Saturday, May 9, 2015

एक महान् साईक्लिस्ट से मिलिए..

कल जब मैं सुबह साईकिल पर घूम रहा था तो मुझे ये सूने पड़े चाय के अड्डे दिखे...सुबह सुबह अगर आप शहर से थोड़ा सा ही बाहर निकलने की ज़हमत उठाएं तो इस तरह के देशी जुगाड़ दिख ही जाते हैं।

वैसे तो ये जुगाड़ मिट्टी से ही बने हैं..ज़ाहिर सी बात है कि मिट्टी की खुशबू तो आएगी ही...ऐसी जगहों पर क्या आपने कभी चाय और भजिया खाए हैं, अगर नहीं खाए, तो फिर आप से इस बारे में क्या बात करें।

जब भी मैं इस तरह की मिट्टी से बनी और जुड़ी जगहें देखता हूं तो मुझे कहीं न कहीं बचपन में हमारे घर के पास ही अमृतसर के इस्लामाबाद एरिया के बेहतरीन ढाबे याद आ जाते हैं....जहां से हम कभी कभी खाना लाते थे...जब मां का सिर या दांत दर्द हुआ करता या फिर मां एक दो दिन के लिए हमारे ननिहाल जाया करतीं। बड़ी ईमानदारी से कह रहा हूं कि उतनी बेहतरीन दाल और रोटी (अधिकतर चने की दाल वहां चलती है) मैंने उस के बाद कभी किसी ढाबे की नहीं खाई..उस दाल में चार चांद लगाने में मेरे पापा का भी योगदान तो होता ही था..जो उसमें केवल प्याज और भरपूर मात्रा में देशी घी डाल कर खूब गर्म कर दिया करते थे....और साथ में तंदूरी सिंकी हुई पतली कड़क रोटियां...

भूली हुई यादो इतना ना सताओ ....चैन से रहने दो.......मेरे पास न आओ.....

हां, तो कल साईकिल पर घूमते मुझे कुछ फोटो खींचने लायक दिखा नहीं ...और मैं इन दो फोटो के साथ ही वापिस घर की तरफ़ लौट रहा था तो अचानक मेरी नज़र एक शख्स पर पड़ी ...इन के साईकिल के कैरियर पर सामान इस तरह से बंधा हुआ था कि यह समझते देर न लगी कि ये लंबे टूर पर निकले हुए हैं...मैं जिस रास्ते पर जा रहा था यह शख्स उस की उल्ट दिशा से आ रहे थे......मैंने दूर से दो बार हैलो कहा ...इन्हें सुन गया और ये रूक गये...मुझे दूसरी तरफ़ आने को कहा।

मैं इन के पास गया... बातचीत शुरू हुई... यह महान शख्स हीरालाल यादव हैं जो जम्मू से कन्याकुमारी तक साईकिल टूर कर रहे हैं...गोरखपुर के रहने वाले हैं...अब बंबई में रहते हैं...अब ये साईकिल पर घूम घूम कर नशे के प्रति, पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं और बेटी बचाओ...बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों रूपी यज्ञों में अपनी आहूति दे रहे हैं।

इन से मिल कर बहुत अच्छा लगा...क्योंकि मैं भी मन में कहीं न कहीं कुछ वर्षों बाद यही काम करने की तमन्ना रखता हूं...मैं भी बीड़ी-तंबाकू-गुटखे-पानमसाले जैसी घातक चीज़ों के लिए ऐसा ही कुछ करना चाहता हूं....लेिकन मेरा क्या है, मैं तो ख्याली पुलाव बनाने वाला मास्टर शेफ हूं....बस, ख्याली पुलाव लेकिन यह शख्स तो अकेला ही एक मिशन के लिए यह सब कर रहा है.....मैंने इन्हें कहा कि आप के इस ज़ज़्बे को सलाम।

मैंने इन के इस मिशन के बारे में पूछा तो इन्होंने बताया कि यह रोज़ाना आठ घंटे साईकिल चलाते हैं....जहां ठहरते हैं फिर वहां पर इन के लेक्चर होते हैं....मन बहुत प्रसन्न हुआ.....हम ने अपने मोबाइल फोन एक्सचेंज किए... इन्होंने मुझे अब्दुल कलाम जी से सम्मानित होते हुए का एक वीडियो दिखाया...हाल ही में इन्हें अखिलेख यादव ने भी सम्मानित किया।

अच्छा एक बात तो बताना भूल ही गया... इन्होंने बताया कि साईकिल पर इतना सामान लेकर चलने के लिए साईकिल का बेलेंस बनाना बहुत ज़रूरी है ...वरना आप साईकिल चला ही नहीं सकते ..और इसलिए इन्होंने कहा कि मेरी साईकिल की सीट नहीं है, क्योंिक मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बिना सीट के भी कोई साईकिल चला सकता है, इसलिए मेरा ध्यान इन के कैरियर की तरफ़ गया....शायद मैं यही सोच रहा था कि सीट तो पीछे लगी है।

लेकिन ये जैसे ही अपने साईकिल से उठे ...मैं देख कर दंग रह गया कि उस पर सीट (काठी) ही नहीं थी..मुझे कहने लगे कि आप इस पर बैठ कर देखिए....दोस्तो, मैंने कोशिश तो की, लेकिन मैं बैठ ही नहीं पाया....तस्वीरें तो मैंने और भी खींचनी थीं...लेिकन मेरा मोबाइल ऐन वक्त पर धोखा दे गया.....मैमोरी फुल......इन्होंने मेरी फोटी ली और मुझे व्हाट्सएप पर भेजी।

इन्होंने मुझे अपने इस महान् मिशन से संबंधित बहुत सी फोटो भेजीं...अखबारों की कतरने भेजीं...पढ़ कर देख कर बहुत खुशी हुई कि हीरालाल यादव जी जैसे लोग चुपचाप इस तरह के महान् कामों में लगे हुए हैं....इन के साईकिल के अगले पहिये पर दोनों तरफ़ छोटे छोटे गमलों में दो पोधे लगे देख कर मज़ा आ गया.

इन से इन के अनुभवों के बारे में कभी फिर जानेंगे और आप से शेयर करेंगे......मैंने इन्हें कहा कि आप सोशल मीडिया पर भी जुड़ें ...लेकिन अभी तो इस पोस्ट के ज़रिये मैं अपने दो लाख नियमित पाठकों तक इन की बात पहुंचा रहा हूं. सच में इन के ज़ज्बे को सलाम........ईश्वर इन की यात्रा सफल करे.....यह सुरक्षित रहें.

कल जब मैं लौट रहा था तो मुझे यही ध्यान आ रहा था कि राह पर आते जाते हम कैसे कैसे महान् लोगों से मिल जाते हैं ...लेकिन अगर हमारे पास दो मिनट बात करने के लिए समय हो तभी....यादव जी भी बता रहे थे कि मुझे भाव से कोई भी आवाज़ देता है तो मैं रूक जाता हूं...

मुझे यह गीत याद आ रहा है......राजेश खन्ना साहब के दिल से यह गीत किसी दूसरे हसीं कारण की वजह से निकल रहा है......मुझे इसलिए याद आ गया क्योंकि इस के सभी बोल दिल की गहराईयों को छू जाते हैं....