Monday, September 12, 2016

हिंदी के नाम पर महज मजाक ही नहीं लगता यह ...

आज सुबह टहलते हुए मुझे याद आ रहा था कि हम लोग नवीं-दसवीं कक्षा में थे तो हम ने नया नया हिंदी का शब्द सुना था...लोहपथगामिनी... हम एक दूसरे से पूछते कि बताओ तो ज़रा यह क्या है?...कौन बेचारा बता पाता....फिर हम ऐंठ कर कहते ...क्या यार तुमने कभी गाड़ी नहीं देखी!

इस बात का विचार मुझे आज सुबह सुबह इसलिए आ रहा था शायद कि कल शाम में मैंने दैनिक जागरण के संपादकीय पन्ने पर किसी पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डा विजय अग्रवाल का एक बहुत ही अच्छा लेख पढ़ा था, उस के एक एक शब्द पर गौर करने की ज़रूरत है ..

मैंने सोचा कि उस की क्लिपिंग ब्लॉग पर शेयर करूंगा...शायद टैक्नीकली मैं इतना साउंड हूं नहीं...अभी इस लेख को ऑनलाइन देखा तो सोचा कि लिंक ही शेयर करते हैं...तो जनाब यह रहा इस लेख का लिंक ... हिंदी के नाम पर मजाक 
लेकिन सोच रहा हूं कि अगर आप के डिवाईस पर यह लिंक नहीं खुला तो ...उस का प्रबंध इस तरह से कर दूंगा कि मेरे लेख के नीचे जो फिल्मी गाना रहेगा ..उस के बाद मैं इस लेख का टैक्स्ट कॉपी कर दूंगा... ठीक है, खुश?

जब से मैंने इस लेख को पढ़ा है मैं इस समस्या से रू-ब-रू हो पाया कि यूनियम पब्लिक सर्विस कमीशन जैसी नामचीन संस्था में हिंदी भाषा के साथ क्या सलूक हो रहा है...पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ...फिर मुझे यह ध्यान आया कि हम लोग बहुत वर्षों तक जब दिल्ली की शाहजहां रोड़ पर यूपीएससी के दफ्तर की तरफ़ से निकला करते तो बीस-तीस युवक एक तंबू गाड़ कर हमेशा प्रदर्शन करते या धरने पर बैठते दिखते ...धीरे धीरे समझ में आ गया कि वह इस बात पर रुस्वा हैं क्योंकि यूपीएससी की प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी मीडियम लेने की अनुमति नहीं है...

फिर कुछ साल पहले यह समस्या तो सुलट गई लेकिन क्या खाक सुलटी?....इस दैनिक जागरण वाले लेख को पढ़ कर तो आप को भी आभास हो ही गया होगा कि यह तो हिंदी मीडियम वालों का वह हाल हो गया ...आसमान से गिरे, खजूर में अटके...इस जेन्यून समस्या का हल शीघ्र निकलना चाहिए...लेख में हिंदी के उदाहरण पढ़ कर तो मेरा भी सिर घूम गया..शुक्रिया जागरण, इस तरह की समस्या की तरफ़ देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए ...वरना, मेरे जैसे लोग तो इसी बात से आश्वस्त थे कि चलिए, हिंदी को इन परीक्षाओं में मान्यता मिल गई, इस का मतलब सब ठीक है ....

हिंदी के बारे में अकसर हम लोग सरकारी चिट्ठीयां देखते रहते हैं कि इसे जितना हम लोग बोलचाल की भाषा के रूप में इस्तेमाल करेंगे उतना ही यह लोकप्रिय होती चली जायेगी...लोग इसे सरकारी काम काज में अपनाने लगेंगे... यह क्या बात हुई कि आप कोई चिट्ठी पढ़ रहे हैं और आप को कईं शब्दों के लिए शब्दकोष की मदद लेनी पड़ रही है ...

मुझे यह समझ नहीं आती कि लिखने वाली हिंदी आखिर इतनी क्लिष्ट लिखी ही क्यों जाए कि पढ़ने वाले को समझ ही न आए...पहले मैं सोचा करता था कि हिंदी वह है जो एक प्राईमरी स्कूल तक गये हों ( जी हां, सिर्फ़ गये ..पास या फेल से कोई खास फर्क नहीं पड़ता, अब तो वैसे भी फेल करने का रिवाज ही खत्म हो गया है...सब पास ही हैं!!).... वे भी हिंदी में लिखा कुछ भी पढ़ लें, अब लगता है कि वे ही नहीं जिन लोगों को साक्षरता मिशन के अंतर्गत पढ़ाया गया है वे भी हिंदी के लेखों का आनंद ले सकें....वही सार्थक हिंदी है, वरना तो बेकार में हम लोग भारी-भरकम शब्दों का बोझा ढोते ढोते खुद भी परेशान होते हैं और दूसरों को इंप्रेस करने के चक्कर में गुड़-गोबर कर देते हैं...है कि नहीं?

 मुझे अभी एक ब्लॉगर मित्र का ध्यान आ रहा है ...श्री अनूप शुक्ल जी...इतना बढ़िया लिखते हैं ...और इतनी सादगी से ...मैं क्या सारा हिंदी जगत इन के लेखन का मुरीद है ...कुछ सप्ताह पहले ही इन की एक किताब बेवकूफ़ी का सौंदर्य भी यहां लखनऊ में रिलीज़ हुई थी ..मुझे भी वहां जाने का सौभाग्य मिला था...लिखने में इतनी सादगी लेकिन फिर भी गहराई ..इन के ब्लॉग का मैं यहां लिंक दे रहा हूं...यह बहुत अच्छे व्यंग्यकार भी है ं...फुरसतिया ब्लॉग   (http://fursatiya.blogspot.in/) मैं इन्हें २००७ से निरंतर पढ़ रहा हूं ...इन का ब्लॉग नहीं है यह, एक पाठशाला है ...जैसे यह कहते हैं कि मजाक मजाक में मैंने किताब लिख दी... मुझे लगता है अगर आप इन के ब्लॉग को नियमित देखेंगे तो आप को बहुत आनंद मिलेगा..मैंने इन्हें पढ़ पढ़ कर अपनी हिंदी में सुधार करने की कोशिश करता रहता हूं..(आप ठीक सोच रहे हैं, आप को नहीं दिखता नहीं, मेरे को भी लगता नहीं, लेकिन शेखी बघारने में क्या जाता है!...मुझे पता है मेरी हिदी में बहुत गल्तियां होती हैं, लेकिन क्या करें, मन की बात कह लेते हैं इतना ही काफ़ी है, मेरी दादी मुझे नहीं पता कितनी पढ़ी थीं ...लेकिन ४०-४५ साल पहले हम सब को उन के हस्तलिखित पोस्टकार्ड को पाने पर जो खुशी होती थी, वह मैं ब्यां नहीं कर सकता...हिंदी के एक एक हिज्जे को अलग अलग जोड़ कर लिखा हुआ ख़त...पिता जी को हिंदी नहीं आती थी, वे तो हमें उसे बार बार सुनाने को कहा करते और अपने तकिये के नीचे ही कईं बार रख लिया करते ....यह होती है संप्रेष्णीयता की ताकत ...)

हां, तो मैं दैनिक जागरण लेख के शीर्षक की बात कर रहा था कि यूपीएससी की परीक्षाओं में इस तरह की हिंदी का प्रयोग केवल एक मजाक ही नहीं लगता, मुझे तो डर है कि कहीं इस के पीछे कुछ ऐसी शक्तियां तो नहीं हैं जो हिंदी मीडियम वाले छात्रों के पीछे अब इस तरह से पड़ी हुई हैं...हो भी सकता है, सब कुछ संभव है....अध्ययन का मुद्दा तो है ही यह! वरना इस तरह की परेशानियों का तुरंत समाधान ढूंढा जाना चाहिए..

और रही बात हिंदी के नाम पर मजाक की बात, जनमानस की इस सुंदर भाषा से जो कश्मीर से कन्याकुमारी को एक माला में पिरो कर रखे हुए है...इस से मज़ाक करने की हिमाकत करने वाले स्वयं ही मजाक के पात्र बनेंगे ... आज से ३५ साल पहले जब एक दूजे के लिए फिल्म देखी थी तो पता चला था कि देश के कुछ हिस्सों में लोग हिंदी नहीं समझ पाते ...लेकिन उस फिल्म में भी इस मुद्दे को बेहद संवेदनशीलता के साथ ट्रीट किया ...


अच्छा, अब क्या रह गया? ..हां, सुबह के भ्रमण की चंद तस्वीरें और सुप्रभात कहने की औपचारिकता ... चलिए, वह भी निभाए देते  हैं...



आप को दिन इस फूल की तरह खुशनुमा हो !!

यार,  अब तू भी थोड़ी अकल से काम ले...हिंदुस्तान बदल रहा है!
नेट पर यह इमेज छाया हुआ है, जब भी देखता हूं मुझे बड़ी हंसी आती है ...सोचा हंसी की बौछार आप तक भी पहुंचा ही दूं आज ... 

हिंदी के नाम पर मजाक ... 
हिंदी पखवाड़े के इन दिनों में थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि आप 'हिंदी भाषी राज्य मध्य प्रदेश में पैदा हुए हैं और तब से लेकर अब तक संस्कृत के महान कवि कालिदास की नगरी उज्जैन में रह रहे हैं। आपने वहीं के विक्रम विश्ववद्यालय से हिंदी साहित्य में स्वर्ण पदक के साथ हिंदी साहित्य में एमए एवं बाद में हिंदी पर संस्कृत 'भाषा का प्रभाव' विषय पर पीएचडी की है। फिर आपने भारत सरकार में हिंदी अधिकारी के पद के लिए आवेदन दिया है। संघ लोक सेवा आयोग इसके लिए एक प्रतियोगी परीक्षा आयोजित करता है, जिसमें वह आपके हिंदी भाषा के ज्ञान को जांचने के लिए आपको एक प्रश्नपत्र देता है। उस पेपर में आपसे कुछ इस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं-(1) निम्न शब्दों के अर्थ समझाएं- बहुशाखन, प्रायिकता, वृत्तिक सेवा, अवक्रमण, प्रतिच्छेदन-स्थल, सुप्रचालनिका एवं अभिसमय। (2) 'पिछड़े क्षेत्रों में बड़े उद्योगों का विकास करने के सरकार के लगातार अभियानों का परिणाम जनजातीय जनता और किसानों, जिनको अनेक विस्थापनों का सामना करना पड़ रहा है, का विलगन है।' इसका अंग्रेजी में अनुवाद कीजिए। (3) 'जलवायु अनुकूलन अप्रभावी हो सकता है, यदि दूसरे विकास संबंधी सरोकारों के संदर्भ में नीतियों को अभिकल्पित नहीं किया जाता। उदाहरण के तौर पर एक व्यापक रणनीति, जो जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा की अभिवृद्धि करने का प्रयास करती है, कृषि प्रसार, फसल विविधता, एकीकृत जल एवं पीड़क प्रबंधन और कृषि सूचना सेवाओं से संबंधित उपायों के एक समुच्चय को सम्मिलित कर सकती है।' इस वाक्य का सरलीकरण कीजिए। आपको क्या लगता है कि आप इस परीक्षा में चुन लिए जाएंगे, जबकि आपकी पृष्ठभूमि वह है जो शुरू में दी गई है? मेरे इस एक सामान्य से व्यावहारिक प्रश्न पर विचार कीजिए कि क्या ऐसी हिदी से कहीं भी, कभी भी आपकी मुलाकात हुई है- पढऩे में या सुनने में भी। अगला सवाल है कि यह कहां की और किसकी हिंदी है- सरकारी परिपत्रों की, संविधान की, एनसीईआरटी की किताबों की, सिनेमा की, टीवी की, अखबारों की आदि-आदि। आपका उत्तर होगा-इनमें से किसी की भी नहीं। तो फिर यर्ह ंहदी आई कहां से है? 
यह हिंदी हमारे देश के शीर्ष नौकरशाहों की भर्ती करने वाली एजेंसी यूपीएससी की हिंदी है। और उस परीक्षा के प्रश्नपत्रों र्की ंहदी, जिसके जरिए वह इस देश को आइएएस, आइएफएस, आइपीएस तथा अन्य बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स देती है। यह हिंदी नहीं, हिंदी वालों के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं के साथ संघ लोक सेवा आयोग द्वारा किया जाने वाला एक मजाक है। 1979 में इस आजाद भारत को इस बात की आजादी मिली थी कि परीक्षार्थी सर्वोच्च सिविल सेवा परीक्षा अपनी भाषा में दे सकेंगे, लेकिन प्रश्नपत्र केवल दो ही भाषाओं में दिया जाएगा-अंग्रेजी और हिंदी में। जाहिर है कि भाषा को लेकर अंग्रेजी वालों को न तो पहले कोई समस्या थी और न ही आज है। हां, उनका वर्चस्व जरूर टूटा है। 
इसके बाद के लगभग पच्चीस सालों तक की इसकी हिंदी ठीक-ठाक ही रही, हालांकि वह भी कोई सुगम हिंदी नहीं थी। लेकिन पिछले लगभग दस सालों में तो कमाल ही हो गया है। लगता है कि यूपीएससी ने किसी ऐसे ग्रह की खोज कर ली है जहां ऐसी हिंदी बोली और समझी जाती है। वस्तुत: इसका प्रभाव यह हो रहा है कि हिंदी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषा के परीक्षार्थी पेपर में दी गई हिंदी को समझने में ही बुरी तरह उलझ जाते हैं, जबकि परीक्षा में समय का दबाव इतना अधिक रहता है कि आप एक मिनट भी जाया करना बर्दाश्त नहीं कर सकते। क्षेत्रीय भाषा वाले इस संकट में इसलिए भागीदार बनते हैं, क्योंकि यदि उन्हें अंग्रेजी आ रही होती तो वे उसे ही अपना माध्यम चुन लेते। अंग्रेजी उन्हें आती नहीं और हिंदी ऐसी कि वह समझ में नहीं आ रही है। अंग्रेजी के साथ ऐसा नहीं है कि वहां हिंदी की तरह ही पुराने लैटिन, ग्रीक या बाइबल की भाषा से शब्द खोज-खोजकर ठूंसे जाएं। अंग्रेजी की भाषा वह भाषा होती है, जिसे वे पढ़कर स्नातक बनते हैं और रोजाना अखबारों में भी पढ़ते हैं। सच यह है कि यही वह प्रारंभिक स्थिति है, जब प्रतियोगिता के लिए सभी को समान धरातल उपलब्ध कराए जाने का मूल सिद्धांत ध्वस्त हो जाता है। यदि आपको मेरी बातों पर यकीन न हो रहा हो, तो कृपया आप किसी भुक्तभोगी से पूछ लीजिए। आप उसे खून के आंसू रोते हुए पाएंगे। 
अंगेजी के लिए जब हिंदी के कई शब्द व्यवहार में आ गए हैं तो उनका उपयोग न करके न जाने कहां की टकसाल से नए-नए शब्दों को ढालने की कारीगरी का उद्देश्य आखिर क्या है? उदाहरण के लिए 'पेरिस कांफ्रेंस' इसकी हिंदी है-पेरिस अभिसमय। जबकि शब्दकोष तक में इसके लिए सम्मेलन शब्द दिया हुआ है और इसका खूब उपयोग भी होता है। यूपीएससी के गूगल महाशय अपने ही अनुवाद में कहीं 'प्रोफेशनल' के लिए 'संव्यावसायिक' शब्द ले आते हैं तो कहीं 'वृत्तिक'। हद तो तब हो जाती है जब आपकी मुलाकात 'मेगा-सिटी' की हिंदी 'विराट-नगर' (महानगर नहीं) 'एनिहिलेशन आफ कास्ट' की जगह 'जाति-विनाश' तथा 'डिस्प्यूट रिसोल्यूशन मैकेनिज्म' के बदले 'विवाद समाधान यांत्रिकत्व' से होती है। इस 'यांत्रिकत्व अनुवाद' ने परीक्षार्थियों के दिमाग में दम कर रखा है। इन सबसे कुछ बातें तो बिल्कुल साफ हैं। पहला यह कि आयोग को हिंदी से कुछ लेना-देना नहीं है। वह इसे मजबूरी में ढोये हुए है। दूसरा यह कि वह न केवल भाषाई असंवेदनशीलता से ग्रस्त है, बल्कि अंग्रेजी के अतिरिक्त अन्य सभी भाषाओं के प्रति दुराग्रही-पूर्वाग्रही भी है। तीसरे यह कि हिंदी के बारे में उसके पास अनुवाद की कोई एक नीति नहीं है। चौथे यह कि एक बार जो अनुवाद हो जाता है उसे देखने वाला वहां कोई नहीं है। इस तरह र्की ंहदी को लेकर युवाओं में एक अजीब किस्म की मूक छटपटाहट है, जो धीरे-धीरे आक्रोश का रूप लेने की ओर बढ़ रही है। फिलहाल मोदीजी की सरकार से ये नौजवान अपेक्षा कर रहे हैं कि वे इस भाषाई भेदभाव को दूर करेंगे। 'सी सेट' के मामले में ऐसा करके वे सदाशयता का परिचय दे चुके हैं। 
[ लेखक डॉ. विजय अग्रवाल, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं ]
साभार ... दैनिक जागरण, ११ सितंबर, २०१६