Sunday, May 24, 2015

बस सब शब्दों का ही खेल है!

कितने शब्द, कौन सा शब्द ...और इन्हें कहने का अंदाज़ ही है बस, इन्हें ही सीखते सीखते ज़िंदगी बीत जाती है, लेकिन यह फंडा ही हम लोग समझ नहीं पाते।

अकसर हम लोग हर जगह अनाप-शनाप बोलते रहते हैं...किसी की मौत पर अफसोस करने आए कुछ लोगों को यह पता नहीं होता कि कितना चुप रहना है, कितना मुंह खोलना है, और क्या कहना है! पेज-थ्री फिल्म के एक दृश्य का ध्यान आ गया जहां पर लोग इस तरह के मौके पर अफसोस के अलावा सब कुछ डिस्कस करते दिखते हैं...अफेयर्स, बिजनेस आदि आदि।

कम्यूनिकेशन एक बहुत बड़ा विषय है...मैंने इसे कईं वर्षों तक पढ़ा...इस के बारे में बहुत कुछ जाना....सिर्फ़ जाना...कुछ भी सीख नहीं पाया.....और जीवन में तो कुछ भी यूज़ कर ही नहीं पाया....बड़ा रोमांचक विषय है...जब इसे पढ़ने लगते हैं तो ऐसा लगने लगता है जैसे सारी ज़िंदगी ही इस विषय में सिमटी पड़ी है।

व्हाट्सएप, फेसबुक जैसे सोशल-मीडिया के यंत्रो-तंत्रों की तूती बोल रही है....हम बिना सोचे समझे कुछ भी इधर से उधर ...उधर से इधर फारवर्ड करते रहते हैं सारा दिन...बिना ज़्यादा सोच विचार किए......सारा दिन हम लोग ऐसा ही कुछ किये जाते हैं ना....

लेकिन सही शब्द सही मौके पर जब दिखते हैं या कहे जाते हैं तो उन की तासीर ही अलग होती है....जादू सा असर कर सकते हैं ये शब्द...

वैसे बहुत बार तो कुछ रिश्तों में शब्दों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती....आंखें ही बहुत कुछ ब्यां कर जाती हैं....

लेकिन कईं बार कुछ कहना भी पड़ता है.....हम लोग चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े हैं, देखते हैं किसी बीमार के कंधे पर हाथ रख कर जब ये चंद शब्द कहे जाते हैं ...टेंशन मत लो, सब ठीक हो जाएगा!..... तो उसके चेहरे की चमक देखते बनती है...

जब किसी बीमार को आप कोई Get Well note भेजते हैं तो उसे कितना अच्छा लगता होगा! ...शब्दों के साथ साथ मौका और उस की टाइमिंग भी बहुत अहम् होती है।


आज मुझे यह विचार सुबह आया जब मैंने जे ई ई एडवांस के एक परीक्षा केन्द्र पर एक बात लिखी देखी....बात देखने में बहुत छोटी सी थी ..लेकिन मौका और इस का टाईमिंग अति उत्तम था...Everyday holds the opportunity of miracles!

देखिएगा बात कितनी सुंदर है... और सैंकड़ों बच्चे और उन के गार्जिएन्स ने जब उन शब्दों को पढ़ा होगा तो उन्हें कितना अच्छा लगा होगा। मुझे भी बहुत अच्छा लगा...


इस तरह के एग्ज़ाम देने आए स्टूडेंट्स और उन के अभिभावकों पर उस समय कितना दबाव होता है...यह हम सब समझ सकते हैं...वैसे उस समय बहुत से और भी मुद्दे दिमागों में ऊधम मचा रहे होते हैं...लेकिन ये सरकार की नितियां हैं.....बहुत बड़े मुद्दे हैं...इतनी टेंशन नहीं लेने का .......बस उस बात पर ही ध्यान देने का .......हर दिन चमत्कार हो सकते हैं। रिजल्ट कब आएगा, कैसा आएगा...कौन आईआईटी में दाखिला ले पाएगा....कौन रह जाएगा...रिजर्व कैटेगरी का कट-अफ कितना गिरेगा,.......मैंने कहा ना ये बहुत बड़े मुद्दे हैं.....लेकिन ऊपर लिखे चंद करिश्माई शब्दों ने तो सभी को एक बार तो गुदगुदाया दिया।

उस मुश्किल घड़ी में मुझे यकीन है जो भी इस वाक्य को पढ़ रहा होगा, उस का हौसला कुछ तो बुलंद हो ही जाता होगा....क्योंकि हर एक पढ़ने वाले को लगता होगा कि यह उस के लिए ही लिखा है।

अकसर हम लोग देखते हैं कि एक ही बात अलग अलग लोग कहते हैं ..लेकिन उन के कहने का ढंग -अंदाज़ इस कद्र अलग होता है कि एक तो लड़ाई झगड़े का कारण बन जाता है और दूसरी की बात खुशी खुशी स्वीकार कर ली जाती है। सच बताऊं यह कम्यूनिकेशन एक बेहद रोमांचक विषय है....बिल्कुल प्रेक्टीकल ......यह मेरा कसूर है कि मैं इस के बारे में बहुत कुछ जान तो पाया लेकिन इसे जीवन में उतार नहीं पाया।

पंजाबी में एक बड़ी पुरातन कहावत है ... जुबान ही है जेहड़ी राज करवा दिंदी है ते एहो ही है जिहड़ी छित्तर पवा दिंदी है......(जुबान ऐसी है जो राज भी करवा सकती है और जूते भी पड़वा सकती है!!) ... शत प्रतिशत सच।
अकसर हम लोग समझा करते थे कि बातचीत करने के ढंग का किसी बंदे की पढ़ाई-लिखाई से कोई संबंध है....लेकिन ऐसा नहीं है.....ऐसा मैंने अनुभव किया है।

कितनी बार हम लोग सुनते हैं कि बहुत बार कही गई बात के शब्दों की वजह से नहीं होती, उस के कहने के अंदाज़ और बात कहने की टोन की वजह से बड़े बड़े बखेड़े हो जाते हैं।

हमें कम्यूनिकेशन में शब्दों का इस्तेमाल सोच समझ के करना चाहिए...आज दोपहर में मैं आलइंडिया रेडियो का रेनबो चैनल सुन रहा था ..कोई गौतम कौल हैं..लेखक और पुलिस अधिकारी रहे हैं.....किसी पाठक का जब खत उन्हें सुनाया गया ..२० साल की किसी लड़की ने खत लिखा था रेडियो कार्यक्रम में ..खत पढ़ने वाला लड़की की हिम्मत की दाद दे रहा था ...लेकिन कौल साहब ने उस लड़की को ताकीद की निराशात्मक (निगेटिव) quote कहना उस की उम्र में शोभा नहीं देता.....यह उम्र तो आशा की है, उमंग की है, नई ऊर्जा की है, स्फूर्ति की है......ऐसे में निराशा का, हताश होने का क्या काम......अच्छा लगा उन की यह बात सुन कर... उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में जो गीत पहले बज रहा था, हमें उस में कही बातों पर गौर करना चाहिए......हमेशा पाज़िटिव रहना चाहिए...

जिस गीत का वह ज़िक्र कर रहे थे, उस का रिकार्ड मैं ही लगा देता हूं ...आप भी सुनिएगा...




आज मैं सरकारी भांग के ठेके पे हो ही आया...


भांग के बारे में मेरी उत्सुकता पिछले कुछ महीनों से ज़्यादा ही बढ़ गई थी...मैंने पांच छः महीने पहले लिखा भी था...
उत्सुकता कुछ तो इसलिए बढ़ गई थी क्योंकि मैं जब से लखनऊ में आया हूं मैंने कईं जगह पर भांग के सरकारी ठेके देखता हूं..

बचपन से भांग की यादें कुछ खास नहीं....बस, जिस घर में हम रहते थे उस के पीछे वीरान जगह थी...जहां पर अकसर आने जाने वाले, कूड़ा कर्कट उठाने वाले लोग कुछ जंगली पौधे के पत्तों को तोड़ते, दोनों हाथों में मसलते, फिर किसी कागज़ में डाल कर पीने लगते...हमें तब पता चल गया था कि यह भांग के पौधे हैं।

फिर कालेज में गये तो भांग के बारे में बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) पढ़ते अच्छे से पढ़ा। फिर जब मेडीसन पढ़ने लगे तो पता चला कि यह किस तरह का नशा है।

उन्हीं दिनों की बात है कि होस्टल में रहने वाले कुछ लड़कों को होली वाले दिन धोखे से भांग के पकोड़े खिला दिए गये..उन की हालत इतनी खराब हो गई, उल्टीयां होने लगीं कि उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा....तब पता चला कि भांग बहुत खराब चीज है।

और सब से ज़्यादा तारूफ़ भांग से राजेश खन्ना और मुमताज ने तब तक करवा ही दिया था...जब वे शिवरात्रि के दिन भांग वांग पी लेते हैं....

हां, तो भांग के ठेके वाली बात पर वापिस लौटते हैं...आज मैं एक भांग के ठेके पर रूक ही गया...यह सरकारी ठेका है...मुझे सीधा उस के अंदर जाते हुए झिझक महसूस हुई तो मैंने उस के साथ वाली दुकान से उस ठेके के बारे में थोड़ा जानना चाहा...उसने बताया कि दस बीस रूपये में भांग मिल जाती है...धंधा बहुत बढ़िया है पर यह भांग दिमाग को बिल्कुल खोखला कर देती है। अगर इन ठेकों पर कोई गलत काम होता दिख जाए तो सरकार इन का लाइसेंस कैंसिल भी कर देती है...मैं मन में सोच रहा था कि यार, यह तो तुम मुझे मत बताओ...यह सब सुन कर अब हंसी आती है।
मैं वहां से जाने लगा तो इच्छा हुई कि हिम्मत कर के अंदर ही चलता हूं....

मैं अंदर गया तो देखा कि एक कारीगर जैसा दिखने वाला बंदा छोटे छोटे लड्डू से बना रहा था ..मैंने उत्सुकता से पूछा कि यह क्या है, जवाब मिला कि यह भांग है। यह जो तस्वीर आप देख रहे हैं ये भांग के गोले हैं....बीस बीस रूपये में बिकते हैं।

भांग के गोले 
अब मैं अंदर चला ही गया था तो क्या कहता कि मैं क्यों आया हूं...क्या मैं उस कारीगर के पीछे बैठा उस ठेके के मालिक को कहता कि मैं बस फोटो खींचने आया हूं....यह तो ठीक न लगता ...इसलिए मैंने बात इस तरह से शुरू की कि पंजाब में तो भांग के पकोड़े खूब बिकते हैं। पंजाब का नाम सुन कर दुकान का मालिक कहने लगा कि पंजाब में तो नशों की भरमार है।

बहरहाल, उसने मुझे पूछा कि आप उन पकोड़ों के लिए भांग लेना चाहते हैं, वह भी हमारे पास है....वहां पर पैकेटों में भांग की पत्तियां पैक की हुई थीं....उसने बताया पकोड़े इसी के बनते हैं।

अभी इतनी बात चल रही थी कि एक आदमी आया और इन भांग के गोलों के पास ही रखे कुछ चांदी के वर्क लगे छोटे छोटे भांग के गोले की तरफ़ इशारा कर के एक लेने लगा...बीस रूपये में....उसे मुनक्का कहते हैं....मैंने पूछा कि इसे मुनक्का क्यों कहते हैं...तो कारीगर और मालिक कहने लगे कि यह मीठा होता है ... इसे देशी घी से तैयार किया जाता है।

 भांग मुनक्का 
मैंने यह भी पूछा कि बाहर दुकान के बाहर एक मटका रखा हुआ है...जो भी आपसे भांग खा रहा है, बाहर पानी ज़रूर पी रहा है ..तो कारीगर ने बताया कि भांग गले में अटक जाती है...इसलिए उसे ठीक से निगलने के लिए पानी तो पीना ही पड़ता है। अभी जब मैं विकि-पीडिया पर भांग के बारे में पढ़ रहा था तो उस में लिखा है कि जो लोग इस का सेवन करने लग जाते हैं...उन का मुहं सूखने लगता है....सूखे मुंह में रखी किसी भी चीज़ को आगे सरकाने के लिए पानी तो चाहिए ही।

मुनक्के के एक खरीददार ने मुझे भी मुनक्का खाने के लिए कहा। लेकिन मुझे तो उस मुनक्के का याद आ गया जिसे मैंने हरियाणा में बिकता सुना था...मुझे आज पता चल गया कि उस मुनक्का वटी में भी यह भांग वांग ही होती होगी।

मैंने जब पूछा कि भांग को पीया कैसे जाता है तो दुकानदार ने पास ही रखे कुछ छोटे छोटे पाउचों की तरफ़ इशारा किया कि इन में भांग का पावडर है, अगर आप इन्हें सूंघ ही लें तो बस....मस्त हो जाएं।

इतने में मैंने दुकानदार से पूछा कि क्या मैं इन भांग के गोलों की फोटो खींच लूं.....उसने कहा ...हां, हां......लेकिन मुनक्का वटी की फोटो खींचते समय कैमरा बंद हो गया...कोई बात नहीं..
नेपाल में साधु न बेच पाएंगे भांग

इस के आगे मैं वहां क्या बातें करता....उसने मेरे से पूछा कि आप कहां से आए हैं......मैंने भी अपना परिचय दे दिया।
शायद आप को पता होगा कि भांग को दवाई के तौर पर भी यूज़ किया जाता है ..कुछ पश्चिमी देशों में....और यह मेडीकल यूज़ डाक्टरों की देखरेख में होता है....विशेषकर कैंसर के दर्द को कम करने के लिए इस का बहुत इस्तेमाल हो रहा है... और अभी तो हिंदोस्तान में भी चर्चा शुरू हो गई है कि भांग के मेडीकल इस्तेमाल की अनुमति दी जानी चाहिए....

अगर इसे मेडीकल इस्तेमाल के लिए यूज़ किया जाने लगेगा तो इस का सही तरीके से शुद्दिकरण होगा,....इस तरह से बिक रही भांग में (जैसा कि मैंने ऊपर बताया है) तो पता ही नहीं कौन कौन सी अशुद्धियां हैं...क्या क्या भरा पड़ा है!... लेकिन अगर मेडीकल यूज़ के लिए इसे अनुमति मिल जाती है तो फिर डाक्टरी खुराक की तरह ही इसे लिया जा सकेगा....ऐसे ही नही भांग के गोले, भांग का मुनक्का ही खरीद कर खा लिया जाए..

जो भी हो , भांग खराब तो है ही.......नशे तो सब खऱाब ही हैं......लेकिन इस में कोई शक नहीं कि अगर इस का नियंत्रित इस्तेमाल चिकित्सा के लिए किया जाए तो कैंसर जैसे जटिल रोगों से ग्रस्त रोगियों की पीड़ा का काफ़ी कम किया जा सकता है...और चिकित्सा विज्ञानिक इसी पर रिसर्च करने की ही तो अनुमति मांग रहे हैं। आप इस िलंक को देख सकते हैं...
डाक्टरों को तो भांग पर काम कर लेने दो 

दो साल पहले की बात है हम लोग अपने नेटिव प्लेस पर गये हुए थे....वहां पर हमारे मैदान को बहुत समय से खाली छोड़ा हुआ था..वहां पर भी यह भांग के पौधे निकल आए थे....उन्हें देखते ही मेरा बेटा हंसने लगा...डैड, मरीयाना, वाह ...इस की बड़ी डिमांड है...इसी का ही बिजनेस कर लेते हैं! (बाहर देशों में भांग को मरीयाना ...Marijuana कहा जाता है)...हंसते हंसते फिर कहने लगा......Woh! Marijuana cultivation!!
अगले दिन मजदूरों से उन पत्तों को कटवा कर फैंक दिया गया।

यह टॉपिक बहुत लंबा है ...लेकिन अगर आप को भांग के बारे में बहुत कुछ जानना है तो भांग के विकिपेज पर विज़िट अवश्य करिएगा......यह रहा लिंक ....Cannabis (wikipedia page)


भांग की इतनी बातें हो गईं........ना ही मैंने इसे चखा ना ही इसे आपने खाया....लेकिन फिर भी इस की सीरियस बातों की चर्चा के बाद प्रसाद के रूप में चिट-पट वाला यह कार्टून देख कर थोड़ा हंस दीजिए....आज ही हिन्दुस्तान में छपा है....इन कार्टूनिस्टों के फन को दंडवत सलाम.....किस तरह से गागर में सागर तो भर ही देते हैं.....और बिना भांग खिलाए ही हमें लोटपाट कर देते हैं......अच्छे दिनों को चंद शब्दों में इतनी सटीकता से हमारे सामने रख दिया.....आप का क्या ख्याल है?