटाबालिक सिंड्रोम के रिस्क को कम करता ही है। क्या हम यह कईं बार पहले भी नहीं सुन चुके हैं। लेकिन फिर भी अपने सैर के शूज़ पहनने में इतना भारीपन क्यों महसूस करते हैं।
एक बात और यह कि मैने सुना है कि उस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अगर आप यह सब हासिल कर सकते हैं और वह भी अपने खाने-पीने की आदतों को कंट्रोल किए बिना ही। दोस्तो, एक रिक्वेस्ट है कि बस यह वाली खाने-पीने की लाइन बस मैंने लिखने के लिए लिख दी है क्योंकि यह मेरे नोटिस में आई। पर,मेरा हाथ जोड़ कर आप से विनम्र निवेदन है कि आप यह समझिए कि आप ने यह लाइन पढ़ी ही नहीं है। क्योंकि मुझे पता है न आप ने ब्रिस्क वाक वाली बात तो पता नहीं माननी है या नहीं, ये खान-पीन वाली बात पर आपने इंसटैंस्ट एक्शन ले लेना है--- और फिर रबड़ी, जलेबी, गुलाब-जामुन, चाट-पापड़ी, खस्ता कचौड़ी , समोसे, चने-भटूरे का दौर शुरू हो जाना है( मुझे पता है मुझे इस रविवार की सुस्ताई सी सुबह में बिना वजह आप के मुंह में पानी लाने का घोर पाप तो लगेगा ही)- बहरहाल मेरा यह विश्वास है कि किसी भी अध्ययन के परिणामों को थोड़े नमक के साथ ही लेने की जरूरत है। जो बात ठीक लगे ग्रहण करें, बाकी नकार दें।
.ठीक है, अभी तो आप भी नाश्ता कीजिए। इस बलागरी के मेले ( या मैदान) में फिर लौट कर आते हैं।