Wednesday, January 13, 2016

कल्लू मामा को सुनना एक्टिंग ग्रंथ पढ़ने जैसा

जब भी मौका मिलता है मुझे राज्य सभा के यू-ट्यूब चैनल पर गुफ्तगू जैसे कार्यक्रम देखना अच्छा लगता है ... दर्जनों एपिसोड देख चुका हूं।

सुबह की शुरूआत आज भी ऐसा ही एक एपिसोड देख कर की। राज्यसभा के चैनल पर दो दिन पहले सौरभ शुक्ला का इंटरव्यू अपलोड किया गया था। लगभग एक घंटे का एपिसोड था, लेिकन इसे देखते समय का पता ही नहीं चला।

इस गुफ्तगू को यहां एम्बेड किए दे रहा हूं, देखिएगा....इसे देखते हुए मैं यही सोच रहा था कि इन शख्शियतों की बातें सुन कर ऐसे लगता है कि जैसे आदमी एक्टिंग का कोई ग्रंथ पढ़ रहा है...इतनी सादगी और सब से बड़ी बात अपने मन की बात कहने में बरती गई इतनी ईमानदारी।


मैं हमेशा से ही सौरभ शुक्ला का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं..कभी भी किसी भी फिल्म में इन्हें देख कर लगा ही नहीं कि यह एक्टिंग कर रहे हैं, उस भूमिका में पूरी तरह ढल जाते हैं...कितनी ही फिल्में हैं जिन का ध्यान इस समय आ रहा है। सत्या में कल्लू मामा को हम कैसे भूल सकते हैं!

अभी पिछले साल ही मैंने एक फिल्म देखी थी ..जोली एल एल बी ....इस फिल्म में सौरभ शुक्ला ने एक जज की भूमिका निभाई थी....बेहतरीन काम किया था... बहुत अच्छा लगा था।



इन फ़नकारों की बात सुनने पर यही पता चलता है कि ये लोग भी जिस मुकाम पर पहुंचे हैं बड़े संघर्ष के बाद ही वहां तक जा पाए हैं...

मैं इन एपिसोड्स को देखना इसलिए पसंद करता हूं क्योंकि इन में ईमानदारी झलकती है...किसी बात पर भी ये लोग लीपापोती नहीं करते .. इसलिए यहां मन लग जाता है।



पता नहीं आज मैंने नोटिस किया और आज राज्यसभी चैनल को लिखूंगा भी कि कईं बार इस तरह के कार्यक्रम कुछ नीरस लगने लगते हैं...कंटैंट की बात नहीं कर रहा हूं..वह तो बेहतरीन है ही ...लेकिन राज्यसभी चैनल को लगता है अब प्रस्तुति के अंदाज़ में थोड़ा परिवर्तन करने की बहुत ज़रूरत है .....वर्तमान और भविष्य यू-ट्यूब का है और आज की पीढ़ी का भी ध्यान रखते हुए .. अन्यू विजुएल एलीमेंट्स ..जैसे कि इन महान फ़नकारों की फिल्मों के कुछ दुश्य अगर इस तरह के प्रोग्रामों में डाल दिए जाएं तो चार चांद लग जाते हैं.......वरना एक घंटे के लिए इस तरह के प्रोग्रामों को झेल पाना मुश्किल हो जाता है ऐसा तो नहीं कहूंगा.....शायद मेरी उम्र के लोग यह कर लेते हैं लेकिन फिर भी बिना किसी विजुएल के ये बोझिल से लगने लगते हैं ...१०-१५ मिनट बाद .....और यह बोझ इसलिए भी ज़्यादा लगने लगता है क्योंकि कोई एड-ब्रेक तो होती नहीं जो कि एक अच्छी बात है ...



कुछ फिल्में ऐसी हैं जो मैं केवल इसलिए देखता हूं क्योंकि उन में सौरभ शुक्ला ने काम किया है या संजय मिश्रा का काम देखने को मिलेगा....कल रात मुझे मसान फिल्म का यू-ट्यूब लिंक का मैसेज मिला... लगभग दो घंटे की फिल्म थी...बेहतरीन फिल्म लगी...सब के लिए कुछ न कुछ संदेश....सार्थक प्रस्तुति...संजय मिश्रा ने भी इस फिल्म में बहुत उमदा काम किया है....देखिएगा अगर कहीं से मिले तो ....वरना तो यू-ट्यूब का प्रिंट भी परफेक्ट है....

मैंने बस ऐसे ही इस फिल्म के बारे में कहीं से सुना था ...यही लखनऊ टाइम्स में या कहीं किसी चैनल पर ...लेकिन अफसोस यही है कि इन फिल्मों की इतनी पब्लिसिटी होती नहीं है ... फिल्म देखने पर अहसास हुआ कि इस तरह की फिल्में हमारे समाज के लिए कितनी ज़रूरी हैं, पुरानी रूढ़ियों पर चोट की गई है, नवयुवक किस तरह से गल्तियों की वजह से ज़िंदगी खराब कर लेते हैं, किस तरह से छोटे छोटे बच्चों का शोषण किया जाता है चंद सिक्कों के लिए...यह वाराणसी शहर की कहानी है...बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है यह कहानी और बहुत से प्रश्न छोड़ जाती है ...इस की कहानी मैं आप से शेयर नहीं करना चाहता क्योंकि इसे आप को स्वयं देखना चाहिए... यह आज की जेनरेशन की भी कहानी है .. something about their strengths and weaknesses!

सारी फिल्म देख ली, लेकिन मुझे मसान का अर्थ नहीं पता था... फिल्म के बाद डिक्शनरी में इस का मतलब देखा तो पता चला इस का शब्दार्थ है ...श्मसान घाट...फिर मुझे याद आया कि पंजाबी में भी कुछ इसी तरह की शब्द कहते तो सुना तो था कईं बार ...मसानां ...जिस का अर्थ तो पता था लेकिन मसान का सही अर्थ तो यह फिल्म देखने के बाद ही जाना .... देखिएगा यह फिल्म अपनी पहली फ़ुर्सत में...