Saturday, August 2, 2014

सौ साल से बड़ी उम्र की महिलाओं को मिली सिलाई मशीनें?

बीबीसी न्यूज़ को दिन में एक बार देख लेना चाहिए.. पता चलता रहता है कि देश में चल क्या रहा है।
ऐसी ही एक खबर पर अभी अभी नज़र पड़ी है जिस में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के रायपुर में १०० से ज्यादा वाली सैंकड़ों महिलाओं को सिलाई मशीनें बांटी गई हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि ६हज़ार से भी ज्यादा महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें इस स्कीम के अंतर्गत लाभ प्राप्त हुआ है और जिन की उम्र ११४ वर्ष से भी ज़्यादा है।

क्या करें, यकीन कर लें, इस बात पर भी या पहले छानबीन चलने दें। इस स्कीम में करोड़ों रूपये खर्च हुये हैं और आजकल इस की भी छानबीन चल रही है।

भारत में कभी चारे की खरीद में लफड़ेबाजी, फिर जवानों के कफ़न के साथ, फिर पुलिस वालों की जेकेटों के साथ.....दवाईयों की तो बात ही क्या करें, दवाईयों से खाने-खिलाने की बातें तो बहुत पुरानी हो गई हैं, लोग नाम तक भी नहीं लेते।

India: Sewing machines given to '100-year-old' woman

1957 से पहले जन्मे लोगों को क्या खसरे का टीका फिर से लगवा लेना चाहिए?

 आज एक न्यूयार्क-टाइम्स के एक पेज पर नज़र पड़ी जिस में एक व्यक्ति ने विशेषज्ञ ने यह पूछा था कि क्या बड़ी उम्र के लोगों को खसरे से बचाव का टीका फिर से लगवाना चाहिए।

उत्तर में विशेषज्ञ ने साफ साफ बता दिया कि अगर तो आप का जन्म १९५७ के पहले हुआ है तो कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन अगर आप का जन्म १९५७ के बाद का है तो आप को इसे लगवा लेना चाहिए।

Do i need a measles shot?

खसरा अर्थात् मीसल्ज़ का टीका अन्य दो बीमारियों से बचाव के टीके के साथ ही लगता है जिसे एमएमआर वैक्सीन कहते हैं।

१९५७ वाली बात मेरे को कुछ अजीब सी लगी, जिज्ञासा हुई कि यह १९५७ का क्या चक्कर है? लेकिन सीडीसी की साइट पर इस का सटीक जवाब भी मिल गया... जिन लोगों का जन्म १९५७ से पहले हुआ, उन लोगों का जीवनकाल उस समय के दौरान गुज़रा जब मीसल्ज़ का पहला टीका नहीं आया था ...इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि उन लोगों में मीसल्ज़ की बीमारी हो चुकी होगी। सर्वे से भी यही पता चला है कि ९५ से ९८ प्रतिशत लोग जिन का जन्म १९५७ से पहले का है, उन में से ९५ से ९८ प्रतिशत लोगों में इस बीमारी की इम्यूनिटी है --अर्था्त् उन में इस के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता उपलब्ध है। साथ में यह भी लिखा था कि यह १९५७ का नियम केवल मीसल्ज़ और मम्स दो
बीमारियों के लिए लागू है, यह रूबैला पर लागू नहीं है।

अब अगला प्रश्न था कि क्या जिन लोगों को १९६० के दशक में एमएमआर जैसे टीके लगे हों, क्या उन को फिर से ये टीके लगवाने होंगे?.... यह कोई इतना ज़रूरी नहीं है। जिन लोगों के पास तो इस तरह का कोई रिकार्ड उपलब्ध है कि १९६० में उन्हें लाइव मीसल्ज वैक्सीन लग चुका है, उन्हें तो इसे फिर से लगवाने की ज़रूरत नहीं है।

जिन लोगों का यह टीकाकरण १९६८ से पहले हुआ है और उन में निष्क्रिय (मृत) मीसल्ज वैक्सीन का या ऐसे वैक्सीन का इस्तेमाल किया गया हो जिन का उन्हें अब पता नहीं---ऐसे लोगों को इस नये लाइव एटैन्यूएटेड वैक्सीन की एक खुराक हासिल कर लेनी चाहिए। यह सिफारिश केवल उन लोगों के लिए है जिन को ऐसे मीसल्ज़ टीके से वैक्सीनेट किया गया जो कि १९६३-१९६७ के बीच उपलब्ध तो था लेकिन वह इस रोग की रोकथाम के लिए प्रभावी नहीं था।
बहुत भारी हो गया ना आप सब के लिए यह समझना ...१९५७ की लक्ष्मण-रेखा, मृत टीका, लाइव टीका...यह सब कुछ ज्यादा ही डाक्टरी झाड़ने जैसा लग रहो होगा आपको। कोई बात नहीं कुछ खबरें बस केवल ध्यान में रखने के लिए ही काफी होती हैं। इस बात को भी ध्यान में रखिए। 
अमेरिका में तो वैसे यह समस्या इतनी नहीं है लेकिन फिर भी देशवासियों के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने का उन का संक्लप प्रशंसनीय है। सोचने वाली बात यही है कि भारत में इस तरह की जानकारी लोगों पर विश्वसनीय सोत्रों से विशेषकर सरकारी वेबसाइटों पर क्यों उपलब्ध नहीं है, और वह भी हिंदी में ....वैसे तो इंगलिश में ही कुछ खास उपलब्ध नहीं है तो हिंदी में कब आयेगा, कौन बता सकता है!
 लेकिन इस तरह की सेहत से संबंधित जानकारी हिंदी में ही उपलब्ध होनी चाहिए। इंगलिश को हम चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग तो पढ़-समझ भी लें, एक गैर-चिकित्सक के लिए यह सब समझना इतना आसान नहीं है। 
सब कोई आवाज़े लगा रहा है कि हिंदी मे कंटैंट बढ़ना चाहिए, हर कोई कह रहा है... हर तरफ़ से ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें आ तो रही हैं, लेिकन जो लोग हिंदी में कंटैंंट तैयार कर रहे हैं, उन की भी कोई सोचेगा या उन के हाथ में कटोरा ही ठीक है। ऐसे नहीं बढ़ता कंटैंट-वैंट, दुनिया में काफ़ी काम हैं ठीक है शौक से किए जा रहे हैं, और लोग कर रहे हैं, मिशन समझ कर लोग अपनी धुन में लगे हुए हैं, लेकिन जो बंदा सारा दिन हिंदी का कंटैंट ही तैयार करता रहेगा, उस की और उस के परिवार की भी तो ज़रूरते होंगी, वह कौन पूरी करेगा? इसलिए मुझे यह सब आडंबर लगता है कि हम किसी को भी इमोशनल ब्लैकमेल करते रहें कि हिंदी भाषा अपनी है, इस में लिखो, ऑनलाइन कंटैंट तैयार करो, लेकिन तैयार करने वाले का ध्यान कौन करेगा? 
चलिए इस बात पर अभी मिट्टी डालते हैं और आप को कुछ अच्छे से लिंक दे रहा हूं जहां से आपको ऊपर दिए गये प्रश्नों के जवाब तलाशने में सुविधा रहेगी। पाठकों से अनुरोध है कि अपने बारे में फिर से टीका लगवाने के बारे में निर्णय लेने से पहले अपने फ़िजिशियन से इस की चर्चा कर लें। यहां तो वैसे ही यह बीमारी इतनी व्यापक स्तर पर है कि शायद आप को भी वैसे ही प्राकृतिक इम्यूनिटी प्राप्त हो चुकी हो। फिर भी ज़्यादा जानकारी नीचे दिए गये लिंक्स पर जा कर पाई जा सकती है........ 

खाद्य पदार्थों में मिलावट की जांच के लिए

भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण- जिसे इंगलिश में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्डज़ अथॉरिटी ऑफ इंडिया कहते हैं जो एक सरकारी साइट है और जिस के बारे में आप इस लिंक पर क्लिक कर के और भी जान सकते हैं।

जब से यह साइट तैयार हुई है या यूं कह लें कि जब से यह प्राधिकरण बना है मैं इस साइट पर अकसर जाता रहता हूं कि शायद कुछ बढ़िया सा उपभोक्ता के दृष्टिकोण से मिल जाए।

एक बात पहले ही नोटिस कर लें कि इस साइट पर ऊपर एक बटन मिलेगा --भाषा के लिए.. उस पर क्लिक करने पर एक मेन्यू खुलता है जिस में शायद बीस से भी ज़्यादा भाषाओं के विक्लप बताये जाते हैं.......अर्था्त् जिस भी भाषा में --भारतीय हो या विदेशी, आप उस पर क्लिक करें तो सारी जानकारी उस भाषा में उपलब्ध हो जायेगी। लेकिन ध्यान रहे कि ऐसा कुछ है नहीं, बस केवल होम पेज पर सारे शीर्षक ज़रूर हिंदी या आप के द्वारा चुनी भाषा में आ जाएंगे ...बाकी फिर उस के आगे सब कुछ इंगलिश ही इंगलिश।

इन का ब्लॉग क्या ब्लॉग कहा जा सकता है, इस का फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं। मैंने देखा कि इन्होंने अखबारों में से कुछ लेख जैसे के तैसे उस ब्लॉग पर टिकाए होते हैं......मैंने उस पर टिप्पणी भी दी कि ऐसा मत किया करो, पाठक आप की साइट पर कुछ नया ढूंडने के चक्कर में आता है। अब पिछले लगभग सवा साल से इन्होंने ब्लॉग को अपडेट ही नहीं किया। चलिए, इन से जान पहचान तो मैंने करवा दी.......बाकी आप स्वयं इन की साइट पर जा कर कर लीजिएगा। अगर मुझे भूल में सुधार करना हो तो कृपया इस पोस्ट की टिप्पणी में लिखिएगा।

हां, जिस काम के लिए मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं --वह यह है कि इस प्राधिकरण की साइट पर खाद्य पदार्थों की मिलावट की घरेलू जांच हेतु कुछ अच्छी जानकारी भी उपलब्ध है, इस की पीडीएफ फाइल का लिकं यहां लगा रहा हूं....  Quick Test for some adulterants in food.

यह सारी जानकारी इंगलिश में है , पहले तो इन को यह सारी जानकारी हिंदी में ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध करवानी चाहिए ताकि जनता जनार्दन को पता तो चले कि उन की सेहत के साथ खिलवाड़ किन किन वस्तुओं की मिलावट से हो रहा है। शायद यह पहला स्टेप होगा जागरूकता का।

मैंने पढ़ा है वह सारा डाक्यूमैंट। चाहे मैं इस तरह के विषय को बहुत बार ढूंढ चुका था, इस तरह की प्रामाणिक जानकारी......लेकिन इतने सारे कैमीकल्स, उपकरण.......इक्ट्ठे करने....ऐसे तो पहले घर को लैबोरेटरी बनाने वाली बात हो गई।

लेकिन बात वह भी है कि अगर किसी भी मिलावट के पुख्ता सबूत चाहिए तो कुछ तो मेहनत करनी ही होगी। मैं कल से सोच रहा हूं कि इस मैन्युल में बताए गये टैस्टों का  क्या कोई वैकल्पिक जुगाड़ नहीं हो सकता ...कुछ भी...जैसे बड़े बड़े शहरों की हाउसिंग सोसाइटी की तरफ़ से, गांवों में पंचायतों, शहरों में मोहल्ला कमेटियों की तरफ़ से ...इस तरह का उपकरण मंगवा कर ..फिर टैस्टिंग शुरू की जा सकती है।

यह सब महंगा बिल्कुल भी नहीं है...लेकिन घर घर में इस तरह के सामान कहां कोई इक्ट्ठे करता फिरेगा और फिर उन्हें संभाल कर रखेगा। इसलिए टैस्टिंग की कोई वैकल्पिक व्यवस्था हो पाए तो बात बने। वरना तो हम जैसे साईंस पढ़े लोग ही इन सब को खरीदने की सिरदर्दी से दूर भागते हैं।

जो भी हो, जानकारी तो बहुत बढ़िया दी गई है। अब बारी है यह सोचने कि आखिर हो क्या जाएगा इस तरह की टैस्टिंग करने से ........घर, मोहल्ले में टैस्टिंग से क्या हासिल, किसी को फांसी को दिलवाने से रहे, लेकिन फिर भी एक बात तो पक्की है कि जन जागरूकता तो बढ़ेगी, लोगों में -व्यापारियों में भी बात तो फैलेगी कि लोग अब टैस्टिंग करने लगे हैं, इसलिए ये जो परचून के व्यापारी हैं ..सब से पहले तो शायद यही लोग मिलावट से तौबा करने लगें।

जब घर, मोहल्ले में इन चीज़ों की टैस्टिंग की जाए और मिलावट पाई जाए तो उस को विभिन्न माध्यमों से शेयर किया जाए, लोकल केबल चैनल से, अखबार के स्थानीय संस्करण के द्वारा या बड़े शहरों में ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी के नोटिस बोर्ड पर, सोशल मीडिया पर...  इस के बारे में लिख कर ........ऐसे जागरूकता फैलती जाएगी, छोटे मोटे व्यापारी मिलावट करने से डरने लगेंगे।

थोड़ा लिखिएगा इस पोस्ट की टिप्पणी में अगर आप के पास भी कोई आइडिया है कि खाद्य प्राधिकरण के इस मैन्युल को कैसे प्रैक्टिस में उतारा जा सकता है, जब काम की जानकारी उपलब्ध हुई है तो उस का फायदा भी लिया जाए।

कम से कम इस मैन्युल को डाउनलोड कर के, प्रिंट आउट ले कर रखा जाए ... कुल २२ पेज ही तो हैं......ताकि यदा कदा उस पर नज़र पड़ती रहे, विशेषकर बच्चों की .......जो हम से कहीं ज्यादा सचेत रहना चाहते हैं, उद्यमी होते हैं .......देखिए उन के पास ही कितने आइडिया होते हैं .......सभी को इस मिलावट रूपी जहर के प्रति जागरूक करने के िलए। ज़रूरत है बस इस बात की इस जागरूकता रूपी मशाल को हमेशा जलाए रखने की।

चोरों के लिए कईं बार बस इतना ही काफ़ी होता है कि कहीं पर कोई न कोई नज़र रखे है। तिनका तो होता ही है उन की दाढ़ी में...