Saturday, May 28, 2016

हमारी डबलरोटी....चल बैठ जा, बैठ गई..

वैसे तो मेरी पोस्ट के आखिर में ही हिंदी फिल्मी गीत बजते हैं..लेकिन जैसे निर्मल बाबा जी को कभी कभी कुछ बातों का ध्यान आने लगता है अचानक..मुझे भी इस गीत का ध्यान बार बार आये जा रहा है..क्यों आ रहा है, बताऊंगा बाद में..पहले आप सुन लीजिएगा...रेडवे पे खूब बजा करता था हमारे बचपन के जमाने में...

कैसा लगा ...देवानंद हेमा मालिनी को हिप्नोटाइज़ करने के चक्कर में है ...चल बैठ जा, बैठ गई....भूल जा ..भूल गई...मुझे तो पहले भी अच्छा लगता था यह बालीवुड गीत और अब तो और भी लगता है ...


अब क्यों  अच्छा लगता है?...क्योंकि अब मुझे लगता है कि हम लोग इस गाने से अपने आप को आईडैंटीफाई करने लगे हैं...

एक दिन अचानक अखबार के पहले पन्ने पर आता है ...एक नामचीन गैर सरकारी संस्था CSE ने जांच करी कि देश में विभिन्न ब्रेड के सैंपलों में कुछ कैंसर पैदा करने वाले कैमीकल पाये गये हैं...

इस संस्था की विश्वसनीयता पर कोई प्रश्न उठाया नहीं जा सकता...

उस रिपोर्ट में यह भी प्रश्न उठा कि हमारी डबलरोटी में इस तरह के कैमीकल आखिर इस्तेमाल करने की इजाजत ही क्यों है, कंपनियों वाले permissible limits से कईं गुणा ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, वह अलग बात है, लेकिन अभी तक ये कैमीकल इस देश में बैन ही क्यों नहीं कर दिये गये ...जब कि बहुत से देशों में ऐसा हो चुका है।

इस का सीधा सादा जवाब यही है कि हमें इन सब चीज़ों की कोई जल्दी नहीं होती.. हो जायेगा...टाइम तो लगता ही है ना हर काम में!

हां, तो जिस दिन अखबार में इन कैमीकल्स के बारे में आया ..शायद उस के एक दो दिन बाद ही केन्द्र सरकार ने इन दोनों कैमीकल्स को बैन कर दिया....उस के बाद अगले दिन FSSAI  Food safety and standards authority of India..ने ब्रेड कंपनियों को चेता दिया कि अब इन कैमीकल्स को ब्रेडों में इस्तेमाल मत करियो....

बस, हो गई हमारी डबलरोटी की समस्या का समाधान!...But is it really as easy as it sounds?...उसने यह किया, उसने यह कहा...प्राबल्म खत्म हमेशा के लिए।

लिखते लिखते मुझे ध्यान आ रहा है कि वैसे ऐसा क्या है कि कोल्ड-ड्रिंक्स में ही गड़बड़ का हमें कोई गैर सरकारी संस्था बताती है, नूडल में भी यही हुआ...और मिनरल वाटर में भी यही कुछ हुआ..... What is FSSAI doing, I wonder!

मुझे जो प्रश्न सता रहा है वह यह है कि क्या किसी चीज़ पर प्रतिबंध लगाने से उस वस्तु का इस्तेमाल बंद हो जाता है...मुझे तो नहीं लगता... कितनी चीज़ें, कितने फ्लेवर, सैंकड़ों हज़ारों फूड-एडिटिव्ज़ हैं, कितने घटिया किस्म के कलर्ज़ - नान फूड ग्रेड तक के ... सब कुछ धड़ल्ले से िबक रहे हैं, इस्तेमाल हो रहे हैं...हम यह सब अच्छे से जानते हैं...कुछ साल पहले अजिनोमोटो के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा था...हर नूडल की रेहडी पर वह खोमचे वाला उसी चीनी मसाले को धड़ाधड़ इस्तेमाल कर रहा होता है....

खाने पीने के मामलों में इस तरह की बात सामने आना एक बेहद संजीदा मुद्दा है ..पता ही नहीं यार सारा भारत कितने अरसे से इस तरह की कैंसर कैमीकल्स से युक्त ब्रेड को खाता रहा...बेहद दुर्भाग्यपूर्ण....बस कंपनी वाले क्या सच में अगले दिन से अच्छे बच्चे बन जाएंगे?....इस का निर्णय आप करिए और अपने खाने पीने के फैसले इन निर्णयों के आधार पर किया करिए...वरना तो ऊपर देवानंद और हेमा मालिनी के गाने वाली बात लगती है ...एक ने कह दिया कि हमारी ब्रेड में लफड़ा है, दूसरे दिन आदेश आ गया कि नहीं, ठीक है, सब कुछ ठीक है ...

दरअसल हमारी समस्याएं तब तक यूं की यूं बनी रहेंगी जब तक शिक्षा का स्तर नहीं बदलेगा...लोग आज वैसे तो सचेत हो रहे हैं..पिछले दो तीन दिनों में मैंने आठ दस लोगों को ऐसे ही टेस्ट किया ..कुछ बात चली थी...कि ब्रेड का क्या चल रहा है, पता है ना!.... मुझे बहुत खुशी हुई कि सभी मरीज़ों को इस खबर के बारे में सब कुछ पता था...एक महिला तो इतनी सचेत थी कि उसने बताया कि डाक्टर साहब, हम लोग तो १५-२० दिन में एक बार लाते थे, अब वह भी बंद कर देंगे।

सब से बढ़िया सिचुएशन वही होती है कि अपनी सेहत के निर्णय लोगों को अपने आप लेने दिए जाएं.... we really need to empower them!

मेरे विचार में ऐसा तो कभी होता नहीं किल  बैठ जा, बैठ गई ...भूल जा ..भूल गई...हिंदी फिल्मों में होता होगा..कंपनियां कैसे इन कैमीकल्स को अचानक इस्तेमाल करना छोड़ देंगी......कितनी टैस्टिंग कर लोगो, कितनी पुलिसिंग कर लोगो....हर गली के मोड़ पर तो CSE जैसी संस्था के कार्यकर्ता तैनात नहीं किये जा सकते..ध्यान में आ रहा है कि किसी कंपनी ने तो इस NGO की कार्यक्षमता पर ही प्रश्न लगा दिया है ...

Market forces are extremely powerful....मार्कीट शक्तियां बहुत ही ताकतवर हैं, कुछ भी किसी भी कीमत पर करवाने में सक्षम हैं, करवा सकती हैं, करवा भी लेती हैं....absolutely no doubt... पहले कह दिया नूडल नहीं खाओ..फिर फरमान आ गया, कोई बात नहीं, खा लो...

लेिकन मैं CSE जैसे संस्थान की बातें मानने के पक्ष में हूं......they dont have any obvious conflict of interest... इस तरह की संस्थाओं से हमारे खाद्य पदार्थों के अच्छे-बुरे के बारे में जो भी इशारे मिलें  उसे बिना किसी किंतु-परंतु के मानने में ही हमारी भलाई है ..वैसे भी डबल रोटी कौन सा पौष्टिक आहार है जो हम इसे छोड़ नहीं पा रहे हैं...Well, that's personal choice! After all, Your Health is in your hands! व्यक्तिगत तौर पर मेरी ब्रेड के प्रति नफ़रत और भी गहरा गई है... जी हां, personally speaking!!

बैठ जा, बैठ गई ...से मुझे इस बात का भी ध्यान आ रहा है कि पहले ब्रेड को फुलाने या नर्म रखने के लिए जो कैमीकल इस्तेमाल होते थे... अब क्या इसे कह दिया जायेगा कि फूलो नहीं, बैठ जायो, पिचकी रहो, सिमट जाओ....बात गले से नीचे नहीं उतर नहीं.....बहरहाल, जो भी निर्णय अपने खानपान के बारे में आपने लेना है, सोच समझ कर के लीजिएगा...

शब्बा खैर....रब राखा...  Good night.. take care! 😉

आखिर डाक्टर कितनों का तंबाकू छुड़वा लेंगे!

कल सुबह मैं वैशाली मैट्रो स्टेशन के बाहर अखबार खरीदने लगा ..दस रूपये दिए..उसने ये तंबाकू के पाउच भी रखे हुए थे..अब ये पेपर पैकिंग में आने लगे हैं..मैंने कहा कि बाकी के ये पाउच दे दो ..उसने मेरी तरफ़ गौर से देखा...

मैंने इन्हें खरीदा क्योंकि मुझे इतनी बड़ी बड़ी चेतावनी फोटो सहित देख कर अचानक याद आया कि सरकार की कुछ नीति में बदलाव हुआ है कि शायद पैकेट के ८५प्रतिशत हिस्से में अब इस तरह की भयानक तस्वीरें छपा करेंगी..



ठीक है ...बिल्कुल ठीक है ..मैं इन पैकेटों को देख कर यही सोच रहा था कि सरकार इस से ज़्यादा और क्या करे...फिर ध्यान आता है कि क्यों न करे....क्यों न इस का उत्पादन ही खत्म करवा दे...रही बात प्रतिबंध की, वह हमने देख लिया है, जगह जगह प्रतिबंधित है गुटखे आदि लेकिन धड़ल्ले से बिकते हैं.. धूम्रपान सरेआम लोग प्रतिबंधित स्थानों पर भी करते हैं...कितनी पर्चियां कटेंगीं ज़ुर्माने की, पहले पर्ची काटने वाला गुटखे थूकेगा तो ही सामने वाले को बीड़ी मारने के लिए ज़ुर्माना देने को कहेगा! ...लोग इतने दबंग पहले नहीं थे कि चिकित्सक के पास और वह भी दंत चिकित्सक के पास मुंह में मसाला-गुटखा दबाए पहुंच जाते हैं...


मैं भी गुटखे-मसाले-तंबाकू की जंग पिछले तीस सालों से लड़ रहा हूं...रेडियो, टीवी, मैगजीन, न्यूज़-पेपर...ऑनलाईन राईटिंग ...कुछ भी नहीं छोड़ा लेकिन फिर भी फ्रस्ट्रेशन ही होती है ...इतना व्यापक इस्तेमाल और हम लोग इतने कम...
मेरे पास एक कटिंग है ..यह १९९० की एक अखबार की है ...इसे देख कर मुझे लगा था कि इस पर काम किया जाना चाहिए..और किया भी ...अपने क्षमता से बढ़ कर किया शायद...सैंकड़ों लेख लिख डाले...किसी में भी किसी बात को बढ़ा चढ़ा कर नहीं लिखा...जो देखा वही लिखा...जो लिखने वाले दिन मुझे सच नज़र आया वही दर्ज किया...और फिल लिखने के बाद उस के साथ कुछ भी कांट-छांट नहीं की...

बस इतना इत्मीनान है कि जो भी लिखा है सच लिखा है, मैं पाठक के साथ झूठ बोलने को बहुत बड़ा द्रोह मानता हूं...जो मन में है, वही लिखा ...कुछ वर्षों बाद कुछ लेखों को पढ़ते समय एम्बेरेसमैंट भी हुई लेकिन उसे बदला नहीं...जैसा था, वैसा ही रखा पड़ा है। 

हां, तो मैंने जब ये तंबाकू वाले पाउच इतनी भयंकर चेतावनियों वाले देखे तो मैं यही सोचता रहा कि यार, जो लोग इन्हें देख कर नहीं डरते, उन्हें डाक्टर कैसे डरा पाएंगे! 

सरकारों से तो इस से आगे उम्मीद की नहीं जा सकती... और अब लगने लगा कि डाक्टरों के पास भी कहां इतना टाइम है कि हर बीड़ी-तंबाकू-गुटखे वाले के साथ बीस बीस मिनट तक मगजमारी करते फिरें... सच्चाई तो यह है कि बहुत बार यह संभव हो ही नहीं पाता ..बस इतना ही कह दिया जाता है कि ...छोड़ दो भई बीड़ी पीना, फेफड़ें खराब हो रहे हैं, दिल का रोग पनप रहा है.....लेकिन जो मैं समझा हूं लोग सुनते कम ही हैं, तब ही सुनते हैं जब कोई झटका लगता है..

मुझे तो इन पाउचों को देख कर कल से यही लग रहा है कि अब मुझे तंबाकू के बारे में ज़्यादा बातें करना बंद कर देना चाहिए...इन तस्वीरों के बावजूद भी जो यह सब लफड़ा कर रहा है वह अपने पैरों पर आप ही कुल्हाड़ी मार रहा है, उसे कौन रोक पाएगा! ..हां, कुछ कुछ केसों में िवशेषकर छोटी उम्र के बच्चों एवं युवाओं की तरफ़ ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत होती है ताकि वे इन सब घातक पदार्थों से दूर रह पाएं। 

आज फिर इस विषय पर इसलिए लिखने का मन इसलिए हो आया कि दो दिन के बाद हम लोग विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाएंगे...मैंने सोचा दो दिन पहले ही कुछ शुरूआत तो करूं...

समझ में नहीं आता कि इस टॉपिक पर कितना लिखना होगा ताकि लोगों को इन चीज़ों से डर लगने लगा...अभी तक तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ हुआ है... सब कुछ धड़ल्ले से खाया पिया जा रहा है...मेरे विभिन्न ब्लॉगों में सैंकड़ों लेख हैं ...हिंदी और इंगलिश में...इन की पैकिंग से लेकर ...इन की विनाशलीला को दिखाते। 

लोग पीछे पड़े हुए हैं...किताबें छपवा....ईनाम के लिए भेज...मेरी ऐसी कोई तमन्ना नहीं है, ईनाम-वाम के जुगाड़ न ही पसंद हैं, न ही शौक है, न ही कभी इन के बारे में सोचा है...चुपचाप काम करने में आनंद है...सब जगह राजनीति घुसी हुई है...हम लोगों की ऐसी कोई प्रवृत्ति है नहीं...

सिनेरियो इतना निराशाजनक भी नहीं है, कभी कभी जब मेरी बातें सुन कर कोई बंदा अपनी जेब से बीड़ी का बंडल या तंबाकू का पाउच मेरी टेबल पर टिका देता है कि आज के बाद नहीं इस्तेमाल करूंगा ...तो बहुत खुशी होती है ..मेरी मेज़ की दराज़ में हर समय दो तीन बीड़ी के बंडल पड़े होते हैं...इन में से बहुत से लोग सच में छोड़ देते हैं...इन्हें मैं पंद्रह -पंद्रह दिन बाद पाठ को दोहराने के लिए बुला लिया करता हूं...और क्या करें यार! 

कभी कभी कहीं से जब कोई फीडबैक आती है तो भी अच्छा लगता है ..बहुत से ऐसे संदेश आते हैं...एक इस समय याद आ रहा है...ओर्डिनेंस फैक्टरी के एक बहुत बड़े अफसर लिखते हैं कि हमारी फैक्टरी में यह पान, मसाले, गुटखे की बड़ी समस्या थी, हम लोगों ने तुम्हारे लेखों के प्रिंट आउट फोटो सहित प्रिंट करवा कर के फ्रेम करवा दिये हैं....बहुत फर्क पड़ा है ...वे अकसर इस बात को बहुत जगहों पर शेयर कर चुके हैं। अच्छा लगता है सुन कर। 

बंद करता हूं ...it is never-ending discussion!
और हां, आप के मन में यह प्रश्न तो नहीं आ रहा कि यार, तूने इतने सारे तंबाकू के पाउच by the way खरीदे क्यों?.. मैंने इन की फोटो खींचने के लिये ही खरीदा था..और फोटो खींचते ही डस्टबिन में फैंक दिया है। 

बीड़ी की बात याद आई...हर फिल्म में कोई भी किरदार सिगरेट जब भी सुलगाता है तो तुरंत चेतावनी आ जाती है कि धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है ....लेकिन गुलजार साहब ने बीड़ी को आग लगे जिगर से जला कर दिखा दिया.... लेकिन कभी आपने इस गीत के दौरान कभी कोई चेतावनी देखी?





नीरज जी, आप सौ नहीं, डेढ़ सौ साल जिएं!!


महान कवि गोपाल दास नीरज जी को यहां लखनऊ में तीन चार बार मिलने का मौका मिला...एक बार तो किसी एनजीओ ने आमंत्रण भेजा था..वहां पर दो राज्यों के राज्यपाल, राज्य के कईं मंत्री, मुख्यमंत्री भी आए हुए थे..इन के ९०वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में वह समारोह था...मुझे उस दिन पता चला था कि इस शख्स ने हमें कितने कितने महान् गीत दिए हैं जो हम लोग आज भी उतनी ही शिद्दत के साथ सुनते हैं..और उन के जादू में खो जाते हैं...

उस दिन उन के लिखे गीतों को कुछ कलाकार गा भी रहे थे...मुझे याद है मैं भी दूसरी या तीसरी कतार में था...कुछ बात हुई ...उत्तराखंड के राज्यपाल जनाब अज़ीज़ कुरैशी साहब ने एक कलाकार को आवाज़ दे कर कहा कि वह सुनाओ...शोखियों में घोला जाए, फूलों का शबाब...यह गीत भी इस महान कवि का ही लिखा हुआ है... a wonderful song indeed! 


मुझे अच्छे से याद है ..किस तरह से वह राज्यपाल महोदय इस गीत को सुनते हुए झूम रहे थे...वैसे तो वह ही नहीं, सारा ऑडीटोरियम ही मंत्रमुग्ध सा बैठा हुआ था..

ये गीत भी इन्हीं के ही हैं...सुनिएगा..ऐ भाई ज़रा देख के चलो...और खिलते हैं गुल यहां...



मैं उस दिन पहली बार इस महान हस्ती से मिला था...ये बहुत लिटरेट हैं..पहले कहीं प्रोफैसर रह चुके हैं...बहुत सहज स्वभाव के हैं...मैंने उस दिन इन से बात की और इन से ऑटोग्राफ भी लिए...जब यह एक कविता कह रहे थे तो यह वीडियो क्लिप भी बनाई ...आप भी सुनिएगा..कितना बेहतरीन अंदाज़े-ब्यां है इन का...

उस के बाद भी इन को दो-तीन प्रोग्रामों में देखने का मौका मिला... हर बार बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा..
इन के बारे में मैंने लिखने की सोच तो ली, लेकिन सूर्य को दिया तो क्या एक चिंगारी दिखाने जैसी बात भी नहीं है...इस हस्ती ने हमें सैंकड़ों बेहतरीन हिंदी फिल्म गीत दिए हैं...एक से बढ़ कर एक...जीवन की सभी संवेदनाओं से जुड़े हुए लगभग ... 

अच्छा एक काम करिए...इंटरनेट पर इन के बहुत से इंटरव्यू तो हैं ही, इन के ऐसे वीडियो भी सैंकड़ों होंगे जिन में ये कवि सम्मेलनों में शिरकत करते नज़र आते हैं...मेरे लिए इतना सब कुछ समेटना इस छोटी सी पोस्ट में नामुमकिन है ... मैंने एक कार्यक्रम में इन की लिखी कुछ किताबें भी खरीदी थीं, कभी कभी ज़रूर पढ़ता हूं ... लाजवाब लेखन.

हां, यह पोस्ट अचानक कैसे?...दरअसल पिछले दिनों इन की तबीयत नासाज़ थी...ये अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के भी बहुत करीबी हैं, वे इन का भरपूर सम्मान करते हैं..मुलायम सिंह इन का पता लेने यहां अस्पताल में गये हुए थे...अब सेहतमंद हैं. अस्पताल से छुट्टी हो गई है..९२ साल के हैं और आज की अखबार में इन की एक खबर दिखी ...कहते हैं मैं १०० साल पूरे करूंगा.....जनाब, नीरज जी, आप जैसी विभूतियां करोड़ों दिलों पर राज करती हैं, इन सब की दुआओं में आप शामिल हैं, ईश्वर करे आप कम से कम १५० साल जी कर लोगों को अपने शब्दों के जादू से मंत्रमुग्ध करते रहें.....आमीन!!
                                   इन की कुछ पंक्तियां ये भी हैं....
 यह वहशी ज़माना है..
हर हाथ में पत्थर है..
कि बच जाए 'गर शीशा.
यह उस का मुकद्दर है...

अब सोच रहा हूं कहां लिखने बैठूं...अपनी डायरी से फोटो खींच कर ही यहां चस्पा किए दे रहा हूं....अगर ठीक से न पढ़ा जाए, तो इस पर क्लिक कर के आप अच्छे से पढ़ सकते हैं....मुझे भी लिखने में आलस आने लगा है ...बुढ़ापा घेरने लगा है ऐसा लगता है....





उसने वट-पूजन के लिए इलाज किया मुल्तवी


कुछ महीने पहले एक महिला मरीज़ आई थीं..उसे जब बुलाया था..उस के भी बहुत दिनों बाद आईं...कारण बता रही थीं कि घर में तुलसी जी हैं, उन से संबंधित कुछ कार्यक्रम था...इसीलिए उस में व्यस्त रही...बताने वाली बात यहां यह है कि वह बात बात पर तुलसी को तुलसी जी के नाम से संबोधित कर रही थीं...मुझे अच्छा लगा, इतना आदर सत्कार...बहरहाल, तुलसी के ब्याह के बारे में तो आप सब जानते ही होंगे...यह भी बड़ी धूमधाम से किया जाता है ...वही बात है, अपनी अपनी आस्था है, मुबारक है।

आज भी एक महिला को मुंह की किसी सर्जरी के लिए बुलाया था..सुबह आईं अपने पति के साथ...गोंडा के किसी गांव की रहने वाली हैं..लखनऊ में बेटा नौकरी करता है ..यहां रहने आए हुए हैं लेकिन कुछ दिन के लिए वापिस जा रहे हैं...मुझे यह कहने आईं थी कि सावित्री वट पूजा के बाद ही कुछ करवा पाऊंगी...तब तक तो मैं कुछ सोच भी नहीं सकती...मुझे उत्सुकता हुई कि यह वट-पूजा आखिर है क्या!

इस वर्ष वट पूजा ५ जून को है...

उस के पति ने बताया कि उन के गांव में सदियों पुराना (उन्होंने ऐसा ही कहा!..उस के दादा के दादा के जमाने का) वट वृक्ष है...उस का पूजन होता है ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन...सभी महिलाएँ अपने पति की सलामती के लिए व्रत भी रखती हैं...वट का पूजन करने के बाद ही व्रत तोड़ती हैं..

महिला ने बताया कि गांव में वट-पूजन के दिन मेले जैसा माहौल हो जाता है ...खूब व्यंजन बनते हैं..लेिकन पूजा के बारे में कुछ ज़्यादा वह बता नहीं पाईं...

मेरी इस उत्सुकता का समाधान गूगल मामू ने कर दिया....सब कुछ अच्छे से देख लिया और आप के साथ शेयर भी कर रहा हूं..

देश में इतने आस्थावान लोग हैं ...कि बहुत बार मनोज कुमार की फिल्म का वह गीत याद आ जाता है ...यहां नदियों को भी मैया कह के पुकारा जाता है ..सच में धर्म-कर्म तो बहुत है ही ...और किसी भी आस्था के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथ्य तो रहते ही हैं..लेकिन जैसे जैसे स्वरूप बदलता गया, शायद उस वैज्ञानिक प्रतिपादन की तरफ़ ध्यान देना गौन होता गया...मुझे ऐसा लगता है ..

लेिकन कुछ भी हो, जनमानस में व्याप्त इस तरह की आस्थाएं मुझे बहुत सुख देती हैं...इतने पुरातन पेढ़ों की पूजा-अर्चना होगी तो ज़ाहिर सी बात है कि ये कुल्हाड़ी से बचे रहेंगे...

मेरी मरीज़ के पति ने बताया कि अगर कोई टहनी अपने आप गिर जाये तो अलग बात है ...लेकिन उसे हम लोग वैसे नहीं काटते.....उसने बताया कि उस के दादा के दादा को उसी जगह पर बाघ खा गया था...उसी समय से निरंतर वहां वट की पूजा होती है ..

मैंने देखा यू-ट्यूब पर तो पता चला कि यह वट-पूजा समझ में आ गई...वट को बरगद भी कहते हैं और इंगिलश में banyan tree...देश में जगह जगह पर इस के बहुत पुराने-पुरातन पेड़ हैं...आप भी गूगल करिए और देखिए...


हिंदी के अखबार में हर सप्ताह एक सूचना दिखती है ..इस सप्ताह में पड़ने वाले व्रत-त्योहार ...और अकसर जब मैं सूची देखता हूं तो समझ में आता है कि हर दिन कोई न कोई व्रत है, कोई न कोई त्योहार है...वैसे तो इस देश में हर दिन एक जश्न है...
एक चुटकुला याद आ गया ...सुबह एक साथी मधुर बंसल ने भेजा था... 
पिंजड़े में बंद एक मिट्ठू मियां को पंजाबी मालिक कहता है ..हां भई मिट्ठू, जलेबियां खाएंगा?
मिट्ठू मियां ने दिया करारा सा जवाब....जलेबियां अपनी मां नूं खवा...सालेया,पहलां मिर्चां खवा खवा के बवासीर करवा दित्ती, हुन जलेबियां खवा के शुगर करवाएंगा की?😄😄😄😄😄
कभी भी पूजा-अर्चना के बाद ...प्रसाद तो मिलता ही है ..यहां पर दिखा देते हैं...पिछले दिनों खूब साईकिल चला लिया, टहल लिया..अब उसे काउंटर करने के लिए घर में कुछ डिब्बे आज दिख रहे है...सोन पापड़ी, ड्राई पेठा...मुझे ड्राई पेठा देख कर अच्छा लगा... खाने में भी बहुत अच्छा है...आज पहली बार देखा कि ह्लदीराम कंपनी इस पेठे को भी तैयार करती है...😄😄 ...बाज़ार में लोकल कंपनियों का मिलता तो है ..लेकिन हर बार अलग अलग ...कभी भी क्वालिटी ठीक नहीं लगी... चलिए, अब इस पूजा के सामान को समेट लिया जाए....गीतकार नीरज की कुछ बातें आप से करनी हैं अभी.. ..