Saturday, January 25, 2014

गुटखा छोड़ने का एक जानलेवा उपाय

इस युवक के मुंह की तस्वीर.. 
कल मेरे पास एक २१ वर्ष के लगभग आयु का युवक आया। मुंह में कोई समस्या थी। मुझे लगा कि गुटखा-पान मसाला खूब खाया जा रहा है।

पूछने पर उसने बताया कि मैंने खाया तो खूब बहुत वर्षों तक ..लेकिन पिछले ६-७ वर्षों से सब कुछ छोड़ दिया है। ऐसे लोगों से मिल कर बहुत खुशी होती है जो अपने बल-बूते पर इस ज़हर को ठोकर मार देते हैं। उस के इस प्रयास के लिए मैंने उस की पीठ भी थपथपाई।

ऐसे मरीज़ मेरे पास कम ही आते हैं जो कहें कि इतने वर्षों से गुटखा-पानमसाला छोड़ रखा है। मुझे जिज्ञासा हुई कि इस से पूछें तो सही कि कैसे यह संभव हो पाया।

उस ने बताया कि गुटखा-पानमसाला उसने स्कूल के दिनों से ही खाना शुरू कर दिया था और मैट्रिक तक खूब खाया--लगभग दस पैकेट रोज़। लेकिन एक दिन उसने बताया कि उस के पिता जी को पता चल गया ...बस फिर छूट गया यह सब कुछ।

मैंने ऐसे ही पूछ लिया कि पिता जी ने धुनाई की होगी........कहने लगा ...नहीं, नहीं, उन्होंने मुझे बड़े प्यार से उस दिन समझा दिया कि इस सब से ज़िंदगी खराब हो जायेगी। और बताने लगा कि उस दिन के बाद से पिता जी ने मुझे अपने पास ही सुलाना शुरू कर दिया।

दो-चार मिनट तक ये बातें वह बता रहा था। पता नहीं मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगा, उस का मुंह के अंदर की तस्वीर उस की बात से मेल खा नहीं रही थी। मैं भी थोड़े असमंजस की स्थिति में था कि सात वर्ष हो गये हैं गुटखा छोड़े इस को लेकिन मुंह की अंदरूनी सेहत तो अब तक ठीक हो जानी चाहिए।

यह बात बिल्कुल सत्य है कि मुझे कल कोई ऐसा मिला जिसने अपने आत्मबल के कारण गुटखा त्याग दिया था।
लेकिन मैं गलत साबित हुआ। पता नहीं उसे किस बात ने प्रेरित किया कि अचानक कहने लगा कि बस, डाक्टर साहब, मैं कभी कभी बस तंबाकू रख लेता हूं। मेरा माथा ठनका।

पूछने पर उसने बताया कि १४-१५ वर्ष की अवस्था से अर्थात् छः-सात वर्ष से उसने गुटखा तो छोड़ ही रखा है, कभी लिया ही नहीं ...लेकिन अभी कुछ डेढ़ साल के करीब वह इलाहाबाद अपने अंकल के पास गया है जो कि वहां पर एक उच्चाधिकारी हैं....वहां रहकर वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा है। बस, वहां रहते रहते अन्य साथियों की देखा देखी ...बस, फ्रस्ट्रेशन दूर करने के लिए (जी हां, उस ने इसी शब्द का इस्तेमाल किया था) जैसे दूसरे लड़के लोग तंबाकू चबा लेते थे मैंने भी चबाना शुरू कर दिया है।

और वह एक बात बड़े विश्वास से कह रहा था कि गुटखे छोड़े रखने के लिए ही उसने तंबाकू चबाना शुरू किया है। मुझे लगा कि यह कैसा इलाज है। उसने बताया कि वह जो तंबाकू इस्तेमाल करता है उस में चूना भी मिला रहता है और गुटखे छोड़ने के लिए बहुत बढ़िया है।

गुटखे की आदत से मुक्ति दिलाने का दावा करता यह तंबाकू
मेरे कहने पर उसने वह तंबाकू का पैकेट मुझे जेब से निकाल कर दिखाया। आप इसे देखिए कि किस तरह से ये कंपनियां देश के लोगों को बेवकूफ़ बना कर लूट रही हैं ... धिक्कार है इन सब पर जिस तरह से ये देश की सेहत के साथ खिलवाड़ किये जा रही हैं, आप की जानकारी के लिए इस पैकेट की कुछ तस्वीरें मैं यहां लगा रहा हूं....आप भी देखिए कि किस तरह से पैकिंग पर ही कितना बोल्ड लिखा गया है .. गटुखा छोड़ने का उत्तम उपाय... चूना मिश्रित तंबाकू--- दुर्गंध एवं झंझट से मुक्ति।

उसी तंबाकू के पैकेट पर यह भी लिखा पाया...
इस तरह की बातें किसी पैकेट के ऊपर लिखा पाया जाना कि इस तंबाकू को खाने के बाद मुंह से दुर्गंध नहीं आती है ..इसके सेवन से गुटखे की आदत से अतिशीघ्र मुक्ति मिल सकती है। गंभीर बात यह भी है कि ठीक ठाक पढ़े युवक -यह युवक भी ग्रेजुएट है...अगर इस तरह की बातों में आकर गुटखे को छोड़ कर तंबाकू चबाने लगते हैं तो फिर उस इंसान की कल्पना करिए जो न तो पढ़ना जानता है ...और न ही उस की कोई कोई आवाज़ है, बस हाशिये पर जिये जा रहा है।

गुटखा छोड़ने का जानलेवा उपाय 
हां, उस लड़के को मैंने इतना अच्छा से समझा दिया कि यह बात तो तुम ने पैकेट पर लिखी देख ली कि यह गुटखा छोड़ने का उत्तम उपाय है ...जो कि सरासर कोरा झूठ है... लेकिन तुम ने पैकेट की दूसरी तरफ़ यह कैसे नहीं देखा... तंबाकू जानलेवा है और एक कैंसर से ग्रसित मरीज़ के मुंह की तस्वीर (चाहे वह इतनी क्लियर नहीं है) भी पैकेट पर ही छपी है।  उसे मैंने समझा तो दिया कि ऐसे सब के सब उत्पाद मौत के खेल के सामान हैं ...।

लगता था वह समझ गया है, कहने लगा कि आज के बाद इसे भी नहीं छूयेगा... और बाहर जाते जाते वहीं कूड़दाने में उस पैकेट को फैंक गया। मुझे लगा मेरी पंद्रह मिनट की मेहनत सफ़ल हो गई। अभी आता रहेगा अपने इलाज के लिए मेरे पास...तीन चार बार... देखता हूं कि वह इस ज़हर से हमेशा दूर रह पाए।

इस पोस्ट में स्वास्थ्य से संबंधित ही नहीं ..अन्य सामाजिक संदेश भी है....किस तरह से बाप के प्यार ने, उसे पास सुलाने से उस ने गुटखा तो छोड़ दिया....लेकिन करीबी रिश्तेदार के यहां जाकर फिर वह तंबाकू चबाने लगा......वहां शायद उसे किसी ने रोका नहीं होगा....मतलब आप समझ ही गये हैं।

मैं इस तरह की कंपनियां के ऐसे भ्रामक विज्ञापन देखता हूं , एक तरह से पैकेट में बिकता ज़हर देखता हूं तो मुझे इतना गु्स्सा आता है कि मैं उसे पी कर ही मन ममोस कर रह जाता हूं लेकिन ये मुझे इस तंबाकू-गुटखे-पानमसाले के विरूद्ध जंग को और प्रभावी बनाने के लिए उकसा जाते हैं।

मुझे लगता है कि हम डाक्टरों के संपर्क में आने के बाद भी अगर लोग तंबाकू, गुटखा, पानमसाला नहीं छोड़ पाएं तो फिर कहां जा कर छोड़ पाएंगे, हमें इन के साथ बार बार गहराई से बात करनी ही होगी। ऐसे कैसे हम इन कमबख्त कंपनियां को जीतने देंगे, अपना युवा वर्ग हमारे देश की पूंजी है.......कैसे हम उन्हें इन का शिकार होने देंगे। अगर कोई व्यक्ति मेरे पास कईं बार आ चुका है और वह अभी भी इस तरह की जानलेवा चीज़ों से निजात नहीं पा सका है तो मैं इसे अपनी असफलता मानता हूं.....यह मेरा फेल्योर है....ये दो टके की लालची कंपनियां क्या डाक्टरों से आगे निकल गईं, हमारे पास समझाने बुझाने के बहुत तरीके हैं, और हम लोग पिछले तीस वर्षों से कर ही क्या रहे हैं, बस ज़रूरत है तो उन तरीकों को कारगार ढंग से इस्तेमाल करने की..........इस सोच के साथ कि जैसे इस तरह का हर युवक अपने बेटा जैसे ही है, अगर हम १०-१५ मिनट की तकलीफ़ से बचना चाहेंगे तो इस की सेहत तबाह हो जायेगी। मैं नहीं जानता निकोटीन च्यूईंग गम वम को... मैं ना तो किसी को इसे लेने की सलाह दी है ...इस के कईं कारण हैं, वैसे भी अपने दूसरे हथियार अच्छे से काम कर रहे हैं, मरीज़ अच्छे से बात सुन लेते हैं, मान लेते हैं तो क्यों फिर क्यों इन सब के चक्कर में उन्हें डालें?

बस अपना कर्म किये जा रहे हैं, इन युवाओं की सेहत की रक्षा हो पाने के रूप में फल भी मिल ही रहा है.......मैंने उसे इतना भी कहा कि अगर इस तरह के दांतों के साथ तुम कोई भी कंपीटीशन की परीक्षा देने के बाद इंटरव्यू में जाओगे तो इस का क्या परिणाम क्या हो सकता है, तुम स्वयं सोचना। कुछ बातें साक्षात्कार लेने वाले रिकार्ड नहीं करते लेकिन ये सब बातें उम्मीदवार के मूल्यांकन को प्रभावित अवश्य करती हैं, आप क्या सोचते हैं ...क्या ऐसा होता होगा कि नहीं?

सुबह से लेकर रात सोने तक सारे चैनलों पर आम आदमी पार्टी एवं अन्य पार्टीयों की छोटी छोटी बातें ...कौन कितना खांसता है, कौन खांसने का बहाना करता है, किस ने एक साइज बड़ी कमीज़ डाली है, किस ने मफलर कैसे लपेटा, कौन  दफ्तर से निकल कर महिला आयोग पहुंचा कि नहीं, राखी सावंत कैसे चलाती दिल्ली सरकार..........सारा दिन बार बार वही दिखा दिखा कर...उत्तेजित स्वरों में बड़ी बड़ी बहसें.............इन सब के बीच कुछ कंपनियां किस तरह से ज़हर बेच बेच कर अपना उल्लू सीधा किए जा रही हैं, उन की खबर कौन लेगा?

Thursday, January 23, 2014

सरकारी मीडिया पर सेहत संबंधी जानकारी ..२

इस श्रृंखला की पहली कड़ी में मैंने कल ऑल इंडिया रेडियो विविध भारती पर प्रसारित होने वाले सेहत संबंधी कार्यक्रमों की समीक्षा की थी। आज ज़रा देखते हैं कि दूरदर्शन जैसे सरकारी चैनल पर सेहत संबंधी जानकारी किस तरह से उपलब्ध करवाई जा रही है।

डी डी न्यूज़ पर टोटल हैल्थ -- 
यह कार्यक्रम डी डी न्यूज़ चैनल पर हर रविवार की सुबह साढ़े आठ बजे से साढ़े नौ बजे तक प्रसारित किया जाता है।
इस कार्यक्रम की जितनी प्रशंसा की जाए कम है .. और मैं यह सिफ़ारिश करता हूं कि इसे हर व्यक्ति को रविवार सुबह देखना चाहिए। आप इस के हर एपीसोड से कुछ न कुछ नया सीखेंगे, इस की गारंटी मैं लेता हूं।

किसी एक मैडीकल अवस्था से संबंधित इस कार्यक्रम में तीन-चार चोटी के विशेषज्ञ आमंत्रित किये जाते हैं। इस प्रोग्राम का सिलसिला पिछले कईं वर्षों से चल रहा है। यह लाइव कार्यक्रम है।

इस कार्यक्रम के फार्मेट की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। सब से पहले इसे प्रस्तुत करने वाले उस मैडीकल अवस्था की संक्षिप्त जानकारी देंगे ..और बहुत बार तो यह ऑडियो-विजुअल भी होती है। विशेषज्ञों का परिचय करवाया जाता है और इस बात के लिए डी डी न्यूज़ चैनल बधाई का पात्र है कि ये विशेषज्ञ बेहद अनुभवी बुलाते हैं...जैसा कि मैं अकसर कहता हूं कि जिन का एक एक शब्द अनुभव की कसौटी पर परखा हुआ होता है। बिल्कुल आम भाषा में बिना किसी तकनीकी मकड़जाल (technical jargon) के अपनी बात देश के सामने रख पाने में भी जैसे इन सब विशेषज्ञों ने  महारत हासिल की हो।

जिस शारीरिक अथवा मानसिक तकलीफ़ के ये विशेषज्ञ होते हैं उस के बारे में प्रोग्राम के प्रिज़ेटर चर्चा शुरू करते हैं.. उन की बातचीत से ही पता चल जाता है कि वे भी विषय के बारे में पूरी रिसर्च कर के आये हैं। बीच बीच में दर्शक फोन के द्वारा अपनी समस्याएं उन विशेषज्ञों को बताते हैं और वे उन का समुचित मार्गदर्शन (जितना वे दूर बैठे कर सकते हैं) करते हैं।

मैं प्रिज़ेंटर्ज़ की रिसर्च के बारे में कह रहा था ...उन दोनों ने उस विषय के बारे में इतनी अच्छी रिसर्च कर रखी होती है जैसे कि आम आदमी की उस विषय से सभी संभावित जिज्ञासाओं को उन्होंने भांप लिया हो। अच्छा लगता है सरकारी चैनल पर इतना उत्कृष्ठ सेहत संबंधी कार्यक्रम देख कर।

एक बात और यह भी है कि आप इस कार्यक्रम में अपनी समस्या के समाधान के लिए इन्हें ई-मेल भी भेज सकते हैं ...यहां तक कि इस लाइव कार्यक्रम के दौरान भी आप इन्हें ई-मेल भेज सकते हैं जिन्हें अकसर ये उस कार्यक्रम के दौरान ही विशेषज्ञों के समक्ष रख कर आप की सहायता करते हैं।

लाइव कार्यक्रम के दौरान फोन करने के लिए लैंडलाइन फोन के साथ साथ इन्होंने एक टोल-फ्री नंबर भी दिया होता है।
मैं अकसर इस कार्यक्रम को देखता हूं --इस बार रविवार २६जनवरी को गणतंत्र दिवस की वजह से प्रसारित नहीं किया जायेगा। इस प्रोग्राम के हर एपीसोड से आप कुछ न कुछ ऐसा सीख सकते हैं जो आप को पहले से न पता हो......और यह बात थ्यूरी जैसी कोई बात नहीं होगी, आप उन सीखी हुई बातों को अपनी सेहत की रक्षा एवं सुधार करने के लिए सहजता से अपने जीवन में उतार भी सकते हैं।

मैंने तो एक बार इस कार्यक्रम में यह ई-मेल भेजी कि आप का कार्यक्रम जनता जनार्दन के लिए तो सर्वश्रेष्ठ हैल्थ कार्यक्रम है ही, यह ऐसा प्रोग्राम है जहां से डाक्टर लोग भी कुछ न कुछ नया सीख सकते हैं क्योंकि इन के विशेषज्ञ बेहद अनुभवी, सुलझे हुए और देश के प्रिमियर चिकित्सा संस्थानों से आए होते हैं जिन का अनुभव बोल रहा होता है और वे अपना २५-३० वर्ष या इस से भी ज़्यादा अनुभव आप के सामने खोल कर रख देते हैं.......और यह सब कुछ जब बिल्कुल किसी कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट (conflict of interest) की बदबू के बिना होता है तो इस की महक ही अलग होती है। मैंने कभी भी इस प्रोग्राम को देखते यह महसूस नहीं हुआ कि इस में बुलाए गये किसी भी विशेषज्ञ का किसी भी तरह का कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट हो, ऐसा ही नहीं सकता कि इस कार्यक्रम के विशेषज्ञों का चयन ही ऐसा होता है, ये सब इस तरह के मुद्दों के बारे में बेहद सचेत जान पड़ते हैं। अच्छी बात है।

कार्यक्रम के दौरान बीच बीच में ऑडियो-विजुएल से जटिल बातों को बिल्कुल साधारण शैली से समझा भी दिया जाता है। और एक बात, चूंकि अकसर ये बड़े बड़े विशेषज्ञ सरकारी संस्थानों से होते हैं ये कईं बार किसी किसी परेशान मरीज़ को अपनी ओपीडी के दिन भी बता देते हैं कि वे फलां फलां दिन आ कर उन से परामर्श कर सकते हैं।

मैं यह पोस्ट बेहद संजीदगी और पूरी जिम्मेदारी से लिख रहा हूं क्योंकि मुझे पता है कि सेहत से संबंधी किसी भी कार्यक्रम की सिफ़ारिश करने का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। मैं इस कार्यक्रम की गुणवत्ता पर शत-प्रतिशत सहमत हूं, इसलिए इसे नियमित देखने की सिफ़ारिश कर रहा हूं।

जिस समय यह कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है ..रविवार सुबह .. उसी समय ये भी सूचना साथ में टीवी स्क्रीन पर कईं बार दिखती है कि यह कार्यक्रम कब पुनः प्रसारित किया जायेगा ...पहले यह उसी दिन --रविवार की शाम को ही डी डी न्यूज़ पर ही प्रसारित किया जाता था ...सुबह वाले लाइव कार्यक्रम की रिकार्डिंग का रिपीट टैलीकास्ट। लेकिन अब शायद इसे अगले दिन अर्थात् सोमवार को दोपहर १२ बजे और शाम ७.३० बजे डी डी इंडिया पर पेश किया जाता है। कृपया आप इस रिपीट प्रसारण के चैनल के बारे में लाइव कार्यक्रम के दौरान जान लें क्योंकि मुझे अच्छे से इस के बारे में याद नहीं है।

और एक बात जो बहुत ठीक लगी इस के बारे में कि ये एक सप्ताह पहले अपने अगले प्रोग्राम के विषय की घोषणा कर देते हैं......चाहे तो आप इन्हें पत्र लिख कर या ई-मेल कर के पहले से ही अपनी बात रख सकते हैं, प्रतिक्रिया दे सकते हैं।  बात रखने तक तो बात ठीक है लेकिन अगर प्रतिक्रिया भेज रहे हैं तो इन से किसी जवाबी मेल या ई-मेल की अपेक्षा न करें क्योंकि यह इन का एक कमज़ोर पक्ष है। शायद इन्हें इस तरफ़ भी सोचने की ज़रूरत है।

एक बहुत उपयोगी बात यह भी है कि वैसे तो नेट पर सेहत संबंधी बातों की भरमार है लेकिन अगर इस तरह का कार्यक्रम आप को इंटरनेट पर किसी भी समय देखने को मिले जिस में आप की ही अपनी भाषा में सीधे-सादे अंदाज़ में विशेषज्ञों ने आपके परिवेश की उदाहरणें लेकर ही अपनी बात रखी हो तो आप को कैसा लगेगा? ...यह भी कोई पूछने की बात है, अच्छा ही लगेगा, बहुत अच्छा लगेगा।

तो फिर एक खुशखबरी यह भी है कि इस कार्यक्रम के कुछ अंश डीडीन्यूज़ के ऑफिशियल यू-ट्यूब चैनल पर भी अपलोड कर दिये जाते हैं...जिन्हें आप उस यू-ट्यूब पर जा कर खंगाल सकते हैं। वैसे एक नमूने के तौर पर मैं इसी प्रोग्राम का एक अंश यहां एम्बैड किये दे रहा हूं......इसे देखियेगा लेकिन अगली २ फरवरी रविवार को सुबह ८.३० बजे डी डी न्यूज़ पर इसे देखना मत भूलियेगा। आप को भी यह कार्यक्रम पसंद आयेगा। वैसे मैं तो डीडीन्यूज़ चैनल को लिखने वाला हूं कि इस कार्यक्रम के सभी एपीसोड (फुल लैंथ) अपने यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड कर दें क्योंकि हर एपीसोड देश के नेट-यूज़र्ज के लिए बेशकीमती है.........such vital information just a click away......



Wednesday, January 22, 2014

सरकारी मीडिया पर सेहत संबंधी जानकारी ..१

मुझे याद है...मैं १७ -१८ वर्ष का था, अमृतसर के डैंटल कॉलेज में बीडीएस में मेरा दाखिला हुआ था और तब हमें टीवी खरीदे भी कुछ हफ़्ते ही हुए थे....डैंटल कॉलेज में दाखिल होते ही वे लोग दांतों की सफ़ाई की बातें नहीं करने लगते..सिलेबस के अनुसार बीडीएस कोर्स के तीसरे वर्ष के दौरान हमें टुथब्रुश-टुथपेस्ट के सही इस्तेमाल के बारे में बताया जाता है। लेकिन मैं यहां बात करना चाह रहा हूं एक जालंधर दूरदर्शन के एक टीवी प्रोग्राम की ...मुझे अच्छे से याद है उस सेहत संबंधी कार्यक्रम में एक दंत चिकित्सक टुथब्रुश की सही तकनीक एक माडल पर बता रहे थे।

उन्होंने इतने अच्छे से माडल के ऊपर टुथब्रुश करना बताया कि मैंने उसी दिन से अपना ब्रुश करने का ढंग सही कर लिया...इससे पहले मैं गलत ढंग से ही ब्रुश किया करता था। दंत चिकित्सक के पास हम लोग कभी गये ही नहीं थे, हम क्या हमारी पुश्तें कभी दांत उखड़वाने के अलावा कभी न गई होंगी ...हम यही समझा करते थे कि दंत चिकित्सक के पास दांत में दर्द होने पर ही जाते हैं।

बहरहाल, मैं प्रशंसा कर रहा हूं उस दंत चिकित्सक की जिन्होंने मुझे उस टीवी प्रोग्राम के दौरान सही ब्रुश करना सिखा दिया। समय चलता गया... कुछ वर्षों बाद मुझे भी आल इंडिया रेडियो एवं दूरदर्शन पर आमंत्रित किया जाने लगा। मुझे याद है कि मैं दूरदर्शन पर जब भी गया तो ब्रुश के सही इस्तेमाल को दिखाने के लिए माडल और ब्रुश ज़रूर लेकर जाया करता था।

यह जो मैं बता रहा हूं कि मैं बहुत बार टीवी और रेडियो के कार्यक्रमों में गया....ऐसा नहीं था कि मैं बहुत काबिल रहा होऊंगा उस दौर में, इसलिए मुझे बुलाया गया। मेरे से सीनियर विशेषज्ञ भी होते थे लेकिन कईं बार मुझे ही बुलाया जाता था। इस का केवल यही कारण था कि रेडियो से या टीवी में काम करता कोई कर्मचारी या अधिकारी आप के पास अपने इलाज के लिए आया, उसे लगा कि अगली बार आप को बुलाया जाए तो बुला लिया गया। बस, इतनी सी बात। इस में अपनी कोई विशेष काबलियत न रही होगी, ऐसा मैं सोचता हूं।

बहुत बार तो जब हमारे वरिष्ठ प्रोफैसरों की ही इन कार्यक्रमों में बुलाया जाता था तो मन में एक प्रश्न सा तो आता ही था कि यार, इन लोगों ने अपना जुगाड़ फिट कर रखा है ... इन्हें ही आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर जाने के इतने अवसर मिलते हैं।

लेकिन आज जब मेरे बाल पकने लगे हैं तो मुझे लगने लगा है कि इस सरकारी मीडिया का विशेषज्ञों की चयन बिल्कुल परफैक्ट है......ये जिन भी विशेषज्ञों को बुलाते हैं वे अपने काम से साथ पूरा न्याय कर के जाते हैं।

क्या करें, चंद शब्दों में अपनी बात कहना सीख ही नहीं पाए, अब अगर किसी विषय की भूमिका ही इतनी लंबी-चौड़ी हो जायेगी तो पोस्ट को उबाऊ होने से कौन रोक पाएगा। चलिए, मैं सीधा अपनी बात पर आता हूं और सरकारी मीडिया पर सेहत संबंधी जानकारी के बारे में कुछ बातें करना चाहता हूं।

विविध भारती -- विविध भारती के नाम से तो आप सब परिचित ही हैं। यह हम लोग बचपन से ही सुन रहे हैं। पहले इसे सुनने के लिए अपने ट्रांसिस्टर को कईं बार थपथपाना पड़ता था या फिर छत पर जा कर एरियर की तार को हिलाना-ढुलाना पड़ता था...लेकिन अब यह आसानी से कहीं भी कैच हो जाता है.....एफ.एम तकनीक ने हमारे मनोरंजन के मायने ही बदल दिये हैं जैसे।

विविध भारती में बाद दोपहर के समय शाम ४ से ५ बजे सप्ताह में एक दिन कार्यक्रम आता है सेहतनामा। मैंने इस की प्रशंसा अपने बहुत से लेखों में की है, इस से बढ़िया सेहत से संबंधी कार्यक्रम मैंने रेडियो पर नहीं सुना।

यह एक घंटे का कार्यक्रम होता है जिस में किसी बीमारी के विशेषज्ञ को बुलाया जाता है... यह विशेषज्ञ अपने फील्ड का अच्छा मंजा कलाकार होता है.. परिचय तो वे करवाते ही हैं लेकिन उन की बातों का ढंग ही उन का परिचय दे देता है। जो विशेषज्ञ बुलाये जाते हैं वे या तो किसी मैडीकल कॉलेज के प्रोफैसर होते हैं या फिर कोई ख्याति-प्राप्त विशेषज्ञ जो किसी प्राईव्हेट अस्पताल में काम कर रहे होते हैं।

यह एक फोन-इन तरह का कार्यक्रम है जिस के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से लोग उस विशेषज्ञ से जुड़ी अपनी शारीरिक-मानसिक समस्याओं को बता कर सलाह पाते हैं।

यह कार्यक्रम जिस ढंग से प्रस्तुत किया जाता है उस के लिए मैं दस में से दस अंक इन्हें देता हूं ...मैं पिछले लगभग सात वर्षों से इसे सुनता ही हूं ..जब भी मुझे याद रहता है.....लेकिन जितनी बार भी सुनता हूं उतनी ही बात कहीं न कहीं किसी फोरम पर इस की प्रशंसा के पुल अवश्य बांध देता हूं।

सब से बड़ी बात इन कार्यक्रमों में यह रहती है कि जो विशेषज्ञ इन कार्यक्रमों में आते हैं उन का कोई कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरैस्ट (conflict of interest) नहीं होना चाहिए.....और इस के बारे में मुझे लगता है कि ये कार्यक्रम वाले बहुत अलर्ट हैं....मुझे कभी भी इस तरह की कोई शिकायत इस कार्यक्रम में महसूस नहीं हुई। न ही तो ये विशेषज्ञ किसी निजी अस्पताल का नाम लेते हैं न ही किसी दवाई के ब्रांड का नाम लेते हैं .. यूं कहें कि ये लोग १००प्रतिशत सच्चाई,  ईमानदारी एवं बेहद अपनेपन से अपना जीवन भर का ज्ञान आपके सामने उस एक घंटे में रख कर चले जाते हैं।

मुझे कहने में कोई गुरेज नहीं है कि जिस स्तर के अनुभवी विशेषज्ञ इन कार्यक्रमों में बुलाये जाते हैं उन का एक एक शब्द ध्यान से सुनने लायक होता है...सुनने लायक ही नहीं, माननीय भी होता है।

कोई भी बात इन विशेषज्ञों से कभी इतनी मुश्किल नहीं सुनी कि जिसे आम आदमी भी सुन कर समझ न पाए। बिल्कुल बोलचाल की भाषा में ये इतनी इतनी बड़ी जटिल बातें बेहद सहजता से समझा कर चले जाते हैं कि आश्चर्य होता है।

विविध भारती के अलावा भी --- विविध भारती के अलावा भी देश के विभिन्न रेडियो स्टेशन..रोहतक, चंडीगढ़, जालंधर .....कोई भी रेडियो स्टेशन...ये भी अपने क्षेत्र से विभिन्न विशेषज्ञ बुला कर सेहत संबंधी कार्यक्रम पेश करते रहते हैं।  इन की प्रस्तुति भी प्रशंसनीय रहती है ... ये भी विभिन्न मैडीकल कालेजों या पीजीआई जैसे संस्थानों से विशेषज्ञ बुलाते हैं।

मुझे लगता है कि पिछले कुछ वर्षों से इन कार्यक्रमों का फारमेट बदल गया है......मुझे याद है मैं केवल एक ही बात रेडियो पर फोन-इन कार्यक्रम में बुलाया गया था........लेकिन अधिकतर बार मुझे किसी बस दस-पंद्रह मिनट के लिए मुंह से संबंधी रोगों के बचाव, निदान एवं उपचार के बारे में बोलना होता था, मैं एक लिखित स्क्रिप्ट के साथ जाता, वहां उसे थोड़ा देखा जाता कि कहीं कोई दवाई-वाई का नाम तो नहीं लिखा गया, किसी पेस्ट-मंजन का नाम तो नहीं है, बस इतना चेक करने के बाद मैं उसे दस-पंद्रह मिनट बोल कर लौट आता...फिर कुछ दिन बाद रेडियो पर उसे प्रसारित कर दिया जाता।

लेकिन आजकल यह फारमेट बहुत इंट्रएक्टिव है... प्रश्न -उत्तर के फार्मेट में और साथ में श्रोतागण अपनी समस्याओं से संबंधित फोन कर रहे हैं उसी समय ...इस से बेहतर तो कुछ हो ही नहीं सकता। आप को क्या लगता है?

 पोस्ट बहुत लंबी हो गई दिखती है ...एक ब्रेक लेते हैं और अगली कड़ी के साथ जल्दी हाज़िर होता हूं....
एक बात और...विविध भारती पर प्रसारित होने वाले सेहतनामा कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञ के पसंदीदा गीत भी बजाये जाते हैं.........इतना सब कुछ, इतनी सच्चाई, इतनी सहजता...मनोरंजन की चाशनी में भिगो कर.............और ? ....क्या जान लोगो ?

Thursday, January 16, 2014

गुर्दे की पथरी या बड़ा पत्थर

जब हम लोग शरीर के किसी अंग में पथरी की बात करते हैं तो हमारा ध्यान में बिल्कुल छोटे छोटे से कंकड़ ही तो आते हैं, है कि नहीं?.... चाहे वह पित्ताशय (गॉल-ब्लैडर) हो या फिर गुर्दा, हम लोग अकसर पथरी के नाम पर इन में कंकड़ों की ही कल्पना करते हैं। कभी कभी अखबार में खबर दिख जाती है जब पथरी थोड़ी बड़ी होती है..। पित्ताशय में तो अकसर चावल जैसी बीसियों पथरियां पाई जाती हैं।

लेकिन अगर पथरी की जगह किसी के गुर्दे में ७०० ग्राम का पत्थर निकाला जाए तो बात हैरान करने वाली लगती है।
लेकिन ऐसा ही हुआ है दिल्ली के एक अस्पताल में। आज ही दा हिंदु में यह खबर पढ़ने को मिली।

 गुर्दे से निकला 700 ग्राम का पत्थर 
४५ वर्षीय इस पुरूष के गुर्दे से पांच पथरीयां निकाली गईं --जिन का कुल वजन ८०० ग्राम थी...इन में से एक तो ७०० ग्राम का पत्थर था जिस का डॉयामीटर ही ९ सैंटीमीटर था।

सुखद बात यह पढ़ी कि इस बड़े से पत्थर और इतनी पथरियों के कारण उस का बायां गुर्दा बहुत बड़ा होने के बावजूद भी सुचारू रूप से काम कर रहा था।

और एक बात... इतना बड़ा पत्थर किडनी से निकाला जाना एक विश्व-रिकार्ड है, इसलिए अस्पताल इसे गिनीज़ बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज़ करवाने जा रहा है। पुराना रिकार्ड गुर्दे से ६२०ग्राम का पत्थर निकालने का है।

आप को भी यह खबर देख कर वह कहावत याद आ जायेगी.....  Heaviest renal stone removed from a patient at Delhi hospital.

शूगर की जांच हो जायेगी बहुत सस्ती

शूगर रोग के बारे में मेरे कुछ विचार ये हैं कि इस शारीरिक अवस्था का जो बुरा प्रबंधन हो रहा है उस के लिए स्वयं मरीज और साथ में चिकित्सा व्यवस्था भी ज़िम्मेदार है। मरीज़ की गैर-ज़िम्मेदारी की बात करें तो बड़ी सीधी सी बातें हैं कि नियमित दवाई न ले पाना, विभिन्न भ्रांतियों के चलते दवाई बीच ही में छोड़ देना, किसी बाबा-वाबा के चक्कर में पड़ कर देशी किस्म की दवाईयां लेनी शुरू कर देना, परहेज़ न करना, शारीरिक परिश्रम न कर पाना और ब्लड-शूगर की नियमित जांच न करा पाना।

शूगर की अवस्था में -जो दवाईयों से नियंत्रण में हो और चाहे जीवन-शैली में बदलाव से ही काबू में हो -- नियमित शूगर जांच करवानी या करनी बहुत आवश्यक होती है ..और यह कितनी नियमितता से होनी चाहिए, इस के बारे में आप के चिकित्सक आप को सलाह देते हैं।

चलिए इस समय हम लोग एक ही बात पर केंद्रित रहेंगे कि लोग शूगर की जांच नियमित नहीं करवा पाते। सरकारी चिकित्सा संस्थानों की बात करें तो पहले दिन तो मरीज़ शायद ब्लड-शूगर की जांच का पर्चा किसी डाक्टर से बनवा पाता है, फिर वह दूसरे दिन अपने साथ नाश्ता बांध कर लाता है ...सुबह से भूखा रह कर वह अस्पताल पहुंचता है... और उस दिन ११-१२ बजे वह फ़ारिग होता है ..खाली पेट वाली (फास्टिंग) और खाने के बाद वाली (पी पी .. पोस्ट परैंडियल ब्लड-शूगर) ..फिर तीसरे दिन वह पहुंचता से अपनी रिपोर्ट लेने को। अच्छा खासा भारी भरकम सा काम लगता है ना......और ऊपर से अगर किसी की शारीरिक अवस्था ठीक नहीं है तो यह बोझ और भी बोझिल करने वाला लगता है......घर से अस्पताल आना बार बार भी आज के दौर में कहां इतना आसान रह पाया है।

मैं इस के कारणों का उल्लेख यहां करना नहीं चाहूंगा लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि कुछ मरीज़ों को सरकारी अस्पतालों की रिपोर्टों पर भरोसा नहीं होता.......मरीज़ ही क्यों, बहुत बार निजी क्लीनिक या अस्पताल चलाने वाले डाक्टर भी इन्हें नहीं मानते और बाहर से ये सब जांच करवाने को कह देते हैं......अकसर मरीज़ों को भी कहते देखा है कि सरकारी अस्पताल में करवाई तो शूगर इतनी आई और बाहर से इतनी ... लोगों से बातचीत के दौरान बहुत बार सुनने को मिलता है। जब वह दोनों रिपोर्टें आप के सामने रख दे तो आप क्या जवाब दें, यह एक धर्म-संकट होता है, लेकिन जो है सो है!

कुछ उच्च-मध्यम वर्गीय लोगों ने --जो एफोर्ड कर सकते हैं--घर में ही शूगर की जांच करने का जुगाड़ कर रखा है। ठीक है। एक बार मैंने मद्रास की मैरीना बीच पर देखा कि वहां सुबह सुबह लोग भ्रमण कर रहे थे और वहीं किनारे पर बैठा एक शख्स ब्लड-शूगर की जांच की सुविधा प्रदान कर रहा था। पचास रूपये में यह सुविधा दी जा रही था। इस के बारे में मेरी पोस्ट आप इस लिंक पर क्लिक कर के देख सकते हैं।

अभी दो चार दिन पहले ही की बात है कि मैंने यहां लखनऊ के एक कैमिस्ट के यहां बोर्ड लगा हुआ देखा कि यहां शूगर की जांच ३० रूपये में होती है।

घर में जो लोग इस शूगर जांच की व्यवस्था कर लेते हैं या मैरीना बीच पर बैठा जो शख्स यह सुविधा दे रहा था या फिर अब कुछ कैमिस्ट लोगों ने भी यह सब करना शुरू कर दिया है, इसे ग्लूकोमीटर की मदद से स्ट्रिप के द्वारा किया जाता है।

अब आता हूं अपनी बात पर......खुशखबरी यह है कि आज कल ये ग्लूकोमीटर विदेशों से आते हैं और इन की कीमत १०००-२५०० रूपये के बीच होती है लेकिन अब शीघ्र ही भारत ही में तैयार हुए ये ग्लूकोमीटर ५०० से ८०० रूपये में मिलने लगेंगे।

और जो स्ट्रिप इन के साथ इस्तेमाल होती है उस के दाम वर्तमान में १८ से ३५ रूपये प्रति स्ट्रिप हैं, लेकिन अब शीघ्र ही ये स्ट्रिप भी दो और चार रूपये के बीच मिलने लगेगी।

यह एक खुशखबरी है कि शूगर की जांच अब लोगों की जेब पर भारी न पड़ेगी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने दो दिन पहले ही इस तरह की किट्स को लंॉच किया है। प्रशंसनीय बात यह है कि इन किट्स को इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी मुंबई ने सूचक (Suchek) के नाम से और बिरला इंस्टीच्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी, हैदराबाद ने क्विकचैक (QuickcheQ) के नाम से डिवेल्प किया है।

जेब पर भारी न पड़ने वाली इन किटों के बारे में आप यह समाचार इस लिंक पर क्लिक कर के देख सकते हैं..... Purse-friendly diabetic testing kits launched. 

उम्मीद है इन के बाज़ार में आने से यह जांच बहुत से लोगों की पहुंच में हो जायेगी और कम से कम कुछ लोगों की  यह बात कि महंगे टैस्ट की वजह से इस की नियमित जांच न करवा पाना रूल-आउट सा हो जायेगा लेकिन फिर भी नियमित दवाई, परहेज़ और शारीरिक व्यायाम का महत्व तो अपनी जगह पर कायम ही है........इस किट से बहुत से लोगों के हैल्थ-चैक अप करने में भी सुविधा हो जायेगी......होती है पहले भी यह जांच (कैंपों आदि में) इसी किट से ही हैं लेकिन अब यह काम बहुत सस्ता हो जायेगा, अच्छी बात है। 

Monday, January 13, 2014

मेरा पुराना ट्रांसिस्टर..

यह जो ट्रांसिस्टर मैंने यहां दिखा रहा हूं यह मैंने १०-१२ वर्ष पहले एक गाड़ी में खरीदा था। अब तो मुझे पता नहीं कि यह धंधा चलता है कि नहीं, लेकिन लगभग दस वर्ष पहले मैंने इसे गोहाटी से दिल्ली आने वाली एक ट्रेन के सैकेंड एसी के डिब्बे में खरीदा था, शायद २५0-३०० रूपये का था। देखने में इतना बढ़िया लगा कि मैं अपने आप को रोक न पाया। समस्या आज एफएम और विविध भारती प्रोग्राम देखने की है..पहले मैं एक एफएम के डिब्बे से काम चला लिया करता था, लेकिन अब उस में कईं बार थोड़ा झंझट सा या अजीब सा लगता है ..उस के एरियर वाली तार को हिलाते रहो, अजीब सा लगता है ...उन ४०वर्ष पुराने दिनों की बात याद आ जाती है जब अपने मर्फी के रेडियो के साथ ऐंटीना की तार बांध कर घर के ऊपर छत तक पहुंचाई जाती थी। फिर एक एलजी का एक फोन इसी काम के लिए लिया--GM 200- बहुत बढ़िया सेट है यह ...आप सोच रहे होंगे कि एफएम तो आजकल लगभग हर फ़ोन में होता है ऐसे में इस की इतनी क्या विशेषता है, जी हां, यह स्पैशल है ..मेरे बेटे ने नेट पर रिसर्च करने के बाद इसे रिक्मैंड किया था ..खासियत यही है इसकी कि इस में एफएम सुनने के लिए साथ में एयरफोन नहीं लगाने पड़ते। जी हां, यह वॉयरलैस एफएम रेडियो की सुविधा देता है। लेकिन हम ठहरे पक्के रेडियो प्रेमी.....जब तक किसी ट्रांसिस्टर जैसे डिब्बे में रेडियो ना सुना जाए, कुछ कमी सी लगती है। इसलिए आज जब मुझे इस ट्रांसिस्टर की याद आई तो इसे निकाला, सैल डाले और यह बढ़िया चल रहा था। एक बात तो और बता दूं जिस गाड़ी में यह खरीदा था ..शायद उस स्टेशन का नाम सिलिगुड़ी या फिर न्यू-जलपाईगुड़ी है...वहां से नेपाल शायद बिल्कुल पास ही है, इसलिए वहां गाडियों में और इस तरह का तथाकथित इम्पोर्टेड सामान जैसे कि रेडियो, टू-इन-वन,कैमरे आदि खूब बिकते हैं.. मोल-तोल भी खूब होता है उन्हीं पांच-दस मिनटों में..सब डरते डरते लेते हैं कि क्या पता गाड़ी से उतरने पर ये उपकरण चलें भी या नहीं..लेकिन फिर भी मेरे जैसे लोग अपने को रोक नहीं पाते। एक बात और..उसी स्टेशन पर मुझे याद है चाय बेचने वाले अपनी अंगीठी समेत एसी के डिब्बे में भी चढ़ जाते हैं...अच्छे से याद है एक अंगीठी से कुछ कोयले एसी डिब्बे के फर्श पर गिर गये और वह बिल्कुल जल सी गई .....लेकिन न तो कोच अटैंडैंट की और न ही टीटीई की इतनी हिम्मत हुई कि वह उस चाय वाले से उलझने का साहस करें। इस के कारण गाड़ी चलने पर पता चले। लेकिन जो भी है, आज जब गाड़ियों में आग की इतनी वारदातें देखने में आ रही हैं, इस तरह की अराजकता को भी रोकने के लिए कुछ तो करना ही होगा।