Wednesday, September 17, 2014

वो हजामत के दिन, वे बरफी की यादें...

शायद आप में से कुछ सोच रहे होंगे कि यह हजामत का बरफी से क्या संबंध.....शायद कुछ को तो हजामत का मतलब ही न पता हो, या जिस हमाजत के बारे में वे सोच रहे हैं यह वह हजामत नहीं है।

सब से पहले तो हजामत का मतलब ही समझ लें.....वैसे मुझे यह भी नहीं पता कि सही शब्द हज़ामत है या हजामत, क्योंकि जब से होश संभाला पंजाब में अमृतसर की धरती पर हमेशा यही सुना कि बाल वध गये ने, जामत नहीं करवानी हल्ले... (बाल बढ़ गये हैं, अभी बाल नहीं कटवाने जाना).... जी हां, आपने ठीक समझा पंजाब में  ठेठ भाषा में बाल कटवाने को जामत करवाना ही कहते रहे हैं....यह १९६० के दशक के आखिरी और १९७० के दशक के पहले वर्षों की बातें आपसे साझी कर रहा हूं...हजामत समझ हमें लंबा लगता है, इसलिए शायद हम उसे आसानी से छोटा कह कर उस की भी जामत कर देते हैं।

फ्लैशबैक...

मैं पांच-सात-आठ वर्ष का बालक......अपने पिता जी की साईकिल के अगले डंडे पर बैठा हूं...पता नहीं उन्होंने उस पर बच्चों वाली काठी कभी क्यों नहीं लगवाई, लेकिन मुझे उस पर बैठने में दिक्कत बहुत हुआ करती थी....सब कुछ दुःखने लगता था.....क्योंकि मैं डंडे के दोनों तरफ़ एक एक टांग कर के बैठता और बार बार हिलता रहता कि नीचे चुभने वाला दर्द कम तो हो.......लेकिन जो भी वे भी बहुत अच्छे दिन थे, अपने पिता जी का साईकिल पर आगे बैठ कर किसे उम्र की उस अवस्था में बादशाह जैसे फील नहीं हुआ होगा.......मजे की बात तब बादशाह का पता ही कहां होता है!!

 नहीं यार यह मैं नहीं हूं..गूगल से
लो जी हम पहुंच गये...अमृतसर के हरीपुरा एरिया के एक नाई के यहां.......आज हेयर-ड्रैसर कहते हैं, तब तो नाई ही कहते थे.....वह माहौल अभी भी याद है...... उस की दुकान पर एक लकड़ी की कुर्सी हुआ करती थी, अब वह एडजस्ट तो हो नहीं पाती थी, इसलिए मेरे जैसे छोटे बच्चों के लिए एक लड़की का फट्टा रख कर उस पर मुझे बैठा दिया जाता था.. फिर एक कपड़ा बांध कर वह अपना काम शुरू कर दिया करता था।

एक बात का और भी ध्यान आ रहा है कि उस नाई की दुकान पर बहुत सी तस्वीरें ये हीरो-हारोईनों की मायापुरी और लोकल हिंदी के अखबार --पंजाब केसरी से काट कर आटे की लेवी से चिपकाई हुई होती थीं..विशेषकर हीरोईनों के विभिन्न मन-लुभावने पोज़ों को तरजीह दी जाती थी...... दो दिन से एक अभिनेत्री के क्लीवेज को लेकर इतनी चर्चा हो रही है, तब नाई की दुकान पर भी यह सब दीवारों पर चिपका पड़ा मिलता था।

मुझे याद है मुझे उस नाई की मशीन से बड़ा डर लगता था......इतनी आवाज़ करती थी, और बार बार उस का बालों में अटक जाना......कईं जगह से चमड़ी काट दिया करती थी वह मशीन...इसलिए मुझे जामत करवाने जाना कभी अच्छा नहीं लगता था, फिर भी मैं राजी हो जाया करता था, कारण अभी बताऊंगा।

जिस उस्तरे से वह कलमें बनाया करता था, वह भी मल्टी-पर्पज़ ही हुआ करता था.....हर पांच मिनट के बाद वह एक पुरानी चमड़े की बेल्ट पर रगड़ कर उस की धार लगाया करता था......फिर उस से किसी ग्राहक की शेव, किसी की बगलों के बाल, किसी के नाखून और किसी की जामत को फाईनल टच उसी उस्तरे से ही दिया जाता था।

कोई चूं चां नहीं किया करता था......बस, उस समय थोड़ी कोफ्त हुआ करती थी कि कोई जब जामत करवा रहा होता और एक दूसरा बंदा आकर अपना कुर्ता ऊपर उठा कर उसे बगलें साफ़ करने को कह देता.......नाई बड़ा सहनशील हुआ करता था, वह किसी को नाराज़ न करता।

मेरी जामत के दौरान मेरे पिता जी उस दुकान के बाहर अपने एक डेरी वाले दोस्त से गप्पबाजी किया करते...

जामत करवाने के बाद जब मैं थोड़ा थोड़ा सा परेशान उस कुर्सी से नीचे उतरता से मेरे पिता जी मुझे साथ वाली हलवाई की दुकान पर बरफी दिलवाने ले जाते।

उस दुकान की क्या तारीफ़ करूं.......मैंने इतनी बढ़िया बरफी कभी नहीं खाई..मुझे मेरे पिता जी मुझे पचास पैसे की या एक रूपये की बरफी दिला देते......मैं उस की खुशबू पर ही मुग्ध हो जाता ..और जामत के समय हुए अत्याचार को भूलते देर न लगती.....इतनी नरम और ताज़ी बरफी ...कि उस कागज़ के लिफ़ाफे में वे टुकड़ियां आपस में जुड़ जाया करती थीं....क्या कहूं कि इतना मज़ा तो आज तक किसी मिठाई में नहीं आया........

जैसे थोड़े बड़े हुए तो पता चला कि वह बुज़ुर्ग मिठाईवाला सुबह से लेकर शाम तक उस कोयले वाली बड़ी सी अंगीठी में दूध को हिलाता रहता था और शाम को जो दो-तीन ट्रे बरफी की तैयार होती थी, वह हाथों हाथ बिक जाया करती थी।  ओ माई गॉड---- इतना सबर।

पहले तो नहीं कहते थे कि बरफी खरीदने के दो दिन के अंदर ही खा लें.....नहीं तो खराब हो जायेगी। अब पता ही नहीं चलता कि ये लोग क्या क्या मिला कर देते हैं.....दूध का कुछ भरोसा नहीं........अब बरफी खाते तो हैं, लेकिन कईं कईं महीने बीत जाने के बाद दो-चार टुकड़े.......और यह जानते हुए कि ये सेहत खराब ही करेंगे.....फिर भी दिल तो बच्चा है जी.......।।

मेरा बेटा मुझे कईं बार कहता है कि बाज़ार जाते वक्त बरफी ले कर आना........लेकिन मैं जानबूझ कर उस की फरमाईश पूरी नहीं करता......और कुछ ले आता हूं लेकिन अकसर बरफी नहीं लाता।

अच्छा, अगर आप के बचपन की भी कुछ यादें हैं इस तरह की ईमानदारी की बीमारी से ग्रस्त हलवाईयों से जुड़ी हैं, तो आप साझा क्यों नहीं करते.......लिखिएगा। अच्छा लगेगा।



बस क्या सेहत विभाग ही संभाल लेगा हमारी सेहत..

सेहत विभाग की टीमों का ध्यान करें तो मुझे अपनी २०-२५ वर्ष की उम्र वाले दिन याद आ जाते हैं.....तब, जून की गर्मी में गन्ने का रस पीने की इच्छा हुआ करती थी तो पता चलता था कि सेहत विभाग की टीमें छापे मार रही हैं, इसलिए गन्ने का रस बेचने वाले कुछ दिनों के लिए छुप कर बैठ गये हैं।

और उस के बाद इतने साल हो गये, त्यौहारों के सीजन में ....दीवाली, दशहरा, बैसाखी....हर दिन इस देश में एक उत्सव है... अखबारों में निकलने लगता है कि सिविल सर्जन की टीम ने फलां मिठाई की दुकान में छापा मारा, इतने बोरे खोए (मावा) के, इतने क्विंटल रसगुल्ले, बर्फी.... वहां से उठवा कर नष्ट करवा दी ....कईं बार वहां से सैंपल उठाने की बात भी हुई.....बस, उस के बाद फिर कभी खबर दिख गई तो ठीक, न दिखी तो ठीक कि उन मिलावटी सामान बेचने वाले दुकानदारों का आखिर हुआ तो हुआ क्या...

सभी सरकारें इतने इतने अभियान भी चलाती हैं ..अखबारों में, टीवी-रेडियो में भी......लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या इस से हम लोगों की खाने पीने की आदतें सुधर गईं, हम ने कभी दूध एवं दूध से बनने वाले खाद्य पदार्थों को लेने से पहले कभी सोचा भी कि यार, इतना सारा दूध आखिर आ कहां से जाता है, हर तरफ़ पनीर की भरमार, हर तरफ़ मावे की हर तरह की मिठाईयां....

चलिए, बात आगे बढ़ाते हैं......मुझे लगता है कि सरकार जितना कर रही है, कर ही रही है, सिविल सर्जन के दस्ते भी कर ही रहे हैं.......लेकिन फिर भी मेरा यह मानना है कि बाहर से कुछ भी खरीद कर खाने के प्रति हमारी अपनी जिम्मेदारी कहीं ज़्यादा है......और इस में जहां तक मैं समझ पाया हूं शिक्षा और आर्थिक अवस्था की बहुत बड़ी भूमिका है।

आखिर हम कैसे सोच भी लें कि सरकारी दस्ते हर जगह हर खाने पीने के खोमचे तक पहुंच जाएंगे .....इस देश में यह एकदम असंभव सा प्रतीत होता है। हर गली, हर नुक्कड़, हर मोहल्ले, हर तिराहे-चौराहे पर दर्जनों खोमचे वाले मिल जाएंगे जो हमें कुछ भी खिला-पिला दें......

दस रूपये में बिक रहा जंबो बन-मक्खन..
दो दिन पहले मैं अपने घर के पास एक सब्जी मंडी में गया....वहां मैं अकसर देखता हूं कि ये समोसे-वोसे वाले तो रेहड़ीयों पर अपना सामान बेच रहे होते हैं.....अच्छा एक बात का ध्यान आया कि ये चीनी की चासनी में भीगे समोसे तो मैंने यहां लखनऊ में ही देखे हैं......कोई बात नहीं, हर जगह की अपनी खाने पीने की आदते हैं......।

हां, तो आज मैंने देखा कि एक रेहड़ी वाला इस तरह के बन-मक्खन बेच रहा था... दस रूपये का एक पीस दे रहा था.....जो बच्चे अपने मां-बाप के साथ आए हुए थे, वे मचल रहे थे, और इन बन-मक्खनों की खूब बिक्री हो रही थी। ठीक है, उस ने कांच से कवर तो किया हुआ था......लेिकन जिस तरह का रंग आप देख रहे हैं, और जिस तरह का मक्खन मैंने वहां देखा.....जिसे वह एक्स्ट्रा भी लगा कर देख रहा था.....देख कर सिर घूम रहा था। कुछ माताएं अपने दोनों बच्चों को दिखा कर सब से बड़े बन-मक्खन के लिए आग्रह करतीं तो उन्हें वह नाराज़ नहीं करता.......हां, हा, पता है मुझे, कह कर औरों से बड़ा बन थमा देता।

आप देख सकते हैं कि कैसे दस रूपये में इतना बड़ा बन और मक्खन बेचा जा सकता है........कम से कम यह मक्खन तो हो नहीं सकता। दुःख होता है ये सब कुछ बिकता देख कर।

बन-मक्खन का क्लोज़-अप..
पता ही नहीं कि इन तरह के मिलावटी खाद्य पदार्थों में किस किस चीज़ की मिलावट हो रही है, कौन बताएगा। बेचने वाला अपनी जगह ठीक है, वह तो कमीशन पर काम कर रहा है, उसे एक पीस में एक रूपया मिलता है... क्या करे, उसने भी बच्चों का पेट भरना है, अच्छा खरीदने वाले क्या करें, उन्हें भी कम पैसे में यह सब कुछ चाहिए.....इसीलिए मैं बहुत बार कहता हूं कि इस देश का सारी समस्याओं का समाधान इतना आसान भी नहीं है, बेहद जटिल हैं.... अब इसी बात को लें कि अगर लोग समझ जाएं कि कुछ भी हो, हम ऐसे खाद्य पदार्थ नहीं खरीदेंगे ...तो ये अपने आप ही बिकने बंद हो जाएंगे...अपने पास ही ये खोमचे वाले फल-फ्रूट, चना-कुरमुरा आदि बेचने लगेंगे। ....शायद मैं बहुत सोचता हूं इसलिए ऐसा सोच रहा हूं।

यह पेठे की मिठाई भी आजकल खूब बिकती है..
अभी थोड़ी दूर ही गया तो यह पेठे वाला मिल गया........आप देखिए कि किस तरह से खुले में यह सब बिक रहा है......वैसे तो मैं अकसर इस तरह से बिकते हुए पेठे पर खूब मक्खियां भिनभिनाते देखता हूं लेकिन आज कुछ कम ही दिखीं......लेकिन फिर भी इस तरह के पेठे में क्या है, कहां पे यह तैयार हुआ, इस की हैंडलिंग कैसे हुई......जब जनता यह सब सोचने लगेगी तो नहीं खरीदेगी यह सब।

एक बात अकसर सत्संग आदि में सुनाई जाती है कि सारे संसार पर कालीन या चटाई तो बिछाई नहीं जा सकती, इसलिए समझदारी इसी में है कि हम कांटों से बचने के लिए अपने एक जूता ही पहन लें...... काश, ऐसा हो जाए।


कंटीला परवल... सब्जी है यह भी एक...
लेकिन यार, जैसे राशन की दुकान  या सब्जी मंडी में जा कर मुझे किसी न किसी दाल का नाम जानने को तो मिलता है,  और नईं नईं सब्जियां भी देखने को मिलती हैं ...जिन्हें मैंने अभी तक चखा भी नहीं.... शायद इसलिए कि ये सब पंजाब-हरियाणा में बिकती देखी नहीं....या मुझे कभी इन की तरफ़ देखने की फुर्सत ही न थी.....पता नहीं......दो दिन पहले पता चला कि यह जो सुंदर सी तरकारी (सब्जी) आप इस तस्वीर में देख रहे हैं......यह है कंटीला परवल.....क्या आपने इसे कभी खाया है। दरअसल जो सब्जियां हम लोगों ने बचपन में नहीं खाई होतीं, वे हम लोग अकसर बड़े होकर भी नहीं खा पाते....जैसे कि मैं करेले से दूर भागता हूं........इसलिए मैं बच्चों के अभिभावकों को कहता रहता हूं कि इन्हें हर सब्जी, हर दाल खाने की आदते डालिए.......वरना बड़े होकर भी ये जंक-फूड़ को ही सुपर-फूड समझते रहेंगे।