Sunday, October 5, 2014

त्योहार के मौसम में मृतक भोज

मुझे अच्छे से याद है ... १९७३ के आसपास के वो दिन...मैं पांचवी या छठी कक्षा के कुछ विषयों में अव्वल आया था... स्कूल के वार्षिक पारितोषिक वितरण उत्सव में जहां तक मुझे याद है फैज़ अहमद फैज़ जी मुख्य अतिथि के तौर पर आए थे......उस जमाने में हमें नाम भी अच्छे से कहां याद रहते हैं..लेकिन फैज़ आए थे...इतना तो मुझे धुंधली याद है। यह मैं अमृतसर के डीएवी हायर सैकण्डरी स्कूल, हाथी गेट की बातें सुना रहा हूं।

हां, पहले यह भी एक बहुत अच्छा रिवाज था कि छात्रों को इनाम में बढ़िया प्रेरणात्मक किताबें दी जाती थीं। मुझे भी अन्य किताबों के साथ साथ मुंशी प्रेमचंद का गोदान नावल मिला था..  याद है मैंने उस गोदान को बहुत शौक से कईं बार पढ़ा। एक बात तो है कि पहले हम लोग किताबें पाते थे तो उन्हें पढ़ते भी थे.....किताबों के संसार में खोए रहने का अपना अलग ही मज़ा हुआ करता था। उस के बाद ढूंढ ढूंढ कर मुंशी प्रेमचंद की कहानियां पढ़ी...बूढ़ी काकी, ईदगाह जैसे नगीने तो हमारे सिलेबस में ही थे। 

बहरहाल, अब आता हूं मृतक भोज के ऊपर.......तो जैसा कि आप जानते हैं .. मृतक भोज भी मुंशी प्रेमचंद की एक मशहूर कहानी है। वैसे तो आप इस लिंक पर भी जा कर इस कहानी को मूल रूप में पढ़ सकते हैं... मृतक भोज..

कुछ दिन पहले यहां लखनऊ की संगीत नाटक अकादमी में मृतक भोज कहानी के ऊपर तैयार किए गये एक नाटक का मंचन हुआ........मैंने इस पर अपनी एक यू-ट्यूब प्रस्तुति दो-तीन दिन लगा कर तैयार की है, आशा है आप इसे देखने का कष्ट करेंगे.......नीचे एम्बेड कर रहा हूं।

सेठ रामदास जब तक जीवित रहे, किसी का अहसान नहीं लिया। उनकी मृत्यु के बाद सेठानी को खेत, जेवर, खलिहान, बर्तन, सब िबक जाते हैं। उसके बाद भी गांव के लोग और सेठ के तथाकथित शुभचिंतक सेठ का 'मृतक भोज' करवाने के लिए उन पर दबाव डालते हैं। इस बार घर भी बिक जाता है। सेठानी और उनकी बेटी पहले बेघर होती हैं फिर पहले सेठानी की फिर बेटी की मौत हो जाती है। एक 'मृतक भोज' सेठ के बाकी बचे परिवार को लील जाता है। 

मुंशी प्रेमचंद की यह मशहूर कहानी २६ सितंबर २०१४ शुक्रवार को लखनऊ की संगीत नाटक अकादमी में नाट्य रूप में दिखाई गई। इस नाटक में यही दिखाने का प्रयास किया गया कि कैसे कुरीतियां मानवता पर भारी पड़ती हैं।

जो लोग खुद को सेठ का दोस्त और शुभचिंतक कहते थे उन्हें यह चिंता नहीं हुई कि घर बिकने के बाद सेठानी और उनकी बेटी कहां जाएंगे। सेठानी जिस घर की मालकिन होती हैं वहीं किराए पर रहने को मजबूर हो जाती हैं। सेठ के दोस्त उनकी बेटी पर बुरी नजर डालते हैं। पहले मां बीमारी से मरती है फिर बेटी जिंदगी की दुश्वारियों से हारकर खुदकुशी कर लेती है लेकिन फिर भी लोगों को यही लगता है कि सेठ का 'मृतक भोज' होना जरूरी थी। 

जिस दिन शाम को लखनऊ में इस नाटक का मंचन किया जाना था उसी दिन सुबह ९ बजे इस नाटक के निर्देशक नवीन श्रीवास्तव जी को मातृशोक हो गया....उत्तर प्रदेश संगीत नाटक संस्थान के निदेशक ने उसे इस नाटक के मंचन को स्थगित करने के लिए कहा लेकिन श्रीवास्तव जी ने "Show must go on!" की भावना से इस के मंचन को अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार करवाने का निर्णय लिया। 

उस महान कहानीकार मुंशी प्रेम चंद और निदेशक नवीन श्रीवास्तव की तुलना में  यह एक धूल के कण के समान तुच्छतम् भेंट उन की दिवंगत माता जी की आत्मा की शांति के लिए मेरी तरफ़ से आहुति।

वापिस इस पोस्ट के शीर्षक पर लौटता हूं......त्योहार के मौसम में मृतक भोज........तो बस यही ध्यान में आ रहा है कि कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं, मन चाहिए।।