Sunday, December 14, 2008

स्कूल में मूंगफली खाने पर प्रतिबंध कितना उचित ?

सोचने की बात है कि ब्रिटेन में अगर स्कूल में मूंगफली खाने पर भी बैन लग जायेगा तो देर-सवेर उस का प्रभाव कहीं हमारे स्कूलों में भी तो नहीं देखने को मिलेगा ---क्योंकि हम लोग अकसर उन देशों की नकल करने में कभी भी पीछे रहते नहीं हैं।

हम लोग तो अकसर मूंगफली को गरीब के बादाम के नाम से जानते हैं – और यह प्रोटीन प्राप्त करने का एक बहुत उम्दा स्रोत है और लगभग 25-30 प्रतिशत प्रोटीन होता है मूंगफली में। और हमारे देश में तो धूप में बैठ कर इस का सेवन करने से तो मज़ा ही बहुत आता है। स्कूल क्या , यहां तो सर्दी की रुत में बस जहां देखो मूंगफली खाते लोग मिलते हैं --- पार्क में, गाड़ी में, सिनेमा में .....।

ब्रिटिश मैडीकल जर्नल के 12 दिसंबर के संस्करण में स्कूलों द्वारा अपने स्कूलों को मूंगफली रहित घोषित किये जाने के निर्णय की चर्चा की है। हुआ यह है कि मूंगफली एवं अन्य खाद्य पदार्थों से होने वाले एलर्जी के केस बढ़ रहे हैं , इसलिये स्कलों ने मूंगफली को बैन करने का ही निर्णय कर डाला है।

लेकिन विशेषज्ञों ने इस मुद्दे को उठाया है कि इस तरह से नट्स पर बैन लगाने से तो एक हिस्टीरिया सा ही पैदा हो जायेगा और जो बच्चे नान-एलर्जिक हैं उन का तो नट्स से एक्पोज़र ही नहीं हो पायेगा- हारवर्ड मैडीकल स्कूल के प्रोफैसर क्रिसटैकिस ने कहा है कि जो बच्चे छोटी उम्र में मूंगफली खाना शुरू कर देते हैं उन में पी-नट्स ( मूंगफली) से होने वाली एलर्जी के केस कम होते हैं।

इस तरह का जो हिस्टीरिया पैदा किया जा रहा है उस का एक उदाहरण देते हुये प्रोफैसर ने कहा है कि इस का आलम यह है कि 10 साल के बच्चों से भरी एक बस में जब मूंगफली का एक दाना नज़र आ गया तो सारी बस ही खाली कर दी गई।

अमेरिका में 33 लाख लोगों को नट्स से एलर्जी है – लेकिन फिर भी इन की वजह से किसी सीरियस रिएक्शन होने का अंदेशा बहुत कम है।

आप इन आंकड़ों से ज़्यादा परेशान न होइये, क्योंकि हमारे यहां यह समस्या लगती नहीं है और अगर है भी तो हम इस तरफ़ कभी ध्यान ही नहीं देते, हमारे पहले ही से इतने ज़्यादा सेहत से संबंधित मुद्दे हैं कि इस मूंगफली वगैरह के बारे में कौन ज़्यादा सोच कर अपना समय खाली-पीली बर्बाद करे। वैसे भी हम लोगों ने कभी इस तरह की मूंगफली की एलर्जी से होने वाले केसों में बारे में सुना नहीं है ----या यूं कहें कि हमारे यहां पर न तो इस के बारे में अवेयरनैस ही है और न ही इस तरह की डॉयग्नोसिस के कोई साधन ही ज़्यादा प्रचलित हैं।

वैसे भी मुझे नहीं लगता है कि हम लोग किसी को मूंगफली खाने से मना करें और वे इसे खाना बंद कर दें ---- और सोचने की बात है कि आखिर हम लोग ऐसा करने को किसी को कहें ही क्यों, इस देश में बच्चों और बड़ों के लिये प्रोटीन पाने का एक बहुत ही बढ़िया स्रोत है यह मूंगफली ।

स्कूलों द्वारा मूंगफली बैन किये जाने की बात तो हो गई। कईं स्कूलों में तो जंक-फूड को भी बैन किया जा चुका है। अगर हमें किसी तरह की नकल ही करनी है तो यही करनी होगी कि देश के सारे स्कूलों में जंक-फूड पर पूरी तरह से बैन कर दिया जाये।

स्कूलों में उपलब्ध जंक-फूड( बर्गर, हाट-डाग, पेटीज़, समोसे, ब्रैड-पकोड़े, चिप्स, भुजिया, बिस्कुट, चामीन......ये सब जंक-फूड ही तो हैं ) .... बिस्कुट भी अगर एक-दो दूध चाय के साथ खा लिये जायें तो अलग बात है लेकिन अगर खाने की जगह पर पूरे पूरे पैकेट ही खाने का चलन है तो यह बेहद खतरनाक आदत है ---सेहत खराब करने का श्यूर-शॉट फार्मूला।

हर देश की अपनी राष्ट्रीय समस्यायें होती हैं ---मेरे विचार में इस देश की एक बहुत बड़ी विकट समस्या है कि यहां पर स्कूल-कालेज के बच्चे स्कूल में टिफिन ले जाना अपना अपमान समझने लगे हैं और कुछ हद तक जाने-अनजाने में इस को मां-बाप की स्वीकृति भी प्राप्त हो चली है। किसी पेरेन्ट को यह पूछो कि क्या बच्चा स्कूल या कालेज में खाना लेकर जाता है तो यही जवाब मिलता है कि आजकल बच्चे कहां खाना वाना लेकर जाते हैं ,वहां पर कैंटीन में ही कुछ खा लेते हैं , सब कुछ मिलता है।

ठीक है, सब कुछ मिलता तो है, लेकिन सब जंक ही मिलता है, फूड-हाइजीन का कोई ध्यान रखा नहीं जाता और नतीजा यह निकलता है कि इन बच्चों को भविष्य में होने वाली बीमारियों की नींव पड़नी शुरू हो जाती है। सुबह बच्चे जल्द बाजी में नाश्ता करते नहीं है, और स्कूल में लंच ले कर जाने से उन्हें बेहद शर्मिंदगी महसूस होती है, और शाम तक भूखे-प्यासे क्लास में बैठे रहते हैं ----इस हालत में इन की क्या कंसैंट्रेशन बनती होगी !!
और जंक-फूड थोड़ा खा भी लिया तो उस से किसी तरह की एनर्जी मिलने के स्थान पर एनर्जी का ह्रास ही होता है और इस परिस्थिति में ढंग से पढ़ाई में मन लगाना बेहद मुश्किल काम होता है। मैं उस से बड़ा मूर्ख किसी को नहीं समझता जो स्कूल-कालेज में टिफिन नहीं ले कर जाता --- और जो मां-बाप भी इस में बच्चों का साथ देते हैं मुझे उन से भी बेहद शिकायत है ---क्योंकि आप भी अपने बच्चों की सेहत बिगाड़ने के लिये जिम्मेदार हैं ----वैसे तो मैं भी इस में शामिल हूं ---- क्योंकि मेरा कालिजेएट बेटा भी टिफिन लेकर जाना अपनी सब से बड़ी बेइज्जती समझता है ----और मैं इस के बारे में कुछ कर नहीं पा रहा हूं ---बस, इतना इत्मीनान है कि डाक्टर मां-बाप होने की वजह से जंक-फूड के बारे में उस की इतनी ज़्यादा ब्रेन-वाशिंग हो चुकी है कि कालेज में जंक-फूड खाता नहीं है। लेकिन सोचता हूं कि यह भी कैसा इत्मीनान है --- सुबह नाश्ते करने के बाद शाम के पांच बजे तक भूखा रह कर वह अपनी सेहत ही बिगाड़ रहा है, लेकिन क्या करें ---- सब कुछ अपने हाथ में कहां होता है ? –जो देश के अन्य करोड़ों युवाओं का होगा, वह उस का भी हो जायेगा, और क्या !!

स्कूल ही क्यों, किसी भी कार्यालय में चले जायें -----किसी भी समय पर चाय के साथ जो जो खाद्य़ पदार्थ वहां पर उपलब्ध रहते हैं --- उन की लिस्ट सुनिये ----बर्फी, बेसन की बर्फी, समोसे, ब्रेड-पकोड़े, चामीन, पकौड़े( भजिया), रसगुल्ले, गुलाब-जामुन – ऐसा नहीं लगता कि वे किसी कार्य-स्थल पर नहीं वरना किसी बारात में आये हुये हैं -----वहां पर मिलने वाला सब कुछ शरीर को बीमार करने वाला ही है, लेकिन सुनता कौन है , इस का यह मतलब भी तो नहीं कि मैं चिल्लाना बंद कर दूं ----मुझे अपना काम तो करना ही है !!

और हां, मूंगफली वाली बात को एक कान से अगर अंदर डाल भी लिया है तो दूसरे से तुरंत निकाल बाहर करें -----धूप निकल आई है और मूंगफली लेकर कर बाहर बैठ जायें -----सारी बातें औरों की मान लेनी कहां की अकलमंदी है !! अगर बैन ही करना है तो स्कूलों से जंक फूड का खात्मा करें ----ताकि सब विद्यार्थी घर का खाना लाने के लिये मजबूर हो जायें ---फिर किसी को किसी तरह की बेइज़्जती महसूस भी न होगी।