Monday, March 21, 2011

जटरोफा खाने से बार बार बीमार होते बच्चे

आज सुबह तो मैं डा बशीर की डायरी ही पढने में मसरूफ रहा, सोचा आज के लिये इतनी ही काफी है...बाकी फिर कभी।

आज सुबह ही मैं दो दिन पुरानी अमर उजाला में एक खबर देख रहा था कि कैथल में जटरोफा खाने से 15 बच्चे बीमार हो गये। कुछ ही समय बाद मुझे मेरे चार साल पहले लिखे एक आर्टीकल की कापी दिख गई जो एक नेशनल न्यूज़-पेपर में छपा था, इसलिये आज जटरोफा के बारे में ही बात करते हैं।

जटरोफा कुरकास (जंगली अरंडी) सारे भारतवर्ष में पाया जाने वाला एक आम पौधा है—इस के बीजों में 40 प्रतिशत तक तेल होता है। भारत एवं अन्य विकासशील देशों में जटरोफा से प्राप्त तेल (बॉयोडीज़ल) पैदा करने हेतु सैंकड़ों प्रोजैक्ट चल रहे हैं।

दिल्ली से मुंबई जाने वाली रेल लाइन के दोनों तरफ़ जटरोफा के पेड़ लगाए गये हैं। कुछ गाड़ियां भी इसी जटरोफा से प्राप्त 15-20 प्रतिशत बॉयोडीज़ल पर चलती हैं। जटरोफा की एक हैक्टेयर की खेती से 1892 लिटर डीज़ल मिलता है।

जटरोफा के बीजों से प्राप्त होने वाला तेल मनुष्ट के खाने योग्य नहीं होता। बॉयो-डीज़ल पैदा करने के इलावा इसे मोमबत्तियां, साबुन इत्यादि बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में भी इस पौधे के विभिन्न भागों को तरह तरह की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है।

जटरोफा के बीजों का उत्पात ...
जटरोफा के विषैले गुण इस में मौजूद कुरसिन एवं सायनिक एसिड नामक टॉक्स-एल्ब्यूमिन के कारण होते हैं। वैसे तो पौधे के सभी भाग विषैले होते हैं लेकिन उस के बीजों में उस की सर्वाधिक मात्रा रहती है। उन बीजों को खाने के बाद शरीर में होने वाले बुरे असर मूल रूप से पेट एवं आंतों की सूजन के कारण उत्पन्न होते हैं। गलती से जटरोफा के बीज खाने की वजह से बच्चों में इस तरह के हादसे आये दिन देखने सुनने को मिलते रहते हैं।

उन आकर्षक बीजों को देख कर बच्चे अनायास ही उन्हें खाने को आतुर हो जाते हैं। उस के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि इस पौधे के कितने बीज खाने पर विषैलेपन के लक्षण पैदा होते हैं। कुछ बच्चों की तो तीन बीज खा लेने से ही हालत पतली हो गई जब कि कुछ अन्य बच्चों में पचास बीज खा लेने पर भी बस छोटे मोटे लक्षण ही पैदा हुये।
आम धारणा यह भी है कि इन बीजों को भून लेने से विष खत्म हो जाता है लेकिन भुने हुये बीज खाने पर भी बड़े हादसे देखने में आये हैं।

उल्टियां आना एवं बिलकुल पानी जैसे पतले दस्त लग जाना इन बीजों से उत्पन्न विष के मुख्य लक्षण हैं.. पेट दर्द, सिर दर्द, बुखार एवं गले में जलन होना इस के अन्य लक्षण हैं। इस विष से प्रभावित होने पर अकसर बहुत ज़्यादा प्यास लगती है, इस के विष से मृत्यु की संभावना बहुत ही कम होती है।

क्या करें ?

बेशक जटरोफा बीज में मौजूद विष को काटने वाली कोई दवा (ऐंटीडोट) नहीं है, फिर भी अगर बच्चों ने इस बीजों को खा ही लिया है तो अभिभावक घबरायें नहीं.....बच्चों को किसी चिकित्सक के पास तुरंत लेकर जाएं ...अगर बच्चा सचेत है, पानी पी सकता है तो चिकित्सक के पास जाने तक भी उसे पेय पदार्थ (दूध या पानी) पिलाते रहें जिससे कि पेट में मौजूद विष हल्का पड़ जाए।

चिकित्सक के पास जाने के पश्चात् अगर वह ज़रूरी समझते हैं तो अन्य दवाईयों के साथ साथ वे नली द्वारा ( आई-व्ही ड्रिप – intra-venous fluids) कुछ दवाईयां शुरू कर देते हैं। छः घंटे के भीतर अकसर बच्चे सामान्य हो जाते हैं।

रोकथाम ....

बच्चों को इस पौधे के बीजों के बारे में पहले से बता कर रखें...उन्हें किसी भी पौधे को अथवा बीजों को ऐसे ही खेल खेल में खा लेने के लिये सचेत करें। स्कूल की किताबों में इन पौधों का विस्तृत्त वर्णन होना चाहिये व अध्यापकों को भी इस से संबंधित जानकारी देते रहना चाहिए।

डा. बशीर की डायरी ----पेज 2.

पिछली पोस्ट ...डा बशीर का डायरी --पेज 1 से आगे .....

जब बशीर ने उन से उस एक्स-रे के बारे में पूछा कि वह कहां पर है? उन्होंने बताया कि वह तो एक्स-रे विभाग में जमा हो गया था ... उस ने उन्हें वह लाने को कहा। वहां पर वे एक-डेढ़ घंटा धक्के खाने के बाद वापिस आ गये कि वहां से तो कहते हैं कि हम इतना पुराना एक्स-रे नहीं ढूंढ सकते।

बशीर उन के साथ एक्स-रे रूम तक गया ... वहां पर स्टॉफ को कहा कि देखो, बई, इन का एक्स-रे ढूंढो कैसे भी, कहीं से भी, इन का स्वास्थ्य देख ही रहे हैं आप! आधे घंटे के बाद वे दंपति एक्स-रे लेकर वापिस बशीर के पास आ गये।

बशीर ने फिर से पूछा कि बाकी सब तो ठीक है ना, उस ने साफ साफ अक्षरों में यह भी पूछ डाला कि बवासीर जैसी कोई बात तो नहीं! इतना सुनते ही उस वृद्दा ने बहुत ही झिझकते झिझकते बोला कि इन्हें टायलेट के साथ खून आता है। पूछने पर उस ने आगे बताया कि यह तो बहुत दिनों से हो रहा है। बशीर ने पूछा कि क्या यह तकलीफ़ आप ने अपने डाक्टर को पहले कभी बताई? जवाब मिला कि उन्हें लग रहा था कि गर्म दवाईयों की वजह से यह सब हो रहा है, अपने आप ठीक हो जायेगा। और रही बात, अपने डाक्टर के साथ बात करने की, यह बात किसी ने पूछी नहीं और उन्हें स्वयं यह बात करने में शर्म आती थी क्योंकि डाक्टर के कमरे में हमारी जान-पहचान के और भी बहुत से लोग इक्ट्ठे होते हैं।

बहरहाल , बशीर ने उन के नुस्खे पर यह टायलेट के रास्ते रक्त निकलने की बात लिख कर उसे वापिस डाक्टर के पास भेज दिया ... और डाक्टर ने छाती का एक्स-रे देख कर उन्हें अगले दिन फ़िज़िशियन को दिखाने के लिये बुला लिया।

बशीर आगे लिखता है कि जिस बड़े अस्पताल में वह काम करता है, वह बिल्कुल नाम का ही बड़ा है, पंद्रह डाक्टरों की जगह चार डाक्टर काम कर रहे हैं...विशेषज्ञ कोई भी नहीं टिकता, चुस्त चालाक लोग कोई भी जुगाड़ कर के बड़े शहरों में लपक जाते हैं... केवल एक फ़िज़िशियन है। आगे जो लिखा था वह पढ़ कर मन दुःखी हुआ....लिखता है कि एक एक डाक्टर दिन भर में 80-90 मरीज़ “भुगता” देता है, वह भी यह सोच कर हैरान है कि यह कैसे हो सकता है ! लेकिन बड़े दुःखी मन से आगे लिखता है कि डाक्टर चाहे एक भी हो....(और चाहे न भी हो !!) , सिवाए मरीज़ के किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, सब मस्ती मार रहे हैं, टूर जाने वाले टूर पर जा रहे हैं, छुट्टी पर जाने वाले छुट्टी काट रहे हैं, खूब राजनीति भी चल रही है, लेकिन अगर मरीज़ों की तरफ़ से कोई शिकायत नहीं है, तो किसी को भी किसी से कोई भी शिकायत नहीं है ....

बशीर भी जब दिल की बात लिखने लगता है ....तो फिर सब कुछ लिख ही देता है ... उस ने लिखा था ....मरीज़ों का क्या है, वे घंटा शिकायत करेंगे, उन्हें पता कैसे चलेगा कि उन के साथ कम से कम दस मिनट बिताने की जगह अगर आधा मिनट बिताया गया है तो इस का सीधा सीधा मतलब उन की सेहत के लिये आखिर है क्या ! लेकिन छोड़िए, किसी को कोई परवाह नहीं, सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा... आगे लिखता है कि उस के अस्पताल का सीधा सीधा फंडा है कि बस उन पांच दस लोगों को “ हर कीमत पर” हर तरह से खुश रखा जाए...( पंजाबी में एक कहावत है ...किसे अग्गे कोड़ा होना....बस लिखदा ऐ कि अजेहे पंजा-दसां लोकां अग्गे बस कोडे होन दी ही कसर रह जांदी ऐ !!) …..बशीरे, तूं वी जदों दिल नाल लिखदैं फेर कुछ नहीं वेखदा .......लेकिन लगता है कि वह इधर उधर देखता भी क्यों, अपनी डायरी में अपनी मस्ती में लिख रहा था।

मैं बशीर की डायरी पढ़ते पढ़ते सोच रहा था कि बशीर क्यों इतनी हिम्मत हारता दिखाई दे रहा है, हर बात का इलाज तो है, खैर मैं वापिस उस की डायरी के दूसरे पन्ने पर ही वापिस आ जाता हूं.....

अगले दिन वो दंपति आते हैं ...फिज़िशियन को दिखाने के लिये....किसी पड़ोसी की कार मांग कर क्योंकि उस बंदे से चला नहीं जा रहा था लेकिन उन के अस्पताल पहुंचने पर पता चलता है कि फिज़िशियन साहब तो आज छुट्टी पर हैं । मायूस हो कर जाने के सिवाए कोई चारा नहीं था।

 अगले दिन वे दंपति आते हैं, फिज़िशियन को दिखाने के बाद बशीर के पास आते हैं....फिज़िशियन ने भी उन के छाती के एक्स-रे में दिखने वाली गड़बड़ी के बारे में लिखा था और टीबी के जीवाणु देखने के लिये लगातार तीन बार लार की टैस्टिंग (sputum test) के लिये कहा था। आज फिर बशीर ने पूछ ही लिया कि वह जो टायलेट के साथ रक्त आता है, उस का क्या हाल है ?

इतना बात सुनने पर पता नहीं कैसे बेचारी उस वृद्दा के सब्र का बांध टूट गया कि उस ने दिल की बात खोल ही दी ...डाक्टर साहब, यह तकलीफ़ इन्हें पिछले काफी दिनों से है, बड़ी बेबसी से, बशीर लिखता है, उस ने कहा कि मैं थक गई हूं इन का खून से लथपथ पायजामा और कच्छा (अंडरवियर) धोते धोते...... मुझे उल्टी जैसा होने लगता है, लेकिन बहुओं-बेटों वाला घर है, किसी से कुछ भी कहते शर्म आती है !! मैं तो यह बात आपसे भी न करती, पता नहीं कैसे आज हिम्मत आ गई !! और उस ने आगे कहा कि उसे लगता है कि इन की उस जगह पर कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि जिस तरह खून के थक्के निकलते हैं, मुझे बहुत डर लगता है....

बशीर ने आगे लिखा कि उसे समझ मे आ रहा था कि इन्हें किसी सर्जन को दिखाया जाना बेहद ज़रूरी है.... जिस के लिये उन्हें चालीस मील दूर जाना होगा......लेकिन वे अभी कहते हैं कि पहले वे थूक का टैस्ट करवा के उस तकलीफ़ से निपट लें, यह तकलीफ़ को थोड़े दिनों बाद देख लेंगे........क्रमशः
कड़ी जोड़ने के लिये देखिए
डा बशीर की डायरी --पहला पन्ना 

डा बशीर की डायरी ... पहला पन्ना

कुछ दिन पहले मुझे बहुत वर्षों के बाद एक कॉलेज के दिनों का मित्र मिला... खूब बातें हुईं... प्रोफैशन, दुनिया और इधर उधर की हर तरह की बहुत सी बातें। प्रोफैशन की बातों से ध्यान आया ...उस ने मेरे को अपनी डायरी ही पढ़ने के लिये दे दी .... कुछ बातें ऐसी पढ़ीं जिन्हें मैं यहां पाठकों के साथ साझा करना ज़रूरी समझता हूं।

मेरा यह दोस्त एक डैंटिस्ट है डा. बशीर (नाम बदल दिया है).. डायरी में उस ने एक बुज़ुर्ग के बारे में लिखा था कि एक 70-75 वर्ष का व्यक्ति था, वह दो एक साल पहले दांतों के उपचार के लिये उस के पास अकसर आया करता था ...जब सब कुछ दुरूस्त हो गया तो उस से मुलाकात होनी बंद हो गई। उस के बारे में उस ने लिखा था कि बड़ा हंसमुख, ज़िंदादिल इंसान था.....अपनी ज़िदगी के किताब के कुछ पन्ने बशीर के सामने खोल लिया करता था।
हां, तो बशीर ने आगे लिखा था कि उसने उस बुज़ुर्ग को पिछले कुछ महीनों में तीन चार बार बाज़ार में देखा ... उसे देख कर बहुत ताजुब्ब हुआ करता था कि वह बहुत कमज़ोर सा दिखने लगा था।

अभी कुछ दिन पहले ही की बात है कि वह बुज़ुर्ग और उस की वृद्ध पत्नी डा बशीर को अस्पताल के बाहर ही मिल गये....अच्छी तरह से मिले ...लेकिन वह बंदा बहुत ही कमज़ोर दिख रहा था...बशीर ने उनसे पूछा कि क्या बात है, वजन बहुत कम लग रहा है, सब ठीक तो है? इस पर उस की पत्नी ने बताया कि बस, अब इन की तबीयत ऐसी ही रहती है, पिछले कुछ दिनों से पेट में दर्द भी है, बस, दिन प्रतिदिन इन की सेहत गिरती जा रही है, बस किसी तरह से यह अस्पताल में भर्ती हो जाएं।

बशीर जल्दी में था ... उस ने उन का मार्गदर्शन किया कि वे किस डाक्टर के पास जाएं और वहां दिखाने के बाद उस से मिल कर जाएं.... और कोई भी दिक्कत होने पर उस के कमरे में आकर  मिलने के लिये भी कह दिया।

लगभग डेढ़ घंटे के बाद वह बुज़ुर्ग और उन की बीवी बशीर के कमरे में पहुंचे ..... उस ने उन्हें सम्मानपूर्वक बिठाया, अच्छे से बात की और सब हाल चाल पूछा ... उस वृद्दा ने डाक्टरी नुस्खा उस के आगे कर दिया। उस ने देखा कि डाक्टर ने उस के लिये पेट और सिरदर्द की दवाई लिखी हुई थी ... लेकिन यह देख कर बशीर को तसल्ली नहीं हुई...उसे लगा कि यह बंदा बीमार तो इतना ज़्यादा लग रहा है और ये पेट-सिरदर्द की दवाईयां आखिर कौन सा जादू कर देंगी!

बहरहाल बशीर ने उस नुस्खे को फिर से देखना शुरू किया ...उस ने देखा कि दो महीने पहले इस बंदे का छाती का एक एक्स-रे हुआ था जिस की रिपोर्ट कुछ गड़बड़ थी ...
क्रमश.....