Thursday, January 7, 2016

गुड़ नालों इश्क मिट्ठा..

बचपन में हमारे पड़ोस की एक दादी आसपास की औरतों को दोपहर में इक्ट्ठा कर के सुख सागर, गरूड़-पुराण सुनाया करती थीं... मुझे भी इसी से ध्यान आ गया... गुड़ पुराण !

आज लिखते समय बार बार गुड़ का ध्यान आ रहा है ...मैं बिल्कुल वैसी ही बात कर रहा हूं जैसे वह बाबा करता है जिसके टीवी शो में लोग पांच-छः हज़ार का टिकट खर्च कर आते हैं...पैसे एडवांस में देते हैं ..इस टिकट की राशि में लगभग एक हज़ार रूपया तो मनोरंजन टैक्स होता है (मैंने उस बाबा की वेबसाइट से चेक किया है)..आप ने देखा होगा ज़रूर इस शो को टीवी पर...अकसर रिमोट से खेलते हुए मुझे भी कईं बार यह दिख जाता है ...इस बाबा के श्रद्धालु जिस तरह से अपनी व्यथा ब्यां करते हैं, उन की बात सुन कर आंखें नम हो जाती हैं बहुत बार...कैसे बच्चों की तरह गिड़गिड़ा कर सुबकते हुए वे अपनी फरियाद बाबे तक पहुंचाते हैं....लेिकन तभी बाबा को कहीं से गुलाब जुमान दिखने लगते हैं या मीठे चावल आ जाते हैं उस के ध्यान में और श्रद्धालु से पूछताछ शुरू हो जाती है कि पिछले बार गुलाब-जुमान कब खाये थे?...बाबा, हां, दो दिन पहले ही खाए थे, जवाब मिलता है। 

तभी कृपा के सागर बाबा कहते हैं अकसर... ठीक है, लेकिन जाओ जा कर आधो किलो बांट भी दो, रुकी हुई कृपा फिर से शुरु हो जायेगी...सच में मैं उस कार्यक्रम को एक मनोरंजन के तौर पर ही कभी दस पांच मिनट देख लिया करता हूं...लेकिन जनता जनार्दन की परेशानियां और जिस तरह से उन का समाधान सुझाया जाता है, उससे मुझे बहुत परेशानी होती है। और क्या कहें, कोई किसी को किसी जगह जाने पर विवश तो कर नहीं रहा। अपनी अपनी (अंध)श्रद्धा की बात है!

लेिकन मुझे तो गुड़ का ध्यान आ रहा था... कल शाम से ही आ रहा है...दरअसल मैंने यहां लखनऊ में दो तीन दिन पहले एक बिज़ी रोड़ पर देखा कि एक बैल गाड़ी पर एक गुड़ का जैसे कोई पहाड़ सा लदा हुआ था और वह खूब बिक रहा था ..कल भी लखनऊ की एक बहुत विशेष रोड़ जेल रोड पर यह मंजर दिखा...मैं शाम के समय ड्यूटी से लौट रहा था।

अकसर इस जेल रोड पर कभी भी जाम  नहीं लगता...यह सड़क वैसे ही इतनी खुली है..फिर भी लोग गलत साइड से अब इस पर निकल पड़ते हैं, यू-टर्न से बचने के लिए... किसी अनहोनी के होने पर ही लोग इस पर इक्टठा हुआ दिखते हैं...मैंने भी दूर से देखा कि बहुत से लोग जमा हैं तो मुझे लगा कि शायद सब कुछ ठीक नहीं है....खैर, थोड़ा दूर जाने पर दो बैल गाड़ियां दिख गईं ...गुड़ और शक्कर से लदी हुईं, और लोग उसे खरीदने में पूरी तन्मयता से जुटे हुए थे। 

एक दो मोटरसाईकिल सवारों पर को मैंने जब गुड़ खाते देखा ..जैसे ही उन का ध्यान मेरी तरफ़ गया तो हम सब एक साथ हंसने लगे...मुझे लगा कि उस वक्त बड़े-छोटे सभी छोटे बच्चे से बने हुए थे...गुड़ को देख कर! गुड़ का ऐसा जादू!




मैं भी रूक गया....इस मेले को देखने के लिए...इंट्रस्टिंग बात सब से यह थी कि पैदल और साईकिल चलने वाले, दो पहिया और चार पहिया पर चलने वाले सभी इस खरीददारी में मशगूल थे...मैंने भी सुना कि गुड़ पचास रूपये किलो बिक रहा है... जहां तक मुझे ध्यान है बाज़ार में भी यह इसी दाम पर बिकता है...लेिकन लोगों का क्रेज़ देखते बन रहा था ...बिल्कुल वैसे जैसे आम या तरबूज के मौसम में जब बैल गाड़ी पर ये सब बिक रहे होते हैं तो भी अचानक बहुत से लोग वहीं से खरीदने के लिए रुक जाते हैं।

कल मैंने देखा कि उस बैलगाड़ी वाले दुकानदार का एक साथी सभी खरीददारों को पहले थोड़ा सा गुड़ चखने के लिए दे रहा था...मैंने भी खाया?....नहीं, मैंने नहीं लिया... कारण?...मैं सुबह से लेकर रात सोने तक विभिन्न रूपों में वैसे ही इतना गुड़ खा लेता हूं कि उस समय ज़रूरत महसूस नहीं हुई... न चखने की न ही खरीदने की... बस, मैं इतना सोचते हुए आगे बढ़ गया कि यहां पर भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (fssai) के सामने कितनी चुनौतियां हैं...इस देश में तो हर गली-नुक्कड़ पर सब कुछ ऐसे ही संरक्षा एवं मानकों से  बेपरवाह ही तो बिक रहा है...


ध्यान यह भी आ रहा था कि हम लोग किसी पर भी कितनी जल्दी भरोसा कर लेते हैं..पता नहीं कहां से हमारे खाद्य पदार्थ आते हैं, कहां तैयार हुए किन परिस्थितियों में ....हम कुछ नहीं जानते, हम बस यह जानते हैं कि यह देखने में अच्छा है, और यह बात हमारे मन में बैठ चुकी है कि जो चीज़ सीधा गांव से आ रही है, वह बिल्कुल ठीक है, सेहतमंद है, इस में कोई मिलावट नहीं है, बस, जो भी है, सब कुछ ठीक ठाक है।

सोचने वाली बात है  कि क्या हमारी यह सोच ठीक है?....क्यों fssai एवं उपभोक्ता मामलों से संबंधित विभाग आए दिन पैकेजिंग एवं मिलावट जैसे विषयों पर एक अभियान छेड़े रहते हैं! रेलवे स्टेशनों पर भी तो हम सब को कितना चेताया जाता है कि कहां से खाने-पीने की चीज़ लेनी है, कहां से नहीं लेनी है!...आप को क्या ठीक लगता है कि हम ऐसे ही बीच रास्ते से कुछ भी खरीदने लगें ...और एक स्थायी ठेले से भी नहीं, किसी खोमचे से नहीं जिन का एक पक्का ठिकाना होता है, लेिकन यहां तो पता ही नहीं, बैलगाड़ीयां कहां से आईं,  कहां जाएंगी...फिर से ये घुमंतू "व्यापारी" कभी दिखेंगे भी या नहीं। 

बहरहाल, कुछ समय के लिए इन सब सिर दुःखाने वाली बातें यही छोड़ देते हैं...मुझे गुड़ की अच्छी अच्छी पुरातन यादें गुदगुदाने लगी हैं...सब से पहली याद गुड़ की यही है कि उस दिन मेरा स्कूल का पहला दिन था..१९६७ के आस पास की बात है ....मेरे दोस्त देवकांत ने और मैंने स्कूल जाना था..दोपहर के बारह साढ़े बारह बजे का समय .. ईवनिंग शिफ्ट में .. देवकांत मेरे से बस कुछ दिन सीनियर था, हमारे पड़ोस में रहता था..इसलिए मेरी कमान मेरी मां ने उस के हाथ में सौंप दी थी कि इसे भी अपने साथ ले जा (उस दौर के सभी मां-बाप के विश्वास, भरोसे और सकारात्मक सोच की भी दाद देनी पड़ेगी) ...दरअसल अभी स्कूल देखने ही जाना था, मुझे धुंधली याद है कि आज जा कर स्कूल देख कर आ, बैठना सीख ले ...फिर टोपी वाले हैड-मास्टर (उस स्कूल के हैडमास्टर को हम सब ऐसे ही बुलाते थे) से कह देंगे दाखिले के लिए...हां, उस अमृतसर के डैमगंज स्कूल का वह टोपी वाला हैड-मास्टर हमारी कालोनी में साईकिल पर घूम घूम कर बच्चे उस के स्कूल में दाखिल करने को कहा करता था। 

हां, तो उस स्कूल के पहले दिन की बात है .... मुझे मां ने एक पीतल की गोल सी डिब्बी में एक परांठे के साथ एक गुड़ की डली दी और मैं और देवकांत स्कूल के लिए चलने ही लगे थे कि मेरे पिता जी आ गये ...उन्होंने मुझे दस पैसे का सिक्का थमा दिया...पीतल का हुआ करता था...मेरी तो जैसे लाटरी निकल गई। अभी यहां पोस्ट में चिपकाने के लिए नेट पर ढूंढा तो पता चला कि अब यह भी OLX पर बिक रहा है। 

हम दोनों स्कूल की तरफ़ चल पड़े .... शायद एक किलोमीटर की दूरी होगी घर से स्कूल की या इस से भी कम... लेकिन बीच में एक मैदान आता था...हम ने सोचा कि पहले रोटी खा ली जाए..इस भार को साथ उठाने से क्या हासिल, हम ने पहले तो खाना खाया... फिर, स्कूल के बाहर दस पैसे से पिपरमिंट की चरखियों की खरीददारी कीं ...दस पैसे में खूब मिल गईं... दस बारह के करीब... हम दोनों के लिए काफ़ी थीं...पहले उन के साथ खेले...फिर उन्हें खा लिया... बस, इतना ही याद है पहले दिन के बारे में.. पढ़ाई वढ़ाई का कुछ याद नहीं कि क्या हुआ क्या नही हुआ! 

आज जब गुड़ की यादें चल ही निकली हैं तो मुझे भी आइना देखने का एक मौका तो मिल गया कि मैं कितना मीठा, कितना गुड़ और शक्कर खाता हूं.. शूगर की जांच करवाई थी, कुछ महीने पहले, ठीक है... लेकिन मैं अकसर सोचता हूं कि क्या इस का मतलब यह है कि मैं इस का गलत फायदा लेता रहूं....बहुत सोचता हूं लेकिन मजबूर हूं...शायद आज इस पोस्ट लिखने के बाद मुझे कुछ प्रेरणा मिले.... बचपन से ही चीनी, शक्कर, गुड़ खाने का बहुत शौक था... हर जगह के खान पान के अपने कायदे हैं, ठीक है, यहां लखनऊ में देखता हूं कि मूंगफली लेते हैं तो साथ में नमक की पुड़िया देते हैं, कहीं कहीं हरी, तीखी चटनी की थैली भी दे देते हैं साथ में....और देखता हूं यहां जब लोग मूंगफली खाते हैं और साथ में थोड़ा नमक चाट लेते हैं....कोई खास मसाले वाला नमक होता है... ठीक है, अपना अपना खान पान है, लेकिन सेहत की नज़र से देखा जाए तो यह ठीक नहीं है, जितना नमक हम लोग कम लेंगे उतना ही हमारी सेहत के लिए ठीक है ......हां, नमक ठीक नहीं है तो गुड़ भी ठीक नहीं है इतना खाना....हम लोगों को बचपन से ही मूंगफली के साथ गुड़ खाने की आदत पक्की पड़ी हुई है ...बचपन से देखते हैं कि हम लोग अगर पचास पैसे की मूंगफली लेते थे तो लिफाफे में वह थोड़ी सी गुड़ की गोलकार रेवड़ियां भी डाल दिया करता था... बचपन के बाद से फिर वे कभी दिखी नहीं... फिर वे सफेद रंग की गुड़ और चीनी से बनने वाली चपटी सी रेवडियां मिलनी शुरू हो गईं। मैं आज भी उन बचपन वाली रेवडियों को मिस करता हूं। 

गुड़ का भरपूर इस्तेमाल होता रहा .. हो रहा है.. गुड़ की पट्टी, रेवड़ी, गज्जक, सौंठ गुड़....पता नहीं यार क्या क्या...दही में गुड़ की शक्कर ....बचपन से ही निरंतर सर्दी के मौसम में मक्की की रोटी को रोज़ाना एक बार गुड़ के साथ खाना, कभी कभी गुड़ वाले चावल ... और कभी कभी गुड़ वाला दलिया.....अपने आप से पूछ रहा हूं कि कितना गुड़ खा लेते हैं हम लोग! गर्मी के मौसम में इस आदत पर थोड़ा लगाम ज़रूर लग जाती है...थैंक गॉड..लेिकन फिर भी गुड़ या शक्कर में तैयार सत्तू, गुड़ वाले चावल और दलिया तो बहुत बार खाते ही रहते हैं गर्मी के दिनों में भी!

किसी भी आदत को छोड़ना बहुत मुश्किल है... मेरे लिए किसी को कहना कितना आसान है कि आप आज ही से गुटखा, पान मसाला छोड़ दीजिए, बीड़ी फैंक दीजिए.....जब कि मैं अपने मीठे पर ही कंट्रोल नहीं कर पा रहा हूं....चाय भी ऐसी पीता हूं जिस में काफ़ी चीनी होती है .. यह आदत मुझे लगता है मुझे अपनी नानी से पड़ी होगी.....उन की चाय का कोई जवाब नहीं होता था, मां भी ऐसी ही चाय पसंद करती हैं। 

मीठे पर कुछ कंट्रोल तो इस चक्कर में हो गया कि लगभग १०-१५ साल से मिठाईयां लगभग बंद ही हैं ...शायद साल में एक दो बार ही हम लोग खाते होंगे .. दरअसल दस पंद्रह साल पहले तक पंजाब में रहते हुए हम लोग बर्फी, गुलाब जामुन, जलेबियां खूब खाते थे...फिर मिलावटी, सिंथेटिक, कैमीकल दूध, मिलावटी खोआ, और ट्रांस्फैट्स के बारे में लोग जागरूक होने लगे और हम भी .. और मैंने भी समाचार पत्रों में इन विषयों के बारे में लिखना शुरू कर दिया... बस, इसी चक्कर में इन सब चीज़ों से नफ़रत सी होने लगी ...इसलिए इन का सेवन न के बराबर ही है...बेसन के लड़्डू अभी भी एक कमज़ोरी है लेिकन।

बहुत बार मन को समझाना पड़ता है ...कल बाद दोपहर मैं यहां लखनऊ के केसरबाग चौराहे से गुजर रहा था... वहां पर एक खस्ता-कचौड़ी की दुकान है ..उस की महक इतनी बढ़िया थी कि मैंने अपनी पत्नी को कहा कि मेरी इच्छा हो रही है कि मैं दो चार खस्ता कचौडी खा लूं.....लेकिन मजबूरी है मेरी ... बाहर का कुछ भी खाने से मेरी तबीयत खराब हो जाती है, विशेषकर अगर वह सब मैदा (refined flour) से बना हुआ हो तो ....बस, मन ममोस कर रह जाना पड़ा....लेिकन मीठे पर पता नहीं काबू नहीं हो पाता!






वापिस गुड़ की कुछ बातें कर लें.... हम लोगों ने सुना है कि ताज़ा गुड़ जब गांव में बन रहा होता है तो बिल्कुल हलवे जैसा स्वाद होता है .. अभी यू ट्यूब पर इस के तैयार होते समय की एक वीडियो भी दिख गई...ऊपर इस पोस्ट में उसे एम्बेड किया है।

मुझे फल और सब्जी की तो ठीक ठीक पहचान है लेकिन मैं यह कम ही पहचान पाता हूं कि कौन सा गुड़ ठीक है, कौन सा ऐसा ही है ...ठीक का तो पता नहीं लेकिन खराब को तो पहचान ही लेता हूं ... उस दिन अमीनाबाद में घूम रहा था तो वहां पर कुछ गुड़ की दुकानें देख कर मैं रुक गया... उस दुकानदार ने इतने तरह का गुड़ गिनवा दिया ...कि मैंने भी तीन चार तरह का खरीद ही लिया...गुड़ की शक्कर भी खरीदी... लेिकन फिर कुछ दिन बाद जब उधर से गुड़ की शक्कर लेने के लिए गया तो वह लाल रंग की दिखी.......नहीं ली, नकली रंग (artificial colors)  वाली कोई भी चीज़ हमारी सेहत के लिए बहुत खराब होती है ...अकसर हम लोग कुछ रंग बिरंगा गुड़ भी देखने लगे हैं.. लाल-गहेर पीले रंग वाला ......देखते हैं न?...जितना अल्प ज्ञान मेरा है इस विषय के बारे में, उस के अनुसार तो यह ठीक नहीं होता, कुछ न कुछ तो खराबी होती ही होगी! 

Oh my God!....गुड़ की इतनी बातें... हां, लेकिन एक बात और याद आ गईं...इस गुड़-शक्कर के चक्कर में मैं अपने बहुत से दांत भी खराब करवा चुका हूं... डैंटिस्ट हूं लेकिन फिर भी ... यह इस पोस्ट में इसलिए लिख रहा हूं कि खेल के नियम सब के लिए एक जैसे होते हैं ... जो भी इस तरह के खाद्य पदार्थों से ज़्यादा लगाव रखेगा, कुछ न कुछ खराबी तो मोल ले ही लेगा...वैसे भी गुड़ आदि से बन जो पदार्थ हैं उन्हें अगर आप खाने के तुरंत बाद ले लें तो इतना नुकसान नहीं करते (दांतों की सेहत के नज़रिये से) ...और वैसे भी दिन में बार बार मीठा खाने से परहेज ही करना चाहिए..इस से दांतों की सड़न होने की संभावना ही नहीं बढ़ती, दांत सड़ भी जाते हैं....यह बिल्कुल पक्की बात है! मैं भी अपने दांतों की खराबी के लिए अपनी इस आदत को ही दोषी ठहराता हूं.....और एक बात, कुछ भी खाने के बाद, विशेषकर गुड़, गुड़ की पट्टी, रेवड़ी, गजक.....कुल्ला अवश्य कर लें, इस से दांतों के साथ चिपके ये पदार्थ उतर जाते हैं..जो दांतों की सेहत के लिए एक अच्छी बात है। 

बस कुछ ही दिनों की तो बात है .. लोहड़ी, मकर-संक्राति का त्योहार आने ही वाला है ..चार पांच दिनों में... इसलिए भी गुड़, तिल, रेवड़ी, चिवड़े की बातें करनी तो बनती हैं दोस्तो... शायद इसीलिए मुझे ध्यान आ रहा होगा तीस साल पहले आए मल्कीयत सिंह के उस सुपर-डुपर पंजाबी गीत का .. १९८६ की बात है .. तब कुछ पंजाबी गीत गुरदास मान के, मल्कीयत सिंह के धूम मचाए हुए थे.....१९८७ की कालेज की लोहड़ी वाले दिन भी इस गीत ने खूब माहौल बनाया हुआ था.... एक जूनियर था ..उस की याद आ गई.. वह बेचारा इस गीत को लिख लिख कर याद किया करता था कि उसने कालेज के एक समारोह में इसे सुना कर किसी को इंप्रेस करना है...हम से सब कुछ शेयर किया करता था, हम भी सब बातें अपने तक ही रखा करते थे... उसने बहुत मेहनत की ... लेिकन हमें बहुत बुरा लगा था जब उसे पता चला कि  आग तो बस एक तरफ़ा ही थी......सच में बहुत बुरा लगा था...बेचारा, अपनी पढ़ाई छोड़ कर इस गाने की प्रैक्टिस किया करता था.. कालेज की चहारदीवारों में कईं किस्से हमेशा के लिए दफन हो जाते होंगे! है कि नहीं?

हां, उस गीत की तो बात कर लें......उस गीत के बोल हैं......गुड़ नालों इश्क मिट्ठा, रब्बा लग न किसे नूं जावे.....(इश्क तो गुड़ से भी मीठा है, दुआ करते हैं कि किसी को यह इश्क न हो जाए..) एक पंजाबी फिल्म थी...यारी जट्ट दी, यह गीत उस में भी था। 

गुड़ नालों इश्क मिट्ठा...रब्बा लग न किसे नूं जावे..

आज सुबह सुबह इस गुड़ पुराण आप को सुनाने का फायदा यह हुआ है कि मुझे आइना देखने का मौका मिला... और कोशिश करूंगा कि अगली बार गुड़ या इस से बने पदार्थ खाते समय इन बातों को अपने आप को भी याद दिला सकूं... after all, there is an age-old advice....... An ounce of prevention is better than a pound of cure!