Saturday, December 20, 2008

डायबिटिज़ के पैर में बिंदी लगाने से इतनी नाराज़गी !!

इस शनिवार की सुस्त सी शाम में निठल्ले बैठे बैठे गूगल सर्च के बारे में एक बात का ज्ञान हो गया है- इसलिये आगे से नेट पर हिंदी लिखने में और हिंदी में गूगल सर्च करते वक्त सावधानी बरता करूंगा। बस, मैंने ऐसे ही डाय़बिटिज के नाम से गूगल सर्च की - नोट करें कि जब मैं गूगल-सर्च के लिये डायबिटिज़ लिख रहा था तो गलती से मेरे से की जगह लिखा गया अर्थात् के पैर में बिंदी लग गई। फिर भी मैंने इस की परवाह की - सोचा कि इस से क्या फर्क़ पड़ेगा --- मैंने सर्च के बटन पर कर्सर ले जाकर सर्च दबा दिया।

मैं सर्च रिज़ल्टस देख कर बहुत हैरान हुआ ---गूगल सर्च ने कहा कि इस शब्द के लिये कोई रिज़ल्टस ही नहीं हैं। मैंने ध्यान से देखा तो यही पाया की के पैर में बिंदी पड़ी हुई है - तो मैं समझ गया कि यहां भी इस बिंदी का ही पंगा है। मैंने तुरंत उसी तरह से दोबारा डायबिटिज़ लिखा जिस तरह से मैं आम तौर पर अपनी पोस्टों में लिखता हूं -- तो रिज़ल्ट्स में मेरी कुछ पोस्टें दिख गईं ( जो कि मैं देखने के लिये गूगल सर्च पर बिना वजह आवारागर्दी कर रहा था)

फिर उस के बाद मैंने एक और एक्पैरीमैंट करना चाहा --- मैं अब गूगल सर्च पर डायबिटीज़ लिखा ---अब भी रिज़ल्ट बदल गये। मेरी किसी पोस्ट में जहां पर मैंने डायबिटीज़ लिखा हुआ था, वह प्रकट हो गई।


मैं कुछ कुछ समझने लगा कि यह हिंदी के स्पैलिंग्ज़ की भी कितनी बड़ी भूमिका है नेट में ----कहीं भी बिंदी लगी या हटी, कहीं सिहारी की बिहारी बनी और कहीं भी आंचलिक पुट आया नहीं कि सर्च रिज़ल्ट्स ही बदल गये
मैं अब बैठा बैठा यही सोच रहा हूं कि आने वाले समय में यह नेट पर हिंदी एक सशक्त माध्यम बस अब बनने ही वाला है --मैं अधिकतर स्वास्थ्य विषयों पर ही लिख कर अपने अल्प-ज्ञान का दिखावा कर लेता हूं ( अधजल गगरी छलकत भारी !!) लेकिन मैं अकसर फीड-जिट में अकसर देख कर हैरान हो जाता हूं कि किस तरह के सीधे साधारण की-वर्ड्स लिख कर सेहत के किसी विषय के लिये गूगल सर्च की जा रही है।

हिंदी हिंदी हम पिछले साठ सालों से कह रहे हैं ----लेकिन अब हिंदी का दौर गया है --- यह हम सब प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। किसी भी शब्द को हिंदी में लिख कर गूगल-सर्च कीजिये और कुछ कुछ तो सर्च करने वाले के हाथ में लग ही जाता है। इस का कारण यही है कि विभिन्न क्षेत्रों के लोग इस हिंदी रूपी यज्ञ में दिन प्रतिदिन अपनी आहूतियां लगातार डालते जा रहे हैं जो भी किसी ज़रूरतमंद की सर्च -रिज़ल्ट के रूप में प्रकट होती हैं।

और मुझे लगने लगा है कि हिंदी नेट पर बढ़ भी रही है और वह भी इतने प्रजातांत्रिक स्टाइल में ---जब कोई भी व्यक्ति विश्व में हिंदी में कोई जानकारी ढूंढ रहा है तो उसे शुरू शुरू में स्पैलिंग्ज़ वगैरह की इतनी चिंता करने की ज़रूरत नहीं ----शायद ज़रूरत नहीं , लेकिन ज़रूरत तब लगने लगेगी जब उसे वांछित जानकारी के लिये स्पैंलिंग्ज़ तो ठीक करने ही होंगे --- शायद इस से हम लोगों की हिंदी में भी सुधार होने लगा।

मैंने सोच रहा हूं कि इस देश में कहते हैं इतने कोस पर पानी और इतने कोस पर बोली बदल जाती है - तो फिर हम कुछ भी कर लें किसी भी टापिक को सर्च करते वक्त हमें इस तरह की थोड़ी परेशानियों से तो रू--रू होना ही पड़ेगा ---लेकिन क्या ये वास्तव में ही परेशानियां हैं ? आइये सोचते हैं।

जब हम लोग नेट पर लिख रहे होते हैं तो ----चलिये मैं अपनी ही बात करता हूं ---कईं बार कोई स्पैलिंग गल्त हो भी जाये तो ज़्यादा परवाह किये बिना आगे बढ़ जाते हैं ----लेकिन आज लग रहा है कि यह बात बिल्कुल ठीक नहीं है ---- अगल हम चाहते हैं कि सर्च रिज़ल्ट्स के माध्यम से हम लोगों तक पहुंच सकें तो यह संभव तभी होगा जब हम शुद्द लिख रहे हैं ----शुद्ध से मेरा मतलब वह वाली हिंदी नहीं जिसे देख कर, पढ़ कर, सुन कर एक आम हिंदोस्तानी डर जाता है --- उसे लगने लगता है कि यार, यह अपने बस की बात नहीं है।

इसलिये पढ़े-लिखे इंगलिश वर्ग को अगर हम लोग नेट के माध्यम से हिंदी से जोड़ना चाहते हैं तो हमें बोल चाल वाली हिंदी ही यहां भी लिखनी होगी ---बिल्कुल वही वाली हिंदी है जो हम लोग अपने घर में, अपनी गली-मुहल्ले में यूं ही किसी से बतियाते हुये इस्तेमाल करते हैं। बिलकुल - 100% आम हिंदी ---- जिससे किसी को डर नहीं लगता --- बस, जो अपनी सी लगती है ऐसा करना इस लिये तो और भी ज़रूरी है क्योंकि यह पढ़ा लिखा वर्ग अपने मतलब की जानकारी ढूंढने के लिये इसी आम भाषा के की-वर्ड्स का ही इस्तेमाल करता है - ऐसा मैं सैंकड़ों बार नोटिस कर चुका हूं।

मैं भाषा का स्टूडैंट तो हूं नहीं --लेकिन फिर भी सोच रहा हूं कि क्या कुछ ऐसा भी होता है कि हिंदी में सब लोग वही शब्द इस्तेमाल करें जो बर्तनी के हिसाब से ठीक है -----बर्तनी शब्द भी मैं ब्लागिंग में कईं बार सुन चुका हूं, लेकिन इस का मुझे कुछ ज्ञान नहीं है। लेकिन अब लगने लगा है कि भाषा के सही शब्दों का ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है ---वरना सब लोगों की लिखावट में अपने अपने क्षेत्र का हिंदी पुट होगा तो गूगल सर्च करने पर तो डाय़बिटिज़ से भी पेचीदा खिचड़ी पक जायेगी। अब इस बात पर तो हिंदी के धुरंधर लिक्खाड़ ही प्रकाश डाल सकते हैं।

अच्छा एक बात और भी करनी है ---- मुझे बहुत बार कहा गया कि हिंदी विकि पीडिया पर भी मैं स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर लेख लिखा करूं ---- मैं बहुत बार उस साइट पर भी गया ---- लेकिन दस-पंद्रह मिनट में ही सिर भारी होने की वजह से वापिस लौट आता था ---कारण ? --- अब कारण क्या बताऊं , वहां पर लिखी हुई हिंदी किसी दूसरे लोक की दिखती है ---शायद अपनी सी नहीं लगती --- उस साइट पर घूमने से लगता है कि यह तो बस बुद्धिजीवियों का जमावड़ा है जहां पर वे अपना ज्ञान केवल अपने आप में ही बांटे जा रहे हैं --- अगर मेरा उस साइट पर इतनी बार जाने के बाद यही हाल है तो एक हिंदी का औसत नेट-यूज़र जब हिंदी विकिपीडिया पर जायेगा , वह तो तुरंत ही वहां से भाग खड़ा होगा। इसलिये इस हिंदी वीकिया में लिखने वाले को यही सुझाव है कि हिंदी का स्तर थोड़ा घटाओ ---- सब तरह के लोग वहां पर कुछ ढूंढने रहे हैं , इसलिये सब का ध्यान रखो, भाईयो।

वैसे मुझे एक तरीका दिखा ---मैंने दो तीन दिन पहले पेपर में पढ़ा कि विकिपीडिया ने मद्रास में एक विकि एकेडमी शुरू की है ---तो मैं अंग्रेज़ी की विकिपीडिया पर गया तो वहां पर सारी हिदायतें आराम से समझ में जाती हैं ---तो मेरा सुझाव यह है कि अगर आप में से भी कुछ लोग हिंदी वीकिपीडिया पर अपना योगदान देना चाहते हैं लेकिन वहां पर लिखे निर्देश हिंदी में समझ नहीं पाते हैं तो अंग्रेज़ी वीकिपीडिया में उन्हें देख कर हिंदी में लिखना शुरू कर दीजिये।

बस, अब इतना लिखने के बाद सुस्ती गायब सी हो गई है -- पता नहीं एक ही शब्द को सैकंड़ों हिंदी भाषी अपने अपने अंदाज़ में कितने कितने अलग ढंग से लिखते होंगे -- ऐसी ही एक उदाहरण डायबिटिज़, डाय़बिटिज़, डायबिटीज़ की आप ने देख ली ----वैसे आप भी कुछ शब्द लिख कर गूगल सर्च कर कुछ एक्सपैरीमेंट क्यों नहीं करते ?