Wednesday, November 24, 2010

एड्स से बचाव के लिये रोज़ाना दवाई -- यह क्या बात हुई ?

अभी मैं न्यू-यार्क टाइम्स की साइट पर यह रिपोर्ट पढ़ रहा था -- Daily Pill Greatly Lowers AIDS Risk, Study Finds. शायद आप को भी ध्यान होगा कि आज से 20-25साल पहले एक फैशन सा चला था कि मलेरिया रोग से बचने के लिये हर सप्ताह एक टैबलेट ले लें तो मलेरिया से बचे रहा जा सकता है – इस फैशन का भी जम कर विरोध हुआ था, उन दिनों मीडिया भी इतना चुस्त-दुरूस्त था नहीं, इसलिये अपने आप को समझदार समझने वाले जीव कुछ अरसा तक यह गोली खाते रहे...लेकिन बाद में धीरे धीरे यह मामला ठंडा पड़ गया। आजकल किसी को कहते नहीं सुना कि वह मलेरिया से बचने के लिये कोई गोली आदि खाता है।

एक बात और भी समझ में आती है कि जब किसी एचआईव्ही संक्रमित व्यक्ति पर काम करते हुये किसी चिकित्सा कर्मी को कोई सूई इत्यादि चुभ जाती है तो उसे भी एचआईव्ही संक्रमण से बचने के लिये दो महीने पर कुछ स्ट्रांग सी दवाईयां लेनी होती हैं ताकि वॉयरस उस के शरीर में पनप न सके –इसे पोस्ट post-exposure prophylaxis – वायरस से संपर्क होने के बाद जो एहतियात के तौर पर दवाईयां ली जाएं।

लेकिन आज इस न्यू-यार्क टाइम रिपोर्ट में यह पढ़ा कि किस तरह इस बात पर भी ज़ोरों शोरों से रिसर्च चल रही है कि जिस लोगों का हाई-रिस्क बिहेवियर है जैसे कि समलैंगी पुरूष –अगर ये रोज़ाना एंटी-वायरल दवाई की एक खुराक ले लेते हैं तो इन को एचआईव्ही संक्रमण होने का खतरा लगभग 44 फीसदी कम हो जाता है। और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर समलैंगिक पुरूषों में रोज़ाना दवाई लेने से खतरा कम हो सकता है तो फिर अन्य हाई-रिस्क लोगों जैसे की सैक्स वर्करों, ड्रग-यूज़रों (जो लोग ड्रग्स—नशा -- लेने के लिये एक दूसरे की सूई इस्तेमाल करते हैं) में भी रोज़ाना यह दवाई लेने से यह खतरा तो कम हो ही जायेगा। अभी इस पर भी ज़ोरों-शोरों से काम चल रहा है।

मैं जब यह रिपोर्ट पढ़ रहा था तो यही सोच रहा था कि इस तरह का धंधा भी देर-सवेर चल ही निकलेगा कि एचआईव्ही से बचने के लिये स्वस्थ लोग भी रोज़ाना दवाई लेनी शुरू कर देंगे। लेकिन सोचने की बात है कि यह दवाईयां फिलहाल इतनी महंगी हैं कि इन्हें खरीदना किस के बस की बात है? एक बात और भी तो है कि भारत जैसे बहुत से अन्य विकासशील देशों में जो लोग एचआईव्ही से पहले से संक्रमित है उन तक तो ये दवाईयां पहुंच नहीं पा रही हैं, ऐसे में समलैंगिकों, सैक्स वर्करों और सूई से नशा करने वालों की फिक्र ही कौन करेगा ?

रिपोर्ट पढ़ कर मुझे तो ऐसा भी लगा जैसे कि लोगों के हाई-रिस्क को दूर करने की बजाए हम लोग उन्हें एक आसान सा विकल्प उपलब्ध करवा रहे हैं कि तुम अपना काम चालू रखो, लेकिन एचआईव्ही से अपना बचाव करने के लिये रोज़ाना दवाई ले लिया करो। इस रिपोर्ट में तो यह कहा गया है कि यह दवाईयां सुरक्षित हैं, लेकिन दवाई तो दवाई है ---अगर किसी को मजबूरन लेनी पड़ती हैं तो दूसरी बात है, लेकिन अगर हाई-रिस्क बिहेवियर को ज़िंदा रखने के लिये अगर ये दवाईयां ली जाने की बात हो रही है तो बात हजम सी नहीं हो रही। आप का क्या ख्याल है?

रिपोर्ट पढ़ते पढ़ते यही ध्यान आ रहा था कि आज विश्व की समस्त विषम समस्याओं का हल क्यों भारत के पास ही है? इन सब बातों का सही इलाज अध्यात्म ही है, और कोई दूसरा पक्का उपाय इस तरह की विकृतियों को दूर करने का किसी के पास तो है नहीं। यह क्या बात है , समलैंगिक पुरूष हाई-रिस्क में चाहे लगे रहें, नशा करने वाले नशे में लिप्त रहें लेकिन एचआईव्ही संक्रमण से बचने के लिये रोज़ाना दवाई ले लिया करें---यह भी कोई बात हुई। एक तो इतनी महंगी दवाईयां, ऊपर से इतने सारे दूसरे मुद्दे और बस यहां फिक्र हो रही है कि किस तरह से उसे संक्रमण से बचा लिया जाए। बचा लो, भाई, अगर बचा सकते हो तो बचा लो, लेकिन अगर उस की लाइन ही बदल दी जाए, उस की सोच, उस की प्रवृत्ति ही बदल दी जाए तो कैसा रहे ----- यह चाबी केवल और केवल भारत ही के पास है।

Tuesday, November 23, 2010

शुगर डॉयन खाये जात है ...

कल शाम को मुझे एक बंदा मिला – 50-52 की उम्र—चिकित्सा क्षेत्र से ही संबंधित—बातचीत के दौरान उस ने अपने यूरिन-टैस्ट की रिपोर्ट मेरे आगे की – ज़रा देखो कि क्या सब कुछ ठीक है ? मैं बड़ा हैरान हुआ –यूरिन में शूगर डबल प्लस, साथ में यूरिन में पस सैल(pus cells), रक्त सैल और क्रिसटल्स का भी ज़िक्र था। मैंने पूछा कि यार, तुमने यह टैस्ट करवाया क्यों था ? बताने लगा कि यह टैस्ट उस ने इसलिये करवाया क्योंकि उस के अंडरवियर पर पीले दाग पड़ने लगे हैं जो धुलने से भी नहीं छूटते।

आगे उस ने बताया कि दरअसल उसे लगभग 15 वर्ष पहले पेट में दर्द हुआ था –उस के विवरण से पता लग रहा था कि गुर्दे का दर्द था। खैर, उस ने बताया कि उसे इतने सालों में कोई तकलीफ़ नहीं थी। लेकिन अब यह अंडरवियर वाली बात से वह परेशान था, वैसे उस ने मुझे बताया कि पंद्रह सोलह साल पहले भी जो यूरिन टैस्ट करवाया था उस में भी क्रिस्टल्स की बात तो आई थी, लेकिन उसे कोई तकलीफ़ नहीं थी और इसलिये उस ने किसी तरह का मशवरा लेना ज़रूरी नहीं समझा।

मुझे उस की रिपोर्ट देख कर बहुत अफसोस सा हुआ – इतना मस्त रहने वाला बंदा, न किसी की बुराई में न किसी की अच्छाई में... लेकिन इत्मीनान इतना था कि चलो अगर कोई तकलीफ़ है तो पकड़ी तो जायेगी।

सो, मैंने आज सुबह उसे खाली पेट ब्लड-शूगर टैस्ट करवाने के लिये कहा ---रिपोर्ट आई 297mg%. यह तो तय ही हो गया कि शूगर (मधुमेह) तो है ही। अब उसे पेट का अल्ट्रासाउंड (Ultrasound Abdomen) करवाने के लिये कहा है और साथ में किडनी फंक्शन टैस्ट, और अन्य सामान्य टैस्ट आदि ---बाद में और भी टैस्ट तो करवाने ही होंगे।

आज मेरा मूड उस के बारे में सोच कर खराब ही रहा। बस वही बातें जो अकसर ऐसे मौकों पर होती हैं –मेरे पूछने पर उस ने बताया कि मीठे का तो वह शौकीन है ही --- वैसा चलता तो वह पैदल ही है। मैंने उसे कहा कि यार, चिंता न करो, बस फिजिशियन के बताए अनुसार दवाई तो लेनी ही होगी, और अपने खाने पीने का ध्यान रखना होगा.........

मैं यही सोच रहा हूं कि उस बंदे को तो चिकित्सा विज्ञान के बारे में थोडी बहुत नालेज थी, इतना भी कहूंगा कि साहसी था कि उस ने अपनी मर्जी से ही यूरिन टैस्ट करवा लिया और अभी बाकी टैस्ट करवाने को राजी हो गया---- वरना, बिना किसी जटिलता (complication) के कहां अकसर लोग शूगर वूगर टैस्ट करवाते हैं जब कि 35-40 वर्ष की उम्र के बाद एक-दो साल के बाद इस तरह की जांच तो जरूरी है ही।

अब इस बंदे में भी पता नहीं कि कब से यह रोग था --- बता रहा था कि पिछले दो-तीन साल से दो-तीन किलो वज़न कम चल रहा है। बिना दवाई के अनियंत्रित शूगर-रोग हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों (vital organs—kidneys, heart, eyes, vascular and nervous system)को तब तक नुकसान पहुंचाता रहता है जब तक कि वे हड़ताल ही न कर दें।

वैसे एक बात आप से साझी करूं --- यह टैस्ट वैस्ट करवाने में डर बड़ा लगता है, मुझे भी अपने सभी सामान्य टैस्ट करवाये तीन साल हो गये है.......पता नहीं यह क्या मसला है, डाक्टर वाक्टर ऊपर से कितने भी साहसी से नज़र आते हैं , मैंने देखा है जब उन की अपनी एवं उन के सगे-संबंधियों की बात होती है तो बिल्कुल बच्चे जैसे डरे से, भयभीत से, आशंकित से ---------बस, बिल्कुल एक आम मरीज़ की तरह ही होते हैं -----शायद उस से भी बढ़ के।

Monday, November 22, 2010

जमा हुई दवाईयों का भूल-भुलैय्या

अकसर डाक्टरों के आसपास के लोग –परिचित, रिश्तेदार,मित्र-सगा उन से यह बात कहते रहते हैं कि भई हमें तो आम तकलीफ़ों के लिये कुछ दवाईयां लिखवा दो, जिसे हम ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर लिया करें। और अकसर लोग यह भी करते हैं कि घर में जमा हो चुकी दवाईयां किसी डाक्टर (जिस से उन्हें डांट-फटकार का डर न हो) के पास ले जाकर उन के नाम एवं उन के प्रभाव लिखने की कोशिश करते हैं।

जिस तरह से आज जीवनशैली से संबंधित तकलीफ़ें बढ़ गई हैं और जिस तरह से तरह तरह के रोगों के लिये नई नई दवाईयां आ गई हैं, ऐसे में एक आम आदमी की बड़ी आफ़त हो गई है। इतनी सारी दवाईयां –तीन चार इस तकलीफ़ के लिये, तीन चार उस के लिये ---अब कैसे कोई हिसाब रखे कि कौन सी कब खानी है, कितनी खानी है। मैं इस विषय के बारे में बहुत सोच विचार करने के बाद इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि यह सब हिसाब किताब रखना अगर नामुमकिन नहीं तो बेहद दुर्गम तो है ही। और ऊपर से अनपढ़ता, स्ट्रिपों के ऊपर नाम इंगलिश में लिखे रहते हैं, और कईं बार किसी दवाई का एक ब्रांड नहीं मिलता, अगली बार किसी और दवाई का पुराना ब्रांड नहीं मिलता ----बस, इस तरह की अनगिनत समस्यायें –देखने में छोटी दिखती हैं लेकिन जिसे उन्हें खाना होता है उन की हालत दयनीय होती है।

मैं डाक्टरों की उस श्रेणी से संबंधित रखता हूं कि जिन के साथ कोई भी किसी भी समय कितनी भी बेतकल्लुफी से बात करते हुये किसी तरह की डांट फटकार से नहीं डरता—क्योंकि मैं इतने वर्षों के बाद यही सीखा है कि मरीज से ऐसी डांट-डपट करने वाले बंदे से ज़्यादा ओछा कोई भी नहीं हो सकता। मेरे को कोई भी इन दवाईयों के बारे में कितने भी सवाल पूछे मैं कभी भी तंग नहीं आता ---- जिस का जो काम है, वही बात ही तो लोग पूछेंगे। वरना यह ज्ञान-विज्ञान किस काम का।

इस तरह के लोगों से जिन्हें इंगलिश नहीं आती, बेबस हैं, मुझे इन पर बहुत तरस आता है, तरस इसलिये नहीं कि इंगलिश नहीं आती , बल्कि यह सोच कर कि यह सब मेरे से पूछने के बाद भी ठीक दवाईयां ठीक समय पर कैसे लेंगे ? गलती होने का पूरा चांस रहता ही है।

आज भी एक अम्मा जी आईं --- चार-पांच पत्ते दिखा कर कहने लगीं कि बेटा, ज़रा बता दे कि किस तकलीफ़ के लिये कौन सी दवा लेनी है, दवाईयां वह कहीं और से लेकर आ रही थीं। बता तो मैंने अच्छे से दिया --- न ही मैंने जल्दबाजी ही की और न ही मैंने उस के ऊपर किसी तरह की नाराज़गी करने की हिमाकत ही की --- वह बीबी तो संतुष्ट हो गईं लेकिन मुझे बिल्कुल भी संतोष नहीं हुआ क्योंकि मैं इस बात से बिल्कुल भी कनविंस नहीं हूं कि उस ने सब कुछ अच्छे से समझ लिया होगा और सत्तर पार की उम्र में सब कुछ याद भी रखेगी। लेकिन यह एक ऐसा मुद्दा है कि इस के बारे में कितना भी सोच लें ----- अपने लोगों की अनपढ़ता का कसूर और ऊपर से दवाईयां बनाने वाले कंपनियों का इंगलिश-प्रेम। सुना तो भाई मैंने भी है कि इन दवाईयों के पत्तों पर हिंदी में भी नाम लिखे जाने ज़रूरी हो गये हैं, या खुदा जाने कब से ज़रूरी हो जाएंगे---पता नहीं, कुछ तो आ रहा था एक-दो साल पहले मीडिया में।

वैसे एक बात है घर में अगर आठ दस तरह की दवाईयां हों तो अकसर नान-मैडीकल लोगों में यह उत्सुकता सी रहती है कि यार, कहीं से यह पता लग जाए कि यह किस किस तकलीफ़ के लिये है तो बात बन जाए। ऐसे में मेरी मां जी तो पहले या कभी कभी अभी भी यह करती आई हैं कि वह दवाईयों के नाम एक काग़ज पर लिख कर मेरे से उन के इस्तेमाल के बारे में भी पूछ कर लिख लेती हैं।

और एक महाशय हैं जो मेरे पास अकसर कुछ महीनों बाद दस-बारह स्ट्रिप लेकर आते हैं साथ में स्टैप्लर ---मेरे से हर स्ट्रिप के बारे में पूछ कर एक छोटी सी स्लिप पर वह सूचना पंजाबी में लिख लेते हैं और फिर उसे उस पत्ते के साथ स्टेपल कर देते हैं। मुझे उन का यह आईडिया अच्छा लगा --- आज भी वो सुबह मेरे पास इस काम के लिये आये थे –तो मैंने सोचा था कि यह आईडिया मैं नेट पर लिखूंगा, सो मैंने अपना काम कर दिया। वैसे जाते जाते एक बार और भी है कि जब भी आप किसी स्ट्रिप से कोई टैबलेट अथवा कैप्सूल निकालें तो कुछ इस तरह का ध्यान रहे कि आखिरी टैबलेट तक उस पत्ते के पीछे लिखी एक्सपायरी की तारीख दिखती रहे ---ऐसा करना बिल्कुल संभव है – वरना मैं बहुत बार देखा है कि अभी स्ट्रिप में छः गोली होती हैं लेकिन उस के पीछे एक्सपॉयरी की तारीख न होने की वजह से वह कुछ दिनों बाद कचरेदान में ही जाती है।

कहां ये सब दवाईयों-वाईयों की बातें --- परमात्मा से प्रार्थना है कि सब तंदरूस्त रहें --- और हमेशा मस्त रहें। आमीन !!