Tuesday, February 2, 2016

सोयाबीन देखते ही तबीयत हुई नासाज़!

कल दोपहर के खाने में सोयाबीन की दाल और आलू मेथी की सब्जी थी...मुझे खाने की इच्छा नहीं थी, मैंने चाय ली और लेट कर टीवी देखने लग गया..कुछ समय बाद दो तीन अमरूद खा लिए...फिर खाने की इच्छा ही नहीं हुई।

रात में जब हम लोग मटर-पुलाव खा रहे थे तो श्रीमति ने पूछा कि सोयाबीन लेंगे...मेरे मना करने पर उन्होंने यही कहा..."लगता है सोयाबीन देखते ही आप की तबीयत नासाज़ हो गई है, जैसे बच्चों की भूख उड़ जाती है। वैसे ही इसे छःमहीने बाद बनाया है।" 


बात सुन कर मुझे बिल्कुल ऐसा लगा जैसे कि मेरी चोरी पकड़ी गई हो...जी हां, मुझे सोयाबीन के किसी भी तरह से इस्तेमाल से नफ़रत है। न ही सोयाबीन की दाल, न ही सोयाबीन की बड़ी और न ही न्यूट्री ...हां, बस थोड़ा बहुत अालू की सब्जी में इसे खा लेता हूं। 

सोयाबीन की दाल जैसी कोई चीज़ होती है इस का पता ही शायद १७-१८ वर्ष की उम्र में किताबों से चला था...कभी घर में इसे देखा ही नहीं...खाना तो बहुत दूर की बात हो गई। 

होस्टल में रहते हुए मेरे साथ वाले रूम में राकेश पुरी ने सोयाबीन खिलाई सब से पहले... उस की मां उसे अच्छे से भून कर यह साथ दिया करती थी लेकिन उसे पसंद नहीं था यह सब...पसंद हमें भी कहां था यह सब खाना..लेिकन अकसर वह हमारे आगे रख दिया करता था, इसलिए थोड़ी खा लिया करते थे...लेिकन एक बात वह तैयार इतनी बढ़िया होती थी कि खाते खाते अच्छा लगने लगा.

मैं क्यों यह सब यहां लिख रहा हूं ...शायद मैं अपने आप को समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि ऐसा नहीं है कि पढ़े लिखे होने के बावजूद हम अपने खाने पीने के बारे में ठीक से चुनाव कर पाते हों.....अब इसी सोयाबीन की ही उदाहरण लीजिए...मैं अपने बहुत से मरीज़ों को सोयाबीन को किसी भी रूप में लेने की सलाह जब देता हूं तो उन्हें बताना नहीं भूलता कि यह प्रोटीन का बहुत ही बढ़िया स्रोत है ... इस में ४० फीसदी के लगभग प्रोटीन होता है ...और हमारे जैसे विकासशील देश में तो इस का महत्व और भी ज़्यादा है। 

लेिकन फिर भी मैं स्वयं सोयाबीन नहीं खाना चाहता...मजबूरी में खा लेता हूं ...इस से यही बात समझ में आती है कि ज़रूरी नहीं कि केवल ज्ञान मात्र से ही हम लोगों का खान-पान स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है ... ऐसा नहीं है, सेहत से जुड़े लोग धूम्रपान करते हैं, गुटखा चबाते हैं...पुलिस वाले बिना हेल्मेट के वाहन दौड़ा रहे होते हैं, मैं डैंटिस्ट हूं लेकिन रात में ब्रुश नहीं करता ... बहुत से दांत खराब करवा के बावजूद भी ...कथनी करनी में फ़र्क तो है ही निःसंदेह। 

लेिकन बात एक और भी है अगर अच्छी आदतें हमें बचपन में नहीं पड़तीं तो फिर आगे भी हम ऐसे ही रहते हैं। 

खाने के बारे में बातें करते हैं, सोयाबीन की बात मैंने की...मैं अकसर शेयर करता हूं कि मैं दो सब्जीयां नहीं खाता, एक करेला और दूसरी ग्वार की फली....मुझे बहुत बेकार स्वाद लगता है इन दोनों का ...इसका भी कारण यही कि १८-२० साल की उम्र तक कभी ग्वार की फली की शक्ल नहीं देखी ..उस के बाद कभी कभी सुन लिया करते थे इसे यह गंवार लोगों के लिए है... करेला इसलिए नहीं खाता था कि कड़वा होता है, बस, फिर उस के बाद कभी इच्छा ही नहीं हुई..कभी एक दो करेले खा लेता हूं ...कोई रूचि नहीं होती इसे खाने में। 

सोचने वाली बात है कि इस सुस्त सी दोपहरी में मैं क्यों अपना यह अपने खाने-पीने की थाली लेकर बैठ गया हूं.. कोई खास बात नहीं, बस ऐसे ही यह ध्यान में आता है जब आज कल के बच्चों की तरफ़ देखता हूं कि जो बच्चे ज़्यादा जंक फूड नहीं खाते, फॉस्ट-फूड नहीं लेते ...उन में से भी अधिकांश बच्चे ऐसे हैं जो मैंने देखा है कि उन्हें बस एक तरह की दाल, राजमा-चावल, पनीर या ऐसे ही दो तीन चीज़ें हैं जो पसंद ... बस, वे इन्हें ही बार बार खाना चाहते हैं... सब्जियों से नफ़रत है ...

कुपोषण वह तो है ही जो हम गरीब बच्चों में देखते हैं, संभ्रांत परिवारों के बच्चे जो बहुत कुछ खा तो लेते हैं लेिकन पौष्टिकता-रहित होता है अधिकतर यह सब कुछ...यह भी एक तरह का कुपोषण ही पैदा कर रहा है.. संतुलित आहार से कोसों दूर। 

मैं अकसर यह शेयर करता हूं अभिभावकों से कि बच्चों को हर तरह की दाल-सब्जी खाने के लिए तैयार करना चाहिए.. जो तत्व एक में हैं वे दूसरी में कम हैं, जो तत्व या यूं कह लें कि विटामिन आदि एक रंग की सब्जी या फल में हैं वे दूसरी में नहीं हैं....कहने का मतलब बदल बदल के दाल-सब्जी लेना और विभिन्न दालों को मिला कर खाना...यही संतुलित पौष्टिक आहार है .....मैं नहीं कहता, हमारे प्राचीन आयुर्वेद के ग्रंथों में दर्ज है यह सब कुछ...हमारा खान पान कैसा हो, क्या नहीं खाना है किस समय.....सब कुछ तो कह दिया गया है, अब और कुछ कहने की ज़रूरत है नहीं दरअसल, बस पुराने पाठ बार बार दोहराए जाने की ज़रूरत है। 

बच्चे आज कल घरों से बाहर रहते हैं...दूध वूध अकसर होस्टलों में मिलता नहीं, अगर मिलता भी है कि आप उस की गुणवत्ता की क्लपना कर सकते हैं, किस तरह का दही मिलता है हम जानते हैं, फल-फ्रूट के लिए बच्चे थोड़ा प्रयत्न कर लें, इस की कल्पना करने में भी थोड़ी कठिनाई ही होती है ... ऐसे में शारीरिक तौर पर तो बच्चों में थोड़ी कमजोरी आ ही जाती है ...जो देखने वाले को दिख जाती है लेिकन सब से बड़ी त्रासदी यह है कि कुछ तत्वों की कमी युवावस्था में दिखती नहीं लेिकन उस के प्रभाव बहुत बुरे होते हैं ...किस किस के बारे में लिखें, ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जिन की कमी की वजह से आगे चल कर बहुत परेशानी हो जाती है ..

मुझे अभी ध्यान आ रहा है कि बच्चे सरसों के साग तक से दूर भागते हैं.....मैं कईं बार सोचा करता हूं कि अगर यह सब ये अभी नहीं खा रहे तो क्या आज से दस-बीस साल बाद अचानक इसे खाना शुरू कर देंगे.....ऐसा लगता तो नहीं अगर अपने अनुभव से देखूं तो भी। 

हम लोग जिन चीज़ों को बचपन में नहीं खाते, हमारे स्वाद डिवेल्प नहीं हो पाते, बड़े होने पर भी अकसर हम इन चीज़ों से किनारा ही किए रहते हैं.....इस पोस्ट का बस यही एक विनम्र प्रयास है कि हम लोग बच्चों को शुरू से ही सब तरह की दालों एवं सब्जियों को खाने के लिए प्रेरित करें ... यह कैसे करना है, यह का जुगाड़ आप को खुद करना होगा.. वैसे मैं और मेरी मिसिज़ मिल कर भी यह काम अपने बच्चों के लिए नहीं कर पाए...ऊपर लिखी खाने पीने की बातें लगभग सभी उन्हीं की कहानी है। मैं अपने बड़े बेटे को पौष्टिक खाने के बारे में कहता हूं तो वह मेरी बात मज़ाक में उड़ाते हुए कहता है ....."Dad, what have you gained by healthy eating? ...Just weight!!"


अभी जुगाड़ की बात कर रहा था तो कल व्हाट्सएप पर मिले एक जुगाड़ का ध्यान आ गया...माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए उसे आप तक पहुंचा रहा हूं... 


मुझे अकसर लोग पूछते हैं कि आप क्या बाहर नहीं खाते, नहीं मैं बाहर नहीं खाता, मुझे अच्छा नहीं लगता बिल्कुल...मैदा मैं वैसे ही नहीं खाता...लगभग न के बराबर....बस, अमृतसर के केसर के ढाबे का खाना और बंबई के दादर में प्रीतम का ढाबा मैं कभी भी खा सकता हूं.....अमृतसर में तो मैं अपने खाने-पीने के सारे कायदे-कानून तोड़ने को तैयार हूं ...हर गली, हर नुक्कड़, हर बाज़ार अपना सा लगता है .....लेिकन केसर के ढाबे तां ते बई कोई जवाब ही नहीं..

केसर दा ढाबा अमृतसर

एक बाबा है न जो टीवी पर आता है और जिसे अचानक कहीं से गुलाब जुमान या हलवा दिखने लग जाता है और अपने दुःखी भक्तों पर कृपा खोलने के लिए वह उन्हें इन का भरपूर सेवन करने की सलाह दे देता है... मुझे तो केसर के ढाबे का इतना बढ़िया खाना देख कर बस अब फिल्मी गीत ही याद आते हैं ...हमेशा पोस्ट को समाप्त करते समय जो गीत मेरे ज़हन में आता है, मैं उसे आप तक पहुंचा दिया करता हूं...तो आज इस गीत का ध्यान आ गया... पल्ले विच अग्ग दे अंगारे नहीं लुकदे... (पल्ला का मतलब का दामन और नहीं लुकदे का मतलब है छिपते नहीं...)..हिना फिल्म से... 


पद्मश्री गुलाबो सपेरा और सुशील दोशी से कल हो गई मुलाकात..

जब भी मैं टीवी ऑन करता हूं तो एनडीटीवी इंडिया, ज़ी क्लासिक, स्टार गोल्ड आदि पर ही आ कर थम जाता हूं...खबरिया चैनलों में से एनडीटीवी इंडिया मेरा फेवरेट चैनल है...कुछ कारण और भी होंगे, लेकिन सब से बड़ा कारण यही है कि यहां पर ख़बरें पढ़ते हुए लोग उछलते नहीं हैं। ..दूसरे कईं चैनल हैं जिन को लगाते ही पांच मिनट में खबरें पढ़ने वालों की उत्तेजना से मेरा सिर भारी हो जाता है ..

कल दोपहर दो बजे जैसे ही टीवी लगाया तो नगमा सहर दिखीं...हम लोग प्रोग्राम में...पता चला कि पद्मश्री गुलाबो के बारे में यह प्रोग्राम है.. इन के बारे में कईं बार सुना था, पढ़ा था और टी वी पर देखा भी था लेकिन सब कुछ धुंधला ही था...नागिन डांस के नाम पर बस दो तीन वे व्हाट्सएप वीडियो ही याद थे जो कुछ युवा शादी ब्याह में कर लेते हैं।
वैसे भी हम कहां पद्मश्री या अन्य अवार्ड पाने वालों को जानते हैं?... मुझे याद है बस अखबारों में इन की लिस्ट और उस के साथ ब्रेकेट में उन के कार्यक्षेत्र के बारे में ही अकसर हम लोग देख कर इत्मीनान कर लिया करते थे...मेरा तो यही अनुभव रहा है ..शायद मेरे से कुछ प्रोग्राम छूट जाते होंगे। 

बहरहाल कर एनडीटीवी इंडिया पर गुलाबो सपेरा के बारे में बहुत सी बातें जानने का मौका मिला ..बहुत अच्छा लगा...उस की बातें शेयर करने की इच्छा हो रही है...

गुलाबो सपेरा उस प्रोग्राम में अपनी बेटी के साथ आई थीं..यह जो सपेरा डांस है इन्होंने ही शुरू किया .. बचपन से ही अपने पिता के साथ साथ ही रहती थीं... वे सपेरे थे..और ऐसे ही सांपों को बीन की मधुर धुन पर मुग्ध होते देख देख कर गुलाबो भी यह नृत्य करने लगीं...छुपटन से ...और फिर तो कभी सांप इन के ऊपर और कभी ये सांपों के ऊपर और सांपों को गले में डाल कर ये नृत्य करने लगीं और जल्द ही इतनी पारंगत हो गईं कि इन्हें बड़े मेलों पर नृत्य करने का मौका मिलने लगा...

इस बात को यहां थोड़ा रोकते हैं.. पहले इन के जन्म के बारे में यह बात बताना चाहूंगा कि इन के जन्म से पहले तीन बहनें और तीन भाई हो चुके थे..इन का जन्म जिस दिन हुआ..पिता बाहर गये हुए थे ..तो घर की और आस पास की महिलाओं ने सोचा कि तीन छोरियां तो पहले से हैं, अब एक और हो गई..चलो, इसे गाड़ देते हैं...उन महिलाओं ने वैसा ही किया.. नवजात बच्ची को कहीं जा कर गाड़ आईं... गुलाबो की मां ने जब होने वाले बच्चे के बारे में पूछा तो उन्होंने कह दिया कि जो भी बच्चा हुआ, मरा हुआ था... लेकिन जैसे तैसे गुलाबो की मां ने अपनी बहन से सच उगलवा ही लिया ..यह कह कर कि तेरे तो पांच बेटे हैं, चाहे तो इस बेटी को तू रख लेना, पर इसे बचा ले....यह बातें तब चल रही थीं जब उस नवजात बच्ची को दफनाए हुए चार पांच घंटे बीत चुके थे. 

गुलाबों की मौसी ने मां को समझाया कि अब तक तो वह मर चुकी होगी..लेकिन मां ने कहा कि मेरा दिल कहता है वह ज़िंदा होगी, चल, ज़रा जा कर देखते हैं। और जब वे दोनों बच्ची को लेने गये तो उस की सांसें चल रही थीं...यह बात सुना कर गुलाबो ने सब को हिला दिया...

हां, गुलाबो जिस नृत्य को करती हैं उसे राजस्थान का कालबेलिया लोकनृत्य कहते हैं ...यह गुलाबो की ही देन है ..अब यह विश्वप्रसिद्ध है। सात साल की उम्र में किसी मेले पर जब यह नृत्य कर रही थीं तो किसी की नज़र इन पर पड़ी और इन्हें स्टेज पर नृत्य करने का मौका मिला .. स्टेज पर नृत्य करना इन्हें इतना अच्छा लगा कि उस के बाद इन्हें पीछे मुड़ के नहीं देखना पड़ा.... देश विदेश में इन के शो होने लगे ...


सब कुछ इन्हें इतनी आसानी से भी नहीं मिल गया... जब यह स्टेज पर नृत्य करने लगीं तो कबीले में बहुत विरोध हुआ.. एक तरह से सामाजिक बहिष्कार हो गया...लेकिन यह धुन की पक्की निकलीं...जैसे जैसे इन की ख्याति बढ़ती गई, यह अमेरिका जैसे देशों में भी शो कर आईं तो इन के कबीले के लोग भी बदलने लगे ...वे इन के पास आने लगे कि हमारी घर की औरतों को भी यह नृत्य सीखना है। इन्होंने उन के सामने यही शर्त रखी कि ज़रूर सिखाएंगी ...लेिकन शर्त एक ही होगी कि तुम लोग बच्चियों को गर्भ में मारना..और उन्हें मार कर दफ़नाना बंद करोगे...धीरे धीरे लोग इन की बात मानने लगे। 


नगमा सहर से इन की बातचीत सुन कर जैसा अनुभव हुआ उस का एक अंश भी मैं इन पंक्तियों के माध्यम से आप तक पहुंचाने में नाकामयाब रहा .. इन की बेटी भी इन के साथ थी, जो बोर्डिंग स्कूल में पढ़ी हैं और अब मां के साथ इस नृत्य को करती हैं.. मैं इसे लिखते सोचा कि काश, इस प्रोग्राम की वीडियो कहीं मिल जाए...एनडीटीवी की साइट पर ढूंढा तो यह मिल गई....इस का लिंक यह है (यहां क्लिक करिए)  ....इस पर क्लिक कर के आप इस प्रोग्राम का आनंद ले सकते हैं....गुलाबो सपेरा की तारीफ़ करने के लिए मेरे पास इस से ज़्यादा शब्द नहीं है.....वैसे ही मेरी हिंदी की वोकेबुलरी मुझे बहुत से मौकों पर फेल कर देती है!

इस के बाद नगमा सहर ने हमें मिलाया हिंदी कमेंटेटर सुशील दोशी जी से ..इन से मिल कर भी बहुत अच्छा लगा.. कितनी तपस्या की इन्होंने क्रिकेट की कमेंटरी हिंदी में देने के लिए..यह इन्हें से जानिए इसी वीडियो से ...पहले पहल लोगों ने मज़ाक उड़ाया कि अंग्रेज़ी खेल की कमेंटरी हिंदी में कैसे कर पाओगे..लेिकन इन के जुनून की जीत हुई...बचपन के बारे में बताते हैं कि १४ साल की उम्र में इंदौर में रहते हुए इन का मन हआ कि बंबई जाकर मैच देखना है...हालांकि इन के पिता को क्रिकेट का बिल्कुल शौक नहीं था लेकिन वे इन्हें लेकर बंबई जा पहुंचे..स्टेडियम में कौन घुसने देता!..टिकट ऐसे कहां िमल पाती... तीन दिन ऐसे ही स्टेडियम के चक्कर काटते रहे, चौथे दिन स्टेडियम के बाहर चाय बेचने वाले ने इन बाप-बेटे को देखा और सारी बात उसने समझी। उस ने जैसे तैसे सुशील को अंदर भिजवा दिया और इन के पिता को बाहर ही इंतज़ार करने को कहा ...सुशील वे पल याद करते हुए भावुक हो गये। 


ये पिछले ५० सालों से हिंदी में कमेंटरी कर रहे हैं...१७-१८ साल की उम्र में इन्होने आकाशवाणी के लिए हिंदी में कमेंटरी करनी शुरू कर दी थी... इन के महान काम को देखते हुए इंदौर के क्रिकेट स्टेडियम के कमेंटरी बॉक्स का नाम इन्हीं के नाम पर रखा गया है ...और ऐसा भारतवर्ष में पहली बार हुआ है..

इसे लिखते लिखते व्हाट्सएप पर एक संदेश दिख गया जिसे यहां शेयर कर रहा हूं....कुछ लोग सच में मुकद्दर के सिकंदर ही होते हैं..



हम जो भी काम करते हैं ..कुछ भी ..हर काम बहुत अहम् है....बस, उसे पूरी ईमानदारी से करते रहना चाहिए..सफलता की ऐसी की तैसी ...वह कहां जाएगी....हम अपने आस पास ऐसे बीसियों किस्से देखते सुनते हैं अकसर...इन पर भी कभी कभी विचार कर लेना चाहिए....होता यह सब कुछ संघर्ष से ही है ...बहुत कम होता है कि किसी नामचीन बाप का बेटा भी वैसा ही जुनून दिखा पाए.......हो सकता है, लेकिन अकसर देखने में आता नहीं ..स्टार पुत्रों के बारे में भी हम यही देखते हैं......होता है,...यह स्वभाविक भी है ... पिता के लिए शायद यह जीने का संघर्ष होता है और फिर बच्चों को सब कुछ पका-पकाया मिल जाता है तो शायद वह स्पार्क पैदा ही नहीं हो पाता....

कल शाम भी लखनऊ महोत्सव में फरहान अख्तर का रॉक-शो देखने का आप्शन था... निमंत्रण पत्र भी था..घर से पांच मिनट की दूरी थी प्रोग्राम स्थल से ..लेकिन तभी यू-ट्यूब पर घूमते हुए अपने मन पसंदीदा कार्यक्रम गुफ्तगू पर संजय मिश्रा से इंटरव्यू का पता चला तो बस वहीं बैठा रह गया...मैं इनका बहुत बड़ा फैन हूं...इन की ईमानदारी का, सच्चाई का... 


....फरहान अख्तर के शो में जाने की इच्छा नहीं हुई... वैसे भी इन रॉक-वॉक शो में मेरी कोई रूचि नहीं है.. बस, उधर तक ही ठीक है ..साडा हक्क ऐत्थे रख.. रॉकस्टार का गीत!!


कल एनडीटीवी के इस प्रोग्राम से लगा कि पद्मश्री पुरस्कारों जैसे अवार्ड के लिए चयन करने वालों का काम भी कितना मुश्किल होता होगा... लेकिन जिन लोगों ने भी अपने काम को पूजा की तरह किया ..उन्हें इन अवार्डों से सुशोभित किया ही जाना चाहिए... पद्मश्री गुलाबो और सुशील दोशी जी को हमारी ढ़ेरों बधाईयां... इन के फन को सलाम...
पद्मश्री अवार्डों की बात चली तो पता चला कि पिछले दिनों मीडिया में यह दिखा कि शायद एक मंत्री ने यह कहा कि एक सुप्रसिद्ध पुराने दौर की सिनेतारिका ने उन से पद्मश्री अवार्ड दिलाने की सिफारिश करने को कहा ...यह पढ़ कर अच्छा नहीं लगा... कारण?...हम उस सिनेतारिका का महान काम बचपन से देख रहे हैं, उम्मीद नहीं कि उसने ऐसा कहा हो, और अगर कहा भी हो तो उस में ऐसा हायतौबा मचाने की बात ही क्या थी, हम सब लोग अकसर कईं बार कमज़ोर लम्हों में कुछ न कुछ कह देते हैं....ऐसे में इस तरह की बात को मीडिया में उछालने से क्या हासिल! मुझे तो यह बात बहुत बुरी लगी।