Thursday, December 4, 2014

मेरी मैकबुक की तबीयत नासाज़ थी...

आज पांच दिन के बाद मेरी मैकबुक की तबीयत थोड़ी ठीक हो गई..अभी अभी ऐपल के सर्विस सैंटर से वापिस लौटी है... इतने दिन बड़ी परेशानी हुई ..कितना कुछ सा आप सब से शेयर करने के लिए..पिछले दिनों इधर लखनऊ लिटरेचर फेस्टीवल हुआ..३ दिन ...मैं छुट्टी लेकर वहीं बैठा रहा तीनों दिन...बहुत अच्छा अनुभव रहा..आप से शेयर करूंगा धीरे धीरे।

मेरी समस्या यह है कि मैं अपने मोबाइल पर ज्यादा कुछ लिख नहीं पाता...सिर भारी होने लगता है.. झुंझलाहट हो जाती है....बस व्हास्ट-एप और फेसबुक पर दो चार लाइनें लिखने तक ही ठीक है।

इन चार पांच दिनों में मैंने अपने पुराने डेल के लैपटाप को भी ढूंढा..२००७ में खरीदा गया था लेकिन पिछले दो सालों से ठीक से काम नहीं कर रहा था.....ना चार्जिंग ठीक होता है न ही ठीक से चलता है....कल मैं उसे डेल के सर्विस सेंटर ले गया...उन्होंने बताया कि यह तो बहुत पुराना माडल है.. अब इस की बेटरी भी नहीं मिलती और चार्जर भी खराब है..चार्जर दो दिन के बाद मंगवा के देने को कह रहे थे...लेकिन मुझे लगा कि अब इस का कुछ नहीं हो सकता।

२००५ में खरीदा गया .. एसर लेपटाप भी बिल्कुल कंडम पड़ा हुआ है। और २००२ में खरीदा गया ..कम्पैक का डैस्कटाप तो जैसे एंटीक पीस की तरह सजा हुआ है कंप्यूटर टेबल पर....वह खुल तो जाता है लेकिन स्पीड इतनी कम कि क्या कहें।

बात वही है कि लेपटाप, मोबाईल जैसी कुछ चीज़ें है ... जो जल्द ही इलैक्ट्रोनिक कबाड़ का रूप ले लेती हैं....लेकिन फिर भी इन की इमोशनल वेल्यू तो रहती है ही.....मैं ऐसा सोचता हूं......पता है कि अब डेल वाला लेपटाप कबाड़ है लेकिन उसे कहीं पर फैंका तो नहीं जा सकता.....इसी डैल पर मैंने लगभग ५ साल तक सुबह चार-पांच बजे उठ कर बहुत से लेख लिखे....

और जो डैस्कटाप है, उस पर बहुत कुछ लिखा...जब मैं प्रिंट-मीडिया के लिए लिखा करता था.....लेकिन अधिकतर तो उस पर हम लोग फिल्मी गीत, हिंदी फिल्में और पंजाबी गीतों को ही देखा करते थे। उन दिनों हंस राज हंस का एक गीत आया था.....अक्खियां लड़ीं ओ लड़ीं बीच बाज़ार...टोटे टोटे हो गया दिल टोटे टोटे हो गया....यह रोज़ाना कईं बार किसी आरती की तरह उस पर सुना-देखा जाता था...आप से लिंक ही शेयर कर देता हूं....



मैं यह कभी समझ नहीं पाया कि यार, लैपटाप कुछ ही समय के बाद नकारा क्यों हो जाते हैं, हम क्यों इसे अपग्रेड नहीं करवा पाते। इस का जवाब मेरे १२वीं कक्षा में पढ़ रहे बेटे ने दिया जो मुझे झट से समझ में आ गया....एक तो इन के स्पेयर-पार्ट्स नहीं मिलते और दूसरा यह कि जो इंटरनेट ब्राउज़र्स और विभिन्न ऐप्लीकेशन्ज़ हैं ...अपने यूज़र्स को बेहतर सेवा देने के लिए वे भी निरंतर अपग्रेड होते रहते हैं...इसलिए नये वर्ज़न वाले ये ब्राउज़र्स और ऐप्लीकेशन्ज़ पुराने लैपटाप, डैस्कटाप की कंफिग्रेशन पर चल नहीं पाते क्योंकि उन के चलने के लिए कंफिग्रेशन की डिमांड भी बढ़ जाती है। 

बहरहाल, इन पांच दिनों के दौरान ऐसा लग रहा था कि जैसा मेरे पास टाइम ही टाइम है....सुबह भी खूब समय खाली रहता था...इन दिनों रेडियो भी खूब सुना.......एक गीत जो परसों सुना अभी तक याद है.... लीजिए आप भी सुनिए....आ बता दें तुझे कैसे जिया जाता है.. (1974 Film Dost)....यह गीत सुनना मुझे बहुत भाता है....बचपन में रेडियो पर यह बार बार बजा करता था...गीतों के शहनशाह आनंद बक्शी के बोलों पर ध्यान दीजिएगा...