Thursday, December 18, 2014

समय तू धीरे धीरे चल...

कितनी बार होता है कि हम बीते हुए दिनों की याद में कहीं खो जाते हैं और लगता है कि यार, कल की ही तो बात है...समय इतनी जल्दी आगे चला आया।

मेरे साथ तो ऐसा बहुत बार होता है .....कोई पिछले दिनों की तस्वीर दिखने पर भी यही अहसास होने लगता है। एक तस्वीर से हमारी कम से कम सैंकड़ों यादें जुड़ी होती हैं, है कि नहीं? थैंक-गॉड तब शेल्फी न होती थी, शायद इसलिए हम लोग फोटो को सहेजने की कीमत जानते थे।
यादों के झरोखे से........समय तू धीरे धीरे चल..
मेरी स्टडी के एक दराज में कल मुझे यह फोटो दिख गई......सारा ज़माना याद आ गया....यह तस्वीर १९९५ के आसपास की है.....मेरी और मेरी बीवी की पोस्टिंग उन दिनों बम्बई सेंट्रल में ही थी। यह बड़ा बेटा है....यह मेरे साथ बड़ी मस्ती किया करता था....ईश्वर की कृपा से आजकल यह कंप्यूटर इंजीनियरिंग करने के बाद डिजिटल मीडिया में लगा हुआ है.....अपने काम में मस्त है। इसी ने ही मुझे कंप्यूटर पर हिंदी लिखना सिखाया था.....छःवर्ष पहले मैंने उसका धन्यवाद भी किया था.....आप इसे इस लिंक पर देख सकते हैं........थैंक-यू, विशाल.. (बॉय गाड मुझे नहीं याद कि मैंने इस पोस्ट में छः साल पहले क्या लिखा था, पेशेखिदमत है वैसी की वैसी.....बिना किसी कांट-छांट के).

हां, तो बात हो रही थी समय के बहुत जल्द जल्द बीत जाने की......दो चार दिन पहले मैं जब दिल वाले दुल्हनिया के १००० हफ्ते पूरे होने की खबरें देख-सुन रहा था तो यही सोचने लगा कि यार, यह तो हम लोगों ने १९९५-९६ में देखी थी, और अभी तक १००० हफ्ते ही हुए हैं.....मराठा मंदिर के पास ही हमारा ऑफिस था, सन् २००० तक तो हमने स्वयं देखा कि यह फिल्म टिकी हुई थी......फिर हमारा तबादला हो गया.....और तब से हम पंजाब, हरियाणा, यू.पी में घाट घाट का पानी पी रहे हैं। फिल्म टिकी ऐसी हुई थी कि सुबह का पहला शो मराठा मंदिर टॉकीज़ में इस DDLJ का ही चलता था, बाकी के शो दूसरी फिल्मों के चला करते थे।

एक बात और, यह जो तस्वीर मैंने यहां टिकाई है, ऐसी तस्वीरें देख कर अकसर मुझे उस गीत का मुखड़ा बहुत याद आ जाता है...... आप भी सुनिए और इस के बोलों में खो जाइए.......समय तू धीरे धीरे चल.....आज का दिन मेरी मुट्ठी में है, किस ने देखा कल......गीत मैं यहां एम्बेड नहीं कर पा रहा हूं.......आप इस लिंक पर क्लिक कर के सुनिएगा ज़रूर। मुझे भी यह गीत सुनना बहुत अच्छा लगता है।

यार, अभी तो हम लोगों ने अच्छे से एंन्ज्वाय ही कहां किया और हम उम्र के इस पढ़ाव में पहुंच भी गए।

हां, एक बात और ध्यान में आ गई..........याद होगा मैंने कुछ महीने पहले देश के मशहूर बाल रोग विशेषज्ञ डा आनंद से आप का तारूफ़ करवाया था...याद है?..... नहीं भी याद तो अब मिल लें, इस लिंक पर क्लिक करिए..... डा आनंद से मिलिए. मैंने उन जैसा बालरोग चिकित्सक अभी तक नहीं देखा।

वे अकसर कहा करते थे कि बच्चों को बढ़ता देखना खूब एन्ज्वाय किया करो, समय बहुत जल्दी मुट्ठी में बंद रेत की तरह खिसक जाता है...और बच्चे बहुत जल्द सयाने हो जाते हैं....कितनी सही बात है ना!!


दांतों की जड़ में भी कीड़ा लग जाता है

मरीज़ों की बातें सुन सुन कर हम लोग भी उन की ही भाषा बोलने लगते हैं, होता है, आदमी सुबह से शाम जैसी संगत में रहेगा वैसे ही बोलने लगेगा......मजाक की बात, सीरियस न हो जाएं।

सच में दांत का कीड़ा वीड़ा कुछ होता नहीं है, यह केवल दांत की सड़न है जिसे पता नहीं कितने समय से लोगों ने कीड़े की संज्ञा दे दी और बस लीक की फकीरी की सुंदर परंपरा के चलते वही नाम चल निकला.......और इस गलत नाम को और भी पुख्ता किया उन सड़क-छाप दांत का इलाज करने वालों ने जो परेशान मरीज़ को रूमाल में कुछ कीड़ा सा निकाल कर दिखा देते हैं.....अब वे ये कैसे करते हैं, यह मैं नहीं जानता, बस, आप इतना याद रखिए कि दांत की कीड़े नाम के किसी जीव-जंतु का वजूद है ही नहीं।

तो फिर यह सब लफड़ा है क्या?....दरअसल बात यह है कि दांतों में खाना फंसने की वजह से उन पर जब मुंह में मौजूद लाखों-करोड़ों जीवाणु (bacteria) टूट पड़ते हैं तो एसिड (अमल) पैदा होता है जो दांतों को साड़ देता है....एक बार शूरू हो जाने पर यह एक सतत प्रक्रिया है....यह फिर धीरे धीरे दांतों में छेद पैदा कर देती है, सड़न तो होती ही है, जिस से कालापन रहता ही है, इसलिए इसे बुलाया जाने लगा दांत की कीड़ा।

पोस्ट तो मैंने बस आप से यह शेयर करने के लिए लिखी थी कि दांत का कीड़ा (यार, मुझे तो कीड़ा कहने की पक्की लत लग चुकी है, माफ़ कीजिएगा, मैं तो भाई कीड़े शब्द का ही इस्तेमाल करूंगा)...केवल दाड़ों में ही नहीं लगता, कहने का भाव वहीं पर नहीं लगता जहां पर आप को खड्डे दिखें या फिर दांतों की जिन सतहों से हम चबाया करते हैं.......बल्कि किसी भी दांत की जड़ को भी कीड़ा लग सकता है।

दांत की जड़ का दंत-क्षय (root caries)
रोज़ाना मेरे पास बहुत से मरीज़ ऐसे आते हैं जिन की दांतों की जड़ों में कीड़ा (दंत-क्षय) लग चुका होता है......और बहुत से तब आते हैं जब यह दांत की सड़न नीचे दांत की नस तक पहुंच चुकी होती है.....लेकिन कुछ कुछ अपनी सेहत का ध्यान भी रखते हैं जैसे कि यह साहब जिन की उम्र ६१ वर्ष की है, इन्हें लगा कि यह काला क्यों पड़ रहा है, इसलिए ये दिखाने आए थे।

यह दांत के जड़ की एक उदाहरण है.....जैसा कि आप देख रहे हैं....इस का इलाज बेहद आसान है.....क्या है ना, इस दंत-क्षय को हटाने के बाद हम लोग इस में एक ऐसा मैटीरियल भर देते हैं......जो दांतों के कलर से बिल्कुल मेल खाता है, किसी को पता भी नहीं चलता .......मामला बिल्कुल फिट.........इस तरह के मैटिरियल को ग्लास-ऑयोनोमर कहते हैं। यह कितना समय चलता है, आज से पच्चीस वर्ष पहले जिन लोगों में मैंने किया था, अभी भी वैसे का वैसा ही है, मेरा भाई भी उस में शामिल है। वैसे इस में मेरी कोई जादू नहीं है, यह मैटीरियल ही ऐसा है, बस इस तरह का काम करवाएं किसी प्रशिक्षित दंत चिकित्सक से ही........क्या है ना अगर किसी नीम हकीम के चक्कर में पड़ गए तो वह किसी और लफड़े में भी डाल सकता है, और ये लफड़े कौन कौन से हैं, लिस्ट बहुत लंबी है, फिर कभी इस पर चर्चा करेंगे।

वैसे इस तरह का काम करने के लिए कईं और भी मैटीरियल हैं, लेकिन मैं ग्लास-ऑयोनोमर फिलिगं को ही तरजीह देता हूं...किसी भी अच्छे इम्पोर्टेड ब्रॉंड को, जो ब्रांड मैं पच्चीस वर्ष पहले इस्तेमाल किया करता था, आज भी उन्हें ही करता हूं.....लेकिन लोकल स्तर पर तैयार ये मैटिरियल बिल्कुल बेकार हैं, रद्दी हैं......बस इतना ध्यान रखना होता है।

हां तो बात चल रही थी, दांत की जड़ की सड़न की। अधिकतर इसे बड़ी उम्र के लोगों में देखा जाता है.....अधिकतर....लेकिन पैंतीस-चालीस की उम्र में भी इसे देखता ही हूं। इस का कारण है कि उम्र बढ़ने के साथ हमारे मुंह में पलने वाले जीवाणुओं की किस्म में भी थोड़ा बदलाव आता है, बुज़ुर्गों के मुंह में जो जरासीम रहते हैं, वे इस तरह से दांतों की जड़ों की सड़न पैदा की क्षमता रखते हैं।

यही एक कारण नहीं है, कारण और भी हैं, ब्रुश और दातुन के गलत इस्तेमाल से दांत के ऊपरी हिस्से (क्राउन) और जड़ के बार्डर पर मौजूद एक पतली सी लेयर हट जाती है......वहां पर थोड़ा सा खड्डा हो जाता है, फिर वह खाने फंसने की एक जगह बन जाती है......बस, फिर तो वही सारी दंत क्षय की प्रक्रिया शुरू।

लेकिन आप इतना भारी भरकम समझने के चक्कर में भी मत पड़िए.....चुपचाप किसी प्रशिक्षित दंत चिकित्सक से छःमहीने में एक बार अपने दांतों का निरीक्षण करवा लिया करिए......सही ढंग से ब्रुश करने का इस्तेमाल सीख लें (सीखने की कोई उम्र नहीं होती, झिझकिए मत), और हां, देश में बिकने वाले हर तरह के खुरदरे मंजनों-पेस्टों से दूर रहें, ये दांतों का हुलिया ऐसा बिगाड़ देते हैं कि दांतों की सड़न की तो छोड़िए, दांत इतने कट-फट जाते हैं कि वे पहचान में भी नहीं आते.......अगली पोस्ट में इस को जिक्र करूंगा।

और हां, दांतों की जड़ों के दंत-क्षय से भी बचे रहने का एक सुपरहिट फार्मूला और भी है......हमेशा फ्लोराइड-युक्त पेस्ट ही इस्तेमाल करें.......इस के बारे में बीसियों भ्रांतियों पर रती भर ध्यान न दें, मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं ना...... छोटी छोटी बातें मानते रहिए और सदैव मुस्कुराते रहिए। 

पायरिया रोग बिना लक्षणों के भी पनपता रहता है...

दांतों के किनारे पर जमी हुई मैल की परत..टारटर 
यह तस्वीरें जिस महिला के मुंह की हैं, इस की उम्र कुछ ज्यादा नहीं है, यही ३०-३५ के पास ही रही होगी.....दो दिन पहले मुझे दिखाने आईं थी कि दांतो में थोड़ा ठंडा लगने लगा है।

अगर मैं कहूं कि यह तस्वीर शायद बहुत से भारतीयों के मुंह की तस्वीर है तो शायद अतिशयोक्ति न होगी... क्योंकि जैसा आप महिला के मुंह में देख रहें कि दांतों के किनारे किनारे मैल की परत जमी हुई है....इसे डैंटल भाषा में टारटर कहते हैं....यह सीधा ऐसे ही नहीं जम गया......पहले इस स्थान पर प्लॉक बनता है--मैल की पतली सी झिल्ली जो बाद में पड़ी पड़ी इस तरह की ढीठ हो कर पत्थर जैसी बन जाती है।

यही पायरिया रोग की जड़ है.....आप देख सकते हैं किस तरह से नीचे के दांतों के मसूड़े भी सूजे से हुए हैं। पर इस मोहतरमा को इस सब से कोई परेशानी नहीं है, शिकायत नहीं है। लेिकन अगर ये बहुत समय तक बिना इलाज के रही तो यह पायरिया बढ़ कर नीचे जबड़े की हड्‍डी में चला जाएगा.....मसूड़ें दांतों को छोड़ने लगेंगे, मसूड़ों से पस निकलने लगेगी, दांत हिलने लगेंगे....भयानक किस्म की बदबू मुंह से आने लगेगी आदि आदि।

इसी महिला के मसूड़े भी फूले हुए हैं...इसे जिंजीवाईटिस भी कहते हैं
लेकिन ये सब शुरूआती दौर के पायरिया रोग के वे लक्षण हैं जो मरीज़ को नहीं दंत चिकित्सक को साफ साफ दिख जाते हैं....ऐसे में क्या करें, कुछ नहीं, बस...दंत चिकित्सक से इस का इलाज करवाएं.....दांतों को सही ढंग से साफ़ करने का तरीका उस से सीखें......रोज़ाना रात को सोने से पहले अच्छे से ब्रुश करिए, कुछ भी खाने के बाद कुल्ला करें, तंबाकू उत्पादों से मीलों दूर रहें......और क्या, कुछ नहीं।

टीवी..अखबारों में विज्ञापन में दिखाई जाने वाली ठंडा-गर्म पेस्टों को अपनी मर्जी से ना खरीद लिया करें......इस से कुछ फायदा होने वाला नहीं...बेकार में आप की परेशानी खत्म होने की बजाए, कुछ समय के लिए शायद दब जाए, और फिर बाद में ज़्यादा उग्र रूप ले लेगी....और अगर कहीं परेशानी दब गई तो आप समझने लगते हैं कि फलां फलां ने तो कमाल कर दिया.......नहीं ऐसा कमाल हो ही नहीं सकता, दांत की तकलीफ़, मसूड़ों की तकलीफ़ के लिए प्रशिक्षित एवं अनुभवी दंत चिकित्सक का रूख करना ही होगा।

वैसे बीमारी होते हुए भी अगर मरीज़ के मुताबिक उस में कोई भी लक्षण न हों, और उसे परेशानी न हो, तो यकीन मानिए, मरीज़ को इलाज के लिए तैयार करने में प्यारी नानी याद आ जाती है, हमें यही होता है कि रोग तो इस में हैं, अगर इलाज अभी नहीं हुआ तो यह आगे बढ़ता बढ़ता इतना बढ़ जाएगा कि हम अकसर फिर कुछ कर नहीं पाते......पायरिया जब हद से बढ़ कर हड़्डी में पहुंच जाता है तो इलाज करना और करवाना हर एक के बस की बात भी नहीं होती....बेहतरी इसी में है कि समय रहते ही इस तरफ़ ध्यान दे कर, सांसों को महकाए रखा जाए। आप का क्या ख्याल है?

अपना ख्याल रखिएगा। 

अकल की दाड़ से परेशानी

अकल की दाड़ की रगड़ से होने वाला ज़ख्म 
यह जो तस्वीर आप देख रहे हैं यह एक १८ साल के युवक के मुंह की तस्वीर है....आप देख रहे हैं तस्वीर की बाईं तरफ़ एक घाव है।

यह घाव इसलिए बना हुआ है क्योंकि इस की ऊपर वाली अकल की दाड़ पूरी तरह से नहीं निकल पाई है और जितनी निकली भी है वह भी टेढ़ी-मेढ़ी--तिरछी......इस दाड़ की रगड़ से इसे दो तीन बार पहले भी ज़ख्म हो चुका है.....कुछ अकल की दाड़ें होती हैं जिन के सही ढंग से मुंह के उतरने की हम प्रतीक्षा कर सकते हैं, लेकिन इस युवक की दाड़ उस श्रेणी में नहीं आती।

मैंने इसे बहुत बार कहा है कि इसे निकालने से ही बात बनेगी..वरना बार बार परेशान होते रहोगे। शायद अभी छोटा है, अकेला ही आता है, इसलिए अभी उस के बारे में इतने ध्यान से सुनता नहीं लगता, कोई बात नहीं।

इस घाव का इलाज कुछ विशेष नहीं है....जब भी इस घाव के साथ आता है तो मैं गाल के इस हिस्से में गढ़ रही अकल की दाड़ को थोड़ा सा ग्राईंड कर देता हूं जिससे उस के कोने मुलायम हो जाते हैं ...और यह घाव दो-तीन दिन में ठीक हो जाता है (मरीज़ों की भाषा में सूखने लगता है)..इस के लिए सामान्यतयः किसी ऐंटिबॉयोटिक आदि की ज़रूरत नहीं पड़ती लेकिन इस युवक को तीन-चार दिन लेने पड़े थे जब कुछ महीने पहले इस तरह का जो घाव बना था उस में इंफेक्शन हो गई थी।

साथ में इस घाव पर लगाने के लिए कोई दर्द-निवारक जैल सा दे दिया जाता था, साथ में वही गर्म गुनगुने पानी से कुल्ले.....और क्या, कुछ नहीं.....खाने पीने में थोड़ी एहतियात कि ज़्यादा मिर्च-मसाले से कम से कम दो चार दिन दूर ही रहा जाए, बाकी कुछ भी खाया जाए।

कुछ अन्य लेखों के जरिए आप से शेयर करूंगा कि अकल की दाड़ किस तरह से बहुत बार परेशानी का सबब बनती है।

एक बार सुनाऊं ... बड़ी रोचक.......अकसर लोग अकल की दाड़ और अकल का सीधा सीधा संबंध समझते हैं.....कुछ पूछ भी लेते हैं कि अगर अकल की दाड़ निकलवाएंगे तो समझ पर तो फर्क नहीं पड़ेगा....फिर उन्हें बता दिया जाता है कि इस दाड़ का अकल से केवल इतना संबंध जाता है कि यह आम तौर पर मुहं में तब प्रवेश करती है जब आदमी में बुद्धि का विकास हो रहा होता है.....अर्था्त् १७ से २१ वर्ष की उम्र में यह मुंह में दिख जाती है, इसलिए अकल की दाड़ कहलाती है, बस। तब कहीं जा कर उन की सांस में सांस आती है..और वे दाड़ उखड़वाने के लिए राजी होते हैं।