Thursday, January 22, 2009

अनहोनी को होनी कर दें ...!!

निःसंदेह अमर अकबर एंथोनी में निरूपा राय को एक साथ अकबर और एंथोनी का रक्त चढ़ता दिखाते हुये रील-लाइफ़ में एक अनहोनी को होनी बता कर के तो दिखा दिया। लेकिन ऐसा रियल लाइफ में नहीं होता है क्योंकि जब किसी रक्त-दाता से रक्तदान प्राप्त होता है तो उस की कईं प्रकार की जांच होती है।


इसी बात पर ध्यान आ रहा है कि ये जो डाक्टर लोग रेडियो एवं टीवी वगैरह पर आते हैं इन की सब बातें पूरे ध्यान से सुननी चाहिये क्योंकि अकसर मैंने यह देखा है कि ये सारी उम्र भर के अनुभव को उस एक घंटे के कार्यक्रम में श्रोताओं से साझा कर देना चाहते हैं। ऐसे ही मुझे दो-दिन पहले विविध-भारती पर सुने एक ऐसे ही कार्यक्रम का ध्यान आ रहा है जिस में वह किसी ब्लड-बैंक के डाक्टर से की गई बातचीत का प्रसारण कर रहे थे।


अकसर हम लोग सोचते हैं कि किसी सर्टीफाइड ब्लड-बैंक से लिया गया रक्त लिया है तो वह शत-प्रतिशत सुरक्षित ही होता है। लेकिन डाक्टर साहब इस बात पर भी प्रकाश डालने का प्रयत्न कर रहे थे कि ठीक है, रक्त किसी सर्टीफाइड बैंक से लिया है लेकिन फिर भी कुछ बीमारी तो इस प्रकार से लिये रक्त से भी फैलने का रिस्क तो बना ही रहता है ---चाहे यह रिस्क होता बहुत कम है !!

अब आप का यह सोचना बिलकुल मुनासिब है कि अब यह कौन सी नईं मुसीबत है कि किसी मान्यता-प्राप्त ब्लड-बैंक से रक्त लेकर भी रिस्क की चिंता बनी रहे। दोस्तो, यह इसलिये है क्योंकि अभी भी बहुत से ऐसी वॉयरस हैं जिन का हमें पता ही नहीं है। जिन वॉयरसों अथवा जिवाणुओं का हमें पता है उन की तो हम नें रक्त दाता से रक्त लेकर जांच कर डाली लेकिन जिन के बारे में अभी चिकित्सा विज्ञान को कुछ भी पता ही नहीं है, उन का क्या ? कल ही मैं पढ़ रहा था कि रक्त के चढ़ाने से एक अन्य नईं सी बीमारी ( नाम ध्यान में नहीं आ रहा ) के फैलने के रिस्क का भी पता चला है ।

चलिये इस नईं सी बीमारी का तो मैं नाम भूल गया – लेकिन हैपेटाइटिस सी का तो नाम हम सब को याद है। दोस्तो, रक्त-दान से प्राप्त किसी भी रक्त की थैली के बाहर लिखा होता है कि इस रक्त की वीडीआरएल, हैपेटाइटिस बी, हैपेटाइटिस सी, एच-आई-व्ही, मलेरिया के जीवाणुओं के लिये जांच की जा चुकी है और इस सुरक्षित है ।
अकसर सर्टीफाइड सरकारी ब्लड-बैंक रक्त के एक यूनिट के लिये 250 रूपये की रकम लेते हैं – और यह रक्त की कीमत नहीं है (!!) , यह तो इसे टैस्टिंग करने की कीमत है और वह भी ये सब कैसे कर पाते हैं मैं इस का पता लगा कर बताऊंगा क्योंकि अकसर बाजार में ये सारे टैस्ट ही एक हज़ार-बारह सौ रूपये में होते हैं क्योंकि हैपेटाइटिस सी के लिये रक्त की जांच करने के ही लगभग 650 रूपये का खर्च बैठता है।

बात मुझे आज हैपेटाइटिस सी के बारे में ही करनी है --- मलेरिया, वीडीआरएल टैस्ट के साथ साथ हैपेटाइटिस बी और एचआईव्ही की जांच भी होती है , यह तो आप सब अच्छी तरह से जानते ही हैं लेकिन हैपेटाइटिस सी के बारे में इतना कहना चाहता हूं कि रक्त दान से प्राप्त रक्त की हैपेटाइटिस सी के लिये जांच अभी पिछले कुछ ही सालों से शुरू की गई है ----पहले यह टैस्टिंग नहीं की जाती थी –और जब से यह एचआईव्ही का शैतान आ गया तो उस के बाद से ही ये सारे टैस्ट वगैरह होने लगे।

इस का क्या यह मतलब है कि जब से हम लोगों ने रक्त के लिये इस तरह के टैस्ट करवाने शुरू कर दिये उस समय से ही ये बीमारियां हैं ---नहीं, उस से पहले ही से ये बीमारियां हैं लेकिन हमें इन के जीवाणुओं के बारे में ही पता ही न था और अगर पता भी था तो हमारे पास कुछ बीमारियों को पता करने के साधन नहीं थे और जहां कहीं किसी बीमारी अथवा इंफैक्शन का पता करने के लिये साधन थे , वहां तब यह पालिसी ही नहीं थी अथवा शायद ज़रूरत ही नहीं समझी जा रही थी कि इस बीमारी के लिये भी रक्त की जांच किये जाने की ज़रूरत है !!

अब यह पढ़ कर यह विचार आना कि यह सब भ्रम मात्र हैं ---- क्या पहले रक्त नहीं चढ़ा करता था ( blood transfusion) ---पहले भी तो यह सब होता ही था ना ---- ठीक है , होता तो था लेकिन जैसे कि ऊपर बार बार बताया जा चुका है कि हमारे पास कुछ बीमारियों की टैस्टिंग करने का कोई जुगाड़ ही न था।

अब चलिये हैपेटाइटिस की ही बात करते हैं ----कहां किसी को पीलिया होने पर इतनी जांच की जाती थी ----बस, पीलिया हो गया है तो यह कह दिया जाता था कि इस का सारा रक्त पानी बन गया है – और कुछ बच जाते थे और कुछ लंबे समय तक बीमार रहते थे और कुछ को पीलिये की बीमारी लील लिया करती थी। लेकिन आज किसी की व्यक्ति को जब पीलिया होता है तो तुरंत उस की जांच की जाती है कि यह दूषित पानी पीने की वजह से है ( हैपेटाइटिस ए) , दूषित रक्त अथवा ऐसे ही अन्य कारणों की वजह से ( हैपेटाइटिस बी, सी) , शराब द्वारा लिवर को तबाह कर दिये जाने की वजह है , पित्ते में पत्थरी की वजह से है ..........कहने का भाव यह है कि जो भी कारण पता चलता है उस के मुताबिक मरीज़ का इलाज शुरू कर दिया जाता है।

अब जिस बात पर मैं ज़ोर देना चाहता हूं कि जब हैपेटाइटिस सी की बीमारी की जांच नहीं हुआ करती थी , बीमारी तो यह तब भी थी और रक्तदान से प्राप्त रक्त को किसी को चढ़ाने के कारणवश फैलती तो होगी लेकिन किसी को पता ही नहीं चलता था । फिजिशियन से बात हो रही थी कि जिस दौर में हैपेटाइटिस सी का टैस्ट नहीं किया जाता था , उस ज़माने में जिन लोगों को रक्त चढ़ाया गया होगा, उन में हैपेटाइटिस सी की पुरानी बीमारी ( chronic hepatitis C infection) होने की संभावना तो है ही----यह रिस्क तो उन को झेलना ही पड़ा।

हैपेटाइसिस सी के बारे में थोड़ी बातें जाननी ज़रूरी हैं ---- इस इंफैक्शन के बारे में यह कहा जा सकता है कि यह वॉयरल सिकनैस खामोश रह सकती है और जिस का इलाज करना मुश्किल तो हो सकता है लेकिन इस का इलाज हो भी सकता है ।

हैपेटाइटिस सी इंफैक्शन का पता कईं बार तब चलता है जब बहुत सालों तक यह लिवर को तबाह कर चुकी होती है। विकसित देशों में तो आज की तारीख में लिवर ट्रांसप्लांट का एक मुख्य कारण ही वॉयरल हैपेटाइटिस है।
हैपेटाइटिस सी के बारे में यह बात बहुत रोचक है कि आज कल जिस तरह की दवाईयां उपलब्ध हैं उन के इस्तेमाल से पुरानी इंफैक्शन के 40 से 80 प्रतिशत केसों को जड़ से नष्ट किया जा सकता है।

सब से ज़्यादा ध्यान देने योग्य बात यही है कि हैपेटाइटिस सी से इंफैक्शन का कईं कईं साल तक पता ही नहीं चलता । ये वायरस इतनी चंचल है कि अकसर यह कईं सालों तक सोई रहती है और उस के बाद यह एक ऐसा रूप धारण कर लेती है कि डाक्टर लोग भी असमंजस की स्थिति में हैं कि इस के इलाज की सिफारिश करें अथवा मरीज़ों को सजग रहते हुये इंतज़ार करने की सलाह दें ( wait and watch !!) .

कहीं आप को यह सुन कर एक झटका न लगे कि अमेरिका जैसे देश में 32 लाख लोग ऐसे हैं जिन में हैपेटाइटिस सी की क्रानिक इंफैक्शन तो है लेकिन उन्हें इस का पता नहीं है ---- ऐसा कहा जाता है कि पांच में से चार लोगों में जब यह इंफैक्शन पहली बार होती है तो इस के कुछ भी लक्षण नहीं होते ( no symptoms).

अमेरिका में तो बहुत से लोगों को तो तब ही इस हैपेटाइसिस सी की बीमारी का पता चलता है जब वे रक्त दान देते हैं अथवा हैल्थ इंश्योरैंस के लिये उन का सारा चैक-अप होता है।

जिन लोगों को हैपेटाइटिस सी से इंफैक्शन होती है उन में से लगभग एक तिहाई लोग ऐसे होते हैं जिन की रोग-प्रतिरोधक शक्ति ( natural immunity) ही इस वॉयरस का खात्मा कर देती है लेकिन 70 फीसदी लोग ऐसे होते हैं जिन में यह एक क्रॉनिक संक्रमण का रूप ले लेती है जिस की वजह से लिवर की सिरोसिस ( liver cirrhosis) एवं लिवर के कैंसर की संभावना बहुत बढ़ जाती है। विडंबना देखिये कि जो लोग हैपेटाइटिस सी से इंफैक्शन होने के तुरंत बाद बीमार हो जाते हैं उन में इस वायरस के खत्म हो जाने की काफ़ी संभावना रहती है।
तो इस हैपेटाइटिस सी का इलाज क्या है ? – इस के लिये दवाईयां तो हैं जो महंगी तो हैं ही –इस के साथ ही साथ उन के साइड-इफैक्टस भी सीरियस किस्म के होते हैं । इसलिये कईं बार यह फैसला करना कि किस का इलाज किया जाये और किस का नहीं थोड़ा पेचीदा सा काम ही होता है।


विशेषज्ञों के अनुसार लगभग एक तिहाई ऐसे मरीज़ जिन में यह क्रॉनिक इंफैक्शन होती है उनमें लिवर सिरोसिस हो जाती है ---- पांच से दस प्रतिशत मरीज़ ऐसे होते हैं जिन में लिवर कैंसर हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो बहुत से मरीज़ क्रॉनिक इंफैक्शन होते हुये भी बिना किसी तकलीफ़ के ज़िंदगी बिता देते हैं --------मुश्किल बात यही बताना है कि कौन सा बंदा ठीक चलता रहेगा और किस की इस क्रॉनिक इंफैक्शन की वजह से मौत हो जायेगी।

अमेरिका में 1980 के दशक में हैपेटाइटिस सी इंफैक्शन के हर साल दो लाख चालीस हज़ार नये केस पकड़ में आते थे और यह संख्या 2006 में केवल 19000 रह गई है । लेकिन हम लोग ज़रा अपने यहां की हालात की कल्पना करें ----- सीधा जवाब है कि हमें पता ही नहीं है कि हम कहां पर खड़े हैं --- इस की एक छोटी सी शुरूआत मैं सूचना के अधिकार के अंतर्गत यह पता कर के करने की करूंगा कि पिछले पांच सालों में रक्त-दान के कितने केसों में से कितने लोगों में हैपेटाइटिस सी का संक्रमण पाया गया है।

हां, तो आप यह सब पढ़ कर भयभीत तो नहीं हो गये ----क्या करें, थोड़ा बहुत आदमी हो ही जाता है और विशेष कर अगर किसी को उस ज़माने में रक्त चढ़ाया जा चुका है जब रक्तदान से प्राप्त रक्त की हैपेटाइटिस सी की टैस्टिंग ही नहीं हुआ करती थी ----अगर ऐसा है तो डरने की बजाये आप अपने फिजिशियन से मिल कर अगर वह आप को सलाह दे तो हैपेटाइटिस सी के लिये अपना ब्लड-टैस्ट करवा लेंगे तो बेहतर होगा।

वैसे एक बात की तरफ़ हमेशा ध्यान रहना चाहिये कि अभी भी बहुत से वॉयरस हैं जिन का हमें अभी पता ही नहीं है --- लेकिन फिर भी दोस्त जब किसी को रक्त-दान दिया जाना होता है उस की लाइफ़ बचाने के लिये रक्त चढ़ाया ही जाता है ---- फौरी तौर पर उस की ज़िंदगी बचाना सब से ज़्यादा लाज़मी होता है ।

लेकिन एक बात का आप को पता है कि कई बार आप्रेशन के वक्त जिस किसी मरीज़ को रक्त दिये जाने की संभावना रहती है वह आप्रेशन के कुछ महीने पहले अपना ही रक्त निकलवा कर सुरक्षित रखवा देता है जिसे उस के आप्रेशन के समय ज़रूरत पड़ने पर चढ़ा दिया जाता है --- इसे ऑटोलॉगस ट्रांसफ्यूज़न ( Autologous transfusion) --कहते हैं। एक तरह से किसी तरह की बीमारी के फैलने की होनी को अनहोनी में बदलने का एक रास्ता !!

मैंने जो बात अनहोनी को होनी में बदलने की की थी उसे होनी को अनहोनी में बदल कर समाप्त कर रहा हूं। बस, अपना ध्यान रखियेगा।