Friday, March 4, 2011

स्वस्थ लोगों को बीमार करने की सनक या कुछ और !

msnbc.com पर दो दिन पहले एक रिपोर्ट दिखी थी .. America’s past of US human experiments uncovered. इसे आप अवश्य पढ़िये क्योंकि तभी आप शायद समझ पाएंगे कि जब विदेशी कंपनियां अपनी दवाईयों, अपने इंजैक्शनों की टैस्टिंग के लिये भारत के लोगों को गिनि-पिग (guinea pigs) की तरह इस्तेमाल करते हैं तो क्यों मीडिया में इतना हो-हल्ला खड़ा हो जाता है। इसे जानने के लिये आप आगे पढ़िये।

अमेरिका में 1940 से 1960 के बीच कुछ ऐसे प्रयोग किये गये जिन में स्वस्थ लोगों को बीमार बना कर मैडीकल रिसर्च की गई। ये प्रयोग अपंग लोगों, कैदीयों, मानसिक रोगियों एवं गरीब अश्वेत लोगों पर किये गये।

मेरी तरह आप की यह सुन कर मत चौंकिये कि मानसिक रोगियों को हैपेटाइटिस बीमारी से बीमार किया गया। कैदियों को पैनडैमिक फ्लू नामक बीमारी के कीटाणु सूंघने के लिये दिये गये।

जैसे कि यह सब काफ़ी न था ---लंबे अरसे से बीमार लोगों को कैंसर कोशिकाओं का टीका लगा दिया गया।

आज से 65 साल पहले गिटेमाला में मानसिक रोगियों को सिफ़लिस (आतशक, एक यौन रोग) का रोगी बना दिया गया ... कुछ लोगों को सूज़ाक (gonorrhea, यौन रोग) की बीमारी से ग्रस्त करने के लिये उन के गुप्तांग पर सूज़ाक के जीवाणुओं के टीके लगाये गये।

और रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे दर्जनों प्रयोग किये गये जिन्हें उस समय के मीडिया द्वारा कभी कवर भी नहीं किया जाता था। एक और रिसर्च के बारे में सुनिए – 600 अश्वेत मरीज़ों को जो सिफिलिस (आतशक) से ग्रस्त थे, उन्हें दवाई ही नहीं दी गई।

जिस msnbc.com की रिपोर्ट का मैंने ऊपर लिंक दिया है, उस में एक डाक्टर को दिखाया गया है कि किस तरह से 1945 में वार्ड में एक मरीज़ में मलेरिया रोग उत्पन्न करने के लिये प्रयत्नशील है।  यह सब मैंने आज पहली बार देखा है...

अब मेरे से और नहीं लिखा जा रहा, बाकी रिपोर्ट आप स्वयं ही पढ़ लीजिएगा ..... और इस तरह के कामों को सही ठहराने के लिये कुछ तर्क भी इस रिपोर्ट में दिये गये हैं जिन के साथ मैं तो व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं.... आप का क्या ख्याल है ?

जब मैं डैंटिस्ट्री पढ़ रहा था तो हमारे प्रोफैसर साहब हमें एक Vipeholm Study (1945-55) के बारे में सुनाया करते थे किस तरह एक मानसिक रोग केंद्र में मानसिक रोगों में दंत-क्षय पैदा करने के लिये जम कर मिठाईयां आदि खिलाई जाती थीं और ये सुन कर ही हमारे चेहरे लाल हो जाया करते थे लेकिन अब वक्त के साथ लगता है सच में खून ठंड़ा पड़ चुका है, क्योंकि इतना सब कुछ पढ़ लेने के बाद भी कुछ भी नहीं हुआ। कहीं आप का सिर तो चकराने नहीं लग गया ?





पैरों की सेहत—मछली ने संवार दी, कुत्ते ने बिगाड़ दी ?

कुछ साल पहले से यह तो सुनने में आने लगा था कि पैरों की देखरेख भी अब ब्यूटी पार्लर में होती है जहां पर इस के लिये दो-तीन सौ रूपये लगते हैं ...लेकिन इस तरह के क्रेज़ के बारे में शायद ही आप ने सुना हो कि पैरों की साफ़-सफ़ाई के लिये छोटी छोटी मछलियों की मदद लेने की नौबत आ गई है।

इस तरह की साज सज्जा के दौरान एक पानी के टब में जिस में एक विशेष तरह की मछलियां पड़ी रहती हैं उन में पैरों को डुबो दिया जाता है और ये नन्ही मुन्नी मछलियां पैरों पर धीरे धीरे काट कर मृत चमड़ी (dead skin) को उतार देती हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि इस तरह का शौक पालने से तरह तरह की इंफैक्शन का जो खतरा मंडराने की बात होने लगी है, उसे समझने की ज़रूरत है। वैसे भी अपना देसी बलुआ पत्थर (sandstone, पंजाबी में इसे झांवा कहते हैं) इस काम के लिये क्या किसे से कम है ....एकदम सस्ता, सुंदर और टिकाऊ उपाय है, लेकिन अगर किसी को अथाह इक्ट्ठी की हुई दौलत से बेइंतहा खुजली हो तो कोई क्या करे? …. फिर तो शुक्र है कि इस काम के लिये मछली से ही काम चलाया जा रहा है !!

यह खबर देख कर बहुत दुःख हुआ .... रात को एक आदमी सोया, सुबह उठा तो देखता है कि उस के पांव की तीन उंगलियां और पैर का एक हिस्सा उस का पालतू कुत्ता खा गया है.. दरअसल इस आदमी को डायबीटीज़ रोग था जिस की वजह से उस के पैर सुन्न पड़ चुके थे, उन में किसी तरह का कोई अहसास नहीं होता था, इसलिये जब कुत्ता अपना काम कर रहा था तो उसे पता ही नहीं चला...एक दुःखद घटना। मधुमेह के रोगियों को यह खबर चेता रही है कि अपनी ब्लड-शुगर के स्तर को नियंत्रण में रखें, अपनी पैरों की भी विशेष देख भाल करें, छोटी मोटी तकलीफ़ होने पर विशेषज्ञ से परामर्श लें और रात में अपने कुत्ते को अपने कमरे में न रखें ......यह कुत्ते को अपने साथ रखने वाली बात मैंने कहीं पढ़ी नहीं है, लेकिन इस खबर से तो इस का यही मतलब निकलता है !!
Further reading --
For diabetics --keep your feet and skin healthy.

बुज़ुर्गों के आर्थिक शोषण को नासमझने की नासमझी

कुछ अरसा पहले मेरी ओपीडी में एक बुज़ुर्ग दंपति आये थे ...पता नहीं बात कैसे शुरू हुई कि उन्होंने अपनी असली बीमारी मेरे सामने रख दी कि उन का इकलौता बेटा जो तरह तरह के नशे लेने का आदि हो चुका है, उन की पेंशन छीन लेता है। विरोध करने पर अपने पिता पर हाथ भी उठाने लगता है, जब उन का छः-सात साल का पौता उस बुज़ुर्ग को बचाने की कोशिश करता है तो उस का पिता उसे भी पीट देता है...............और उन दंपति के सहमे हुये चेहरे और भी बहुत कुछ ब्यां कर रहे थे !

मैं सोच रहा था कि यह बुज़ुर्ग जो उच्च रक्तचाप की दवाईयां ले रहा है, इस से क्या हो जाएगा? तकलीफ़ कहीं और है जिसे देखने के लिये हमारी आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के पास आंखें है ही नहीं.... चाहे ऐसे मरीज़ की हर माह दवाई बदल दी जाए, पुरानी दवाईयों में नईं और जोड़ दी जाएं ... तो क्या हम सोच सकते हैं कि यह ठीक रह सकता है ? ……..मुझे तो कभी भी ऐसा नहीं लगा!!

बुज़ुर्गों के शारीरिक उत्पीड़न (physical torture) के साथ साथ उन का आर्थिक शोषण भी किया जा रहा है, लेकिन ज्यादातर ऐसे किस्से ये बुज़ुर्ग ही दबाए रखते हैं ....वही पुरानी दलीलें ..घर की बदनामी होगी, बेइज्जती होगी, बेटा या बहू इस से और ढीठ हो जाएंगे वगैरह वगैरह ......इसलिये यह सिलसिला बुजुर्गों के दम निकलने तक चलता ही रहता है।

और इस तरह की यातना झेलने के बाद जब ये बुज़ुर्ग बदहवास से होते हैं तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया जाता है कि उम्र की तकाज़े की वजह से अब ये पगला गये हैं, अब इन का जाने का समय आ गया है।
आप को भी शायद यह लगता होगा कि यह सब तो हम जैसे देशों में ही होता होगा ...लेकिन न्यू-यार्क टाइम्स की यह रिपोर्ट .... When abuse of older adults is financial...वहां की परिस्थितियों के बारे में भी बहुत कुछ बताती है।

रिपोर्ट में कितनी साफ़गोई से लिखा गया है कि डाक्टर लोग बुज़ुर्गों के आर्थिक शोषण के मुद्दे को अकसर नज़रअंदाज़ कर दिया करते हैं। अगर कोई ऐसा मरीज़ कहता है कि उस ने अपने पैसे किसी जगह रखे थे लेकिन वह उसे मिल नहीं रहे, उस की पचास-साठ पुरानी शादी की अंगूठी पता नहीं कहां चली गई, अगर कोई बुज़ुर्ग कहता है कि उस ने एक खाली फार्म पर हस्ताक्षर तो कर दिये हैं लेकिन उसे उस की कोई समझ नहीं ....और भी ऐसी बहुत सी बातें ... तो ऐसे में डाक्टर क्या करते हैं ... उन की बातों की गहराई में जाकर कुछ ढूंढने की बजाए यही सोच लेते हैं कि ये सब भूल-भुलैया तो अब इन के साथ चलेंगी ही ...इसलिये उन्हें दी जाने वाली टेबलेट्स की लिस्ट में कुछ और दवाईयां जोड़ दी जाती हैं, या फिर कोई और टैस्ट करवाने की हिदायत दे दी जाती है। 

यह सब कुछ इस देश में भी हो रहा है ..और बड़े स्तर पर .. ... सोचने की बात है कि  किसी की अति-वरिष्ट नागरिक की लेबलिंग करने से क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा?

यह तो बात पक्की है कि बुज़ुर्गों का हर तरह का शोषण हो रहा है ... और इस के एक प्रतिशत केस भी जगजाहिर नहीं होते ... और यह सब होता इतने नर्म तरीके और सलीके (subtle way) से है कि उन्हें घुट घुट कर मारने वाली बात दिखती है। भारत में अभी भी नैतिक मूल्य काफ़ी हद तक कायम तो हैं लेकिन पश्चिम की देखा देखी अब इन का भी ह्रास तेज़ी से हो ही रहा है। कानून तो बन गये कि मां बाप की देखभाल करना बच्चों की जिम्मेवारी है लेकिन ऐसा कानून कितने लोग इस्तेमाल करते हैं या कर पाते हैं ....यह बताने की कोई ज़रूरत नहीं !!

इस का कारण व इलाज यही है कि अब नईं पीढ़ी को सही संस्कार नहीं मिल पा रहे—आर्कुट, फेसबुक, ट्विटर पर सारा दिन जमे रहने से तो ये मिलने से रहे, ये केवल किसी सत्संग में बैठ कर किसी महांपुरूष की बातें सुन कर ही ग्रहण किये जा सकते हैं और साथ ही साथ बच्चे हर काम में अपने मां-बाप का ही अनुसरण करते हैं, इसलिये उन के सामने मां-बाप को भी आदर्श उदाहरण रखनी होगी .....वरना तो वही बात ... बीस-तीस सालों बाद वही व्यवहार यही बच्चे उन के साथ करने वाले हैं!!

यह दकियानूसी बात नहीं है कि बच्चों को किसी भी सत्संग के साथ जोड़ने में और जोड़े रखने में ही सारे समाज की भलाई है ताकि वे अपने नैतिक मूल्यों एवं जिम्मेदारियों के प्रति सचेत रह सकें ......इस के अलावा कोई भी रास्ता मेरी समझ में तो आता नहीं..... दुनिया तो ऐसी ही है कि एक 80 साल की महिला के बस द्वारा कुचले जाने पर मुआवजा देने से बचने के लिये एक सरकारी इंश्योरैंस कंपनी कहती है कि इस के लिये काहे का मुआवजा, यह तो बोझ है!! ……. लेकिन जज ने फिर उस कंपनी को कैसे आड़े हाथों लिया, यह जानने के लिये इस लिकं पर क्लिक करिये ...Insurance firm's view on old people insulting ..