Monday, June 30, 2008

Yahoo Answers ने बना दिया टॉप-कंटरीब्यूटर

मैं पिछले लगभग दो-हफ्ते से ब्लागिंग से दूर रहा ...क्योंकि मैं याहू आंसर्ज़ में जवाब देने में व्यस्त था। बस, ऐसे ही जैसे कभी भी ब्लागिंग की धुन सवार हो जाती है , बस कुछ दिन yahoo! answers का भूत सवार रहा । इसलिये मुझे पिछले दिनों जब भी समय मिलता मैं याहू पर जवाब देने के लिये बैठ जाता। मुझे इन प्रश्नों का जवाब देने के दौरान यह तो पता चल ही गया कि वैस्टर्न -वर्ल्ड में सब कुछ इतना rosy नहीं है, उन लोगों की समस्यायें भी हम लोगों जैसी ही हैं ...और कईं कईं केसों में तो हम से भी कहीं बदतर। बस, यह बड़ा मिक्सड़ सा अनुभव रहा । वैसे मैं अपने याहू आंसर्ज़ पेज का लिंक नीचे दे रहा हूं---आप क्लिक कीजिये और फिर मुझे भी फीड-बैक दीजिये।

in.answers.yahoo.com/my/profile?show=AA10015966

हिंदी ब्लागिंग के पितामहों के लिये मेरा एक प्रश्न है कि याहू आंसर्ज़ विश्व की बहुत सी भाषाओं में उपलब्ध है....लेकिन आप को इसे हिंदी में भी लाने के लिये कुछ करना होगा.। वैसे एक रोचक बात बता रहा हूं कि पंद्रह दिन पहले जब मैंने इस पर हिंदी में लिख कर जवाब देने शुरू किये तो हिंदी बढ़िया इस पर आने लगी। मुझे लगा कि यार, यह तो बढ़िया है ...अपने देशवासियों से हिंदी के उत्तरों के माध्यम से जुड़ने का एक बढ़िया तरीकाहै यह. लेकिन यह क्या, अभी मैं आप लोगों के साथ यह सब शेयर करना ही चाह रहा था कि मुझे याहू, आंसर्ज़ से एक मेल आया कि हम आप का एक जवाब डिलीट कर रहे हैं जिस का कारण यह दिया गया कि आप की भाषा गलत है (यानि हिंदी है। )......सो, मुझे बहुत दुख हुया । सोचा, आप से यह सब तो बाद में शेयर करूंगा.....लेकिन मैं उस के बाद अंग्रेज़ी में ही जवाब देता गया । वैसे यह याहू आंसर्ज़ का अनुभव है बड़ा रोमांचक। आप सब भी इस में कूद पढ़िये।

लेकिन असली बात बतानी तो मैं भूल ही गया कि आज मैं बहुत खुश हूं .....कारण ? .......वैसे कारण कोई इतना महान भी नहीं है....बस इतना सा कारण है कि आज याहू, आंसर्ज़ वालों ने इस नाचीज़ के नाम पर टॉप-कंटरीब्यूटर ( top contributor) की मोहर लगा दी है।

Thursday, June 26, 2008

नफ़रत है मुझे इस दादागिरी से....

पिछले कुछ दिनों से यह जो हम जगह जगह देख रहे हैं कि रेलें बीच रास्ते में ही रोकी जा रहूी हैं, क्या आप को नहीं लगता कि यह एक दादागिरी आखिर कब खत्म होगी। आज भी अखबार में देखा कि लोगों नें पत्थर लाईनों पर रखे हुये हैं और उन पर बैठ कर रेलें रोके हुये हैं।

जितनी मेरी समझ है...उस के अनुसार तो यही सोचता हूं कि इस तरह के प्रदर्शनकारियों की जब कोई मांग मान ली जाती है तो इस से सारे देश के लोगों को एक बिलकुल गलत सिगनल मिलता है। मैं नहीं जानता किसी भी मांग को .....वह कुछ भी हो, किसी भी जाति की हो, किसी भी संप्रदाय की हो, किसी भी स्टेटस वाले बंदे की हो.......यह जो रेलें रोक कर रखने वाला चक्कर है ना,......यह बेहद आपत्तिजनक है, इस से तो यही लगता है कि सारे देश ने इन आंदोलनकारियों के आगे अपने घुटने टेक दिये हैं। पंजाबी में कहूं तो यही लगता है कि असीं तां ऐन्नां अग्गे कोडे हो गये।

जब कोई भी समूह ये रेलें रोकते हैं तो वे यह क्यों भूल जाते हैं कि इसी रेल में कोई बालक अपनी परीक्षा देने जा रहा है जिस का वह बरसों से इंतज़ार कर रहा है, किसी की बच्ची अपनी नौकरी की इंटरव्यू के लिये जा रही है जिस में  वह पहले छः बार फेल हो चुकी है, कोई आदमी अपनी बूढ़ी मां को इलाज के लिये शहर के बड़े हास्पीटल ले जा रहा है, कोई अपनी बाप के मरने पर उस के दर्शन के लिये दौड़ा जा रहा है....उस का दाह-संस्कार उस के आने की इंतज़ार कर रहा है कि किसी तरह वह सूर्यास्त होने से पहले अपने गांव पहुंच जाये।

लेकिन इन आंदोलनकारियों को इन से क्या मतलब........सोचता हूं कि यह तो बर्बरता है, कितनी कठोरता है, बस मेरे पास इस तरह के आंदोलनों के विरोध में बोलने के लिये शब्द नहीं मिल रहे हैं। मैं इस झमेले में तो बिलकुल पड़ ही नहीं रहा हूं कि डिमांड वाजिब है कि नहीं है.....एक प्रजातंत्र देश में इसे जांचना का एक बढ़िया सिस्टम है।

सोच रहा हूं कि अगर इन रेल रोको आँदोलनकारियों को तुरंत ही न रोका गया तो वह समझ दूर नहीं जब ये आंदोलनकारी किसी गांव में इन गाड़ियों को रोके रखेंगे और इसी दौरान चोर-डाकू इन पर डाके डालेंगे, इस देश की बहन-बेटियों की आबरू से खेलेंगे और फिर क्या पता आने वाले समय में इन खड़ी हुई गाड़ियों के स्थान पर धर्म,संप्रदाय, जाति, श्रेणी के नाम पर कत्लो-गैरत ही हो जाये .............इसलिेये कुछ भी हो इन आंदोलनकारियों को तुरंत रोकना ही होगा।

वैसे भी अभी तो हम गाड़ियों से धक्का देकर नीचे गिरा देने वाली घटनाओं को याद करते हैं तो कांप उठते हैं। आज़ाद भारत में इस तरह से किसी भी तरह से विद्रोह को प्रगट करने का यह ढंग बेहद बेहूदा है.......आम सीधी सादी निर्दोष जनता पर अत्याचार है.......आम आदमी कभी भी इस तरह के प्रदर्शनकारियों के साथ नहीं होता।

सोचिये कि अगर किसी बंदे के पास उतने ही पैसे थे जितने का उस ने रेल टिक्ट खरीद लिया( मेरे साथ ही बहुत बार ऐसा हो चुका है, आज नेट पर बैठ कर प्रवचन करने लग गया हूं तो क्या !!)......तो जब किसी सुनसान जगह पर उस की ट्रेन रोक दी जाती है तो वह किस की अम्मा को अपनी मौसी बोलेगा, किस पेड़ से अपनी सिर टकरायेगा कि उस की ही किस्मत ऐसी क्यों है या फिर कटोरा पकड कर भीख मांगने पर वह मजबूर हो जायेगा।

Tuesday, June 17, 2008

अब हो पायेगी डायबिटीज़ की और भी कारगर स्क्रीनिंग एवं डायग्नोसिस..


हम ने अपने बचपन के दौरान यह सुना कि मोहल्ले की तारा मौसी को शूगर हो गई है.....लेकिन इस का पता कैसे चला ?......हुया यूं कि जिस जगह भी तारा मौसी पेशाब करती थी, कुछ समय बाद उस जगह पर मकौड़े आ जाते थे। बस, काफी लोगों की शूगर की डॉयग्नोसिस कुछ इसी ढंग से ही हुआ करती थी.....यह पेशाब पर मकौड़ा टैस्ट तो एक किस्म का कन्फर्मेटरी टैस्ट ही माना जाता था।

लेकिन इस टैस्ट पर निर्भर करने की भी कितनी खतरनाक हानियां होती होंगी ....यह तो आप के सामने ही है। जब तक शूगर के रोगी को ढूंढने के लिये यह देसी टैस्ट अपना काम करता था, तब तक अकसर शूगर रोग के मरीज़ में यह बड़ी हुई शूगर की वजह से शरीर के कईं अंग( गुर्दे, हृदय, आंखें इत्यादि) क्षतिग्रस्त हो जाया करते थे। लेकिन जो भी हो कभी कभार अगर किसी सज्जन-मित्र के पेशाब पर मकौड़ा दिख जाता था तो उस की हालत पतली हो जाती थी।

एक बात और यहां होनी ज़रूरी है कि आज के समय में भी हम लोगों के पास ऐसे कईं मरीज आते हैं जिन से जब शूगर रोग की हिस्ट्री पूछी जाती है तो वे अकसर कह देते हैं कि शूगर है तो, लेकिन बिलकुल थोड़ी ही है और वह भी केवल रक्त में ही है.......इसलिये, वह आगे कहते हैं, कि मैंने कभी दवाई नहीं ली...बस परहेज ही कर रहे हैं। ऐसी सोच बेहद हानिकारक है....कि शूगर का स्तर अगर ब्लड ही में है तो कोई बात नहीं। यह समझ लेना कि जब तक शूगर पेशाब में नहीं आ जाती ...तब तक किसी डाक्टर के पास जाने की जरूरत ही नहीं है.......यह बिलकुल गलत धारणा है। अब प्रश्न पैदा होता है कि पेशाब में शूगर कब आने लगती है.....इस के लिये यह जानना ज़रूरी है कि शूगर के पेशाब में आने के लिये उस को Renal threshold (रीनल थ्रैशहोल्ड) को पार करना होता है...और यह लक्ष्मण-रेखा है 180मि.ग्राम परसेंट ....कहने का मतलब यह कि जब रक्त में शूगर का स्तर यहां तक पहुंच जाता है( 100ml में 180mg.शूगर) तो इस के ऊपर हमारे गुर्दे इस को नहीं झेल पाते हैं और शक्कर पेशाब के साथ शरीर से बाहर आने लगती है।

ऐसा तो आप जानते ही हैं कि उस जमाने में शूगर की स्क्रीनिंग वाली बात इतनी आम नहीं थी ( अब कौन सा यह सब कुछ इतना आम हो गया है!!)। अकसर मकौड़े दिखने पर ही लोग पेशाब में शक्कर की लैबोरेटरी जांच करवाया करते थे। फिर धीरे धीरे लोग शुगर की स्क्रीनिंग के लिये रक्त की जांच करवाने लगे....खाली पेट और फिर खाना खाने के बाद। अब मैडीकल कम्यूनिटी ने यह सिफारिश की है कि शूगर रोग की स्क्रीनिंग के लिये भी ग्लाइकोसेटेज हीमोग्लोबिन( glycosated haemoglobin...Haemoglobin A1c….HbA1c) टैस्ट करवाया जाए।

जर्नल ऑफ क्लीनिकल ऐंडोक्राईनॉलाजी एवं मैटाबॉलिज़म में छपने वाले एक लेख अनुसार चोटि के डाक्टरों के एक एक्सपर्ट पैनल ने यह रिक्मैंड किया है कि मरीज के रक्त से किया जाने वाला ग्लाईकोसेटेज हीमोग्लोबिन टैस्ट जिसे शूगर के मरीजों में इस लिये किया जाता है कि पिछले तीन महीने के दौरान उन के रक्त में शूगर के कंट्रोल का पूरा नक्शा इलाज करने वाले डाक्टर के पास उपलब्ध हो जाए, अब इसी टैस्ट को शूगर के मरीजों की स्क्रीनिंग एवं डॉयग्नोसिस के लिये भी इस्तेमाल किया जाना चाहिये।

शूगर की मौजूदा स्क्रीनिंग के द्वारा डाक्टरों को कईं बार शूगर की डायग्नोसिस में दिक्कत आती है और इस की टैस्टिंग के लिये मरीज़ों को खाली पेट भी रहना पड़ता है। मौजूदा हालात में कुछ हद तक तो डायग्नोसिस में दिक्कत आने की वजह से ही कईं मरीज़ों का बहुत कीमती समय नष्ट हो जाता है और उन के शरीर में शूगर से संबंधित जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं।

आप को जान कर बहुत हैरानी होगी कि जॉन हॉपकिंज़ इंस्टीच्यूट ऑफ मैडीसन के मैडीकल विशेषज्ञों के अनुमान अनुसार अभी भी अमेरिका में शूगर के 30प्रतिशत मरीज ( 62लाख लोग) ऐसे हैं जिन में शूगर रोग का डायग्नोसिस ही नहीं हो पाया है। मैं भी यह पढ़ कर इस लिये चौंक गया था कि अगर अमेरिका जैसे देश का यह हाल है तो अपने यहां की बात ही क्या करें !!

मैडीकल एक्सपर्ज़ के अनुसार इस टैस्ट ...ग्लाइकोसेटेड हिमोग्लोबिन...HbA1c...को शूगर रोग की स्क्रीनिंग के लिये इस्तेमाल किये जाने के फायदे ये हैं कि एक तो मरीज को टैस्ट करवाने के लिये खाली पेट रहने की ज़हमत नहीं उठानी पड़ती और दूसरा यह कि यह टैस्ट पूरी तरह स्टैंडर्डाइज़ हो चुका है। इसलिये डाक्टरों के इस ग्रुप ने सलाह दी है कि जब कोई व्यक्ति यह टैस्ट करवाये और अगर इस का स्तर रिपोर्ट में 6.5 प्रतिशत या उस से ज़्यादा आये तो फिर भी शूगर रोग की डायग्नोसिस को कंफर्म करने के लिये ब्लड-शूगर की जांच करवानी भी ज़रूरी है।

जाते जाते यह ध्यान आ रहा है कि कहां से चले थे....बाथ-रूम में किसी बंदे के यूरिन पर चलने वाले मकौड़े से और अब हम लोग पहुंच गये हैं ऐसे टैस्ट पर...glycosated haemoglobin…. जो शूगर रोग के डायग्नोसिस के साथ साथ इस बात का भी खुलासा कर देता है कि पिछले तीन महीनों के दौरान किसी शूगर के मरीज में ब्लड-शूगर का कंट्रोल कैसा रहा है। इसलिये भी चिकित्सक की सलाह अनुसार किसी भी शूगर के मरीज को इस टैस्ट ....Glycosated haemoglobin….HbA1c …को भी नियमित तौर पर करवा कर के अपने ब्लड-शूगर के कंट्रोल पर नज़र रखनी बहुत ज़रूरी है।

वैसे यह टैस्ट कोई खास महंगा भी नहीं है....मेरे ख्याल में दो-तीन सौ रूपये में हो जाता है और इस के लिये मरीज के रक्त का सैंपल चाहिये होता है।

Friday, June 13, 2008

हरिद्वार में ककड़ी खाने से दो भाई मरे, अमेरिका ने लगाई टमाटर पर रोक..


कुछ दिन पहले हरिद्वार में दो भाईयों ने खेत से तोड़ कर ककड़ी क्या खाई, अपनी मौत को बुलावा दे दिया। उस के कुछ ही समय बाद उन की हालत इतनी बिगड़ गई कि एक भाई ने तो हस्पताल जाते जाते ही दम तोड़ दिया और कुछ समय बाद दूसरे की भी मृत्यु हो गई। कारण यह बताया जा रहा है कि जिन ककड़ीयों को इन भाईयों ने खेत से तोड़ कर खाया था उन पर कुछ समय पहले ही ज़हरीले कीटनाशक का स्प्रे किया गया था।

इस से एक बात फिर से उजागर हो गई है कि हम लोग खा क्या रहे हैं। यह तो अब हम सब लोग जान ही गये हैं कि हमारे यहां इन खतरनाक एवं प्रतिबंधित कीटनाशकों का भी जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है। रिपोर्टज़ यह भी हैं कि ये जो हमें सब्जियां-फल बड़े ताज़े ताज़े से रेहड़ीयों इत्यादि पर करीने से सजे हुये दिखते हैं इन पर भी कईं तरह के रासायनों का स्प्रे कर के इन्हें इतना फ्रेश दिखाया जाता है और ये रासायन बहुत हानिकारक होते हैं।

मैं जब भी खेतों में फसलों पर मजदूरों के द्वारा स्प्रे किया जाता देखता हूं तो अकसर उन के स्वास्थ्य के बारे में सोचता हूं कि वे किस तरह बिना किसी तरह की जानकारी के , बिना किसी तरह के सेफ्टी-गियर के...यहां तक कि बिना अपना मुंह एवं नाक ढके हुये.....इस तरह का काम करते रहते हैं। लेकिन कल ही मेरी नज़र एक रिपोर्ट पर पढ़ी है जिस में बताया गया है कि अमेरिका की शीर्ष हैल्थ एजेंसी ने यह बात कही है कि ऐसी लाईसैंसधारी पैस्टीसाइड स्प्रे करने वालों में जिन्होंने अपने जीवनकाल में एक-सौ दिन से ज़्यादा इन पैस्टीसाइडों को स्प्रे करना का काम किया है, उन में डायबिटीज़ रोग होने का खतरा 20 से 200 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।

Licensed pesticide applicators who used chlorinated pesticides on more than 100 days in their lifetime were at greater risk of diabetes, according to researchers from the National Institutes of Health (NIH). The associations between specific pesticides and incident diabetes ranged from a 20 percent to a 200 percent increase in risk, said the scientists with the NIH's National Institute of Environmental Health Sciences (NIEHS) and the National Cancer Institute (NCI).

दो-चार दिन पहले पता चला कि अमेरिका के हैल्थ-विभाग की ओर से वहां के नागरिकों को कुछ तरह के टमाटरों का इस्तेमाल न करने की सलाह दी गई है। इस का कारण यह है कि उन के हैल्थ विभाग ने पता लगाया है कि कुछ इंफैक्टेड किस्म के टमाटरों की वजह से वहां कुछ लोगों को सालमोनैला इंफैक्शन ( salmonella infection) हो गई । यह इंफैक्शन एक बैक्टीरिया सालमोनैला की वजह से होती है जिस में दस्त लग जाते हैं जिन के साथ खून भी आने लगता है। वहां पर तो पब्लिक को इस बात के बारे में भी सचेत किया गया है कि वे जिन टमाटरों का इस्तेमाल कर रहे हैं उन के बारे में स्टोर से इस के बारे में भी पूरी जानकारी लें कि वे किस क्षेत्र की पैदावार हैं। फिर उन्होंने अपने नागरिकों को इस बारे में भी सचेत किया है कि टमाटर की कौन कौन सी किस्में इस साल्मोनैला इंफैक्शन से रहित हैं और इन का प्रयोग किया जा सकता है।


हम कहां खड़े हैं...........इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे देश में हर समय इन दस्तों, पेचिशों, एवं खूनी दस्तों के मरीज़ तैयार मिलते हैं, लेकिन कभी किसी तरह का कारण पता करने की कोशिश ही कहां की जाती हैं। कितने लोग हैं जो मल का टैस्ट करवाते हैं या करवा पाते हैं......कोई समझता है यह किसी शादी बियाह में खाने से हो गया, कोई कहता है कि यह गर्मी के मिजाज की वजह से है, कोई सोचता है कि इस का कारण यह है कि उसे रात में दही पचता नहीं है, कोई सोचता है कि तरबूज, खरबूजा खाने के बाद पानी लेने से ये दस्त हो गये हैं............बस, किसी तरह के कारण की गहराई में जाने की न तो कोशिश ही की जाती है ...............वैसे, हमारे यहां की समस्यायें हैं भी तो कितनी कंपलैक्स कि किसी पेचिश के मरीज को साफ-स्वच्छ पानी पीने का मशविरा देते हुये भी लगता है कि उससे मज़ाक सा ही किया जा रहा है..........कितने दिन पी लेगा वो उबला हुया पानी !!


अब आते हैं इस बात की तरफ़ की इस से आखिर हमें सीख क्या मिलती है............सीख यही है कि दोस्तो कितना भी कह लें, खाना तो यही सब कुछ ही हम ने है....लेकिन अगर कुछ थोड़ी बहुत जन-जागरूकता कम से कम इस बारे में हो जाये कि बिना अच्छी तरह धोये हुये कोई सब्जी-फल का सेवन तो एक इंस्टैंट ज़हर है ............लेकिन फिर भी रोज़ाना कितनी सी कीटनाशकों से लैस सब्जियों वगैरह का सेवन हम लोग करते हैं.....चाहे कितनी भी अच्छी तरह से धुल चुकी हों लेकिन उस से भी वे स्लो-प्वाईज़न जैसा असर तो रखती ही हैं। लेकिन इन के खाये बिना कोई चारा भी तो नहीं है। और अगर आप कहते हैं कि ऑगैनिक हो जाएं, तो दोस्तो यह तो आप को भी पता है कि यह कितने लोगों के बस की बात है !!

इन्हीं कीटनाशकों की वजह से मैंने भी पिछले दो-वर्ष से आम को चूस कर खाना बिलकुल बंद कर दिया है। हुया यूं कि दो साल पहले कईं बार ऐसा हो गया कि जब मैं आम को चूसता और बाद में उस की गुठली को निकालने के लिये उस का छिलका छीलता तो हैरान हो जाता कि बाहर से इतना बढ़िया दिखने वाला आम अंदर से इतना सड़ा-गला और कीड़े लगा हुआ....... और ऐसा बहुत बार हुआ.............बस, तब से इतनी नफ़रत हो गई है कि अब तो आम की फाड़ी काट कर उसे चम्मच से ही खाना ठीक लगता है.....कोशिश यही रहती है कि जहां तक हो सके आम के छिलके को मुंह ना ही लगाना पड़े।

कहीं ऐसा तो नहीं कि इस समय आप आम खा रहे हों और मैंने आप का मजा किरकिरा कर दिया हो...........खाइये, खाइये....इस गर्मी के मौसम में आनंद लूटिये।

Tuesday, June 10, 2008

महिलाओं को इस तरह के विषयों पर आपस में बात करते रहना चाहिये...भाग2

गर्भाशय के कैंसर से बचाव का इंजैक्शन....
कल मैंने एच.पी.व्ही इंफैक्शन की बात की थी....यह समझना बेहद ज़रूरी है कि इस इंफैक्शन का गर्भाशय के मुख (cervix of uterus) के कैंसर में सीधा रोल है। एच.पी.व्ही का पूरा नाम है....ह्यूमन पैपीलोमा वॉयरस ( Human papilloma-virus).
शायद आप को भी यह सोच कर थोड़ा अजीब सा लग तो रहा होगा कि क्या वॉयरस से भी कैंसर होते हैं ....लेकिन मैडीकल वैज्ञानिकों ने इस को प्रमाणित कर दिया है। अब जब हम यहां महिलाओं के गर्भाशय के मुख पर होने वाले कैंसर की बात कर रहे हैं तो इस के बारे में यह जान लेना ज़रूरी है कि इस के लिये इसी एच.पी.व्ही इंफैक्शन को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
महिलाओं के इस गर्भाशय के मुख के कैंसर के बारे में यह भी जानना ज़रूरी है कि हर वर्ष हज़ारों महिलाओं की जान ले लेने वाले इस कैंसर के भारत में सब से ज़्यादा केस पाये जाते हैं। महिलाओं में जितने भी कैंसर के केस होते हैं उन में से 24प्रतिशत केस इसी गर्भाशय के कैंसर के होते हैं और 20 प्रतिशत केस स्तन-कैंसर के होते हैं। भारत में एक लाख तीन हज़ार से भी ज़्यादा नये केस हर वर्ष डिटेक्ट होते हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमान के अनुसार हर वर्ष यह बीमारी भारत में 74000महिलाओं की जानें लील लेती है।
अब खबर यही है कि इस एच.पी.व्ही इंफैक्शन से बचाव का भी इंजैक्शन आ गया है। इस ह्यूमन पैपीलोमा वॉयरस की भी कईं किस्में होती हैं ...और इन में से दो किस्में ऐसी होती हैं जिन्हें गर्भाशय के कैंसर के 70प्रतिशत केसों के लिये जिम्मेदार माना जाता है.....तो, बहुत बड़ी खुशखबरी यही है कि इन एच.पी.व्ही की दोनों किस्मों से बचाव के लिये यह इंजैक्शन शत-प्रतिशत कारगर है।
अमेरिका की सरकारी फूड एवं ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन एजेंसी ने इस इंजैक्शन के 9 से 26 वर्ष की लड़कियों एवं युवा महिलाओं में इस्तेमाल की अनुमति दे दी है। यूरोप में भी यह इंजैक्शन चल रहा है। लेकिन भारत में अभी यह उपलब्ध नहीं है....वैसे तो यह अभी अच्छा-खासा महंगा भी है लेकिन महिलाओं को इतने भयानक एवं दर्दनाक जानलेवा रोग से बचाने के लिये शायद इस का मोल इस के इस्तेमाल के रास्ते में नहीं आयेगा।
वैसे अभी तो इंडियन काउंसिल ऑफ मैडीकल रिसर्च कुछ ही दिनों में इस इंजैक्शन के लिये एक क्लीनिकल ट्रायल शुरू करने जा रही है ...जो तीन वर्ष तक चलेगा और इस इंजैक्शन की भारतीय महिलाओं में सफलता सिद्ध होने के बाद ही इसे भारत में शुरू किया जायेगा।
इस नये वैक्सीन के बारे में यह बात भी बहुत ध्यान देने योग्य है कि यह वैक्सीन लड़कियों की एवं युवा महिलाओं की तो एच.पी.व्ही इंफैक्शन से रक्षा करता है लेकिन बड़ी उम्र की उन महिलाओं में जिन में पहले ही से एच.पी.व्ही इंफैक्शन मौजूद है उन में इस इंजैक्शन का कोई प्रभाव नहीं है।
एक बात और भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि जिन महिलाओं को ये कैंसर से बचाव के ये इंजैक्शन दिये गये हैं ...उन को भी कैंसर के लिये नियमित जांच( cervical cancer screening) करवानी आवश्यक है।
गर्भाशय के कैंसर की स्क्रीनिंग से ध्यान आ रहा है कि विकसित देशों में इसी स्क्रीनिंग की वजह से ही इस के केसों में भारी कटौती संभव हो पायी है। लेकिन भारत में इस के केस बढ़ रहे हैं.....और अफसोस तो इसी बात का है कि इस तरह के कैंसर को इतनी आसानी से रोका जा सकता है, इस से बचा जा सकता है। इसी स्क्रीनिंग के लिये ही एक टैस्ट है ....पैप स्मीयिर( PAP Smear)…..यह बहुत ही सिंपल सा टैस्ट है जिस में बहुत ही आसानी से बिना किसी दर्द आदि के एक स्लाईड के ऊपर महिला के गर्भाशय से लिये कोशिकाओं की लैब में जांच की जाती है।( स्लाईड तैयार करने का काम स्त्री-रोग विशेषज्ञ द्वारा ही किया जाता है) । इस पैप-स्मीयर टैस्ट की वजह से बहुत सी जानें बच पाई हैं। लेकिन हमारे देश में आमतौर पर महिलाओं को आसानी से उपलब्ध नहीं है। और जहां है भी, वहां पर महिलायें अज्ञानता वश इसे करवाती नहीं हैं कि हमें क्या हुआ है, हम भली-चंगी तो हैं, ......लेकिन इस टैस्ट को बिना किसी तकलीफ़ के भी अपनी उम्र के अनुसार अपनी स्त्री-रोग विशेषज्ञ की सलाह अनुसार अवश्य करवाना चाहिये।
तो, कहने का भाव है कि गर्भाशय के कैंसर से बचाव के लिये इस्तेमाल किये जाने वाली इंजैक्शन की बातें तो हम ने कर लीं लेकिन हमारे यहां तो अभी तक महिलाओं में इस बीमारी के लिये रूटीन स्क्रीनिंग ( स्त्री-रोग विशेषज्ञ द्वारा नियमित परीक्षण, पैप-स्मीयर टैस्ट आदि) तक की जागरूकता नहीं है तो ऐसे में बिना नियमित स्क्रीनिंग के इस टीके का प्रभाव कितना कारगर होगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। वैसे भी इस समय ज़रूरत इस बात की है कि गर्भाशय कैंसर के लिये रूटीन स्क्रीनिंग को कैसे सब महिलाओं तक ...उन की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को बिल्कुल भी कंसिडर न करते हुये.......पहुंचाया जाये।
जाते जाते यही ध्यान आ रहा है कि महिलाओं के अधिकारों का महिलाओं के इस गर्भाशय के कैंसर से सीधा संबंध है। भारत में लड़कियां छोटी उम्र में ब्याह दी जाती हैं, बार-बार वे गर्भावस्था से गुज़रती हैं ...और इन का अपने पति की यौन-आदतों के ऊपर किसी भी तरह का बिल्कुल कंट्रोल होता नहीं है......इन सब की वजह से महिला की अपनी रिप्रोडक्टिव हैल्थ खतरे में पड़ जाती है।
इतना लिखने के बाद ध्यान आ रहा है कि इस एच.पी.व्ही इंफैक्शन से होने वाले गर्भाशय के कैंसर के बारे में इतनी बातें हो गईं .....लेकिन एच.पी.व्ही इंफैक्शन के बारे में कुछ अहम् बातें करनी अभी शेष हैं......ये चर्चा कल करेंगे कि यह इंफैक्शन महिलाओं में अकसर आती कहां से है।

Monday, June 9, 2008

महिलायों को इन विषयों के बारे में आपस में बात करनी चाहिये....भाग..1.

पिछले कुछ अरसे से महिलायों के गर्भाशय के मुख के कैंसर से बचाव के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले टीके की बातें चल रही हैं। एक मैडीकल-राइटर होने के नाते मैंने कुछ महीने पहले एक महिला-चिकित्सक से इस एचपीव्ही इंफैक्शन के बारे में बात करनी चाही.....कि नेट पर तो इस इंफैक्शन की जानकारी की भरमार है, लेकिन अपने यहां के आंकड़े क्या कहते हैं । तो मुझे जो जवाब मिला वह बिल्कुल भी संतोषजनक ना था, मैं आज भी यह सोच कर हैरान हूं कि उस स्त्री-रोग विशेषज्ञ ने मुझे यह क्यों कहा कि यह समस्या तो बाहर के देशों की ज़्यादा है।

इसलिये सोच रहा हूं कि आज दो-चार बातें अपनी जानकारी के आधार पर महिलायों के स्वास्थ्य के बारे में विशेषकर महिलायों में होने वाले कैंसर के बारे में ही करते हैं। अकसर विभिन्न कारणों की वजह से हमारे देश की महिलायें अपने शरीर की देखभाल पूरी तरह से कर नहीं पाती हैं। उन का तो किसी चिकित्सक के पास जाने का फैसला भी ज्यादातर उन के पति की इच्छा के मुताबिक ही होता है।
स्तन कैंसर के रोग के बारे में भी इतनी जागरूकता है नहीं। कोई प्रिवैंटिव प्रोटोकॉल फॉलो नहीं किया जाता। बाहर के देशों में तो महिलायें जैसे ही 35 वर्ष की होती हैं वे महिला-रोग विशेषज्ञ से मिल कर अपनी नियमित जांच करवाती रहती हैं......क्लीनिकल चैक-अप के साथ-साथ वे अपनी मैमोग्राफी भी नियमित तौर पर चिकित्सक की सलाह के अनुसार करवाती रहती हैं।

मैमोग्राफी एक तरह का एक्स-रे ही है जिस के करवाने से महिलाओं के स्तन में आने वाले बारीक से बारीक बदलाव को प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़ा जा सकता है। वैसे तो बाहर के देशों में और अब तो हमारे देश में भी महिलायें इसे करवाने लगी हैं.....लेकिन फिर भी हमारे यहां तो अभी भी यह स्तन में कोई तकलीफ़ होने पर ही करवाया जाता है। तो, यहां ज़रूरत है इस मैमोग्राफी तकनीक को पापुलर करने की। यह लगभग सात-आठ सौ रूपये में हो जाता है....कीमत विभिन्न जगहों पर अलग हो सकती है। आम तौर पर जिन सैंटरों में सीटी-स्कैन आदि की मशीन होती है वहां इस की भी सुविधा होती ही है। बाहर के देशों में स्त्रियां इस के बारे में बेहद चेतन हैं। इसलिये हमारे देश की महिलायों को भी अपने चिकित्सक की सलाह से इसे अवश्य करवा लेना चाहिये।....करवा क्या लेना चाहिये बल्कि नियमित करवाना चाहिये...जहां तक मुझे ध्यान है एक तो बेस-लाइन मैमोग्राफी 35 साल की उम्र में होनी चाहिये और उस के पांच –पांच साल के बाद इसे रिपीट किया जाना जरूरी होता है। इस की विस्तृत जानकारी एवं शैड्यूल आप को अपनी महिला रोग विशेषज्ञ से मिल जायेगा। उस के बाद एक उम्र के बाद तो इस मैमोग्राफी को हर साल के बाद रिपीट करने की हिदायत दी जाती है। यह बेहद लाज़मी है....क्योंकि अकसर देखा गया है कि हमारे देश में जब तक स्तन में किसी तरह की गांठ वांठ के लिये अपने चिकित्सक से मिलती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिये इस मैमोग्राफी की मदद से छोटे से छोटे बदलाव को बहुत सी आसानी से पकड़ कर किसी तरफ भी फैलने से पहले ही उसे काबू कर लिया जाता है।

वैसे तो स्त्री –रोग चिकित्सक महिलायों को अपने वक्ष-स्थल की स्वयं-जांच के लिये भी बताती ही रहती हैं....महिलाओं को इस का पालन भी करना चाहिये....और कुछ दिन पहले से कहीं पर पढ़ा है कि इस स्वयं-जांच का एक चार्ट सा जो अपने चिकित्सक से मिले उसे उन्हें अपने कपड़ों की अलमारी में चिपका लेना चाहिये....ताकि एक तो उस के अनुसार ही वे अपने वक्ष-स्थल की स्वयं जांच करती रहें और दूसरा यह कि यह चार्ट उन को यह काम करने की याद भी दिलाता रहेगा।

एक बात और जो बहुत ही ज़रूरी है कि वैसे तो बिना किसी तकलीफ़ के भी अपनी मैमोग्राफी करवानी बहुत ज़रूरी है लेकिन एक बात तो बहुत बहुत ही ज़रूरी है कि जिन महिलायों के परिवार में किसी नज़दीकी रिश्तेदार को स्तन-कैंसर की बीमारी हो चुकी है जैसे कि किसी की मां,बहन, नानी, मौसी .....ऐसे में इन महिलायों को तो अपनी नियमित जांच करवानी और भी बहुत महत्वपूर्ण है।

इस जानकारी को हिंदी में ब्लाग पर डालने के बारे में मैंने बहुत सोचा....लेकिन मुझे यह पोस्ट लिखने के लिये मज़बूर होना ही पड़ा। उसका पहला कारण तो यह कि पोस्ट पढ़ने वाले काफी पुरूष भी हैं और देश में महिलाओं के स्वास्थ्य की विडंबना भी यही है कि उस के शरीर से संबंधित फैसले अभी भी पुरूषों के हाथ ही में हैं। और, दूसरा यह कि जो महिला ब्लागर हैं ....मैं समझता हूं ये सब बेहद प्रबुद्ध महिलायें हैं जो अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं जिन्हें इस तरह की जानकारी पहले ही से होगी ....तो इन सभी बहनों से मेरी गुज़ारिश यही है कि अपने ग्रुप में .......अपनी घर काम करने वाली बाई से शुरू कर के , अपनी किट्टी पार्टी की सदस्याओं एवं अपने कार्य-क्षेत्र के इंफार्मल ग्रुप में इस तरह की चर्चायें किया जायें ....................क्योंकि यह आप के अपने स्वास्थ्य का प्रश्न है................आरक्षण बिल का तो हमें अभी पता नहीं क्या होगा, लेकिन बहनो, अभी अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी तो थामो।( यह सब कहना जितना आसान है , काश ! यह सब प्रैक्टीकल लाइफ में भी इतना ही आसान होता !!)…………फिर भी , .......Try to take control of your life from this moment onwards……….afterall it is the question of your well-being……….which is so very important for the well-being of your kids …..not only kids, but your whole family………even extended family !!
Wish all of you pink of health and spirits !!

कल दूसरे भाग में महिलायों के गर्भाशय के मुख के कैंसर के बारे में कुछ अहम् बातें करूंगा।

Friday, June 6, 2008

जब दांतों में खाना फंसने से आप परेशान होने लगें...


दांतों में खाना फंसना एक बहुत ही आम समस्या है। लेकिन इस विषय पर कुछ विशेष बातें करने से पहले चलिये यह तो समझ लें कि प्रकृति ने हमारे दांतों, जिह्वा, गालों की संरचना एवं कार्य-प्रणाली ऐसी बनाई है कि दांतों के बीच सामान्यतः कुछ भी खाद्य पदार्थ फंस ही नहीं सकता। जिह्वा एवं गालों के लगातार दांतों पर होने वाले घर्षण से हमारे दांतों की सफाई होती रहती है। अगर कभी-कभार कुछ फंस भी जाता है तो वह कुल्ला करने मात्र से ही निकल जाता है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति के किसी विशेष दांत अथवा दांतों में ही खाना फंस रहा है तो समझ लीजिये की कहीं न कहीं तो गड़बड़ है जिस के लिये आप को दंत-चिकित्सक से अवश्य परामर्श करना होगा।

आम तौर पर देखा गया है कि बहुत से लोग ऐसे ही टुथ-पिक या दिया-सिलाई की तीली से फंसे हुये पदार्थों को कुरेदते रहते हैं। यह तो भई समस्या का समाधान कदापि नहीं है। इस से तो कोमल मसूड़े बार बार आहत होते रहते हैं। इसलिये टुथ-पिक के इस्तेमाल की तो हम लोग कभी भी सलाह नहीं देते हैं.....इसे नोट किया जाए। कुछ लोग अपने आप ही इस समस्या से समाधान हेतु इंटर-डैंटल ब्रुश ( अर्थात् दो दांतों के बीच में इस्तेमाल किया जाने वाला ब्रुश) को यूज़ करना शुरू कर देते हैं । लेकिन एक बात विशेष तौर पर काबिले-गौर है कि दांतों में खाद्य-पदार्थों के फंसने की समस्या का अपने ही तरीके से समाधान ढूंढने का सीधा-सीधा मतलब है ......दंत-रोगों को बढ़ावा देना।

अब ज़रा हम दांतों में खाना फंसने के आम कारणों पर एक नज़र डालेंगे....

दंत-छिद्र ( दांतों में कैविटीज़)

मसूड़ों की सूजन ( पायरिया रोग)

मसूड़ों की सर्जरी के बाद

दंत-छिद्रों और पायरिया का समुचित उपचार होने के पश्चात् इस समस्या का समाधान संभव है। जहां तक मसूड़ों की सर्जरी के बाद दांतों में फंसने की बात है, यह आम तौर पर कुछ ही सप्ताह में ठीक हो जाता है क्योंकि थोड़े दिनों में मसूड़े एवं उस के साथ लगे उत्तक अपनी सही जगह ले लेते हैं।

कईं बार ऐसे मरीज़ मिलते हैं जिन के दांतों में स्वाभाविक तौर पर ही काफी जगह होती है और उन में कभी कभार थोड़ा खाना अटकता तो है....लेकिन केवल कुल्ला करने मात्र से ही सब फंसा हुया निकल जायेगा।

ध्यान में रखने लायक कुछ विशेष बातें.....

कुछ ऐसे लोग अकसर दिखते हैं जो एक छ्ल्ले-नुमा आकार में छोटे-छोटे तीन औज़ार हमेशा अपने पास ही रखते हैं...एक दांत खोदने के लिये, दूसरा कान खोदने के लिए और तीसरा नाखून कुरेदने के लिये। ऐसे शौकिया औज़ारों के परिणाम अकसर खतरनाक ही होते हैं।

कईं बार जब कोई मरीज़ दंत-चिकित्सक के पास जा कर किसी दांत में कुछ फंसने ( उदाहरण के तौर पर कोई रेशेदार सब्जी जैसे पालक, साग, बंद-गोभी, मेथी इत्यादि) मात्र से ही दंत-चिकित्सक को यह संकेत मिल जाता है कि इस दांत में या अमुक दो दांतों के बीच कुछ गड़बड़ है। चाहे मरीज को अपने दांत देखने में सब कुछ ठीक ठाक ही लगे, लेकिन उपर्युक्त दंत-चिकित्सा औजारों से उस स्थान पर दंत-छिद्र अथवा मसूड़ों की तकलीफ़ की पुष्टि की जाती है। आवश्यकतानुसार दांतों का एक्स-रे परीक्षण भी कर लिया जाता है।

जहां कहीं भी मुंह में दांतों के बीच या कहीं भी खाना फंसेगा, स्वाभाविक है कि यह वहां पर सड़ने के बाद बदबू तो पैदा करेगा ही और साथ ही साथ आस-पास के दांतों के दंत-क्षय (दांतों की सड़न) से ग्रस्त होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

इसलिये दांतों में खाना फंसने का इलाज स्वयं करने की बजाए दंत-चिकित्सक से समय पर परामर्श लेने में ही बेहतरी है।

Thursday, June 5, 2008

जब भी मुझे यह कमीशन का चांटा लगता है...

यह लेख नहीं है ....मेरी पर्सनल डायरी का 25 अगस्त 2006 को लिखा गया एक पन्ना है...जिसे मैं बिल्कुल बदले बिना यहां डाल रहा हूं.....आशा है आप स्वीकार करेंगे !!

यह जो अखबार वाले अपने लेखकों को उनके लेखों एवं फीचरों के लिये मानदेय भेजते हैं, मुझे यह सब बहुत हास्यास्पद सा लगता है। लेखकों की तकदीर पर बस करूणा आती है। अब मैं अपना ही किस्सा ब्यां करता हूं....मैंने शायद जनवरी 2006 में एक अखबार में मसूड़ों से खून आने के संबंध में एक लेख लिख भेजा था। लगभग पांच-छः महीने बाद उन्होंने मुझे 200 रूपये का एक चैक भेज दिया था( आउट-स्टेशन चैक)...पानीपत से जारी किया हुया।
मेरे पास भी वह चैक एक-डेढ़ महीने तक तो ज्यों का त्यों पड़ा रहा। फिर मैंने कुछ दिन पहले –लगभग 10-15 दिन पहले- अपने जगाधरी के खाते में जमा करवा दिया।

आज जब मैं पास-बुक में एन्ट्री करवाने के लिये गया तो बाबू कह रहा था कि आप का चैक भी पास हो गया है। मैंने कहा...ठीक है। जब मैंने पास-बुक में प्रविष्टियां देखीं तो 60रूपये( साठ रूपये) उन 200रूपयों में से कटे हुये थे। मैंने बाबू से पूछा कि यह 60 रूपये का तमाचा किस लिये ? ….तो वह कहने लगा कि 25 रूपये तो डाक-खर्च और बाकी बैंक की कमीशन !! मैं उस से पूछना चाह रहा था कि देख लो, भाई, कोई और भी कटौती रह गई हो तो हसरत पूरी कर डालो।
गुस्सा तो मुझे बहुत आया और बहुत अजीब सा भी लगा ...क्या,यार, लेखकों की यह हालत !! इन कमीशनों के चक्कर में उन के फाके करवाओगे क्या ? उन से ही काहे की ये....... ............( खेद है, ये शब्द मैं यहां लिखने में असमर्थ हूं क्योंकि उन्हें सैंसर करना पड़ रहा है....कभी मौका मिलेगा तो व्यक्तिगत रूप में इस शब्द का रहस्य उजागर कर दिया जायेगा) .....भई , किसी बंदे को आपने 200 रूपये भेजे हैं तो उस के हाथ में लगे केवल 140 रूपये।

अखबार वाले इस राशि का ड्राफ्ट नहीं भेज रहे क्योंकि शायद उन्हे यह झँझट लग रहा होगा, और शायद इसलिये भी नहीं कि ड्राफ्ट बनाने में पैसे लगते हैं...लेकिन आप एक काम तो कर ही सकते हैं कि उसे मनीआर्डर तो करवा ही सकते हैं । और मनीआर्डर का खर्चा आप उस की राशि से घटा लें, जैसे कि अगर आपने किसी मेरे जैसे स्ट्रगलर लेखक को 200 रूपये भेजने हैं , जिस के मनीआर्डर पर दस रूपये लगने हैं तो आप उसे 190 रूपये मनीआर्डर करवा कर छुट्टी करें, और क्या और ये पैसे उसे अगले दो-तीन दिन में पहुंच भी जायेंगे !! आउटस्टेशन चैक के भुगतान के लिये इतने दिन भी तो लग जाते हैं।

कोई पता नहीं किसी लेखक के द्वारा उस राशि की कितनी शिद्दत से इंतज़ार हो रही होगी !!.......लेकिन बात कहीं ना कहीं संवेदना की है....मानवीय मूल्यों की है...अब अखबार वालों को यह सब कौन समझाए ? कौन डाले बिल्ली के गले में घंटी !!.......इसलिये सब कुछ जस का तस चलता आ रहा है......खूब चल रहा है और माशा-अल्ला आने वाले समय में भी बखूबी चलता ही रहेगा।

Wednesday, June 4, 2008

बच्चों के दांतों को क्यों लेते हैं इतना लाइटली !!

मुझे रोज़ाना अपनी ओपीडी में बैठे बैठे यह प्रश्न बहुत परेशान करता है.......कि आखिर लोग बच्चों के दांतों को इतना लाइटली क्यों लेते हैं। वास्तविकता यह है कि ये दूध के दांत भी कम से कम पक्के दांतों के जितना ही महत्व तो रखते ही हैं....शायद उन से भी ज़्यादा, क्योंकि यह बिल्कुल ठीक कहा जाता है कि ये दूध के दांत तो पक्के दांतों की नींव हैं।

लेकिन मां-बाप यही समझ लेते हैं कि इन दूध के दांतों का क्या है, इन्होंने तो गिरना ही है और पक्के दांतों ने तो आना ही है। इसलिये बच्चों को डैंटिस्ट के पास ले जाने का काहे का झंझट लेना। लेकिन यह बहुत बड़ी गलतफहमी है।

और यह धारणा बच्चे के बिल्कुल छोटे होते ही शुरू हो जाती है। बच्चे के मुंह में दूध की बोतल लगी रहती है और वह सो जाता है जिस की वजह से उस के बहुत से दांतों में कीड़ा लग जाता है......( क्या यह वास्तव में कोई कीड़ा ही होता है , इस की चर्चा किसी दूसरी पोस्ट में करूंगा।) लेकिन फिर भी मां-बाप डैंटिस्ट के पास जाने से बचते रहते हैं।

जब बच्चों के दांत इतने ज़्यादा सड-गल जाते हैं कि वह दर्द की वजह से रात-रात भर मां-बाप को जागरण करने पर मजबूर करता है तो मां-बाप को मजबूरी में डैंटिस्ट के पास जाना ही पड़ता है। लेकिन अकसर बहुत से केसों में मैं रोज़ाना देखता हूं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.....दांत के नीचे फोड़ा( एबसैस) सा बना होता है......और बहुत बार तो इन दूध के दांतों को निकालना ही पड़ता है। अब शायद कईं लोग यह समझ रहे होंगे कि दूध के दांत ही तो हैं....इन्हें तो वैसे भी निकलना ही था....अब अगर डैंटिस्ट को इन्हें निकालना ही पड़ा तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा।
इस का जवाब देने की कोशिश कर रहा हूं ....ठीक है दूध के दांत गिरने हैं....लेकिन मुंह में मौजूद दूध के बीस दांतों के गिरने का अपना एक निश्चित समय है। वह समय कौन सा है ?........वह समय वह है जब उस के नीचे बन रहा पक्का दांत इतना तैयार हो जाता है कि उस के ऊपर आने के प्रैशर से दूध के दांत की जड़ धीरे धीरे घुलनी ( resorption of deciduous teeth) शुरू हो जाती है कि वह दूध का दांत धीरे धीरे इतना हिलना शुरू हो जाता है कि आम तौर पर बच्चा स्वयं ही उसे हिला हिला कर निकाल देता है.....( और हमारी और आप की तरह किसी मिट्टी वगैरा में फैंकने का टोटका कर लेता है !!!)...

यह तो हुया दूध के दांत के दांत का नार्मल गिरना......क्योंकि इस के गिरते ही कुछ दिनों में नीचे से आ रहा पर्मानैंट दांत इस की जगह ले लेता है और सब कुछ नार्मल हो जाता है। यह संतुलन कुदरत ने बेहद नाज़ुक सा बनाया हुया है....लेकिन यह संतुलन बिगड़ता है तब जब हमें बच्चों के दूध के दांतों को उन के नार्मल गिरने के समय से पहले ही निकलवाना पड़ जाता है...जैसा कि आज कल खूब हो रहा है क्योंकि बच्चे किसी के भी कहने में हैं नहीं....एक-एक, दो-दो हैं...इसलिये इन की पूरी दादागिरी है जनाब.......मॉम-डैड को टाइम है नहीं , बस जंक-फूड से, महंगी महंगी आइस-क्रीम से , विदेशी चाकलेटों के माध्यम से ही इन के सामान्य स्वास्थ्य के साथ साथ दांतों की सेहत का भी मलिया मेट किया जा रहा है। और फिर डैंटिस्टों के क्लीनिकों के चक्कर पे चक्कर................

पच्चीस साल डैंटल प्रैक्टिस करते करते यही निष्कर्ष निकाला है इलाज से परहेज भला कहावत दंत-चिकित्सा विज्ञान में बहुत ही अच्छी तरह फिट होती है। क्योंकि ट्रीटमैंट माडल तो बाहर के अमीर मुल्क ही नहीं निभा पाये तो हम लोगों की क्या बिसात है । सरकारी हस्पतालों के डैंटिस्टों के पास वर्क-लोड इतना ज़्यादा है कि क्या कहूं.......सारा दिन अपने काम में गड़े रहने के बावजूद भी ......डैंटिस्ट के मन को ही पता है कि वह मरीज़ों के इलाज के पैरामीटर पर कहां स्टैंड कर रहा है। इस का जवाब केवल उस सरकारी डैंटिस्ट की अंतर-आत्मा ही दे सकती है। दूसरी तरफ देखिये तो प्राइवेट डैंटिस्ट का खर्च आम आदमी नहीं उठा सकता ....प्रोफैशन में पूरे पच्चीस साल पिलने के बाद अगर ऐसी स्टेटमैंट दे रहा हूं तो यह पूरी तरह ठोस ही है........प्राइवेट डैंटिस्ट के पास जाना आम आदमी के बस की बात है नहीं.......एक तरह से देखा जाये तो वह भी क्या करे......उस ने भी इतने साल बिताये हैं पढ़ाई में, डैंटल चिकिस्ता के लिये इस्तेमाल होने वाली दवाईयां इतना महंगी हो गई हैं, प्राइवेट क्लीनिकों के खर्च इतने हो गये हैं, ए.सी -वे.सी के बिना अब बहुत मुश्किल होती है..................इतने ज़्यादा फैक्टर्ज़ हैं कि क्या क्या लिखूं। कहना बस इतना ही चाह रहा हूं कि डैंटल ट्रीटमैंट महंगी है और इस के बहुत से कारण हैं।

अच्छा तो मैं बात कर रहा था बच्चों के दूध के दांत समय से पहले जब निकलवाने पड़ जाते हैं तो अकसर गड़बड़ होने के चांस बहुत बढ़ जाते हैं ....क्यों ? ....वह इसलिये कि इन दूध के दांतों ने एक तरह से पक्के दांतों की जगह घेर कर रखी होती है और जब ये ही समय से पहले निकल जाते हैं तो कईं बार इन पक्के दांतों को अपनी निश्चित जगह पर जगह न मिलने के कारण कहीं इधर-उधर निकलना पड़ता है...और कईं बार तो ये जगह के अभाव के कारण मुंह में निकल ही नहीं पाते और जबड़े की हड्डी में ही दबे रह जाते हैं। और बहुत बहुत टेढ़े-मेढ़े होने की वजह से फिर इन के ऊपर तारें /ब्रेसेज़ लगवाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जिन में काफी पैसा भी खर्च होता है और समय भी बहुत लगता है।

तो, सलाह यही है कि छोटे बच्चों को एक साल की उम्र में डैंटिस्ट के पास पहली बार ले कर जाना बेहद लाजमी है। उस के बाद हर छःमहीने बाद हरेक बच्चे का डैंटिस्ट के द्वारा देखा जाना बहुत बहुत ज़रूरी है क्योंकि हम सब ने बहुत अच्छी तरह से पढ़ रखा है ना कि a stitch in time saves nine......तो फिर यहां भी यह बात बिल्कुल फिट बैठती है।

इसी तरह की बच्चों के दांतों की बातें मैं अपनी कुछ अगली पोस्टों में करूंगा और साथ में एक्स-रे के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करता रहूंगा। तो, दांतों और मसूड़ों के परफैक्ट स्वास्थय का सुपरहिट फार्मूला तो यहां लिख ही दूं........रोज़ाना दो-बार ब्रुश करें.....रात को सोन से पहले ब्रुश करना सुबह वाले ब्रुश से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है और इस के साथ ही साथ सुबह सवेरे रोज़ाना जुबान साफ करने वाली पत्ती ( टंग-क्लीनर ) से जीभ रोज़ साफ करनी भी निहायत ज़रूरी है।

बाकी बातें फिर करते हैं, आज पहली बात अपनी पोस्ट आन-लाइन लिख रहा हूं, इसलिये डर भी रहा हूं कि कहीं कोई गलत कुंजी न दब जाये और यह गायब ही ना जाये.......ऐसा एक-दो बार पहले हो चुका है। इसलिये अब मैं तुरंत पब्लिश का बटन दबाने में ही बेहतरी समझ रहा हूं।

Tuesday, June 3, 2008

वो मैला कुचैला रद्दी कागज़ !


जब मैं अखबारों के लिये लिखा करता था तो पहले किसी भी रफ कागज़ पर आईडिया लिख लिया करता था.....फिर किसी दूसरे कागज़ पर लेख लिखता था.....एक-दो बार लिखने के बाद मैं या तो उसे फेयर कर लिया करता था...अन्यथा कंप्यूटर में डाल कर तुरंत फैक्स कर दिया करता था।
लेकिन अगर मुझे कोई लेख लिखने से पहले ही फेयर कागज़ थमा दे, तो मुझे लगता है कि मैं तो कुछ भी लिख ही ना पाऊं। पता नहीं मेरे साथ ऐसा क्यों है कि मैं किसी रद्दी पेपर जैसे पेपर पर ही अपने विचारों का खाका खींच सकता हूं। यह मैं बहुत बार सोचता हूं। और इन रद्दी कागज़ों में से मेरा सब से फेवरट है.....वह कागज़ की पैकिंग जिस में हम लोगों के ग्लवज़ पैक हो कर आते हैं। मेरे हास्पीटल के रूम में ये कागज़ प्रतिदिन कितने पड़े होते हैं और इन पर मैं एक-दो मिनट की फुर्सत के दौरान अपने आइडिया लिखता रहता हूं और जेब में बस इन्हे ठूंसता रहता हूं। उस के बाद पता नहीं कब किस कागज़ के भाग्य खुलते हैं..............जी, आप बिलकुल ठीक सोच रहे हैं कि तू अगर इतने रद्दी कागज़ इक्ट्ठे करता है तो फिर तेरा स्टडी-रूम कबाड़खाना तो लगना ही है। कईं बार मुझे कोई रद्दी कागज़ नज़र नहीं आता तो मैं अखबार के साथ आये हुये तरह तरह के हैंड-बिल्ज़ की पिछली तरफ़ भी अपनी कलम से खेल लेता हूं। और कईं बार किसी इस्तेमाल किये हुये एनवेल्प के इधर-उधर लिख कर मन को ठंड़ा कर लेता हूं।
मुझे ऐसा लगता है कि मैं इन रद्दी कागज़ों के ऊपर जब कलम चलाता हूं ना तो मुझे पूरी आज़ादी का अहसास होता है.....मैं शत-प्रतिशत पूरी स्वच्छंदता का अनुभव करता हूं.....मुझे लगता है कि जो भी मैं लिखूंगा, बस अपनी मरजी से लिखूंगा......यह मेरा एरिया है.....इस में कोई नहीं घुस सकता ......इस में मुझे किसी की टोका-टोकी पसंद नहीं है.....मुझे लगता है कि मैं अपने इलावा केवल इस रद्दी कागज़ के ही ऊपर ही तो अपना दिल खोल सकता हूं.....मुझे शायद यह भी तो लगता है किसी साफ़-सुथरे, फेयर कागज़ की तुलना में यह रद्दी कागज़ मेरे जैसा कमज़ोर भी है.....मैं शायद सोचता हूं कि इस मैले-कुचैले कागज़ में भी ढेरों कमज़ोरियां हैं , इसलिये यह मुझे क्या कहेगा!......मैं सोचता हूं कि यह मेरा सच्चा साथी है , मेरा हमराज़ है, मेरे दुःख-सुख का साझीदार है, इसलिये इस के ऊपर जब मैं अपनी कलम से अपने विचारों का कोई खाका खींच रहा होता हूं तो यह विचार मन में आते हैं कि यार, मैं भला इस बेकार से दिखने वाले ( दो-कौड़ी के भी नहीं!!) कागज़ को भी बेइमानी से लिख कर शर्मिंदा क्यों करूं। मुझे यह अहसास है कि इस के साथ किसी तरह की चालाकी करना अपनी मां के साथ फरेब करने के बराबर है। इन सब बातों की वजह से मैं इस मैले-कुचैले कागज़ों को अपना सब से बड़ा हमराज़ मानता हूं। लेकिन मेरी खुदगर्ज़ी की इन्तहा भी तो ज़रा देखिये.......इन का और मेरा साथ केवल लैप-टाप में लिखने तक का ही होता है।
इन कईं तरह के रफ कागज़ों को अपने सामने रख के मैं अपने लैप-टाप पर बैठ जाता हूं और जो भी ये रद्दे कागज़ मुझ से लिखवाते हैं मैं लिखता जाता हूं। लिखने के बाद या तो यहीं से लेख को पब्लिश कर देता हूं , नहीं तो पैन-ड्राइव में लेकर दूसरे किसी डैस्क-टाप से पब्लिश कर देता हूं।
सीधी सी बात करूं तो मुझे इन रद्दी कागज़ों पर कुछ भी लिखना दुनिया में किसी भी चीज़ की परवाह किये बिना अपने बचपन में मिट्टी के साथ खेलने के दिनों की याद दिलाता है.......शायद यही तो अब अपने बचपन के दिन जी लेने का एक बहाना है.....मुझे अकसर याद आते हैं वो दिन जब हम लोग गीली-रेत में खूब भागा-दौड़ा करते थे, अपना पांव उस में धंसा कर बड़े बड़े घर उस रेत में बना डालते थे ....अगले ही पल उसे गिरा कर नया घर बना डालते थे......और फिर आपस में एक दूसरे से पूछते थे कि देख, मैंने कितना बड़ा बना लिया...................जी हां, जैसे अब टिप्पणीयों की संख्या और आज कितनी बार पढ़े गये के आंकड़े ये सब बातें हमारे लेखन के बारे में बताते रहते हैं।
लेकिन मेरे दुःख-सुख में इतना साथ निभाने के बाद, मेरा मन निर्मल करने वाले , मुझे सुकून देने वाले उस रद्दी कागज़ का क्या हश्र होता है.....जानना चाहेंगे ??............लेख छपते ही पहली फुर्सत में उसे नोच कर रद्दी की टोकड़ी के हवाले कर दिया जाता है....जी हां, बिल्कुल उसी तरह जैसे अपना मतलब निकल जाने के बाद हम उसी बंदे से आंखें चुराने में ज़रा भी नहीं हिचकाते। वाह.....भई ....वाह.......हम इंसानों की भी क्या फितरत है......अपना उल्लू सीधा करने के बाद अगर हम एक छोटे से रद्दी के कागज़ को नहीं झेल सकते तो आदमी की क्या बिसात कि हमारे सामने हमारा उल्लू सीधा होने के बाद टिक भी पाए !!
इस रद्दी कागज़ से एक और बात याद आ रही है....जब चुनाव के दिनों में कपड़े के बैनर जगह-जगह लगे देखता हूं और अगले दिन किसी नुक्कड़ पर बैठे भिखारी को उस से अपना तन ढांप कर लंबी ताने देखता हूं तो मन ही मन एक विजय का , एक संतोष का, एक सुकून का अहसास करता हूं.......इतना संतोष कि मैं ब्यां नहीं कर पा रहा हूं.......क्योंकि बिना वजह अभी से ही भावुक हो रहा हूं.......वैसे भी अभी तो चुनाव होने में कईं महीने पड़े हैं !!

Monday, June 2, 2008

क्या आप ने कभी लट्टू चलाया है ?


मैं
तो कभी नहीं चला पाया....अपनी टोली के दूसरे लड़कों को इतनी आसानी से बार-बार उस मिट्टी के बने लट्टू पर झट से डोरी लपेट कर ज़मीन पर छोड़े जाने का सारा एक्शन मैं बड़ी हसरत से देखा करता था। बहुत बार मैंने भी उस मिट्टी के बने लट्टू पर डोरी लपेट कर उसे ज़मीन पर छोड़ने की नाकाम कोशिश की।

अच्छा तो अब आप को याद आ रही है उन पांच-पांच पैसे में बिकने वाली मिट्टी के लट्टूयों की .....तो यह भी बता डालिये कि आप के इस के साथ क्या अनुभव रहे ? मुझे तो आज दोपहर में उन लट्टूयों के बारे में ही सोच कर इतना सुखद लग रहा था कि क्या कहूं !!

दोस्तो, मैं उस ज़माने की बात कर रहा हूं कि जब ये मिट्टे के बने लट्टूओं पर बहुत बढ़िया सा चमकीला काला-लाल पेंट भी किया गया होता था। उन्हें देखना ही कितना सुखद हुया करता था। और फिर जब हम खुराफाती लड़की की टोली में इन को चलाने का मुकाबला हुया करता था तो पूछो मत कि कितना मज़ा लूटा करते थे।

इमानदारी से कह रहा हूं कि दशकों पुरानी यह बात आज ही याद आई है कि दो लड़के अपने अपने लट्टू पर डोरी लपेट कर एक साथ ज़मीन पर छोड़ते थे, जिस का लट्टू ज़्यादा समय तक चल पाया, वही जीता ....वही सिकंदर। लेकिन हारने वाला भी अपनी हार इतनी आसानी से कैसे स्वीकार कर ले...... फिर वह बिल्कुल नाच ना जाने आंगन टेढ़ा कि तर्ज़ पर कह उठता कि देख, मेरे वाला इस बार तो ज़मीन पर पड़े हुये पत्थर से टकरा गया, ऐसा कर, तू अब देख......भूल गया, परसों मैंने तेरे को कितनी बार हराया था।

पेंट वाले लट्टूओं के साथ ही साथ ऐसे लट्टू भी तो आया करते थे जिन पर पेंट नहीं हुया होता था...बस, मिट्टी के लट्टू होते थे जिन के नीचे एक लोहे की पिन सी लगी होती थी।

लिखते लिखते मुझे आज खुशवंत सिंह जी की वह वाली बात बहुत याद आ रही है कि खुदा का शुक्र है कि किसी ने कलम के लिये कंडोम नहीं बनाया......दोस्तो, मैंने इस महान लेखक के अखबारों में छपे लेखों से लिखने की बहुत प्रेरणा ली है.......वे अकसर लिखा करते हैं कि पेन को बस कागज़ पर छोड़ना ही आप का काम है, बाकी काम धीरे धीरे अपने आप होने लगता है।

यह मैं इसलिये यहां लिखना ज़रूरी समझता हूं कि जब मैं यह लेख लिखने लगा तो बहुत सी बातें मेरे ध्यान में ही नहीं थीं, लेकिन अब लिखते लिखते याद आने लगा है। जैसे कि मुझे अभी ध्यान आ रहा है कि मिट्टी के लट्टूओं के बाद फिर लकड़ी के बने लट्टू बाज़ार में आने लग गये थे। लेकिन मैं उन मिट्टी के लट्टूओं के बारे में यह बताना तो भूल ही गया कि जिन लड़कों की गैंग में मैं शामिल था, उन में से कईं लड़कों को जेबों में कईं कईं मिट्टी के लट्टू ठूसे रहते थे ...क्योंकि जब एक लट्टू टूट जाता था तो बिना किसी शिकन के झट से जेब से दूसरा लट्टू तुरंत ना निकले तो यह एक प्रैस्टीज इश्यू हो जाया करता था और लड़कों में खिल्ली उड़ती भला कौन बर्दाश्त करे, भई .......मैं बार बार एक बात फिर से दोहरा रहा हूं कि मुझे इन लट्टूओं को देखने से ही बहुत अच्छा लगता था। जिन लकड़ी के लट्टूओं की मैं बात कर रहा हूं उन की भी बनावट भी बिल्कुल मिट्टी के लट्टूओं के जैसी ही हुया करती थी....जिन पर भी डोरी लपेट पर उन को ज़मीन पर छोड़ा जाता था।

ये लकड़ी के लट्टू मेरे बेटे ने बंबई रहते खूब चलाये हैं.....बंबई की यही तो खासियत है कि यहां सब कुछ मिल जाता है। और वह भी रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर या फुटपाथों पर.....यह सब कुछ बहुत आसानी से मिल जाता है ताकि कोई भी बच्चा इन छोटी मोटी चीज़ों के लिये कभी तरसे नहीं। इन लकड़ी के लट्टूओं को चलाने में मेरे बड़े बेटे ने इतनी महारत हासिल कर ली कि मुझे उस से ईर्ष्या होती कि यार, इसे भी तो किसी ने नहीं सिखाया,यह कैसे इतनी आसानी से इन को चला लेता है और वह इतना धुरंधर लट्टूबाज हो गया कि इन लट्टूओं को जमीन पर छोड़ कर ....उन्हें चलते चलते फिर से.....अपने हाथ में पकड़ी डोरी की मदद से ज़मीन पर चलते चलते लट्टू को अपने हाथों पर ट्रांस्फर कर लेता ( बिल्कुल उसी तरह जिस तरह मेरी बचपन की टोली के लोग खासकर दोस्त दारा किया करता था !)..... मुझे यह सब देखना बहुत रोमांचक लगता।

यह नब्बे के दशक का वह दौर था जब उन 5-5, 10-10 रूपये के जंक-फूड के पैकेटों के साथ एक बिल्कुल छोटा सा प्लास्टिक का लट्टू आने लगा था.....जिस की उम्र एक-दो दिन की ही हुया करती थी, क्योंकि अकसर ये इधर उधर पड़े किसी के पैरों तले आ ही जाते थे।

अब आते हैं नये मिलिनियम में.....अर्थात् चार-पांच साल पहले मेरा बेटा क्लब से खबर लेकर आया कि शर्मा अंकल अपने बेटे के लिये दिल्ली से बे-ब्लेड लाये हैं.......यकीनन उस ने कुछ वर्णऩ इस तरह का किया कि हमें भी उत्सुकता हो उठी कि यार, देखना ही होगा, यह कौन सा करिश्मा है। मुझे याद है मैं और मेरी पत्नी उसे लेकर फिरोज़पुर की एक स्थानीय खिलौनों की दुकान पर पहुंच गये........दाम पता किया तो अढ़ाई सौ –तीन सौ रूपये। और साथ में दुकानदार की शर्त की ना ही पैकिंग खोल कर चैक ही करवायेगा और ना ही कोई गारंटी होगी......कहने लगा कि हमें तो कंपनी से जाते आते हैं वैसे ही हम आगे बेच देते हैं, हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं। फिर उस ने बताया कि जो बच्चे ठीक से हैंडल नहीं कर पाते, उन के बे-ब्लेड झट से खराब हो जाते हैं......और ये फिर रिपेयर नहीं हो पाते...उस ने इतना कहते हुये पास ही पड़े खराब बे-ब्लेड़ो का ढेर दिखा दिया। लेकिन फिर भी रिस्क लेते हुये हम एक बे-ब्लेड खरीद ही लाये।

अभी दो-तीन दिन हुये थे कि कोई और डिजाइन बेटे के दोस्तों के पास आ गया.....तो फिर वैसा ही डिजाइन लुधियाना से मंगवाना पड़ा। बस, देखते ही देखते घर में कईं तरह के बे-ब्लेड दिखने लग गये। इन बे-ब्लेड़ों की शुरूआत हुई एक टीवी प्रोग्राम से ही थी, लेकिन हमें ही इतनी बार सिर मुंडवा कर पता चला कि यार, यह भी एक लट्टू ही तो है.......बस, उसे ज़मीन पर छोड़ने का मकैनिज़्म ही तो अलग है......पहले डोरी से यह काम हो जाता है और यहां से काम एक प्लास्टिक की लंबी सी पत्ती से हुया करता था। लेकिन यकीन मानिये जो रोमांच बचपन में दिखने वाले उस लट्टू का था, वह तो भई अलग ही था।

हम हिंदोस्तानियों के इतनी सफाई से नकल करने के हुनर को सलाम......कुछ ही महीनों में ये बे-ब्लेड पहले पचास-साठ रूपये में और फिर कुछ ही समय के बाद बीस-बीस, तीस तीस रूपये में बिकने लग गये। घर में जगह जगह बे-ब्लेड दिखने लग गये.....बच्चों में क्लबों, पार्टियों में इन के बारे में चर्चा होने लगी कि यार, तेरे पास कितने हैं, तेरे पास क्या वह लाइट-वाला है या नहीं !!

बस, पता नहीं कुछ ही महीनों में फिर से इन बच्चों को कभी बे-ब्लेड़ों का नाम लेते देखा नहीं..........अब तो पता नहीं कि ये धीरे धीरे मार्कीट से ही गायब हो गये हैं या अपने बच्चे ही बड़े हो गये हैं।

लेकिन मेरे छोटे बेटे के पास बहुत साल पुराना एक लकड़ी का लट्टू पड़ा हुया है जिस को मैंने भी खूब चलाया है...........नहीं, साहब, नहीं, यह डोरी वाला नहीं है.......डोरी वाला तो कईं वर्षों से दिखा ही नहीं है और डोरी वाला लट्टू इस जन्म में तो मेरे से चलने से रहा। यह लकड़ी का खूबसूरत-सा लट्टू तो हाथ से घुमा कर चलाने वाला है जिसे मैं कईं साल पहले घुमा कर उस के नर्म-नर्म पेट पर छोड़ दिया करता था जिससे उसे बहुत मज़ा आता था। और उस की किलकारियां सुन कर मुझे उस से भी ज़्यादा मज़ा आता था...................सचमुच, अपनी बड़ी बड़ी खुशियां भी कितनी छोटी छोटी बातों में छिपी बैठी हैं !!.....क्या आप को ऐसा नहीं लगता, दोस्तो !!

क्या करें नए रचनाकार....

नए लेखकों को क्या करना चाहिए ?...इस प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं प्रख्यात लेखक मुद्राराक्षस। ......दोस्तो, मैंने यह जबरदस्त लेख तीन साल पहले एक अखबार में पढ़ा था, इस ने मुझे इतना कुछ कह दिया कि मैंने इस की कतरन अपनी नोटबुक में लगा रखी है। आज अपने स्टडी-रूम की सफाई करते करते जब इस कापी के ऊपर नज़र पड़ी तो सोचा कि यार, यह तो आप सब से शेयर करने वाली क्लिपिंग है। सो, इस को जैसे का तैसे ही लिख रहा हूं।
युवा रचनाकारों को कोई सलाह दे पाना मुश्किल काम है। लगभग 54 बरस हो गए हैं लिखते और छपते लेकिन हर नई चीज़ के लिए कलम उठाने से पहले गहरी उलझन होती है कि वह लिखने के लिए मेरे पास पूरी तैयारी नहीं है।
सार्त्र ने आत्मकथा में लिखा था कि लेखन एक बंदूक होता है। बंदूक सिर्फ उसका घोड़ा दबाने से ही काम नहीं करती । उससे निशाना लेने के लिए लंबे और श्रमसाध्य अभ्यास की जरूरत होती है। फिर बंदूक चलने पर निशाना ही नहीं लगाती, वह चलाने वाले को भी भरपूर धक्का देती है।
कुछ निशानेबाजी तो सिर्फ कौशल के लिए होती है और कुछ कारगर। लेखन भी बहुत कुछ ऐसी ही चीज़ है।
युवा लेखक को सलाह इसलिए भी मुश्किल काम है कि हर लेखक नई दुनिया खोजता है। उसे कौन बता सकता है कि तुम अमुक को खोजो क्योंकि जिस अमुक की सलाहें दी जाएंगी वह तो सलाह देने वाले की खोज है। क्या निराला को किसी ने बताया था कि तुम ऐसी कविता लिखो? आइन्सटाइन को किसने बताया था कि वे क्वाण्टम फिजिक्स का नया इतिहास रचें बल्कि उनके अध्यापक तो उनके काम से गहरी असहमति जताते थे। नए लेखक को एक घबराहट ज़रूर होती है कि उसकी रचना अक्सर छप नहीं पाती या संपादक अस्वीकार कर देता है। कुछ लेखकों को संयोग से यह कभी नहीं झेलना पड़ता लेकिन ऐसा कुछ झेला तो भवभूति जैसे शिखर के संस्कृत नाटककार ने भी , तभी उसने लिखा था कि धरती बहुत बड़ी है और समय निरवधि है, कभी तो लोग पहचानेंगे। और वे पहचाने गए।
निराला का विरोध भी हुआ और उनकी रचनाएं अस्वीकृत भी हुईं....तभी उन्होंने लिखा था ....एक संपादकगण निरानंद, वापस कर देते पढ़ सत्वर, दे एक पंक्ति दो में उत्तर। मुक्तिबोध तो बड़े उदाहरण हैं कि उनकी कोई कविता या निबंध की किताब उनके जीवनकाल में नहीं छपी थी। कभी-कभी किसी तेजस्वी लेखक के साथ यह भी होता है। इसके लिए भी लेखक को तैयार रहना चाहिए।
एक विनम्र सुझाव देना चाहूंगा...किसी भी रचना को लिखने से पहले व्यापक अध्ययन ज़रूरी होता है। अपने समय का ओर अपने इतिहास में जो कुछ लिखा गया वह गंभीरता से पढ़ना चाहिए। दुनिया में क्या लिखा गया, इसका भी बोध होना चाहिय, तभी पता लग सकता है कि कितना और कैसा क्या कुछ लिखा गया है। तभी यह भी पता लगता है कि जो कुछ लिखा जा चुका है उससे अलग और बेहतर कुछ कैसे लिखा जा सकता है।
PS…..मुझे लेखक मुद्राराक्षस जी की सभी बातें बहुत भा गई। हिंदी चिट्ठाकारी में बहुत से साहित्यकार हैं...अगर मुद्राराक्षस जी के लेखन एवं जीवन के बारे में बतलाने का कष्ट करेंगे तो अच्छा लगेगा।
देखिये , आज एक बार फिर इस पोस्ट को लिखने के चक्कर में मेरा स्टड़ी-रूम साफ होते होते रह गया। ....पता नहीं इस कबाड़खाने की किस्मत कब खुलेगी.....दोस्तो, यह रूम इतना ज़्यादा अव्यवस्थित है कि मुझे यहां बैठ कर कुछ लिखे पढ़े महीनों बीत जाते हैं।